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अध्याय इक्कीसवाँ: सूर्य की गति

5.21एतावानेव भूवलयस्य सन्निवेश: प्रमाणलक्षणतो व्याख्यातः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एतावान्‌--इतना; एव--ही; भू-वलयस्य सन्निवेश:--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कीयोजना; प्रमाण-लक्षणत:--लक्षणों तथा माप के अनुसार ( पचास करोड़ योजन या ४ अरब लम्बाई तथा चौड़ाई );व्याख्यात:--अनुमान किया गया।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन, मैंने यहाँ तक आपसे विद्वानों के अनुमानों केआधार पर ब्रह्माण्ड के व्यास ( पचास करोड़ योजन या ४ अरबमील ) तथा इसके सामान्यलक्षणों का वर्णन किया है।

एतेन हि दिवो मण्डलमानं तद्ठविद उपदिशन्ति यथा द्विदलयोर्निष्पावादीनां ते अन्तरेणान्तरिक्षंतदुभयसन्धितम्‌ ॥

२॥

एतेन--इस अनुमान के आधार पर; हि--निस्सन्देह; दिवः--स्वर्गलोक का; मण्डल-मानम्‌--गोलक का परिमाण( माप ); ततू-विदः--इसको जानने वाले विद्वज्जन; उपदिशन्ति-- उपदेश देते हैं; यथा--जिस प्रकार; द्वि-दलयो:--दो अर्द्ध॑भागों में; निष्पाव-आदीनाम्‌--अन्न के दाने यथा गेहूँ के; ते--दो विभागों का; अन्तरेण--बीच के स्थान में; अन्तरिक्षम्‌-- आकाश या बाह्य-आकाश; तत्‌--दोनों के द्वारा; उभय--दोनों ओर; सन्धितम्‌--जहाँ दोनों भाग जुड़े हैं

जिस प्रकार गेहूँ के दाने को भागों में विभाजित कर देने पर निचले भाग के परिमाण ( आकार ) का ज्ञान होने पर ऊपरी भाग का पता लगाया जाता है उसी प्रकार भूगोलवेत्ताओं काकहना है कि इस ब्रह्माण्ड के ऊपरी भाग की माप को तभी समझा जा सकता है, जब निचलेभाग की माप ज्ञात हो।

भूलोक तथा झुलोक के बीच का आकाश अन्तरिक्ष अथवा बाह्य-आकाश कहलाता है।

यह भूलोक की चोटी तथा झ्युलोक के निचले भाग को जोड़ता है।

यन्मध्यगतो भगवांस्तपतां पतिस्तपन आतपेन त्रिलोकीं प्रतपत्यवभासयत्यात्मभासा स एउदगयनदक्षिणायनवैषुवतसंज्ञाभिर्मान्दशैरयसमानाभिर्गतिभिरारोहणावरोहणसमानस्थानेषुयथासवनमभिपद्यमानो मकरादिषु राशिष्वहोरात्राणि दीर्घहस्वसमानानि विधत्ते ॥

३ ॥

यत्‌--जिस ( मध्यावकाश ) का; मध्य-गत: --मध्य में स्थित होने से; भगवान्‌--सर्वशक्तिमान; तपताम्‌ पति: --सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको तपाने वालों का स्वामी; तपन:--सूर्य:; आतपेन--ताप से; त्रि-लोकीम्‌--तीनों लोकों को; प्रतपति--तप्त करता है;अवभासयति--प्रकाशित करता है; आत्म-भासा--अपनी भास्कर किरणों से; सः--वह; एष: --सूर्यगोलक ; उदगयन--विषुव॒त रेखा के उत्तर की ओर गमन का; दक्षिण-अयन--विषुवत रेखा के दक्षिण गमन का; वैषुव॒त-- अथवा विषुव॒त रेखापार करने का; संज्ञाभिः--विभिन्न नामों से; मान्दय--मन्दता से; शैश्य--शीघ्रता से; समानाभि:--तथा समानता से; गतिभि: --गति से; आरोहण--ऊपर जाने; अवरोहण--नीचे जाने की; समान--मध्य में स्थित रहने की; स्थानेषु--स्थितियों में; यथा-सबनम्‌-- श्रीभगवान्‌ की आज्ञानुसार; अभिपद्यमान:--गति करते हुए; मकर-आदिषु--मकर आदि; राशिषु--विभिन्न राशियोंमें; अहः-रात्राणि--दिन तथा रात्रियाँ; दीर्घ--लम्बे; हस्व--छोटे; समानानि--समान; विधत्ते--करता है |

