← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय एक: महाराज प्रियव्रत की गतिविधियाँ

5.1राजोबाचप्रियत्रतो भागवत आत्माराम: कथं मुने ।गृहेरमत यन्मूल: कर्मबन्ध: पराभव: ॥ १॥

राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; प्रिय-ब्रत:ः--राजा प्रियत्रत; भागवत:--परमभक्त; आत्म-आराम:--आत्म-साक्षात्कार मेंरुचि रखनेवाला; कथम्‌--क्यों; मुने--हे मुनि; गृहे--घर पर; अरमत-- भोग किया; यत्‌-मूल:--जिसे मूल कारण मानते हुए;कर्म-बन्ध:--सकाम कर्मों का बन्धन; पराभव: --उद्देश्य की पराजय ?

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे मुनिवरपरम आत्मदर्शी भगवद्भक्त राजाप्रियत्रत ने ऐसे गृहस्थ जीवन में रहना क्‍यों पसन्द किया, जो कर्म-बन्धन ( सकाम कर्म ) कामूल कारण तथा मानव जीवन के उद्देश्य को पराजित करने वाला है ?

न नून॑ मुक्तसड़नां ताहशानां द्विजर्षभ ।ग्हेष्वभिनिवेशोयं पुंसां भवितुमहति ॥

२॥

न--नहीं; नूनम्‌--निश्चय ही; मुक्त-सड्जनाम्‌-विरक्त; ताहशानाम्‌--ऐसे; द्विज-ऋषभ-हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, विप्रवर; गृहेषु --गृहस्थ जीवन में; अभिनिवेश:--अत्यधिक अनुरक्ति; अयम्‌--यह; पुंसाम्‌ू--मनुष्यों का; भवितुम्‌--होना; अरहति--सम्भव है।

भक्त-जन निश्चय ही मुक्त पुरुष होते हैं।

अतः हे विप्रवर, वे सम्भवतः गृहकार्यों में दत्तचित्तनहीं रह सकते।

महतां खलु विप्रर्षे उत्तमश्लोकपादयो: ।

छायानिर्वृतचित्तानां न कुट॒ुम्बे स्पृहामति: ॥

३॥

महताम्‌--परम भक्तों की; खलु--निश्चय ही; विप्र-ऋषे--हे विप्रों में ऋषि; उत्तम-शलोक-पादयो:-- भगवान्‌ के चरणकमलोंकी; छाया--छाया से; निर्वृत--तृप्त; चित्तानामू--जिनकी चेतना; न--नहीं; कुट॒म्बे--पारिवारिक सदस्यों पर; स्पृहा-मति: --आसक्ति सहित चेतना।

जिन सिद्ध महात्माओं ने भगवान्‌ के चरणकमलों की शरण ली है वे उन चरणकमलों कीछाया से पूर्णतया तृप्त हैं।

उनकी चेतना कभी भी कुट॒म्बीजनों में आसक्त नहीं हो सकती।

संशयोउयं महान्ब्रह्मन्दारागारसुतादिषु ।

सक्तस्य यत्सिद्धिरभूत्कृष्णे च मतिरच्युता ॥

४॥

संशय: --सन्देह; अयम्‌--यह; महान्‌ू--महान्‌; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; दार--स्त्री; आगार--घर; सुत-- बच्चे; आदिषु--इत्यादि केप्रति; सक्तस्थ--अनुरक्त पुरुष का; यत्‌--क्योकिं; सिद्द्धि:--सिद्धि; अभूत्‌--हो गया; कृष्णे-- श्रीकृष्ण में; च-- भी; मति:--आसक्ति; अच्युता--अविचल।

राजा ने आगे पूछा, हे विप्रवर, मेरा सबसे बड़ा सन्देह यही है कि राजा प्रियव्रत जैसे व्यक्तिके लिए, जो अपनी पत्नी, सन्‍्तान तथा घर के प्रति इतने आसक्त थे, कृष्ण-भक्ति में सर्वोच्चअविचल सिद्धि प्राप्त कर पाना कैसे सम्भव हो सका?

श्रीशुक उवाचबाढमुक्त भगवत उत्तमश्लोकस्य श्रीमच्चरणारविन्दमकरन्दरस आवेशितचेतसो ।

भागवतरमहंसदयितकथां किझ्ञिदन्तरायविहतां स्वां शिवतमां पदवीं न प्रायेण हिन्वन्ति ॥

५॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी बोले; बाढ्म्‌--ठीक; उक्तम्‌--आपने जो कहा; भगवत:-- भगवान्‌ का; उत्तम-श्लोकस्य--जिनकी प्रशंसा उत्तम एलोकों से की जाती है; श्रीमत्‌-चरण-अरविन्द--अत्यन्त सुन्दर सुरभित कमल पुष्पों केसमान चरणों का; मकरन्द--मधु; रसे-- अमृत में; आवेशित--डुबोया हुआ, सराबोर; चेतस:--जिनके हृदय; भागवत--भक्तोंकी; परमहंस--मुक्त पुरुष; दयित--रुचिकर, मनोहारी; कथाम्‌--यशोगान; किश्जित्‌ू--क भी-क भी; अन्तराय--अवरोधों से;विहताम्‌-- अवरुद्ध; स्वाम्‌-- अपने; शिव-तमाम्‌--अत्यन्त शुभ; पदवीम्‌--पद को; न--नहीं; प्रायेण -- प्राय: ; हिन्वन्ति--त्यागते हैं।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--तुम्हारा कथन सही है।

ब्रह्मा के समान सिद्ध पुरुषों के द्वारादिव्य एलोकों से प्रशंसित भगवान्‌ की कीर्ति परम भक्तों तथा मुक्त पुरुषों के लिए अत्यन्तमनोहारी है।

जो भगवान्‌ के चरणकमलों के अमृततुल्य मधु में अनुरक्त है तथा जिसका मनसदैव उनकी कीर्ति में लीन रहता है, वह भले ही कभी कभी किसी बाधा से रुक जाये, किन्तुजिस परम पद को उसने प्राप्त किया है उसे वह कभी नहीं छोड़ता।

यहिं वाव ह राजन्स राजपुत्र: प्रियत्रतः परमभागवतो नारदस्य चरणोपसेवयाझ्जसावगतपरमार्थसतत्त्वोब्रह्मसत्रेण ।

दीक्षिष्यमाणोवनितलपरिपालनायाम्नातप्रवरगुणगणैकान्तभाजनतया स्वपित्रोपामन्द्रितोभगवति वासुदेव एवाव्यवधानसमाधियोगेन ।

समावेशितसकलकारकक्रियाकलापो नैवाभ्यनन्दद्यद्यपि'तदप्रत्याम्नातव्यं तदधिकरण आत्मनो न्यस्मादसतोपि पराभवमन्वीक्षमाण: ॥

६॥

यहि--चूँकि, क्योंकि; वाव ह--निस्संदेह; राजन्‌ू--हे राजन्‌; सः--वह; राज-पुत्र:--राजकुमार; प्रियव्रत:--प्रियत्रत; परम--महान; भागवतः -- भक्त; नारदस्य-- नारद के; चरण-- चरणकमल की; उपसेवया--सेवा से; अज्लसा--शीघ्र; अवगत--परिचित हो गया; परम-अर्थ--दिव्य विषय; स-तत्त्व:--समस्त ज्ञेय तथ्यों सहित; ब्रह्म-सत्रेण--ब्रह्म की निरन्तर चर्चा से;दीक्षिष्यमाण: --पूर्ण समर्पण की कामना से; अवनि-तल--भूतल पर; परिपालनाय--राज्य करने के लिए; आम्नात--शाम्त्तरों मेंनिर्दिष्ट; प्रवर--सर्वोच्च; गुण--गुणों के; गण--समूह से; एकान्त--विचलित हुए बिना, अविचल; भाजनतया--पात्रता केकारण; स्व-पित्रा--अपने पिता के द्वारा; उपामन्त्रित:--आज्ञा दिये जाने पर; भगवति-- भगवान्‌ में; वासुदेवे --सर्वव्यापी ईश्वरमें; एब--निश्चय ही; अव्यवधान--बिना विराम के; समाधि-योगेन--मग्न होकर योग साधने से; समावेशित-- अत्यन्त समर्पित;सकल--समस्त; कारक --इन्द्रियाँ; क्रिया-कलाप:--जिनके समस्त कार्य; न--नहीं; एव--इस प्रकार; अभ्यनन्दत्‌--अभिनन्दित; यद्यपि--यद्यपि; तत्‌--वह; अप्रत्याम्नातव्यमू--किसी प्रकार उल्लंघन न करने योग्य; तत्‌ू-अधिकरणे--उस पदको ग्रहण करने में; आत्मन:--अपने आपको; अन्यस्मात्‌--अन्य कार्यों से; असत:ः--भौतिक; अपि--निश्चय ही; पराभवम्‌--हास; अन्वीक्षमाण:--दूरदर्शिता से |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे राजन, राजकुमार प्रियत्रत महान्‌ भक्त थे क्‍योंकिउन्होंने अपने गुरु नारद के चरणकमलों को प्राप्त कर दिव्य ज्ञान में उच्चतम सिद्धि प्राप्त की।

