← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय आठ: ध्रुव महाराज जंगल के लिए घर छोड़ देते हैं
4.8मैत्रेय उवाचसनकाद्या नारदश्च ऋभुर्हसोरुणियति: ।
नैतेगृहान्ब्रहासुताह्यावसन्नूध्वरितस: ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; सनक-आद्या:--सनक इत्यादि; नारद:--नारद; च--तथा; ऋभुः--ऋशभु; हंस:--हंस;अरुणि:--अरुणि; यतिः--यति; न--नहीं; एते--ये सब; गृहान्ू--घर पर; ब्रह्म-सुता: --ब्रह्मा के पुत्र; हि--निश्चय ही;आवसनू--निवास किया; ऊर्ध्व-रेतस:--नैष्ठिक ब्रह्मचारी |
मैत्रेय ऋषि ने कहा : सनकादि चारों कुमार और नारद, ऋभु, हंस, अरुणि तथा यति--ब्रह्मा के ये सारे पुत्र घर पर न रहकर ( गृहस्थ नहीं बने ) नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए।
"
मृषाधर्मस्य भार्यासीहम्भं मायां च शत्रुहन् ।
असूत मिथुन तत्तु निरृतिर्जगूहेडप्रज: ॥
२॥
मृषा--मृषा; अधर्मस्य--अधर्म का; भार्या--स्त्री; आसीत्-- थी; दम्भम्--झूठा गर्व; मायाम--ठगना; च--तथा; शत्रु-हन्--हेशत्रुओं के संहारक; असूत--उत्पन्न किया; मिथुनम्--जुडवाँ; तत्ू--वह; तु-- लेकिन; निरृतिः:--निरऋति; जगूहे--ग्रहणकिया; अप्रज:--सन्तानहीन |
ब्रह्मा का अन्य पुत्र अधर्म था जिसकी पत्नी का नाम मृषा था।
उनके संयोग से दो असुर हुएजिनके नाम दम्भ अर्थात धोखेबाज तथा माया अर्थात ठगिनी थे।
इन दोनों को निरऋति नामकअसुर ले गया, क्योंकि उसके कोई सन्तान न थी।
"
तयो: समभवल्लोभो निकृतिश्च महामते ।
ताभ्यां क्रोधश्व हिंसा च यहुरुक्ति: स््वसा कलिः ॥
३॥
तयो:--वे दोनों; समभवत्--उत्पन्न हुए; लोभ:--लोभ, लालच; निकृतिः:--चालाकी; च--तथा; महा-मते--हे महापुरुष;ताभ्यामू--उन दोनों से; क्रोध:--क्रोध; च--तथा; हिंसा--हिंसा; च--तथा; यत्--जिन दोनों से; दुरुक्ति:--कटु वचन;स्वसा--बहन; कलि:--कलि |
मैत्रेय ने विदुर से कहा : हे महापुरुष, दम्भ तथा माया से लोभ और निकृति ( चालाकी )उत्पन्न हुए।
उनके संयोग से क्रोध और हिंसा और फिर इनकी युति से कलि तथा उसकी बहिनदुरुक्ति उत्पन्न हुए।
"
दुरुक्तौ कलिराधत्त भयं मृत्युं च सत्तम ।
तयोश्व मिथुनं जज्ञे यातना निरयस्तथा ॥
४॥
दुरुक्तौ--दुरुक्ति से; कलि:ः--कलि; आधचत्त--उत्पन्न किया; भयम्-- भय; मृत्युम्-मृत्यु; च--तथा; सत्-तम--हे उत्तमपुरुषों में श्रेष्ठ; तयो:--उन दोनों के; च--तथा; मिथुनम्--संयोग से; जज्ञे--उत्पन्न हुए; यातना--अत्यधिक पीड़ा; निरय:--नरक; तथा--और भी |
हे श्रेष्ठ पुरुषों में महान्, कलि तथा दुरुक्ति से मृत्यु तथा भीति नामक सन्तानें उत्पन्न हुईं।
फिरइनके संयोग से यातना और निरय ( नरक ) उत्पन्न हुए।
"
सड्ग्रहेण मयाख्यातः प्रतिसर्गस्तवानघ ।
त्रि: श्रुत्वैतत्पुमान्पुण्यं विधुनोत्यात्मनो मलम् ॥
५॥
सड़ग्रहेण--संक्षेप में; मया--मेरे द्वारा; आख्यात:--कहा गया है; प्रतिसर्ग:--प्रलय का कारण; तब--तुम्हारा; अनघ--हेशुद्ध; त्रिः--तीन बार; श्रुत्वा--सुनकर; एतत्--वर्णन; पुमान्--वह जो; पुण्यम्--पुण्य; विधुनोति-- धो देता है; आत्मन:--आत्मा का; मलमू--मल, कल्मष।
हे विदुर, मैंने संक्षेप में प्रलय के कारणों का वर्णन किया।
जो इस वर्णन को तीन बारसुनता है उसे पुण्य लाभ होता है और उसके आत्मा का पापमय कल्मष धुल जाता है।
"
अथात:ः कीर्ततये वंशं पुण्यकीतें: कुरूद्रह ।
स्वायम्भुवस्यापि मनोहरेरंशांशजन्मन: ॥
६॥
अथ--अब; अत:--इसके बाद; कीर्तये--वर्णन करूँगा; वंशम्--वंश; पुण्य-कीर्ते:--पुण्य गुणों के लिए विख्यात; कुरु-उद्दद-हे कुरु श्रेष्ठ; स्वायम्भुवस्य--स्वायं भुव का; अपि-- भी; मनो:--मनु का; हरे: -- श्रीभगवान् का; अंश--विस्तार;अंश--का भाग; जन्मन:--जन्मा हुआ
मैत्रेय ने आगे कहा : हे कुरु श्रेष्ठ अब मैं आपके समक्ष स्वायंभुव मनु के वंशजों का वर्णनकरता हूँ जो भगवान् के अंशांश के रूप में उत्पन्न हुए थे।
"
प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापते: सुतौ ।
वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगत: स्थितौ ॥
७॥
प्रियत्रत--प्रियव्रत; उत्तानपादौ--उत्तानपाद; शतरूपा-पते:--रानी शतरूपा तथा उनके पति का; सुतौ--दो पुत्र; वासुदेवस्थ--भगवान् का; कलया--अंश से; रक्षायाम्--रक्षा के लिए; जगत:--संसार के; स्थितौ--पालन के लिए
स्वायंभुव मनु को अपनी पत्नी शतरूपा से दो पुत्र हुए जिनके नाम थे--उत्तानपाद तथाप्रियत्रत।
चूँकि ये दोनों श्रीभगवान् वासुदेव के अंश के वंशज थे, अतः वे ब्रह्माण्ड का शासनकरने और प्रजा का भलीभाँति पालन करने में सक्षम थे।
"
जाये उत्तानपादस्य सुनीति: सुरुचिस्तयो: ।
सुरुचि: प्रेयसी पत्युर्नेतरा यत्सुतो श्रुवः ॥
८॥
जाये--दोनों पत्नियों के; उत्तानपादस्य--उत्तानपाद की; सुनीति: --सुनीति; सुरुचि: --सुरुचि; तयो: --उन दोनों से; सुरुचि: --सुरुचि; प्रेयसी--अत्यन्त प्रिय; पत्यु:--पति की; न इतरा--दूसरी वाली नहीं; यत्--जिसका; सुत:--पुत्र; ध्रुव: -- ध्रुव |
उत्तानपाद के दो रानियाँ थीं--सुनीति तथा सुरुचि।
इनमें से सुरुचि राजा को अत्यन्त प्रियथी।
सुनीति, जिसका पुत्र ध्रुव था, राजा को इतनी प्रिय न थी।
"
एकदा सुरुचेः पुत्रमड्डमारोप्य लालयन् ।
उत्तमं नारुरुक्षन्तं श्रुवं राजाभ्यनन्दत ॥
९॥
एकदा--एक बार; सुरुचे:--सुरुचि के; पुत्रमू--पुत्र को; अड्डमू-गोद में; आरोप्य--बैठा कर; लालयनू--दुलारते हुए;उत्तममू--उत्तम; न--नहीं; आरुरुक्षन्तम्-चढ़ने का प्रयास करता; ध्रुवम्-ध्रुव का; राजा--राजा ने; अभ्यनन्दत--स्वागतकिया।
एक बार राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को अपनी गोद में लेकर सहला रहे थे।
ध्रुवमहाराज भी राजा की गोद में चढ़ने का प्रयास कर रहे थे, किन्तु राजा ने उन्हें अधिक दुलार नहींदिया।
"
तथा चिकीर्षमाणं त॑ सपत्यास्तनयं श्रुवम् ।
सुरुचि: श्रृण्वतो राज्ञः सेर्ष्यमाहातिगर्विता ॥
१०॥
तथा--इस प्रकार; चिकीर्षमाणम्--चढ़ने के लिए प्रयलशील बालक श्लुव; तम्--उस; स-पत्या:--अपनी सौत ( सुनीति ) का;तनयम्--पुत्र; ध्रुवम्-- ध्रुव को; सुरुचि: --सुरुचि ने; श्रृण्वत:--सुनता हुआ; राज्ञ:--राजा का; स-ईर्ष्चम्--ईष्या से; आह--कहा; अतिगर्विता--अत्यन्त घमण्ड से भरी।
जब बालक श्रुव महाराज अपने पिता की गोद में जाने का प्रयत्न कर रहे थे तो उसकीविमाता सुरुचि को उस बालक से अत्यन्त ईर्ष्या हुई और वह अत्यन्त दम्भ के साथ इस प्रकारबोलने लगी जिससे कि राजा सुन सके।
"
न वत्स नृपतेर्थिष्ण्यं भवानारोढुमहति ।
न गृहीतो मया यत्त्वं कुक्षावषि नृपात्मज: ॥
११॥
न--नहीं; वत्स--मेरे लड़के; नृपतेः --राजा का; धिष्ण्यम्ू-- आसन; भवान्--अपने आप; आरोढुम्-चढ़ने के लिए; अर्हति--योग्य; न--नहीं; गृहीतः--लिया गया; मया--मेरे द्वारा; यत्--क्योंकि; त्वम्-तुम; कुक्षौ--गर्भ में; अपि--यद्यपि; नृप-आत्मज:--राजा का पुत्र |