उस अन्तरिक्ष के मध्य में ताप उत्पन्न करने वाले समस्त ग्रहों का राजा परम तेजवान सूर्य हैजो अपने प्रकाश से समस्त ब्रह्माण्ड को तप्त करता है और उसको वास्तविक स्वरूप प्रदानकरता है।

यह समस्त जीवात्माओं को प्रकाश प्रदान करता है, जिससे वे देख पाते हैं।

श्रीभगवान्‌की आज्ञानुसार वह उत्तरायण, दक्षिणायन होकर या विषुव॒त रेखा को पार करते हुए मन्द, शीघ्रऔर मध्यम गतियों से घूमता हुआ समयानुसार मकरादि राशियों में ऊँचे-नीचे और समान स्थानोंमें जाकर दिन तथा रात को बड़ा, छोटा या समान बनाता है।

यदा मेषतुलयोर्वर्तते तदाहोरात्राणि समानानि भवन्ति यदा वृषभादिषु पञ्ञसु च राशिषु चरति तदाहान्येववर्धन्ते हसति च मासि मास्येकैका घटिका रात्रिषु, ॥

४॥

यदा--जब; मेष-तुलयो:--मेष तथा तुला राशियों में; वर्तते--सूर्य रहता है; तदा--उस समय; अहः-रात्राणि--दिन तथा रातें;समानानि--समान अवधि की; भवन्ति--होती हैं; यदा--जब; वृषभ-आदिषु--वृषभ, मिथुन आदि; पञ्ञसु-- पाँच; च-- भी;राशिषु--राशियों में; चरति--घूमता है; तदा--उस समय; अहानि--दिन; एव--निश्चय ही; वर्धन्ते--बढ़ते हैं; हसति--घटतेहैं; च-- भी; मासि मासि-- प्रत्येक मास में; एक-एका--एक; घटिका--आधा घंटा; रात्रिषु--रातों में |

जब सूर्य मेष या तुला राशि पर आता है, तो दिन और रात की अवधि समान हो जाती है।

जब यह वृषभ इत्यादि पाँचों राशियों पर से गुजरता है, तो दिन ( कर्क तक ) बढ़ता जाता है औरतब प्रति मास आधा घंटा घटता रहता है, जब तक दिन तथा रात्रि पुनः ( तुला में ) समान नहीं होजाते।

यदा वृश्चिकादिषु पञ्ञसु वर्तते तदाहोरात्राणि विपर्ययाणि भवन्ति ॥

५॥

यदा--जब; वृश्चिक-आदिषु--वृश्चिक इत्यादि; पञ्ञसु--पाँच; वर्तते--रहता है; तदा--उस काल; अहः-रात्राणि--दिन तथारात; विपर्ययाणि-- इसके विपरीत ( दिन घटता और रात बढ़ती है ); भवन्ति--होते हैं।

जब सूर्य वृश्चिक इत्यादि पाँच राशियों से होकर गुजरता है, तो दिन घटता है ( जब तक यहमकर राशि पर नहीं आ जाता ) और फिर क्रमशः मास प्रति मास बढ़ता जाता है जब तक दिनऔर रात समान ( मेष पर ) नहीं हो जाते।