परम ज्ञान के कारण वे आत्म-विषयों की चर्चा में सदैव संलग्न रहे और उन्होंने अपना ध्यानकिसी ओर नहीं मोड़ा।

इसके बाद राजकुमार के पिता ने आदेश दिया कि वह संसार पर राज्यकरने का भार ग्रहण करे।

उन्होंने प्रियत्रत को आश्वस्त करना चाहा कि शास्त्रों के अनुसार यहउसका कर्तव्य है, किन्तु प्रियत्रत ने तो निरन्तर भक्तियोग की साधना में रत रह कर भगवान्‌ कास्मरण करते हुए समस्त इन्द्रियों को ईश्वर की सेवा में अर्पित कर रखा था।

अतः पिता की आज्ञाअनुलंघ्य होने पर भी राजकुमार ने उसका स्वागत नहीं किया।

इस प्रकार उन्होंने अपनेअन्तःकरण में यह प्रश्न किया कि संसार पर राज्य करने के उत्तरदायित्व को स्वीकार करकेकहीं वे अपनी भक्ति से पराड्मुख तो नहीं हो जायेंगे ?

अथ ह भगवानादिदेव एतस्य गुणविसर्गस्य परिबृंहणानुध्यानव्यवसित।

सकलजगदभिप्रायआत्मयोनिरखिलनिगमनिजगणपरिवेष्टित: स्वभवनादवततार ॥

७॥

अथ--इस प्रकार; ह--निस्संदेह; भगवान्‌ू--सर्वशक्तिमान; आदि-देव:--प्रथम देवता; एतस्य--इस ब्रह्माण्ड के; गुण-विसर्गस्य--तीनों गुणों की उत्पत्ति; परिबृंहण--कल्याण; अनुध्यान--सदैव ध्यानमग्न; व्यवसित--ज्ञात; सकल--सप्पूर्ण;जगतू--ब्रह्मण्ड का; अभिप्राय: --परम उद्देश्य; आत्म--परम-आत्मा; योनि:--जिसके जन्म का स्त्रोत; अखिल--ससम्पूर्ण;निगम--वेदों के द्वारा; निज-गण--अपने गणों ( सहयोगियों ) से; परिवेष्टित: --घिरे हुए; स्व-भवनात्‌-- अपने धाम से;अवततार--नीचे आये |

श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे बोले: इस ब्रह्माण्ड के आदि जीव एवं सर्वशक्तिमान देवताब्रह्माजी हैं, जो इस सृष्टि की समस्त गतिविधियों के विकास के लिए उत्तरदायी हैं।

भगवान्‌ सेप्रत्यक्ष जन्म लेकर वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के हित को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं, क्योंकि वेसृष्टि का उद्देश्य जानते हैं।

ऐसे परम शक्तिशाली देवता ब्रह्माजी अपने पार्षदों तथा मूर्तिमान वेदोंसहित अपने सर्वोच्च लोक से उस स्थान पर उतरे जहाँ राजकुमार प्रियव्रत ध्यान कर रहे थे।

स तत्र तत्र गगनतल उडुपतिरिव विमानावलिभिरनुपथममरपरिवृढैरभिपूज्यमान: ।

पथि पथि च वरूथशःसिद्धगन्धर्वसाध्यचारणमुनिगणैरुपगीयमानो गन्धमादनद्रोणीमवभासयन्नुपससर्प ॥

८ ॥

सः--वह ( भगवान्‌ ब्रह्मा ); तत्र तत्र--यहाँ वहाँ; गगन-तले-- आकाश मंडप के नीचे; उडु-पतिः--चन्द्रमा; इब--सहश;विमान-आवलिभि:--अपने-अपने विमानों में; अनुपथम्‌--पथ में; अमर--देवताओं के ; परिवृढः:--नायकों द्वारा;अभिपूज्यमान: --पूजित होकर; पथ्िि पथि--एक के बाद एक पथ पर; च-- भी; वरूथश:ः --समूहों में; सिद्ध--सिद्धलोक केवासियों द्वारा; गन्धर्व--गन्धर्वलोक के वासियों द्वारा; साध्य--साध्यलोक के वासियों द्वारा; चारण--चारणलोक के वासियोंद्वारा; मुनि-गणैः--तथा मुनियों के द्वारा; उपगीयमान:--पूजित होकर; गन्ध-मादन--उस लोक का जहाँ गंधमादन पर्वत है;द्रोणीमू--घाटी या किनारे को; अवभासयन्‌-- प्रकाशित करते हुए; उपससर्प--पहुँचा |

ज्योंही भगवान्‌ ब्रह्म अपने वाहन हंस पर आरूढ होकर नीचे उतरे, तो सिद्धलोक,गंधर्वलोक, साध्यलोक तथा चारणलोक के समस्त वासी तथा मुनि एवं अपने-अपने विमानों मेंउड़ते हुए देवताओं ने आकाशमण्डल के नीचे एकत्र होकर उनका स्वागत किया और पूजा की।

विभिन्न लोकों के वासियों से आदर तथा स्तवन पाकर भगवान्‌ ब्रह्मा ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानोंप्रकाशमान नक्षत्रों से घिरा हुआ पूर्ण चन्द्रमा हो।

तब ब्रह्माजी का विशाल हंस गंधमादन कीघाटी में प्रियत्रत के पास पहुँचा जहाँ वे बैठे हुए थे।

तत्र ह वा एन॑ देवर्षिहेसयानेन पितरं भगवन्तं हिरण्यगर्भमुपलभमान: ।

सहसैवोत्थायाईहणेन सहपितापुत्राभ्यामवहिताझ्जलिरुपतस्थे ॥

९॥

तत्र--वहाँ; ह वा--निश्चय ही; एनम्‌--उसको; देव-ऋषि:--देवर्षि नारद; हंस-यानेन-- अपने वाहन हंस द्वारा; पितरमू-- अपनेपिता; भगवन्तम्‌ू--सर्वशक्तिमान; हिरण्य-गर्भमू-- भगवान्‌ ब्रह्म को; उपलभमान:--समझकर; सहसा एव--तुरन्त; उत्थाय--उठ कर; अर्हणेन-- पूजन-सामग्री; सह--सहित; पिता-पुत्राभ्याम्‌-प्रियत्रत तथा उनके पिता स्वायंभुव मनु; अवहित-अज्जलि:ः--आदरपूर्वक हाथ जोड़कर; उपतस्थे-- अर्चना की |

नारद मुनि के पिता भगवान्‌ ब्रह्मा इस ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं।

नारद ने ज्योंही विशालहंस को देखा, वे तुरन्त समझ गये कि ब्रह्माजी आए हैं, अतः वे स्वायंभुव मनु तथा अपने द्वाराउपदेश दिये जाने वाले उनके पुत्र प्रियत्रत सहित अविलम्ब खड़े हो गये।

तब उन्होंने हाथजोड़कर आदरपूर्वक भगवान्‌ की आराधना प्रारम्भ की।

भगवानपि भारत तदुपनीताईएण: सूक्तवाकेनातितरामुदितगुणगणावतारसुजय: ।

प्रियत्रतमादिपुरुषस्तंसदयहासावलोक इति होवाच ॥

१०॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ ब्रह्मा; अपि-- भी; भारत--हे राजा परीक्षित; तत्‌--उनके द्वारा; उपनीत--आगे लायी गयी; अर्हण: --पूजन-सामग्री; सूक्त--वैदिक शिष्टाचार के अनुसार; वाकेन--वाणी से; अतितराम्‌ू-- अत्यधिक; उदित-- प्रशंसित; गुण-गण--गुणसमूह; अवतार--नीचे उतरने के कारण; सु-जय:--जिसकी कीर्ति; प्रियत्रतम्‌--प्रियत्रत को; आदि-पुरुष: --आदिपुरुष; तम्‌--उनको; स-दय--दयापूर्वक; हास--हँसते हुए; अवलोक:--जिनकी दृष्टि; इति--इस प्रकार; ह--निश्चय ही;उवाच--कहा।

हे राजा परीक्षित, चूँकि ब्रह्माजी सत्यलोक से भूलोक में उतर चुके थे, अतः नारद मुनि,राजकुमार प्रियत्रत तथा स्वायंभुव मनु ने आगे बढ़कर पूजन सामग्री अर्पित की और वैदिकविधि के अनुसार अत्यन्त शिष्ट वाणी से उनकी प्रशंसा की।

