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अध्याय पन्द्रह: राजा प्रियव्रत के वंशजों की महिमा

5.15श्रीशुक उबाचभरतस्यात्मज: सुमतिर्नामाभिहितो यमु ह वाव केचित्पाखण्डिनऋषभपदवीमनुवर्तमानं चानार्याअवेदसमाम्नातां देवतां स्वमनीषया पापीयस्या कलौ कल्पयिष्यन्ति ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा; भरतस्य-- भरत महाराज का; आत्म-ज:--पुत्र; सुमतिः नाम-अभिहितः--जिसका नाम सुमति था; यम्‌ू--जिसको; उ ह वाव--निस्सन्देह; केचित्‌ू--कोई; पाखण्डिन:--वैदिक ज्ञान-विहीन, पाखंडी जन; ऋषभ-पदवीम्‌--राजा ऋषभदेव के मार्ग का; अनुवर्तमानम्‌--अनुसरण करते हुए; च--तथा;अनार्या:--वैदिक नियमों का कठोरता से पालन न करने वाले अनार्य; अवेद-समाम्नाताम्‌--जिनका वेदों में उल्लेख नहीं है;देवताम्‌ू-- भगवान्‌बुद्ध या बौद्ध विग्रह के समान; स्व-मनीषया--अपनी बौद्धिक कल्पना से; पापीयस्या-- अत्यन्त पापमय;कलौ--इस कलियुग में; कल्पयिष्यन्ति--कल्पना करेंगे |

श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--महाराज भरत के पुत्र सुमति ने ऋषभदेव के मार्गका अनुसरण किया, किन्तु कुछ पाखंडी लोग उन्हें साक्षात्‌ भगवान्‌ बुद्ध मानने लगे।

वस्तुत: इनपाखंडी नास्तिक और दुश्चरित्र लोगों ने वैदिक नियमों का पालन काल्पनिक तथा अप्रसिद्ध ढंगसे अपने कर्मों की पुष्टि के लिए किया।

इस प्रकार इन पापात्माओं ने सुमति को भगवान्‌ बुद्धदेवके रूप में स्वीकार किया और इस मत का प्रवर्तन किया कि प्रत्येक व्यक्ति को सुमति के नियमोंका पालन करना चाहिए।

इस प्रकार अपनी कोरी कल्पना के कारण वे रास्ते से भटक गये।

तस्माद्वुद्धसेनायां देवताजिन्नाम पुत्रो भवत्‌ ॥

२॥

तस्मात्‌ू--सुमति से; वृद्ध-सेनायाम्‌--उसकी पतली वृद्धसेना के गर्भ से; देवताजित्‌ू-नाम--देवताजित्‌ नामक; पुत्र:--पुत्र;अभवत्‌--उत्पन्न हुआ सुमति की पतली वृद्धसेना के गर्भ से देवताजित्‌ नामक पुत्र का जन्म हुआ।

अथासुर्या तत्तनयो देवद्युम्नस्ततो धेनुमत्यां सुतः परमेष्ठी तस्य सुवर्चलायां प्रतीह उपजात: ॥

३॥

अथ--त्पश्चात्‌; आसुर्याम्‌ू--उसकी पत्नी आसुरी के गर्भ से; तत्‌ू-तनय:--देवताजित्‌ का एक पुत्र; देव-द्युम्न:--देवद्युम्न नामका; ततः--देवद्युम्न से; धेनु-मत्याम्‌--देवद्युम्न की पत्नी धेनुमती के गर्भ से; सुतः--एक पुत्र; परमेष्ठी--परमेष्ठी नामक;तस्य--परमेष्ठी की; सुवर्चलायाम्‌-पत्नी सुवर्चला के गर्भ से; प्रतीह:--प्रतीह नाम का पुत्र; उपजात:--उत्पन्न हुआ।

तत्पश्चात्‌ देवताजित्‌ की पत्नी आसुरी के गर्भ से देवद्युम्न नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