सुरुचि ने ध्रुव महाराज से कहा : हे बालक, तुम राजा की गोद या सिंहासन पर बैठने केयोग्य नहीं हो।
निस्सन्देह, तुम भी राजा के पुत्र हो, किन्तु तुम मेरी कोख से उत्पन्न नहीं हो, अतःतुम अपने पिता की गोद में बैठने के योग्य नहीं हो।
"
बालोसि बत नात्मानमन्यस्त्रीगर्भसम्भृतम् ।
नूनं वेद भवान्यस्य दुर्लभेर्थे मनोरथ: ॥
१२॥
बाल:--बालक; असि--हो; बत--फिर भी; न--नहीं; आत्मानम्--मेरे; अन्य--दूसरी; स्त्री--स्त्री; गर्भ--गर्भ; सम्भूृतम्-सेउत्पन्न; नूममू--फिर भी; वेद--जानने का प्रयत्त करो; भवान्--अपने आप; यस्य--जिसका; दुर्लभे--अप्राप्य; अर्थे--वस्तु;मनः-रथ:--इच्छुक
मेरे बालक, तुम्हें पता नहीं कि तुम मेरी कोख से नहीं, वरन् दूसरी स्त्री से उत्पन्न हुए हो।
अतः तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है।
तुम ऐसी इच्छा की पूर्ति चाह रहे होजिसका पूरा होना असम्भव है।
"
तपसाराध्य पुरुष तस्यैवानुग्रहेण मे ।
गर्भ त्वं साधयात्मानं यदीच्छसि नृपासनम् ॥
१३॥
तपसा--तपस्या से; आराध्य--सन्तुष्ट करके; पुरुषम्-- भगवान्; तस्थ--उसकी; एव--केवल; अनुग्रहेण --कृपा से; मे--मेरे;गर्भ--गर्भ में; त्वम्ू--तुम; साधय--प्रस्थापित करो; आत्मानम्ू-- अपने को; यदि--यदि; इच्छसि--चाहते हो; नृप-आसनमू--राजा के सिंहासन पर
यदि तुम राजसिंहासन पर बैठना चाहते हो तो तुम्हें कठिन तपस्या करनी होगी।
सर्वप्रथमतुम्हें भगवान् नारायण को प्रसन्न करना होगा और वे तुम्हारी पूजा से प्रसन्न हो लें तो तुम्हें अगलाजन्म मेरे गर्भ से लेना होगा।
"
मैत्रेय उवाचमातु: सपल्याः स दुरुक्तिविद्धःश्रसन्रुषा दण्डहतो यथाहिः ।
हित्वा मिषन्तं पितरं सन्नवा्च॑जगाम मातु: प्ररुदन््सकाशम् ॥
१४॥
मैत्रेय:ः उवाच--महामुनि मैत्रेय ने कहा; मातुः--अपनी माता की; स-पत्या:--सौत का; सः--वह; दुरुक्ति--कटु बचनों से;विद्धः--विंध कर; श्वसन्--तेजी से साँस लेता; रुषा--रोष से; दण्ड-हतः--डंडे से मारा गया; यथा--जिस प्रकार; अहिः--सर्प; हित्वा--त्याग कर; मिषन्तम्--केवल ऊपर देखता; पितरम्--अपना पिता; सन्न-वाचम्ू--मौन; जगाम--चला गया;मातु:--अपनी माता के; प्ररूदन्ू--रोते हुए; सकाशम्--पास |
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : हे विदुर, जिस प्रकार से लाठी से मारा गया सर्प फुफकारता है,उसी प्रकार श्रुव महाराज अपनी विमाता के कटु वचनों से आहत होकर क्रोध से तेजी से साँसलेने लगे।
जब उन्होंने देखा कि पिता मौन हैं और उन्होंने प्रतिवाद नहीं किया, तो उन्होंने तुरन्तउस स्थान को छोड़ दिया और अपनी माता के पास गये।
"
त॑ निःश्वसन्तं स्फुरिताधरोष्टसुनीतिरुत्सड़ उदूह्य बालम् ।
निशम्य तत्पौरमुखान्नितान्तंसा विव्यथे यद्गदितं सपत्या ॥
१५॥
तम्--उसको; निः श्वसन्तम्--जोर से साँस लेते; स्फुरित--कम्पित; अधर-ओएष्ठम्--नीचे तथा ऊपर के होंठ; सुनीति:--सुनीति;उत्सड़े--अपनी गोद में; उदृह्य --उठाकर; बालम्--पुत्र को; निशम्य--सुनकर; ततू-पौर-मुखात्-- अन्य पुरजनों के मुख से;नितान्तमू--सारा हाल; सा--वह; विव्यथे--दुखी हुईं; यत्--जो; गदितम्ू--कहा गया; स-पल्या--सौत द्वारा |
जब श्रुव महाराज अपनी माता के पास आये तो उनके होंठ क्रोध से काँप रहे थे और वेसिसक-सिसक कर जोर से रो रहे थे।
रानी सुनीति ने अपने लाड़ले को तुरन्त गोद में उठा लियाऔर अन्तःपुर के वासियों ने सुरुचि के जो कटु वचन सुने थे उन सबको विस्तार से कह सुनाया।
इस तरह सुनीति अत्यधिक दुखी हुई।
"
सोत्सूज्य धैर्य विललाप शोकदावाग्निना दावलतेव बाला ।
वाक्य सपत्या: स्मरती सरोजश्रिया दशा बाष्पयकलामुवाह ॥
१६॥
सा--वह; उत्सृज्य--छोड़कर; धैर्यम्--धैर्य, ढाढस; विललाप--विलाप करने लगी; शोक-दाव-अग्निना--शोक की अग्नि से;दाव-लता इब--जली हुईं पत्तियों के समान; बाला--स्त्री; वाक्यम्ू--शब्द; स-पल्या:--अपनी सौत द्वारा कहे; स्मरती--स्मरण करती; सरोज-भ्रिया--कमल के समान सुन्दर मुख; हशा--देखते हुए; बाष्प-कलाम्--रोते हुए; उबाह--कहा |
यह घटना सुनीति के लिए असह्य थी।
वह मानो दावाग्नि में जल रही थी और शोक केकारण वह जली हुई पत्ती ( बेलि ) के समान हो गई और पश्चात्ताप करने लगी।
अपनी सौत केशब्द स्मरण होने से उसका कमल जैसा सुन्दर मुख आँसुओं से भर गया और वह इस प्रकारबोली।
"
दीर्घ श्रसन्ती वृजिनस्य पारम्अपश्यती बालकमाह बाला ।
मामड्नलं तात परेषु मंस्थाभुड़े जनो यत्परदुःखदस्तत् ॥
१७॥
दीर्घम्--अत्यधिक; श्वसन्ती--साँस लेती हुई; वृजिनस्थ--संकट की; पारम्--सीमा; अपश्यती--बिना पाये; बालकम्-- अपनेपुत्र से; आह--कहा; बाला--स्त्री ने; मा--मत; अमड्लम्--अशकुन; तात--मेरे पुत्र; परेषु--अन्यों को; मंस्था:-- कामना;भु्े --भोग करता है; जन:--व्यक्ति; यत्ू--जो; पर-दुःखद:--जो दूसरों को पीड़ा पहुँचाए; तत्--वह।
वह तेजी से साँस भी ले रही थी और वह इस दुखद स्थिति का कोई इलाज ठीक नहीं ढूँढपा रही थी।
अतः उसने अपने पुत्र से कहा : हे पुत्र, तुम अन्यों के अमंगल की कामना मत करो।
जो भी दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, वह स्वयं दुख भोगता है।
"
सत्य सुरुच्याभिहितं भवान्मेयहुर्भगाया उदरे गृहीतः ।
स्तन्येन वृद्धश्न विलजते यांभार्येति वा वोढुमिडस्पतिर्माम् ॥
१८॥
सत्यम्--सत्य; सुरुच्या--सुरुचि द्वारा; अभिहितम्--कहा गया; भवान्--आपको; मे--मुझ; यत्-- क्योंकि; दुर्भगाया: --अभागी के; उदरे--गर्भ में; गृहीत:--जन्म लेकर; स्तन्येन--स्तन के दूध से; वृद्धः च--बड़ा हुआ; विलजते--लज्जा आती है;याम्ू--उसको; भार्या--पत्नी; इति--इस प्रकार; वा--अथवा; वोढुम्--स्वीकार करने के लिए; इडः-पति:--राजा; मामू--मुझको ।
सुनीति ने कहा : प्रिय पुत्र, सुरुचि ने जो कुछ भी कहा है, वह ठीक है, क्योंकि तुम्हारे पितामुझको अपनी पत्नी तो क्या अपनी दासी तक नहीं समझते, उन्हें मुझको स्वीकार करने में लज्जाआती है।
अतः यह सत्य है कि तुमने एक अभागी स्त्री की कोख से जन्म लिया है और तुम उसकेस्तनों का दूध पीकर बड़े हुए हो।
"
आतिष्ठ तत्तात विमत्सरस्त्व-मुक्त समात्रापि यदव्यलीकम् ।
आराधयाधोक्षजपादपद्ंयदीच्छसेध्यासनमुत्तमो यथा ॥
१९॥
आतिष्ठ--पालन करो; तत्--वही; तात--प्रिय पुत्र; विमत्सर: --बिना ईर्ष्या के; त्वम्--तुमको; उक्तम्--कहा गया; समात्राअपि--तुम्हारी विमाता द्वारा; यत्--जो कुछ; अव्यलीकम्--वे सत्य हैं; आराधय-- आराधना प्रारम्भ करो; अधोक्षज--सत्त्व,दिव्य पुरुष; पाद-पदम्ू--चरणकमल; यदि--यदि; इच्छसे--चाहते हो; अध्यासनम्--आसन ग्रहण करना; उत्तम:--अपनेसौतेले भाई उत्तम के साथ; यथा--जिस प्रकार |
प्रिय पुत्र, तुम्हारी विमाता सुरुचि ने जो कुछ कहा है, यद्यपि वह सुनने में कटु है, किन्तु हैसत्य।
अतः यदि तुम उसी सिंहासन पर बैठना चाहते हो जिसमें तुम्हारा सौतेला भाई उत्तम बैठेगातो तुम अपना ईर्ष्याभाव त्याग कर तुरन्त अपनी विमाता के आदेशों का पालन करो।
