← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय सात: दक्ष द्वारा किया गया यज्ञ
4.7मैत्रेय उवाचइत्यजेनानुनीतेन भवेन परितुष्यता ।
अभ्यधायि महाबाहो प्रहस्य श्रूयतामिति ॥
१॥
मैत्रेय:--मैत्रेय ने; उवाच--कहा; इति--इस प्रकार; अजेन--ब्रह्मा द्वारा; अनुनीतेन--शान्त किया जाकर; भवेन--शिव द्वारा;परितुष्यता--पूर्णतया सन्तुष्ट होकर; अभ्यधायि--कहा; महा-बाहो--हे विदुर; प्रहस्थ--हँस कर; श्रूयताम्--सुनो; इति--इसप्रकार।
मैत्रेय मुनि ने कहा : हे महाबाहु विदुर, भगवान् ब्रह्मा के शब्दों से शान्त होकर शिव नेउनकी प्रार्थना का उत्तर इस प्रकार दिया।
"
महादेव उबवाचनाघं प्रजेश बालानां वर्णये नानुचिन्तये ।
देवमायाभिभूतानां दण्डस्तत्र धृतो मया ॥
२॥
महादेव: --शिव ने; उवाच--कहा; न--नहीं; अघम्--पाप; प्रजा-ईश--हे प्रजापति; बालानाम्ू--बच्चों का; वर्णये--सत्कारकरता हूँ; न--नहीं; अनुचिन्तये -- मानता हूँ; देव-माया-- भगवान् की बहिरंगा शक्ति के; अभिभूतानामू--द्वारा ठगे हुओं का;दण्ड:--डंडा; तत्र--वहाँ; धृत:--प्रयुक्त; मया--मेरे द्वारा |
शिवजी ने कहा : हे पूज्य पिता ब्रह्माजी, मैं देवताओं द्वारा किये गये अपराधों की परवाहनहीं करता।
चूँकि ये देवता बालकों के समान अल्पज्ञानी हैं, अतः मैं उनके अपराधों परगम्भीरतापूर्वक विचार नहीं कर रहा हूं।
मैंने तो उन्हें राह पर लाने के लिए ही दण्डित किया है।
"
प्रजापतेर्दग्धशीष्णों भवत्वजमुखं शिरः ।
मित्रस्य चश्नुषेक्षेत भागं स्व॑ बर्हिषो भग: ॥
३॥
प्रजापते:-- प्रजापति दक्ष का; दग्ध-शीर्ष्ण:--जिसका सिर जलकर राख हो गया है; भवतु--हो जाए; अज-मुखम्--बकरे केमुँह से युक्त; शिरः--सिर; मित्रस्थ--मित्र के; चक्षुषा--नेत्रों से; ईक्षेत--देखे; भागम्-- भाग; स्वमू-- अपना; बर्हिष:--यज्ञका; भगः-- भग।
शिव ने आगे कहा : चूँकि दक्ष का सिर पहले ही जल कर भस्म हो चुका है, अतः उसेबकरे का सिर प्राप्त होगा।
भग नामक देवता, मित्र के नेत्रों से यज्ञ का अपना भाग देख सकेगा।
"
पूषा तु यजमानस्य दद्धिर्जक्षतु पिष्टभुक् ।
देवा: प्रकृतसर्वाड्रा ये म उच्छेषणं ददु: ॥
४॥
पूषा--पूषा; तु--लेकिन; यजमानस्य--यज्ञकर्ता का; दद्धिः--दाँतों से; जक्षतु--चबाए; पिष्ट-भुक्ू--आटे का भोजन;देवा:--देवता; प्रकृत--निर्मित; सर्व-अड्भा:--पूर्ण; ये-- जो; मे--मुझको; उच्छेषणम्--यज्ञ भाग; ददु:--दिया |
पूषादेव अपने शिष्यों के दाँतों से चबायेंगे और यदि अकेले चाहें तो उन्हें सत्तू की बनी लोईखाकर सन्तुष्ट होना पड़ेगा।
किन्तु जिन देवताओं ने मेरा यज्ञ-भाग देना स्वीकार कर लिया है वेसभी प्रकार की चोटों से स्वस्थ हो जाएँगे।
"
बाहुभ्यामश्विनो: पूष्णो हस्ताभ्यां कृतबाहव: ।
भवन्त्वध्वर्यवश्वान्ये बस्तश्म श्रुभगुर्भवेत् ॥
५॥
बाहुभ्याम्ू-दो भुजाओं से; अश्विनो: --अश्विनी कुमारों की; पृष्ण:--पूषा के; हस्ताभ्याम्-दो हाथों से; कृत-बाहवः--बाहुओंकी इच्छा रखने वाले; भवन्तु--हों; अध्वर्यवः--पुरोहितगण; च--तथा; अन्ये--अन्य; बस्त-श्म श्रु; --बकरे की दाढ़ी; भूगुः--भूगु; भवेत्--उसके हों ।
जिन लोगों की भुजाएँ कट गई हैं, उन्हें अश्विनी कुमार की बाहों से काम करना होगा औरजिनके हाथ कट गये हैं उन्हें पूषा के हाथों से काम करना होगा।
पुरोहितों को भी तदनुसार कार्यकरना होगा।
जहाँ तक भृगु का प्रशन है, उन्हें बकरे की दाढ़ी प्राप्त होगी।
"
मैत्रेय उवाचतदा सर्वाणि भूतानि श्रुत्वा मीदुष्टमोदितम् ।
परितुष्टात्मभिस्तात साधु साध्वित्यथाब्रुवन् ॥
६॥
मैत्रेय:--मैत्रेय सुनि ने; उवाच--कहा; तदा--उस समय; सर्वाणि--समस्त; भूतानि--मनुष्य; श्रुत्वा--सुनकर; मीढुः-तम--वरदेने वालों में श्रेष्ठ (शिव ); उदितम्--कहा गया; परितुष्ट--सन्तुष्ट होकर; आत्मभि:--हृदय तथा आत्मा से; तात--हे विदुर;साधु साधु-- धन्य-धन्य हुआ; इति--इस प्रकार; अथ अन्लुवन्--जैसा हम कह चुके हैं।
मैत्रेय मुनि ने कहा : हे विदुर, वहाँ पर उपस्थित सभी मनुष्य सर्वश्रेष्ठ वरदाता शिव के बचनोंको सुनने से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर गदगद हो गये।
"
ततो मीढ्वांसमामन्त्रय शुनासीरा: सहर्षिभि: ।
भूयस्तद्देवयजनं समीढ्वद्वेधसो ययु; ॥
७॥
ततः--तत्पश्चात्; मीढ्वांसमू--शिव; आमन््य--बुलाकर; शुनासीरा:--इन्द्र इत्यादि देवता; सह ऋषिभि: -- भृगु इत्यादि ऋषियोंसहित; भूय:--पुनः; तत्--उस; देव-यजनम्--वह स्थान जहाँ देवता पूजे जाते हैं; स-मीढ्वत्--शिव समेत; वेधस: --ब्रह्मासहित; ययुः--गये
तब मुनियों के प्रमुख भूगु ने शिवजी को यज्ञशाला में पधारने के लिए आमंत्रित किया।
इसतरह से ऋषिगण, शिवजी तथा ब्रह्मा समेत सभी देवता उस स्थान पर गये जहाँ वह महान् यज्ञसम्पन्न हो रहा था।
"
विधाय कार्त्स्येन च तद्यदाह भगवान्भव: ।
सन्दधु: कस्य कायेन सवनीयपशो: शिर: ॥
८॥
विधाय--सम्पन्न करके; कार्त्स्येन--सर्वेसर्वा; च-- भी; तत्ू--वह; यत्-- जो; आह--कहा गया; भगवान्-- भगवान्; भव: --शिव ने; सन्दधु: --सम्पन्न किया; कस्य--जीवित ( दक्ष ) का; कायेन--शरीर से; सवनीय--यज्ञ के निमित्त; पशो:--पशु का;शिरः--सिर।
जब शिवजी के निर्देशानुसार सब कुछ सम्पन्न हो गया तो यज्ञ में वध के निमित्त लाए पशुके सिर को दक्ष के शरीर से जोड़ दिया गया।
"
सन्धीयमाने शिरसि दक्षो रुद्राभिवीक्षितः ।
सद्यः सुप्त इवोत्तस्थौ ददशे चाग्रतो मृडम् ॥
९॥
सन्धीयमाने--सम्पन्न होने पर; शिरसि--सिर से; दक्ष:--राजा दक्ष; रुद्र-अभिवीक्षित:--रुद्र द्वारा देखे जाने पर; सद्यः --तुरन्त;सुप्ते--सोया हुआ; इब--समान; उत्तस्थौ--जगाया जाकर; ददशे--देखा; च-- भी; अग्रत:--समक्ष; मृडम्ू--शिव को |
जब दक्ष के शरीर पर पशु का सिर लगा दिया गया तो दक्ष को तुरन्त ही होश आ गया औरज्योंही वह निद्रा से जगा, तो उसने अपने समक्ष शिवजी को खड़े देखा।
"
तदा वृषध्वजद्वेषकलिलात्मा प्रजापति: ।
शिवावलोकादभवच्छरद्ध्रद इबामलः ॥
१०॥
तदा--उस समय; वृष-ध्वज--शिव, जो बैल पर सवार रहते हैं; द्वेष--ईर्ष्या; कलिल-आत्मा--दूषित हृदय; प्रजापति:--राजादक्ष; शिव--शिव को; अवलोकात्--देखने से; अभवत्--हो गया; शरत्--शरद ऋतु में; हृदः--झील; इब--सहश;अमलः--निर्मल, स्वच्छ।
उस समय जब दक्ष ने बैल पर सवारी करने वाले शिव को देखा तो उसका हृदय, जो शिवके प्रति द्वेष से कलुषित था, तुरन्त निर्मल हो गया, जिस प्रकार सरोवर का जल शरदकालीनवर्षा से स्वच्छ हो जाता है।
"
भवस्तवाय कृतधीर्नाशक्नोदनुरागत: ।
औत्कण्ठ्याद्वाष्पकलया सम्परेतां सुतां स्मरन् ॥
११॥
भव-स्तवाय--शिव की स्तुति के लिए; कृत-धी:--कृतसंकल्प; न--नहीं ही; अशक्नोत्--समर्थ था; अनुरागत:--विचार से;औत्कण्ठ्यात्--उत्कंठा से; बाष्प-कलया--आँखों में आँसू भर कर; सम्परेताम्--मृत; सुताम्--पुत्री; स्मरन्ू--स्मरण करतेहुए
राजा दक्ष ने शिव की स्तुति करनी चाही, किन्तु अपनी पुत्री सती की दुर्भाग्यपूर्ण-मृत्यू कास्मरण हो आने से उसके नेत्र आँसुओं से भर आये और शोक से उसकी वाणी अवरुद्ध हो गई।