देवद्युम्नकी पत्नी धेनुमती के गर्भ से परमेष्ठी नामक पुत्र का और परमेष्ठी की पत्नी सुवर्चला के गर्भ सेप्रतीह नाम के पुत्र का जन्म हुआ।

य आत्मविद्यामाख्याय स्वयं संशुद्धो महापुरुषमनुसस्मार ॥

४॥

यः--जिसने ( राजा प्रतीह ने ); आत्म-विद्याम्‌ आख्याय--आत्म-साक्षात्कार के सम्बन्ध में अनेक लोगों को शिक्षा देने केपश्चात्‌; स्वयम्‌ू--स्वतः; संशुद्ध:--आत्म-साक्षात्कार में अतीव समुन्नत एवं परिशुद्ध; महा-पुरुषम्‌-- भगवान्‌ को; अनुसस्मार--भलीभाँति समझा और निरन्तर स्मरण किया।

राजा प्रतीह ने स्वयं आत्म-साक्षात्कार के सिद्धान्तों का प्रसार किया।

इस प्रकार शुद्ध होकरवे परम पुरुष भगवान्‌ विष्णु के महान्‌ भक्त बन गये और प्रत्यक्षतः उनका साक्षात्कार किया।

प्रतीहात्सुवर्चलायां प्रतिहरत्रांदयस्त्रय आसन्निज्याकोविदा: सूनव: प्रतिहर्तु:स्तुत्यामजभूमानावजनिषाताम्‌, ॥

५॥

प्रतीहात्‌ू--राजा प्रतीह से; सुवर्चलायाम्‌--उसकी पतली सुवर्चला के गर्भ से; प्रतिहर्त-आदय: त्रयः--प्रतिहर्ता, प्रस्तोता तथाउदगाता नाम के तीन पुत्र; आसन्‌ --उत्पन्न हुए; इज्या-कोविदा:--वेदों के अनुष्ठानों में अत्यन्त दक्ष; सूनबः--तीनों पुत्र;प्रतिहर्तु: --प्रतिहर्ता से; स्तुत्यामू--उसकी पत्नी स्तुती के गर्भ से; अज-भूमानौ--अज तथा भूमा नाम के दो पुत्र;अजनिषाताम्‌--आविर्भूत हुएप्रतीह की पत्नी सुवर्चला के गर्भ से प्रतिहर्ता, प्रस्तोता तथा उद्गाता नाम के तीन पुत्र उत्पन्नहुए।

ये तीनों पुत्र वैदिक अनुष्ठानों में अत्यन्त दक्ष थे।

प्रतिहर्ता की भार्या स्तुती के गर्भ से अजतथा भूमा नामक दो पुत्रों का जन्म हुआ।

भूम्न ऋषिकुल्यायामुद्गीथस्ततः प्रस्तावो देवकुल्यायां प्रस्तावान्नियुत्सायां हृदयज आसीद्िभुर्विभो रत्यांच पृथुषेणस्तस्मान्नक्त आकृत्यां जज्ने नक्ताद्द्रुतिपुत्रो गयो राजर्षिप्रवर उदारश्रवा अजायतसाक्षाद्धगवतो विष्णोरज॑गद्विरक्षिषया गृहीतसत्त्वस्थ कलात्मवत्त्वादिलक्षणेन महापुरुषतां प्राप्त: ॥