तुम्हें बिनाकिसी विलम्ब के पुरुषोत्तम भगवान् के चरण-कमलों की पूजा में लग जाना चाहिए।
"
यस्याड्प्रिपद्ं परिचर्य विश्व-विभावनायात्तगुणाभिपत्ते: ।
अजोडध्यतिष्ठ त्खलु पारमेष्ठयंपदं जितात्मश्वसनाभिवन्द्यम्ू ॥
२०॥
यस्य--जिसके; अड्प्रि--पाँव; पद्ममू--कमल; परिचर्य--पूजा करके; विश्व--ब्रह्माण्ड; विभावनाय--सृष्टि के लिए; आत्त--प्राप्त; गुण-अभिपत्ते:--वांछित योग्यता प्राप्त करने के लिए; अज:--अजन्मा ( ब्रह्मा ); अध्यतिष्ठत्--प्राप्त हुआ; खलु--निश्चित रूप से; पारमेष्ठय्मम्--इस ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च पद; पदम्--पद; जित-आत्म--जिसने मन को जीत लिया है; श्वसन--श्वास को साध कर; अभिवन्द्यमू-पूज्य |
सुनीति ने कहा : भगवान् इतने महान् हैं कि तुम्हारे परदादा ब्रह्मा ने मात्र उनके चरणकमलोंकी पूजा द्वारा इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने की योग्यता अर्जित की।
यद्यपि वे अजन्मा हैं औरसब जीवात्माओं में प्रधान हैं, किन्तु वे इस उच्च पद पर भगवान् की ही कृपा से आसीन हैं,जिनकी आराधना बड़े-बड़े योगी तक अपने मन तथा प्राण-वायु को रोक कर करते हैं।
"
तथा मनुर्वो भगवान्पितामहोयमेकमत्या पुरुदक्षिणर्मखै: ।
इष्ठाभिपेदे दुरवापमन्यतोभौम॑ सुख दिव्यमथापवर्ग्यम् ॥
२१॥
तथा--उसी प्रकार; मनु:--स्वायंभुव मनु; वः--तुम्हारे; भगवान्--पूज्य; पितामह:--दादा ( बाबा ); यम्ू--जिनको; एक-मत्या--एकनिष्ठ सेवा से; पुरु--महान; दक्षिणै:--दान से; मखै:--यज्ञ करने से; इश्ला--पूजा करके; अभिपेदे--प्राप्त किया;दुरवापम्--दुष्प्राप्प; अन्यतः--किसी अन्य साधन से; भौमम्ू-- भौतिक; सुखम्--सुख; दिव्यम्ू--नैसर्गिक; अथ--तत्पश्चात्;आपवर्ग्यम्ू-मुक्ति |
सुनीति ने अपने पुत्र को बताया : तुम्हारे बाबा स्वायंभुव मनु ने दान-दक्षिणा के साथ बड़े-बड़े यज्ञ सम्पन्न किये और एकनिष्ठ श्रद्धा तथा भक्ति से उन्होंने पूजा द्वारा भगवान् को प्रसन्नकिया।
इस प्रकार उन्होंने भौतिक सुख तथा बाद में मुक्ति प्राप्त करने में महान् सफलता पाईजिसे देवताओं को पूजकर प्राप्त कर पाना असंभव है।
"
तमेव वत्साश्रय भृत्यवत्सलंमुमुक्षुभिमृग्यपदाब्जपद्धतिम् ।
अनन्यभावे निजधर्मभावितेमनस्यवस्थाप्य भजस्व पूरुषम् ॥
२२॥
तम्--उसको; एबव--भी; वत्स--मेरे पुत्र; आश्रय--शरण ग्रहण करो; भृत्य-वत्सलम्-- भगवान् की, जो अपने भक्तों परअत्यन्त कृपालु हैं; मुमुक्षुभिः--जो मुक्ति की इच्छा रखने वाले हैं, वे भी; मृग्य--खोजे जाकर; पद-अब्ज--चरणकमल;पद्धतिम्--प्रणाली; अनन्य- भावे--एकान्त भाव में; निज-धर्म-भाविते--अपने मूल स्वाभाविक पद पर स्थित; मनसि--मनको; अवस्थाप्य--रखकर; भजस्व--भक्ति करते रहो; पूरुषम्--परम पुरुष |
मेरे पुत्र, तुम्हें भी भगवान् की शरण ग्रहण करनी चाहिए, क्योंकि वे अपने भक्तों परअत्यन्त दयालु हैं।
जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति चाहने वाले व्यक्ति सदैव भक्ति सहित भगवान्के चरणकमलों की शरण में जाते हैं।
अपना निर्दिष्ट कार्य करके पवित्र होकर तुम अपने हृदय मेंभगवान् को स्थिर करो और एक पल भी विचलित हुए बिना उनकी सेवा में तन््मय रहो।
"
नान््यं ततः पद्यपलाशलोचनाद्दुःखच्छिदं ते मृगयामि कञ्ञन ।
यो मृग्यते हस्तगृहीतपदायाश्रियेतरैरड़ विमृग्यमाणया ॥
२३॥
न अन्यम्--दूसरे नहीं; ततः--अतः; पद्य-पलाश-लोचनात्--कमल नेत्र वाले भगवान् से; दुःख-छिदम्--अन्यों के कष्टों कोकम करने वाला; ते--तुम्हारा; मृगयामि--खोज में हूँ; कञ्लनन-- अन्य कोई; यः--जो; मृग्यते--ढूँढता है; हस्त-गृहीत-पदाया--हाथ में कमल पुष्प लेकर; थ्रिया--सम्पत्ति की देवी; इतरैः--अन्यों से; अड्भ--मेरे पुत्र; विमृग्यमाणया--पूजित |
हे प्रिय ध्रुव, कमल के दलों जैसे नेत्रों वाले भगवान् के अतिरिक्त मुझे कोई ऐसा नहींदिखता जो तुम्हारे दुखों को कम कर सके।
ब्रह्मा जैसे अनेक देवता लक्ष्मी देवी को प्रसन्न करनेके लिए लालायित रहते हैं, किन्तु लक्ष्मी जी स्वयं अपने हाथ में कमल पुष्प लेकर परमेश्वर कीसेवा करने के लिए सदेव तत्पर रहती हैं।
"
मैत्रेय उवाचएवं सञ्जल्पितं मातुराकर्ण्यार्थागमं बच: ।
सन्नियम्यात्मनात्मानं निश्चक्राम पितु: पुरातू ॥
२४॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सझल्पितम्--परस्पर बातें करते; मातु:--माता से; आकर्ण्य--सुनकर;अर्थ-आगमम्--सार्थक; वच:--शब्द; सन्नियम्य--संयमित करके; आत्मना--मन से; आत्मानम्--अपने को; निश्चक्राम--निकल पड़े; पितु:--पिता के; पुरात्-घर से |
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा: श्रुव महाराज की माता सुनीति का उपदेश वस्तुतः उनकेमनोवांछित लक्ष्य को पूरा करने के निमित्त था, अतः बुद्धि तथा दृढ़ संकल्प द्वारा चित्त कासमाधान करके उन्होंने अपने पिता का घर त्याग दिया।
"
नारदस्तदुपाकर्णयय ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् ।
स्पृष्ठा मूर्धन्यघघ्नेन पाणिना प्राह विस्मित: ॥
२५॥
नारदः--नारद मुनि ने; तत्--वह; उपाकर्ण्य--सुनकर; ज्ञात्वा--तथा जानकर; तस्य--उसका ( श्रुव महाराज का );चिकीर्षितम्--कार्यकलाप; स्पृष्ठा--स्पर्श करके; मूर्धनि--सिर पर; अघ-घ्नेन--समस्त पापों को भगाने वाले; पाणिना--हाथसे; प्राह--कहा; विस्मित:--चकित होकर
नारद मुनि ने यह समाचार सुना और श्लुव महाराज के समस्त कार्यकलापों को जानकर वेचकित रह गये।
वे श्रुव के पास आये और उनके सिर को अपने पुण्यवर्धक हाथ से स्पर्श करतेहुए इस प्रकार बोले।
"
अहो तेज: क्षत्रियाणां मानभड़ममृष्यताम् ।
बालोप्ययं हृदा धत्ते यत्समातुरसद्बच: ॥
२६॥
अहो--कितना आश्चर्यमय है; तेज:--बल; क्षत्रियाणाम्--क्षत्रियों का; मान-भड्डम्--प्रतिष्ठा को धक्का; अमृष्यताम्ू--सहन करसकने में अक्षम; बाल:--मात्र बालक; अपि--यद्यपि; अयमू--यह; हृदा--हृदय में; धत्ते--घर कर लिया है; यत्--जो; स-मातु:--अपनी विमाता का; असत्--अरूचिकर, कटु; वचः--वचन |
अहो! शक्तिशाली क्षत्रिय कितने तेजमय होते हैं! वे थोड़ा भी मान-भंग सहन नहीं करसकते।
जरा सोचो तो, यह नन््हा सा बालक है, तो भी उसकी सौतेली माता के कटु वचन उसकेलिए असह्ा हो गये।
"
नारद उवाचनाधुनाप्यवमानं ते सम्मान वापि पुत्रक ।
लक्षयाम: कुमारस्य सक्तस्य क्रीडनादिषु ॥
२७॥
नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; न--नहीं; अधुना-- अभी; अपि--यद्यपि; अवमानम्-- अपमान; ते--तुमको; सम्मानम्--आदर; वा--अथवा; अपि--निश्चय ही; पुत्रक-हे पुत्र; लक्षयाम: --मुझे दिखाई पड़ रहा है; कुमारस्थ--तुम जैसे बालकों का;सक्तस्थ--आसक्त; क्रीडन-आदिषु--खेल इत्यादि में |
महर्षि नारद ने श्रुव से कहा : हे बालक, अभी तो तुम नन्हें बालक हो, जिसकी आसक्तिखेल इत्यादि में रहती है।
तो फिर तुम अपने सम्मान के विपरीत अपमानजनक शब्दों से इतनेप्रभावित क्यों हो ?"
