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अध्याय बारह: महाराज राहुगण और जड़ भरत के बीच बातचीत
5.12रहूगण उबाचनमो नमः कारणविग्रहायस्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय ।
नमोवधूतद्विजबन्धुलिड्र-निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥
१॥
रहूगण: उवाच--राजा रहूगण ने कहा; नम:--मेरा नमस्कार है; नम:--नमस्कार; कारण-विग्रहाय--समस्त कारणों के कारण,परमात्मा से प्रकट होने वाले को; स्वरूप-तुच्छीकृत-विग्रहाय--अपने सत्य रूप को प्रकट करके शास्त्रों के विरोधों को दूरकरनेवाले; नम: --नमस्कार; अवधूत-हे योगेश्वर; द्विज-बन्धु-लिड्र--ब्राह्मण कुल में उत्पन्न पुरुष के लक्षणों के द्वारा ( भले हीब्राह्मण का कर्म न करता हो ); निगूढ-- प्रच्छन्न; नित्य-अनुभवाय--उसे जिसका शाश्वत आत्म-साक्षात्कार होता हो; तुभ्यम्--तुम्हें ?
राजा रहूगण ने कहा--हे महात्मन्ू, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अभिन्न हैं।
आपकेप्रभाव से शास्त्रों के समस्त विरोधभास दूर हो गये हैं।
आप ब्रह्म-बन्धु के वेश में अपने दिव्यआनन्दमय स्वरूप को छिपाए हुए हैं।
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत्निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भ: ।
कुदेहमानाहिविदष्टशष्टेःब्रह्मन्वचस्तेडमृतमौषधं मे ॥
२॥
ज्वर--ज्वर, या ताप के; आमय--रोग से; आर्तस्य--पीड़ित पुरुष की; यथा--जिस प्रकार; अगदम्-- औषधि दवा; सत्--सही; निदाघ-दग्धस्य--लू लगने पर; यथा--जैसे; हिम-अम्भ:--अति शीतल जल; कु-देह--इस शरीर में, जो मल-मूत्र जैसागंदी वस्तुओं से पूरित है; मान--गर्व रूपी; अहि--सर्प से; विदृष्ट--दंशित, काटा गया; दृष्टे:--दृष्टि वाले का; ब्रह्मनू-हेब्राह्मणों में श्रेष्ठ; बच:--शब्द, वाणी; ते--तुम्हारी; अमृतम्--अमृत; औषधम्--दवा; मे--मेरे लिए?
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मेरा शरीर मल से पूर्ण और मेरी दृष्टि गर्व रूपी सर्प द्वारा दंशित है।
अपनीभौतिक बुद्धि के कारण मैं रुग्ण हूँ।
इस प्रकार के ज्वर से पीड़ित व्यक्ति के लिए आपकेअमृतमय उपदेश वैसे ही हैं जैसे कि धूप ( लू ) से झुलसे हुए व्यक्ति के लिए शीतल जल होताहै।
तस्माद्धवन्तं मम संशयार्थप्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् ।
अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त-माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥
३॥
तस्मातू--अतः; भवन्तम्-- आपको; मम--मुझको; संशय-अर्थम्--वे विषय जिसका अर्थ मुझे ज्ञात नहीं; प्रक्ष्यामि--कहूँगा;पश्चात्-बाद में; अधुना--इस समय; सु-बोधम्-- सरलता से समझ में आ जाने वाला, बोधगम्य; अध्यात्म-योग--आत्म-साक्षात्कार हेतु योग शिक्षा का; ग्रधितम्ू--रचित; तब--तुम्हारी; उक्तमू--वाणी, वचन; आख्याहि--पुनः विस्तार से समझाइये;'कौतूहल-चेतस:--ऐसे उत्कण्ठा से ?
