← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय बाईसवां: ग्रहों की कक्षाएँ

5.22राजोबाचयदेतद्धगवत आदित्यस्य मेरं श्रुवं च प्रदक्षिणेन परिक्रामतो राशीनामभिमुखं प्रचलित चाप्रदक्षिणंभगवतोपवर्णितममुष्य वयं कथमनुमिमीमहीति ॥

१॥

राजा उवाच--राजा ( महाराज परीक्षित ) ने पूछा; यत्‌--जो; एतत्‌--इस; भगवतः --सर्वशक्तिमान; आदित्यस्य--सूर्य( सूर्यनारायण ) का; मेरुम्‌--सुमेरु पर्वत; ध्रुवम्‌ च--तथा थ्रुवलोक; प्रदक्षिणेन--दाहिने रखकर; परिक्रामतः--परिक्रमा करतेहुए; राशीनाम्‌--राशियों की; अभिमुखम्‌--ओर मुख करके; प्रचलितम्‌ू--गति करते हुए; च--तथा; अप्रदक्षिणम्‌--बाँये रखकर; भगवता--आपके द्वारा; उपवर्णितम्‌--वर्णित; अमुष्य--उसका; वयम्‌--हम ( श्रोता ); कथम्‌--किस प्रकार;अनुमिमीमहि--तर्क तथा निर्णय द्वारा स्वीकार करें; इति--इस प्रकार।

राजा परीक्षित ने श्रीशुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे भगवान्‌, आपने पहले ही इस सत्य कीपुष्टि की है कि परम शक्तिमान सूर्यदेव श्ुवलोक तथा सुमेरु पर्वत को अपने दाएँ रखकरध्रुवलोक की परिक्रमा करते हैं, तो भी वे राशियों की ओर मुख किये रहते हैं और सुमेरु तथाध्रुवलोक को अपने बाएँ भी रखते हैं, अतः हम तर्क तथा निर्णय द्वारा किस प्रकार स्वीकार करेंकि हर समय सूर्यदेव सुमेरु तथा ध्रुवलोक को दाएँ तथा बाएँ दोनों ओर रखते हुए चलते हैं ?

स होवाचयथा कुलालचक्रेण भ्रमता सह भ्रमतां तदाश्रयाणां पिपीलिकादीनां गतिरन्यैवप्रदेशान्तरेष्वप्युपल भ्यमानत्वादेवं नक्षत्ररशाशिभिरुपलक्षितेन कालचक्रेण श्रुवं मेरुं च प्रदक्षिणेन'परिधावता सह परिधावमानानां तदाश्रयाणां सूर्यादीनां ग्रहाणां गतिरन्यैव नक्षत्रान्तरे राश्यन्तरेचोपलभ्यमानत्वातू, ॥

२॥

सः--शुकदेव गोस्वामी ने; ह--अत्यन्त स्पष्ट; उवाच--उत्तर दिया; यथा--जिस प्रकार; कुलाल-चक्रेण --कुम्हार के चाक के;भ्रमता--घूमते हुए; सह--साथ; भ्रमताम्‌--जो चारों ओर घूमते हुए, घूमने वाले; तत्‌ू-आश्रयाणाम्‌--उस ( चक्र ) में स्थितहोकर; पिपीलिक-आदीनाम्‌--छोटी -छोटी चींटियों की; गतिः--गति; अन्या--दूसरी; एब--ही; प्रदेश-अन्तरेषु--विभिन्नस्थानों में; अपि-- भी; उपलभ्यमानत्वात्‌--अनुभवगम्य होने के कारण; एवम्‌--इसी प्रकार; नक्षत्र-राशिभि: --नक्षत्रों तथाराशियों द्वारा; उपलक्षितेन--देखा जाकर; काल-चक्रेण --कालचक़ के साथ; ध्रुवम्‌-- ध्रुवलोक नामक नक्षत्र; मेरुम्‌--सुमेरुपर्वत को; च--तथा; प्रदक्षिणेन--दाईं ओर; परिधावता--चारों ओर घूमते हुए; सह--साथ; परिधावमानानाम्‌--परिक्रमा करनेबालों का; तत्‌-आश्रयाणाम्‌ू--जिनका आश्रय कालचक् हैं; सूर्य-आदीनाम्‌ू--सूर्य आदि; ग्रहाणाम्‌--ग्रहों की; गति:--गति;अन्या--अन्य; एव--निश्चय ही; नक्षत्र-अन्तरे--विभिन्न नक्षत्रों में; राशि-अन्तरे--विभिन्न राशियों में; च--तथा;उपलभ्यमानत्वात्‌--देखे जाने के कारण।

