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अध्याय दस: जड़ भरत और महाराज राहुगण के बीच चर्चा
5.10श्रीशुक उवाचअथ सिन्धुसौवीरपते रहूगणस्य ब्रजत इश्लुमत्यास्तटे तत्कुलपतिनाशिबिकावाहपुरुषान्वेषणसमयेदैवेनोपसादित: स द्विजवर उपलब्ध एष पीवा युवा संहननाड़ुं गोखरवद्भुरं वोढुमलमिति पूर्व॑विष्टिगृहीतैःसह गृहीतः प्रसभमतदर्ह उवाह शिबिकां स महानुभावः ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी बोले; अथ--इस प्रकार; सिन्धु-सौबीर-पते: --सिंधु तथा सौवीर राज्यों के शासक के;रहू-गणस्य--रहूगण नामक राजा के; ब्रजतः--( कपिल के आश्रम ) जाते हुए; इक्षु-मत्या: तटे--इक्षुमती के तट पर; ततू-कुल-पतिना--पालकी ढोने वालों के सरदार द्वारा; शिबिका-वाह--पालकीवाहक बनने के लिए; पुरुष-अन्वेषण-समये--आदमी की खोज करते हुए; दैवेन-- भाग्य से; उपसादित:--पास गये हुए; सः--वह; द्विज-वरः--ब्राह्मण पुत्र, जड़ भरत;उपलब्ध: --प्राप्त; एष:--यह पुरुष; पीवा--अत्यधिक बलिष्ठ; युवा--तरूण; संहनन-अड्डभ --सुगठित अंगों वाला; गो-खर-बत्--बैल या गधे के समान; धुरम्-- भार, बोझा; वोढुम्--ले जाने के लिए; अलम्--समर्थ; इति--इस प्रकार सोचते हुए;पूर्व-विष्टि-गृहीतैः--बलपूर्वक काम कराये जाने वाले, बेगारी में पकड़े गये; सह--साथ; गृहीत:--पकड़ा जाकर; प्रसभम्--बलपूर्वक; अ-तत्-अर्ह:--पालकी ढोने के अयोग्य होते हुए भी; उबाह--ढोता था; शिबिकामू--पालकी; सः--वह; महा-अनुभाव:--महापुरुष |
शुकदेव गोस्वामी आगे बोले, हे राजन, इसके बाद सिंधु तथा सौवीर प्रदेशों का शासकरहूगण कपिलाश्रम जा रहा था।
जब राजा के मुख्य कहार ( पालकीवाहक ) इश्लुमती के तट परपहुँचे तो उन्हें एक और कहार की आवश्यकता हुईं।
अतः वे किसी ऐसे व्यक्ति की खोज करनेलगे और दैववश उन्हें जड़ भरत मिल गया।
उन्होंने सोचा कि यह तरुण और बलिष्ठ है औरइसके अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ हैं।
यह बैलों तथा गधों के तुल्य बोझा ढोने के लिए अत्यन्त उपयुक्त है।
ऐसा सोचते हुए यद्यपि महात्मा जड़ भरत ऐसे कार्य के लिए सर्वथा अनुपयुक्त थे तो भी कहारोंने बिना झिझक के पालकी ढोने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया।
यदा हि द्विजवरस्येषुमात्रावलोकानुगतेर्न समाहिता पुरुषगतिस्तदा विषमगतां स्वशिबिकां रहूगण उपधार्यपुरुषानधिवहत आह हे वोढारः साध्वतिक्रमत किमिति विषममुहाते यानमिति ॥
२॥
यदा--जब; हि--निश्चय ही; द्विज-वरस्थय--जड़ भरत का; इषु-मात्र--एक बाण आगे तक ( ३ फुट ); अवलोक-अनुगते: --देखकर ही चलने से; न समाहिता--मेल न खाता हुआ; पुरुष-गतिः --कहारों की चाल; तदा--उस समय; विषम-गताम्--असन्तुलित होने पर; स्व-शिबिकाम्--अपनी पालकी को; रहूगण: --राजा रहूगण ने; उपधार्य--समझ कर; पुरुषान्ू--पुरुषोंसे; अधिवहतः--पालकी ले जाने वाले; आह--कहा; हे --ेरे; वोढार: --कहारो; साधु अतिक्रमत--एक बराबर चलो जिससेउछाल न हो; किम् इति--किस कारण; विषमम्--असंतुलित, ऊँची-नीची; उह्नते--ले जाई जा रही है; यानमू--पालकी;इति--इस प्रकार।
किन्तु अपने अहिंसक भाव के कारण जड़ भरत पालकी को ठीक से नहीं ले जा रहे थे।
जैसे ही वे आगे बढ़ते, हर तीन फुट पहले वे यह देखने के लिए रुक जाते कि कहीं कोई चींटीपर पांव तो नहीं पड़ रहा है।
फलतः वे अन्य कहारों से ताल-मेल नहीं बैठा पा रहे थे।
इसके कारण पालकी हिल रही थी।
अतः राजा रहूगण ने तुरन्त कहारों से पूछा, 'तुम लोग इसपालकी को ऊँची-नीची करके क्यों लिए जा रहे हो ? अच्छा हो, यदि उसे ठीक से ले चलो।
'अथ त ईश्वरवच: सोपालम्भमुपाकर्ण्योपायतुरीयाच्छड्लितमनसस्तं विज्ञापयां बभूवु:, ॥
३॥
अथ--इस प्रकार; ते--वे ( कहार ); ईश्वर-वच:--अपने स्वामी राजा रहूगण के शब्द; स-उपालम्भम्--उलाहनापूर्वक;उपाकर्ण्य --सुनकर; उपाय--साधन; तुरीयात्--चौथे से; शद्धित-मनस:ः--सशंकित मन वाले; तम्ू--उसको (राजा को );विज्ञापयाम् बभूवु:--सूचित किया।
जब कहारों ने महाराजा रहूगण की धमकी सुनी तो वे उसके दण्ड से अत्यन्त भयभीत होगये और उनसे इस प्रकार कहने लगे।