६॥

भूम्न: --राजा भूमा से; ऋषि-कुल्यायाम्‌-- उसकी पत्नी ऋषिकुल्या के गर्भ से; उद्गीथ:--उद्‌गी थ नामक पुत्र; ततः--फिरराजा उद्गीथ से; प्रस्ताव:--प्रस्ताव नामक पुत्र; देव-कुल्यायाम्‌-- उसकी पत्नी देवकुल्या से; प्रस्तावात्‌--राजा प्रस्ताव से;नियुत्सायाम्‌--नियुत्सा नाम वाली उसकी पत्नी से; हदय-ज:--पुत्र; आसीतू--उत्पन्न हुआ; विभु:--विभु नामक; विभो:--राजा विभु से; रत्यामू--उसकी पत्नी रती से; च-- भी; पृथु-षेण:-- पृथुषेण नाम का; तस्मात्‌--उससे ( पृथुषेण से ); नक्त:--नक्त नामक पुत्र; आकृत्याम्‌ू--उसकी पत्नी आकूती से; जज्ञे--जन्म लिया; नक्तात्‌ू--नक्त राजा से; द्वुति-पुत्र:--द्रुति का पुत्र;गयः--गय नामक राजा; राज-ऋषि-प्रवर: --राजर्षियों में अत्यन्त सम्मान्य; उदार- श्रवा: --अत्यन्त पवित्र राजा के रूप मेंविख्यात; अजायत--उत्पन्न हुआ; साक्षात्‌ भगवतः --साक्षात्‌ भगवान्‌; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु का; जगत्‌-रिरक्‌-षिषया--समस्त संसार की रक्षा के हेतु; गृहीत--गर्भ में वास किया; सत्त्वस्थ--शुद्ध सत्त्वत गुण का; कला-आत्म-वत्त्व-आदि-- भगवान्‌के साक्षात्‌ अवतार के रूप में; लक्षणेन--लक्षणों से; महा-पुरुषताम्‌--मानव समाज के नायक होने का मुख्य गुण ( सम्पूर्णजीवित प्राणियों के नायक भगवान्‌ विष्णु के सहश ); प्राप्त:--प्राप्त किया

राजा भूमा की पतली ऋषिकुलया के गर्भ से उदगीथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

उदगीथ कीपत्नी देवकुल्या से प्रस्ताव नामक पुत्र ने जन्म लिया और प्रस्ताव को अपनी पत्नी नियुत्सा सेविभु नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।

विभु की पत्नी रती के गर्भ से पृथुषेण और पृथुषेण की पत्नीआकूती के गर्भ से नक्त नामक पुत्र ने जन्म लिया।

नक्त की पतली द्वुति हुई, जिसके गर्भ से गयनामक महान्‌ राजा उत्पन्न हुआ।

गय अत्यन्त विख्यात एवं पवित्र था, वह राजर्षियों में सर्व श्रेष्ठथा।

भगवान्‌ विष्णु तथा उनके सभी अंश विश्व की रक्षा के लिए हैं और वे सदैव दिव्य सत्त्वगुणमें, जिसे विशुद्ध सत्त्व कहते हैं, विद्यमान रहते हैं।

भगवान्‌ विष्णु के साक्षात्‌ अंश होने केकारण राजा गय भी विशुद्ध-सत्त्व में आसीन थे।

इस कारण महाराज गय दिव्य ज्ञान से युक्त थेऔर इसलिए वे महापुरुष कहलाए।

स बै स्वधर्मेण प्रजापालनपोषणप्रीणनोपलालनानुशासनलक्षणेनेज्यादिना च भगवति महापुरुषे परावरेब्रह्मणि सर्वात्मनार्पितपरमार्थलक्षणेन ब्रह्मविच्चरणानुसेवयापादितभगवद्धक्तियोगेन चा भीक्ष्णश:परिभावितातिशुद्धमतिरुपरतानात्म्य आत्मनि स्वयमुपलभ्यमानब्रह्मात्मानुभवो पि निरभिमानएवावनिमजूगुपत्‌, ॥