श्रीशुकदेव ने उत्तर दिया--जब कुम्हार के घूमते हुए चाक पर छोटी छोटी चींटियाँ बैठीरहती हैं, तो वे उसके साथ-साथ घूमती हैं, किन्तु उनकी गति चाक की गति से भिन्न होती हैं,क्योंकि कभी वे चाक के एक भाग में दिखती हैं, तो कभी दूसरे भाग पर।

इसी प्रकार राशियाँतथा नक्षत्र सुमेरु तथा ध्रुवलोक को अपने दाईं ओर रखकर कालचक्र के साथ घूमते हैं औरसूर्य तथा अन्य ग्रह चींटी के तुल्य उनके साथ-साथ घूमते हैं।

तो भी वे विभिन्न कालों में विभिन्नराशियों तथा नक्षत्रों में देखे जाते हैं।

इससे सूचित होता है कि उनकी गति राशियों तथाकालचक्र से सर्वथा भिन्न है।

स एष भगवानादिपुरुष एव साक्षात्रारायणो लोकानां स्वस्तय आत्मानं त्रयीमयं कर्मविशुद्धिनिमित्तंकविभिरपि च वेदेन विजिज्ञास्यमानो द्वादशधा विभज्य षट्सु वसन्तादिष्वृतुषुयथोपजोषमृतुगुणान्विदधाति ॥

३॥

सः--वह; एष:--यह; भगवान्‌--परम शक्तिमान; आदि-पुरुष: --आदि पुरुष; एव--ही; साक्षात्‌- प्रत्यक्षत:; नारायण:--श्रीभगवान्‌ नारायण; लोकानाम्‌--अन्य लोकों के; स्वस्तये--लाभ हेतु; आत्मानमू--स्वयं; त्रयी-मयम्‌--तीन वेदों ( साम,यजुर्‌ तथा ऋग्‌ ) से युक्त; कर्म-विशुद्धि--कर्मो की शुद्धि; निमित्तमू--कारणरूप; कविभि:--महान्‌ सन्तों द्वारा; अपि--भी;च--तथा; वेदेन--वैदिक ज्ञान से; विजिज्ञास्यमान:--पूछे जाने पर; द्वादश-धा--बारह विभागों में; विभज्य--विभाजित होकर;घट्सु--छः में; बसन्‍्त-आदिषु--वसनन्‍्त आदि; ऋतुषु--ऋतुओं में; यथा-उपजोषम्‌-- अपने पूर्व कर्मों के भोग के अनुसार;ऋतु-गुणान्‌ू--विभिन्न ऋतुओं के गुण; विदधाति--विधान करता है।

विराट जगत के आदि कारण भगवान्‌ नारायण हैं।

जब वैदिक ज्ञान से भली भाँति परिचितमहान्‌ साधुजनों ने परम पुरुष की स्तुति की तो वे समस्त लोकों का हित करने तथा कर्मो की शुद्धि के लिए सूर्य के रूप में इस भौतिक जगत में अवतरित हुए।

उन्होंने स्वयं को बारह भागोंमें विभाजित करके वसनन्‍्तादि ऋतुओं की सृष्टि की।

इस प्रकार उन्होंने ताप, शीत इत्यादि ऋतुसम्बन्धी गुणों की सृष्टि की।

तमेतमिह पुरुषास्त्रय्या विद्यया वर्णाअ्रमाचारानुपथा उच्चावचै: कर्मभिराम्नातैयोंगवितानैश्व श्रद्धयायजन्तो ज्जसा श्रेय: समधिगच्छन्ति ॥