न वयं नरदेव प्रमत्ता भवन्नियमानुपथा: साध्वेव वहाम: अयमधुनैव नियुक्तोपि न द्वुतं त्रजति नानेन सहवोढुमु ह बयं पारयाम इति ॥
४॥
न--नहीं; वयम्--हम सब; नर-देव--हे मनुष्यों में ईश्वर तुल्य ( राजा को देव अर्थात् श्रीभगवान् का प्रतिनिधि माना जाता है );प्रमत्ता:--कार्य के प्रति असावधान; भवत्-नियम-अनुपथा:--सदैव आपके आज्ञाकारी हैं; साधु--ठीक से; एव--निश्चय ही;वहामः--ले जा रहे हैं; अयम्--यह मनुष्य; अधुना--नया; एव--निस्संदेह; नियुक्त:--लगाया गया; अपि--यद्यपि; न--नहीं;ब्रुतम्ू-शीघ्रता से; ब्रजति--चलता है, काम करता है; न--नहीं; अनेन--इसके; सह--साथ; बोढुम्--ढोने में; उह-- ओह;वयम्--हम सभी; पारयाम:ः --समर्थ हैं; इति--इस प्रकारहे स्वामी, कृपया ध्यान दें कि हम अपना कार्य करने में तनिक भी असावधान नहीं हैं।
हमइस पालकी को आपको इच्छानुसार निष्ठा से ले जा रहे हैं, किन्तु यह व्यक्ति, जिसे हाल ही मेंकाम में लगाया गया है, तेजी से नहीं चल पा रहा।
अत: हम उसके साथ पालकी ले जाने मेंअसमर्थ हैं।
सांसर्गिको दोष एव नूनमेकस्यापि सर्वेषां सांसर्गिकाणां भवितुमईतीति निश्चित्य निशम्य कृपणवचोराजा रहूगण उपासितवृद्धोपि निसर्गेण बलात्कृत ईंषदुत्थितमन्युरविस्पष्टब्रह्मतजसं जातवेदसमिवरजसावृतमतिराह ॥
५॥
सांसर्गिक:--संसर्ग से उत्पन्न; दोष:--अवगुण, त्रुटि; एब--निस्संदेह; नूनम्--निश्चय ही; एकस्य--एक व्यक्ति का; अपि--यद्यपि; सर्वेषाम्-- अन्य सभी; सांसर्गिकाणाम्--उसके संसर्ग में आने वाले व्यक्तियों का; भवितुम्--होना; अर्हति--सम्भव है;इति--इस प्रकार; निश्चित्य--निश्चय करके ; निशम्य--सुनकर; कृपण-वच: --दण्ड-भय से भयभीत दीन सेवकों के वचन;राजा--राजा; रहूगण: --रहूगण ने; उपासित-वृद्ध:--अनेक महापुरुषों का उपेदश सुना तथा उनकी सेवा किया हुआ; अपि--तो भी; निसर्गेण--अपने स्वभाव से, जो क्षत्रिय का था; बलात्ू--बलपूर्वक; कृत:--किया हुआ; ईषत्--कुछ-कुछ;उत्थित--जागृत; मन्यु:--क्रोध; अविस्पष्ट--ठीक से दृष्टिगोचर न होने वाला, अस्पष्ट; ब्रह्य-तेजसम्--उस ( जड़ भरत ) का ब्रह्मतेज; जात-वेदसम्--वैदिक अनुष्ठानों में भस्म से ढकी हुई अग्नि; इब--के समान; रजसा आवृत--रजोगुण से ढकी हुई;मतिः--जिसकी बुद्धि; आह--कहा।
राजा रहूगण दण्ड से भयभीत कहारों के वचन का अभिप्राय समझ रहा था।
उसकी समझमें यह भी आ गया कि मात्र एक व्यक्ति के दोष के कारण पालकी ठीक से नहीं चल रही।
यहसब अच्छी प्रकार जानते हुए तथा उनकी विनती सुनकर वह कुछ-कुछ क्रुद्ध हुआ, यद्यपि वहराजनीति में निपुण एवं अत्यन्त अनुभवी था।
उसका यह क्रोध राजा के जन्मजात स्वभाव सेउत्पन्न हुआ था।
वस्तुतः राजा रहूगण का मन रजोगुण से आवृत था, अतः वह जड़ भरत से,जिनका ब्रह्मतेज राख से ढकी अग्नि के समान सुस्पष्ट नहीं था, इस प्रकार बोला।
अहो कष्ट भ्रातर्व्यक्तमुरुपरिश्रान्तो दीर्घमध्वानमेक एवं ऊहिवान्सुचिरं नातिपीवा न संहननाड़ों जरसाचोपद्गुतो भवान्सखे नो एवापर एते सट्डृट्टिन इति बहुविप्रलब्धोप्यविद्ययारचितद्र॒व्यगुणकर्माशयस्वचरमकलेवरेवस्तुनि संस्थानविशेषेहं ममेत्यनध्यारोपितमिथ्याप्रत्ययोब्रह्मभूतस्तूष्णीं शिबिकां पूर्ववदुवाह, ॥
६॥
अहो--ओह; कष्टमू--कितना कष्टप्रद है यह; भ्रातः--मेरे भाई; व्यक्तम्ू--स्पष्ट; उरू--अत्यन्त; परिश्रान्तः--थके हुए;दीर्घमू--लम्बा; अध्वानम्-मार्ग; एक:--अकेले; एव--ही; ऊहिवान्--ढोते हुए; सु-चिरम्--दीर्घ काल तक; न--नहीं;अति-पीवा--अत्यन्त हट्टा कट्टा; न--नहीं; संहनन-अड्रः --सुगठित शरीर; जरसा--बुढ़ापे से; च--भी; उपद्गुत:--विचलित,दबाया हुया; भवान्--आप; सखे-मेरे मित्र; नो एब--निश्चय ही नहीं; अपरे--दूसरे; एते--ये सब; सट्डट्टिन:--सह-कर्मी ;इति--इस प्रकार; बहु--अत्यधिक; विप्रलब्ध:--ताना मारे जाने पर; अपि--यद्यपि; अविद्यया--अज्ञान से; रचित--रचा हुआ;द्र॒व्य-गुण-कर्म-आशय--भौतिक तत्त्वों, गुणों तथा कर्मफल एवं आकांक्षाओं के मिश्रण में; स्व-चरम-कलेवरे--शरीर में, जोसूक्ष्म तत्त्वों ( मन, बुद्धि तथा अहं ) से चालित है; अवस्तुनि--ऐसी भौतिक वस्तुओं में; संस्थान-विशेषे--विशेष मनोवृत्तिवाला; अहम् मम--मैं तथा मेरा; इति--इस प्रकार; अनध्यारोपित--ऊपर से थोपा नहीं; मिथ्या--झूठा; प्रत्ययः--विश्वास;ब्रह्म-भूत:--स्वरूप-सिद्ध, ब्रह्म पद को प्राप्त; तृष्णीमू--चुप रहकर; शिविकाम्--पालकी; पूर्ब-बत्--पहले की तरह;उबाह--ले गया।
