← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची
अध्याय सत्रह: गंगा नदी का अवतरण
5.17श्रीशुक उबाचतत्र भगवतः साक्षाद्यज्जलिड्रस्य विष्णोर्विक्रमतोवामपादाडुष्टनखनिर्मिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टाया बाह्य जलधारा तच्चरणपड्डजावनेजनारुणकिड्जल्कोपरज्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामलासाक्षाद्धगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचो उभिधीयमानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो मूर्थन्यवततारयतक्तिद्विष्णुपदमाहु: ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; तत्र--उस काल; भगवतः-- श्रीभगवान् के अवतार का; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; यज्ञ-लिड्डस्थ--समस्त यज्ञों के फल का भोक्ता; विष्णो:-- भगवान् विष्णु का; विक्रमत:--दूसरा पग भरते हुए; वाम-पाद--बाएँपैर के; अद्डुष्ठ--अँगूठे के; नख--नाखून द्वारा; निर्भिन्न-- भेद कर; ऊर्ध्व--ऊपरी; अण्ड-कटाह--ब्रह्माण्ड का ऊपरी आवरण( इसमें पृथ्वी, जल, अग्नि इत्यादि सात आवरण हैं ) ); विवरेण--छिद्र से होकर; अन्तः-प्रविष्टा--ब्रह्माण्ड को भेद कर; या--जो; बाह्म-जल-धारा--ब्रह्मण्ड से बाहर कारण-समुद्र जल की धारा; तत्--उसका; चरण-पड्डज--चरणकमल का;अवनेजन--धोकर; अरुण-किज्लल्क--लाल चूर्ण के द्वारा; उपरस्चिता--रंजित होकर; अखिल-जगत्--सम्पूर्ण संसार के;अघ-मल--पापकर्म; अपहा--विनष्ट करती है; उपस्पर्शन--जिसके स्पर्श से; अमला--नितान्त शुद्ध; साक्षात्-प्रत्यक्षतः;भगवत््-पदी -- श्रीभगवान् के चरणकमल से निकलने वाली; इति--इस प्रकार; अनुपलक्षित--वर्णित; बच: --नाम से;अभिधीयमाना--पुकारी जाकर; अति-महता कालेन--दीर्घकाल के पश्चात्; युग-सहस्त्र-उपलक्षणेन--एक हजार युग; दिव:--आकाश के; मूर्थनि--शीश पर ( ध्रुव लोक ); अवततार--नीचे उतरी; यत्--जो; तत्--वह; विष्णु-पदम्-- भगवान् विष्णु केचरणकमल; आहु:--पुका रते हैं |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन, सभी यज्ञों के भोक्ता भगवान् विष्णु महाराज बलिकी यज्ञशाला में वामनदेव का रूप धारण करके प्रकट हुए।
तब उन्होंने अपने वाम पाद कोब्रह्माण्ड के छोर तक फैला दिया और अपने पैर के अँगूठे से उसके आवरण में एक छिद्र बनादिया।
इस छिद्र से निकले कारण-समुद्र के विशुद्ध जल ने गंगा नदी के रूप में इस ब्रह्माण्ड मेंप्रवेश किया।
विष्णु के चरणकमलों को, जो केशर से लेपित थे, धोने से गंगा का जल अत्यन्तमनोहर गुलाबी रंग का हो गया।
गंगा के दिव्य जल के स्पर्श से क्षण भर में प्राणियों के मन केभौतिक विकार शुद्ध हो जाते हैं, किन्तु इसका जल सदैव शुद्ध रहता है।
चूँकि इस ब्रह्माण्ड मेंप्रविष्ट होने के पूर्व गंगा प्रत्यक्ष रूप से विष्णुजी के चरणकमलों का स्पर्श करती है, इसलिए वहविष्णुपदी कहलाती है।
बाद में उसके अन्य नाम पड़े यथा जाह्वी तथा भागीरथी।
एक हजारयुगों के बाद गंगा का जल श्रुवलोक में उतरा जो इस ब्रह्माण्ड का सर्वोपरि लोक है।
इसीलिए सभी सन्त तथा दिद्वान श्रुवलोक को विष्णुपद ( अर्थात् भगवान् विष्णु चरणकमलों में स्थित )कहते हैं।
यत्र ह वाव वीरब्रत औत्तानपादि: परमभागवतोस्मत्कुलदेवताचरणारविन्दोदकमितियामनुसवनमुत्कृष्यमाणभगवद्धक्तियोगेन ह॒ढं क्लिद्यमानान्तईदयऔत्कण्ठ्यविवशामीलितलोचनयुगलकुड्मलविगलितामलबाष्पकलयाभिव्यज्यमानरोमपुलककुलकोधुनापि परमादरेण शिरसा बिभर्ति ॥
२॥