४॥

तम्‌--उस ( श्रीभगवान्‌ ) को; एतम्‌--यह; इह--इस मर्त्यलोक में; पुरुषा:--सभी मनुष्य; त्रय्या--तीन विभागों वाले;विद्यया--वैदिक ज्ञान से; वर्ण-आश्रम-आचार--वर्णा श्रम धर्म; अनुपथा: -- अनुसरण करते हुए; उच्च-अबचै: --वर्णा श्रम धर्म( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र ) में पद के अनुसार उच्च या निम्न; कर्मभिः--अपने कर्मों द्वारा; आम्नातैः -- प्रदत्त; योग-वितानैः-- ध्यान तथा अन्य योग-क्रियाओं से; च--तथा; श्रद्धबा--अत्यन्त श्रद्धा सहित; यजन्तः--आराधना करते हुए;अज्जसा--बिना कठिनाई के; श्रेयः:--जीवन का परम लाभ; समधिगच्छन्ति-- प्राप्त करते हैं।

चारों वर्णों तथा चारों आश्रमों के लोग सामान्य रूप से सूर्यदेव के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ नारायण की उपासना करते हैं।

वे अत्यन्त श्रद्धा के साथ वेदत्रयी द्वारा प्रतिपादितअग्निहोत्र जैसे छोटे-बड़े सकाम कर्मों के अनुसार तथा योग क्रिया द्वारा परमात्मास्वरूपश्रीभगवान्‌ की आराधना करते हैं।

इस प्रकार वे सुगमतापूर्वक जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्तकरते हैं।

अथ स एष आत्मा लोकानां द्यावापृथिव्योरन्तरेण नभोवलयस्य कालचक्रगतो द्वादश मासान्भुड्ेराशिसंज्ञान्संवत्सरावयवान्मास: पक्षद्वयं दिवा नक्तं चेति सपादर्क्ृद्वयमुपदिशन्ति यावता षष्ठमंशं भुद्जीतस वै ऋतुरित्युपदिश्यते संवत्सरावयव: ॥

५॥

अथ--अतः; सः--वह; एष:--यह; आत्मा--प्राणशक्ति; लोकानाम्‌--तीनों लोकों का; द्यावू-आ-पृथिव्यो: अन्तरेण--ब्रह्माण्ड के ऊपरी तथा निचले भागों के मध्य; नभः-वलयस्य-- अन्तरिक्ष का; काल-चक्र-गत:--काल के चक्र में आसीन;द्वादश मासान्‌--बारह महीने; भुड़े --तय करता है; राशि-संज्ञान्‌--राशियों के नाम पर; संवत्सर-अवयवानू--पूरे वर्ष के अंग;मास:--एक मास; पक्ष-द्यम्‌ू--दो पखवाड़े; दिवा--दिन; नक्तम्‌ च--तथा रात्रि; इति--इस प्रकार; सपाद-ऋक्ष-द्वयम्‌--ज्योतिष गणना के अनुसार दो तथा चौथाई ( सवा दो ) नक्षत्र; उपदिशन्ति--उपदेश देते हैं; यावता--जितने समय से; षष्ठम्‌अंशम्‌--अपनी कक्ष्या का छठवाँ भाग; भुञ्जीत--तय करता है; सः--वह भाग; बै--निस्संदेह; ऋतु:-- ऋतु; इति--इसप्रकार; उपदिश्यते--उपदेशित होता है; संवत्सर-अवयवः--वर्ष का भाग।

सूर्यदेव जो नारायण अथवा विष्णु हैं और समस्त लोकों के आत्मा हैं, वे इस ब्रह्माण्ड केऊपरी तथा निचले भागों (पृथ्वी तथा द्युलोक ) के मध्य अन्तरिक्ष में स्थित हैं।

कालचक़ मेंस्थित होकर बारह मासों को तय करते हुए सूर्य बारह राशियों के सम्पर्क में आकर उनके अनुसार बारह भिन्न-भिन्न नाम धारण करते हैं।

इन बारह मासों का योगफल संवत्सर अथवा एकपूर्ण वर्ष कहलाता है।

चन्द्र गणना के अनुसार चन्द्रमा के घटने-बढ़ने के दो पक्ष मिल कर एकमास बनाते हैं।

पितृलोक ग्रह पर यही काल एक दिन तथा रात के तुल्य है।

ज्योतिष गणना केअनुसार एक मास सवा दो नक्षत्रों के बराबर होता है।

जब सूर्य दो मास यात्रा कर लेता है, तोएक ऋतु बीतती है; इसलिए ऋतु के अनुसार होने वाले परिवर्तनों को वर्ष-देह का अंग मानाजाता है।