७॥

सः--वह राजा गय; बै--निश्चय ही; स्व-धर्मेण-- अपने कर्तव्य के द्वारा; प्रजा-पालन-- प्रजा का पालन करने; पोषण--प्रजाका भरण करने; प्रीणन--सभी तरह से उसे सुखी बनाने; उपलालन--उसे पुत्र की भाँति रखने; अनुशासन--कभी-कभीत्रुटियों के लिए दण्डित करने; लक्षणेन--राजा के लक्षणों से; इज्या-आदिना--वेदोक्त विधि से यज्ञ सम्पन्न करके; च--भी;भगवति-- श्री भगवान्‌, विष्णु; महा-पुरुषे--समस्त जीवात्माओं में प्रमुख; पर-अबरे-- भगवान्‌ ब्रह्म से लेकर अकिंचन चींटीतक समस्त जीवात्माओं का स्त्रोत; ब्रह्मणि--परब्रह्म पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ वासुदेव में; सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से;अर्पित--समर्पित, शरणागत; परम-अर्थ-लक्षणेन--चिन्मय लक्षणों से; ब्रह्य-वित्‌ू--स्वरूप-सिद्ध सन्त भक्तों के; चरण-अनुसेवया--चरणारविन्दों की सेवा करके; आपादित--प्राप्त किया; भगवत्‌-भक्ति-योगेन-- भगवान्‌ की भक्ति के अभ्यास से;च--भी; अभीक्षणश: --अनवरत, सतत्‌; परिभावित--संतृप्त; अति-शुद्ध-मतिः--जिसकी विशुद्ध चेतना ( ऐसी पूर्ण चेतनाकि शरीर तथा मन आत्मा से पृथक्‌ है ); उपरत-अनात्म्ये--जिसमें भौतिक वस्तुओं की पहचान रुक जाती है; आत्मनि--अपनेमें; स्ववम्‌--स्वयं; उपलभ्यमान--साक्षात्कार होते हुए; ब्रह्य-आत्म-अनुभव: -- अपनी स्थिति का परब्रह्म के रूप में दर्शन;अपि--यद्यपि; निरभिमान: --अभिमानरहित, झूठी बड़ाई के बिना; एब--इस प्रकार; अवनिम्‌--सम्पूर्ण संसार पर;अजूगुपत्‌--वैदिक विधियों के अनुसार दृढ़ता से शासन किया।

राजा गय ने अपनी प्रजा को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जिससे अवांछित तत्त्वों के द्वारा उनकीनिजी सम्पत्ति को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे।

उन्होंने इसका भी ध्यान रखा कि प्रजा कोपर्याप्त भोजन प्राप्त हो ( यही 'पोषण ' है )।

कभी-कभी प्रजा को प्रसन्न रखने के लिए वे दानदेते थे ( यह 'प्रीणन' कहलाता है )।

कभी-कभी वे प्रजा की सभाएं बुलाते और मृदु बचनों सेउन्हें तुष्टि प्रदान करते ( यह 'उपलालन ' कहलाता है )।

वे उन्हें उच्चकोटि के नागरिक बनने कीशिक्षा देते ( यह ' अनुशासन ' कहलाता है )।

राजा गय में इस प्रकार की विलक्षणताएँ थीं।

इनसबके साथ ही साथ राजा गय गृहस्थ थे और वे गृहस्थ जीवन के सभी नियमों का कड़ाई सेपालन करते थे।

वे यज्ञ करते थे तथा श्रीभगवान्‌ के एकनिष्ठ भक्त थे।

वे महापुरुष कहे जाते थे,क्योंकि राजा के रूप में उन्होंने नागरिकों को सभी सुविधाएं प्रदान कीं गृहस्थ के रूप में वे सभीकर्तव्यों का पालन करने वाले थे।

फलस्वरूप वे अन्ततः भगवान्‌ के परम भक्त हुए।

भक्त केरूप में वे सभी भक्तों का आदर करने और भगवान्‌ की सेवा करने को उद्यत रहते थे।

यहभक्तियोग की प्रक्रिया है।

इन दिव्य कर्मो के कारण राजा गय देहात्मबोध से सदैव मुक्त रहे।

वेब्रह्मसाक्षात्कार में लीन रहने के कारण सदैव प्रमुदित रहते थे।

उन्हें भौतिक पश्चात्ताप काअनुभव नहीं करना पड़ा।

सभी प्रकार से पूर्ण होने पर भी वे न तो गर्व करते थे, न ही राज्य करनेलिए लालायित थे।