वह कुछ भी न कह सका।
"
कृच्छात्संस्तभ्य च मन: प्रेमविह्लित: सुधीः ।
शशंस निर्व्यलीकेन भावेनेशं प्रजापति: ॥
१२॥
कृच्छात्--बड़े यत्न से; संस्तभ्य--शान्त करके; च-- भी; मन: --मन; प्रेम-विह्ललित:--प्रेम से विभोर; सु-धी:--जिसे चेत होआया हो; शशंस-- प्रशंसा की; निर्व्यलीकेन--बिना द्वैत के, अथवा अत्यन्त प्यार से; भावेन--विचार में; ईशम्--शिव की;प्रजापति:--राजा दक्ष
उस समय प्रेम-विहल होने से राजा दक्ष अत्यधिक जागरूक हो उठा।
उसने बड़े ही यत्न सेअपने मन को शान्त किया, अपने भावावेग को रोका और शुद्ध चेतना से शिव की स्तुति करनीप्रारम्भ की।
"
दक्ष उवाचभूयाननुग्रह अहो भवता कृतो मेदण्डस्त्वया मयि भृतो यदपि प्रलब्ध: ।
न ब्रह्मबन्धुषु च वां भगवन्नवज्ञातुभ्यं हरेश्व कुत एवं धृतब्रतेषु ॥
१३॥
दक्ष: उबाच--दक्ष ने कहा; भूयान्-- अत्यधिक; अनुग्रह:--कृपा; अहो--ओह; भवता--आपके द्वारा; कृतः--की गई; मे--मुझपर; दण्ड:--दण्ड, सजा; त्ववा--आपके द्वारा; मयि--मुझको; भृत:ः--की गई; यत् अपि--यद्यपि; प्रलब्ध: --पराजित;न--न तो; ब्रह्म-बन्धुषु-- अयोग्य ब्रह्मण को; च--भी; वाम्--तुम दोनों; भगवन्--मेरे स्वामी; अवज्ञा--अनादर; तुभ्यम्--आपका; हरे: च--विष्णु का; कुत:ः--कहाँ; एव--निश्चय ही; धृत-ब्रतेषु--यज्ञ करने में दत्तचित्त |
राजा दक्ष ने कहा : हे शिव, मैने आपके प्रति बहुत बड़ा अपराध किया है, किन्तु आप इतनेउदार हैं कि आपने अपने अनुग्रह से वंचित करने के बजाय, मुझे दण्ड देकर मेरे ऊपर कृपा कीहै।
आप तथा भगवान् विष्णु अयोग्य-निकम्मे ब्राह्मणों तक की उपेक्षा नहीं करते तो फिर भलाआप मेरी उपेक्षा क्यों करने लगे, मैं तो यज्ञ करने में लगा रहता हूँ?"
विद्यातपोब्रतधरान्मुखतः सम विप्रान्ब्रह्मात्मतत्त्वमवितु प्रथम त्वमस्त्राक् ।
तद्गाह्मणान्परम सर्वविपत्सु पासिपाल: पशूनिव विभो प्रगृहीतदण्ड: ॥
१४॥
विद्या--विद्या; तपः--तपस्या; ब्रत--ब्रत; धरान्--- अनुचर; मुखत:--मुख से $ स्म-- था; विप्रान्ू--ब्राह्मण: ब्रह्मा--ब्रह्मा;आत्म-तत्त्वम्ू-आत्म-साक्षात्कार; अवितुम्-फैलाने के लिए; प्रथमम्--पहले; त्वम्--तुम; अस्त्राकु--उत्पन्न किया; तत्--अतः; ब्राह्मणान्--ब्राह्मणों की; परम--हे महान; सर्व--सभी; विपत्सु--संकट में; पासि--रक्षा करते हो; पाल:--रक्षक कीतरह; पशून्ू-- पशु; इब--समान; विभो--हे महान; प्रगृहीत--हाथ में धारण किये; दण्ड:--डंडा |
हे महान् तथा शक्तिमान शिव, विद्या, तप, ब्रत तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए ब्राह्मणों कीरक्षा करने के हेतु ब्रह्म के मुख से सर्वप्रथम आपकी उत्पत्ति हुई थी।
आप ब्राह्मणों के पालकबनकर उनके द्वारा आचरित अनुष्ठानों की सदैव रक्षा करते हैं, जिस प्रकार ग्वाला गायों कीरखवाली के लिए अपने हाथ में दण्ड धारण किये रहता है।
"
योसौ मयाविदिततत्त्वदशा सभायांक्षिप्तो दुरुक्तिविशिखैर्विगणय्य तन्माम् ।
अर्वाक्पतन्तमर्हत्तमनिन्दयापाद्इृष्टचार्दया स भगवान्स्वकृतेन तुष्येत् ॥
१५॥
यः--जो; असौ--उस; मया--मेरे द्वारा; अविदित-तत्त्व--वास्तविकता को जाने बिना; हशा--अनुभव से; सभायाम्ू--सभामें; क्षिप्:--गाली दिया गया; दुरुक्ति--कटु वचन रूपी; विशिखै:ः--बाणों से; विगणय्य--परवाह न करके; तत्--वह;माम्--मुझको; अर्वाक्--नीचे की ओर; पतन्तम्--नरक में गिरते हुए; अईहत्-तम--सर्वाधिक पूज्य; निन्दया--निन्दा से;अपातू--बचा लिया; दृष्या--देख कर; आर्द्रया--दयावश; सः--वह; भगवान्-- भगवान्; स्व-कृतेन--अपनी कृपा से;तुष्येत्-प्रसन्न हो |
मैं आपकी समस्त कीर्ति से परिच्चित न था।
अतः मैंने खुली सभा में आपके ऊपर कटु शब्दरूपी बाणों की वर्षा की थी, तो भी आपने उनकी कोई परवाह नहीं की।
मैं आप जैसे परम पूज्यपुरुष के प्रति अवज्ञा के कारण नरक में गिरने जा रहा था, किन्तु आपने मुझ पर दया कर केऔर दण्डित करके मुझे उबार लिया है।
मेरी प्रार्थना है कि आप अपने ही अनुग्रह से प्रसन्न हों,क्योंकि मुझमें वह सामर्थ्य नहीं कि मैं अपने शब्दों से आपको तुष्ट कर सकूँ।
"
मैत्रेय उवाचक्षमाप्यैवं स मीढ्वांसं ब्रह्मणा चानुमन्त्रित: ।
कर्म सन््तानयामास सोपाध्यायर्त्विगादिभि: ॥
१६॥
मैत्रेय:--मैत्रेय मुनि ने; उवाच--कहा; क्षमा-- क्षमा; आप्य--प्राप्त करके; एवम्--इस प्रकार; सः--राजा दक्ष; मीढ्वांसम्--शिव को; ब्रह्मणा-- ब्रह्मा सहित; च-- भी; अनुमन्त्रितः --अनुमति पाकर; कर्म--यज्ञ; सन््तानयाम् आस-- पुनः प्रारम्भ किया;स--सहित; उपाध्याय--विद्वान साधु; ऋत्विक् --पुरोहित; आदिभि: --इत्यादि के द्वारा |
मैत्रेय मुनि ने कहा : इस प्रकार शिवजी द्वारा क्षमा कर दिये जाने पर राजा दक्ष ने ब्रह्मा कीअनुमति से विद्वान साधुओं, पुरोहितों तथा अन्यों के साथ पुनः यज्ञ करना प्रारम्भ कर दिया।
"
वैष्णवं यज्ञसन्तत्यै त्रिकपालं द्विजोत्तमा: ।
पुरोडाशं निरवपन्वीरसंसर्गशुद्धये ॥
१७॥
वैष्णवम्--विष्णु या उनके भक्तों के हेतु; यज्ञ-यज्ञ; सन्तत्यै--कृत्यों के लिए; त्रि-कपालम्--तीन प्रकार की भेंटें; द्विज-उत्तमा:--ब्राहमणों में श्रेष्ठ; पुरोडाशम्--पुरोडाश नामक आहुतिनि; निरवपन्-- भेंट की गईं; वीर--वीरभद्र तथा शिव के अन्यअनुचर; संसर्ग--स्पर्श के कारण दोष; शुद्धये--शुद्धि के लिए
तत्पश्चात ब्राह्मणों ने यज्ञ कार्य फिर से प्रारम्भ करने के लिए वीरभद्र तथा शिव के भूत-प्रेतसदृश अनुचरों के स्पर्श से प्रदूषित हो चुके यज्ञ स्थल को पवित्र करने की व्यवस्था की।
तबजाकर उन्होंने अग्नि में पुरोडाश नामक आहुतियाँ अर्पित की।
"
अध्वर्युणात्तरविषा यजमानो विशाम्पते ।
धिया विशुद्धया दध्यौ तथा प्रादुरभूद्धरिः ॥
१८॥
अध्वर्युणा--यजुर्वेद से; आत्त--लेकर; हविषा--घृत से; यजमान:--राजा दक्ष; विशाम्-पते--हे विदुर; धिया--चिन्तन में;विशुद्धबा-शुद्ध की गई; दध्यौ--डाला; तथा--तुरन्त; प्रादु:--प्रकट; अभूत्--हो गये; हरि:--हरि, भगवान्
महामुनि मैत्रेय ने विदुर से कहा : हे विदुर, जैसे ही राजा दक्ष ने शुद्धचित्त से यजुर्वेद केमंत्रो के साथ घी की आहुति डाली, वैसे ही भगवान् विष्णु अपने आदि नारायण रूप में वहाँप्रकट हो गये।
"
तदा स्वप्रभया तेषां द्योतयन्त्या दिशो दश ।
मुष्णंस्तेज उपानीतस्ताक्ष्येण स्तोत्रवाजिना ॥
१९॥
तदा--उस समय; स्व-प्रभया--अपने तेज से; तेषाम्--उन सबों के ; द्योतयन्त्या--कान्ति से; दिश:--दिशाएँ; दश--दस;मुष्णन्ू--कम करते हुए; तेज: --तेज; उपानीत:--लाया गया; ता्ष्येण --गरुड़ द्वारा; स्तोत्र-वाजिना--जिसके पंख बृहत् तथारथन्तर कहलाते हैं।
भगवान् नारायण स्तोत्र अर्थात् गरुड़ के कन्धे पर आरूढ़ थे, जिसके बड़े-बड़े पंख थे।
जैसे ही भगवान् प्रकट हुए, सभी दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं जिससे ब्रह्मा तथा अन्य उपस्थितजनों की कान्ति घट गई।
"
इयामो हिरण्यरशनोर्ककिरीटजुष्टोनीलालकशभ्रमरमण्डितकुण्डलास्य: ।