अथ च यावतार्धन नभोवीथ्यां प्रचरति तं कालमयनमाचक्षते ॥

६॥

अथ--अब; च-- भी; यावता--जितने समय से; अर्धेन--आधा; नभः-वीथ्याम्‌-- अन्तरिक्ष में; प्रचरति--सूर्य चलता है;तम्‌--उस; कालम्‌ू--समय को; अयनम्‌--अयन; आचक्षते--कहते हैं।

इस प्रकार आधे अन्तरिक्ष को पार करने में सूर्य को जितना समय लगता है, वह अयनकहलाता है [ उत्तर या दक्षिण दिशा में |

अथ च यावतन्नभोमण्डलं सह द्यावापृथिव्योर्मण्डलाभ्यां कार्त्स्येन स ह भुद्जीत तं काल संवत्सरं'परिवत्सरमिडावत्सरमनुवत्सरं वत्सरमिति भानोर्मान्द्यशैर्यसमगतिभि: समामनन्ति ॥

७॥

अथ--अब; च-- भी; यावत्‌-- जब तक; नभः-मण्डलम्‌--उच्च तथा निम्न लोक के मध्य का अन्तरिक्ष; सह--के साथ;झहौ--ऊपरी जगत का; आपृथिव्यो:--निम्न जगत का; मण्डलाभ्याम्‌--गोलक; कार्त्स्येन--पूर्णत:; सः--वह; ह--निस्संदेह;भुल्जीत--तय करता है; तमू--उस; कालम्‌ू--काल, समय को; संवत्सरम्‌--संवत्सर; परिवत्सरमू--परिवत्सर; इडावत्सरम्‌--इडावत्सर; अनुवत्सरम्‌-- अनुवत्सर; वत्सरम्‌-- वत्सर; इति--इस प्रकार; भानो:--सूर्य की; मान्द्य-- धीमी, मन्द; शैश्य--तीक्र;सम--समान; गतिभि:--गतियों के द्वारा; समामनन्ति--अनुभवी विद्वान वर्णन करते हैं।

सूर्यदेव की तीन प्रकार की गतियाँ हैं--मन्द, तीव्र और मध्यम।

इन तीनों गतियों से स्वर्ग,पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष प्रक्षेत्रों के चारों ओर पूरी यात्रा करने में जितना समय लगता है उसेविद्वद्जन संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर तथा वत्सर--इन पाँच नामों से वर्णन करतेहैं।

सौर पद्धति ज्योतिष गणनाओं के अनुसार प्रत्येक वर्ष कलैण्डर वर्ष से छ: दिन आगे तकजाता है और चन्द्र पक्षीय वर्षों में बारह दिन का अन्तर होता है, जैसे-जैसे सम्वत्सर, परिवत्सर,इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर बीतते हैं, प्रत्येक पाँच वर्षों में दो अतिरिक्त मास जुड़ जाते हैं।

इससे छठा सम्बत्सर बन जाता है, किन्तु अतिरिक्त सम्वत्सर होने के कारण सौर-पद्धति में सम्वत्सरों की उपयुक्त पाँच नामों के अनुसार गणना की जाती है।

एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्लक्षयोजनत उपलभ्यमानो र्कस्य संवत्सरभुक्ति पश्षा भ्यां मासभुक्तिसपादर्श्नाभ्यां दिनेनैव पक्षभुक्तिमग्रचारी द्रततरगमनो भुड्डे ॥

८ ॥

एवम्‌--इस प्रकार; चन्द्रमा--चाँद; अर्क-गभस्तिभ्य:--सूर्य प्रकाश की किरणों से; उपरिष्टात्‌--ऊपर; लक्ष-योजनत:--१,००,००० योजन से; उपलभ्यमान: --स्थित रह कर; अर्कस्य--सूर्य का; संवत्सर-भुक्तिमू-- भोग का व्यतीत हुआ एक वर्ष;पक्षाभ्याम्‌-दो पक्षों के द्वारा; मास-भुक्तिमू--व्यतीत एक मास; सपाद-ऋश्षाभ्याम्‌--सवा दो दिन से; दिनेन--एक दिन से;एव--केवल; पक्ष-भुक्तिमू--पक्ष की अवधि; अग्रचारी-- आगे चलने वाला; द्रुत-तर-गमन: --अधिक तेजी से चलते हुए; भुड्ड तय करता है।