तस्थेमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति ॥

८॥

तस्य--राजा गय के; इमाम्‌ू--ये; गाथाम्‌--स्तुतिपरक पद्य; पाण्डबवेय--हे महाराज परीक्षित; पुरा-विदः--पुराणों कीऐतिहासिक घटनाओं के ज्ञाता, उपगायन्ति; उपगायन्ति--तस्य--राजा गय के; इमाम्‌ू--ये; गाथाम्‌--स्तुतिपरक पद्य; पाण्डबवेय--हे महाराज परीक्षित; पुरा-विदः--पुराणों कीऐतिहासिक घटनाओं के ज्ञाता, उपगायन्ति- गाते हैं।

हे राजा परीक्षित्‌, पुराणों को जानने वाले विद्वान राजा गय की स्तुति और महिमागाननिम्नलिखित एलोकों से करते हैं।

गयं॑ नृपः कः प्रतियाति कर्मभि-्ज्वाभिमानी बहुविद्धर्मगोप्ता ।

समागतश्री: सदसस्पतिः सतांसत्सेवकोन्यो भगवत्कलामृते ॥

९॥

गयम्‌--गय; नृप:-- राजा; कः--कौन ; प्रतियाति--तुलनीय है; कर्मभि:ः--कर्मों के कारण; यज्वा--जिसने समस्त यज्ञ किये;अभिमानी--सरे विश्व में अत्यधिक सम्मानित; बहु-वित्‌--वैदिक शास्त्रों से भली-भाँति ज्ञात; धर्म-गोप्ता--प्रत्येक व्यक्ति केकार्यों का संरक्षक; समागत- श्री:--सभी प्रकार के वैभव से युक्त; सदसः-पति:ः सताम्‌ू--महान्‌ व्यक्तियों की सभा का अध्यक्ष;सतू-सेवक:ः--भक्तों का सेवक; अन्य: --अन्य कोई; भगवत्‌-कलाम्‌-- श्रीभगवान्‌ की कला ( अवतार ); ऋते--केअतिरिक्त

महान्‌ राजा गय सभी प्रकार के वैदिक अनुष्ठान किया करते थे।

वे अत्यन्त बुद्धिमान औरसभी वैदिक शास्त्रों के अध्ययन में दक्ष थे।

उन्होंने धार्मिक नियमों की रक्षा की और वे समस्तवैभव से युक्त थे।

वे सज्जनों के नायक और भक्तों के सेवक थे।

वे श्रीभगवान्‌ के सच्चे अर्थों मेंसर्वथा समर्थ अंश ( कला ) थे।

अतः महान्‌ अनुष्ठानों ( यज्ञ ) को सम्पन्न करने में उनकी तुलनाकौन कर सकता है ?यमभ्यषिज्ञन्परया मुदा सतीःसत्याशिषो दक्षकन्या: सरिद्धि: यस्य प्रजानां दुदुहे धराशिषोनिराशिषो गुणवत्सस्नुतोधा: ॥

१०॥

यम्‌--जिसको; अभ्यषिश्नन्‌ू--- अभिषेक करती थीं; परया--अत्यन्त ( परम ); मुदा--सन्तोष से; सती: --अपने पतियों के प्रतिभक्तिभाव रखने वाली तथा पतिक्रता स्त्रियाँ; सत्य--सच्चे; आशिष:--आशीर्वाद; दक्ष-कन्या:--राजा दक्ष की पुत्रियाँ;सरिद्धिः--पवित्र जल के द्वारा; यस्थ--जिसकी; प्रजानाम्‌--प्रजा की; दुदुहै--पूरा किया; धरा--पृथ्वी ने; आशिष:--समस्त'कामनाओं का; निराशिष:--यद्यपि स्वयं कामनारहित होकर; गुण-वत्स-स्नुत-उधा: -- प्रजा पर राज्य करने वाले