तब इस ब्रह्माण्ड के प्रथम पुरुषब्रह्मा प्रियत्रत पर सदय मन्द मुस्कान-युक्त दृष्टि डालते हुए उनसे इस प्रकार बोले।

श्रीभगवानुवाचनिबोध तातेदमृतं ब्रवीमिमासूयितु देवमर्हस्यप्रमेयम्‌ ।

बयं भवस्ते तत एष महर्षि-वहाम सर्वे विवशा यस्य दिष्टम्‌ ॥

११॥

श्री-भगवान्‌ उवाच--परम पुरुष ब्रह्मा ने कहा; निबोध--ध्यानपूर्वक सुनो; तात--मेरे प्रिय पुत्र; इदम्‌--यह; ऋतम्‌--सत्य;ब्रवीमि--बोल रहा हूँ; मा--मत; असूचितुम्‌--ईर्ष्यालु; देवम्‌-- भगवान्‌; अहसि--तुम्हें चाहिए; अप्रमेयम्‌--जो हमारेप्रयोगात्मक ज्ञान से परे है; वयम्‌--हम; भव:--शिवजी; ते--तुम्हारा; ततः--पिता; एष:--यह; महा-ऋषि:--नारद;वहाम:ः--पालन करते हैं; सर्वे--सभी; विवशा:--विचलित होने में अशक्त; यस्य--जिसकी; दिष्टमू-- आज्ञा?

इस ब्रह्माण्ड के परम पुरुष भगवान्‌ ब्रह्मा ने कहा--हे प्रियत्रतमैं जो कुछ कहूँ उसे ध्यान से सुनो।

परमेश्वर से ईर्ष्या न करो क्योंकि वे हमारे प्रयोगात्मक परिमापों से परे हैं।

हम सबों को,जिसमें शिवजी, तुम्हारे पिता तथा महर्षि नारद भी सम्मिलित हैं, परमेश्वर की आज्ञा का पालनकरना पड़ता है।

हम उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकते।

न तस्य कश्_ित्तपसा विद्यया वान योगवीर्येण मनीषया वा ।

नैवार्थधर्म: परत: स्वतो वाकृतं विहन्तुं तनुभृद्विभूयात्‌ ॥

१२॥

न--कभी नहीं; तस्थ--उसका; कश्चित्‌ू--कोई भी; तपसा--तप से; विद्यया--विद्या से; वा--अथवा; न--कभी नहीं;योग--योगबल से; वीर्येण--शारीरिक बल से; मनीषया--बुद्धि से; वा--अथवा; न--कभी नहीं; एब--निश्चय ही; अर्थ--भौतिक ऐश्वर्य से; धर्म: -- धर्म से; परतः--किसी बाह्य शक्ति से; स्वतः--अपने प्रयास से; वा-- अथवा; कृतम्‌--आज्ञा;विहन्तुमू--टालने में; तनु-भृत्‌-- भौतिक देह स्वीकार करने वाला जीवात्मा; विभूयात्‌--समर्थ है?

भगवान्‌ की आज्ञा को कोई न तो तपोबल, वैदिक शिक्षा, योगबल, शारीरिक बल याबुद्धिबल से टाल सकता है, न ही कोई अपने धर्म की शक्ति या भौतिक ऐश्वर्य से अथवा किसीअन्य उपाय से, न स्वयं या न पराई सहायता से परमात्मा के आदेशों को चुनौती दे सकता है।

ब्रह्मा से लेकर एक चींटी तक, किसी भी जीवात्मा के लिए ऐसा कर पाना सम्भव नहीं है।

भवाय नाशाय च कर्म कर्तुशोकाय मोहाय सदा भयाय ।

सुखाय दुःखाय च देहयोग-मव्यक्तदिष्ट जनताड़ धत्ते ॥

१३॥

भवाय--जन्म के निमित्त; नाशाय--मृत्यु के लिए; च--भी; कर्म--कार्य ; कर्तुमू--करने के लिए; शोकाय--शोक के लिए;मोहाय--मोह के लिए; सदा--सदैव; भयाय--भय के लिए; सुखाय--सुख हेतु; दुःखाय--दुख हेतु; च-- भी; देह-योगम्‌--भौतिक देह से सम्बन्ध; अव्यक्त-- भगवान्‌ द्वारा; दिष्टम--निर्देशित; जनता--जीवात्माएँ; अड़--हे प्रियत्रत; धत्ते-- धारणकरती हैं।

हे प्रियत्रत, भगवान्‌ की आज्ञा से ही सभी जीवात्माएँ जन्म, मृत्यु, कर्म, शोक, मोह, भविष्यके संकटों के प्रति भय, सुख तथा दुख के हेतु विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करती हैं।

यद्वाचि तन्त्यां गुणकर्मदामभि:सुदुस्तरैर्वत्स वयं सुयोजिता: ।

सर्वे वहामो बलिमी श्वरायप्रोता नसीब द्विपदे चतुष्पद: ॥

१४॥

यत्‌--जिसका; वाचि--वैदिक आदेश के रूप में; तन्त्याम्‌--लम्बी रस्सी से; गुण--गुण; कर्म--( तथा ) कर्म की; दामभि:--रस्सियों से; सु-दुस्तरः--टाल पाना अत्यन्त कठिन है; वत्स--हे बालक; वयम्‌--हम; सु-योजिता:--लगे हुए हैं; सर्वे--सभी;वहामः--पालन करते हैं; बलिम्‌--ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उनकी आज्ञाओं को; ईश्वराय-- भगवान्‌ को; प्रोता:--बद्धहोकर; नसि--नाक में; इब--सहश; द्वि-पदे--दो पैर वाले ( हाँकने वाले ) को; चतु:-पदः--चौपाया ( बैल )॥

हे बालक, हम सभी अपने गुण तथा कर्म के अनुसार वैदिक आज्ञा द्वारा वर्णाअ्रम विभागोंमें बँधे हुए हैं।

इन विभागों से बच पाना कठिन है, क्योंकि ये वैज्ञानिक विधि से व्यवस्थित हैं।

अतः हमें वर्णा श्रम धर्म के कर्तव्यों का पालन उन बैलों के समान करना चाहिए जो नाक में बँधीनकेल खींचने वाले चालक के आदेश पर चलने के लिए बाध्य हैं।

ईशाभिसूष्टं हावरुन्ध्महेउड़दुःखं सुखं वा गुणकर्मसझत्‌ ।

आस्थाय तत्तद्यदयुड्र नाथश्‌चक्षुष्मतान्धा इब नीयमाना: ॥

१५॥

ईश-अभिसृष्टम्‌--ई श्वर द्वारा उत्पन्न या प्रदत्त; हि--निश्चय ही; अवरून्ध्महे --हमें स्वीकार करना होता है; अड्ग--हे प्रियब्रत;दुःखम्‌--दुख; सुखम्‌--सुख; बा--अथवा; गुण-कर्म--गुण तथा कार्य की; सड्भात्‌ू--संगति से; आस्थाय--स्थित होकर; तत्‌तत्‌--स्थिति; यत्‌--जो शरीर; अयुद्ध --उसने प्रदान किया; नाथ:--परमे श्वर; चक्षुष्मता--नेत्रयुक्त पुरुष के द्वारा; अन्धा: --अंधे पुरुष; इब--सहृश; नीयमाना:--ले जाया जाकर।

हे प्रियत्रत, भगवान्‌ विभिन्न गुणों के साथ हमारे संसर्ग के अनुसार हमें विशिष्ट शरीर प्रदानकरते हैं और हम सुख तथा दुख प्राप्त करते हैं।

अत: मनुष्य को चाहिए कि वह जिस रूप में हैवैसे ही रहे और भगवान्‌ द्वारा उसी प्रकार मार्गदर्शन प्राप्त करे जिस प्रकार एक अंधा व्यक्तिआँख वाले व्यक्ति से प्राप्त करता है।

मुक्तोषपि तावद्विभूयात्स्वदेह-मारब्धमश्नन्नभिमानशून्य: ।

यथानुभूतं प्रतियातनिद्र:कि त्वन्यदेहाय गुणान्न वृड्डे ॥

१६॥

मुक्त:--मुक्त पुरुष; अपि--ही; तावत्‌--तब तक; बिभूयात्‌-- धारण करना चाहिए; स्व-देहम्‌--अपना शरीर; आरब्धम्‌--पूर्वकर्मों के फलस्वरूप प्राप्त; अश्नन्‌ू--स्वीकार करते हुए; अभिमान-शून्य:--अभिमान रहित; यथा--जिस प्रकार; अनुभूतम्‌--जैसा अनुभव किया गया हो; प्रतियात-निद्र:--निद्रा से जगा हुआ; किम्‌ तु--लेकिन; अन्य-देहाय--दूसरी देह के लिए;गुणान्‌--गुणों को; न--नहीं; वृड्ढे --भोगता है।