यत्र ह वाव--श्रुवलोक में; वीर-ब्रतः --दृढ़प्रतिज्ञ; औत्तानपादि: --महाराज उत्तानपाद का विख्यात पुत्र; परम-भागवत:ः--परमभक्त; अस्मत्--हमारा; कुल-देवता--पारिवारिक देवता का; चरण-अरविन्द--चरणकमल; उदकम्---जल में; इति--इसप्रकार; याम्ू--जो; अनुसवनम्--सतत; उत्कृष्यमाण--वर्धमान; भगवत्-भक्ति-योगेन-- भगवान् के प्रति भक्ति के द्वारा;हढम्--अत्यन्त; क्लिद्यमान-अन्त:-हृदय:ः--अपने हृदय के अन्तः में मृदु होकर; औत्कण्ठ्य--अत्यन्त उत्कंठा ( चिन्ता ) से;विवश--तत्क्षण; अमीलित--कुछ कुछ खुले; लोचन--नेत्रों का; युगल--जोड़ा; कुड्मल--कली से; विगलित--विकीर्णहोकर; अमल--मलरहित; बाष्प-कलया--अश्रु-पूर्ण; अभिव्यज्यमान-- प्रकट रूप में; रोम-पुलक-कुलक: --शरीर में प्रसन्नताके द्योतक लक्षण; अधुना अपि--आज भी; परम-आदरेण--अत्यन्त आदरपूर्वक; शिरसा--शिर पर; बिभर्ति-- धारण करताहै।
महाराज उत्तानपाद के ख्याति प्राप्त पुत्र धुव महाराज परम-ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ भक्त कहलाते हैं, क्योंकि उनकी भक्ति-निष्ठा हढ़ थी।
यह जानते हुए कि गंगाजल भगवान् विष्णु के चरणकमलको पखारता है, वे उस जल को अपने लोक में ही रहते हुए आज तक अपने शिर पर भक्तिपूर्वकधारण करते हैं।
चूँकि वे अपने अन्तस्थल ( हृदय ) में श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं,'फलत:ः वे अत्यन्त उत्कंठित रहते हैं, उनके अर्ध-निमीलित नेत्रों से अश्रु की धारा बहती है औरउनका शरीर पुलकायमान रहता है।
ततः सप्त ऋषयस्तत्प्रभावाभिज्ञा यां ननु तपस आत्यन्तिकी सिद्धिरितावती भगवति सर्वात्मनिवासुदेवेनुपरतभक्तियोगलाभेनैवोपेक्षितान्यार्थात्मगतयो मुक्तिमिवागतां मुमुक्षय इव सबहुमानमद्यापिजटाजूटैरुद्वहन्ति ॥
३॥
ततः--तत्पश्चात्; सप्त ऋषय: --( मरीचि से लेकर ); तत् प्रभाव-अभिज्ञा:--जो गंगा के प्रभाव से भलीभाँति परिचित थे;याम्ू--यह गंगा जल; ननु--निश्चय ही; तपस:--हमारे तपों का; आत्यन्तिकी--परम; सिद्ध्धि:--सिद्धि; एतावती--इतनी;भगवति--श्रीभगवान्; सर्व-आत्मनि--सर्वव्यापी; वासुदेवे-- श्रीकृष्ण में; अनुपरत--अविरत; भक्ति-योग-- भक्ति योग का;लाभेन--इस पद को प्राप्त करके; एब--निश्चय ही; उपेक्षित--तिरस्कृत; अन्य--दूसरा; अर्थ-आत्म-गतय: --सिद्धि के अन्यसभी साधन ( यथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ); मुक्तिमू--सांसारिक बन्धनों से छुटकारा; इब--सहृश; आगताम्-- प्राप्त किया;मुमुक्षव: --मुक्ति की इच्छा करने वाला व्यक्ति; इब--सहृश; स-बहु-मानम्--अत्यन्त मानपूर्वक; अद्य अपि--आज भी; जटा-जूटैः--जूड़े के रूप में बँधी जटाओं से युक्त; उद्दहन्ति-- धारण करते हैं।
ध्रुवलोक के नीचे वाले लोकों में सप्तर्षियों ( मरीचि, वसिष्ठ, अत्रि इत्यादि ) का वास है।
गंगा जल के प्रभाव से परिचित होने के कारण वे आज भी अपने शिर की जटाओं पर उसेधारण करते हैं।
अन्ततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यही परम धन, समस्त तपस्याओं कीसिद्धि तथा दिव्य जीवन बिताने का सर्वश्रेष्ठ साधन है।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सतत भक्तिप्राप्त होने के कारण उन्होंने धर्म, अर्थ, काम, तथा परब्रह्म से तदाकार होने ( अर्थात् ) मोक्ष जैसेसमस्त साधनों का परित्याग कर दिया है।
जिस प्रकार ज्ञानीजन यह सोचते हैं कि भगवान् में तदाकार होना ही परम सत्य है उसी प्रकार सप्तर्षि भी भक्ति को जीवन की परम सिद्धि मानते हैं।
ततोनेकसहस्त्रकोटिविमानानीकसड्जू लदेवयानेनावतरन्तीन्दु मण्डलमावार्य ब्रहासदने निपतति ॥
४॥
ततः--सप्तर्षियों के सात लोकों को पवित्र करने पश्चात्; अनेक--कई; सहस्त्र--हजार; कोटि--करोड़ों; विमान-अनीक --विमान सेना सहित; सह्ढु 'ल--समूहित; देव-यानेन--देवताओं के अन्तरिक्ष से होकर; अवतरन्ती--उतरते हुए; इन्दु-मण्डलम्--चन्द्र लोक को; आवार्य--आप्लावित करके; ब्रह्म-सदने--सुमेरु पर्वत के ऊपर ब्रह्मा के आवास तक; निपतति--गिरता है।
ध्रुवलोक के पड़ोसी सात लोकों को पावन करने के पश्चात् गंगा का जल करोड़ों देवताओंके विमानों द्वारा अन्तरिक्ष को ले जाया जाता है।
तब यह चन्द्रलोक को आप्लावित करता हुआअन्ततः मेरु पर्वत पर स्थित ब्रह्म के आवास तक पहुँच जाता है।