गय के गुणोंको देखकर गो रूप पृथ्वी के थन से दुग्ध की धारा निकल आईं।

महाराज दक्ष की श्रद्धा, मैत्री तथा दया जैसी पतिब्रता तथा सत्यनिष्ठ कन्याएँ जिनकेआशीर्वाद सदा फलित होते थे, पवित्र जल से महाराज गय का अभिषेक करती थीं।

असल में वेसभी महाराज गय से अत्यधिक सन्तुष्ट थीं।

पृथ्वी स्वयं गौ रूप में प्रकट हुई और महाराज गय केउत्तम गुणों को देखकर दुग्ध सत्रवण करने लगी, मानो गाय ने अपने वत्स को देखा हो।

छन्दांस्यकामस्य च यस्य कामान्‌दुदृहुराजहरथो बलि नृपा: ।

प्रत्यश्लिता युधि धर्मेण विप्रायदाशिषां षष्ठमंशं परेत्य ॥

११॥

छन्दांसि--वेदों के समस्त अंग; अकामस्य--निष्काम; च-- भी; यस्य--जिसकी ; कामान्‌--समस्त इच्छाएँ; दुदृहुः--प्रदानकिया; आजहु:-- अर्पित किया; अथो--इस प्रकार; बलिमू-- भेंट, बलि; नूपा:--सभी राजा; प्रत्यश्चिता:--उसके विपक्ष मेंयुद्ध करने से सन्तुष्ट होकर; युधि--युद्ध में; धर्मेण-- धार्मिक नियमों से; विप्रा: --समस्त ब्राह्मण; यदा--जब; आशिषाम्‌--आशीर्वादों का; षष्ठम्‌ अंशम्‌--छठा अंश; परेत्य--अगले जन्म में |

यद्यपि महाराज गय में इन्द्रियतृप्ति के लिए किसी प्रकार की व्यक्तिगत इच्छा नहीं थी, किन्तुवैदिक अनुष्ठानों को पूरा करने के कारण उनकी सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति होती रहती थी।

जिनराजाओं से महाराज गय को युद्ध करना पड़ता, वे धर्मयुद्ध करने के लिए विवश हो जाते।

वेमहाराज गय के युद्ध से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर उन्हें सभी प्रकार की भेंटें प्रदान करते थे।

इसीप्रकार से उनके राज्य के समस्त ब्राह्मण उनके मुक्त दान से अत्यन्त सन्तुष्ट रहते थे।

फलस्वरूपब्राह्मणों ने राजा गय को अगले जन्म में प्राप्त होने के लिए अपने पुण्यकर्मों का छठा अंश सहर्षप्रदान किया था।

यस्याध्वरे भगवानध्वरात्मामधघोनि माद्यत्युरुसोमपीथे ।

श्रद्धाविशुद्धाचलभक्तियोगसमर्पितेज्याफलमाजहार ॥

१२॥

यस्य--जिसका ( राजा गय का ); अध्वरे--विभिन्न यज्ञों में; भगवान्‌-- भगवान्‌; अध्वर-आत्मा--समस्त यज्ञों के परम भोक्ता,यज्ञ पुरुष; मघोनि--जब राजा इन्द्र; माद्यति--मदान्ध हो जाता है; उरुू--अत्यधिक; सोम-पीथे--मादक सोमरस का पान करतेहुए; श्रद्धा-- भक्ति से; विशुद्ध--शुद्ध।

अचल--तथा स्थिर; भक्ति-योग--भक्ति के द्वारा; समर्पित--चढ़ाया गया, अर्पित;इज्या--पूजन का; फलम्‌--फल, परिणाम्‌; आजहार--स्वयं स्वीकार किया।

महाराज गय के यज्ञों में सोम नामक मादक द्रव्य का अत्यधिक प्रयोग होता था।

इनमें राजाइन्द्र आया करते थे और प्रचुर मात्रा में सोमरस पीकर मदान्ध हो जाते थे।

भगवान्‌ श्रीविष्णु(यज्ञ पुरुष ) भी आया करते थे और यज्ञ क्षेत्र में विशुद्ध भक्तिपूर्वक उनको समर्पित किये गयेयज्ञफल को स्वयं स्वीकार करते थे।