मुक्त होते हुए भी मनुष्य पूर्व कर्मों के अनुसार प्राप्त देह को स्वीकार करता है।

किन्तु वहभ्रान्तिरहित होकर कर्म-वश प्राप्त सुख तथा दुख को उसी प्रकार मानता है, जिस प्रकार जाग्रतमनुष्य सुप्तावस्था में देखे गये स्वप्णन को।

इस तरह वह हृढ़प्रतिज्ञ रहता है और भौतिक प्रकृति केतीनों गुणों के वशीभूत होकर दूसरा शरीर पाने के लिए कभी कार्य नहीं करता।

भयं प्रमत्तस्य वनेष्वपि स्थाद्‌यतः स आस्ते सहषदट्सपत्न: ।

जितेन्द्रियस्यात्मरतेर्बु धस्यगृहा भ्रम: कि नु करोत्यवद्यम्‌ू ॥

१७॥

भयम्‌-- भय; प्रमत्तस्य--मोहग्रस्त का; वनेषु--वनों में; अपि-- भी; स्थात्‌ू--होना चाहिए; यतः--क्योंकि; सः--वह( जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं )।

आस्ते--रहता है; सह--साथ; षट्‌-सपत्न:--छह सपत्नियाँ; जित-इन्द्रियस्थ--इन्द्रियों कोजीतने वाले का; आत्म-रते: --आत्मतुष्ट; बुधस्य--ऐसे विद्वान का; गृह-आश्रम:--गृहस्थ जीवन; किम्‌--क्या; नु--निस्सन्देह;'करोति--कर सकता है; अवद्यम्‌-- क्षति |

जो मनुष्य इन्द्रियों के वशीभूत है, भले ही वह वन-वन विचरण करता रहे, तो भी उसेबन्धन का भय बना रहता है क्योंकि वह मन तथा ज्ञानेन्द्रियाँ--इन छः सपत्नियों के साथ रह रहाहोता है।

किन्तु आत्मतुष्ट विद्वान जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया हो, उसे गृहस्थजीवन कोई क्षति नहीं पहुँचा पाता।

यः षट्सपत्नान्विजिगीषमाणोगृहेषु निर्विश्य यतेत पूर्वम्‌ ।

अत्येति दुर्गाअ्रित ऊर्जितारीन्‌श़ क्षीणेषु काम विचरेद्विपश्चित्‌ ॥

१८॥

यः--जो कोई; षघट्‌ू--छः:; सपत्नान्‌ू--प्रतिपक्षी ( शत्रु )) विजिगीषमाण:--जीतने की आकांक्षा रखने वाले; गृहेषु--गृहस्थजीवन में; निर्विश्य--प्रवेश करके; यतेत--प्रयत्त करना चाहिए; पूर्वम्‌--प्रथम; अत्येति--जीत लेता है; दुर्ग-आश्रित:--सुरक्षित स्थान ( दुर्ग ) में रहते हुए; ऊर्जित-अरीन्‌-- अत्यन्त प्रबल शत्रुओं को; क्षीणेषु-- क्षीण; कामम्‌--विषयवासना;विचरेत्‌--विचरण कर सकता है; विपश्चित्‌--अत्यन्त अनुभवीविद्वान?

गृहस्थाश्रम में रह कर जो मनुष्य अपने मन तथा पाँचों इन्द्रियों को विधिपूर्वख जीत लेता है,वह उस राजा के समान है, जो अपने किले (दुर्ग ) में रहकर अपने बलशाली शत्रुओं कोपराजित करता है।

गृहस्थाश्रम में प्रशिक्षित हो जाने पर तथा कामेच्छाओं को क्षीण करके मनुष्यबिना किसी भय के कहीं भी घूम सकता है।

त्वं त्वब्जनाभाड्प्रिसरोजकोश-दुर्गाअतो निर्जितषट्सपत्न: ।

भुड्झ्वेह भोगान्पुरुषातिदिष्टान्‌विमुक्तसड्ः प्रकृति भजस्व ॥

१९॥

त्वमू-तुम स्वयं; तु--तब; अब्ज-नाभ--जिनकी नाभि कमल-पुष्प के सहश है, ऐसे भगवान्‌; अड्प्रि--चरण; सरोज--कमल; कोश--मुँह, सम्पुट; दुर्ग--किला; आश्रित:--शरणागत; निर्जित--विजित; षट्‌-सपत्न: --छःशत्रु ( मन तथा अन्य पाँच इन्द्रियाँ ); भुड्क्ुव-- भोग करो; इह--जगत में; भोगान्‌ू-- भोग्य वस्तुएँ; पुरुष--परम पुरुष द्वारा; अतिदिष्टानू--विशेषतयाआदेशित; विमुक्त--मुक्त हुआ; सड़:-- भौतिक लगाव से; प्रकृतिमू--स्वाभाविक स्थिति; भजस्व-- भोग करो।

ब्रह्माजी ने आगे कहा--हे प्रियत्रत, कमलनाभ ईश्वर के चरणकमल के कोश में शरणलेकर छहों ज्ञान इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करो।

तुम भौतिक सुख-भोग स्वीकार करो, क्योंकिभगवान्‌ ने तुम्हें विशेष रूप से ऐसा करने के लिए आज्ञा दी है।

इस तरह तुम भौतिक संसर्ग सेमुक्त हो सकोगे और अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहते हुए भगवान्‌ की आज्ञाएँ पूरी कर सकोगे।

श्रीशुक उबाचइति समभिहितो महाभागवतो भगवतस्त्रिभुवनगुरोरनुशासनमात्मनो ।

लघुतयावनतशिरोधरो बाढमितिसबहुमानमुवाह ॥

२०॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; समभिहितः--पूर्णतया उपदिष्ट; महा-भागवत: --परमभक्त; भगवतः--अति शक्तिमान ब्रह्माजी का; त्रि-भुवन--तीनों लोकों के; गुरो:--गुरु की; अनुशासनम्‌--आज्ञा, आदेश;आत्मन:--स्वयं का; लघुतया--लघुता के कारण; अवनत--झुका हुआ; शिरोधर: --उसका शिर; बाढम्‌--जो आज्ञा; इति--इस प्रकार; स-बहु-मानम्‌-- अत्यन्त आदर समेत; उबाह--पालन किया।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--इस प्रकार तीनों लोकों के गुरू ब्रह्माजी द्वाराभलीभाँति उपदेश दिये जाने पर अपना पद छोटा होने के कारण प्रियत्रत ने नमस्कार करते हुएउनका आदेश शिरोधार्य किया और अत्यन्त आदरपूर्वक उसका पालन किया।

भगवानपि मनुना यथावदुपकल्पितापचितिःप्रियत्रतनारदयोरविष ।

ममभिसमीक्षमाणयोरात्मसमवस्थानमवाड्मनसं क्षयमव्यवहतं प्रवर्तयन्नगमत्‌, ॥

२१॥

भगवान्‌--परम शक्तिमान ब्रह्माजी; अपि-- भी; मनुना--मनु द्वारा; यथावत्‌ -- अभीष्ट रूप से; उपकल्पित-अपचिति: --आराधित होकर; प्रियब्रत-नारदयो:--प्रियत्रत तथा नारद की उपस्थिति में; अविषमम्‌--बिना द्वेष के; अभिसमीक्षमाणयो: --इष्टिपात करते हुए; आत्मसम्‌--अपने पद के अनुकूल; अवस्थानम्‌--अपने धाम को; अवाक्‌-मनसम्‌--मन तथा वाणी केवर्णन से परे; क्षयम्‌-ग्रह, लोक; अव्यवहृतम्‌--अपूर्व स्थित; प्रवर्तयन्‌--विदा लेते हुए; अगमत्‌--वापस चले गये ।

इसके पश्चात्‌ मनु ने ब्रह्माजी को संतुष्ट करते हुए विधिवत्‌ पूजा की।

प्रियत्रत तथा नारद नेभी किसी प्रकार का विरोध दिखाये बिना ब्रह्माजी की ओर देखा।

प्रियत्रत से उसके पिता कीमनौती स्वीकार कराकर ब्रह्माजी अपने धाम सत्यलोक को चले गये, जिसका वर्णन भौतिक मनतथा वाणी के परे है।

मनुरपि परेणैवं प्रतिसन्धितमनोरथ: सुर्षिवरानुमतेनात्म जमखिलधरामण्डलस्थितिगुप्तय ।

आस्थाप्य स्वयमतिविषमविषयविषजलाशयाशाया उपरराम॥

२२॥

मण्डल--लोकों का; स्थिति--पालन; गुप्तये--रक्षा हेतु; आस्थाप्य--स्थापित करके; स्वयम्‌--स्वयं; अति-विषम--अत्यन्तभयावने; विषय--सांसारिक प्रपंच; विष--विष का; जल-आशय--समुद्र; आशाया: --कामनाओं से; उपरराम--निवृत्ति प्राप्तकी।