तत्र चतुर्धा भिद्यमाना चतुर्भिर्नामभिश्चतुर्दिशमभिस्पन्दन्ती नदनदीपतिमेवाभिनिविशति सीतालकनन्दाचक्षुर्भद्रेति, ॥
५॥
तत्र--वहाँ ( मेरु पर्वत पर ); चतुर्धा--चार धाराओं में; भिद्यमाना--विभाजित होकर; चतुर्भि: --चार; नामभि:--नामों से;चतु:-दिशम्--चारों दिशाओं में ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण ); अभिस्पन्दन्ती--वेग से प्रवाहित होकर; नद-नदी-पतिम्--समस्त बृहद् नदियों का आगार ( सागर ); एव--निश्चय ही; अभिनिविशति-- प्रविष्ट करती है; सीता-अलकनन्दा--सीता तथाअलकनन्दा; चक्षु:--चक्षु; भद्रा--भद्गा; इति--इन नामों से विख्यात |
मेरु पर्वत की चोटी पर गंगा नदी चार धाराओं में विभक्त हो जाती है और प्रत्येक धाराअलग-अलग दिशाओं की ओर ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण ) वेग से प्रवाहित होती है।
येधाराएँ सीता, अलकनन्दा, चश्षु तथा भद्गरा नाम से विख्यात हैं और ये सब सागर की ओर बहतीहैं।
सीता तु ब्रह्मसदनात्केसराचलादिगिरिशिखरे भ्यो धो ध: प्रस्त्रवन्ती गन्धमादनमूर्धसु पतित्वान्तरेणभद्राश्ववर्ष प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रमभिप्रविशति ॥
६॥
सीता--सीता नामक धारा; तु--निश्चय ही; ब्रह्म-सदनात्--ब्रह्मपुरी से; केसराचल-आदि--केसराचल तथा अन्य महान पर्वतोंके; गिरि--पवर्तो की; शिखरेभ्य:--चोटियों से; अध: अध:--नीचे की ओर; प्रस्त्रवन्ती --प्रवाहित; गन्धमादन--गंध-मादनपर्वत की; मूर्थसु--चोटी पर; पतित्वा--गिर कर; अन्तरेण--के अन्तर्गत; भद्राश्व-वर्षम्--भव्रा श्व प्रदेश; प्राच्याम्--पूर्व;दिशि--दिशा में; क्षार-समुद्रमू--लवण सागर में; अभिप्रविशति-- प्रवेश करती है।
गंगा नदी की सीता नामक धारा मेरु पर्वत की चोटी पर स्थित ब्रह्मपुरी से होकर बहती हुईपार्श्ववर्ती केसराचल पर्वतों के श्रृंगों पर पहुँचती है।
जो मेरु पर्वत जितने ही ऊंचे है।
ये पर्वत मेरुपर्वत के चारों ओर तन्तुगुच्छ जैसे हैं।
केसराचल पर्वतों से चलकर गंगा नदी गंधमादन पर्वत कीचोटी पर गिरती है और वहाँ से भद्राश्च-वर्ष की भूमि में बहती है।
अन्त में यह पश्चिम में लवणसागर में पहुँच जाती है।
एवं माल्यवच्छिखरान्निष्पतन्ती ततोनुपरतवेगा केतुमालमभि चक्षु: प्रतीच्यां दिशि सरित्पतिं प्रविशति ॥
७॥
एवम्--इस प्रकार; माल्यवत् -शिखरात्--माल्यवान् पर्वत की चोटी से; निष्पतन्ती--नीचे गिरकर; ततः--तत्पश्चात्: अनुपरत-बेगा--अप्रतिहत वेग से; केतुमालम् अभि--केतुमाल वर्ष में; चक्षु:ः--चक्षु नामक धारा; प्रतीच्याम्ू--पश्चिम; दिशि--दिशा में;सरित्-पतिम्--सागर में; प्रविशति--प्रवेश करती है।
गंगा नदी की चश्लु नामक धारा माल्यवान् पर्वत की चोटी पर गिरती है और वहाँ से प्रपातके रूप में गिरकर केतुमाल वर्ष में प्रवेश करती है।
अविच्छिन्न रूप से केतुमाल वर्ष से बहकरगंगा नदी पश्चिम की ओर लवण सागर तक पहुँच जाती है।
भद्रा चोत्तरतो मेरशिरसो निपतिता गिरिशिखरादिगरिशिखरमतिहाय श्रुड्भव॒तः श्रुड्भादवस्यन्दमानाउत्तरांस्तु कुरूनभित उदीच्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति ॥
८ ॥
भद्रगा-- भद्रा नामक धारा; च-- भी; उत्तरत: --उत्तर दिशा को; मेरु-शिरस:--मेरु पर्वत की चोटी से; निपतिता--गिर कर;गिरि-शिखरात्--कुमुद पर्वत की चोटी से; गिरि-शिखरम्--नील पर्वत की चोटी तक; अतिहाय--बिना स्पर्श किये पारकरके; श्रूड़ब॒त:--श्रृंगवान् पर्वत की; श्रूझ़्त्ू--चोटी से; अवस्यन्दमाना--प्रवाहित होकर; उत्तरान्ू--उत्तरी; तु--किन्तु;कुरून्ू-कुरु प्रदेश की; अभितः--चारों दिशाओं में; उदीच्याम्--उत्तरी; दिशि--दिशा में; जलधिम्--लवण सागर में;अभिप्रविशति--प्रवेश करती है।
गंगा की भद्गा नामक धारा मेरु पर्वत की उत्तरी दिशा से होकर बहती है।
इसका जलक्रमशः कुमुद, नील, श्वेत तथा श्रृंगवान् पर्वतों की चोटियों पर गिरता है।
फिर वह कुरु प्रदेश मेंसे बहती हुईं उत्तर में लवण सागर से मिल जाती है।