यावद्दक्षिणायनमहानि वर्धन्ते यावदुदगयनं रात्रय: ॥

६॥

यावत्‌--जब तक; दक्षिण-अयनम्‌--सूर्य दक्षिण को चला जाता है; अहानि--दिन; वर्धन्ते--बढ़ते हैं; यावत्‌--जब तक;उदगयनम्‌--सूर्य उत्तर को जाता है ( उत्तरायण ); रात्रय:--रातें |

सूर्य के दक्षिणायन होने तक दिन बढ़ते रहते हैं और उत्तरायण होने तक रातें लम्बी होतीजाती हैं।

एवं नव कोटय एकपश्ञाशल्लक्षाणि योजनानां मानसोत्तरगिरिपरिवर्तनस्योपदिशन्ति तस्मिन्नैन्द्रीं पुरीपूर्वस्मान्मेरोदेबधानीं नाम दक्षिणतो याम्यां संयमनीं नाम पश्चाद्वारुणीं निम्लोचनीं नाम उत्तरतः सौम्यांविभावरीं नाम तासूदयमध्याह्रास्तमयनिशीथानीति भूतानां प्रवृत्तिनिवृत्तिनिमित्तानि समयविशेषेणमेरोश्वतुर्दिशमू, ॥

७॥

एवम्‌--इस प्रकार; नव--नौ; कोटय:--करोड़; एक-पञ्ञाशत्‌ू--इक्यावन; लक्षाणि--लाख; योजनानाम्‌--योजनों का;मानसोत्तर-गिरि--मानसोत्तर पर्वत की; परिवर्तनस्थ--परिक्रमा का; उपदिशन्ति--वे ( विद्वान ) उपदेश देते हैं; तस्मिनू--उसपर्वत पर; ऐन्द्रीमू--इन्द्र की; पुरीम्‌ू-- पुरी, नगर; पूर्वस्मात्‌--पूर्व दिशा में; मेरो:--सुमेरु पर्वत की; देवधानीम्‌--देवधानी;नाम--नामक; दक्षिणत: --दक्षिण दिशा में; याम्याम्‌ू--यमराज का; संयमनीम्‌--संयमनी; नाम--नामक; पश्चात्‌-पश्चिमदिशा में; वारुणीम्‌ू--वरुण का; निम्लोचनीम्‌--निम्लोचनी; नाम--नामक ; उत्तरत:--उत्तर दिशा में; सौम्याम्‌--चन्द्रमा का;विभावरीम्‌--विभावरी; नाम--नामक; तासु--इन सबों में; उदय--सूर्योदय; मध्याह्--दोपहर; अस्तमय--सूर्यास्त;निशीथानि--अर्धरात्रि; इति--इस प्रकार; भूतानाम्‌--जीवात्माओं की; प्रवृत्ति--क्रियाशीलता; निवृत्ति--क्रियाशीलता काअन्त; निमित्तानि--कारण; समय-विशेषेण--विशेष समय द्वारा; मेरो:--सुमेरु पर्वत की; चतु:-दिशम्‌--चारों दिशाएँ।

श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे बोले--हे राजन, जैसा पहले कह चुका हूँ पण्डितों का कहना हैकि मानसोत्तर पर्वत के चारों ओर सूर्य का परिक्रमा-पथ ९,५१,००,००० ( नौ करोड़ इक्यावनलाख ) योजन ( ७६ करोड़ आठ लाख मील ) है।

मानसोत्तर पर्वत पर मेरु के पूर्व की ओर इन्द्रकी देवधानी, दक्षिण में यमराज की संयमनी, पश्चिम में वरूण की निम्लोचनी तथा उत्तर मेंचन्द्रमा की विभावरी नामक पुरियाँ स्थित हैं।

इन सभी पुरियों में मेरू के चारों ओर विशिष्टकालों के अनुसार सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त तथा अर्धरात्रि होती रहती है और तदनुसार समस्तजीवात्माएँ अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त अथवा निवृत्त होती रहती हैं।