इस प्रकार ब्रह्माजी की सहायता से स्वायंभुव मनु का मनोरथ पूर्ण हुआ।

उन्होंने महर्षि नारदकी अनुमति से अपने पुत्र को समस्त भूमण्डल के पालन का भार सौंप दिया और इस तरह स्वयंभौतिक कामनाओं के अति दुस्तर तथा विषमय सागर से निवृत्ति प्राप्त कर ली।

इति ह वाव स जगतीपतिरीश्वरेच्छयाधिनिवेशितकर्माधिकारो खिलजगद्ठन्धध्वंसनपरानुभावस्य ।

भगवतआदिपुरुषस्याड्प्रियुगलानवरतध्यानानुभावेन परिरन्धितकषायाशयोवदातोपि ।

मानवर्धनो महतांमहीतलमनुशशास ॥

२३॥

इति--इस प्रकार; ह वाव--निस्सन्देह; सः--वह; जगती-पति:--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राजा; ई श्वर-इच्छया-- भगवान्‌ केआदेश से; अधिनिवेशित--पूर्णतया संलग्न; कर्म-अधिकार: -- भौतिक कार्यों में; अखिल-जगत्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का;बन्ध--बन्धन; ध्वंसन--विनष्ट करते हुए; पर--दिव्य; अनुभावस्थ--जिसका प्रभाव; भगवतः--भगवान्‌ के; आदि-पुरुषस्थ--आदि पुरुष के; अड्ध्रि--चरणकमल में; युगल--दो; अनवरत--अहर्निश; ध्यान-अनुभावेन--ध ध्यान द्वारा;परिरन्धित--विनष्ट; कषाय--समस्त मल; आशय: --अपने हृदय में; अवदात:--नितान्त शुद्ध; अपि--यद्यपि; मान-वर्धन:--केवल सम्मान देने के लिए; महताम्‌--बड़ों को; महीतलम्‌-- भौतिक संसार पर; अनुशशास--राज्य किया।

भगवान्‌ की आज्ञा का पालन करते हुए महाराज प्रियत्रत सांसारिक कार्यो में अनुरक्त रहनेलगे, किन्तु उन्हें सदैव भगवान्‌ के उन चरणकमलों का ध्यान बना रहा जो समस्त भौतिकआसक्ति से मुक्ति दिलाने वाले हैं।

यद्यपि महाराज प्रियत्रत समस्त भौतिक कल्मषों से विमुक्त थे,किन्तु अपने बड़ों का मान रखने के लिए ही वे इस संसार पर शासन करने लगे।

अथ च दुहितरं प्रजापतेर्वि श्रकर्मण उपयेमे बर्हिष्मतीं नाम तस्यामु ह ।

वावआत्मजानात्मसमानशीलगुणकर्मरूपवीर्योदारान्द्श भावयाम्बभूव कन्यां च यवीयसीमूर्जस्वतीं नाम ॥

२४॥

अथ--त्पश्चात्‌; च-- भी; दुहितरम्‌--पुत्री को; प्रजापते: --प्रजापतियों में से एक की; विश्वकर्मण: --विश्वकर्मा नामक;उपयेमे--ब्याह लिया; बर्हिष्मतीम्‌--बर्हिष्मती को; नाम--नाम; तस्याम्‌ू--उसमें; उ ह--जैसाकि प्रसिद्ध है; वाव--आश्चर्यजनक; आत्म-जानू-- पुत्रों को; आत्म-समान--अपने ही सहृश्य; शील--चरित्र; गुण--गुण; कर्म--कार्य; रूप--सुन्दरता; वीर्य--बल; उदारान्‌ू--जिसकी उदारता; दश--दस; भावयाम्‌ बभूब--उसके उत्पन्न हुई; कन्याम्‌--कन्या; च-- भी;यवीयसीम्‌--सबसे छोटी; ऊर्जस्वतीम्‌--ऊर्जस्वती; नाम--नाम ?

कीतदनन्तर महाराज प्रियब्रत ने प्रजापति विश्वकर्मा की कन्या बर्दिष्मती से विवाह किया।

उससेउन्हें दस पुत्र प्राप्त हुए जो सुन्दरता, चरित्र, उदारता तथा अन्य गुणों में उन्हीं के समान थे।

उनकेएक पुत्री भी हुई जो सबसे छोटी थी।

उसका नाम ऊर्जस्वती था।

आग्नीक्षेध्मजिहयज्ञबाहुमहावीरहिरण्यरेतोघृतपृष्ठसवनमे ।

धातिधिवीतिहोत्रकवय इति सर्वएवाग्निनामान:, ॥

२५॥

आग्नीक्ष--आग्नी ध्र; इध्म-जिह्न--इध्मजिह्न; यज्ञ-बाहु--यज्ञबाहु; महा-वीर--महावीर; हिरण्य-रेत: --हिरण्यरेता; घृतपृष्ठ--घृतपृष्ठ; सवन--सवन; मेधा-तिथि--मेधातिथि; बीतिहोत्र--वीतिहोत्र ; कवयः--( तथा ) कवि; इति--इस प्रकार; सर्वे--येसभी; एव--निश्चय ही; अग्नि-- अग्नि देवता के; नामान:--नाम |

महाराज प्रियत्रत के दस पुत्रों के नाम थे--आग्नीश्च, इध्मजिह्न, यज्ञबाहु, महावीर,हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सबन, मेधातिथि, वीतिहोत्र तथा कवि।

ये अग्निदेव के भी नाम हैं।

एतेषां कविर्महावीर: सवन इति त्रय आसन्चूध्वरेतसस्त ।

आत्मविद्यायामर्भभावादारभ्य कृतपरिचया:पारमहंस्यमेवा भ्रममभजन्‌ ॥

२६॥

एतेषाम्‌--इनमें से; कवि:--कवि; महावीर:--महावीर; सवन:--सवन; इति--इस प्रकार; त्रय:ः--तीन; आसनू--थे; ऊर्ध्व-रेतस:ः--परम ( नैषप्ठिक ) ब्रह्मचारी; ते--वे; आत्म-विद्यायाम्‌--दिव्य ज्ञान में; अर्भ-भावात्‌--बचपन से; आरभ्य--प्रारम्भ करके; कृत-परिचया: -- अत्यधिक परिचित; पारमहंस्यम्‌--मानव जीवन की उच्चतम सिद्धि का; एब--निश्चय ही; आश्रमम्‌--आश्रम; अभजन्‌--पालन किया।

इन दस पुत्रों में से तीन--कवि, महावीर तथा सवन--पूर्ण ब्रह्मचारी रहे।

इस प्रकारबालपन से ब्रह्मचर्य जीवन की शिक्षा प्राप्त करने के कारण वे सर्वोच्च सिद्धि अर्थात्‌ परमहंसआश्रम से पूर्णतया परिचित थे।

तस्मिन्नु ह वा उपशमशीला: परमर्षय: सकलजीवनिकायावासस्य भगवतो वासुदेवस्य भीतानांशरणभूतस्य श्रीमच्चरणारविन्दाविरतस्मरणाविगलितपरमभक्तियोगानु भावेन परिभावितान्तईदयाधिगतेभगवति सर्वेषां भूतानामात्मभूते प्रत्यगात्मन्येवात्मनस्तादात्म्यमविशेषेण समीयु: ॥

२७॥

तस्मिनू--उस परमहंस आश्रम में; उ--निश्चय ही; ह--इतना प्रसिद्ध; वा--निश्चय ही; उपशम-शीला:--संन्यास आश्रम में;'परम-ऋषय: --महान्‌ ऋषि; सकल--समस्त; जीव--जीवात्माओं का; निकाय--समूह; आवासस्य--निवास का; भगवतः --भगवान्‌; वासुदेवस्थ-- भगवान्‌ वासुदेव का; भीतानाम्‌--जो भौतिक अस्तित्व के कारण भयभीत हैं, उनका; शरण-भूतस्य--जो एकमात्र शरण है; श्रीमत्‌-- भगवान्‌ का; चरण-अरविन्द--चरणकमल; अविरत--निरन्तर; स्मरण--स्मरण; अविगलित--निष्कलुषित; परम--परम; भक्ति-योग--भक्ति का; अनुभावेन--बल से; परिभावित--शुद्धी कृत, विमल; अन्तः-- भीतरी;हृदय--हृदय; अधिगते--देखा हुआ; भगवति-- भगवान्‌; सर्वेषाम्‌--सब; भूतानाम्‌-- भूतात्माओं में से; आत्म-भूते--शरीर केभीतर स्थित; प्रत्यक्‌--प्रत्यक्ष; आत्मनि--परम-आत्मा में; एबव--निश्चय ही; आत्मन:--अपना; तादात्म्यमू--गुण में एक समान;अविशेषेण--बिना अन्तर के; समीयु:--साक्षात्कार किया।