पूर्ण कथनों के मर्म को समझने के लिए जिसका मन अत्यन्त उत्सुक है; मे--मुझको |
यदि किसी विशेष विषय पर मेरी शंकाएँ रह गई हैं, तो मैं उनके सम्बन्ध में आपसे बाद मेंपूछूँगा।
किन्तु इस समय आपने आत्म-साक्षात्कार के लिए जो गूढ़ योग के उपदेश दिये हैं उनकोसमझ पाना कठिन है।
कृपया उन्हें सरल रीति से पुनः कहें जिससे मैं उन्हे समझ सकूँ।
मेरा मनअत्यन्त उत्सुक है और मैं इसे भलीभाँति समझ लेना चाहता हूँ।
यदाह योगेश्वर दृश्यमानंक्रियाफलं सद्व्यवहारमूलम् ।
न हाझ्जसा तत्त्वविमर्शनायभवानमुष्मिन्भ्रमते मनो मे ॥
४॥
यत्--जो; आह--आपने कहा है; योग-ईश्वर--हे योग शक्ति के स्वामी; हृश्यमानम्-- भली-भाँति दिखते हुए; क्रिया-फलम्--शरीर को इधर-उधर हिलाने डुलाने का फल यथा थकान; सत्ू--विद्यमान; व्यवहार-मूलम्--जिसका आधार केवल शिष्टता है;न--नहीं; हि--निश्चय ही; अज्धसा--वस्तुतः-वास्तव में; तत्त्व-विमर्शनाय--विमर्श द्वारा सत्य को समझने के लिए; भवान्--आप; अमुष्मिन्--उस कथन में; भ्रमते-- चक्कर काट रहा है; मनः--मन; मे--मेरा |
हे योगेश्वर आपने कहा है कि शरीर को इधर-उधर हिलाने-डुलाने से उत्पन्न थकान प्रत्यक्ष अनुभवगम्य है, किन्तु वास्तव में कोई थकान नहीं रहती।
वह तो कहने के लिए होती है।
ऐसेप्रश्नोत्तरों से परम सत्य के विषय में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
आपके इस कथन सेमेरा मन कुछ-कुछ विचलित है।
ब्राह्मण उवाचअयं जनो नाम चलन्पृथिव्यांयः पार्थिव: पार्थिव कस्य हेतोः ।
तस्यापि चाड्ग्घ्रयोरधि गुल्फजड्डा-जानूरुमध्योरशिरोधरांसा: ॥
५॥
अंसेधि दार्वी शिबिका च यस्यांसौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।
यस्मिन्भवातब्रूढनिजाभिमानोराजास्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्ध: ॥
६॥
ब्राह्मण: उवाच--ब्राह्मण ने कहा; अयम्--यह; जन:ः--पुरुष; नाम--पदवी; चलनू--चलते हुए; पृथिव्याम्--पृथ्वी पर; य:--जो; पार्थिव:--पृथ्वी का रूप; पार्थिव--हे राजा, जिसका शरीर पार्थिव है; कस्य--किस; हेतो: --कारण; तस्य अपि-- उसकाभी; च--तथा; अड्ग्घ्रयो: --पाँव; अधि--ऊपर; गुल्फ--टखने; जज्ञ--पिंडली; जानु--घुटने; उरू--जघन, जाँघ;मध्योर--कटि, कमर; शिर:-धर--गर्दन; अंसा:--कंधे; अंसे--कंधा; अधि--ऊपर; दार्बी--लकड़ी की बनी हुई;शिबिका--पालकी; च--तथा; यस्यामू--जिस पर; सौवीर-राजा--सौवीर का राजा; इति--इस प्रकार; अपदेश:--विख्यात;आस्ते-- है; यस्मिन्--जिसमें; भवान्ू-- आप; रूढ-- आसीन; निज-अभिमान:--मिथ्या प्रतिष्ठा का भाव; राजा अस्मि--राजाहूँ; सिन्धुषु--सिन्धु राज्य में; इति--इस प्रकार; दुर्मद-अन्ध:--अहंकार के वशीभूत, मद से अंधे।
स्वरूपसिद्ध ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा--अनेक भौतिक संयोगों में विविध रूप तथा पार्थिवरूपान्तर विद्यमान हैं।
कुछ कारणवश ये पृथ्वी पर हिलते-डुलते हैं और पालकीवाहक ( कहार )कहलाते हैं।
इनमें से वे रूपान्तर जो गति नहीं करते वे पत्थर जैसे स्थूल पदार्थ हैं।
प्रत्येक दशा मेंयह भौतिक देह पाँव, टखना, पिंडली, घुटना, जाँघ, कमर, गर्दन तथा सिर के रूप में मिट्टी तथापत्थर से बनी हैं।
इसके कंधों के ऊपर काठ की पालकी रखी है और उसके भीतर सौवीर का राजा बैठा है।
राजा का शरीर मिट्टी का अन्य रूपान्तर मात्र है, किन्तु उस शरीर के भीतर आपस्थिर हैं और अहंकारवश अपने को सौवीर राज्य का राजा मान रहे हैं।
शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान्विष्टयया निगृह्नन्निरनुग्रहोडसि ।
जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानोन शोभसे वृद्धसभासु धृष्ट: ॥
७॥
शोच्यान्ू--शोचनीय है; इमान्--ये सब; त्वमू-- तुम; अधि-कष्ट-दीनान्ू-- अपनी दरिद्रता के कारण बेचारे लोग और अधिककष्ट उठा रहे हैं; विष्ठधया--बलपूर्वक; निगृह्न्-- पकड़े हुए; निरनुग्रहः असि--तुम अत्यन्त दया से हीन हो; जनस्थ--सामान्यलोगों का; गोप्ता अस्मि--मैं रक्षक ( राजा ) हूँ; विकत्थमान:--डींग मारते हुए; न शोभसे--तुम्हें शोभा नहीं देता; वृद्ध-सभासु--विद्वानों की सभा में; धृष्ट:--बढ़-चढ़कर बातें करने वाला, उद्धत |
किन्तु यह सच है कि बेगारी में तुम्हारी पालकी ले जाने वाले ये निर्दोष व्यक्ति इस अन्यायके कारण कष्ट उठा रहे हैं।
उनकी दशा अत्यन्त शोचनीय है, क्योंकि तुमने अपनी पालकी लेजाने के लिए जबरन उन्हें लगा रखा है।
इससे सिद्ध होता है कि तुम क्रूर तथा निर्दय हो।
तो भीअहंकारवश तुम यह सोच रहे थे कि तुम प्रजा के रक्षक हो।
यह हास्यास्पद है।
तुम जैसे मूर्ख कोज्ञानी पुरुषों की सभा में भला कौन महान् पुरुष मान सकता है ?
यदा क्षितावेव चराचरस्यविदाम निष्टां प्रभवं च नित्यम् ।
तन्नामतो न्यद्व्यवहारमूलंनिरूप्यतां सत्क्रिययानुमेयम् ॥
८ ॥
यदा--अतः ; क्षितौ--पृथ्वी पर; एव--निश्चय ही; चर-अचरस्य--चर तथा अचर का; विदाम--हम जानते हैं; निष्ठाम्ू--प्रलय,संहार; प्रभवम्--सृष्टि; च--तथा; नित्यम्ू--प्रकृति के नियमों से नियमित रूप से; तत्ू--वह; नामत:ः--केवल नाम से;अन्यत्--अन्य; व्यवहार-मूलम्-- भौतिक कार्यो का कारण; निरूप्यताम्--निश्चित किया गया; सतू-क्रियया--वास्तविक कार्यसे; अनुमेयम्--निष्कर्ष निकालना चाहिए ?
हम इस पृथ्वी के ऊपर विभिन्न रूपों में जीवात्माएँ हैं।
हममें से कुछ गतिशील हैं, तो कुछ गति नहीं करते।
हम सभी उत्पन्न होते हैं, कुछ समय तक रहते हैं और नष्ट हो जाने पर पृथ्वी मेंपुनः मिल जाते हैं।
हम सभी पृथ्वी के विभिन्न रूपान्तर ( पार्थिव ) हैं; विभिन्न शरीर तथाउपाधियाँ पृथ्वी के रूपान्तर मात्र हैं और नाम के लिए ही विद्यमान रहती हैं, क्योंकि प्रत्येक वस्तुपृथ्वी से निकलती है और जब सब कुछ विनष्ट हो जाता है, तो वह फिर पृथ्वी में मिल जाती है।
दूसरे शब्दों में, हम केवल धूल हैं और धूल ही रहेंगे।
सबों को इस पर विचार करना चाहिए।
एवं निरुक्त क्षितिशब्दवृत्त-मसन्निधानात्परमाणवो ये ।
अविद्यया मनसा कल्पितास्तेयेषां समूहेन कृतो विशेष: ॥
९॥
एवम्--इस प्रकार; निरुक्तम्-मिथ्या वर्णन किया गया; क्षिति-शब्द--क्षिति अर्थात् 'पृथ्वी ' शब्द; वृत्तम्--उपस्थिति;असत्ू--असत्य; निधानात्ू--विलीन होने से; परम-अणव: --अत्यन्त सूक्ष्म कण; ये--जो सब; अविद्यया--अविद्या अर्थात्अज्ञान से; मनसा--मन से; कल्पिता:--कल्पना किये हुए; ते--वे; येषामू--जिनका; समूहेन--समूह के द्वारा; कृत:--बनायाहुआ; विशेष:--विशेष |
कोई यह कह सकता है कि विविधता तो स्वयं पृथ्वी से उत्पन्न होती है।
तथापि यह ब्रह्माण्डभले ही थोड़े समय तक सत्य प्रतीत हो पर वास्तव में इसका कोई अस्तित्व नहीं है।
यह पृथ्वीमूलतः सूक्ष्म कणों के संयोग से उत्पन्न हुई थी, किन्तु ये कण अस्थायी हैं।
वास्तव में परमाणुब्रह्माण्ड का कारण नहीं, यद्यपि कुछ दार्शनिक ऐसा सोचते हैं।