तथेवालकनन्दा दक्षिणेन ब्रह्मसदनाद्वहूनि गिरिकूटान्यतिक्रम्य हेमकूटाद्वैमकूटान्यतिरभसतररंहसालुठयन्ती भारतमभिवर्ष दक्षिणस्यां दिशि जलधिमभिप्रविशति यस्यां स्नानार्थ चागच्छत: पुंसः पदेपदे श्रमेधराजसूयादीनां फल न दुर्लभमिति ॥
९॥
तथा एव--इसी प्रकार; अलकनन्दा--अलकनन्दा नामक धारा; दक्षिणेन--दक्षिण दिशा से; ब्रह्म-गसदनात्--ब्रह्मपुरी से;बहूनि--बहुत सी; गिरि-कूटानि--पर्वत चोटियों को; अतिक्रम्य--पार करके; हेमकूटात्--हेमकूट पर्वत से; हैमकूटानि--तथा हिमकूट; अति-रभसतर--अधिक भयावनी; रंहसा--अधिक वेग से; लुठयन्ती--अपहरण करती हुई; भारतम्अभिवर्षम्-- भारतवर्ष के चारों ओर; दक्षिणस्थाम्-दक्षिण; दिशि--दिशा में; जलधिम्--लवण सागर में; अभिप्रविशति--प्रवेश करती है; यस्याम्--जिसमें; स्नान-अर्थम्--स्नान हेतु; च--और; आगच्छत: -- आये हुए; पुंसः--पुरुष; पदे पदे--प्रत्येक पग पर; अश्वमेध-राजसूय-आदीनाम्--अश्वमेध तथा राजसूय जैसे महान् यज्ञों का; फलम्ू--फल; न--नहीं; दुर्लभम्--प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है; इति--ऐसा
इसी प्रकार अलकनन्दा ब्रह्मपुरी की दक्षिण दिशा से होकर बहती है।
विभिन्न प्रदेशों मेंपर्वतों की चोटियों को पार करती हुई यह अत्यन्त वेग से हेमकूट तथा हिमकूट पर्वतों कीचोटियों पर गिरती है।
इन पर्वतों की चोटियों को आप्लावित करती हुई गंगा भारतवर्ष नामकभूभाग में गिरती है और उसे अपने जल से आपूरित करती चलती है।
तत्पश्चात् यह दक्षिण दिशा में लवण सागर में मिल जाती है।
जो व्यक्ति इस नदी में स्नान करने आते हैं, वे भाग्यशाली हैं।
उन्हें पग-पग पर राजसूय तथा अश्वमेध जैसे महान् यज्ञों के करने का फल प्राप्त करना दुष्करनहीं है।
अन्ये च नदा नद्यश्न वर्ष वर्षे सन्ति बहुशो मेवादिगिरिदुहितर: शतशः: ॥
१०॥
अन्ये--अन्य अनेक; च-- भी; नदाः--नदियाँ; नद्य:--छोटी नदियाँ; च--तथा; वर्षे वर्ष --प्रत्येक प्रदेश में; सन्ति-- हैं;बहुश:ः--अनेक प्रकार की; मेरु-आदि-गिरि-दुहितरः --मेरु आदि पर्वतों की पुत्रियाँ; शतश:--सैकड़ों |
मेरु पर्वत की चोटी से अन्य अनेक छोटी तथा बड़ी नदियाँ निकलती हैं।
ये नदियाँ पर्वतकी पुत्रियों के तुल्य हैं और वे सैकड़ों धाराओं में विभिन्न भूप्रदेशों में बहती हैं।
तत्रापि भारतमेव वर्ष कर्मक्षेत्रमन्यान्यष्ट वर्षाणि स्वर्गिणां पुण्यशेषोषभोगस्थानानि भौमानि स्वर्गपदानिव्यपदिशन्ति, ॥
११॥
तत्र अपि--इन सबों में से; भारतम्ू-- भारतवर्ष नाम से विख्यात; एब--निश्चय ही; वर्षम्-- भूखण्ड, प्रान्त; कर्म-द्षेत्रमू--कर्मक्षेत्र; अन्यानि--अन्य सभी; अष्ट वर्षाणि--आठ वर्ष ( भूखण्ड ); स्वर्गिणाम्--पवित्र कर्मों के फलस्वरूप स्वर्गलोक कोप्राप्त जीवात्माओं के; पुण्य--पवित्र कर्मों के फल; शेष--बचे हुए; उपभोग-स्थानानि-- भौतिक सुख के स्थान; भौमानि स्वर्ग-'पदानि-- पृथ्वी पर स्वर्गिक स्थानों के रूप में; व्यपदिशन्ति--कहलाते हैं।
नवों वर्षो में से भारतवर्ष नामक भूभाग कर्मक्षेत्र माना जाता है।
विद्वान तथा सन्तजनों काकथन है कि अन्य आठ वर्ष अत्यन्त पुण्यात्माओं के निमित्त हैं।
वे स्वर्गलोक से लौटकर इन आठ भूप्रदेशों में अपने शेष पुण्यकर्मों का फल भोगते हैं।
एषु पुरुषाणामयुतपुरुषायुर्वर्षाणां देवकल्पानां नागायुतप्राणानांवज़संहननबलवयोमोदप्रमुदितमहासौरतमिथुनव्यवायापवर्गवर्षधृतैकगर्भकलत्राणां तत्र तु त्रेतायुगसम:कालो वर्तते ॥
१२॥
एषु--इन आठ वर्षो में; पुरुषाणाम्--समस्त पुरुषों में; अयुत--दस हजार; पुरुष--व्यक्ति, पुरुष; आयु: -वर्षाणाम्-वेजिनकी आयु; देव-कल्पानाम्--जो देवताओं के सहृश हैं; नाग-अयुत-प्राणानामू--दस हजार हाथियों के बल वाले; वज्ज-संहनन--वज्ज के समान ठोस शरीर के द्वारा; बल--शारीरिक शक्ति; वयः--यौवन से; मोद-- प्रचुर इन्द्रियभोग द्वारा;प्रमुदित--उत्तेजित होकर; महा-सौरत-- अत्यधिक विषयभोग सम्बन्धी; मिथुन--पुरुष-स्त्री समागम, प्रसंग; व्यवाय-अपवर्ग --रतिजन्य सुख की अवधि के अन्त में; वर्ष--अन्तिम वर्ष में; धृत-एक-गर्भ--एक गर्भ धारण करने वाली; कलत्राणाम्--पत्नियों के; तत्र-- वहाँ; तु--लेकिन; त्रेता-युग-सम: --त्रेता युग ( जिसमें कोई ताप नहीं रहता ) के ही समान; काल:--समय;वर्तते--रहता है