राजा रहूगण ने जड़ भरत से कहा : मेरे भाई, यह कितना कष्टप्रद है! तुम निश्चित ही अत्यन्तथके लग रहे हो, क्योंकि तुम बहुत समय से और लम्बी दूरी से किसी की सहायता के बिनाअकेले ही पालकी ला रहे हो।
इसके अतिरिक्त, बुढ़ापे के कारण तुम अत्यधिक परेशान हो।
हेमित्र, मैं देख रहा हूँ कि तुम न तो मोटे-ताजे हो, न ही हट्टे-कट्टे हो।
क्या तुम्हारे साथ के कहारतुम्हें सहयोग नहीं दे रहे ?इस प्रकार राजा ने जड़ भरत को ताना मारा, किन्तु इतने पर भी जड़ भरत को शरीर कीसुधि नहीं थी।
उसे ज्ञान था कि वह शरीर नहीं है, क्योंकि वह स्वरूपसिद्ध हो चुका था।
वह नतो मोटा था, न पतला, न ही उसे पंच स्थूल भूतों तथा तीन सूक्ष्म तत्त्वों के इस स्थूल पदार्थ सेकुछ लेना-देना था।
उसे भौतिक शरीर तथा इसके दो हाथों तथा दो पैरों से कोई सरोकार न था।
दूसरे शब्दों में, कहना चाहें तो कह सकते हैं कि वह ' अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् ब्रह्म रूप को प्राप्तहो चुका था।
अतः राजा की व्यंग्य पूर्ण आलोचना का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
वह बिनाकुछ कहे पूर्ववत् पालकी को उठाये चलता रहा।
अथ पुनः स्वशिबिकायां विषमगतायां प्रकुपित उबाच रहूगण: किमिदमरे त्वं जीवन्मृतो मां कदर्थीकृत्यभर्तुशासनमतिचरसि प्रमत्तस्य च ते करोमि चिकित्सां दण्डपाणिरिव जनताया यथा प्रकृति स्वांभजिष्यस इति ॥
७॥
अथ--तदनन्तर; पुनः --फिर से; स्व-शिबिकायाम्--अपनी पालकी में; विषम-गतायाम्--जड़ भरत के ठीक से न चलने केकारण ऊँची-नीची होने से; प्रकुपित:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; उबाच--कहा; रहूगण: --राजा रहूगण ने; किम् इदमू--यह क्याहो रहा है; ओरे--हे मूर्ख ; त्वम्--तुम ( तू ); जीवत्ू--जिन्दा; मृत:--मरा हुआ; मामू--मुझको; कत्-अर्थी-कृत्य-- उपेक्षाकरके; भर्तू-शासनम्--स्वामी का निरादर; अतिचरसि--उल्लंघन कर रहे हो; प्रमत्तस्य--पागल का; च-- भी; ते--तुम;'करोमि--करूँगा; चिकित्सामू--समुचित उपचार; दण्ड-पाणि: इब--यमराज के समान; जनताया: --सामान्य लोगों की;यथा--जिससे; प्रकृतिमू--स्वाभाविक स्थिति; स्वामू--स्वतः; भजिष्यसे--ग्रहण करोगे; इति--इस प्रकार।
तत्पश्चात्, जब राजा ने देखा कि उसकी पालकी अब भी पूर्ववत् हिल रही थी, तो वहअत्यन्त क्रुद्ध हुआ और कहने लगा--ेओरे दुष्ट ! तू क्या कर रहा है? क्या तू जीवित ही मर गयाहै? कया तू नहीं जानता कि मैं तेरा स्वामी हूँ? तू मेरा अनादर कर रहा है और मेरी आज्ञा काउल्लंघन भी।
इस अवज्ञा के लिए मैं अब तुझे मृत्यु के अधीक्षक यमराज के ही समान दण्डदूँगा।
मैं तेरा सही उपचार किये देता हूँ, जिससे तू होश में आ जाएगा और ठीक से काम करेगा।
एवं बह्बद्धमपि भाषमाणं नरदेवाभिमानं रजसा तमसानुविद्धेन मदेन तिरस्कृताशेष भगवत्तप्रियनिकेत॑'पण्डितमानिनं स भगवान्ब्राह्मणो ब्रह्म भूतसर्वभूतसुहृदात्मा योगे श्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मथमान इबविगतस्मय इृदमाह ॥
८॥
एवम्--इस प्रकार; बहु--अधिक; अबद्धम्--अनाप-शनाप; अपि--यद्यपि; भाषमाणम्--बोलता हुआ; नर-देव-अभिमानम्--राजा रहूगण, जो अपने को शासक मानता था; रजसा--रजोगुण से; तमसा--तथा तमोगुण से; अनुविद्धेन--बढ़ते हुए; मदेन--दम्भ ( पागलपन ) से; तिरस्कृत-- डाँटा जाकर; अशेष--असंख्य; भगवत्-प्रिय-निकेतम्--ईश्वर के भक्त;'पण्डित-मानिनम्ू--अपने को अत्यन्त पंडित मानते हुए; सः--वह; भगवान्--अत्यन्त शक्तिमान ( जड़ भरत ); ब्राह्मण: --परमयोग्य ब्राह्मण; ब्रह्म-भूत--स्वरूपसिद्ध; सर्व-भूत-सुहृत्-आत्मा--जो समस्त प्राणियों का मित्र है; योग-ईश्वर--सिद्ध योगियोंके; चर्यायाम्ू--आचरण में; न अति-व्युत्पन्न-मतिम्--राजा रहूगण को, जो वस्तुतः अनुभवी न था; स्मयमान:--कुछ-कुछमुस्काते हुए; इब--सहृश; विगत-स्मय:--समस्त मिथ्या अभिमान से रहित; इृदमू--यह; आह--कहा ?