शझ्जब्जचक्रशरचापगदासिचर्म -व्यग्रर्हिरण्मयभुजैरिव कर्णिकार: ॥
२०॥
श्याम:--श्याम वर्ण के; हिरण्य-रशनः --स्वर्ण के समान वस्त्र; अर्क-किरीट-जुष्ट:ः --सूर्य के समान देदीप्यमान मुकुट; नील-अलक--काले बाल; भ्रमर--भौरे; मण्डित-कुण्डल-आस्यः--कुण्डलों से सुशोभित मुख; शद्भु--शंख; अब्ज--कमल पुष्प;चक्र--चक्र; शर--बाण; चाप-- धनुष; गदा--गदा; असि--तलवार; चर्म--ढाल; व्यग्रै: --पूरित; हिरण्मय--सुनहले( बाजूबन्द तथा कंगन ); भुजैः--हाथों से; इब--सहृश; कर्णिकार: --पुष्प-वृक्ष, कनेर।
उनका वर्ण श्याम था, उनके वस्त्र स्वर्ण की तरह पीले तथा मुकुट सूर्य के समान देदीप्यमानथा।
उनके बाल भौंरों के समान काले और मुख कुण्डलों से आभूषित था।
उनकी आठ भुजाएँशंख, चक्र, गदा, कमल, बाण, धनुष, ढाल तथा तलवार धारण किये थीं ये कंगन तथाबिजावट जैसे स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत थीं।
उनका सारा शरीर कनेर के उस कुसुमित वृक्ष केसमान प्रतीत हो रहा था जिसमें विभिन्न प्रकार के फूल सुन्दर ढंग से सजे हों।
"
वक्षस्यधिश्रितवधूर्वनमाल्युदार-हासावलोककलया रमयंश्न विश्वम् ।
पार्श्भ्रमद्व्यजनचामरराजहंस:श्रेतातपत्रशशिनोपरि रज्यमान: ॥
२१॥
वक्षसि--छाती पर; अधिश्रित--स्थित; वधू: --स्त्री ( लक्ष्मी )वन-माली--वनपुष्पों की माला पहने; उदार--सुन्दर; हास--हँसती हुई; अवलोक--चितवन; कलया--किंचित्; रमयन्--मोहक; च--तथा; विश्वम्--पूरा संसार; पार्थ--बगल; भ्रमत्--आगे-पीछे हिलते हुए; व्यजन-चामर--झलने के लिए सफेद चबूँरी गाय की पूँछ; राज-हंसः--हंस; श्रेत-आतपत्र-शशिना--चन्द्र के समान श्वेत छत्र से; उपरि--ऊपर; रज्यमान:--सुन्दर दिखता हुआ।
भगवान् विष्णु असाधारण रूप से सुन्दर लग रहे थे, क्योंकि उनके वक्षस्थल पर ऐश्वर्य कीदेवी ( लक्ष्मी ) तथा एक हार विराजमान थे।
उनका मुख मन्द हास के कारण अत्यन्त सुशोभितथा, जो सारे जगत को और विशेष रूप से भक्तों के मन को मोहने वाला था।
भगवान् के दोनोंओर श्वेत चामर डुल रहे थे, मानो श्वेत हंस हों और उनके ऊपर तना हुआ श्वेत छत्र चन्द्रमा के" समान लग रहा था।
तमुपागतमालक्ष्य सर्वे सुरगणादय: ।
प्रणेमु: सहसोत्थाय ब्रहोन्द्रव्यक्षनायका: ॥
२२॥
तम्--उसको; उपागतम्--आया हुआ; आलक्ष्य--देखकर; सर्वे --सभी; सुर-गण-आदय:--देवता अथा अन्य लोग; प्रणेमु:--नमस्कार; सहसा--तुरन्त; उत्थाय--खड़े होकर; ब्रह्म--ब्रह्माजी; इन्द्र--इन्द्रदेव; त्रि-अक्ष--शिव ( जिनके तीन नेत्र हैं ) ;नायका:--के नायकत्व में |
जैसे ही भगवान् विष्णु दृष्टिगोचर हुए, वहाँ पर उपस्थित--ब्रह्मा, शिव, गंधर्व तथा वहाँउपस्थित सभी जनों ने उनके समक्ष सीधे गिरकर ( दण्डवत् ) सादर नमस्कार किया।
"
तत्तेजसा हतरुच: सन्नजिह् ससाध्वसा: ।
मूर्ध्ना धृताझ्ललिपुटा उपतस्थुरधोक्षजम् ॥
२३॥
ततू-तेजसा--उनके शरीर के चमचमाते तेज से; हत-रुच:--मलिन कान्ति वाला; सन्न-जिह्ना:ः--मौन जीभ से; स-साध्वसा:--उनके भय से भयभीत; मूर्ध्न--सर सहित; धृत-अद्जलि-पुटा:--सिर पर हाथ रखे; उपतस्थु: --प्रार्थना की; अधोक्षजम्--अधोक्षज भगवान् की |
नारायण की शारीरिक कान्ति के तेज से अन्य सबों की कान्ति मन्द पड़ गई और सबों काबोलना बन्द हो गया।
आश्चर्य तथा सम्मान से भयभीत, सबों ने अपने-अपने सिरों पर हाथ धरलिये और भगवान् अधोक्षज की स्तुति करने के लिए उद्यत हो गए।
"
अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महि त्वात्मभुवादय:ः ।
यथामति गृणन्ति सम कृतानुग्रहविग्रहम् ॥
२४॥
अपि--अब भी; अर्वाक्-वृत्तय:--मानसिक क्रिया-कलापों से परे; यस्य--जिसकी; महि--यश; तु-- लेकिन; आत्मभू-आदय: --ब्रह्मा इत्यादि ने; यथा-मति--अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार; गृणन्ति स्म--स्तुति की; कृत-अनुग्रह--उनकेअनुग्रह से प्रकट; विग्रहम्--दिव्य रूप |
यद्यपि ब्रह्मा जैसे देवता भी परमेश्वर की अनन्त महिमा का अनुमान लगाने में असमर्थ थे,किन्तु वे सभी भगवान् की कृपा से उनके दिव्य रूप को देख सकते थे।
अतः वे अपने-अपनेसामर्थ्य के अनुसार उनकी सादर स्तुति कर सके।
"
दक्षो गृहीताईणसादनोत्तमंयज्जेश्वरं विश्वसूजां परं गुरुम् ।
सुनन्दनन्दाद्यनुगैर्वृत मुदागृणन्प्रपेदे प्रयतः कृताझ्ञललि: ॥
२५॥
दक्ष:--दक्ष ने; गृहीत--ग्रहण कर लिया; अर्हण --उचित; सादन-उत्तमम्--पूजा-पात्र; यज्ञ-ई श्वरम्--समस्त यज्ञों के स्वामीको; विश्व-सूजाम्--समस्त प्रजापतियों को; परम्--परम; गुरुम्--उपदेशक; सुनन्द-नन्द-आदि-अनुगै: --सुनन्द तथा नन््द जैसपार्षदों द्वारा; वृतम्ू-घिरा हुआ; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; गृणन्--स्तुति करते हुए; प्रपेदे--शरण ली; प्रयतः--विनीत भाव से;कृत-अज्जञलि:--हाथ जोड़ कर।
जब भगवान् विष्णु ने यज्ञ में डाली गई आहुतियों को स्वीकार कर लिया तो दक्ष प्रजापति नेअत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उनकी स्तुति करनी प्रारम्भ की।
वस्तुतः भगवान् समस्त यज्ञों के स्वामीऔर सभी प्रजापतियों के गुरु हैं और नन्द-सुनन्द जैसे पुरुष तक उनकी सेवा करते हैं।
"
दक्ष उबाचशुद्ध स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्धयवस्थंचिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् ।
तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्याम्आस्ते भवानपरिशुद्ध इवात्मतन्त्र: ॥
२६॥
दक्ष:--दक्ष ने; उबाच--कहा; शुद्धम्-शुद्ध; स्व-धाम्नि-- अपने धाम में; उपरत-अखिल--पूर्णतया रहित; बुद्धि-अवस्थम्--मानसिक कल्पना की अवस्था; चित्-मात्रम्-पूर्णतया आध्यात्मिक; एकम्--अद्वितीय; अभयम्--निडर; प्रतिषिध्य--वश मेंकरके; मायाम्-- भौतिक शक्ति को; तिष्ठन्--स्थित होकर; तया--उस ( माया ) के द्वारा; एब--निश्चय ही; पुरुषत्वम्--पर्यवेक्षक; उपेत्य--प्रविष्ट होकर; तस्याम्--उसमें; आस्ते--उपस्थित है; भवान्--आप; अपरिशुद्ध:--अशुद्ध; इब--मानो;आत्म-तन्त्र:--आत्म-निर्भर, स्वतंत्रदक्ष ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा--हे प्रभु, आप समस्त कल्पना-अवस्थाओं सेपरे हैं।
आप परम चिन्मय, भय-रहित और भौतिक माया को वश में रखने वाले हैं।
यद्यपि आपमाया में स्थित प्रतीत होते हैं, किन्तु आप दिव्य हैं।
आप भौतिक कल्मष से मुक्त हैं, क्योंकि आपपरम स्वतंत्र हैं।
"
ऋत्विज ऊचुःतत्त्वं न ते वयमनझ्जन रुद्रशापात्कर्मण्यवग्रहधियो भगवन्विदाम: ।
धर्मोपलक्षणमिदं त्रिवृदध्वराख्य॑ज्ञातं यदर्थमधिदैवमदो व्यवस्था: ॥
२७॥
ऋत्विज: --पुरोहितों ने; ऊचु:--कहतना प्रारम्भ किया; तत्त्वम्--सत्य; न--नहीं; ते--आपका; वयम्--हम सब; अनझ्जन--किसी भौतिक कल्मष से रहित; रुद्र--शिव के; शापात्--शाप से; कर्मणि--सकाम कर्मों में; अवग्रह--अत्यधिक लिप्त रहनेसे; धियः--ऐसी बुद्धि का; भगवन्--हे भगवान्; विदाम:--जानते हैं; धर्म--धर्म; उपलक्षणम्--सांकेतिक; इृदम्--यह; त्रि-वबृत्-वेद ज्ञान के तीन विभाग, वेदत्रयी; अध्वर--यज्ञ; आख्यम्--नाम का; ज्ञातम्ू--ज्ञात; यत्--वह; अर्थम्--प्रयोजन केहेतु; अधिदैवम्--देवताओं की पूजा के लिए; अदः--यह; व्यवस्था: --प्रबन्ध, व्यवस्था |