यत्प्रीणनाद्वर्हिषि देवतिर्यड्-मनुष्यवीरुत्तृणमाविरिश्ञात्‌ ।

प्रीयेत सद्यः स ह विश्वजीव:प्रीतः स्वयं प्रीतिमगाद्गयस्य ॥

१३॥

यत्‌-प्रीणनात्‌-- श्रीभगवान्‌ के प्रसन्न होने से; बहिंषि--यज्ञ क्षेत्र में; देव-तिर्यक्‌--देवता तथा निम्न पशु; मनुष्य--मानवसमाज; वीरुतू--पादप तथा वृक्ष; तृणम्‌--घास; आ-विरिज्ञात्‌-- भगवान्‌ ब्रह्मा तक; प्रीयेत--सन्तुष्ट हो जाता है; सद्यः--तुरन्त; सः--श्रीभगवान्‌; ह--निश्चय ही; विश्व-जीव:--समस्त संसार के जीवात्माओं का पालन करने वाला; प्रीत:--यद्यपिसहज तुष्ट हैं; स्वयम्‌--साक्षात; प्रीतिमू--सन्तोष के; अगात्‌--प्राप्त हुआ; गयस्य--महाराज गय के

जब परमेश्वर किसी व्यक्ति के कर्मो से प्रसन्न होते हैं, तो ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता,मनुष्य, पशु, पक्षी, लताएँ, तृण तथा अन्य समस्त जीवात्माएँ स्वतः प्रसन्न हो जाती हैं।

पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ सबों के परमात्मा हैं और वे स्वभाव से परम प्रसन्न रहते हैं।

तो भी वे महाराजगय के यज्ञ क्षेत्र में आये और उन्होंने कहा, 'मैं पूर्णतया प्रसन्न हूँ।

गयादूगयन्त्यां चित्ररथ: सुगतिरवरोधन इति त्रयः पुत्रा बभूवुश्चित्ररथादूर्णायां सम्राडजनिष्ट; ततउत्कलायां मरीचिरमरीचेर्जिन्दुमत्यां बिन्दुमानुदपद्यत तस्मात्सरघायां मधुर्नामाभवन्मधो: सुमनसिवबीरब्रतस्ततो भोजायां मन्धुप्रमन्थू जज्ञाते मन्‍्थो: सत्यायां भौवनस्ततो दूषणायां त्वष्टाजनिष्टत्वष्टुविरोचनायां विरजो विरजस्य शतजित्प्रवरं पुत्रशतं कन्या च विषूच्यां किल जातम्‌ ॥