गणना के अनुसार इन आठ भूभागों में मानव प्राणी पृथ्वी लोक की गणना के अनुसार दसहजार वर्षो तक जीवित रहते हैं।
इनके सभी निवासी प्रायः देवताओं के तुल्य हैं।
उनमें दस हजारहाथियों का बल होता है।
दरअसल, उनके शरीर वज्र की भाँति कठोर होते हैं।
उनके जीवन कायौवनकाल अत्यन्त आनन्ददायक होता है और स्त्री तथा पुरुष दीर्घकाल तक आनन््द-पूर्वकयौन-समागम करते हैं।
वर्षो तक इन्द्रियसुख भोगने के पश्चात् जब जीवन का एक वर्ष शेष रहजाता है, तो स्त्री गर्भवती होती है।
इस प्रकार इन स्वर्गलोकों के वासी वैसा ही आनन्द उठाते हैंजैसा कि त्रेता युग के मानव प्राणी।
यत्र ह देवपतयः स्वैः स्वैर्गणनायकैर्विहितमहाईणा:सर्वर्तुकुसुमस्तबकफलकिसलयश्रियानम्यमानविटपलताविटपिभिरुपशुम्भमानरुचिरकानना श्रमायतनव्गिरिद्रोणीषु तथा चामलजलाशयेषुविकचविविधनववनरूहामोदमुदितराजहंसजलकुक्कुटकारण्डवसारसचक्रवाकादिभिर्म धुकरनिकरा कृतिभरुपकूजितेषु जलक्रीडादिभिर्विचित्रविनोदै: सुललितसुरसुन्दरीणांकामकलिलविलासहासलीलावलोकाकृष्टमनोदृष्टय: स्वैर विहरन्ति ॥
१३॥
यत्र ह--उन आठों भूखण्डों में; देव-पतय:--देवताओं के स्वामी, यथा इन्द्र; स्वै: स्वैः-- अपने अपने; गण-नायकैः--सेवकोंके नेताओं द्वारा; विहित--अलंकृत; महा-अर्हणा: --मूल्यवान भेंटें यथा चन्दन तथा मालाएँ; सर्व-ऋतु--समस्त ऋतुओं में;कुसुम-स्तबक--पुष्प गुच्छ, फूलों का गुच्छा; फल--फल का; किसलय-श्रिया--कोपलों की श्री ( वैभव ); आनम्यमान--नमित; विटप--जिसकी शाखाएँ; लता--तथा बेलें; विटपिभि: --अनेक वृक्षों से; उपशुम्भभान--पूर्णतया अलंकृत; रुचिर--सुन्दर; कानन--उद्यान; आश्रम-आयतन--और अनेक आश्रमों; वर्ष-गिरि-द्रोणीषु-- भूखण्ड की सीमा के सूचक पर्वतों केबीच की घाटियाँ; तथा--और; च-- भी; अमल-जल-आशयेषु--विमल जल वाले सरोवरों में; विकच--सद्यः विकसित;विविध--अनेक प्रकार के ; नव-वनरूह-आमोद--कमल पुष्पों की सुरभि से; मुदित--प्रसन्न; राज-हंस--बड़े-बड़े हंस; जल-कुक्कुट--जल मुर्गी; कारण्डब--कारण्डव नामक जल पक्षी; सारस--सारस पक्षी; चक्रवाक-आदिभि:--चक्रवाक तथा अन्यपक्षी; मधुकर-निकर-आकृतिभि:-- भौंरों के समूह द्वारा; उपकूजितेषु--प्रतिध्वनित; जल-क्रीडा-आदिभि:--जलक़ीड़ा आदिके द्वारा; विचित्र--विविध; विनोदै:--आमोद-प्रमोद से; सु-ललित--आकर्षक; सुर-सुन्दरीणाम्--देवताओं की पत्नियों की;'काम--भोगेच्छा; कलिल--उत्पन्न; विलास--आमोद-प्रमोद; हास-- मुस्कान; लीला-अवलोक--बाँकी चितवन द्वारा;आकृष्ट-मन:ः--जिनके मन आदृष्ट होते रहते हैं; दृष्टय:--तथा जिनकी दृष्टि आकृष्ट हो जाती है; स्वैरम्--स्वेच्छापूर्वक;विहरन्ति--विहार करते हैं।
इन भूखण्डों में से प्रत्येक में ऋतुओं के अनुसार फूलों तथा फलों से पूरित अनेक उद्यान एवंमनोहर ढंग से अलंकृत आश्रम हैं।
इन भूखण्डों की सीमा बताने वाले विशाल पर्वतों के बीचनिर्मल जल से पूरित विशाल सरोवर हैं जिनमें कमल के नए पुष्प खिले हुए हैं।
इन कमल पुष्पोंकी सुगन्धि से हंस, बत्तख, जलमुर्गियाँ तथा सारस जैसे जल-पक्षी अत्यन्त उत्तेजित होते हैं औरभौरों के मोहक गुंजन से वायु पूरित रहती है।
इन भूखण्डों के निवासी देवताओं के प्रमुखनायक हैं।
अपने सेवकों से सेवित ये लोग सरोवरों के तटवर्ती उद्यानों में जीवन का आनन्दउठाते हैं।
ऐसे मोहक वातावरण में देवताओं की पत्लियाँ अपने पतियों से हास-परिहास करती हैंऔर उन्हें कामेच्छा से पूर्ण बाँकी चितवन से देखती हैं।
सभी देवताओं एवं उनकी पत्नियों परउनके सेवक सदैव चन्दन तथा पुष्पमालाएँ चढ़ाते रहते हैं।