पुरोहितों ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा--हे भगवन्, आप भौतिक कल्मष से परेहैं।
शिव के अनुचरों द्वारा दिये गये शाप के कारण हम सकाम कर्म में लिप्त हैं, अतः हम पतितहो चुके हैं और आपके विषय में कुछ भी नहीं जानते।
उल्टे, हम यज्ञ के नाम पर अनुष्ठानों कोसम्पन्न करने के लिए वेदत्रयी के आदेशों में आ फँसे हैं।
हमें ज्ञात है कि आपने देवताओं कोअपने-अपने उनके भाग दिये जाने की व्यवस्था कर रखी है।
"
सदस्या ऊचुःउत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेन्तको ग्र-व्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्यात्मगेहोरु भार: ।
इन्द्रध्रश्न खलमृगभये शोकदावेऊज्ञसार्थ:पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसूष्ट: ॥
२८॥
सदस्या:--सभा के सदस्य; ऊचु:--बोले; उत्पत्ति--जन्म-मृत्यु का चक्र; अध्वनि--के मार्ग पर; अशरणे--जिसका आश्रय नहो; उरु--महान; क्लेश--कष्टकारक; दुर्गे--किले में; अन्तक--अन्त; उग्र--डरावना; व्याल--सर्प; अन्विष्टे--परिपूर्ण ;विषय--भौतिक सुख; मृग-तृषि--मृग-तृष्णा; आत्म--शरीर; गेह--घर; उरू-- भारी; भार: -- भार, बोझ; द्वन्ध--द्वैत; श्रश्रे--छिद्र, सुख तथा दुख के खंदक; खल--दुष्ट; मृग--पशु; भये--डरा हुआ; शोक-दावे--शोक रूपी दावाग्नि; अज्ञ-स-अर्थ:--दुष्टों के हित के लिए; पाद-ओक:--चरणकमलों की शरण; ते--तुम्हारे; शरण-द--शरण देने वाला; कदा--जब;याति--गया; काम-उपसृष्ट:--सभी प्रकार की इच्छाओं से दुखित।
सभा के सदस्यों ने भगवान् को सम्बोधित किया--हे संतप्त जीवों के एकमात्र आश्रय, इसबद्ध संसार के दुर्ग में काल-रूपी सर्प प्रहार करने की ताक में रहता है।
यह संसार तथाकथितसुख तथा दुख की खंदकों से भरा पड़ा है और अनेक हिंस्त्र पशु आक्रमण करने को सन्नद्ध रहतेहैं।
शोक रूपी अग्नि सदैव प्रज्वलित रहती है और मृषा सुख की मृगतृष्णा सदैव मोहती रहतीहै, किन्तु मनुष्य को इनसे छुटकारा नहीं मिलता।
इस प्रकार अज्ञानी पुरुष जन्म-मरण के चक्र मेंपड़े रहते हैं और अपने तथाकथित कर्तव्यों के भार से सदा दबे रहते हैं।
हमें ज्ञात नहीं कि वेआपके चरणकमलों की शरण में कब जाएँगे।
"
रुद्र उबाचतव वरद वराड्घ्रावाशिषेहाखिलार्थहाषि मुनिभिरसक्तैरादरेणाहणीये ।
यदि रचितधियं माविद्यलोकोपविद्धंजपति न गणये तत्त्वत्परानुग्रहेण ॥
२९॥
रुद्र: उबाच--शिव ने कहा; तब--तुम्हारा; वर-द--हे परम दानी; वर-अड्घ्रौ -- अमूल्य चरणकमल; आशिषा--इच्छा से;इह--संसार में; अखिल-अर्थ--पूर्ति के लिए; हि अपि--निश्चय ही; मुनिभि:--मुनियों द्वारा; असक्तै:--मुक्त; आदरेण--आदरपूर्वक; अर्हणीये-- पूज्य; यदि--यदि; रचित-धियम्--स्थिर मन; मा--मुझको; अविद्य-लोक: --अज्ञानी पुरुष;अपविद्धमू--अशुद्ध कर्म; जपति--कहता है; न गणये--मूल्य नहीं जानते; तत्--वह; त्वत्-पर-अनुग्रहेण--आप की जैसीकृपा से।
शिवजी ने कहा : हे भगवान्, मेरा मन तथा मेरी चेतना निरन्तर आपके पूजनीय चरणकमलोंपर स्थिर रहती है, जो समस्त वरों तथा इच्छाओं की पूर्ति के स्त्रोत होने के कारण समस्त मुक्तमहामुनियों द्वारा पूजित हैं क्योंकि आपके चरण कमल ही पूजा के योग्य।
आपके चरणकमलोंमें मन को स्थिर रखकर मैं उन व्यक्तियों से विचलित नहीं होता जो यह कहकर मेरी निन््दा करतेहैं कि मेरे कर्म पवित्र नहीं हैं।
में उनके आरोपों की परवाह नहीं करता और मैं उसी प्रकारदयावश उन्हें क्षमा कर देता हूँ, जिस प्रकार आप समस्त जीवों के प्रति दया प्रदर्शित करते हैं।
"
भूगुरुवाचयन्मायया गहनयापहतात्मबोधाब्रह्मादयस्तनुभूतस्तमसि स्वपन्त: ।
नात्मन्श्रितं तव विदन्त्यधुनापि तत्त्वंसोथयं प्रसीदतु भवान्प्रणतात्मबन्धु; ॥
३०॥
भूगु: उवाच--उवाच श्रीभूगु ने कहा; यत्--जो; मायया--माया से; गहनया--दुर्लध्य; अपहृत--चुराया हुआ; आत्म-बोधा: --स्वाभाविक स्थिति का ज्ञान; ब्रहय-आदय: --ब्रह्मा इत्यादि ; तनु-भृतः--जीवात्माओं सहित; तमसि--मोहान्धकार में;स्वपन्तः--सोये हुए; न--नहीं; आत्मन्--जीवात्मा में; भ्रितम्--स्थित; तब--तुम्हारा; विदन्ति--जानते हैं; अधुना--अब;अपि--निश्चय ही; तत्त्वमू--परम पद; सः--वह ( आप ); अयम्--यह; प्रसीदतु--प्रसन्न हों; भवान्ू--आप; प्रणत-आत्म--शरणागत जीव के; बन्धु:--सखा
मित्रभूगु मुनि ने कहा : हे भगवन्, सर्वोच्च ब्रह्म से लेकर सामान्य चींटी तक सारे जीव आपकीमाया शक्ति के दुर्लघ्य जादू के वशीभूत हैं और इस प्रकार वे अपनी स्वाभाविक स्थिति सेअपरिचित हैं।
देहात्मबुद्धि में विश्वास करने के कारण सभी मोह के अंधकार में पड़े हुए हैं।
वेवास्तव में यह नहीं समझ पाते कि आप प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा के रूप में कैसे रहते हैं, नतो वे आपके परम पद को ही समझ सकते हैं।
किन्तु आप समस्त शरणागत जीवों के नित्यसखा एवं रक्षक हैं।
अतः आप हम पर कृपालु हों और हमारे समस्त पापों को क्षमा कर दें।
"
ब्रह्मोवाचनैतत्स्वरूपं भवतोसौ पदार्थ-भेदग्रहैः पुरुषो यावदीक्षेत् ।
ज्ञानस्थ चार्थस्य गुणस्य चाश्रयोमायामयादव्यतिरिक्तो मतस्त्वम् ॥
३१॥
ब्रह्मा उवाच--ब्रह्मा ने कहा; न--नहीं; एतत्--यह; स्वरूपम्--अनित्य रूप; भवत:--आपका; असौ--वह; पद-अर्थ--ज्ञान;भेद--भिन्न; ग्रहैः--प्राप्ति से; पुरुष:--पुरुष; यावत्--जब तक; ईक्षेत्--देखना चाहता है; ज्ञानस्य--ज्ञान का; च--भी;अर्थस्य--लक्ष्य का; गुणस्य--ज्ञान के साधनों का; च-- भी; आश्रय: --आधार; माया-मयात्--माया से निर्मित होने से;व्यतिरिक्त:--स्पष्ट; मतः--माना हुआ; त्वम्--तुम |
ब्रह्मजी ने कहा : हे भगवन्, यदि कोई पुरुष आपको ज्ञानअर्जित करने की विभिन्न विधियोंद्वारा जानने का प्रयास करे तो वह आपके व्यक्तित्व एवं शाश्वत रूप को नहीं समझ सकता।
आपकी स्थिति भौतिक सृष्टि की तुलना में सदैव दिव्य है, जबकि आपको समझने के प्रयास,लक्ष्य तथा साधन सभी भौतिक और काल्पनिक हैं।
"
इन्द्र उबाचइदमप्यच्युत विश्वभावनंवपुरानन्दकरं मनोहृशाम् ।
सुरविद्विट्क्षपणैरुदायुधै -भुजदण्डैरुपपन्नमष्टभि: ॥
३२॥
इन्द्र: उबाच--राजा इन्द्र ने कहा; इदम्--यह; अपि--निश्चय ही; अच्युत--हे अच्युत; विश्व-भावनम्--विश्व के कल्याण हेतु;वपु:--दिव्य रूप; आनन्द-करम्-- आनन्द के कारण; मनः-हशाम्--मन तथा नेत्रों को; सुर-विद्विटू--आपके भक्तों से ईर्ष्यालु;क्षपणै: --दण्ड द्वारा; उद्-आयुधे: -- हथियार उठाये; भुज-दण्डै:--बाहों से; उपपन्नम्--युक्त; अष्टभि:--आठ |
राजा इन्द्र ने कहा : हे भगवन्, प्रत्येक हाथ में आयुध धारण किये आपका यह अष्टभुजदिव्य रूप सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु प्रकट होता है और मन तथा नेत्रों को अत्यन्त आनन्दितकरने वाला है।
आप इस रूप में अपने भक्तों से ईर्ष्या करने वाले असुरों को दण्ड देने के लिएसदैव तत्पर रहते हैं।