तत्रत्यानां दिवसमध्यड्रत एव सदादित्यस्तपति सव्येनाचलं दक्षिणेन करोति; यत्रोदेति तस्य हसमानसूत्रनिपाते निम्लोचति यत्र क्वचन स्यन्देनाभितपति तस्य हैष समानसूत्रनिपाते प्रस्वापयति तत्र गतंन पश्यन्ति ये तं समनुपश्येरनू, ॥

८॥

तत्रत्यानामू--मेरु पर्वत पर रहने वाली जीवात्माओं के लिए; दिवस-मध्यड्रत:--मध्याह्कालीन; एब--ही; सदा--सदैव;आदित्य:--सूर्य; तपति--तपता है; सव्येन--वाम दिशा को; अचलमू--सुमेरु पर्वत; दक्षिणेन--दक्षिण को ( दक्षिण को बहतेपवन से प्रेरित होकर सूर्य दक्षिण को जाता है ); करोति--चलता है; यत्र--जहाँ; उदेति--उदय होता है; तस्य--उस स्थान का;वापाए ह--निश्चय ही; समान-सूत्र-निपाते--सर्वथा विपरीत दिशा वाले बिन्दु पर ठीक दूसरी ओर; निम्लोचति--सूर्यास्त होता है;यत्र--जहाँ; क्वचन--कहीं; स्वन्देन-- पसीने से; अभितपति--तपता है ( मध्याह्न में ); तस्थ-- उसका; ह--ही; एष:--यह( सूर्य ); समान-सूत्र-निपाते--एकदम विपरीत बिन्दु पर ठीक दूसरी ओर; प्रस्वापयति--सूर्य सुलाता है ( अर्द्ध॑रात्रि में ); तत्र--वहाँ; गतमू--गया हुआ; न पश्यन्ति--नहीं देखते; ये--जो; तम्‌--सूर्यास्त; समनुपश्येरनू-- देखते हुए

सुमेरु पर्वत पर रहने वाले प्राणी मध्याह्न के समय सदा ही अत्यन्त तप्त होते हैं, क्योंकिसूर्यदेव सदैव उनके सिर के ऊपर रहता है।

यद्यपि सूर्य घड़ी की विपरीत दिशा में सुमेरु पर्वत कोअपने बाईं ओर छोड़ता हुआ जाता है, किन्तु यह घड़ी की दिशा में भी घूमता है, जिससे पर्वतउसके दाईं ओर रहता दिखता है, क्योंकि उस पर दक्षिणावर्त पवन का प्रभाव पड़ता है।

जहाँ सर्वप्रथम उदय होता सूर्य दिखता है, उसके ठीक दूसरी ओर वह अस्त होता दिखता है।

उससे होकर एक सीधी रेखा खींची जाये तो इस रेखा के दूसरे सिरे के प्राणी मध्यरात्रि का अनुभवकर रहे होंगे।

इसी प्रकार यदि अस्ताचल के प्राणी अपनी ठीक दूसरी ओर स्थित देशों में जायेंतो उन्हें सूर्य उसी स्थिति में नहीं मिलेगा।

तत्रत्यानां दिवसमध्यड्गत एवं सदादित्यस्तपति सव्येनाचलं दक्षिणेन करोति; यत्रोदेति तस्य हसमानसूत्रनिपाते निम्लोचति यत्र क्वचन स्यन्देनाभितपति तस्य हैष समानसूत्रनिपाते प्रस्वापयति तत्र गतंन पश्यन्ति ये तं समनुपश्येरनू. ॥