इस प्रकार आठों स्वर्गिक वर्षों केरहने वाले लोग स्त्रियों की क्रियाओं से आकृष्ट होकर जीवन का आनन्द भोगते रहते हैं।
नवस्वपि वर्षेषु भगवान्नारायणो महापुरुष: पुरुषाणां तदनुग्रहायात्मतत्त्वव्यूहेनात्मनाद्यापि सन्निधीयते ॥
१४॥
नवसु--नवों; अपि--निश्चय ही; वर्षेषु--वर्षो में; भगवान्-- श्री भगवान्; नारायण: --विष्णु; महा-पुरुष:--परम पुरुष;पुरुषाणाम्--विभिन्न भक्तों में; तत्-अनुग्रहाय-- कृपा प्रदर्शित करने के लिए; आत्म-तत्त्व-व्यूहेन--अपने चतुर्गुण रूपोंवासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध में विस्तार करके; आत्मना--स्वयं; अद्य अपि--आज तक; सन्निधीयते--उनकी सेवास्वीकार करने के लिए भक्तों के निकट हैं।
इन सभी नौ वर्षो में अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जिन्हेंनारायण कहा जाता है, अपने चतुर्व्यूह रूपों--वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध-मेंविस्तार करते हैं।
इस प्रकार अपने भक्तों की सेवा स्वीकार करने के लिए वे उनके निकट रहतेहैं।
इलावूते तु भगवान्भव एक एव पुमान्न हान्यस्तत्रापरो निर्विशति भवान्या: शापनिमित्तज्ञो यत्प्रवेक्ष्यतःस्त्रीभावस्तत्पश्चाद्॒क्ष्यामि ॥
१५॥
इलावृते--इलावृत-वर्ष में; तु--लेकिन; भगवान्--सर्वशक्तिमान; भव:--भगवान् शिव; एक--एकमात्र; एव--निश्चय ही;पुमानू--पुरुष; न--नहीं; हि-- अवश्य ही; अन्य: --दूसरा कोई; तत्र--वहाँ; अपर: --के अतिरिक्त; निर्विशति--प्रवेश करताहै; भवान्या: शाप-निमित्त-ज्ञ:--शिव की पत्नी भवानी के शाप का कारण जानने वाला; यत्-प्रवेक्ष्यत:--बलपूर्वक उस प्रदेशमें प्रवेश करने वाले का; स्त्री-भाव:--स्त्री में परिवर्तन; तत्ू--वह; पश्चात्--बाद में; वक्ष्यामि--मैं व्याख्या करूँगा।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--इलाबृत वर्ष नामक भूखण्ड में भगवान् शिव ही एकमात्रपुरुष हैं जो देवताओं में सर्वाधिक शक्तिमान है।
भगवान् शिव की पत्नी देवी दुर्गा नहीं चाहतींकि उस प्रदेश में कोई भी पुरुष प्रवेश करे।
यदि कोई मूर्ख पुरुष प्रवेश करने का दुस्साहसकरता है, तो वे उसे तत्क्षण स्त्री में परिणत कर देती हैं।
इसकी व्याख्या मै बाद में ( नवम स्कन्धमें ) करूँगा।
भवानीनाथे: स्त्रीगणार्बुदसहस्त्रैरवरु ध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तमहापुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिप्रकृतिमात्मनः सड्डूर्षणसंज्ञामात्मसमाधिरूपेण सन्निधाप्यैतदभिगृणन्भव उपधावति ॥
१६॥
भवानी-नाथै: -- भवानी के संग से; स्त्री-गण--स्त्रियों का; अर्बुद-सहस्त्र:--सौ अरब; अवरुध्यमान:--सदैव सेवित होकर;भगवतः चतुः-मूर्ते: --चतुर्गुण रूप में विस्तारित श्रीभगवान्; महा-पुरुषस्थ--परम पुरुष का; तुरीयाम्--चतुर्थ विस्तार;तामसीम्--तमोगुण से सम्बद्ध; मूर्तिमू--रूप; प्रकृतिम्ू--स्त्रोत स्वरूपा; आत्मन:--स्वयं ( भगवान् शिव ) का; सड्डूर्षण-संज्ञामू--संकर्षण नाम से विख्यात; आत्म-समाधि-रूपेण--समाधि में स्वयं के ध्यान के द्वारा; सन्निधाप्य--निकट लाकर;एतत्--यह; अभिगृणन्--स्पष्ट रूप से कीर्तन करके; भवः--भगवान् शिव; उपधावति--पूजा करता है।
इलावृत्त वर्ष में भगवान् शंकर सदैव दुर्गा की सौ अरब दासियों से घिरे रहते है जो उनकीसेवा करती हैं।
परमात्मा का चतुर्गुण विस्तार वासुदेव, प्रद्युम्म, अनिरुद्ध तथा संकर्षण में हुआहै।
इनमें चतुर्थ विस्तार संकर्षण है जो निश्चित रूप से दिव्य है, किन्तु भौतिक जगत में उनकासंहार-कार्य तमोगुणमय है, अतः वे तामसी अर्थात् तमोगुणी-ईश्वर कहलाते हैं।
भगवान् शिवको ज्ञात है कि संकर्षण उनके अपने अस्तित्व के मूल कारण हैं, अतः वे समाधि में निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए उनका ध्यान करते हैं।