सूर्य-प्रकाश की किरणों से १,००,००० योजन (८,००,००० मील ) ऊपर चन्द्रमा है जोसूर्य से अधिक तीब्र गति से यात्रा करता है।

वह दो चन्द्र पक्षों में एक सौर संवत्सर के समान दूरीतय कर लेता है।

अर्थात्‌ सवा दो दिन में सूर्य के एक मास के तुल्य और एक दिन में सूर्य केएक पक्ष के बराबर दूरी तय कर लेता है।

अथ चापूर्यमाणाभिश्व कलाभिरमराणां क्षीयमाणाभिश्च कलाभि: पितृणामहोरात्राणिपूर्वपक्षापरपक्षाभ्यां वितन्वान: सर्वजीवनिवहप्राणो जीवश्वैकमेकं नक्षत्र त्रिंशता मुहूर्तैर्भुड़े ॥

९॥

अथ--इस प्रकार; च--भी; आपूर्यमाणाभि:--क्रमशः बढ़ते हुए; च--तथा; कलाभि:--चन्द्रमा की कलाओं; अमराणाम्‌--देवताओं का; क्षीयमाणाभि: --क्रमश: घटते रहने से; च--तथा; कलाभि:--चन्द्र कलाओं से; पितृणाम्‌--पितृलोक-वासियोंका; अहः-रात्राणि--दिन तथा रात; पूर्व-पक्ष-अपर-पक्षाभ्याम्‌ू--कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष से; वितन्‍न्वान:--वितरित करते हुए;सर्व-जीव-निवह--समस्त जीवात्माओं का; प्राण:--जीवन, प्राण; जीव:ः--जीव; च-- भी; एकम्‌ एकम्‌--एक के बाद एक;नक्षत्रमू--तारा-समूह; त्रिंशता--तीस; मुहूर्तैं:--मुहूर्तों से; भुड़े --तय करता है।

जब चन्द्रमा बढ़ता है ( शुक्ल पक्ष में ) तो इसका प्रकाशमय अंश प्रतिदिन बढ़ता जाता है,जिससे देवताओं के लिए दिन और पितरों के लिए रात्रि उत्पन्न होती है।

किन्तु जब चन्द्रमा घटतारहता है ( कृष्ण पक्ष में ) तो देवताओं के लिए रात्रि और पितरों के लिए दिन उत्पन्न होते हैं।

इसप्रकार तीस मुहूर्तों में ( पूरे एक दिन में ) चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र से होकर गुजरता है।

चन्द्रमाअमृतमयी शीतलता प्रदान करके अन्नों की वृद्धि को प्रभावित करता है, इसलिए चन्द्रदेव कोसमस्त जीवात्माओं का प्राण माना जाता है।

फलस्वरूप उसे इस ब्रह्माण्ड में वास करने वालामुख्य प्राणी, जीव, कहा गया है।

य एष षोडशकलः पुरुषो भगवान्मनोमयोचन्नमयोमृतमयो देवपितृमनुष्यभूतपशुपक्षिसरीसूपवीरु धांप्राणाप्यायनशीलत्वात्सर्वमय इति वर्णयन्ति ॥

१०॥

यः--जो; एष:--यह; षोडश-कलः--सोलह कलाओं वाला ( पूर्ण चन्द्रमा ); पुरुष:--पुरुष; भगवान्‌-- श्रीभगवानू से प्राप्तमहान्‌ शक्ति वाला; मन:-मय:--मन का प्रधान श्रीविग्रह; अन्न-मयः--अन्नों का शक्ति स्त्रोत; अमृत-मयः--अमृतमय; देव--समस्त देवताओं का; पितृ--समस्त पितृलोकवासियों का; मनुष्य--समस्त मानवगण; भूत--समस्त जीवात्माएँ; पशु--समस्तजानवर; पक्षि--पक्षियों का; सरीसृप--रेंगने वाले जन्तुओं का; वीरुधाम्‌--समस्त लताओं तथा वृक्षों का; प्राण--प्राणवायु;अपि--निश्चय ही; आयन-शीलत्वात्‌--पोषण करने से; सर्व-मयः--सर्वव्यापी; इति--इस प्रकार; वर्णयन्ति--विद्वान लोगवर्णन करते हैं।

समस्त शक्तियों से पूर्ण होने के कारण चन्द्रमा श्रीभगवान्‌ के प्रभाव का सूचक है।

प्रत्येकव्यक्ति के मन का प्रमुख श्रीविग्रह होने के कारण चन्द्रमा मनोमय कहलाता है।