विकल्पे विद्यमानेडपि न ह्ासन्तोषहेतव: ।
पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोके निजकर्मभि: ॥
२८॥
विकल्पे-- अन्य उपाय; विद्यमाने अपि--रहने पर भी; न--नहीं; हि--निश्चय ही; असन्तोष--नाराजगी; हेतव:ः-- कारण;पुंसः--मनुष्यों का; मोहम् ऋते--मोह ग्रस्त हुए बिना; भिन्ना:--पृथक् हुआ; यत् लोके--इस लोक में; निज-कर्मभि:--अपनेकार्य से
हे ध्रुव, यदि तुम समझते हो कि तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस पहुँची है, तो भी तुम्हें असंतुष्टहोने का कोई कारण नहीं है।
इस प्रकार का असन्तोष माया का ही अन्य लक्षण है; प्रत्येकजीवात्मा अपने पूर्व कर्मों के अनुसार नियंत्रित होता है, अतः सुख तथा दुख भोगने के लिए नानाप्रकार के जीवन होते हैं।
"
परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुष: ।
दैवोपसादितं यादद्वीक्ष्ये श्वरगतिं बुध: ॥
२९॥
परितुष्येत्--सन्तुष्ट रहना चाहिए; ततः--अतः ; तात--हे बालक; तावत्--तब तक; मात्रेण--गुण; पूरुष:-- पुरुष; दैव--भाग्य के; उपसादितम्-द्वारा प्रदत्त; यावत्--जब तक; वीक्ष्य--देखकर; ई श्वर-गतिमू-- भगवान् की विधि; बुध:--बुद्धिमानमनुष्य,भगवान् की गति बड़ी विचित्र है।
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह इस गति को स्वीकारकरे और अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी भगवान् की इच्छा से सम्मुख आए, उससे संतुष्ट रहे।
"
अथ मात्रोपदिष्टेन योगेनावरुरुत्ससि ।
यत्प्रसादं स वै पुंसां दुराराध्यो मतो मम ॥
३०॥
अथ--अतः; मात्रा--अपनी माता द्वारा; उपदिष्टेन--उपदेश दिया जाकर; योगेन--योग ध्यान से; अवरुरुत्ससि-- अपने कोऊपर उठाना चाहते हो; यत््-प्रसादम्ू--जिसकी कृपा; सः--वह; बै--निश्चय ही; पुंसामू--जीवात्माओं का; दुराराध्य:--करनेमें अत्यन्त कठिन; मत:--विचार; मम--मेरा |
अब तुमने अपनी माता के उपदेश से भगवान् की कृपा प्राप्त करने के लिए ध्यान की योग-विधि पालन करने का निश्चय किया है, किन्तु मेरे विचार से ऐसी तपस्या सामान्य व्यक्ति के लिएसम्भव नहीं है।
भगवान् को प्रसन्न कर पाना अत्यन्त कठिन है।
"
मुनयः पदवीं यस्य निःसड्लेनोरुजन्मभिः ।
न विदुर्मृगयन्तो पि तीत्रयोगसमाधिना ॥
३१॥
मुनयः--मुनिगण; पदवीम्--पथ; यस्य--जिसका; निःसड्बेन--विरक्ति से; उरु-जन्मभि:--अनेक जन्मों के पश्चात्; न--कभीनहीं; विदु:--समझ पाये; मृगयन्तः--खोज करते हुए; अपि--निश्चय ही; तीब्र-योग--कठिन तपस्या; समाधिना--समाधि से |
नारद मुनि ने आगे बताया : अनेकानेक जन्मों तक इस विधि का पालन करते हुए तथाभौतिक कल्मष से विरक्त रह कर, अपने को निरन्तर समाधि में रखकर और विविध प्रकार कीतपस्याएँ करके अनेक योगी ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग का पार नहीं पा सके।
अतो निवर्ततामेष निर्बन्धस्तव निष्फल: ।
यतिष्यति भवान्काले श्रेयसां समुपस्थिते ॥
३२॥
अतः--इसलिए; निवर्तताम्--अपने को रोको; एष:--यह; निर्बन्ध:--संकल्प; तब--तुम्हारा; निष्फल:--वृथा; यतिष्यति--भविष्य में प्रयल करना; भवान्--स्वयं; काले--काल-क्रम में; श्रेयसाम्--अवसर; समुपस्थिते-- आने पर।
इसलिए हे बालक, तुम्हें इसके लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिए, इसमें सफलता नहीं मिलनेवाली।
अच्छा हो कि तुम घर वापस चले जाओ।
जब तुम बड़े हो जाओगे तो ईश्वर की कृपा सेतुम्हें इन योग-कर्मों के लिए अवसर मिलेगा।
उस समय तुम यह कार्य पूरा करना।
"
यस्य यदैवविहितं स तेन सुखदुःखयो: ।
आत्मानं तोषयन्देही तमस:ः पारमृच्छति ॥
३३॥
यस्य--कोई भी; यत्--जो; दैव-- भाग्य से; विहितम्--बदा; सः--वह व्यक्ति; तेन--उससे; सुख-दुःखयो:--सुख अथवादुख; आत्मानम्--अपने आपको; तोषयनू--संतुष्ट; देही-- आत्मा; तमसः ---अंधकार के; पारम्--दूसरी ओर; ऋच्छति--पार होजाता
मनुष्य को चाहिए कि जीवन की किसी भी अवस्था में, चाहे सुख हो या दुख, जो दैवीइच्छा ( भाग्य ) द्वारा प्रदत्त है, सन्तुष्ट रहे।
जो मनुष्य इस प्रकार टिका रहता है, वह अज्ञान केअंधकार को बहुत सरलता से पार कर लेता है।
"
गुणाधिकान्मुदं लिप्सेदनुक्रोशं गुणाधमात् ।
मैत्रीं समानादन्विच्छेन्न तापैरभिभूयते ॥
३४॥
गुण-अधिकात्--अधिक योग्य पुरुष से; मुदम्--प्रसन्नता; लिप्सेत--अनुभव करे; अनुक्रोशम्-- दया; गुण-अधमात्--कमयोग्य पुरुष से; मैत्रीमू--मित्रता; समानात्ू--समान ( गुण वाले ) से; अन्विच्छेत्--कामना करे; न--नहीं; तापैः--दुख से;अभिभूयते--प्रभावित होता हैप
्रत्येक मनुष्य को इस प्रकार व्यवहार करना चाहिए : यदि वह अपने से अधिक योग्यव्यक्ति से मिले, तो उसे अत्यधिक हर्षित होना चाहिए, यदि अपने से कम योग्य व्यक्ति से मिलेतो उसके प्रति सदय होना चाहिए और यदि अपने समान योग्यता वालों से मिले तो उससे मित्रताकरनी चाहिए।
इस प्रकार मनुष्य को इस भौतिक संसार के त्रिविध ताप कभी भी प्रभावित नहींकर पाते।
"
ध्रुव उवाचसोयं शमो भगवता सुखदुःखहतात्मनाम् ।
दर्शितः कृपया पुसां दुर्दर्शो उस्मद्विधैस्तु य: ॥
३५॥
श्रुवः उबाच--श्रुव महाराज ने कहा; सः--वह; अयम्--यह; शम:--मन का संतुलन; भगवता--आपके द्वारा; सुख-दुःख--सुख तथा दुख; हत-आत्मनाम्--जो प्रभावित हैं; दर्शित:--दिखाया गया; कृपया--कृपा द्वारा; पुंसामू--लोगों का; दुर्दर्शः--देख पाना कठिन; अस्मतू-विधैः--हम जैसे व्यक्तियों द्वारा; तु--लेकिन; यः--जो भी आपने कहा।
ध्रुव महाराज ने कहा : हे नारद जी, आपने मन की शान्ति प्राप्त करने के लिए कृपापूर्वक जोभी कहा है, वह ऐसे पुरुष के लिए निश्चय ही अत्यन्त शिक्षाप्रद है, जिसका हृदय सुख तथा दुखकी भौतिक परिस्थितियों से चलायमान है।
लेकिन जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है मैं तो अविद्या सेप्रच्छन्न हूँ और इस प्रकार का दर्शन मेरे हृदय को स्पर्श नहीं कर पाता।
"
अथापि मेविनीतस्य क्षार्त घोरमुपेयुष: ।
सुरुच्या दुर्वचोबाणैर्न भिन्ने भ्रयते हंदि ॥
३६॥
अथ अपि--अतः ; मे--मेरा; अविनीतस्य-- अविनीत का क्षात्रम्--क्षत्रियत्व; घोरम्-- असह्य; उपेयुष: --प्राप्त; सुरुच्या: --सुरुचि का; दुर्वच:--कटु वचन; बाणैः--बाणों से; न--नहीं; भिन्ने--बेधा जाकर; श्रयते--रह रहे हैं, पड़े हैं; हदि--हृदय मेंहे भगवन्, मैं आपके उपदेशों को न मानने की धुृष्टता कर रहा हूँ।
किन्तु यह मेरा दोष नहींहै।
यह तो क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के कारण है।
मेरी विमाता सुरुचि ने मेरे हृदय को अपने कटुवबचनों से क्षत-विक्षत कर दिया है।
अतः आपकी यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा मेरे हृदय में टिक नहीं पारही।
"
पदं त्रिभुवनोत्कृष्ट जिगीषो: साधु वर्त्म मे ।
ब्रूह्मस्मत्पितृभिर््रह्यन्नन्यैरप्पनधिष्ठितम् ॥
३७॥
पदम्--पद; त्रि-भुवन--तीनों लोक; उत्कृष्टम्--सर्व श्रेष्ठ; जिगीषो: --इच्छुक; साधु--ईमानदार; वर्त्म--राह; मे--मुझको;ब्रूहि--कहो; अस्मत्--हमारा; पितृभि:--पूर्वजों, पिता तथा पितामह द्वारा; ब्रह्मनू--हे महान् ब्राह्मण; अन्यैः --अन्यों द्वारा;अपि--भी; अनधिष्ठितम्-- प्राप्त नहीं हो सका।
हे दिद्वान् ब्राह्मण, मैं ऐसा पद ग्रहण करना चाहता हूँ जिसे अभी तक तीनों लोकों में किसीने भी, यहाँ तक कि मेरे पिता तथा पितामहों ने भी, ग्रहण न किया हो।
यदि आप अनुगृहीत करसकें तो कृपा करके मुझे ऐसे सत्य मार्ग की सलाह दें, जिसे अपना करके मैं अपने जीवन केलक्ष्य को प्राप्त कर सकूँ।
"
नूनं भवान्भगवतो योडउड्भज: परमेष्ठिन: ।
वितुदन्नटते वीणां हिताय जगतोर्कवत् ॥
३८॥
नूनम्--निश्चय ही; भवान्ू--आप; भगवतः -- भगवान् के; यः--जो; अड़-जः: --शरीर से उत्पन्न; परमेष्ठटिन: --ब्रह्मा; वितुदन् --बजाते हुए; अटते--सर्वत्र विचरण करते हो; वीणाम्ू--वीणा; हिताय--कल्याण के लिए; जगतः--संसार के; अर्क-वत्--सूर्य के समान |
हे भगवन्, आप ब्रह्मा के सुयोग्य पुत्र हैं और आप अपनी वीणा बजाते हुए समस्त विश्व केकल्याण हेतु विचरण करते रहते हैं।
आप सूर्य के समान हैं, जो समस्त जीवों के लाभ के लिएब्रह्माण्ड-भर में चक्कर काटता रहता है।
"
मैत्रेय उवाचइत्युदाहतमाकर्ण्य भगवान्नारदस्तदा ।
प्रीत: प्रत्याह तं बाल॑ सद्दाक्यमनुकम्पया ॥
३९॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; इति--इस प्रकार; उदाहतम्--कहा जाकर; आकर्णर्य--सुन कर; भगवान् नारद:--महापुरुष नारद; तदा--तब; प्रीतः-- प्रसन्न होकर; प्रत्याह--उत्तर दिया; तमू--उस; बालम्ू--बालक को; सतू-वाक्यम्--अच्छा उपदेश; अनुकम्पया--कृपावश
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : श्रुव महाराज के शब्दों को सुनकर महापुरुष नारद मुनि उन परअत्यधिक दयालु हो गये और अपनी अहैतुकी कृपा दिखाने के उद्देश्य से उन्होंने निम्नलिखितविशिष्ट उपदेश दिया।
"
नारद उवाचजनन्याभिहितः पन्था: स वै नि: श्रेयसस्य ते ।
भगवान्वासुदेवस्तं भज तं प्रवणात्मना ॥
४०॥
नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; जनन्या--अपनी माता के द्वारा; अभिहित:--कहे गये; पन््था:--पथ; सः--उस; बै--निश्चयही; नि: श्रेयसस्थ-- जीवन का परम लक्ष्य; ते--तुम्हारे लिए; भगवानू-- भगवान्; वासुदेव:-- श्रीकृष्ण; तम्--उसकी; भज--सेवा करो; तम्ू--उसके द्वारा; प्रवण-आत्मना--अपने मन को एकाग्र करके |