राजा रहूगण अपने को राजा समझने के कारण देहात्मबुद्धि से ग्रस्त था और भौतिक प्रकृतिके रजो तथा तमो गुणों से प्रभावित था।
दम्भ के कारण उसने जड़ भरत को अशोभनीय वचनोंसे दुत्कारा।
जड़ भरत महान् भक्त और श्रीभगवान् के प्रिय धाम थे।
यद्यपि राजा अपने आपको बड़ा विद्वान मानता था, किन्तु वह न तो महान् भक्त की स्थिति से और न उसके गुणों से परिचितथा।
जड़ भरत तो साक्षात् भगवान् के परम धाम थे और अपने हृदय में ईश्वर के स्वरूप कोधारण करते थे।
वे समस्त प्राणियों के प्रिय मित्र थे और किसी प्रकार की देहात्म-बुद्धि को नहींमानते थे।
अतः वे मुस्काये और इस प्रकार बोले।
ब्राह्मण उवाचत्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धंभर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भार: ।
गन्तुर्यदि स्थादधिगम्यमध्वापीवेति राशौ न विदां प्रवाद: ॥
९॥
ब्राह्मण: उवाच--योग्य ब्राह्मण ( जड़ भरत ) बोला; त्वया--तुम्हारे द्वारा; उदितम्--कहा गया; व्यक्तम्--अत्यन्त स्पष्ट;अविप्रलब्धम्--विरोधाभास रहित; भर्तुः--ढोने वाले का, शरीर; सः--वह; मे--मेरा; स्थात्ू--ऐसा होता; यदि--यदि; वीर--हे वीर पुरुष ( महाराज रहूगण ); भार:-- भार, बोझा; गन्तुः--चलने वाले का, अथवा शरीर; यदि--अगर; स्यात्--होना था;अधिगम्यम्--लक्ष्य; अध्वा--पथ; पीवा--अत्यन्त हृष्ट-पुष्ठ; इति--इस प्रकार; राशौ--शरीर में; न--नहीं; विदाम्ू--स्वरूपसिद्ध पुरुषों का; प्रवाद:--वाद-विवाद का विषय |
महान् ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा--हे राजन् तथा वीर, आपने जो कुछ व्यंग्य में कहा है, वहसचमुच ठीक है।
ये मात्र उलाहनापूर्ण शब्द नहीं हैं, क्योंकि शरीर तो वाहक ( ढोने वाला ) है।
शरीर द्वारा ढोया जाने वाला भार मेरा नहीं है, क्योंकि मैं तो आत्मा हूँ।
आपके कथनों में तनिक भी विरोधाभास नहीं है, क्योंकि मैं शरीर से भिन्न हूँ।
मैं पालकी का ढोने वाला नहीं हूँ, वह तोशरीर है।
निस्सन्देह, जैसा आपने संकेत किया है, पालकी ढोने में मैंने कोई श्रम नहीं किया है,क्योंकि मैं तो शरीर से पृथक् हूँ।
आपने कहा कि मैं हष्ट-पुष्ट नहीं हूँ।
ये शब्द उस व्यक्ति केसर्वथा अनुरूप हैं, जो शरीर तथा आत्मा का अन्तर नहीं जानता।
शरीर मोटा या दुबला होसकता है, किन्तु कोई भी बुद्धिमान यह बात आत्मा के लिए नहीं कहेगा।
जहाँ तक आत्मा काप्रश्न है मैं न तो मोटा हूँ न दुबला।
अतः जब आप कहते हैं कि मैं हष्ट-पुष्ट नहीं हूँ तो आप सहीहैं और यदि इस यात्रा का बोझ तथा वहाँ तक जाने का मार्ग मेरे अपने होते तो मेरे लिए अनेककठिनाइयाँ होतीं, किन्तु इनका सम्बन्ध मुझसे नहीं मेरे शरीर से है, अतः मुझे कोई कष्ट नहीं है।
स्थौल्यं कार्य व्याधय आधयश्चक्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।
निद्रा रतिर्मन्युरहं मदः शुच्चोदेहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥
१०॥
स्थौल्यम्--स्थूलता, मोटापा; कार्श्यम्--कृशता, दुबलापन; व्याधय:--शरीर के कष्ट यथा रोग; आधय:--मानसिक कष्ट;च--तथा; क्षुत् तूटू भयम्ू-- भूख, प्यास तथा भय; कलिः--कलह, दो व्यक्तियों के बीच झगड़ा; इच्छा--कामनाएँ; जरा--वृद्धावस्था; च--तथा; निद्रा--नींद; रति:--इन्द्रियतृप्ति के लिए आसक्ति; मन्यु:--क्रोध; अहम्--झूठी पहचान ( देहात्मबोध ); मदः --मोह; शुच्च: --शोक; देहेन--इस शरीर से; जातस्य--उत्पन्न हुए का; हि--निश्चय ही; मे--मुझमें; न--नहीं;सन्ति--हैं।
मोटापा, दुबलापन शारीरिक तथा मानसिक कष्ट, भूख, प्यास, भय, कलह, भौतिक सुखकी कामना, बुढ़ापा, निद्रा, भौतिक पदार्थों में आसक्ति, क्रोध, शोक, मोह तथा देहाभिमान--येसभी आत्मा के भौतिक आवरण के रूपान्तर हैं।
जो व्यक्ति देहात्मबुद्धि में लीन रहता है, वही इनसे प्रभावित होता है, किन्तु मैं तो समस्त प्रकार की देहात्मबुद्धि से मुक्त हूँ।
फलतः मैं न तोमोटा हूँ, न पतला, न ही वह सब जो आपने मेरे सम्बन्ध में कहा है।
जीवन्यृतत्वं नियमेन राजन्आइ्वन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।
स्वस्वाम्यभावो श्लुव ईड्य यत्रतहा[॑च्यतेउसौ विधिकृत्ययोग: ॥
११॥
जीवतू-मृतत्वम्--जीवित रहकर भी मृत होने का गुण; नियमेन--प्रकृति के नियमों द्वारा; राजनू--हे राजा; आदि-अन्त-वत्--प्रत्येक पदार्थ का आदि और अन्त होता है; यत्--क्योंकि; विकृतस्थ--विकारी वस्तु का, यथा शरीर का; दृष्टमू--देखी जातीहै; स्व-स्वाम्य-भाव:--सेवक तथा स्वामी का भाव; श्रुवः--अपरिवर्तनीय, स्थिर; ईंड्य--हे पूज्य; यत्र--जहाँ; तहिं--तभी;उच्यते--यह कहा जाता है; असौ--वह; विधि-कृत्य-योग:--आज्ञा तथा कर्तव्य का संयोग।
हे राजनू, आपने वृथा ही मुझ पर जीवित होने पर भी मृततुल्य होने का आरोप लगाया है।
इस भौतिक सम्बन्ध में मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि ऐसा सर्वत्र है, क्योंकि प्रत्येक भौतिकवस्तु का अपना आदि तथा अन्त होता है।
आपका यह सोचना कि, 'मैं राजा तथा स्वामी हूँ!और इस प्रकार आप द्वारा मुझे आज्ञा दिया जाना भी ठीक नहीं हैं, क्योंकि ये पद अस्थायी हैं।
आज आप राजा हैं और मैं आपका दास हूँ, किन्तु कल स्थिति बदल सकती है और आप मेरेदास हो सकते हैं, मैं आपका स्वामी।
ये नियति द्वारा उत्पन्न अस्थायी परिस्थितियाँ हैं।
विशेषबुद्धेर्विवर मनाक्नपश्याम यन्न व्यवहारतोउन्यत् ।
'क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्यंतथापि राजन्करवाम कि ते ॥
१२॥
विशेष-बुद्धेः --स्वामी तथा सेवक के भेद की बुद्धि का; विवरमू--क्षेत्र, प्रसार; मनाक्ू --किंचित; च-- भी; पश्याम:--मैंदेखता हूँ; यत्--जो; न--नहीं; व्यवहारत:--व्यवहार के सिवा; अन्यत्-- अन्य; कः--कौन; ईश्वर: -- स्वामी; तत्र--इसमें;किमू--कौन; ईशितव्यम्ू--वश में किया जाये; तथापि--तो भी; राजनू--हे राजा; करवाम--मैं करूँ; किमू-- क्या; ते--तुम्हारे लिए?