श्रीभगवानुवाच» नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसड्ख्यानायानन्तायाव्यक्ताय नम इति, ॥
१७॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् शंकर कहते हैं; ७ नमो भगवते-- भगवान् को मैं आदरपूर्वक प्रणाम करता हूँ; महा-पुरुषाय--आप महापुरुष है; सर्व-गुण-सड्ख्यानाय--समस्त दिव्य गुणों के आगार; अनन्ताय--अपरिमित; अव्यक्ताय--भौतिक जगत मेंन प्रगट होने वाले; नमः-- प्रणाम करता हूँ; इति--इस प्रकार
परम शक्तिमान भगवान् शिव कहते हैं--हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, मैं संकर्षण के रूप मेंआपको प्रणाम करता हूँ।
आप समस्त दिव्य गुणों के आगार हैं।
अनन्त होकर भी आप अभक्तोंके लिए अप्रकट रहते हैं।
भजे भजन्यारणपादपड्डूजंभगस्य कृत्स्नस्य परं परायणम् ।
भक्तेष्वलं भावितभूतभावनंभवापहं त्वा भवभावमीश्चरम् ॥
१८ ॥
भजे--मैं पूजा करता हूँ; भजन्य--हे आराध्य स्वामी; अरण-पाद-पड्डजम्--जिसके चरणकमल भक्तों के सभी प्रकार के भयोंसे रक्षा करते हैं; भगस्य--ऐश्यर्व का; कृत्स्तस्य--विभिन्न प्रकार के ( धन, यश, बल, ज्ञान, रूप तथा त्याग ); परम्- श्रेष्ठ;परायणम्--परम शरण; भक्तेषु-- भक्तों के लिए; अलम्--अनुमान से परे; भावित- भूत-भावनम्--भक्तों के परितोष के लिएअपने विभिन्न रूपों को प्रकट करने वाला; भव-अपहम्-- भक्त के जन्म-मरण चक्र को रोकने वाले; त्वा-- आपको; भव-भावम्-- भौतिक सृष्टि का मूल; ईंश्वरम्-- भगवान् को |
हे प्रभो, आप ही एकमात्र आराध्य हैं, क्योंकि आप ही समस्त ऐश्वर्यों के आगार पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् हैं।
आपके चरण-कमल भक्तों के एकमात्र आश्रय हैं।
आप भक्तों को अपने नाना रूपों द्वारा सन्तुष्ट करने वाले हैं।
हे प्रभो, आप अपने भक्तों को भौतिक संसार के चंगुल सेछुड़ाने वाले हैं।
आपकी इच्छा से ही अभक्त लोग इस भौतिक संसार में उलझे रहते हैं।
कृपयामुझे अपने नित्य दास के रूप में स्वीकार करें।
न यस्य मायागुणचित्तवृत्तिभि-निरीक्षतो हाण्वपि दृष्टिरज्यते ।
ईशे यथा नोजितमन्युरंहसांकस्तं न मन्येत जिगीषुरात्मतः ॥
१९॥
न--कभी नहीं; यस्य--जिसकी; माया--माया शक्ति, माया; गुण--गुणों में; चित्त--हृदय की; वृत्तिभि:ः--क्रियाओं के द्वारा( चिन्तन, अनुभव तथा इच्छा ); निरीक्षतः--निरीक्षण करने वाले का; हि--निश्चय ही; अणु--कुछ-कुछ; अपि--भी; दृष्टि:--दृष्टि; अज्यते-- प्रभावित होती है; ईशे--नियमन हेतु; यथा--जिस प्रकार; न:--हम लोगों का; अजित--जो जीता न जा सके;मन्यु--क्रोध के; रंहसाम्ू--वेग को; क:ः--कौन; तम्--उस ( ईश्वर ) को; न--नहीं; मन्येत-- पूजा करेगा; जिगीषु:--जीतनेकी कामना करने वाला; आत्मन:--इन्द्रियों को
असहूशो यः प्रतिभाति माययाक्षीबेव मध्वासवताप्रलोचन: ।
न नागवध्वोहण ईशिरे हिया यत्पादयो: स्पर्शनधर्पितेन्द्रिया: ॥
२०॥
असतू-हृशः--कुत्सित दृष्टि वाले व्यक्ति के हेतु; यः--जो; प्रतिभाति--प्रतीत होता है; मायया--माया के वश में; क्षीब:--क्रुद्ध; इब--सहश; मधु--शहद; आसव--तथा सुरा द्वारा; ताम्र-लोचन:--ताँबे के समान रक्तनेत्र वाला; न--नहीं; नाग-वध्व:--नागों की स्त्रियाँ; अहणे--पूजन; ईशिरे--करने में अशक्त; हिया--लज्जावश; यत्-पादयो:--जिसके चरणकमल के;स्पर्शन--स्पर्श से; धर्षित--उत्तेजित; इन्द्रिया:--जिसकी इन्द्रियाँ ॥
कुत्सित दृष्लिल्लाले व्यक्तियों के लिए भगवान् के नेत्र मदिरा पीये हुए उन्मत्त पुरुष जैसे हैं।
ऐसे अविवेकी पुरुष भगवान् पर रुष्ट होते हैं और अपने रोषवश उन्हें श्रीभगवान् अत्यन्त रुष्ट एवंभयावह लगते हैं।
किन्तु यह माया है।
जब भगवान् के चरणकमलों के स्पर्श से नाग-वधुएँउत्तेजित हुईं तो वे लजावश उनकी और अधिक आराधनहिनफिर भी भगवान् उनकेस्पर्श से उत्तेजित नहीं हुए, क्योंकि समस्त परिस्थितियों में वे धीर बने रहते हैं।
अतः ऐसा कौनहोगा जो भगवान् की आराधना करना नहीं चाहेगा ?
यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमंत्रिभिविहीनं यमनन्तमृषय: ।
न वेद सिद्धार्थमिव क्वचित्स्थितंभूमण्डलं मूर्थसहस्त्रधामसु ॥
२१॥
यम्--जिसको; आहुः--उन्होंने कहा; अस्य--इस भौतिक जगत की; स्थिति--पोषण; जन्म--सृष्टि; संयमम्--संहार;त्रिभि:--इन तीनों; विहीनम्--से रहित; यम्--जो; अनन्तमू-- अनन्त, असीम्; ऋषय: --समस्त महान् ऋषि; न--नहीं; वेद--अनुभव करते हैं; सिद्ध-अर्थम्--सरसों का बीज; इब--के समान; क्वचित्--जहाँ; स्थितम्--स्थित; भू-मण्डलम्--यहब्रह्माण्ड; मूर्थ-सहस्त्र-धामसु-- भगवान् के सैकड़ों हजारों फणों पर।
शिवजी कहते हैं--सभी महान् ऋषि भगवान् को सृजक, पालक और संहारक के रूप मेंस्वीकार करते हैं, यद्यपि वास्तव में उनका इन कार्यों से कोई सरोकार नहीं है।
इसीलिएश्रीभगवान् को अनन्त कहा गया है।
यद्यपि शेष अवतार के रूप में वे अपने फणों पर समस्तब्रह्माण्डों को धारण करते हैं, किन्तु प्रत्येक ब्रह्माण्ड उन्हें सरसों के बीज से अधिक भारी नहींलगता।
अतः सिद्धि का इच्छुक ऐसा कौन पुरुष होगा जो ईश्वर की आराधना नहीं करेगा ?
यस्याद्य आसीदगुणविग्रहो महान्विज्ञानधिष्ण्यो भगवानज: किल यत्सम्भवोउहं त्रिवृता स्वतेजसावैकारिकं तामसमैन्द्रियं सूजे ॥
२२॥
एते बय॑ यस्य वशे महात्मन:स्थिता: शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिता: ।
महानहं वैकृततामसेन्द्रिया:सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम् ॥
२३॥
यस्य--जिससे; आद्य:--आरम्भ; आसीतू-- था; गुण-विग्रह: --गुणों का अवतार; महान्--सम्पूर्ण माया; विज्ञान--सम्पूर्णज्ञान का; धिष्ण्य:--आगार; भगवान्--सर्व-शक्तिमान; अज: -- भगवान् ब्रह्मा; किल--निश्चय ही; यत्--जिससे; सम्भव: --उत्पन्न, सम्भूत; अहम्--मैं; त्रि-वृता--तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार का; स्व-तेजसा--अपनी शक्ति से; वैकारिकम्--सभीदेवता; तामसम्-- भौतिक तत्त्व; ऐन्द्रियम्--इन्द्रियाँ; सृजे--उत्पन्न करता हूँ; एते--इन सबों को; वयम्--हम; यस्य--जिसके;वशे--वश में; महा-आत्मन:--महान् पुरुष; स्थिता:--स्थित; शकुन्ता: --गृद्ध; इब--सहृश; सूत्र-यन्त्रिता:--सूत्र ( डोरी ) के द्वारा बद्ध; महान्ू--महत्तत्व; अहम्-मैं; वैकृत--देवतागण; तामस--पाँच तत्त्व; इन्द्रिया:--इन्द्रियाँ; सृजाम: --हम सृष्टि करतेहैं; सर्वे--हम सभी; यत्--जिसकी; अनुग्रहात्--कृपा से; इदम्--यह भौतिक जगत।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से ही ब्रह्माजी प्रकट होते हैं, जिनका शरीर महत् तत्त्व से निर्मित हैऔर वह भौतिक प्रकृति के रजोगुण द्वारा प्रभावित बुद्धि का आगार है।
ब्रह्माजी से मैं स्वयंमिथ्या अहंकार रूप में, जिसे रुद्र कहते हैं, उत्पन्न होता हूँ।
मैं अपनी शक्ति से अन्य समस्तदेवताओं, पंच तत्त्वों तथा इन्द्रियों को जन्म देता हूँ।
अतः मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कीआराधना करता हूँ।
वे हम सबों से श्रेष्ठ हैं और सभी देवता, महत् तत्त्व तथा इन्द्रियाँ, यहाँ तककि ब्रह्माजी और स्वयं मैं उनके वश में वैसे ही हैं जिस प्रकार कि डोरी से बँधे पक्षी ।
केवल उन्हींके अनुग्रह से हम इस जगत का सृजन, पालन एवं संहार करते हैं।
अतः मैं परमब्रह्म को सादरप्रणाम करता हूँ।
यन्निर्मितां कह्ापि कर्मपर्वणींमायां जनोयं गुणसर्गमोहितः ।
न वेद निस्तारणयोगमञ्जसातस्मै नमस्ते विलयोदयात्मने ॥
२४॥
यत्--जिससे; निर्मितामू--निर्मित; कि अपि--किसी भी समय; कर्म-पर्वणीम्--कर्मों की गाँठ को बाँधने वाली; मायाम्--माया को; जनः--व्यक्ति; अयम्--यह; गुण-सर्ग-मोहितः--तीन प्रकार के गुणों से मोहित; न--नहीं; वेद--जानता है; निस्तारण-योगम्--सांसारिक बन्धन से छूटने की विधि; अज्ञसा--शीघ्र; तस्मै-- उसको; नमः--नमस्कार है; ते--तुम्हें;विलय-उदय-आत्मने--जिसमें प्रत्येक वस्तु विलय होकर पुनः उसी से उत्पन्न होती है।
श्रीभगवान् की माया हम समस्त बद्ध जीवात्माओं को इस भौतिक जगत से बाँधती है, अतःउनकी कृपा के बिना हम जैसे तुच्छ प्राणी माया से छूटने की विधि नहीं समझ पाते।
मैं उनश्रीभगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ, जो इस जगत की उत्पत्ति और लय के कारणस्वरूप हैं।