९॥

तत्रत्यानामू--मेरु पर्वत पर रहने वाली जीवात्माओं के लिए; दिवस-मध्यड्रत:--मध्याह्कालीन; एब--ही; सदा--सदैव; आदित्य:--सूर्य; तपति--तपता है; सव्येन--वाम दिशा को; अचलम्‌--सुमेरु पर्वत; दक्षिणेन--दक्षिण को ( दक्षिण को बहते पवन से प्रेरित होकर सूर्य दक्षिण को जाता है ); करोति--चलता है; यत्र-- जहाँ; उदेति--उदय होता है; तस्थ--उस स्थान का; ह--निश्चय ही; समान-सूत्र-निपाते--सर्वथा विपरीत दिशा वाले बिन्दु पर ठीक दूसरी ओर; निम्लोचति--सूर्यास्त होता है;अत्र--जहाँ; क्वचन--कहीं ; स्यन्देन-- पसीने से; अभितपति--तपता है ( मध्याह्न में ); तस्य--उसका; ह--ही; एब:--यह ( सूर्य ); समान-सूत्र-निषपाते--एकदम विपरीत बिन्दु पर ठीक दूसरी ओर; प्रस्वापयति--सूर्य सुलाता है ( अर्द्ध॑रात्रि में ); तत्र--वहाँ; गतमू--गया हुआ; न पश्यन्ति-- नहीं देखते; ये--जो; तम्‌--सूर्यास्त; समनुपश्येरन्‌ू--देखते हुए।

सुमेरु पर्वत पर रहने वाले प्राणी मध्याह्न के समय सदा ही अत्यन्त तप्त होते हैं, क्योंकिसूर्यदेव सदैव उनके सिर के ऊपर रहता है।

यद्यपि सूर्य घड़ी की विपरीत दिशा में सुमेरु पर्वत कोअपने बाईं ओर छोड़ता हुआ जाता है, किन्तु यह घड़ी की दिशा में भी घूमता है, जिससे पर्वतउसके दाईं ओर रहता दिखता है, क्योंकि उस पर दक्षिणावर्त पवन का प्रभाव पड़ता है।

जहाँ सर्वप्रथम उदय होता सूर्य दिखता है, उसके ठीक दूसरी ओर वह अस्त होता दिखता है।

उससे होकर एक सीधी रेखा खींची जाये तो इस रेखा के दूसरे सिरे के प्राणी मध्यरात्रि का अनुभवकर रहे होंगे।

इसी प्रकार यदि अस्ताचल के प्राणी अपनी ठीक दूसरी ओर स्थित देशों में जायेंतो उन्हें सूर्य उसी स्थिति में नहीं मिलेगा।

यदा चैन्द्र्‌याः पुर्या: प्रचलते पञ्लद्शघटिकाभिर्याम्यां सपादकोटिद्दयं योजनानां सार्थद्वादशलक्षाणिसाधिकानि चोपयाति ॥

१०॥

यदा--जब; च--तथा; ऐन्द्र॒या: --इन्द्र की; पुर्या:--पुरी से; प्रचलते--चलता है, गति करता है; पञ्ञदश--पन्द्रह;घटिकाभि:--आधे घंटे की अवधि ( वस्तुतः चौबीस मिनट ); याम्यामू--यमराज के आवास तक; सपाद-कोटि-द्बयम्‌--सवादो करोड़ ( २,२५,००, ००० ); योजनानाम्‌--योजनों का; सार्थ--तथा आधा; द्वादश-लक्षाणि--बारह लाख; साधिकानि--पचास हजार अधिक; च--तथा; उपयाति--ऊपर से जाता है।

सूर्य इन्द्र की पुरी देवधानी से यमराज की पुरी संयमनी तक पन्द्रह घड़ियों ( छः घंटे ) मेंकुल मिलाकर २,३७, ७५, ० ०० योजन ( १९,०२,००,००० ) की यात्रा करता है।

एवं ततो वारुणीं सौम्यामैन्द्री च पुनस्तथान्ये च ग्रहा: सोमादयो नक्षत्रै: सह ज्योतिश्चक्रे समभ्युद्यन्ति सहवा निम्लोचन्ति ॥