हे राजन, यदि आप अब भी यह सोचते हैं कि आप राजा हैं और मैं आपका दास, तो आपआज्ञा दें और मुझे आपकी आज्ञा का पालन करना होगा।
तो मैं यह कह सकता हूँ कि यह अन्तरक्षणिक है और व्यवहार या परम्परावश प्राप्त होता है।
मुझे इसका अन्य कारण नहीं दिखाईपड़ता।
उस दशा में कौन स्वामी है और कौन दास ? प्रत्येक प्राणी प्रकृति के नियमों द्वारा प्रेरितहोता है।
अतः न तो कोई स्वामी है, न कोई दास।
इतने पर भी यदि आप सोचते हैं कि मैंआपका दास हूँ और आप मेरे स्वामी हैं, तो मैं इसे स्वीकार कर लूँगा।
कृपया आज्ञा दें।
मैं आपकी कया सेवा करूँ ?
उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थांगतस्य मे वीर चिकित्सितेन ।
अर्थ: कियान्भवता शिक्षितेनस्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेष: ॥
१३॥
उन्मत्त--पागलपन; मत्त--शराबी; जड-वत्--जड़ की भाँति; स्व-संस्थाम्--मेरी मूल स्वाभाविक स्थिति; गतस्य--प्राप्तकिया हुआ; मे-- मुझको; वीर--हे राजा; चिकित्सितेन--अपनी भर्त्सना से; अर्थ:--प्रयोजन; कियान्--कौन सा; भवता--आपके द्वारा; शिक्षितेन--शिक्षा दिये गए; स्तब्ध--जड़; प्रमत्तस्य--पागल मनुष्य का; च--भी; पिष्ट-पेष:-- आटा पीसनेजैसा?
है राजन, आपने कहा 'रे दुष्ट, जड़ तथा पागल! मैं तुम्हारी चिकित्सा करने जा रहा हूँ औरतब तुम होश में आ जाओगे।
इस सम्बन्ध में मुझे कहना है कि यद्यपि मैं जड़, गूँगे तथा बहरेमनुष्य की भाँति रहता हूँ, किन्तु मैं सचमुच एक स्वरूप-सिद्ध व्यक्ति हूँ।
आप मुझे दण्डितकरके क्या पाएँगे ? यदि आपका अनुमान ठीक है और मैं पागल हूँ तो आपका यह दंड एक मरेहुए घोड़े को पीटने जैसा होगा।
उससे कोई लाभ नहीं होगा।
जब पागल को दंडित किया जाताहै, तो उसका पागलपन ठीक नहीं होता है।
एतावदनुवादपरिभाषया प्रत्युदीर्य मुनिवर उपशमशील उपरतानात्म्यनिमित्त उपभोगेन कर्मारब्धंव्यपनयतन्राजयानमपि तथोवाह ॥
१४॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी आगे बोले; एतावत्--इतना; अनुवाद-परिभाषया--राजा द्वारा कहे गये शब्दों के दोहरानेसे; प्रत्युदीर्य--एक के बाद एक उत्तर देते हुए; मुनि-वरः--मुनिश्रेष्ठ जड़ भरत; उपशम-शील:--परम शान्त; उपरत--चुप होगये; अनात्म्य-- आत्मा से सम्बन्ध न रखने वाली वस्तुएँ; निमित्त:--जिसका कारण ( अज्ञान ) जो आत्मा से सम्बन्धित नहीं हैउससे अपनी पहचान स्थापित करना; उपभोगेन--कर्मफल को अंगीकार करने से; कर्म-आरब्धम्--इस समय मिलने वालाकर्मफल; व्यपनयन्-- पूरा करते हुए; राज-यानम्--राजा की पालकी; अपि-- पुनः; तथा--पूर्ववत्; उबाह-- लेकर चलनेलगे।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे महाराज परीक्षित, जब राजा रहूगण ने परम भक्त जड़ भरतको अपने कटु बचनों से मर्माहत किया, तो उस शान्त मुनिवर ने सब कुछ सहन कर लिया औरसमुचित उत्तर दिया।
अज्ञानता का कारण देहात्मबुद्धि है, किन्तु जड़ भरत उससे प्रभावित नहींथे।
अपनी स्वाभाविक विनप्रता के कारण उन्होंने अपने को कभी भी महान् भक्त नहीं माना औरअपने पूर्व कर्मफल को भोगना स्वीकार किया।
सामान्य मनुष्य की भाँति उन्होंने सोचा कि वेपालकी ढोकर अपने पूर्व अपकृत्यों के फल को विनष्ट कर रहे हैं।
ऐसा सोचकर वे पूर्ववत्पालकी लेकर चलने लगे।
स चापि पाण्डवेय सिन्धुसौवीरपतिस्तत्त्वजिज्ञासायां सम्यक्श्रद्धयाधिकृताधिकारस्तद्धृदयग्रन्थिमोचनंद्विजवच आश्रुत्य बहुयोगग्रन्थसम्मतं त्वरयावरुह्म शिरसा पादमूलमुपसृतः क्षमापयन्विगतनूपदेवस्मयउबाच, ॥
१५॥
सः--वह ( महाराज रहूगण ); च--भी; अपि--निस्संदेह; पाण्डवेय--हे पांडुवंश के श्रेष्ठ ( महाराज परीक्षित ); सिन्धु-सौवीर-पतिः--सिंधु तथा सौवीर नामक राज्यों का राजा; तत्त्व-जिज्ञासायाम्--परम सत्य के सम्बन्ध में जानने की इच्छा के बारे में;सम्यक्-श्रद्धया--इन्द्रियों तथा मन पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाली श्रद्धा से; अधिकृत-अधिकार: --समुचित योग्यताप्राप्त;तत्--उस; हृदय-ग्रन्थि--हृदय के भीतर झूठे विचारों की गाँठ; मोचनम्--खोलने वाले; द्विज-बच:--ब्राह्मण ( जड़ भरत ) केशब्द; आश्रुत्य--सुनकर; बहु-योग-ग्रन्थ-सम्मतम्--समस्त योग तथा उनके ग्रन्थों द्वारा सम्मत ( समर्थित ); त्वरया--शीघ्रतापूर्वक; अवरुह्म--उतर कर ( पालकी से ); शिरसा--अपने सिर से; पाद-मूलम्--चरणकमल पर; उपसृत:--दण्डप्रणामकरके; क्षमापयन्--अपने अपराध के लिए क्षमा प्राप्त करके; विगत-नूप-देव-स्मय:--राजा होने का झूठा अभिमान तथापूज्यभाव त्याग कर; उबाच--कहा |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा-हे श्रेष्ठ पाण्डुबंशी ( महाराज परीक्षित ), सिंधु तथा सौवीरके राजा ( रहूगण ) की परम सत्य की चर्चाओं में श्रद्धा थी।