नारद मुनि ने श्रुव महाराज से कहा : तुम्हारी माता सुनीति ने भगवान् की भक्ति के पथ काअनुसरण करने के लिए जो उपदेश दिया है, वह तुम्हारे लिए सर्वथा अनुकूल है।
अतः तुम्हेंभगवान् की भक्ति में पूर्ण रूप से निमग्न हो जाना चाहिए।
"
धर्मार्थकाममोक्षाख्यं य इच्छेच्छेय आत्मन: ।
एकं हब हरेस्तत्र कारणं पादसेवनम् ॥
४१॥
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष--धर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रिय-तृप्ति तथा मुक्ति, ये चार पुरुषार्थ; आख्यम्--नाम से; यः--जो;इच्छेत्--इच्छा करता है; श्रेय:--जीवन का लक्ष्य; आत्मन:--स्वयं का; एकम् हि एव--केवल एक; हरेः-- भगवान् का;तत्र--उसमें; कारणम्--कारण; पाद-सेवनम्--चरणकमल की पूजा।
जो व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष--इन चार पुरुषार्थों की कामना करता है उसे चाहिएकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति में अपने आपको लगाए, क्योंकि उनके चरणकमलों कीपूजा से इन सबकी पूर्ति होती है।
"
तत्तात गच्छ भद्गं ते यमुनायास्तर्ट शुचि ।
पुण्य॑ मधुवन यत्र सान्रिध्यं नित्यदा हरे: ॥
४२॥
तत्--उस; तात-हे पुत्र; गच्छ--जाओ; भद्रम्--शुभ हो; ते--तुम्हारा; यमुनाया:-- यमुना का; तटमू--किनारा, तट; शुचि--शुद्ध; पुण्यम्--पवित्र; मधु-वनम्--मधुवन नामक; यत्र--जहाँ; सान्निध्यमू--निकट होते हुए; नित्यदा--सदैव; हरेः-- भगवान्के।
हे बालक, तुम्हारा कल्याण हो।
तुम यमुना के तट पर जाओ, जहाँ पर मधुवन नामक विख्यात जंगल है और वहीं पर पवित्र होओ।
वहाँ जाने से ही मनुष्य वृन्दावनवासी भगवान् केनिकट पहुँचता है।
"
स्नात्वानुसवनं तस्मिन्कालिन्द्या: सलिले शिवे ।
कृत्वोचितानि निवसन्नात्मन: कल्पितासन: ॥
४३॥
स्नात्वा--स्तान करके; अनुसवनम्--तीन बार; तस्मिन्ू--उस; कालिन्द्या:--कालिन्दी नदी ( यमुना ) में; सलिले--जल में;शिवे--शुभ; कृत्वा--करके ; उचितानि--उपयुक्त; निवसन्--बैठ कर; आत्मन:--स्वयं का; कल्पित-आसन:ः--आसनबनाकर
नारद मुनि ने उपदेश दिया : हे बालक, यमुना नदी अथवा कालिन्दी के जल में तुम नित्यतीन बार स्नान करना, क्योंकि यह जल शुभ, पवित्र एवं स्वच्छ है।
स्नान के पश्चात् अष्टांगयोगके आवश्यक अनुष्ठान करना और तब शान्त मुद्रा में अपने आसन पर बैठ जाना।
"
प्राणायामेन त्रिवृता प्राणेन्द्रियमनोमलम् ।
शनैर्व्युदस्याभिध्यायेन्मनसा गुरुणा गुरुम् ॥
४४॥
प्राणायामेन-- प्राणायाम ( श्वास की कसरत ) से; त्रि-वृता--तीन विधियों से; प्राण-इन्द्रिय--प्राणवायु तथा इन्द्रियाँ; मनः --मन; मलम्--अशुद्धि; शनैः -- धीरे-धीरे; व्युदस्य--छोड़कर; अभिध्यायेत्-- ध्यान धरो; मनसा--मन से; गुरुणा--अविचल;गुरुमू--परम गुरुश्रीकृष्ण को |
आसन ग्रहण करने के पश्चात् तुम तीन प्रकार के प्राणायाम करना और इस प्रकार धीरे-धीरेप्राणवायु, मन तथा इन्द्रियों को वश में करना।
अपने को समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त करकेतुम अत्यन्त धैर्यपूर्वक भगवान् का ध्यान प्रारम्भ करना।
"
प्रसादाभिमुखं शश्चत्प्रसन्नवदनेक्षणम् ।
सुनासं सुश्रुवं चारुकपोलं सुरसुन्दरम् ॥
४५॥
प्रसाद-अभिमुखम्--सदैव अहैतुकी कृपा करने के लिए तत्पर; शश्वत्--सदैव; प्रसन्न--हर्षित; वदन--मुख; ईक्षणम्--दृष्टि;सु-नासम्--सुन्दर नाक; सु-भ्रुवम्--सुसज्जित भौंहें; चारु--सुन्दर; कपोलम्--कपोल; सुर--देवता; सुन्दरम्--देखने मेंसुन्दर |
[ यहाँ पर भगवान् के रूप का वर्णन हुआ है।
भगवान् का मुख सदैव अत्यन्त सुन्दर औरप्रसन्न मुद्रा में रहता है।
देखने वाले भक्तों को वे कभी अप्रसन्न नहीं दिखते और वे सदैव उन्हेंवरदान देने के लिए उद्यत रहते हैं।
उनके नेत्र, सुसज्जित भौंहें, उन्नत नासिका तथा चौड़ामस्तक--ये सभी अत्यन्त सुन्दर हैं।
वे समस्त देवताओं से अधिक सुन्दर हैं।
"
तरुणं रमणीयाडमरुणोष्ठेक्षणाधरम् ।
प्रणताश्रयणं नृम्णं शरण्यं करुणार्णबम् ॥
४६॥
तरुणम्ू--जवान; रमणीय--आकर्षक; अड्डमू--शरीर के सभी अंग; अरुण-ओएष्ठ --उदीयमान सूर्य की तरह लाल-लाल होंठ;ईक्षण-अधरम्--उसी प्रकार की आँखें; प्रणत--शरणागत; आश्रयणम्--शरणागतों की शरण ( आश्रय ); नृम्णम्-दिव्य रूपसे मनोहर; शरण्यम्--जिसकी शरण में जाने योग्य हो; करुणा--मानो दया से पूर्ण; अर्गबम्--समुद्र |
नारद मुनि ने आगे कहा : भगवान् का रूप सदैव युवावस्था में रहता है।
उनके शरीर काअंग-प्रत्यंग सुगठित एवं दोषरहित है।
उनके नेत्र तथा होंठ उदीयमान सूर्य की भाँति गुलाबी सेहैं।
वे शरणागतों को सदैव शरण देने वाले हैं और जिसे उनके दर्शन का अवसर मिलता है, वहसभी प्रकार से संतुष्ट हो जाता है।
दया के सिन्धु होने के कारण भगवान् शरणागतों के स्वामीहोने के योग्य हैं।
"
श्रीवत्साडूं घनश्यामं पुरुष वनमालिनम् ।
शद्भुचक्रगदापदौरभिव्यक्तचतुर्भुजम् ॥
४७॥
श्रीवत्स-अड्भम्-- भगवान् के वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न; घन-श्यामम्--गहरा नीला; पुरुषम्--परम पुरुष; बन-मालिनमू-- फूलों की माला से युक्त; शट्डु--शंख; चक्र -- चक्र; गदा--गदा; पदौ:--कमल पुष्प से; अभिव्यक्त--प्रकट;चतुः-भुजम्--चार हाथों वाले को |
भगवान् को श्रीवत्स चिह्न अथवा ऐश्वर्य की देवी का आसन धारण किये हुए बताया गयाहै।
उनके शरीर का रंग गहरा नीला ( श्याम ) है।
भगवान् पुरुष हैं, वे फूलों की माला पहनते हैंऔर वे चतुर्भुज रूप में ( नीचेवाले बाएँ हाथ से आरम्भ करते हुए ) शंख, चक्र, गदा तथाकमल पुष्प धारण किये हुए नित्य प्रकट होते हैं।
"
किरीटिनं कुण्डलिनं केयूरवलयान्वितम् ।
कौस्तुभाभरणग्रीवं पीतकौशेयवाससम् ॥
४८ ॥
किरीटिनम्ू--मुकुट धारण किये भगवान्; कुण्डलिनम्ू--कुण्डल सहित; केयूर--रलजटित हार; बलय-अन्वितम्--रत्तजटितबाजूबन्द सहित; कौस्तुभ-आभरण-ग्रीवम्--जिनकी ग्रीवा ( गर्दन ) कौस्तुभ मणि से अलंकृत है; पीत-कौशेय-वाससम्--जोपीले रेशम का वस्त्र धारण किये हैं।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव का सारा शरीर आभूषित है।
वे बहुमूल्य मणिमय मुकुट,हार तथा बाजूबन्द धारण किये हुए हैं।
उनकी गर्दन कौस्तुभ मणि से अलंकृत है और वे पीतरेशमी वस्त्र धारण किये हैं।
"
काञझ्जीकलापपर्यस्तं लसत्काझ्जननूपुरम् ।
दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥
४९॥
काञ्ञी-कलाप--छोटे-छोटे घुंघुरू; पर्यस्तम्--कमर को घेरते हुए; लसत्-काझ्नन-नूपुरम्--सुनहले नूपुरों से अलंकृत पाँव;दर्शनीय-तमम्--अत्यन्त दर्शनीय; शान्तम्--शान्त, मौन; मन:-नयन-वर्धनम्--आँखों तथा मन को मोहने वाला।
भगवान् का कटि- प्रदेश सोने की छोटी-छोटी घंटियों से अलंकृत है और उनके चरणकमलसुनहले नूपुरों से सुशोभित हैं।
उनके सभी शारीरिक अंग अत्यन्त आकर्षक एवं नेत्रों को भानेवाले हैं।
वे सदैव शान्त तथा मौन रहते हैं और नेत्रों तथा मन को अत्यधिक मोहनेवाले हैं।
"
पद्भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्भ्यां समर्चताम् ।
हत्पद्यकर्णिकाशिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥
५० ॥
पदभ्यामू--अपने चरणकमलों से; नख-मणि-श्रेण्या--पाँव के अँगूठे के मणि सहृश्य नाखूनों की ज्योति से; विलसद्भ्याम्ू--चमकते चरणकमल; समर्चताम्--उनकी पूजा में तत्पर पुरुष; हत्-पद्य-कर्णिका--हृदय के कमल पुष्प का पुंज; धिष्णयमू--स्थित; आक्रम्य--पकड़कर, कब्जा करके; आत्मनि--हृदय में; अवस्थितम्--स्थित |
वास्तविक योगी भगवान् के उस दिव्यरूप का ध्यान करते हैं जिसमें वे उनके हृदयरूपीकमल-पुंज में खड़े रहते हैं और उनके चरण-कमलों के मणितुल्य नाखून चमकते रहते हैं।
"
स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम् ।
नियतेनैक भूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥
५१॥
स्मयमानम्-- भगवान् की हँसी; अभिध्यायेत्--उनका ध्यान करे; स-अनुराग-अवलोकनमू-- भक्तों की ओर अत्यन्त स्नेह सेदेखते हुए; नियतेन--इस प्रकार, नियमित रूप से; एक-भूतेन--अत्यन्त ध्यानपूर्वक; मनसा--मन-ही-मन; वर-द-ऋषभम् --श्रेष्ठ वरदायक का ध्यान करे।
भगवान् सदैव मुस्कराते रहते हैं और भक्त को चाहिए कि वह सदा इसी रूप में उनका दर्शनकरता रहे, क्योंकि वे भक्तों पर कृपा-पूर्वक दृष्टि डालते हैं।
इस प्रकार से ध्यानकर्ता को चाहिएकि वह समस्त वरों को देने वाले भगवान् की ओर निहारता रहे।
"
एवं भगवतो रूप॑ सुभद्वं ध्यायतो मन: ।
निर्व॒त्या परया तूर्ण सम्पन्न न निवर्तते ॥
५२॥
एवम्--इस प्रकार; भगवत:-- भगवान् का; रूपम्ू--रूप; सु-भद्रमू-- अत्यन्त कल्याणकारी; ध्यायत:--ध्यान करते हुए;मनः--मन; निर्व॒त्या--समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त होकर; परया--दिव्य; तूर्णम्--शीघ्र; सम्पन्नम्ू--समृद्ध होकर; न--कभी नहीं; निवर्तते--नीचे आता है
भगवान् के नित्य मंगलमय रूप में जो अपने मन को एकाग्र करते हुए इस प्रकार से ध्यानकरता है, वह अतिशीघ्र ही समस्त भौतिक कल्मष से छूट जाता है और भगवान् के ध्यान कीस्थिति से फिर लौटकर नीचे ( मर्त्य-लोक ) नहीं आता।