जीवन प्रारम्भ से ही संन्यास आश्रम में रहकर ये तीनों अपनी इन्द्रियों को पूर्णतया वश मेंकरते हुए महान सन्त हो गये।

उन्होंने अपने मन को उन भगवान्‌ के चरणकमलों में सदैव केन्द्रितरखा, जो समस्त जीवात्माओं के विश्रामस्थल ( आश्रय ) हैं और वासुदेव नाम से विख्यात हैं।

जोभव-स्थिति से भयभीत हैं उनके लिए भगवान्‌ वासुदेव ही एकमात्र शरण हैं।

भगवान्‌ केचरणकमलों का निरन्तर ध्यान धारण करने के कारण महाराज प्रियत्रत के ये तीनों पुत्र शुद्धभक्ति से सिद्ध बन गये।

वे अपनी भक्ति के बल से परमात्मा के रूप में प्रत्येक के हृदय मेंनिवास करने वाले भगवान्‌ का प्रत्यक्ष दर्शन कर सके और इसका अनुभव कर सके कि उनमेंतथा भगवान्‌ में, गुण के अनुसार, कोई अन्तर नहीं है।

अन्यस्यामपि जायायां त्रयः पुत्रा आसच्रुत्तमस्तामसो रैवत इति मन्वन्तराधिपतय: ॥

२८॥

अन्यस्थाम्‌--अन्य; अपि-- भी; जायायाम्‌--स्त्री से; त्रय:ः--तीन; पुत्रा:--पुत्र; आसन -- थे; उत्तम: तामसः रैवत:--उत्तम,तामस तथा रैवत; इति--इस प्रकार; मनु-अन्तर--मन्वन्तर कल्प के; अधिपतय:--शासक ।

महाराज प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से तीन पुत्र उत्पन्न हुए जिनके नाम उत्तम, तामस तथा रैवतथे।

बाद में इन्होंने मनवन्तर कल्पों का भार सँभाला।

एवमुपशमायनेषु स्वतनयेष्वथ जगतीपतिज॑गतीमर्बुदान्येकादशपरिवत्सराणामव्याहताखिलपुरुषकारसारसम्भूतदोर्दण्डयुगलापीडितमौवीगुणस्तनितविरमितधर्म प्रतिपक्षोब्हिष्पत्याश्वानुदिनमेधमानप्रमोदप्रसरणयौषिण्यत्रीडाप्रमुषितहासावलोकरूचिरक्ष्वेल्यादिभि:'पराभूयमानविवेक इवानवबुध्यमान इव महामना बुभुजे ॥

२९॥

एवम्‌--इस प्रकार; उपशम-अयनेषु--सभी सुयोग्य; स्व-तनयेषु-- अपने पुत्रों में से; अथ--तत्पश्चात्‌; जगती-पति:--ब्रह्माण्डके स्वामी; जगतीम्‌--ब्रह्माण्ड को; अर्बुदानि--अर्बुद ( १९०,००,००,००० की संख्या ); एकादश- ग्यारह; परिवत्सराणाम्‌--वर्षो का; अव्याहत--बिना रोकटोक के; अखिल--विश्वव्यापी; पुरुष-कार--शौर्य ; सार--शक्ति; सम्भृत--प्रदत्त; दोः-दण्ड:--बलिष्ठ भुजाओं वाले; युगल--दो; आपीडित--खींची गई; मौर्वी-गुण-- धनुष की डोरी; स्तनित--टंकार से;विरमित--पराजित; धर्म--धार्मिक नियम; प्रतिपक्ष:--विपक्षी; बर्हिष्मत्या:--अपनी पत्नी बर्हिष्मती का; च--तथा;अनुदिनम्‌-- प्रतिदिन; एधमान--वर्धमान; प्रमोद--मनोरंजन; प्रसरण--सुशीलता, सौजन्य; यौषिण्य--स्त्रियोचित व्यवहार;ब्रीडा--लज्जा से; प्रमुषित--संकुचित; हास--हँसी, हास्य; अवलोक--चितवन; रुचिर--मनोहर; क्वेलि-आदिभि: --विनोदइत्यादि; पराभूयमान--पराजित होकर; विवेक:-- अपने वास्तविक ज्ञान; इब--सहृश; अनवबुध्यमान: --विवेकहीन व्यक्ति;इब--सहश; महा-मना:--महान्‌ आत्मा; बुभुजे--राज्य किया, भोगा।

इस प्रकार से कवि, महावीर तथा सवन के परमहंस अवस्था में भलीभाँति प्रशिक्षित हो जानेपर महाराज प्रियब्रत ने ग्यारह अर्बुद वर्षों तक ब्रह्माण्ड पर शासन किया।

जिस समय वे अपनीबलशाली भुजाओं से धनुष की डोरी खींच कर तीर चढ़ा लेते थे उस समय धार्मिक जीवन केनियमों को न मानने वाले उनके विपक्षी विश्वपर शासन करने के उनके अद्वितीय शौर्य से डर करन जाने कहाँ भाग जाते थे।

वे अपनी पतली बर्तहिष्मती को अगाध प्यार करते थे और समय बीतनेके साथ ही उनका प्रणय भी बढ़ता गया।

अपनी स्त्रियोचित वेशभूषा, उठने-बैठने, हँसी तथा चितवन से महारानी बर्दिष्मती उन्हें शक्ति प्रदान करती थी।

इस प्रकार महात्मा होते हुए भी वेअपनी पतली के स्त्री-उच्चित व्यवहार में खो गये।

वे उसके साथ सामान्य पुरुष-सा आचरणकरते, किन्तु वे वास्तव में महान्‌ आत्मा थे।

यावदवभासयति सुरगिरिमनुपरिक्रामन्भगवानादित्यो वसुधातलमर्धेनैव प्रतपत्यर्थेनावच्छादयति तदा हिभगवदुपासनोपचितातिपुरुषप्रभावस्तदनभिनन्दन्समजवेन रथेन ज्योतिर्मयेन रजनीमपि दिन करिष्यामीतिसप्तकृत्वस्तरणिमनुपर्यक्रामद्द्‌वतीय इब पतड़: ॥

३०॥

यावत्‌--जब तक; अवभासयति--प्रकाश देता है; सुर-गिरिम्‌--सुमेरु पर्वत की; अनुपरिक्रामन्‌--परिक्रमा करते हुए;भगवान्‌--परम शक्तिमान; आदित्य: --सूर्यदेव; वसुधा-तलम्‌--अधोलोक पर; अर्धन--आधे से; एव--निश्चय ही; प्रतपति--तप्त करता है; अर्धेन--आधे से; अवच्छादयति-- अँधेरे से ढके रहता है, अँधेरा करता है; तदा--उस समय; हि--निश्चय ही;भगवत्ू-उपासना-- भगवान्‌ की उपासना द्वारा; उपचित--उन्‍्हें पूरी तरह प्रसन्न करके; अति-पुरुष-- परम पुरुष; प्रभाव:--प्रभाव; तत्‌ू--वह; अनभिनन्दन्‌--बिना प्रशंसा किये; समजवेन--समान बलशाली के द्वारा; रथेन--रथ पर; ज्योति: -मयेन--ज्योतिर्मय, प्रकाशवान्‌; रजनीम्‌--रात्रि को; अपि-- भी; दिनमू--दिन; करिष्यामि--बना दूँगा; इति--इस प्रकार; सप्त-कृत्‌--सात बार; वस्तरणिम्‌--सूर्य की कक्ष्या का अनुगमन करते हुए; अनुपर्यक्रामत्‌--परिक्रमा करते हुए; द्वितीय: --दूसरा; इब--सहश; पतड्र:--सूर्य |

इस प्रकार सुचारु रूप से राज्य करते हुए राजा प्रियत्रत एक बार परम बलशाली सूर्यदेव कीपरिक्रमा से असन्तुष्ट हो गये।

सूर्यदेव अपने रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करतेहुए समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं, किन्तु जब सूर्य उत्तर दिशा में रहता है, तो दक्षिण भागको कम प्रकाश मिलता है और जब सूर्य दक्षिण दिशा में रहता है, तो उत्तर भाग को कम प्रकाशमिलता है।

राजा प्रियत्रत को यह स्थिति नहीं भायी इसलिए उन्होंने संकल्प किया कि ब्रह्माण्डके उस भाग में जहाँ रात्रि है, वहाँ वे दिन कर देंगे।

उन्होंने एक प्रकाशमान रथ पर चढ़करसूर्यदेव की कक्ष्या का पीछा करके अपनी इच्छा पूर्ण की।

वे ऐसे विस्मपजनक कार्यकलापइसीलिए कर पाये, क्योंकि उन्होंने भगवान्‌ की उपासना के द्वारा शौर्य अर्जित किया था।