इस प्रकार सुयोग्य होने के कारण,उसने जड़ भरत से वह दार्शनिक उपदेश सुना जिसकी संस्तुति सभी योग साधना के ग्रन्थ करतेहैं और जिससे हृदय में पड़ी गाँठ ढीली पड़ती है।
इस प्रकार उसका राज-मद नष्ट हो गया।
वहतुरन्त पालकी से नीचे उतर आया और जड़ भरत के चरण-कमलों में अपना सिर रखकर पृथ्वीपर दण्डवत् गिर गया जिससे वह इस ब्राह्मण-श्रेष्ठ को कहे गये अपमानपूर्ण शब्दों के लिए क्षमाप्राप्त कर सके ।
तब उसने इस प्रकार प्रार्थना की।
कर्त्वं निगूढश्चरसि द्विजानांबिभर्षि सूत्र कतमोवधूत: ।
कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात्क्षेमाय नश्लेदसि नोत शुक्ल: ॥
१६॥
'कः त्वमू--आप कौन हैं; निगूढ:--प्रच्छन्न; चरसि--इस संसार में विचरण कर रहे हैं; द्विजानामू--ब्राह्मणों अथवा साधु पुरुषोंमें; बिभर्षि-- आपने धारण कर रखा है; सूत्रमू--उपवीत, ब्राह्मणों द्वारा धारण किया जाने वाला जनेऊ; कतमः--कौन से;अवधूत:--अत्यन्त महान् पुरुष; कस्य असि--आप किसके हैं ( किसके पुत्र या शिष्य हैं ); कुत्रत्यः--कहाँ से; इह अपि--यहाँइस स्थान पर; कस्मात्--किस लिए; क्षेमाय--लाभार्थ; न:--हम सबों के ; चेतू--यदि; असि--आप हैं; न उत--अथवा नहीं;शुक्ल:--विशुद्ध-सत्त्व-स्वरूप ( कपिल देव )?
राजा रहूगण बोले, हे ब्राह्मण, आप इस जगत में अत्यन्त प्रच्छन्न भाव से तथा अज्ञात रूप सेविचरण करते प्रतीत हो रहे हैं।
आप कौन हैं ? क्या आप विद्वान ब्राह्मण तथा साधु पुरुष हैं ?आपने जनेउ धारण कर रखा है।
कहीं आप द्त्तात्रेय आदि अवधूतों में से कोई विद्वान तो नहींहैं? क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप किसके शिष्य हैं? आप कहाँ रहते हैं? आप इस स्थान परक्यों आये हैं? कहीं आप हमारे कल्याण के लिए तो यहां नहीं आये ? कृपया बतायें कि आपकौन हैं?
नाहं विशड्ले सुरराजवज्ञा-न त्र्यक्षशूलात्र यमस्य दण्डातू ।
नाग्न्यर्कसोमानिलवित्तपास्त्राच्छड्ले भूशं ब्रह्मकुलावमानात् ॥
१७॥
न--नहीं; अहम्--मैं; विशद्जे-- भयभीत हूँ; सुर-राज-वज़ात्--स्वर्ग के राजा इन्द्र के बज़ से; न--न तो; तयक्ष-शूलात्--भगवान् शिव के त्रिशूल से; न--न तो; यमस्य--मृत्यु के अधीक्षक यमराज के; दण्डात्--दण्ड से; न--न तो; अग्नि-- अग्निके; अर्क--सूर्य के असह्य ताप के; सोम--चन्द्रमा के; अनिल--वायु के; वित्त-प-- धन के स्वामी कुबेर के; अस्त्रात्--अस्त्रोंसे; शद्भे-- भयभीत हूँ; भूशम्-- अत्यधिक; ब्रह्म गकुल--ब्राह्मण-वृन्द के; अवमानात्ू--अपमान से |
महानुभाव, न तो मुझे इन्द्र के बज़ का भय है, न नागदंश का, न भगवान् शिव के त्रिशूल का।
मुझे न तो मृत्यु के अधीक्षक यमराज के दण्ड की परवाह है, न ही मैं अग्नि, तप्त सूर्य,चन्द्रमा, वायु अथवा कुबेर के अस्त्रों से भयभीत हूँ।
परन्तु मैं ब्राह्मण के अपमान से डरता हूँ।
मुझे इससे बहुत भय लगता है।
तदूहासड़ो जडवन्निगूढ-विज्ञानवीर्यो विचरस्यपार: ।
वचांसि योगग्रथितानि साधोन नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम्ू ॥
१८॥
तत्--अतः; ब्रूहि--कृपया बतलाइये; असड्रः--संसार के साथ किसी प्रकार का सम्पर्क न रखने वाला; जड-वत्--मूक तथागूँगे मनुष्य की तरह लगने वाला; निगूढ--पूर्णतया प्रच्छन्न; विज्ञान-वीर्य:--आत्मतत्त्व के ज्ञान से पूर्ण तथा शक्तिशाली;विचरसि--घूम रहे हो; अपार: --अनन्त दिव्य महिमा वाला; वचांसि--उच्चरित शब्द; योग-ग्रथितानि--योग का समग्र अर्थवहन करने वाला; साधो--हे साधु; न--नहीं; न:--हम सब; क्षमन्ते--समर्थ हैं; ममनसा अपि--यहाँ तक कि मन से भी;भेत्तुम--विश्लेषणात्मक विधि से समझना ।
महाशय, ऐसा प्रतीत होता है कि आपका महत् आध्यात्मिक ज्ञान प्रच्छन्न है।
आप समस्तभौतिक संसर्ग से रहित हैं और परमात्मा के विचार में पूर्णतया तल्लीन हैं।
इसलिए आपकाआध्यात्मिक ज्ञान अनन्त है।
कृपया बलताने का कष्ट करें कि आप जड़वतू् सर्वत्र क्यों घूम रहेहैं ? हे साधु, आपने योगसम्मत शब्द कहे हैं, किन्तु हमारे लिए उनको समझ पाना सम्भव नहीं है।
अतः कृपा करके विस्तार से कहें।
अहं च योगे श्वरमात्मतत्त्व-विदां मुनीनां परम॑ गुरु वे ।
प्रष्टे प्रवृत्तः किमिहारणं तत्साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम् ॥
१९॥
अहम्-मैं; च--तथा; योग-ईश्वरम्ू--योग के स्वामी; आत्म-तत्त्व-विदाम्--आत्मतत्त्वं के विज्ञान् से परिचित विद्वान;मुनीनाम्--मुनियों का; परमम्-- श्रेष्ठ; गुरुम्--गुरु, उपदेशक; वै--निस्संदेह; प्रष्टमू--पूछने हेतु; प्रवृत्त:--कार्यलग्न; किमू--क्या; इह--इस संसार में; अरणम्--सुरक्षित शरण; तत्--वह जो; साक्षात् हरिम्-प्रत्यक्ष ?