"
पल्य ऊचु:यज्ञोयं तब यजनाय केन सूष्टोविध्वस्त: पशुपतिनाद्य दक्षकोपात् ।
त॑ नस्त्वं शवशयनाभशान्तमेधंयज्ञात्मन्नलिनरुचा हशा पुनीहि ॥
३३॥
पल्य: ऊचु:--यज्ञकर्ताओं की पत्नियों ने कहा; यज्ञ:--यज्ञ; अयम्--यह; तब--तुम्हारा; यजनाय--पूजा के हेतु; केन--ब्रह्माद्वारा; सृष्ट: --व्यवस्थित; विध्वस्त: --नष्ट- भ्रष्ट; पशुपतिना--शिव द्वारा; अद्य--आज; दक्ष-कोपात्--दक्ष पर क्रोध करने से;तमू--यह; नः--हमारा; त्वमू--तुम; शव-शयन--मृत शरीर; आभ--के समान; शान्त-मेधम्--शान्त बलि-पशु; यज्ञ-आत्मनू्--हे यज्ञ के स्वामी; नलिन--कमल; रुचा--सुन्दर; हशा--अपने नेत्रों की दृष्टि से; पुनीहि--पवित्र कीजिये
याज्ञिकों की पत्नियों ने कहा : हे भगवान्, वह यज्ञ ब्रह्म के आदेशानुसार व्यवस्थित कियागया था, किन्तु दुर्भाग्यवश दक्ष से क्रुद्ध होकर शिव ने समस्त दृश्य को ध्वस्त कर दिया औरउनके रोष के कारण यज्ञ के निमित्त लाये गये पशु निर्जीव पड़े हैं।
अतः यज्ञ की सारी तैयारियाँबेकार हो चुकी हैं।
अब आपके कमल जैसे नेत्रों की चितवन से इस यज्ञस्थल की पवित्रता पुनःप्राप्त हो।
"
ऋषय ऊचु:अनन्वितं ते भगवन्विचेष्टितंयदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे ।
विभूतये यत उपसेदुरी श्वरींन मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान् ॥
३४॥
ऋषय:--ऋषियों ने; ऊचु:--प्रार्थना की; अनन्वितम्-- आश्चर्यजनक; ते--तुम्हारा; भगवन्--हे समस्त ऐ श्वर्यों के स्वामी;विचेष्टितम्ू--कार्यकलाप; यत्--जो; आत्मना--अपनी शक्तियों से; चरसि--करते हो; हि--निश्चय ही; कर्म--ऐसे कार्यों को;न अज्यसे--लिप्त नहीं होते; विभूतये--उसकी कृपा के हेतु; यतः--जिससे; उपसेदु:--पूज्य; ईश्वरीम्-ऐश्वर्य की देवी, लक्ष्मी;न मन्यते--लिप्त नहीं होती हैं; स्वयम्--स्वयं; अनुवर्ततीम्--अपनी आज्ञाकारी दासी ( लक्ष्मी ); भवान्ू--आप
ऋषियों ने प्रार्थना की: हे भगवान्, आपके कार्य अत्यन्त आश्चर्यमय हैं और यद्यपि आप सबकुछ अपनी विभिन्न शक्तियों से करते हैं, किन्तु आप उनसे लिप्त नहीं होते।
यहाँ तक कि आपसम्पत्ति की देवी लक्ष्मीजी से भी लिप्त नहीं हैं, जिनकी पूजा ब्रह्माजी जैसे बड़े-बड़े देवताओंद्वारा उनकी कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती है।
"
सिद्धा ऊचुःअयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यांमनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः ॥
तृषार्तोड>वगाढो न सस्मार दावंन निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्न: ॥
३५॥
सिद्धाः:--सिद्धों ने; ऊचुः--प्रार्थना की; अयम्ू--वह; त्वत्ू-कथा--आपकी लीलाएँ; मृष्ट--शुद्ध; पीयूष-- अमृत की;नद्यामू--नदी में; मन: --मन का; वारण:--हाथी; क्लेश--कष्ट; दाव-अग्नि--जंगल की आग से; दग्ध: --जला हुआ; तृषा--प्यास; आर्त:--त्रस्त; अवगाढ:--निमज्जित; न सस्मार--स्मरण नहीं करते; दावम्--दावाग्नि या कष्टों को; न निष्क्रामति--बाहर नहीं आता; ब्रह्म--परम; सम्पन्न-वत्--मानो तदाकार हों; न:--हम |
सिद्धों ने स्तुति की : हे भगवन्, हमारे मन उस हाथी के समान हैं, जो जंगल की आग सेत्रस्त होने पर नदी में प्रविष्ट हो ते ही सभी कष्ट भूल सकता है।
उसी तरह ये हमारे मन भीआपकी दिव्य लीलाओं की अमृत-नदी में निमज्जित हैं और ऐसे दिव्य आनन्द में निरन्तर बनेरहना चाहते हैं, जो परब्रह्म में तदाकार होने के सुख के समान ही है।
"
यजमान्युवाचस्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमःश्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः ।
त्वामृतेधीश नाड्रैर्मखः शोभतेशीर्षहीन: कबन्धो यथा पुरुष: ॥
३६॥
यजमानी--दक्ष की पत्नी ने; उबाच--प्रार्थना की; सु-आगतम्--शुभ आगमन; ते--आपका; प्रसीद-प्रसन्न हों; ईश--मेरेभगवान्; तुभ्यम्ू--तुमको; नमः--नमस्कार है; श्रीनिवास--हे सम्पत्ति की देवी के धाम; अ्रिया--लक्ष्मी समेत; कान्तया--अपनी पतली; त्राहि--रक्षा करें; न:--हमारी; त्वामू--तुम्हारे; ऋते--बिना; अधीश--हे परम नियंता; न--नहीं; अच्डैः--शारिरिक अंगों से; मख:--यज्ञ स्थल; शोभते--शोभा पाता है; शीर्ष-हीन:--शिर रहित; क-बन्ध: -- धड़; यथा--जिस प्रकार;पुरुष:--पुरुषदक्ष की पत्नी ने इस प्रकार प्रार्थना की--हे भगवान्यह हमारा सौभाग्य है कि आपयज्ञस्थल में पधारे हैं।
मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ और आपसे प्रार्थना करती हूँ कि इसअवसर पर आप प्रसन्न हों।
यह यज्ञस्थल आपके बिना शोभा नहीं पा रहा था, जिस प्रकार किसिर के बिना धड़ शोभा नहीं पाता।
"
लोकपाला ऊचु:इृष्ट: कि नो हग्भिरसदग्रहैस्त्वंप्रत्यग्द्रष्टा इश्यते येन विश्वम् ।
माया होषा भवदीया हि भूमन्यस्त्वं षष्ठ: पञ्ञभिर्भास भूतेः ॥
३७॥
लोक-पाला:--विभिन्न लोकों के प्रशासकों ने; ऊचु:--कहा; दृष्ट:--देखा हुआ; किमू--क्या; न: --हमारे द्वारा; हग्भि: --इन्द्रियों सें; असत्-ग्रहैः--हश्य जगत को प्रकट करने वाले; त्वम्--तुम; प्रत्यक्-द्रष्टा-- आन्तरिक साक्षी; दृश्यते--देखा जाताहै; येन--जिससे; विश्वम्--ब्रह्मण्ड; माया-- भौतिक जगत; हि-- क्योंकि; एघा--यह; भवदीया--आपकी; हि--निश्चय ही;भूमन्--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; य:ः--क्योंकि; त्वम्--तुम; षष्ठ:--छठवाँ; पञ्ञभि:--पाँच; भासि--प्रकट होते हो; भूतैः --तत्त्वों से
विभिन्न लोकों के लोकपालों ने इस प्रकार कहा : हे भगवन्, हम अपनी प्रत्यक्ष प्रतीति परही विश्वास करते हैं, किन्तु इस परिस्थिति में हम नहीं जानते कि हमने आपका दर्शन वास्तव मेंअपनी भौतिक इन्द्रियों से किया है अथवा नहीं ।
इन इन्द्रियों से तो हम हृश्य जगत को ही देखपाते हैं, किन्तु आप तो पाँच तत्त्वों के परे हैं।
आप तो छठवें तत्त्व हैं।
अतः हम आपको भौतिकजगत की सृष्टि के रूप में देख रहे हैं।
"
योगेश्वरा ऊचुःप्रेयान्न तेउन्यो स्त्यमुतस्त्वयि प्रभोविश्वात्मनीक्षेन्न पृथग्य आत्मन: ।
अथापि भक्त्येश तयोपधावता-मनन्यदृत्त्यानुगृहाण बत्सल ॥
३८॥
योग-ई श्वराः -- परम योगीजनों ने; ऊचु:--कहा; प्रेयान्-- अत्यन्त प्रिय; न--नहीं; ते--तुम्हारा; अन्य:--दूसरा; अस्ति-- है;अमुतः--उससे; त्वयि--तुम में; प्रभो--हे ईश्वर; विश्व-आत्मनि--समस्त जीवात्माओं के परमात्मा में; ईक्षेत्--देखते हैं; न--नहीं; पृथक्ू-भिन्न; यः--जो; आत्मन:--जीवात्माएँ; अथ अपि-- और अधिक; भक्त्या--भक्ति से; ईश--हे भगवान्; तया--उससे; उपधावताम्--पूजा करने वालों का; अनन्य-वृत्त्या--न चूकने वाला; अनुगृहाण--कृपा करें; वत्सल--हे हितकारी भगवान्महान्
योगियों ने कहा : हे भगवान्, जो लोग यह जानते हुए कि आप समस्त जीवात्माओंके परमात्मा हैं, आपको अपने से अभिन्न देखते हैं, वे निश्चय ही आपको परम प्रिय हैं।
जोआपको स्वामी तथा अपने आपको दास मानकर आपकी भक्ति में अनुरक्त रहते हैं, आप उन परपरम कृपालु रहते हैं।
आप कृपावश उन पर सदैव हितकारी रहते हैं।