१४-१५॥

गयातू--महाराज गय से; गयन्त्यामू--उनकी पतली गयन्ती के; चित्र-रथ: --चित्ररथ नामक; सुगति:--सुगति नामक;अवरोधन:--अवरोधन नामक; इति--इस प्रकार; त्रय:--तीन; पुत्रा:--पुत्र; बभूवु:--उत्पन्न हुए; चित्ररथात्‌--चित्ररथ से;ऊर्णायाम्‌ू--ऊर्णा के गर्भ से; सम्राट्‌--सप्राट नामक पुत्र; अजनिष्ट -- उत्पन्न हुआ; तत:--उससे; उत्कलायाम्‌--उत्कला नामकपली से; मरीचि:--मरीचि; मरीचे: --मरीचि से; बिन्दु-मत्याम्‌ू--उसकी पतली बिन्दुमती के गर्भ से; बिन्दुम्‌-बिन्दु नाम का पुत्र;आनुदपद्यत--उत्पन्न हुआ; तस्मात्‌--उससे; सरघायाम्‌--सरघा नाम की पतली के गर्भ से; मधु:--मधु; नाम--नामक;अभवत्‌--जन्म लिया; मधो: --मधु से; सुमनसि--उसकी पत्नी सुमना के गर्भ से; बीर-ब्रत:ः--वीरकब्रत नामक पुत्र; ततः--बीरब्रत से; भोजायामू--उसकी पली भोजा से; मन्थु-प्रमन्‍्थू--मन्थु तथा प्रमन्थु नाम के दो पुत्र; जज्ञाते--उत्पन्न हुए; मन्धो: --मन्थु से; सत्यायाम्‌--उसकी पत्नी सत्या से; भौवन:--भौवन नामक पुत्र; ततः--उससे; दूषणायाम्‌--उसकी पत्नी दूषणा केगर्भ से; त्वष्टा--त्वष्टा नाम का एक पुत्र; अजनिष्ट --उत्पन्न हुआ; त्वष्ट:--त्वष्टा से; विरोचनायामू--उसकी पत्नी विरोचना के;विरज:--विरज नाम का एक पुत्र; विरजस्य--राजा विरज का; शतजित्‌-प्रवरम्‌--( जिनमें ) शतजित सर्वोपरि था; पुत्र-शतम्‌--एक सौ पुत्र; कन्या--एक पुत्री; च-- भी; विषूच्याम्‌-- उसकी पत्नी विषूची के; किल--निश्चय ही; जातम्‌-जन्मण् गयन्ती के गर्भ से महाराज गय के तीन पुत्र हुए जिनके नाम थे--चित्ररथ, सुगति तथाअवरोधन।

चित्ररथ की पत्नी ऊर्णा से सम्राट नाम का पुत्र प्राप्त हुआ।

सप्राट्‌ की पत्नी का नामउत्कला था जिसके गर्भ से सम्राट को मरीचि नामक पुत्र का लाभ हुआ।

मरीचि की पत्नीबिन्दुमति से बिन्दु नामक पुत्र हुआ।

बिन्दु की पत्नी सरघा के गर्भ से मधु नामक एक पुत्र ने जन्मलिया।

मधु की पत्नी सुमना से वीरब्रत और वीरब्रत की पत्नी भोजा से मन्थु तथा प्रमन्थु नाम केदो पुत्र उत्पन्न हुए।

मन्थु की पत्नी सत्या से भौवन नाम का पुत्र और भौवन की पत्नी दूषणा सेत्वष्टा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ।

त्वष्टा की पत्नी विरोचना से विरज नाम का पुत्र हुआ और उसकीपत्नी विषूची के गर्भ से एक सौ पुत्र तथा एक पुत्री उत्पन्न हुई।

इन सभी पुत्रों में शतजित्‌ नाम कापुत्र सर्वोपरि था।

तत्रायं श्लोक:--प्रैयत्रतं वंशमिमं विरजश्चरमोद्धव: ।

अकरोदत्यलं कीरत्या विष्णु: सुरगणं यथा ॥

१६॥

तत्र--उस प्रसंग में; अथम्‌ एलोक:ः--यह प्रसिद्ध श्लोक है; प्रैयव्रतम्‌--राजा प्रियत्रत से चलने वाला; वंशम्‌--वंश; इमम्‌--यह; विरज:--राजा विरज; चरम-उद्धव:--एक सौ पुत्रों ( जिनमें शतजित्‌ सर्वोपरि था ) का स्रोत; अकरोत्‌--अलंकृत किया;अति-अलम्‌--अत्यधिक; कीरत्या--अपनी कीर्ति से; विष्णु:--भगवान्‌ विष्णु, श्रीभगवान्‌; सुर-गणम्‌--देवता गण; यथा--जिस प्रकार।

राजा विरज के सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध है (जिसका अर्थ है )--' अपने उच्च गुणोंतथा व्यापक कीर्ति के कारण राजा विरज उसी प्रकार से प्रियत्रत राजा के वंश के मणि हो गएजिस प्रकार भगवान्‌ विष्णु अपनी दिव्य शक्ति द्वारा देवताओं को विभूषित करते और उन्हेंआशीष देते हैं।

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