वह अन्नमय भीकहलाता है क्योंकि वह समस्त वनस्पतियों तथा पौधों को शक्ति प्रदान करता है।

समस्तजीवात्माओं का प्राणाधार होने से वह अमृतमय भी कहा जाता है।

चन्द्रमा समस्त देवताओं,पितरों, मनुष्यों, पशुओं, पश्षियों, सरीसूपों, वृक्षों, पौधों तथा अन्य सभी जीवात्माओं को प्रसन्नकरने वाला हैं।

सभी प्राणी चन्द्रमा की उपस्थिति से संतुष्ट रहते हैं; फलतः वह 'सर्वमय' भीकहलाता है।

तत उपरिष्टादिद्वलक्षयोजनतो नक्षत्राणि मेरुं दक्षिणेनेव कालायन ई श्वरयोजितानिसहाभिजिताष्टाविंशति: ॥

११॥

ततः--चन्द्रमा के उस भाग से; उपरिष्टात्‌--ऊपर; द्वि-लक्ष-योजनत:--२, ००,००० योजन; नक्षत्राणि--अनेक नक्षत्र; मेरुम्‌--सुमेरु पर्वत; दक्षिणेन एब--दाईं दिशा में; काल-अयने--कालचक्र में; ईश्वर-योजितानि-- श्रीभगवान्‌ द्वारा जोड़ा गया; सह--साथ; अभिजिता--अभिजित्‌ नामक नक्षत्र; अष्टा-विंशति: --अट्टाइस |

चन्द्रमा से २,००,००० योजन ( १६,००,००० ) ऊपर कई नक्षत्र स्थित हैं।

श्रीभगवान्‌ नेउन्हें कालचक़ में संयुक्त कर रखा है, अतः ये सुमेरु पर्वत को दाई ओर रखते हुए घूमते रहते हैंऔर इनकी गति सूर्य की गति से सर्वथा भिन्न होती है।

अभिजित्‌ सहित कुल अट्टाइस नक्षत्र हैं।

तात्पर्य : यहाँ जिन नक्षत्रों का उल्लेख हुआ है वे सूर्य से १६,००,००० मील (२,००,०००योजन) ऊपर हैं।

इस प्रकार वे पृथ्वी से ४०,००,००० मील ऊपर हुए।

तत उपरिष्टादुशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः पश्चात्सहैव वार्कस्यशैद्रयमान्धसाम्याभिर्गतिभिरकवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल एव प्रायेण वर्षयंश्रारेणानुमीयते सवृष्टिविष्टम्भग्रहोपशमन: ॥

१२॥

ततः--इन नक्षत्र पुझों से; उपरिष्ठात्‌--ऊपर; उशना--शुक्र; द्वि-लक्ष-योजनत:--२, ००,००० योजन; उपलभ्यते--अनु भवकिया जाता है; पुरतः--सामने; पश्चात्‌--पीछे; सह--साथ-साथ; एव--निस्सन्देह; वा--तथा; अर्कस्य--सूर्य का; शैदय--तीव्र; मान्द--मन्द; साम्याभि:-- समान; गतिभि:ः--गतियों से; अर्कवत्‌--सूर्य के ही समान; चरति--घूमता है; लोकानाम्‌ू--इस ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों का; नित्यदा--अनवरत; अनुकूल:--अनुकूल; एब--निस्सन्देह; प्रायेण--प्राय:; वर्षयन्‌--वर्षाकरके; चारेण--बादल उठाकर; अनुमीयते--देखा जाता है; सः--वह ( शुक्र ); वृष्टि-विष्टम्भ--वर्षा के लिए बाधास्वरूप;ग्रह-उपशमन:--उपशमनकारी ग्रह |

इन नक्षत्रों से लगभग २,००,००० योजन ( १६,००,००० मील ) ऊपर शुक्र ग्रह है जोलगभग सूर्य की ही गति अर्थात्‌ तीव्र, मन्द तथा मध्यम गतियों से घूमता है।

वह कभी सूर्य केपीछे, कभी सामने और कभी उसी के साथ-साथ रहता है।

वह वर्षा में विघ्न डालने वाले ग्रहोंको शानन्‍्त करने वाला है, अतः इसकी उपस्थिति में वर्षा होती है और इसलिए यह इस ब्रह्माण्डके समस्त जीवों के अनुकूल माना जाता है।