"
जपश्च परमो गुह्य: श्रूयतां मे नृपात्मज ।
यं सप्तरात्रं प्रपठन्पुमान्पश्यति खेचरान् ॥
५३॥
जपः च--इस सम्बन्ध में मंत्र का जाप; परम: --अत्यन्त; गुह्ा:--गोपनीय; श्रूयताम्--सुनो; मे--मुझसे; नृप-आत्मज--हेराजपुत्र; यमू--जो; सप्त-रात्रमू--सात रात्रियाँ; प्रपठन्--जपता हुआ; पुमान्-- पुरुष; पश्यति--देख सकता है; खे-चरान्ू--आकाश में चलने वाले प्राणियों को |
हे राजपुत्र, अब मैं तुम्हें वह मंत्र बताऊँगा जिसे इस ध्यान विधि के समय जपना चाहिए।
जोकोई इस मंत्र को सात रात सावधानी से जपता है, वह आकाश में उड़ने वाले सिद्ध मनुष्यों कोदेख सकता है।
"
नमो भगवते वासुदेवायमन्त्रेणानेन देवस्य कुर्याद्द्रव्यमयीं बुध: ।
सपर्या विविधेद्ध॑व्यैर्देशकालविभागवित् ॥
५४॥
३४--हे भगवान्; नमः--नमस्कार है; भगवते-- भगवान् को; वासुदेवाय--वासुदेव को; मन्त्रेण--मंत्र से; अनेन--इस;देवस्थ-- भगवान् का; कुर्यातू-करना चाहिए; द्रव्यमयीम्-- भौतिक; बुध:--विद्वान; सपर्याम्--वेदोक्त विधि से पूजा;विविधे:-- अनेक प्रकार की; द्रव्यै:--सामग्री से; देश--स्थान के अनुसार; काल--समय; विभाग-वित्--विभागों को जाननेवाला।
श्रीकृष्ण की पूजा का बारह अक्षर वाला मंत्र है--» नमो भगवते वासुदेवाय।
ईश्वर काविग्रह स्थापित करके उसके समक्ष मंत्रोच्चार करते हुए प्रामाणिक विधि-विधानों सहित मनुष्यको फूल, फल तथा अन्य खाद्य-सामग्रियाँ अर्पित करनी चाहिए।
किन्तु यह सब देश, कालतथा साथ ही सुविधाओं एवं असुविधाओं का ध्यान रखते हुए करना चाहिए।
"
सलिलै: शुचिभिर्माल्यैर्वन्यर्मूलूफलादिभि: ।
शस्ताहु रांशुकैश्वार्चेत्तुलस्था प्रियया प्रभुम् ॥
५५॥
सलिलै:--जल के प्रयोग से; शुचिभि: --पवित्र किया गया; माल्यैः--माला से; वन्यैः--जंगली फूलों से; मूल--जड़ों; फल-आदिभि:--नाना प्रकार की वनस्पतियों तथा फलों से; शस्त--दूर्वा ( दूब ); अड्'ु र-कलियाँ; अंशुकैः--वृक्षों की छाल, यथाभोज-पत्र से; च--तथा; अर्चेत्--पूजा करें; तुलस्था--तुलसी दलों से; प्रियया--जो भगवान् को अत्यन्त प्रिय; प्रभुम्--भगवान् को
भगवान् की पूजा शुद्ध जल, शुद्ध पुष्प-माला, फल, फूल तथा जंगल में उपलब्धवनस्पतियों या ताजे उगे हुए दूर्वांदल एकत्र करके, फूलों की कलियों, अथवा वृक्षों की छालसे, या सम्भव हो तो भगवान् को अत्यन्त प्रिय तुलसीदल अर्पित करते हुए करनी चाहिए।
"
लब्ध्वा द्रव्यमयीमर्चा क्षित्यम्ब्वादिषु वार्चयेत् ।
आशभ्षृतात्मा मुनि: शान्तो यतवाड्मितवन्यभुक् ॥
५६॥
लब्ध्वा--पाकर; द्र॒व्य-मयीम्-- भौतिक तत्त्वों से बने; अर्चामू--पूज्य विग्रह; क्षिति--पृथ्वी; अम्बु--जल; आदिषु--इत्यादि;बा--अथवा; अर्चयेत्--पूजा करे; आभृत-आत्मा-- आत्मसंयमी; मुनि:ः--महापुरुष; शान्त: --शान्तिपूर्वक; यत-वाक्--वाग्शक्ति पर संयम रखते हुए; मित-- थोड़ा; वन्य-भुक्--जंगल में प्राप्य सामग्री को खाकर
यदि सम्भव हो तो मिट्टी, लुगदी, लकड़ी तथा धातु जैसे भौतिक तत्त्वों से बनी भगवान् कीमूर्ति को पूजा जा सकता है।
जंगल में मिट्टी तथा जल से मूर्ति बनाई जा सकती है और उपर्युक्तनियमों के अनुसार उसकी पूजा की जा सकती है।
जो भक्त अपने ऊपर पूर्ण संयम रखता है, उसेअत्यन्त नप्र तथा शान्त होना चाहिए और जंगल में जो भी फल तथा वनस्पतियाँ प्राप्त हों उन्हें हीखाकर संतुष्ट रहना चाहिए।
"
स्वेच्छावतारचरितैरचिन्त्यनिजमायया ।
करिष्यत्युत्तमएलोकस्तद्धयायेद्धूदयड्गरमम् ॥
५७॥
स्व-इच्छा--उनकी ( भगवान की ) परम इच्छा से; अवतार--अवतार; चरितैः --कार्यकलाप; अचिन्त्य-- अकल्पनीय; निज-मायया--अपनी ही शक्ति से; करिष्यति--करता है; उत्तम-श्लोक:-- भगवान्; तत्ू--वह; ध्यायेत्-- ध्यान करना चाहिए;हृदयम्-गमम्--अत्यन्त आकर्षक ।
हे श्रुव, प्रतिदिन तीन बार मंत्र जप करने और श्रीविग्रह की पूजा के अतिरिक्त तुम्हें भगवान्के विभिन्न अवतारों के दिव्य कार्यों के विषय में भी ध्यान करना चाहिए, जो उनकी परम इच्छातथा व्यक्तिगत शक्ति से प्रदर्शित होते हैं।
"
परिचर्या भगवतो यावत्य: पूर्वसेविता: ।
ता मन्त्रहदयेनैव प्रयुउ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥
५८ ॥
परिचर्या:--सेवा; भगवत:--भगवान् की; यावत्य:--जिस रूप में ( उपर्युक्त ) संस्तुत हैं; पूर्व-सेविता: --पूर्व आचार्यो द्वारा कृतअथवा संस्तुत; ताः--वह; मन्त्र--मंत्र; हृदयेन--हृदय के भीतर; एब--निश्चय ही; प्रयुड्यात्--पूजा करे; मन्त्र-मूर्तये--जो मंत्रसे अभिन्न है।
संस्तुत सामग्री द्वारा परमेश्वर की पूजा किस प्रकार की जाये, इसके लिए मनुष्य को चाहिएकि पूर्व-भक्तों के पद-चिह्नों का अनुसरण करे अथवा हृदय के भीतर ही मंत्रोच्चार करकेभगवान् की, पूजा करे जो मंत्र से भिन्न नहीं हैं।
"
एवं कायेन मनसा वचसा च मनोगतम् ।
परिचर्यमाणो भगवान्भक्तिमत्परिचर्यया ॥
५९॥
पुंसाममायिनां सम्यग्भजतां भाववर्धन: ।
श्रेयो दिशत्यभिमतं यद्धर्मादिषु देहिनामू ॥
६०॥
एवम्--इस प्रकार; कायेन--शरीर से; मससा--मन से; वचसा--शब्दों से; च-- भी; मन:-गतम्-- भगवान् के चिन्तन मात्र से;परिचर्यमाण:--भक्ति में लगे हुए; भगवान्-- भगवान्; भक्ति-मत्-- भक्ति के नियमों के अनुसार; परिचर्यया-- भगवान् कीपूजा द्वारा; पुंसामू-- भक्त का; अमायिनाम्--जो एकनिष्ठ तथा गम्भीर है; सम्यक् --पूर्णरूप से; भजताम्--भक्ति में लगा हुआ;भाव-वर्धन:--जो भक्त के भाव को बढ़ाते हैं, भगवान्, श्रेय: ; श्रेयः--अन्तिम उद्देश्य; दिशति--प्रदान करता है; अभिमतम्--आकांक्षा; यतू--यावत्रूप; धर्म-आदिषु--आध्यात्मिक जीवन तथा आर्थिक विकार के विषय में; देहिनामू--बद्धजीवों का
इस प्रकार जो कोई गम्भीरता तथा निष्ठा से अपने मन, वचन तथा शरीर से भगवान् कीभक्ति करता है और जो बताई गई भक्ति-विधियों के कार्यों में मगन रहता है, उसे उसकीइच्छानुसार भगवान् वर देते हैं।
यदि भक्त भौतिक संसार में धर्म, अर्थ, काम या भौतिक संसारसे मोक्ष चाहता है, तो भगवान् इन फलों को प्रदान करते हैं।
"
विरक्तश्नेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा ।
त॑ निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥
६१॥
विरक्त: च--पूर्णतया विरक्त; इन्द्रिय-रतौ--इन्द्रिय-तृप्ति के विषय में; भक्ति-योगेन-- भक्ति की पद्धति से; भूयसा--अत्यन्तगम्भीरता से; तम्--उस ( परम ) को; निरन्तर--लगातार; भावेन--समाधि की सर्वोच्च अवस्था में; भजेत--पूजा करे; अद्धा--प्रत्यक्ष; विमुक्तये--मुक्ति के लिए।
यदि कोई मुक्ति के लिए अत्यन्त उत्सुक हो तो उसे दिव्य प्रेमाभक्ति की पद्धति का हढ़ता सेपालन करके चौबीसों घंटे समाधि की सर्वोच्च अवस्था में रहना चाहिए और उसे इन्द्रियतृप्ति केसमस्त कार्यो से अनिर्वायतः पृथक् रहना चाहिए।
"
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य प्रणम्य च नृपार्भक: ।
ययौ मधुवन पुण्यं हरेश्वरणचर्चितम् ॥
६२॥
इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; तम्--उसको ( नारद मुनि को ); परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके; प्रणम्य--नमस्कार करके;च--भी; नृप-अर्भक:--राजा का पुत्र; ययौ--पास गया; मधुवनम्--वृन्दावन का एक जंगल जो मधुवन कहलाता है;पुण्यमू--शुभ; हरेः-- भगवान् का; चरण-चर्चितम्--
श्रीकृष्ण के चरणकमल द्वारा अंकितजब राजपुत्र श्रुव महाराज को नारद मुनि इस प्रकार उपदेश दे रहे थे तो उन्होंने अपने गुरुनारद मुनि की प्रदक्षिणा की और उन्हें सादर नमस्कार किया।
तत्पश्चात् वे मधुवन के लिए चलपड़े, जहाँ श्रीकृष्ण के चरणकमल सदैव अंकित रहते हैं, अतः जो विशेष रूप से शुभ है।
"
तपोवनं गते तस्मिन्प्रविष्टो उन्तःपुरं मुनि: ।
अर्हिताईणको राज्ञा सुखासीन उबाच तम् ॥
६३॥
तपः-वनम्--वह वन मार्ग जहाँ ध्रुव महाराज ने तपस्या की; गते--इस प्रकार पास जाने पर; तस्मिन्--वहाँ; प्रविष्ट: -- प्रवेशकरके; अन्तः-पुरम्ू--व्यक्तिगत घर के भीतर; मुनि:--नारद मुनि; अर्हित--पूजित होकर; अर्हणक: --आदरपूर्ण आचरण केद्वारा; राज्ञा--राजा द्वारा; सुख-आसीन:--अपने आसन पर सुखपूर्वक बैठा; उबाच--कहा; तम्--उस ( राजा ) से |
जब श्रुव भक्ति करने के लिए मधुवन में प्रविष्ट हो गए तब महर्षि नारद ने राजा के पासजाकर यह देखना उचित समझा कि वे महल के भीतर कैसे रह रहे हैं।
जब नारद मुनि वहाँ पहुँचेतो राजा ने उन्हें प्रणाम करके उनका समुचित स्वागत किया।
आराम से बैठ जाने पर नारद कहनेलगे।
"
नारद उबाचराजन्कि ध्यायसे दीर्घ मुखेन परिशुष्यता ।
कि वा न रिष्यते कामो धर्मो वार्थेन संयुत: ॥
६४॥
नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; राजन्--हे राजा; किम्ू--क्या; ध्यायसे--सोचते हुए; दीर्घम्--अत्यन्त गहनता से; मुखेन--अपने मुँह से; परिशुष्यता--सूखते हुए; किम् वा--अथवा; न--नहीं; रिष्यते--खो जाना; काम: --इन्द्रियतृप्ति; धर्म:--धार्मिकअनुष्ठान; वा--या; अर्थेन--आर्थिक विकास से; संयुत:--से युक्त
महर्षि नारद ने पूछा : हे राजन, तुम्हारा मुख सूख रहा दिखता है और ऐसा लगता है कि तुमदीर्घकाल से कुछ सोचते रहे हो।
ऐसा क्यों है? क्या तुम्हें धर्म, अर्थ तथा काम के मार्ग कापालन करने में कोई बाधा हुई है ?"