"
जगदुद्धवस्थितिलयेषु दैवतोबहुभिद्यमानगुणयात्ममायया ।
रचितात्मभेदमतये स्वसंस्थयाविनिवर्तितभ्रमगुणात्मने नम: ॥
३९॥
जगत्--भौतिक जगत; उद्धव--सृष्टि; स्थिति--पालन; लयेषु--संहार में; दैवत:-- भाग्य; बहु-- अनेक ; भिद्यमान--भिन्नता;गुणया--भौतिक गुणों के द्वारा; आत्म-मायया--अपनी भौतिक शक्ति से; रचित--उत्पन्न; आत्म--जीवात्माओं; भेद-मतये--भिन्न-भिन्न विचारों को उत्पन्न करने वाली भेदबुद्धि; स्व-संस्थया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; विनिवर्तित--रोका गया; भ्रम--बन्धन; गुण-- भौतिक गुणों का; आत्मने--उनके साक्षात् रूप को; नमः--नमस्कार।
हम उन परम पुरुष को सादर नमस्कार करते हैं जिन्होंने नाना प्रकार की वस्तुएँ उत्पन्न कींऔर उन्हें भौतिक जगत के त्रिगुणों के वशीभूत कर दिया जिससे उनकी उत्पत्ति, स्थिति तथासंहार हो सके।
वे स्वयं बहिरंगा शक्ति के अधीन नहीं हैं, वे साक्षात् रूप में भौतिक गुणों केविविध प्राकट्य से रहित हैं और मिथ्या मायामोह से दूर हैं।
"
ब्रह्मोवाचनमस्ते थ्रितसत्त्वाय धर्मादीनां च सूतये ।
निर्गुणाय च यत्काष्ठटां नाहं वेदापरेडपि च ॥
४०॥
ब्रह्म--साक्षात् वेद ने; उबाच--कहा; नम: --सादर नमस्कार; ते--तुमको; श्रित-सत्त्वाय--सतोगुण के आश्रय; धर्म-आदीनाम्--समस्त धर्म तथा तपस्या; च--तथा; सूतये--स्त्रोत; निर्गुणाय--भौतिक गुणों से परे; च--तथा; यत्--जिसका( परमेश्वर का ); काष्ठाम्--स्थिति; न--नहीं; अहम्--मैं; बेद--जानता हूँ; अपरे-- अन्य; अपि--निश्चय ही; च--तथासाक्षात्
वेदों ने कहा : हे भगवान्, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं, क्योंकि आपसतोगुण के आश्रय होने के कारण समस्त धर्म तथा तपस्या के स्त्रोत हैं; आप समस्त भौतिकगुणों से परे हैं और कोई भी न तो आपको और न आपकी वास्तविक स्थिति को जानने वालाहै।
"
अग्निरुवाचयत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजाहव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् ।
त॑ यज्ञियं पञ्जञविधं च पञ्ञभिःस्विष्टे यजुर्मि: प्रणतोस्मि यज्ञम् ॥
४१॥
अग्नि:ः--अग्निदेव ने; उबाच--कहा; यत्-तेजसा--जिसके तेज से; अहम्--मैं; सु-समिद्ध-तेजा: -- प्रज्वलित अग्नि के समानतेजवान; हव्यम्--आहुतियाँ; वहे--स्वीकार करता हूँ; सु-अध्वरे--यज्ञ में; आज्य-सिक्तम्-घृतमिश्रित; तम्--वह;यज्ञियम्ू--यज्ञ का रक्षक; पञ्ञ-विधम्--पाँच; च--तथा; पञ्चभि:--पाँच द्वारा; सु-इष्टम्-- पूज्य; यजुर्भि:-- वैदिक मंत्र;प्रणतः--सादर नत; अस्मि--मैं हूँ; यज्ञम्--यज्ञ ( विष्णु ) को।
अग्निदेव ने कहा : हे भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आपकी हीकृपा से मैं प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी हूँ और मैं यज्ञ में प्रदत्त घृतमिश्रित आहुतियाँस्वीकार करता हूँ।
यजुर्वेद में वर्णित पाँच प्रकार की हवियाँ आपकी ही विभिन्न शक्तियाँ हैं औरआपकी पूजा पाँच प्रकार के वैदिक मंत्रों से की जाती है।
यज्ञ का अर्थ ही आप अर्थात् परमभगवान् है।
"
देवा ऊचुःपुरा कल्पापाये स्वकृतमुदरीकृत्य विकृतंत्वमेवाद्यस्तस्मिन्सलिल उरगेन्द्राधिशयने ।
पुमान्शेषे सिद्धैईदि विमृशिताध्यात्मपदवि:स एवाद्याक्ष्णोर्य: पथि चरसि भृत्यानवसि न: ॥
४२॥
देवा:--देवताओं ने; ऊचु:--कहा; पुरा--पहले, पूर्व; कल्प-अपाये--कल्पान्त में; स्व-कृतम्-- आत्म-प्रसूत; उदरी-कृत्य--उदरस्थ करके; विकृतम्--प्रभाव; त्वम्ू--तुम; एब--निश्चय ही; आद्य:--आदि; तस्मिन्ू--उसमें; सलिले--जल में; उरग-इन्द्र--शेष पर; अधिशयने--शय्या पर; पुमानू--पुरुष; शेषे--शयन करते हुए; सिद्धैः--मुक्तात्माओं ( यथा सनकादि ) द्वारा );हृदि--हृदय में; विमृशित-- ध्यान किया गया; अध्यात्म-पदविः--दार्शनिक चिन्तन का मार्ग; सः--वह; एव--निश्चय ही;अद्य--अब; अक्ष्णो:--दोनों नेत्रों का; यः--जो; पथि--पथ पर; चरसि--चलते हो; भृत्यानू--दास; अवसि--रक्षा करो;नः--हमारी।
देवताओं ने कहा : हे भगवान्, पहले जब प्रलय हुआ था, तो आपने भौतिक जगत कीविभिन्न शक्तियों को संरक्षित कर लिया था।
उस समय ऊर्ध्वलोकों के सभी वासी, जिनमें सनकजैसे मुक्त जीव भी थे, दार्शनिक चिन्तन द्वारा आपका ध्यान कर रहे थे।
अत: आप आदिपुरुषहैं।
आप प्रलयकालीन जल में शेषशय्या पर शयन करते हैं।
अब आज आप हमारे के समक्षदिख रहे हैं।
हम सभी आप के दास हैं।
कृपया हमें शरण दीजिये।
"
गन्धर्वा ऊचुःअंशांशास्ते देव मरीच्यादय एतेब्रह्मेन्द्राद्य देवगणा रुद्रपुरोगा: ।
क्रीडाभाण्डं विश्वमिदं यस्य विभूमन्तस्मै नित्यं नाथ नमस्ते करवाम ॥
४३॥
गन्धर्वा:--गंधर्वों ने; ऊचु:--कहा; अंश-अंशा:--आपके शरीर के विभिन्न अंश; ते--तुम्हारे; देब--हे भगवान्; मरीचि-आदय: --मरीचि तथा अन्य ऋषिगण; एते--ये; ब्रह्म-इन्द्र-आद्या: -- ब्रह्मा, इन्द्र इत्यादि; देव-गणा:--देवता; रुद्र-पुरोगा:--शिव ही जिनके प्रधान हैं; क्रीडा-भाण्डमू--खिलौना; विश्वम्--सारी सृष्टि; इदमू--यह; यस्य--जिसका; विभूमन्-- भगवन्;तस्मै--उसको; नित्यमू-सदैव; नाथ--हे भगवान्; नम:--सादर नमस्कार; ते--तुमको; करवाम--हम करते हैं।
गन्धर्वों ने कहा : हे भगवन्, शिव, ब्रह्मा, इन्द्र तथा मरीचि समेत समस्त देवता तथाऋषिगण आपके ही शरीर के विभिन्न अंश हैं।
आप परम शक्तिमान हैं, यह सारी सृष्टि आपकेलिए खिलवाड़ मात्र है।
हम सदैव आपको पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् रूप में स्वीकार करते है औरआपको सादर नमस्कार करते हैं।
"
विद्याधरा ऊचुःत्वन्माययार्थभभिपद्य कलेवरेस्मिन्कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथे: स्वै: ।
क्षिप्तोप्यसद्विषषयलालस आत्ममोहंयुष्मत्कथामृतनिषेवक उद्व्युदस्येत् ॥
४४॥
विद्याधरा:--विद्याधरों ने; ऊचु:--कहा; त्वत्ू-मायया--आपकी बहिरंगा शक्ति से; अर्थम्--मानव शरीर; अभिपद्य-प्राप्तकरके; कलेवरे--शरीर में; अस्मिन्ू--इस; कृत्वा--ठीक से न पहचान करके; मम--मेरा; अहम्--मैं; इति--इस प्रकार;दुर्मतिः-- अज्ञानी पुरुष; उत्पथै:--गलत मार्ग से; स्वै:--स्वजनों के द्वारा; क्षिप्त:--विपथ; अपि-- भी; असत्-- क्षणिक;विषय-लालस: -- भोग की वस्तुओं में सुख मानकर; आत्म-मोहम्--देह को आत्मा मानने का मोह; युष्मत्--आपकी; कथा--कथा, वार्ता; अमृत--अमृत; निषेवक:--आस्वादन करता हुआ; उत्--दूर से; व्युदस्येत्--उद्द्धार हो सकता है|
विद्याधरों ने कहा : हे प्रभु, यह मानव देह सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के निमित्त है, किन्तुआपकी बहिरंगा शक्ति के वशीभूत होकर जीवात्मा अपने आपको भ्रमवश देह तथा भौतिकशक्ति मान बैठता है, अतः माया के वश में आकर वह सांसारिक भोग द्वारा सुखी बनना चाहताहै।
वह दिग्भ्रमित हो जाता है और क्षणिक माया-सुख के प्रति सदैव आकर्षित होता रहता है।
किन्तु आपके दिव्य कार्यकलाप इतने प्रबल हैं कि यदि कोई उनके श्रवण तथा कीर्तन में अपनेको लगाए तो मोह से उसका उद्धार हो सकता है।