११॥

एवम्‌--इस प्रकार; ततः--वहाँ से; वारुणीम्‌--वरुण की पुरी तक; सौम्याम्‌--पुरी जहाँ चन्द्रमा निवास करता है; ऐन्द्रीं च--और वह पुरी जहाँ इन्द्र निवास करता है; पुनः--फिर; तथा--इस तरह; अन्ये-- अन्य; च-- भी; ग्रहा:--ग्रह; सोम-आदय: --चन्द्रमा इत्यादि; नक्षत्रै:--सभी नक्षत्रों के; सह--साथ; ज्योति:-चक्रे --स्वर्गीय गोलक में; समभ्युद्यन्ति--उदय होते हैं; सह--के साथ; वा--अथवा; निम्लोचन्ति--अस्त होते हैं |

सूर्य यमराज की पुरी से वरुण की पुरी निम्लोचनी पहुँचता है और फिर वहाँ से चन्द्रदेव कीपुरी विभावरी से होते हुए पुनः इन्द्रपुरी पहुँच जाता है।

इसी प्रकार चन्द्रमा अन्यत्र नक्षत्रों तथाग्रहों सहित ज्योतिश्चक्र में उदित और अस्त होता रहता है।

एवं मुहूर्तेन चतुस्त्रिशल्लक्षयोजनान्यप्टशताधिकानि सौरो रथस्त्रयीमयोसौ चतसूषु परिवर्तते पुरीषु, ॥

१२॥

एवम्‌--इस प्रकार; मुहूर्तेन--एक मुहूर्त( ४८ मिनट ) में ; चतु:-त्रिंशत्‌--चौंतीस; लक्ष--लाख; योजनानि--योजन; अष्ट-शताधिकानि--आठ सौ और; सौर: रथ:--सूर्यदेव का रथ; त्रयी-मय:--जो गायत्री मंत्र द्वारा पूजित है ); असौ--वह;चतसृषु--चारों से होकर; परिवर्तते--घूमता है; पुरीषु--पुरियों से होकर।

इस प्रकार त्रयीमय अर्थात्‌ भूर्भुवः स्व: शब्दों द्वारा पूजित सूर्यदेव का रथ ऊपर वर्णितचारों पुरियों से होकर एक मुहूर्त में ३४, ००,८०० योजन ( २,७२, ०६,४०० मील ) की गति सेघूमता रहता है।

अस्यैकं चक्र द्वादशारं षण्नेमि त्रिणाभि संवत्सरात्मक॑ समामनन्ति तस्याक्षो मेरोर्मूर्धनि कृतो मानसोत्तरेकृतेतरभागो यत्र प्रोतं रविरथचक्रं तैलयन्त्रचक्रवद्‌भ्रमन्मानसोत्तरगिरौ परिभ्रमति ॥

१३॥

यस्य--जिसका; एकम्‌--एक; चक्रम्‌--चक्र; द्वादश--बारह; अरम्‌ू--ेरे, तीलियाँ; घट्‌ू--छ:; नेमि--नेमि ( रिम ); त्रि-णाभि--नाभि ( हब ) के तीन खंड ( आँवन ); संवत्सर-आत्मकम्‌--संवत्सर स्वरूप; समामनन्ति-- पूर्णतया वर्णन करते हैं;तस्य--सूर्यदेव का रथ; अक्ष:--धुरी ( एक्सल ); मेरो: --सुमेरु पर्वत की; मूर्धनि--चोटी पर; कृत:--स्थिर; मानसोत्तरे--मानसोत्तर पर्वत पर; कृत--जड़ा हुआ, लगा; इतर-भाग:--दूसरा सिरा; यत्र--जहाँ; प्रोतम्‌--लगा हुआ; रवि-रथ-चक्रम्‌--सूर्यदेव के रथ का चक्र; तैल-यन्त्र-चक्र-वत्‌--कोल्हू के समान; भ्रमत्‌-घूमते हुए; मानसोत्तर-गिरौ --मानसोत्तर पर्वत पर;परिभ्रमति--घूमता है

सूर्यदेव के रथ में एक ही चक्र है, जिसे संवत्सर कहते हैं।

बारहों महीने इसके बारह आरे,छह ऋतु, छः नेमियाँ ( हाल ) तथा तीन चार्तुमास इसके तीन भागों में विभाजित आँवने ( नाभि )हैं।