राजोबाचसुतो मे बालको ब्रह्मन्स्त्रणेनाकरुणात्मना ।
निर्वासितः पञ्जवर्ष: सह मात्रा महान्कवि: ॥
६५॥
राजा उवाच--राजा ने उत्तर दिया; सुतः--पुत्र; मे--मेरा; बालकः--अल्प वयस वाला; ब्रह्मन्ू--हे ब्राह्मण; स्त्रैणेन --स्त्री मेंलिप्त रहने वाला; अकरुणा-आत्मना--कठोर हृदय; निर्वासित:--घर से निकाला गया; पशञ्ञ-वर्ष:--पाँच वर्ष का बालक;सह--साथ; मात्रा--माता द्वारा; महान्ू--महापुरुष; कवि: --भक्त ।
राजा ने उत्तर दिया : हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं अपनी पत्नी में अत्यधिक आसक्त हूँ और मैं इतनापतित हूँ कि मैंने अपने पाँच वर्ष के बालक के प्रति भी दया भाव के व्यवहार का त्याग करदिया।
मैने उसे महात्मा तथा महान् भक्त होते हुए भी माता सहित निर्वासित कर दिया है।
"
अप्यनाथं बने ब्रह्मन्मा स्मादन्त्यर्भक वृका: ।
श्रान्तं शयानं क्षुधितं परिम्लानमुखाम्बुजम् ॥
६६॥
अपि--निश्चय ही; अनाथम्--अरक्षित; बने--जंगल में; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; मा-- अथवा, नहीं; स्म--नहीं; अदन्ति-- भक्षणकिया; अर्भकम्--निरीह बालक; वृका: --भेड़िये; श्रान्तम्-- थका हुआ; शयानम्--लेटा हुआ; क्षुधितम्-- भूखा; परिम्लान--मुरझाया; मुख-अम्बुजम्ू--कमल के समान मुख ।
हे ब्राह्मण, मेरे पुत्र का मुख कमल के फूल के समान था।
मैं उसकी दयनीय दशा के विषयमें सोच रहा हूँ।
वह असुरक्षित और अत्यन्त भूखा होगा।
वह जंगल में कहीं लेटा होगा औरभेड़ियों ने झपट करके उसका शरीर काट खा लिया होगा।
अहो मे बत दौरात्म्यं स्रीजितस्योपधारय ।
योडड्डू प्रेम्णारुरुक्षन्तं नाभ्यनन्दमसत्तम: ॥
६७॥
अहो--ओह; मे--मेरा; बत--निश्चय ही; दौरात्म्यमू-क्रूरता; स्त्री-जितस्य--स्त्री का गुलाम; उपधारय--जरा सोचो तो; यः--जो; अड्भम्--गोद; प्रेम्णा--प्रेमवश; आरुरुक्षन्तम्-चढ़ने को इच्छुक; न--नहीं; अभ्यनन्दम्--उचित ढंग से आदर; असतू-तमः--अत्यन्त क्रूर
अहो! जरा देखिये तो मैं कैसा स्त्री का गुलाम हूँ! जरा मेरी क्रूरता के विषय में तो सोचिये!वह बालक प्रेमवश मेरी गोद में चढ़ना चाहता था, किन्तु मैंने न तो उसको आने दिया, न उसेएक क्षण भी दुलारा।
जरा सोचिये कि मैं कितना कठोर-हृदय हूँ!" नारद उबाचमा मा शुचः स्वतनयं देवगुप्तं विशाम्पते ।
तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृड्डे यद्यशों जगत् ॥
६८ ॥
नारद: उबवाच--नारद मुनि ने कहा; मा--मत; मा--मत; शुच्च: --दुखी होओ; स्व-तनयम्-- अपने पुत्र के लिए; देव-गुप्तम्ू--भगवान् द्वारा भली-भाँति रक्षित; विशाम्-पते--हे मानव समाज के स्वामी; तत्--उसका; प्रभावम्ू--प्रभाव; अविज्ञाय--बिनाजाने; प्रावृद्ें --चारों ओर फैला; यत्--जिसका; यश:--ख्याति; जगत्--संसार भर में |
महर्षि नारद ने उत्तर दिया: हे राजन, तुम अपने पुत्र के लिए शोक मत करो।
वह भगवान्द्वारा पूर्ण रूप से रक्षित है।
यद्यपि तुम्हें उसके प्रभाव के विषय में सही-सही जानकारी नहीं है,किन्तु उसकी ख्याति पहले ही संसार भर में फैल चुकी है।
"
सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभु: ।
ऐष्यत्यचिरतो राजन्यशो विपुलयंस्तव ॥
६९॥
सु-दुष्करम्ू--न कर सकने योग्य; कर्म--कार्य; कृत्वा--करके; लोक-पालै:ः --महापुरुषों द्वारा; अपि-- भी ; प्रभुः--अत्यन्तसमर्थ; ऐष्यति--लौटेगा; अचिरत:--शीघ्र ही; राजन्--हे राजा; यश:--कीर्ति; विपुलयन्--बढ़ाते हुए; तब--तुम्हारी |
हे राजन, तुम्हारा पुत्र अत्यन्त समर्थ है।
वह ऐसे कार्य करेगा जो बड़े-बड़े राजा तथा साधुभी नहीं कर पाते।
वह शीघ्र ही अपना कार्य पूरा करके घर वापस आएगा।
तुम यह भी जान लो कि वह तुम्हारी ख्याति को सारे संसार में फैलाएगा।
"
मैत्रेय उबाचइति देवर्षिणा प्रोक्त विश्रुत्य जगतीपति: ।
राजलक्ष्मीमनाहत्य पुत्रमेवान्बचिन्तयत् ॥
७०॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; देवर्षिणा--नारद मुनि द्वारा; प्रोक्तम्ू--कहा गया; विश्रुत्य--सुनकर; जगती-'पति:--राजा; राज-लक्ष्मीम्--राज्य का ऐश्वर्य; अनाहत्य--परवाह किये बिना; पुत्रमू--अपना पुत्र; एब--निश्चय ही;अन्वचिन्तयत्ू--सोचने लगा
मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : नारद मुनि से उपदेश प्राप्त करने के बाद राजा उत्तानपाद ने अपनेअत्यन्त विशाल एवं ऐश्वर्यमय राज्य के सारे कार्य छोड़ कर दिये और केवल अपने पुत्र ध्रुव केविषय में ही सोचने लगा।
"
तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।
समाहितः पर्यचरद्ृष्यादेशेन पूरुषम् ॥
७१॥
तत्र--तत्पश्चात्; अभिषिक्त: --स्नान करने के पश्चात्; प्रयतः--ध्यानपूर्वक; ताम्ू--उस; उपोष्य--उपवास करके; विभावरीम्--रात्रि; समाहितः--पूर्ण ध्यान से; पर्यचरत्--पूजा की; ऋषि--नारद ऋषि द्वारा; आदेशेन--आदेश के अनुसार; पूरुषम्--भगवान् की।
इधर, श्रुव महाराज ने मधुवन पहुँचकर यमुना नदी में स्नान किया और उस रात्रि को अत्यन्तमनोयोग से उपवास किया।
तत्पश्चात् वे नारद मुनि द्वारा बताई गई विधि से भगवान् की आराधनामें मग्न हो गये।
"
त्रिरात्रान्ते त्रिरात्रान्ते कपित्थबदराशन:ः ।
आत्पवृत्त्यनुसारेण मासं निन्येर्चयन्हरिम्ू ॥
७२॥
ब्रि--तीन; रात्र-अन्ते--रात बीतने पर; त्रि--तीन; रात्र-अन्ते--रात बीतने पर; कपित्थ-बदर--कैथा तथा बेर; अशनः--खातेहुए; आत्म-वृत्ति--शरीर पालने के लिए निर्वाह; अनुसारेण--आवश्यक या न्यूनतम; मासम्--एक माह; निन््ये--बीत गया;अर्चयन्-पूजा करते; हरिम्ू-- भगवान् की |
ध्रुव महाराज ने पहले महीने में अपने शरीर की रक्षा ( निर्वाह ) हेतु हर तीसरे दिन केवलकैथे तथा बेर का भोजन किया और इस प्रकार से वे भगवान् की पूजा को आगे बढ़ाते रहे।
"
द्वितीयं च तथा मासं षष्ठे षष्ठे र्भको दिने ।
तृणपर्णादिभि: शीर्णै: कृतान्नो भ्यर्चयन्विभुम् ॥
७३॥
द्वितीयमू--अगले मास; च--भी; तथा--उपयुक्त विधि से; मासम्--माह; षष्टे षष्टे-- प्रत्येक छह दिन पर; अर्भकः--अबोधबालक; दिने--दिने में; तृण-पर्ण-आदिभि:--घास-पात से; शीर्णै:--शुष्क; कृत-अन्न:--अन्न के रूप में; अभ्यर्चयन्ू--- औरइस प्रकार पूजा करता रहा; विभुम्-- भगवान् के लिए
दूसरे महीने में महाराज ध्रुव छह-छह दिन बाद खाने लगे।
शुष्क घास तथा पत्ते ही उनकेखाद्य पदार्थ थे।
इस प्रकार उन्होंने अपनी पूजा चालू रखी।
"
तृतीय चानयन्मासं नवमे नवमेहनि ।
अब्भक्ष उत्तमश्लोकमुपाधावत्समाधिना ॥
७४॥
तृतीयम्--तीसरे महीने; च-- भी; आनयनू--बीतने पर; मासम्ू--एक महीना; नवमे नवमे--प्रत्येक नवें; अहनि--दिन में;अपू-भक्ष:--केवल जल पीकर; उत्तम-शलोकम्-- भगवान्, जिनकी आराधना चुने हुए श्लोकों से की जाती है; उपाधावत्--पूजा की; समाधिना--समाधि में |