ये वा उ ह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखातास्ते सप्त सिन्धव आसन्यत एव कृताः सप्त भुवो द्वीपा: ॥

३१॥

ये--वे; वा उ ह--निश्चय ही; तत्‌-रथ--उस रथ के; चरण--पहियों की; नेमि--परिधि से; कृत--बने हुए; परिखाता: --खाइयाँ ( गड्ढे ); ते--वे; सप्त--सात; सिन्धव:--सागर; आसनू--हो गये; यत:--जिसके कारण; एब--निश्चय ही; कृता:--बने हुये; सप्त--सात; भुव:--भूमण्डल के ; द्वीपा:--ट्वीप |

जब प्रियवत्रत ने अपना रथ सूर्य के पीछे हाँका, तो उनके रथ के पहियों की परिधि से जोचिह्न बन गये वे ही बाद में सात समुद्र हो गये और भूमण्डल सात द्वीपों में विभाजित हो गया।

जम्बूप्लक्षशाल्मलिकुशक्रौज्ञशाक पुष्करसंज्ञास्तेषां परिमाणं पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो यथासड्ख्यंद्विगुणमानेन बहि: समन्तत उपक्रिप्ता: ॥

३२॥

जम्बू--जम्बू; प्लक्ष-प्लक्ष; शाल्मलि--शाल्मलि; कुश--कुश; क्रौद्ध-क्रौंच; शाक--शाक; पुष्कर--पुष्कर; संज्ञा:--जाने जाते हैं; तेषाम्‌ू--उनमें से; परिमाणम्‌--परिमाप; पूर्वस्मात्‌ पूर्वस्मात्‌--अपने से पूर्व वाले से; उत्तर: उत्तर: --बाद वाले;यथा--क्रमानुसार; सड्ख्यम्‌--संख्या; द्वि-गुण--दो गुना; मानेन--माप से; बहि:--बाहर; समन्तत:--चारों ओर;उपक्रिप्ता:--उत्पन्न किया।

(सात ) द्वीपों के नाम हैं--जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्कर।

प्रत्येकद्वीप अपने से पहले वाले द्वीप से आकार में दुगुना है और एक तरल पदार्थ से घिरा है, जिसकेआगे दूसरा द्वीप है।

क्षारोदेक्षुससोदसुरोदघृतोदक्षीरोददधिमण्डोदशुद्धोदा: सप्त जलधय: सप्त द्वीपपरिखाइवाभ्यन्तरद्वीपसमाना एकैकश्येन यथानुपूर्व सप्तस्वपि बहिद्वपेषु पृथक्परित उपकल्पितास्तेषुजम्ब्वादिषु बर्हिष्मतीपतिरनुव्रतानात्मजानाग्नीश्नेध्मजिहयज्ञबाहुहिरण्यरेतोघृतपृष्ठमे धातिधिवीतिहोत्रसंज्ञान्यथास ड्ख्येनेकैकस्मिन्नेकमेवाधिपतिं विदधे ॥

३३॥

क्षार--लवण, खारे; उद--जल; इक्षु-गरस--गन्ने का रस; उद--जल; सुरा--मदिरा; उद-- जल; घृत--घी; उद--जल; क्षीर--दुग्ध; उद--जल; दधि-मण्ड--मट्ठा; उद--जल; शुद्ध-उदा:--तथा पेय जल; सप्त--सात; जल-धय:--सागर; सप्त--सात;द्वीप--द्वीप; परिखा:ः--खाइयाँ; इब--सहृश्य; अभ्यन्तर-- भीतरी; द्वीप--द्वीप; समाना:--के तुल्य; एक-एकश्येन--एक केबाद दूसरा; यथा-अनुपूर्वम्‌-क्रमानुसार; सप्तसु--सात; अपि--यद्यपि; बहि:--बाह्द; द्वीपेषु--द्वीपों में; पृथक्‌ -- अलग;परितः--चारों ओर; उपकल्पिता: --स्थित; तेषु--उनमें से; जम्बू-आदिषु--जम्बूद्वीप तथा अन्य द्वीप; बर्हिष्मती--बर्हिष्मती का;'पति:ः--पति; अनुव्रतान्‌ू--जो पिता के नियमों का पालन करने वाले थे; आत्म-जानू--पुत्रों को; आग्नीक्च-इध्मजिह्न-यज्ञबाहु-हिरण्यरेत:-घृतपृष्ठ-मेधातिथि-बीतिहोत्र-संज्ञानू-- आग्नी क्र, इध्मजिह्न, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, मेधातिथि, बीतिहोत्र नामवाले; यथा-सड्ख्येन--क्रमानुसार; एक-एकस्मिन्‌-- प्रत्येक द्वीप में; एकम्‌--एक; एब--निश्चय ही; अधि-पतिम्‌ू--राजा;विदधे--बना दिया।

ये सातों समुद्र क्रमशः खारे जल, ईख के रस, सुरा, घृत, दुग्ध, मट्ठा तथा मीठे पेय जल सेपूर्ण हैं।

सभी द्वीप इन सागरों से पूर्णतया घिरे हैं और प्रत्येक समुद्र घिरे हुए द्वीप के समान चौड़ाहै।

रानी बर्हिष्मती के पति महाराज प्रियव्रत ने इन द्वीपों का एकक्षत्र राज्य अपने पुत्रों को दे दियाजिनके नाम क्रमश: आग्नीक्च, इध्मजिह्न, यज्ञबाहु, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, मेधातिथि तथा बीतिहोत्रथे।

इस प्रकार अपने पिता के आदेश से ये सभी राजा बन गये।

दुहितरं चोर्जस्वतीं नामोशनसे प्रायच्छद्यस्थामासीद्देवयानी नाम काव्यसुता, ॥

३४॥

दुहितरम्‌-पुत्री; च--भी; ऊर्जस्वतीम्‌--ऊर्जस्वती; नाम--नामक; उशनसे --महर्षि उशना ( शुक्राचार्य ) को; प्रायच्छत्‌ू--देदिया; यस्याम्‌--जिससे; आसीत्‌-- थी ( उत्पन्न हुई ); देवबानी--देवयानी; नाम--नामक; काव्य-सुता--शुक्राचार्य की पुत्री |

उसके बाद राजा प्रियत्रत ने अपनी पुत्र ऊर्जस्वती का विवाह शुक्राचार्य से कर दिया,जिसके गर्भ से देवयानी नामक पुत्री उत्पन्न हुई।

नैवंविध: पुरुषकार उरूक्रमस्यपुंसां तदड्घ्रिरजसा जितषड्गुणानाम्‌ ।

चित्र विदूरविगत: सकृदाददीतयन्नामधेयमधुना स जहाति बन्धम्‌ ॥

३५॥

न--नहीं; एवम्‌-विध:--इस प्रकार; पुरुष-कार:--अपना प्रभाव; उरुू-क्रमस्थ-- भगवान्‌ का; पुंसाम्‌ू-- भक्तों का; ततू-अड्ध्रि--उनके चरणारविन्द की; रजसा-- धूलि से; जित-षट्‌-गुणानाम्‌-- जिन्होंने छः प्रकार के विकारों को जीत लिया है;चित्रमू--विस्मयजनक ; विदूर-विगत:--अस्पृश्य, पंचम वर्ण का व्यक्ति; सकृतू--एक बार; आददीत--यदि उच्चारण करे तो;यत्‌--जिसका; नामधेयम्‌--पवित्र नाम; अधुना--तुरन्त; सः--वह; जहाति--त्याग देता है; बन्धम्‌-- भौतिक बन्धन।

हे राजन, जिस भक्त ने भगवान्‌ के चरणारविन्दों की धूलि में शरण ली है, वह षड््‌ विकारोंअर्थात्‌ भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु के प्रभाव तथा मन समेत छहों इन्द्रियों को जीतसकता है।

किन्तु भगवान्‌ के शुद्ध भक्त के लिए यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं क्योंकि चारोंवर्णों से बाहर का व्यक्ति अर्थात्‌ अस्पृश्य व्यक्ति भी भगवान्‌ के नाम का एक बार उचार करलेने मात्र से भौतिक बन्धनों से तुरन्त छूट जाता है।

स एवमपरिमितबलपराक्रम एकदा तु देवर्षिचरणानुशयनानुपतितगुणविसर्गसंसगेंणानिर्वृतमिवात्मानंमन्यमान आत्मनिर्वेद इदमाह ॥