चक्र को धारण करने वाले धुरे का एक सिरा सुमेरु पर्वत की चोटी पर और दूसरा सिरामानसोत्तर पर्वत पर टिका है।

धुरे के बाहरी सिरे पर लगा यह पहिया कोल्हू के चक्र की भाँतिनिरन्तर मानसोत्तर पर्वत के चक्कर लगाता है।

तस्मिन्नक्षे कृतमूलो द्वितीयो क्षस्तुर्यमानेन सम्मितस्तैलयन्त्राक्षवद्ध्छवे कृतोपरिभाग: ॥

१४॥

तस्मिन्‌ अक्षे--उस धुरे में; कृत-मूलः--जिसका मूल भाग लगा है; द्वितीयः--दूसरा; अक्ष:--धुरा; तुर्यमानेन--चौथाई;सम्मित:--मापा गया; तैल-यन्त्र-अक्ष-वत्‌--कोल्हू के धुरे के समान; ध्रुवे-- धुव लोक तक; कृत--लगा हुआ; उपरि-भाग: --ऊपरी भाग।

कोल्हू के समान यह पहली धुरी एक दूसरी धुरी में लगी है जो इसकी चौथाई के बराबरलम्बी ( ३९,३७,५०० योजन अथवा ३, १५, ००,००० मील ) है।

इस द्वितीय धुरी का ऊपरी भागवायु की रस्सी द्वारा ध्रुवलोक से जुड़ा है।

रथनीडस्तु षदटिंत्रशल्लक्षयोजनायतस्तत्तुरीयभागविशालस्तावान्रविरथयुगो यत्र हयाशछन्दोनामानःसप्तारुणयोजिता वहन्ति देवमादित्यम्‌ ॥

१५॥

रथ-नीड:--रथ का भीतरी भाग; तु--लेकिन; षट्‌-त्रिंशत्‌ू-लक्ष-योजन-आयत: -- ३६, ००, ००० योजन लम्बा; ततू-तुरीय-भाग--इसका चौथाई भाग ( ९,००,००० योजन ); विशाल:--चौड़ाई वाला; तावान्‌--तथा इतना ही; रवि-रथ-युग: --घोड़ेके लिए जुआँ; यत्र--जहाँ; हया:--घोड़े; छन्दः-नामान:--वैदिक छन्‍्दों के विभिन्न नाम वाले; सप्त--सात; अरुण-योजिता:--अरुणदेव द्वारा नाधे गये; वहन्ति--ले जाते हैं; देवम्‌--देवता; आदित्यम्‌--सूर्यदेव को |

है राजनू, रथ का भीतरी भाग ३६,००,००० योजन ( २,८८, ००,००० मील ) लम्बा तथाइसका एक चौथाई चौड़ा ९,००,००० योजन तथा ७२,००,००० ) है।

रथ के घोड़ों के नामगायत्री आदि वैदिक छन्दों पर रखे गये हैं और उन्हें अरुणदेव ऐसे जुएँ में जोतता है जो९,००,००० योजन चौड़ा है।

यह रथ लगातार सूर्यदेव को लिये रहता है।

पुरस्तात्सवितुररुण: पश्चाच्च नियुक्त: सौत्ये कर्मण किलास्ते ॥

१६॥

पुरस्तात्‌ू--सम्मुख; सवितु:--सूर्यदेव के; अरूण:--अरूण नामक देवता; पश्चात्‌--पीछे देखता हुआ; च--तथा; नियुक्त:--संलग्न; सौत्ये--रथ के; कर्मणि--कार्य में; किल--निश्चय ही; आस्ते--रहता है।

यद्यपि अरुणदेव सूर्यदेव के सम्मुख बैठ कर रथ को हाँकते हैं तथा घोड़ों को वश में रखतेहैं, तो भी वे पीछे की ओर सूर्यदेव को देखते रहते हैं।