"
ब्राह्मणा ऊचु:त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताश: स्वयंत्वं हि मन्त्र: समिदहर्भपात्राणि च ।
त्वं सदस्यर्त्विजो दम्पती देवताअग्निहोत्रं स्वधा सोम आज्यं पशु: ॥
४५॥
ब्राह्मणा:--ब्राह्मणों ने; ऊचुः--कहा; त्वम्ू--तुम; क्रतु:--यज्ञ; त्वमू--तुम; हवि:ः--घी की आहुति; त्वम्--तुम; हुत-आशः--अग्नि; स्वयम्--साक्षात्; त्वमू--तुम; हि-- क्योंकि; मन्त्र:ः--वैदिक मंत्र; समित्-दर्भ-पात्राणि--ईंधन, कुश तथा यज्ञके पात्र; च--तथा; त्वम्ू--तुम; सदस्य--सभा के सदस्य; ऋत्विज: --पुरोहित; दम्पती--यजमान तथा उसकी पली; देवता--देवता; अग्नि-होत्रम्ू--पवित्र अग्नि-उत्सव; स्वधा--पितरों की हवि; सोम:--सोम पादप; आज्यम्--घृत; पशु:--यज्ञ कापशु।
ब्राह्मणों ने कहा : हे भगवान्, आप साक्षात् यज्ञ हैं।
आप ही घृत की आहुति हैं; आप अग्निहैं; आप वैदिक मंत्रों के उच्चारण हैं, जिनसे यज्ञ कराया जाता है; आप ईंधन हैं; आप ज्वाला हैं;आप कुश हैं और आप ही यज्ञ के पात्र हैं।
आप यज्ञकर्ता पुरोहित हैं, इन्द्र आदि देवतागण आपही हैं और आप यज्ञ-पशु हैं।
जो कुछ भी यज्ञ में अर्पित किया जाता है, वह आप या आपकीशक्ति है।
"
त्वं पुरा गां रसाया महासूकरोदंष्टया पद्धिनीं वारणेन्द्रो यथा ।
स्तूयमानो नदल्लीलया योगिभि-व्युजहर्थ त्रयीगात्र यज्ञक्रतु: ॥
४६॥
त्वमू--तुम; पुरा-- भूतकाल में; गाम्ू--पृथ्वी; रसाया:--जल के भीतर से; महा-सूकरः --महान् शूकर अवतार; दंष्टया --अपनी दाढ़ से; पद्चिनीमू--कमलिनी; वारण-इन्द्र:--हाथी; यथा--जिस प्रकार; स्तूयमान:--स्तुति किया गया; नदनू--गूँजताहुआ; लीलया--सरलता से; योगिभि:--सनक इत्यादि परम साधुओं द्वारा; व्युजहर्थ--ऊपर उठाया; त्रयी-गात्र--हे साक्षात्वैदिक ज्ञान; यज्ञ-क्रतु:--यज्ञ के रूप में |
हे भगवान्, हे साक्षात् वैदिक ज्ञान, अत्यन्त पुरातन काल पहले, पिछले युग में जब आपमहान् सूकर अवतार के रूप में प्रकट हुए थे तो आपने पृथ्वी को जल के भीतर से इस प्रकारऊपर उठा लिया था जिस प्रकार कोई हाथी सरोवर में से कमलिनी को उठा लाता है।
जब आपनेउस विराट सूकर रूप में दिव्य गर्जन किया, तो उस ध्वनि को यज्ञ मंत्र के रूप में स्वीकार करलिया गया और सनक जैसे महान् ऋषियों ने उसका ध्यान करते हुए आपकी स्तुति की।
"
स प्रसीद त्वमस्माकमाकादुक्षतां दर्शन ते परिभ्रष्टसत्कर्मणाम् ।
कीरत्यमाने नृभिर्नाम्नि यज्ञेश तेयज्ञविघ्ना: क्षयं यान्ति तसस््मै नमः: ॥
४७॥
सः--वही व्यक्ति; प्रसीद--प्रसन्न हों; त्वमू--आप; अस्माकम्--हम पर; आकाइुक्षताम्-- प्रतीक्षा करते हुए; दर्शनम्--दर्शन;ते--तुम्हारा; परिभ्रष्ट--पतित; सत्-कर्मणाम्--जिससे यज्ञ कार्य; कीर्त्यमाने--कीर्तन किया जाकर; नृभि:--पुरुषों द्वारा;नाम्नि--आपका पवित्र नाम; यज्ञ-ईश--हे यज्ञों के स्वामी; ते--तुम्हारा; यज्ञ-विष्ना:--बाधाएँ; क्षयम्--विनाश; यान्ति--प्राप्त करते हैं; तस्मै--तुमको; नमः--नमस्कार है।
हे भगवान्, हम आपके दर्शन के लिए प्रतीक्षारत थे क्योंकि हम वैदिक अनुष्ठानों के अनुसारयज्ञ करने में असमर्थ रहे हैं।
अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हम पर प्रसन्न हों।
आपकेपवित्र नाम-कीर्तन मात्र से समस्त बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
हम आपके समक्ष आपको सादरनमस्कार करते हैं।
"
मैत्रेय उवाचइति दक्ष: कविर्यज्ञं भद्र रुद्राभिमशितम् ।
कीर्त्यमाने हषीकेशे सन्निन्ये यज्ञभावने ॥
४८ ॥
मैत्रेय:--मैत्रेय ने; उदाच--कहा; इति--इस प्रकार; दक्ष:--दक्ष; कवि:--चेतना के परिशुद्ध हो जाने पर; यज्ञम्ू--यज्ञ; भद्र--हे विदुर; रुद्र-अभिमर्शितम्--वीरभद्र द्वारा विध्वंसित; कीर्त्य-माने--महिमा का वर्णन किये जाने पर; हषीकेशे -- भगवान्विष्णु; सन्निन्ये-- पुनः प्रारम्भ करने की व्यवस्था की; यज्ञ-भावने--यज्ञ का रक्षक |
श्रीमैत्रेय ने कहा : वहाँ पर उपस्थित सबों के द्वारा विष्णु की स्तुति किये जाने पर दक्ष नेअन्तःकरण शुद्ध हो जाने से पुनः यज्ञ प्रारम्भ किये जाने की व्यवस्था की, जिसे शिव केअनुचरों ने ध्वंस कर दिया था।
"
भगवान्स्वेन भागेन सर्वात्मा सर्वभागभुक् ।
दक्षं बभाष आभाष्य प्रीयमाण इवानघ ॥
४९॥
भगवानू्-- भगवान् विष्णु; स्वेन--अपने से; भागेन--अंश ( भाग ) से; सर्व-आत्मा--समस्त जीवात्माओं का परमात्मा; सर्व-भाग-भुक्--समस्त यज्ञों के फल के भोक्ता; दक्षमू--दक्ष; बभाषे--कहा; आभाष्य--सम्बोधित करके; प्रीयमाण:--प्रसन्न;इब--सहश; अनघ--हे पापरहित विदुर।
मैत्रेय ने आगे कहा : हे पापमुक्त विदुर, भगवान् विष्णु ही वास्तव में समस्त यज्ञों के फल केभोक्ता हैं।
फिर भी समस्त जीवात्माओं के परमात्मा होने से वे अपना यज्ञ-भाग प्राप्त हो जाने सेप्रसन्न हो गये, अतः उन्होंने प्रमुदित भाव से दक्ष को सम्बोधित किया।
"
श्रीभगवानुवाचअहं ब्रह्मा च शर्वश्व॒ जगत: कारणं परम् ।
आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्ववन्हगविशेषण: ॥
५०॥
श्री-भगवान्-- भगवान् विष्णु ने; उवाच--कहा; अहमू--मैं; ब्रह्मा--ब्रह्मा; च--तथा; शर्व:--शिव; च--तथा; जगत: --दृश्यजगत का; कारणम्--कारण; परमू-- परम; आत्म-ई श्वरः -- परमात्मा; उपद्रष्टा-- साक्षी; स्वयम्-हक् -- आत्म-निर्भर;अविशेषण: -- भेदरहित |
भगवान् विष्णु ने उत्तर दिया ब्रह्मा, शिव तथा मैं इस दृश्य जगत के परम कारण हैं।
मैंपरमात्मा, स्वःनिर्भर साक्षी हूँ।
किन्तु निर्गुण-निराकार रूप में ब्रह्मा, शिव तथा मुझमें कोई अन्तरनहीं है।
"
आत्ममायां समाविश्य सोहं गुणमयीं द्विज ।
सृजन्रक्षन्हरन्विश्वैं दश्ने संज्ञां क्रियोचिताम् ॥
५१॥
आत्म-मायाम्--अपनी शक्ति में; समाविश्य--प्रवेश करके; सः--स्वयं ; अहम्--मैं; गुण-मयीम्-- प्राकृतिक गुणों से युक्त;द्वि-ज--हे द्विजन्मा दक्ष; सृजन्--सृष्टि करते हुए; रक्षनू--पालन करते हुए; हरन्ू--संहार करते हुए; विश्वम्--हृश्य जगत;दक्षे--मैं उत्पन्न होता हूँ; संज्ञामू--नाम; क्रिया-उचिताम्--क्रिया के अनुसार
भगवान् ने कहा : हे दक्ष द्विज, मैं आदि भगवान् हूँ, किन्तु इस हश्य जगत की सृष्टि, पालनतथा संहार के लिए मैं अपनी भौतिक शक्ति के माध्यम से कार्य करता हूँ और कार्य की भिन्नकोटियों के अनुसार मेरे भिन्न-भिन्न नाम हैं।
"
तस्मिन्ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि ।
ब्रह्मरुद्रो च भूतानि भेदेनाज्ञोडनुपश्यति ॥
५२॥
तस्मिन्ू--उसको; ब्रह्मणि--परब्रह्म; अद्वितीये--अद्वितीय; केवले-- अकेला; परम-आत्मनि--पर मात्मा; ब्रह्म-रुद्रौ--ब्रह्मा तथाशिव दोनों; च--तथा; भूतानि--जीवात्माएँ; भेदेन--विलगाव से; अज्ञ:--नादान, अज्ञानी; अनुपश्यति--सोचता है।
भगवान् ने आगे कहा : जिसे समुचित ज्ञान प्राप्त नहीं है, वह ब्रह्म तथा शिव जैसे देवताओंको स्वतंत्र समझता है या वह यह भी सोचता है कि जीवात्माएँ भी स्वतंत्र हैं।