३६॥

सः--वह ( महाराज प्रियत्रत ); एवम्‌--इस प्रकार; अपरिमित--अद्वितीय; बल--शक्ति; पराक्रम:--जिसका प्रभाव; एकदा--एक बार; तु--तब; देव-ऋषि--महामुनि नारद के; चरण-अनुशयन---चरणकमलों में समर्पण; अनु--तत्पश्चात्‌; पतित--गिराहुआ; गुण-विसर्ग--विषयों के ( तीन गुणों से उत्पन्न ); संसर्गेण--सम्पर्क होने से; अनिर्वृतम्‌--असंतुष्ट; इब--सहश;आत्मानम्‌ू--अपने आपको; मन्यमान: --इस प्रकार सोचते हुए; आत्म--स्वयं; निर्वेद:--त्यागमय; इृदम्‌--यह; आह--कहा |

इस प्रकार अपने पूर्ण पराक्रम तथा प्रभाव से भौतिक ऐश्वर्य का भोग करते हुए महाराजप्रियत्रत एक बार यह सोचने लगे कि यद्यपि मैं महामुनि नारद के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुकाथा और वास्तव में कृष्णभावनामृत के मार्ग पर था, किन्तु मैं अब न जाने क्‍यों फिर से भौतिककार्यो के बन्धन में फँस गया हूँ।

इस प्रकार उनका मन अशान्त हो उठा।

वे विरक्त होकर बोलने अहो असाध्वनुष्ठटितं यदभिनिवेशितोहमिन्द्रियरविद्यारचितविषमविषयान्धकूपे तदलमलममुष्या वनितायाविनोदमृगं मां धिग्धिगिति गहयां चकार ॥

३७॥

अहो--ओह; असाधु--अच्छा नहीं; अनुष्ठितम्‌ू--हुआ; यत्‌--क्योंकि; अभिनिवेशित: --पूर्णतया निमग्न; अहम्‌--ैं;इन्द्रियैः--इन्द्रिय-भोग के लिए; अविद्या--अज्ञान से; रचित--बनाया हुआ; विषम--दुखदायी; विषय--इन्द्रियभोग; अन्ध-कूपे--अँधेरे कुएँ में; ततू--वह; अलम्‌--तुच्छ; अलम्‌--महत्त्वहीन या अधम का; अमुष्या:--उस; वनिताया:--पत्नी का;विनोद-मृगम्‌--नाचते हुए बन्दर की तरह; माम्‌--मुझको; धिक्‌-घधिक्कार है; धिक्‌-धिक्कार है; इति--इस प्रकार; गह॑याम्‌--आलोचना; चकार--की |

राजा ने अपनी भर्त्सना इस प्रकार की--ओह! इन्द्रिय-भोग के कारण मैं कितना धिक्काराजाने योग्य हो गया हूँ।

मैं अब भौतिक सुख के अंधकूप में गिर गया हूँ।

बहुत हुआ! अब मुझेऔर भोग नहीं चाहिए।

तनिक मेरी ओर देखो--मैं कैसे अपनी पतली के हाथों में नाचने वालाबन्दर बन गया हूँ।

इसलिए मुझे धिक्कार है।

परदेवताप्रसादाधिगतात्मप्रत्यवमरशें नानुप्रवृत्ते भ्य: पुत्रेभ्य इमां यथादायं विभज्य भुक्तभोगां च महिषींमृतकमिव सह महाविभूतिमपहाय स्वयं निहितनिर्वेदो हदि गृहीतहरिविहारानुभावो भगवतो नारदस्य'पदवीं पुनरेवानुससार ॥

३८॥

पर-देवता-- भगवान्‌ के; प्रसाद--अनुग्रह से; अधिगत--प्राप्त किया; आत्म-प्रत्यवमर्शेन-- आत्म-साक्षात्कार से;अनुप्रवृत्ते भ्य:--जो उसके पथ का सही सही अनुसरण करता है; पुत्रेभ्य:--अपने पुत्रों को; इमाम्‌--यह पृथ्वी; यथा-दायम्‌--उत्तराधिकार के अनुसार; विभज्य--बाँटकर; भुक्त-भोगाम्‌--जिसका भोग अनेक प्रकार से किया; च-- भी; महिषीम्‌--रानी;मृतकम्‌ इब--मृत शरीर की भाँति; सह--सहित; महा-विभूतिम्‌--परम ऐ श्वर्य; अपहाय--त्याग कर; स्वयम्‌--स्वयं; निहित--पूर्णतया ग्रहण किया हुआ; निर्वेद:--त्याग; हृदि--हृदय में; गृहीत--स्वीकार किया; हरि-- भगवान्‌ की; विहार--लीलाएँ;अनुभाव: --ऐसे भाव में; भगवत:ः--परम साधु पुरुष का; नारदस्य--नारद मुनि का; पदवीम्‌--पद; पुन:ः--फिर; एब--निश्चयही; अनुससार-- अनुसरण करने लगा।

भगवान्‌ के अनुग्रह से महाराज प्रियत्रत का विवेक पुनः जाग्रत हो उठा।

उन्होंने अपनी सारीसम्पत्ति अपने आज्ञाकारी पुत्रों में बाँट दी।

अपनी पत्ती को जिसके साथ उन्होंने इन्द्रियसुख भोगाथा और प्रभूत ऐश्वर्यशाली राज्य सहित सब कुछ त्याग कर वे सभी प्रकार की आसक्ति से रहितहो गये।

विमल हो जाने से उनका हृदय भगवान्‌ की लीलाओं का स्थल बन गया।

इस प्रकार वेकृष्णभावनामृत के पथ पर पुनः लौट आये और महामुनि नारद के अनुग्रह से जिस पद को प्राप्तकिया था उसको फिर से धारण किया।

तस्य ह वा एते एलोकाः--प्रियव्रतकृतं कर्म को नु कुर्य द्विनेश्वरम्‌ ।

यो नेमिनिम्नैरकरोच्छायां घ्नन्सप्त वारिधीन्‌ ॥

३९॥

तस्य--उसका; ह वा--निश्चय ही; एते--ये सब; श्लोका:--श्लोक; प्रियत्रत--राजा प्रियत्रत द्वारा; कृतम्‌ू--किये हुए; कर्म --कर्म; कः--कौन; नु--तब; कुर्यात्‌ू--कर सकता है; विना--बिना; ई श्वरम्‌-- श्रीभगवान्‌; यः --जिसने; नेमि-- अपने रथ के'पहियों की परिधि के; निम्नैः--पहियों के दाब से; अकरोत्‌--कर दिया; छायाम्‌-- अंधकार; घ्नन्‌ू--दूर करते हुए; सप्त--सात; वारिधीन्‌--समुद्रों को?

महाराज प्रियत्रत के कर्मों से सम्बन्धित अनेक श्लोक प्रसिद्ध हैं--'जो कुछ महाराजप्रियत्रत ने किया उसे भगवान्‌ के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं कर सकता था।

उन्होंने रात्रि केअंधकार को दूर किया और अपने रथ के पहियों की नेमी से सात समुद्र बना दिये।

भूसंस्थानं कृतं येन सरिद््‌गरिवनादिभि: ।

सीमा च भूतनिर्व॑त्यै द्वीपे द्वीपी विभागशः ॥

४०॥

भू-संस्थानम्‌--पृथ्वी की स्थिति; कृतम्‌--बनी; येन--जिसके द्वारा; सरितू--नदियों से; गिरि--पर्वतों से; वन-आदिभि:--वनआदि से; सीमा--सीमा रेखाएँ; च-- भी; भूत--विभिन्न राष्ट्रों का; निर्व॒त्य--लड़ाई रोकने के लिए; द्वीपे द्वीपि--विभिन्न द्वीपोंमें; विभागशः--पृथक्‌-पृथक्‌ ।

विभिन्न लोगों में पारस्परिक झगड़ों को रोकने के लिए महाराज प्रियब्रत ने नदियों, पर्वतोंके किनारों तथा वनों के द्वारा राज्यों की सीमाएँ निर्धारित कीं, जिससे कोई एक दूसरे कीसम्पत्ति में घुस न सके।

भौम॑ दिव्यं मानुषं च महित्वं कर्मयोगजम्‌ ।

यश्चक्रे निरयौपम्यं पुरुषानुजनप्रिय: ॥

४१॥

भौमम्‌--अधोलोक के; दिव्यम्‌--स्वर्ग के; मानुषम्‌--मनुष्यों के; च--भी; महित्वम्‌--समस्त ऐश्वर्य; कर्म--कर्म द्वारा;योग--योग द्वारा; जम्‌--उत्पन्न; य:--जिसने; चक्रे--किया; निरय--नरक से; औपम्यम्‌--उपमा अथवा समानता; पुरुष--भगवान्‌ के; अनुजन-- भक्त को; प्रिय:--अत्यन्त प्यारा |

नारद मुनि के महान्‌ अनुयायी तथा भक्त महाराज प्रियत्रत ने अपने सकाम कर्मों तथा योगसे प्राप्त किये गये समस्त ऐश्वर्य को, चाहे वह स्वर्गलोग, अधोलोक अथवा मानव समाज काहो, नरक तुल्य समझा।

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