यह सत्य नहीं है कि इस संसारमें पाई जाने वाली विविधता ( किसमें ) परमाणुओं के उलट-पुलट या विविध संयोगों का प्रतिफल है।
एवं कृशं स्थूलमणुरबृहद्यद्असच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।
द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म -नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम् ॥
१०॥
एवम्--इस प्रकार; कृशम्--दुर्बल या छोटा; स्थूलमू--मोटा; अणु:--लघु; बृहत्--बड़ा; यत्--जो; असत्--अस्थायी; च--तथा; सत्--अस्तित्वमान्; जीवम्--जीवात्मा; अजीवम्--जड़, जीवरहित पदार्थ; अन्यत्--अन्य कारण; द्रव्य--घटना; स्व-भाव--प्रकृति, आचरण; आशय--मन्तव्य; काल--समय; कर्म--कार्य, वृत्ति; नाम्ना--नामों से; अजया-- प्रकृति द्वारा;अवेहि--तुम्हें समझना चाहिए; कृतम्--किया गया; द्वितीयम्-द्वैत?
चूँकि इस ब्रह्माण्ड का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है, अतः इसके भीतर की वस्तुएँ--यथा लघुता, अन्तर, स्थूलता, कृशता, सूक्ष्मता, विशालता, परिणाम, कारण, कार्य, चेतना तथाद्रव्य--ये सब काल्पनिक हैं।
ये एक ही वस्तु-मिट्टी के बने पात्र हैं, किन्तु इनके नाम भिन्न-भिन्नहैं।
ये अन्तर पदार्थ, प्रकृति, आशय, काल तथा क्रिया ( कर्म ) द्वारा जाने जाते हैं।
तुम्हें जाननाचाहिए कि ये प्रकृति द्वारा उत्पन्न यांत्रिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-मनन्तरं त्वबहिर्त्रह्य सत्यम् ।
प्रत्यक्प्रशान्तं भगवच्छब्दसंज्ञंयद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥
११॥
ज्ञाममू--परम ज्ञान; विशुद्धमू--कल्मषहीन, शुद्ध; परम-अर्थम्--जीवन का परम उद्देश्य प्रदान करने वाला; एकम्ू--एक;अनन्तरमू-- अन्तरविहीन; तु-- भी; अबहि:--बाह्य रहित; ब्रह्म--ब्रह्म, परम; सत्यमू--परम सत्य; प्रत्यक्ू--आन्तरिक,आशभ्यन्तर; प्रशान्तम्-शान्त परमेश्वर, जिसकी उपासना योगी करते हैं; भगवत्-शब्द-संज्ञम्-- भगवान् शब्द से ज्ञात अथवासम्पूर्ण ऐश्वर्य से पूर्ण; यत्--उस; वासुदेवम्-- श्रीकृष्ण, वसुदेव के पुत्र को; कबयः--बुद्धिमान अथवा विद्वान; बदन्ति--कहतेहैं।
तो फिर परम सत्य क्या है? उत्तर है अद्बैत ज्ञान जो भौतिक गुणों के कल्मष से रहित है।
वहमुक्तिप्रदायक है।
वह अद्वितीय, सर्वव्यापी तथा कल्पनातीत है।
उस ज्ञान की प्रथम प्रतीति ब्रह्महै।
फिर योगियों द्वारा अनुभव किया जाने वाला परमात्मा है।
जो बिना किसी कष्ट के उसे देखनेका प्रयास करते है यह प्रतीति की दूसरी अवस्था है।
अन्त में परम पुरुष में ही उसी परम ज्ञान कीपूर्ण प्रतीति की जाती है।
सभी विद्वान परम पुरुष को वासुदेव के रूप में वर्णन करते हैं, जोब्रह्म, परमात्मा आदि का कारण है।
रहूगणैतत्तपसा न यातिन चेज्यया निर्वपणादगृहाद्वा ।
न च्॒छन्दसा नेव जलाग्निसूर्य -विना महत्पादरजोउभिषेकम् ॥
१२॥
रहूगण--हे राजा रहूगण; एतत्--यह ज्ञान; तपसा--कठिन तपस्या द्वारा; न याति--नहीं आता; न--नहीं; च-- भी; इज्यया --श्रीविग्रह की पूजा के लिए महत् आयोजन से; निर्वपणात्--अथवा समस्त सांसारिक कर्तव्यों को पूरा करने और संन्यास ग्रहणकरने से; गृहात्--आदर्श गृहस्थ जीवन से; वा--अथवा; न--न तो; छन्दसा--ब्रह्मचर्य धारण करने या वेदों के अध्ययन से; नएव--न तो; जल-अग्नि-सूर्य:-- जल, तपती धूप या जलती अग्नि में रह कर कठिन तपस्या करने से; विना--रहित; महत्--परम भक्तों की; पाद-रज:--चरण धूलि में; अभिषेकम्--शरीर मार्जन, स्नान?