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यथा पुमात्र स्वाड्रेषु शिरःपाण्यादिषु क्वचित् ।
पारक्यबुद्धि कुरुते एवं भूतेषु मत्पर: ॥
५३॥
यथा--जिस प्रकार; पुमान्ू--पुरुष; न--नहीं; स्व-अड्लेषु--अपने ही शरीर में; शिर:-पाणि-आदिषु--सिर, हाथ तथा शरीर केअन्य भागों में; क्वचित्--क भी -क भी ; पारक्य-बुद्धिम्-- अन्तर; कुरुते--करते हैं; एवम्--इस प्रकार; भूतेषु--जीवात्माओं में;मतू-परः--मेरा भक्त |
सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति सिर तथा शरीर के अन्य भागों को पृथक्-पृथक् नहीं मानता।
इसी प्रकार मेरे भक्त सर्वव्यापी भगवान् विष्णु तथा किसी वस्तु या किसी जीवात्मा में अन्तर नहींमानते।
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त्रयाणामेक भावानां यो न पश्यति वै भिदाम् ।
सर्वभूतात्मनां ब्रह्मनम्स शान्तिमधिगच्छति ॥
५४॥
त्रयाणाम्--तीनों का; एक-भावानाम्--एक ही स्वभाव वाले; य:ः--जो; न पश्यति--नहीं देखता; बै--निश्चय ही; भिदाम्ू--पृथक्ता; सर्व-भूत-आत्मनाम्--समस्त जीवात्माओं के परमात्मा का; ब्रह्मनू-हे दक्ष; सः--वह; शान्तिम्ू--शान्ति;अधिगच्छति--प्राप्त करता है
भगवान् ने आगे कहा : जो मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव या जीवात्माओं को परब्रह्म से पृथक्नहीं मानता और ब्रह्म को जानता है, वही वास्तव में शान्ति प्राप्त करता है, अन्य नहीं।
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मैत्रेय उवाचएवं भगवतादिष्ट: प्रजापतिपतिहरिम् ।
अर्चित्वा क्रतुना स्वेन देवानुभयतोयजत् ॥
५५॥
मैत्रेय:--मैत्रेय; उवाच--कहा; एवम्--इस प्रकार; भगवता-- भगवान् द्वारा; आदिष्ट:--आदेश दिया जाकर; प्रजापति-'पति:ः--समस्त प्रजापतियों के प्रधान; हरिम्--हरि की; अर्चित्वा--पूजा करके; क्रतुना--यज्ञोत्सव से; स्वेन--अपना; देवानू--देवताओं की; उभयत:--पृथक्-पृथक्; अयजत्--पूजा की |
मैत्रेय मुनि ने कहा : इस प्रकार भगवान् से भलीभाँति आदेश पाकर समस्त प्रजापतियों केप्रधान दक्ष ने भगवान् विष्णु की पूजा की।
यज्ञोत्सव के लिए स्वीकृत विधि से उनकी पूजा करनेके अनन्तर उसने ब्रह्म तथा शिव की भी अलग-अलग पूजा की।
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रुद्रं च स्वेन भागेन ह्युपाधावत्समाहितःकर्मणोदवसानेन सोमपानितरानपि ।
उदवस्य सहर्तिग्भि: सस्नाववभूथं ततः ॥
५६॥
रुद्रमू--शिव को; च--तथा; स्वेन-- अपने; भागेन-- भाग से; हि-- चूँकि; उपाधावत्--पूजा की; समाहित:ः--ध्यानस्थ होकर;कर्मणा--कर्म से; उदवसानेन--समाप्त करने के कार्य द्वारा; सोम-पान्ू--देवता; इतरान्ू--अन्य; अपि-- भी; उदवस्य--समाप्त करके; सह--साथ-साथ; ऋत्विग्भि: --पुरोहितों के साथ; सस्नौ--स्नान किया; अवभूथम्-- अवभूथ-स्नान; तत:--तब
दक्ष ने सभी प्रकार से सम्मान पूर्वक यज्ञ के शेष भाग के साथ शिव की पूजा की।
याज्ञिकअनुष्ठानों की समाप्ति के पश्चात् उसने अन्य समस्त देवों तथा वहाँ पर एकत्र अन्य जनों को संतुष्टकिया।
तब पुरोहितों के साथ-साथ इन सारे कर्तव्यों को सम्पन्न करके उसने स्नान किया औरबह पूर्णतया संतुष्ट हुआ।
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तस्मा अप्यनुभावेन स्वेनैवावाप्तराधसे ।
धर्म एवं मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययु: ॥
५७॥
तस्मै--उस ( दक्ष ) को; अपि--ही; अनुभावेन-- परमेश्वर की पूजा द्वारा; स्वेन-- अपने से; एव--निश्चय ही; अवाप्त-राधसे--सिद्धि प्राप्त करके; धर्में-- धर्म में; एब--निश्चय ही; मतिम्--बुद्ध्धि; दत्त्वा--देकर; त्रिदशा:--देवता; ते--वे; दिवम्--स्वर्गलोक को; ययुः:--चले गये।
इस प्रकार यज्ञ के अनुष्ठान द्वारा विष्णु की पूजा करके दक्ष पूर्ण रूप से धार्मिक पथ परस्थित हो गया।
इसके साथ ही, यज्ञ में समागत समस्त देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया कि*धर्मनिष्ठ हो' और तब वे चले गये।
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एवं दाक्षायणी हित्वा सती पूर्वकलेवरम् ।
जज्ने हिमवतः क्षेत्रे मेनायामिति शुश्रुम ॥
५८॥
एवमू--इस प्रकार; दाक्षायणी--दक्ष की पुत्री; हित्वा--त्याग कर; सती--सती ; पूर्व-कलेवरम्-- अपना पहले का शरीर;जज्ञे--उत्पन्न हुई; हिमवतः--हिमालय के; क्षेत्रे--पत्ली ( के गर्भ ) में; मेनायाम्-- मेना में; इति--इस प्रकार; शु श्रुम--मैंने सुनाहै।
मैत्रेय ने कहा : मैंने सुना है कि दक्ष से प्राप्त शरीर को त्याग देने के पश्चात दाक्षायणी ( दक्षकी पुत्री ) ने हिमालय के राज्य में जन्म लिया।
वह मेना की पुत्री के रूप में जन्मी।
इसे मैंनेप्रामाणिक स्त्रोतों से सुना है।
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तमेव दयितं भूय आवृड्धे पतिमम्बिका ।
अनन्यभावैकगतिं शक्ति: सुप्तेव पूरुषम् ॥
५९॥
तम्--उस ( शिव ) को; एव--निश्चय ही; दयितम्--प्रिया; भूय:ः --पुन:; आवृड्धे --स्वीकार किया; पतिम्--पति रूप में;अम्बिका--अम्बिका या सती; अनन्य-भावा--अन्यों से अलिप्त; एक-गतिमू--एक लक्ष्य; शक्ति:--( तटस्था तथा बाह्य ),स्त्री शक्तियाँ; सुप्ता--निष्क्रिय; इब--सहृश; पूरुषम्--पुरुष ( परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में शिव )।
अम्बिका ( देवी दुर्गा ) ने, जो दाक्षायणी ( सती ) कहलाती थीं, पुनः शिव को अपने पतिके रूप में स्वीकार किया, जिस प्रकार कि भगवान् की विभिन्न शक्तियाँ नवीन सृष्टि के समयकार्य करती हैं।
"
एतद्धगवतः शम्भो: कर्म दक्षाध्वरद्रुह: ।
श्रुतं भागवताच्छिष्यादुद्धवान्मे बृहस्पते: ॥
६०॥
एतत्--यह; भगवतः --समस्त ऐ श्वर्य के स्वामी; शम्भो:--शम्भु ( शिव ) का; कर्म--कथा; दक्ष-अध्वर-द्गुह: --जिसने दक्ष केयज्ञ का विध्वंस किया; श्रुतम्--सुना गया; भागवतात्--परम भक्त से; शिष्यात्--शिष्य से; उद्धवात्--उद्धव से; मे--मेरे द्वारा;बृहस्पते:-- बृहस्पति के
मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, मैंने परम भक्त एवं बृहस्पति के शिष्य उद्धव से शिव द्वारा ध्वंसकिये गये दक्ष-यज्ञ की यह कथा सुनी थी।
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इदं पवित्र परमीशचेष्टितंयशस्यमायुष्यमघौधमर्षणम् ।
यो नित्यदाकर्णय्य नरोनुकीर्तयेद्धुनोत्यघं कौरव भक्तिभावत: ॥
६१॥
इदम्--यह; पवित्रम्-शुद्ध; परमू--परम; ईश-चेष्टितम्-परमे श्वर की लीलाएँ; यशस्यम्--यश; आयुष्यम्-दीर्घजीवनकाल; अघ-ओघ-मर्षणम्-- पापों का विनाश; य:--जो; नित्यदा--सदैव; आकर्ण्य--सुनकर; नर: --मनुष्य;अनुकीर्तयेत्--सुनावे; धुनोति-- धो देता है; अधम्-- भौतिक दूषण; कौरव--हे कुरुवंशी; भक्ति-भावतः-- श्रद्धा तथा भक्तिके साथ।
मैत्रेय मुनि ने अन्त में कहा : हे कुरुनन्दन, यदि कोई भगवान् विष्णु द्वारा संचालित दक्ष-यज्ञकी यह कथा श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सुनता है और इसे फिर से सुनाता है, तो वह निश्चय हीइस संसार के समस्त कल्मष से विमल हो जाता है।
"