तथा वालिखिल्या ऋषयोडुष्ठ पर्वमात्रा: षष्टिसहस्त्राणि पुरत: सूर्य सूक्तवाकाय नियुक्ता: संस्तुवन्ति ॥

१७॥

तथा--वहाँ; वालिखिल्या: --वालखिल्य नामक; ऋषय: --ऋषिगण; अद्'ुष्ठ-पर्व-मात्राः --अंगूठे के आकार वाले; षष्टि-सहस्त्राणि--साठ हजार; पुरत:--सामने; सूर्यम्‌--सूर्य देव; सु-उक्त-वाकाय--सुस्पष्ट बोलने के लिए; नियुक्ता:--नियुक्त कियेगये; संस्तुवन्ति--स्तुति करते हैं।

अँगूठे के आकार वाले वालखिल्य नामक साठ हजार ऋषिगण सूर्य के आगे रहकर उनकास्वस्तिवाचन करते हैं।

तथान्ये च ऋषयो गन्धर्वाप्सरसो नागा ग्रामण्यो यातुधाना देवा इत्येकेकशो गणा: सप्त चतुर्दश मासिमासि भगवत्तं सूर्यमात्मानं नानानामानं पृथड्नानानामान: पृथक्कर्मभिद्ठन्द्रश उपासते ॥

१८॥

तथा--इसी प्रकार; अन्ये-- अन्य; च-- भी ; ऋषय:--ऋषिगण; गन्धर्व-अप्सरस:--गन्धर्व तथा अप्सराएँ; नागा:--नाग( सर्प );ग्रामण्य:--यक्ष; यातुधाना:--राक्षसगण; देवा:--देवता; इति--इस प्रकार; एक-एकश: --एक एक करके; गणा: --समूह;सप्त--सात; चतुर्दश--चौदह; मासि मासि--प्रत्येक महीने; भगवन्तम्‌--सर्वशक्तिमान देवता; सूर्यम्‌--सूर्य को; आत्मानम्‌--ब्रह्माण्ड का प्राण; नाना--अनेक; नामानम्‌--नाम वाला; पृथक्‌-भिन्न; नाना-नामान:--विभिन्न नाम वाला; पृथक्‌-भिन्न;कर्मभि:--अनुष्ठानों द्वारा; द्न्द्रशः--दो के समूहों में, जोड़ों में; उपासते--उपासना करते हैं

इसी प्रकार अन्य मुनि, गन्धर्व, अप्सराएँ, नाग, यक्ष, राक्षस तथा देवतागण जो संख्या मेंचौदह हैं, किन्तु दो-दो के जोड़े में विभाजित हैं, प्रतिमस नया नाम धारण करके अनेकनामधारी, सर्वाधिक शक्तिमान देवता सूर्य के रूप में श्रीभगवान्‌ की आराधना करने के लिएनिरन्तर विभिन्न कर्मकाण्डों से उपासना करते रहते हैं।

लक्षोत्तरं सार्धनवकोटियोजनपरिमण्डलं भूवलयस्य क्षणेन सगव्यूत्युत्तरं द्विसहस्त्रयोजनानि स भुड्डे ॥

१९॥

लक्ष-उत्तरमू-- १,००,००० अधिक; सार्ध--५०, ००,००० सहित; नव-कोटि-योजन--९, ००, ००,००० योजन की;परिमण्डलम्‌--परिधि; भू-वलयस्य--पृथ्वी गोलक का भूमण्डल; क्षणेन--एक क्षण में; सगव्यूति-उत्तरम्‌--दो कोस ( चारमील ) अधिक; द्वि-सहस्त्र-योजनानि-- २,००० योजन; सः--सूर्यदेव; भुड्डे --तै करता है |

हे राजनू, भूमण्डल की परिक्रमा करते हुए सूर्यदेव एक क्षण में दो हजार योजन तथा दोकोस ( १६,००४ मील ) की गति से ९,५१,००,००० योजन ( ७६, ०८८०,००० मील ) की दूरीतय करता है।

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