इसे विद्वानों ने स्वीकार किया है।

उशनसा बुधो व्याख्यातस्तत उपरिष्टाद्दूवलक्षयोजनतो बुध: सोमसुत उपलभ्यमान: प्रायेणशुभकृद्यदार्काद्व्यतिरिच्येत तदातिवाताभ्रप्रायानावृष्ठयादिभयमाशंसते ॥

१३॥

उशनसा--शुक्र से; बुध:--बुध; व्याख्यातः--जिसकी व्याख्या हो गई हो; तत:--उस ( शुक्र ) से; उपरिष्टात्‌--ऊपर; द्वि-लक्ष-योजनत:--२,००,००० योजन अर्थात्‌ १६,००,००० मील; बुध:--बुध ग्रह; सोम-सुत:--चन्द्रमा का पुत्र; उपलभ्यमान:--अवस्थित है; प्रायेण--प्राय:; शुभ-कृत्‌--ब्रह्माण्ड के वासियों के लिए शुभ; यदा--जब; अर्कात्‌--सूर्य से; व्यतिरिच्येत--पृथक्‌ किया जाता है; तदा--उस समय; अतिवात--चक्रवात तथा अन्य विघ्न; अभ्र--बादल; प्राय--प्राय:; अनावृष्टि-आदि--अनावृष्टि इत्यादि; भयमू-- भय; आशंसते--बढ़ाता है

बुध को शुक्र के ही समान बताया है, क्योंकि यह कभी सूर्य के पीछे, कभी सामने औरकभी-कभी इसके साथ-साथ घूमता है।

यह शुक्र से १६,००,००० मील अथवा पृथ्वी से७२,००,००० मील ऊपर स्थित है।

यह चन्द्रमा का पुत्र होने से विश्व के वासियों का मंगल करनेवाला है, किन्तु जब यह सूर्य के साथ नहीं घूमता होता तो यह चक्रवात, अंधड़, अनियमित वर्षातथा जलरहित बादलों की जानकारी देता है।

इस प्रकार अवर्षा या अतिवर्षा के कारण यहभयावह परिस्थिति उत्पन्न करता है।

अत ऊर्ध्वमड्रकोपि योजनलक्षद्वितय उपलभ्यमानस्त्रिभिस्त्रिभि: पक्षेरकेकशो राशीन्द्वादशानुभुड़ेयदि न वक्रेणाभिवर्तते प्रायेणाशुभग्रहोघशंस: ॥

१४॥

अतः--इससे; ऊर्ध्वम्‌--ऊपर; अड्जारकः--मंगल; अपि-- भी; योजन-लक्ष-द्वितये-- २,००,००० योजन अर्थात्‌ १६,००,०००मील की दूरी पर; उपलभ्यमान:--स्थित है; त्रिभि: त्रिभिः--तीन-तीन करके; पक्षैः--पक्ष; एक-एकशः--एक के पश्चात्‌ एक;राशीनू--राशियाँ; द्वादश--बारह; अनुभुड़े --से पार करता है; यदि--यदि; न--नहीं; वक्रेण--वक्र सहित; अभिवर्तते--निकट पहुँचता है; प्रायेण--प्राय:; अशुभ-ग्रह:ः-- प्रतिकूल, अमंगलकारी ग्रह; अघ-शंस:ः--कष्ट उत्पन्न करने वाला |

बुध से १६,००,००० मील ऊपर अथवा पृथ्वी से ८८,००,००० मील ऊपर मंगल ग्रह है।

यदि यह वक्रगति से न चले तो एक-एक राशि को तीन-तीन पक्षों में पार करता हुआ क्रमशःबारहों राशियों में से यात्रा करता है।

यह प्राय: सदैव वर्षा तथा अन्य प्रभावों के रूप में प्रतिकूलअवस्थाएँ उत्पन्न करता है।

तत उपरिष्टादिद्वलक्षयोजनान्तरगता भगवान्बृहस्पतिरेकैकस्मिन्राशौ परिवत्सरं परिवत्सरं चरति यदि नवक्रः स्यात्प्रायेणानुकूलो ब्राह्मणकुलस्य ॥