हे राजा रहूगण, महापुरुषों के चरणकमलों की धूलि से सम्पूर्ण शरीर को मलने के लिएबिना परम सत्य की प्रतीति नहीं हो सकती।
ब्रह्मचर्य धारण करने, गृहस्थ जीवन के विधि-विधानों के अनुपालन, वानप्रस्थ के रूप में गृहत्याग अथवा संन्यास ग्रहण करने या शीत ऋतु मेंजल में घुस कर घोर तपस्या करने, या ग्रीष्म में अग्नि से घिर रहने झुलसती धूप में पड़े रहनेजैसी कठिन तपस्याओं से परम सत्य की प्रतीति नहीं हो सकती।
परम सत्य को जानने के औरभी अनेक साधन हैं, किन्तु परम सत्य उसे ही प्राप्त होता है, जिसे किसी महान् भक्त का अनुग्रहप्राप्त हो।
यत्रोत्तमश्लोकगुणानुवाद:प्रस्तूयते ग्राम्यक थाविघात: ।
निषेव्यमाणो<नुदिन मुमुक्षो-मतिं सतीं यच्छति वासुदेवे ॥
१३॥
यत्र--जिस स्थान में ( भक्तों के समक्ष ); उत्तम-शलोक-गुण-अनुवाद:-- श्रीभगवान् की लीलाओं तथा गुणों की चर्चा;प्रस्तूयते--प्रस्तुत की जाती है; ग्राम्य-कथा-विघात:--जिसके कारण लौकिक विषयों की चर्चा के लिए अवसर नहीं मिलता;निषेव्यमाण: --अत्यन्त मनोयोग से सुनी जाकर; अनुदिनम्--नित्यप्रति; मुमुक्षो:-- भौतिक बंधन से निकलने के लिए इच्छुकव्यक्ति का; मतिम्-ध्यान; सतीम्--शुद्ध तथा सरल; यच्छति--लगा देती है; वासुदेवे-- भगवान् वासुदेव के चरमकमलों में |
यहां वर्णित वे शुद्ध भक्त कौन हैं? शुद्ध भक्तों की सभा में राजनीति या समाजशामस्त्र जैसेसांसारिक विषयों पर चर्चा चलाने का प्रश्न ही नहीं उठता।
वहाँ तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कीलीलाओं, स्वरूप एवं गुणों की ही चर्चा होती है।
उनकी प्रशंसा तथा उपासना पूर्ण मनोयोग सेकी जाती है।
यहाँ तक कि विशुद्ध भक्तों की संगति से, ऐसे विषयों को लगातार आदर पूर्वकसुनने से ऐसा पुरुष जो परम सत्य में तदाकार होना चाहता है, वह भी अपने इस विचार को त्यागकर क्रमश: वासुदेव की सेवा में आसक्त हो जाता है।
अहं पुरा भरतो नाम राजाविमुक्तदृष्टश्रुतसड्रबन्ध: ।
आराधनं भगवत ईहमानो मृगोभवं मृगसड्भाद्धतार्थ: ॥
१४॥
अहम्ू--ै; पुरा--पहले ( पूर्व जन्म में ); भरतः नाम राजा--भरत नाम का राजा; विमुक्त--मुक्त; दृष्ट-श्रुत--प्रत्यक्ष अनुभव सेअथवा वेदों से ज्ञान प्राप्त करके ; सड़-बन्ध: --संगति का बन्धन; आराधनम्--पूजा; भगवतः--भगवान् की; ईहमान:--सदैवकरते हुए; मृग: अभवम्--मैं मृग बन गया; मृग-सड्भात्ू--मृग के साथ घनिष्ठ मैत्री से; हत-अर्थ: --भक्ति के विधि-विधानों कीउपेक्षा करके |
मैं पूर्वजन्म में महाराज भरत के नाम से विख्यात था।