श्रीभगवान्; ज्ञान-कला-अवतीर्णम्--जो सम्पूर्ण ज्ञान के अवतार के रूप में अंशधारी कपिल के रूप में अवतरित हुए हैं।
मैं आपको योग शक्ति का प्रतिष्ठित स्वामी मानता हूँ।
आप आत्मज्ञान से भली भाँति परिचितहैं।
आप साधुओं में परम पूज्य हैं और आप समस्त मानव समाज के कल्याण के लिए अवतरितहुए हैं।
आप आत्मज्ञान प्रदान करने आये हैं और ईश्वर के अवतार तथा ज्ञान के अंश कपिलदेव के साक्षात् प्रतिनिधि हैं।
अतः मैं आपसे पूछ रहा हूँ,'हे गुरु, इस संसार में सर्वाधिक सुरक्षितआश्रय कौन सा है?
स वे भवॉल्लोकनिरीक्षणार्थ-मव्यक्तलिड्रो विचरत्यपि स्वित् ।
योगेश्वराणां गतिमन्धबुद्धिःकथं विचक्षीत गृहानुबन्ध: ॥
२०॥
सः--वह भगवान् या उनका अवतार श्रीकपिल देव; बै--निस्संदेह; भवान्ू--आप; लोक-निरीक्षण-अर्थम्--इस संसार केलोगों के चरित्रों का अध्ययन करने के लिए ही; अव्यक्त-लिड्र:--अपनी वास्तविक पहचान प्रकट किए बिना; विचरति--इससंसार में भ्रमण कर रहे हैं; अपि स्वित्--क्या; योग-ईश्वराणाम्-- समस्त योगियों का; गतिम्--वास्तविक आचरण, चरित्र;अन्ध-बुद्धि:--मोहग्रस्त होने से आत्मज्ञान के प्रति अन्धे; कथम्--किस प्रकार; विचक्षीत--जान सकता है; गृह-अनुबन्ध:--गृहस्थ जीवन या सांसारिकता में आसक्त रहने वाला, मैं।
कया यह सच नहीं कि आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अवतार कपिल देव के साक्षात्प्रतिनिधि हैं ? मनुष्यों की परीक्षा लेने और यह देखने के लिए कि वास्तव में कौन मनुष्य है औरकौन नहीं, आपने अपने आपको गूँगे तथा बहरे मनुष्य की भाँति प्रस्तुत किया है।
क्या आपसंसार भर में इसलिए नहीं इस रूप में घूम रहे? मैं तो गृहस्थ जीवन तथा सांसारिक कार्यों मेंअत्यधिक आसक्त हूँ और आत्मज्ञान से रहित हूँ।
इतने पर भी अब मैं आपसे प्रकाश पाने केलिए आपके समक्ष उपस्थित हूँ।
आप बताएँ कि मैं किस प्रकार आत्मजीवन में प्रगति कर सकताहूँ?
हृष्ट: श्रम: कर्मत आत्मनो वैभर्तुर्गन्तुर्भवतश्चानुमन्ये ।
यथासतोदानयनाद्यभावात्समूल दइष्टो व्यवहारमार्ग: ॥
२१॥
इृष्ट:--प्रत्येक प्राणी का अनुभव है; श्रमः-- श्रम, थकान; कर्मत:ः--कोई भी काम करने से; आत्मन:--आत्मा का; वै--निस्संदेह; भर्त::--पालकी वाहक या कहार का; गन्तु:--चलने वाले का; भवतः--आपका; च--तथा; अनुमन्ये--मेरा अनुमान है; यथा--जितना; असता--असत से, जो तथ्य नहीं हैं, उससे; उद--जल का; आनयन-आदि--लाने इत्यादि का कार्य;अभावात्-- अभाव से; स-मूल:--साध्य पर आधारित; इष्ट:--पूज्य; व्यवहार-मार्ग:--प्रत्यक्ष ज्ञान-विषयक |
आपने कहा कि, 'मैं श्रम करने में थकता नहीं हूँ' यद्यपि आत्मा देह से पृथक् है, किन्तुशारीरिक श्रम करने से थकान लगती है और ऐसा लगता है कि यह आत्मा की थकान है।
जबआप पालकी ले जा रहे होते हैं, तो निश्चय ही आत्मा को भी कुछ श्रम करना पड़ता होगा।
ऐसामेरा अनुमान है।
आपने यह भी कहा है कि स्वामी तथा सेवक का बाह्य आचरण वास्तविक नहींहै, किन्तु प्रत्यक्ष जगत में यह वास्तविकता भले न हो तो भी प्रत्यक्ष जगत पदार्थों से वस्तुएँप्रभावित तो हो ही सकती हैं।
ऐसा दृश्य तथा अनुभवगम्य है।
अत: भले ही भौतिक कार्यकलापअस्थायी हों, किन्तु उन्हें असत्य नहीं कहा जा सकता।
स्थाल्यग्नितापात्पयसो भिताप-स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धि: ।
देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षात्तत्संसृतिः पुरुषस्थानुरोधात् ॥
२२॥
स्थालि--पकाने का पात्र; अग्नि-तापातू-- अग्नि के ताप से; पयसः--पात्र में भरा दूध; अभिताप:--तप्त हो जाता है; ततू-तापतः--उसके ताप से, दूध के गर्म होने से; तण्डुल-गर्भ-रन्धि: --दूध में रहने से चावल का भीतरी भाग पक जाता है; देह-इन्द्रिय-अस्वाशय--इन्द्रियाँ; सन्निकर्षात्--से सम्बन्ध होने से; तत्-संसृति:-- श्रम तथा अन्य कष्टों का अनुभव; पुरुषस्थ--आत्मा का; अनुरोधात्--शरीर, इन्द्रियाँ और मन से अत्यधिक आसक्ति के कारण अनुरोध से।
राजा रहूगण आगे बोला--महाशय, आपने बताया कि शारीरिक स्थूलता तथा कृशता जैसीउपाधियाँ आत्मा के लक्षण नहीं हैं।
यह सही नहीं है, क्योंकि सुख तथा दुख जैसी उपाधियों काअनुभव आत्मा को अवश्य होता है।