१५॥

ततः--वह ( मंगल ); उपरिष्टात्‌--ऊपर; द्वि-लक्ष-योजन-अन्तर-गता:-- २, ००,००० योजन अर्थात्‌ १६,००,००० मील की दूरीपर स्थित; भगवान्‌--सर्वाधिक शक्तिमान ग्रह; बृहस्पति: --बृहस्पति; एक-एकस्मिन्‌ू--एक के पश्चात्‌ एक; राशौ--राशि में;परिवत्सरम्‌ परिवत्सरम्‌--प्रति परिवत्सर तक; चरति--चलता है; यदि--यदि; न--नहीं; वक़:--वक्र; स्थातू--हो जाता है;प्रायेण--प्राय:; अनुकूल: --शुभ; ब्राह्मण-कुलस्य--इस ब्रह्माण्ड के ब्राह्मणों के लिए।

मंगल से १,६००,००० योजन अथवा पृथ्वी से १०,४००,००० मील ऊपर बृहस्पति नामकग्रह स्थित है जो एक परिवत्सर में एक राशि की यात्रा करता है।

यदि यह वक्रगति से न चले तोयह ब्राह्मणों के लिए अत्यन्त अनुकूल रहता है।

तत उपरिष्टाद्योजनलक्षद्वयात्प्रतीयमान: शनैश्चवर एकैकस्मिन्राशौ त्रिंशन्‍्मासान्विलम्बमान: सवनिवानुपर्येतितावद्ध्िरनुवत्सरैः प्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकर: ॥

१६॥

ततः--वह ( बृहस्पति ); उपरिष्टात्‌--ऊपर; योजन-लक्ष-द्वयातू-- २, ००,००० योजन ( १६, ००,००० मील ) की दूरी से;प्रतीयमान:--अवस्थित है; शनैश्वर:--शनिश्चर ग्रह; एक-एकस्मिन्‌ू--एक के पश्चात्‌ एक; राशौ--राशि में; त्रिंशत्‌ मासानू--तीस मास तक; विलम्‌-बमान: --विलम्ब करते हुए, रुकते हुए; सर्वानू--सभी बारह राशियाँ; एब--ही; अनुपर्येति--को पारकरता है; तावद्धिः--उतने; अनुवत्सरैः -- अनुवत्सरों से; प्रायेण-- प्रायः; हि--निस्सन्देह; सर्वेषाम्‌--समस्त वासियों के लिए;अशान्तिकर:-- अत्यधिक कष्टकारक |

बृहस्पति से २,००,००० योजन अर्थात्‌ १२१६,००,००० मील और पृथ्वी से १२,२०,००,०००मील ऊपर शनिग्रह स्थित है जो तीस-तीस मास में प्रत्येक राशि से होकर जाता है और तीसअनुव्त्सरों में सम्पूर्ण राशिवृत्त पूरा करता है।

यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए अत्यन्त अशुभ है।

तत उत्तरस्माहृषय एकादशलक्षयोजनान्तर उपलभ्यन्ते य एव लोकानां शमनुभावयन्तो भगवतोविष्णोर्यत्परमं पद प्रदक्षिणं प्रक्रमन्ति, ॥

१७॥

ततः--शनि ग्रह; उत्तरस्मात्‌--ऊपर; ऋषय: --ऋषिगण; एकादश-लक्ष-योजन-अन्तरे-- ११,० ०,००० योजन की दूरी पर;उपलभ्यन्ते-- अवस्थित है; ये--सभी; एब--ही; लोकानाम्‌--ब्रह्माण्ड के समस्त निवासियों के लिए; शम्‌--शुभ;अनुभावयन्तः --सदैव सोचते हैं; भगवत:-- श्रीभगवान्‌; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु का; यत्‌--जो; परमम्‌ पदम्‌--परम धाम;प्रदक्षिणम्‌--दायें रख कर; प्रक्रमन्ति--परिक्रमा करते हैं

शनिग्रह से ११,००,००० योजन अर्थात्‌ ८८,००,००० मील (अथवा पृथ्वी से२,०८,००,००० मील ) ऊपर सप्तर्षि अवस्थित हैं, जो सदैव ब्रह्माण्ड के समस्त प्राणियों कीमंगल-कामना करते रहते हैं।

वे भगवान्‌ विष्णु के परम धाम श्रुवलोक की प्रदक्षिणा करते हैं।

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