मैंने प्रत्यक्ष अनुभव तथा वेद-ज्ञान सेप्राप्त अप्रत्यक्ष अनुभव द्वारा सांसारिक कार्यों से पूर्णतया विरक्त होकर सिद्धि प्राप्त की।
मैंपूर्णतया भगवान् की सेवा में तत्पर रहता था, किन्तु दुर्भाग्यवश मैं एक छोटे से मृग के प्रतिइतना आसक्त हो उठा कि मैंने सारे आध्यात्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा कर दी।
मृग के प्रति प्रगाढ़स्नेह के कारण अगले जन्म में मुझे मृग का शरीर अंगीकार करना पड़ा।
सा मां स्मृतिर्मुगदेहे पि वीरकृष्णार्चनप्रभवा नो जहाति ।
अथो अहं जनसड्रादसड़ोविशड्जभमानोविवृतश्चरामि ॥
१५॥
सा--वह; माम्--मुझको; स्मृति: --पूर्वजन्म के कर्मो की याद; मृग-देहे--मृग के शरीर में; अपि--यद्यपि; वीर--हे वीर;कृष्ण-अर्चन-प्रभवा-- श्रीकृष्ण की एकनिष्ठ सेवा के प्रभाव से प्रकट; नो जहाति--नहीं छोड़ पाई; अथो-- अतः; अहम्--मैं;जन-सझ्त्--सामान्य पुरुषों के संसर्ग से; असड्भ:--पूर्णतया विरक्त; विशद्जूमान:-- भयभीत होकर; अविवृतः --दूसरों सेअलक्षित, गुप्त; चरामि--इधर-उधर घूमता हूँ।
हे वीर राजा, अपनी पूर्व अनन्य भगवत्ू-भक्ति के फलस्वरूप मृग शरीर में रहकर भी मुझे पूर्वजन्म की प्रत्येक वस्तु स्मरण रही।
चूँकि मैं अपने पूर्वजन्म के पतन से परिचित हूँ, अतः मैंसामान्य व्यक्तियों के संसर्ग से अपने को दूर रखता हूँ।
उनकी कुसंगति से डरकर मैं अलक्षित( गुप्त ) होकर अकेला घूमता फिरता हूँ।
तस्मान्नरोसड्रसुसड्रजात-ज्ञानासिनेहेव विवृक्णमोहः ।
हरिं तदीहाकथनश्रुता भ्यांलब्धस्मृतिर्यात्यतिपारमध्वन: ॥
१६॥
तस्मात्--इस कारण से; नरः--प्रत्येक व्यक्ति; असड्र--सांसारिक पुरुषों के संसर्ग से विरक्त होकर; सु-सड़--भक्तों की संगतिसे; जात--उत्पन्न; ज्ञान-असिना--ज्ञान रूपी तलवार से; इह--इस भौतिक जगत में; एब--यहाँ तक कि; विवृकण-मोहः --मोह छिन्न-छिन्न हो जाता है; हरिम्-- श्री भगवान्; तद्ू-ईहा--उनके कार्यों का; कथन-श्रुताभ्याम्ू-- श्रवण तथा कीर्तन इन दोविधियों से; लब्ध-स्मृति:ः--खोई चेतना प्राप्त हो जाती है; याति-- प्राप्त करता है; अतिपारमू--परम अन्त; अध्वन:--परम धामका ?
उन्नत भक्तों की संगति मात्र से पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और फिर ज्ञान कीतलवार से सांसारिक मोहों को छिन्न-भिन्न किया जा सकता है।
भक्तों की संगति से ही श्रवणतथा कीर्तन ( श्रवण कीर्तनम् ) द्वारा भगवान् की सेवा में अनुरक्त हुआ जा सकता है।
इस प्रकारसे अपने सुप्त कृष्णभावनामृत को जागृत किया जा सकता है और कृष्णभावनामृत केअनुशीलन द्वारा इसी जीवन में परमधाम को वापस जाया जा सकता है।