आप दूध तथा चावल को एक पात्र में भर कर अग्नि केऊपर रखें तो दूध तथा चावल क्रम से स्वतः तप्त होते हैं।
इसी प्रकार शारीरिक सुखों तथा दुखोंसे हमारी इन्द्रियाँ, मन तथा आत्मा प्रभावित होते हैं।
आत्मा को इस परिवेश से सर्वथा बाहर नहींरखा जा सकता।
शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानांयः किड्डूरो वै न पिनष्टि पिष्टम् ।
स्वधर्ममाराधनमच्युतस्ययदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥
२३॥
शास्ता--शासक; अभिगोप्ता--नागरिकों का शुभचिन्तक; नृ-पति:--राजा; प्रजानाम्ू--नागरिकों का; य:--जो; किड्जरः --आज्ञा पालने वाला; बै--निस्सन्देह; न--नहीं; पिनष्टि पिष्टमू--पहले से पिसे हुए को पीसता है; स्व-धर्मम्--अपना कर्तव्य;आराधनम्--उपासना; अच्युतस्य-- श्रीभगवान् की; यत्--जो; ईहमान: --करते हुए; विजहाति--मुक्त कर दिये जाते हैं; अघ-ओघम्--सभी प्रकार के पाप तथा दोषपूर्ण कर्म से |
महाशय, आपने बताया कि राजा तथा प्रजा अथवा स्वामी और सेवक के सम्बन्ध शाश्रत नहीं होते।
यद्यपि ऐसे सम्बन्ध अस्थायी हैं, तो भी जब कोई व्यक्ति राजा बनता है, तो उसकाकर्तव्य नागरिकों पर शासन करना और नियमों की अवज्ञा करने वालों को दण्डित करना है।
उनको दण्डित करके वह नागरिकों को राज्य के नियमों का पालन करने की शिक्षा देता है।
पुनःआपने कहा है कि मूक तथा बधिर को दण्ड देना चर्वित को चर्वण करना या पिसी लुगदी कोफिर से पीसना है, जिसका अभिप्राय यह हुआ कि इससे कोई लाभ नहीं होता।
किन्तु यदि कोईपरमेश्वर द्वारा आदिष्ट अपने कर्तव्यों के पालन में लगा रहता है, तो उसके पापकर्म निश्चय ही घटजाते हैं।
अतः यदि किसी को बलपूर्वक उसके कर्तव्यों में लगा दिया जाये तो उसे लाभ पहुँचताहै, क्योंकि इस प्रकार उसके समस्त पाप दूर हो सकते हैं।
तन्मे भवान्नरदेवाभिमान-मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य ।
कृषीष्ट मैत्रीहृशमार्तबन्धोयथा तरे सदवध्यानमंह: ॥
२४॥
तत्ू--अतः; मे--मुझ पर; भवान्--आप; नर-देव-अभिमान-मदेन--राजा की देह पाने के अभिमान से उन्मत्त; तुच्छीकृत--अवज्ञा करने वाले; सतू्-तमस्य--मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ आपका; कृषीष्ट--कृपया प्रदर्शित करें; मैत्री-दहशम्--मित्र के समान मुझ'पर अपनी अहैतुकी कृपा; आर्त-बन्धो--दीनों का साथी; यथा--जिस प्रकार; तरे--मुक्त हो सकूँ; सत्-अवध्यानम्--आप जैसेमहापुरुष की उपेक्षा करने के; अंह:--पाप से।
आपने जो भी कहा है उसमें मुझे विरोधाभास लगता है।
हे दीनबन्धु, मैंने आपको अपमानितकरके बहुत बड़ा अपराध किया है।
राजा का शरीर धारण करने के कारण मैं झूठी प्रतिष्ठा से'फूला हुआ था, अतः इसके लिए मैं अवश्य ही अपराधी हूँ।
अब मेरी प्रार्थना है कि मुझ परअहैतुक अनुग्रह की दृष्टि डालें।
यदि आप ऐसा करें तो आपका अपमान करके मैंने जो पापकर्मकिया है उससे मुक्त हो सकूँगा।
न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्यसाम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।
महद्विमानात्स्वकृतादरिद्वि माहडःनदुक्ष्यत्यद्रादपि शूलपाणि: ॥
२५॥
न--नहीं; विक्रिया-- भौतिक परिवर्तन; विश्व-सुहृत्-प्रत्येक प्राणी के मित्र, श्रीभगवान् का; सखस्य--मित्र ( आप ) का;साम्येन--आपके मानसिक सन्तुलन के कारण; वीत-अभिमते:--जिसने जीवन के देहात्मबोध को सर्वथा त्याग दिया है; तब--तुम्हारा; अपि--निस्सन्देह; महत्-विमानात्ू--महान् भक्त का अपराध करने से; स्व-कृतात्ू--मेरे अपने कार्य से; हि--निश्चितरूप से; माहक्-- मुझ जैसा व्यक्ति; नड्छ्ष्यति--विनष्ट हो जाएगा; अदूरात्-शीघ्र ही; अपि--निश्चय ही; शूल-पाणि:--भगवान् शिव ( शूलपाणि ) के समान शक्तिशाली होकर भी |
हे स्वामी, आप समस्त जीवात्माओं के मित्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के सखा हैं।
अतः आपसबों के लिए समान हैं और देहात्म-बुद्धि से सर्वथा मुक्त हैं।
यद्यपि मैंने आपकी अवमाननाकरके अपराध किया है, किन्तु मैं जानता हूँ कि मेरे इस तिरस्कार से आपको कोई हानि या लाभनहीं होने वाला है।
आप हृढ़ संकल्प हैं जबकि मैं अपराधी हूँ।
इसलिए भले ही मैं भगवान् शिवके समान बलवान् क्यों न होऊँ, किन्तु एक वैष्णव के चरणकमल पर अपराध करने के कारणमैं तुरन्त ही नष्ट हो जाऊँगा।