तीसरे महीने में वे प्रत्येक नवें दिन केवल जल ही पीते।
इस प्रकार वे पूर्ण रूप से समाधि मेंरहते हुए पुण्यश्लोक भगवान् की पूजा करते रहे।
"
चतुर्थमपि बे मासं द्वादशे द्वादशे हनि ।
वायुभक्षो जितश्चासो ध्यायन्देवमधारयत् ॥
७५॥
चतुर्थभमू--चौथे; अपि-- भी; बै--उस प्रकार; मासम्ू--माह; द्वादशे द्वादशे--प्रति बारहवें; अहनि--दिन में; वायु--हवा;भक्ष:--खाकर; जित-श्वास:-- श्वास क्रिया को वश में करके; ध्यायन्--ध्यान करते हुए; देवम्--परमे श्वर की; अधारयत्--
पूजा की चौथे महीने में श्रुव महाराज प्राणायाम में पटु हो गये और इस प्रकार प्रत्येक बारहवें दिनवायु को श्वास से भीतर ले जाते।
इस प्रकार अपने स्थान पर पूर्ण रूप से स्थिर होकर उन्होंनेभगवान् की पूजा की।
"
पञ्ञमे मास्यनुप्राप्ते जितश्रासो नृपात्मज: ।
ध्यायन्त्रह् पदैकेन तस्थौ स्थाणुरिवाचल: ॥
७६॥
पश्ञमे--पाँचवें; मासि--महीने में; अनुप्राप्त--स्थित होकर; जित-श्रास:--तब भी श्वास को नियंत्रित करके; नृप-आत्मज:--राजा का पुत्र; ध्यायन्ू-- ध्यान करता हुआ; ब्रह्म-- भगवान्; पदा एकेन--एक पाँव से; तस्थौ--खड़ा रहा; स्थाणु: --ढूँठ के;इब--समान; अचलः:--स्थिर, जड़ |
पाँचवें महीने में राजपुत्र महाराज श्लुव ने श्वास रोकने पर ऐसा नियत्रंण प्राप्त कर लिया किवे एक ही पाँव पर खड़े रहने में समर्थ हो गए, मानो कोई अचल दूँठ हो।
इस प्रकार उन्होंनेपरब्रह्म में अपने मन को केन्द्रित कर लिया।
"
सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम् ।
ध्यायन्भगवतो रूप नाद्राक्षीत्किल्ननापरम् ॥
७७॥
सर्वतः--सभी प्रकार से; मनः--मन को; आकृष्य--केन्द्रित करके; हृदि--हृदय में; भूत-इन्द्रिय-आशयम्--इन्द्रियों के आश्रयतथा विषयों; ध्यायन्-- ध्यान करते हुए; भगवत:-- भगवान् का; रूपम्--रूप, आकार; न अद्वाक्षीत्--नहीं देखा; किज्ञन--कुछ भी; अपरम्--अन्य |
उन्होंने अपनी इन्द्रियों तथा उनके विषयों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया और इस तरहअपने मन को चारों ओर से खींच कर भगवान् के रूप पर स्थिर कर दिया।
आधारं महदादीनां प्रधानपुरुषे श्वरम् ।
ब्रह्म धारयमाणस्य त्रयो लोकाश्चकम्पिरि ॥
७८ ॥
आधारम्--आश्रय; महत्-आदीनामू--समस्त भौतिक सृष्टि आदि, महत्-तत्त्व; प्रधान--मुख्य; पुरुष-ईश्वरम्--सभीजीवात्माओं का स्वामी; ब्रह्म--परब्रह्म परमेश्वर; धारयमाणस्य-- हृदय में धारण करके; त्रय:--तीनों; लोका:--लोक;चकम्पिरि--हिलने लगे।
इस प्रकार जब श्लरुव महाराज ने समग्र भौतिक सृष्टि के आश्रय तथा समस्त जीवात्माओं केस्वामी भगवान् को अपने वश में कर लिया तो तीनों लोक हिलने लगे।
"
यदैकपादेन स पार्थिवार्भक-स्तस्थौ तदड्ुष्ठनिपीडिता मही ।
ननाम तत्रार्धमिभेन्द्रधिष्ठितातरीब सब्येतरतः पदे पदे ॥
७९॥
यदा--जब; एक--एक; पादेन-- पाँव से; सः-- ध्रुव महाराज; पार्थिव--राजा का; अर्भक:--बालक; तस्थौ--खड़ा रहा;तत्-अब्ुष्ठ --उनके अँगूठे से; निपीडिता--दब कर; मही--पृथ्वी; ननाम--नीचे झुकी; तत्र--तब; अर्धम्--आधा; इभ-इन्द्र--हाथियों का राजा; धिष्ठिता--स्थित; तरी इब--नाव के समान; सव्य-इतरत:--दाहिने तथा बाएँ; पदे पदे--पग-पग पर |
जब राजपुत्र ध्रुव महाराज अपने एक पाँव पर अविचलित भाव से खड़े रहे तो उनके पाँव केभार से आधी पृथ्वी उसी प्रकार नीचे चली गई जिस प्रकार कि हाथी के चढ़ने से ( पानी में ) उसके प्रत्येक कदम से नाव कभी दाएँ हिलती है, तो कभी बाएँ।
"
तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनोद्वार निरुध्यासुमनन्यया धिया ।
लोका निरुच्छुसनिपीडिता भृशंसलोकपाला: शरणं ययुहरिम् ॥
८०॥
तस्मिन्ू-- ध्रुव महाराज; अभिध्यायति--पूर्ण मनोयोग से ध्यान करते हुए; विश्वम् आत्मन:--ब्रह्माण्ड का पूर्ण शरीर; द्वारम्--दरवाजे, छेद; निरुध्य--बन्द करके; असुम्--प्राण वायु; अनन्यया--अविचल भाव से; धिया--ध्यान; लोका:--सभी लोक;निरुच्छास-- श्वास लेना रोककर; निपीडिता: --दम घुटने से; भूशम्--शीघ्र; स-लोक-पाला:--विभिन्न लोकों के समस्त देवता;शरणम्--शरण; ययु:--ग्रहण की; हरिम्ू-- भगवान् की
जब श्रुव महाराज गुरुता में भगवान् विष्णु अर्थात् समग्र चेतना से एकाकार हो गये तो उनकेपूर्ण रूप से केन्द्रीभूत होने तथा शरीर के सभी छिद्रों के बन्द हो जाने से सारे विश्व की साँसघुटने लगी और सभी लोकों के समस्त बड़े-बड़े देवताओं का दम घुटने लगा।
अतः वे भगवान्की शरण में आये।
"
देवा ऊचु:नैवं विदामो भगवन्प्राणरोध॑चराचरस्याखिलसत्त्वधाम्न: ।
विधेहि तन्नो वृजिनाद्विमोश्षंप्राप्ता बय॑ त्वां शरणं शरण्यम् ॥
८१॥
देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; न--नहीं; एवम्--इस प्रकार; विदाम:--हम समझ पाते हैं; भगवन्--हे भगवान्; प्राण-रोधम्-रुद्ध हुआ श्वास; चर--चलता हुआ; अचरस्य--अचल का; अखिल--विश्वजनीन; सत्त्व--अस्तित्व; धाम्न:--आगार;विधेहि--कृपा करके जो आवश्यक हो करें; तत्ू--अतः; नः--हमारा; वृजिनात्ू--संकट से; विमोक्षम्--उद्धार; प्राप्ता:--निकट आता; वयम्--हम सभी; त्वाम्ू--तुमको; शरणम्--शरण; शरण्यम्ू--शरण ग्रहण की जाने योग्य |
देवताओं ने कहा : हे भगवान्, आप समस्त जड़ तथा चेतन जीवात्माओं के आश्रय हैं।
हमेंलग रहा है कि सभी जीवों का दम घुट रहा है और उनकी श्वास-क्रिया अवरुद्ध हो गई है।
हमेंऐसा अनुभव कभी नहीं हुआ।
आप सभी शरणागतों के चरम आश्रय है, अतः हम आपके पासआये हैं।
कृपया हमें इस संकट से उबारिये।
"
श्रीभगवानुवाचमा भेष्ट बाल॑ तपसो दुरत्यया-न्रिवर्तयिष्ये प्रतियात स्वधाम ।
यतो हि वः प्राणनिरोध आसी-दौत्तानपादिर्मयि सड्भतात्मा ॥
८२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने उत्तर दिया; मा भैष्ट--मत डरो; बालमू--बालक श्रुव; तपसः--कठिन तपस्या से;दुरत्ययात्-इृढ़ निश्चय; निवर्तयिष्ये--रोकने के लिए कहूँगा; प्रतियात-- तुम जा सकते हो; स्व-धाम--अपने घर; यतः--जिससे; हि--निश्चय ही; वः--तुम्हारा; प्राण-निरोध:--प्राण वायु का अवरोध; आसीत्--हुआ; औत्तानपादि:--राजाउत्तानपाद के पुत्र के कारण; मयि--मुझको; सड्भत-आत्मा--मेरे विचार में पूरी तरह लीन।
श्रीभगवान् ने उत्तर दिया : हे देवो, तुम इससे विचलित न होओ।
यह राजा उत्तानपाद के पुत्रकी कठोर तपस्या तथा हृढ़निश्चय के कारण हुआ है, जो इस समय मेरे चिन्तन में पूर्णतया लीनहै।
उसी ने सारे ब्रह्माण्ड की श्वास क्रिया को रोक दिया है।
तुम लोग अपने-अपने घरसुरक्षापूर्वक जा सकते हो।
मैं उस बालक को कठिन तपस्या करने से रोक दूँगा तो तुम इसपरिस्थिति से उबर जाओगे।
"
