← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय छह: ब्रह्मा भगवान शिव को संतुष्ट करते हैं
4.6मैत्रेय उवाचअथ देवगणा: सर्वे रुद्रानीकै: पराजिता: ।
शूलपट्टिशनिस्त्रिशगदापरिघमुद्गरः ॥
१॥
सज्छिन्नभिन्नसर्वाजझ्ञः सर्तिविक्सभ्या भयाकुलाः ।
स्वयम्भुवे नमस्कृत्य कार््स््येनेतज्यवेदयन् ॥
२॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; अथ--इसके पश्चात्; देव-गणा:--देवता; सर्वे--समस्त; रुद्र-अनीकैः --शिव के सैनिकों से;'पराजिता:--हार कर; शूल--त्रिशूल; पट्टिश--तेजधार का भाला; निर्त्रिश--तलवार; गदा--गदा; परिघ--लोहे की साँग,परिघ; मुद्गरः --मुद्गर से; सिछन्न-भिन्न-सर्व-अड्भा:--अंग-प्रत्यंग घायल; स-ऋत्विक् -सभ्या:-- समस्त पुरोहित तथा यज्ञ-सभा के सदस्यों सहित; भय-आकुला:--अत्यधिक भय से; स्वयम्भुवे-- भगवान् ब्रह्मा को; नमस्कृत्य--नमस्कार करके;कार्ल्स्येन--विस्तार में; एतत्--दक्ष के यज्ञ की घटना; न्यवेदयन्--विस्तार से निवेदन किया, सूचित किया।
जब समस्त पुरोहित तथा यज्ञ-सभा के सभी सदस्य और देवतागण शिवजी के सैनिकों द्वारापराजित कर दिये गये और त्रिशूल तथा तलवार जैसे हथियारों से घायल कर दिये गये, तब वेडरते हुए ब्रह्माजी के पास पहुँचे।
उनको नमस्कार करने के पश्चात्,जो हुआ था, उन्होंने विस्तारसे उसके विषय में बोलना प्रारम्भ किया।
"
उपलभ्य प्रैवैतद्भधगवानब्जसम्भव: ।
नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतु: ॥
३॥
उपलभ्य--जानकर; पुरा-पहले से; एब--निश्चय ही; एतत्--दक्ष के यज्ञ की ये सभी घटनाएँ; भगवान्--समस्त ऐश्वर्यों केस्वामी; अब्ज-सम्भव:--कमल से उत्पन्न ( ब्रह्म ); नारायण:--नारायण; च--तथा; विश्व-आत्मा--सम्पूर्ण विश्व के परमात्मा;न--नहीं; कस्य--दक्ष के; अध्वरम्--यज्ञ में; ईयतु:--गये |
ब्रह्मा तथा विष्णु दोनों ही पहले से जान गये थे कि दक्ष के यज्ञ-स्थल में ऐसी घटनाएँ होंगी,अतः पहले से पूर्वानुमान हो जाने से वे उस यज्ञ में नहीं गये।
"
तदाकर्ण्य विभुः प्राह तेजीयसि कृतागसि ।
क्षेमाय तत्र सा भूयात्र प्रायेण बुभूषताम् ॥
४॥
तत्--देवों तथा अन्यों द्वारा वर्णित घटनाएँ; आकर्ण्य--सुनकर; विभु:--ब्रह्मा ने; प्राह--उत्तर दिया; तेजीयसि--महापुरुष;कृत-आगसि--अपराध किया गया; क्षेमाय--अपनी कुशलता के लिए; तत्र--उस प्रकार; सा--वह; भूयात् न--अच्छा नहींहै; प्रायेण--सामान्यत; बुभूषताम्--रहने की इच्छा |
जब ब्रह्मा ने देवताओं तथा यज्ञ में सम्मिलित होने वाले सदस्यों से सब कुछ सुन लिया तोउन्होंने उत्तर दिया; यदि तुम किसी महापुरुष की निन्दा करके उसके चरणकमलों की अवमाननाकरते हो तो यज्ञ करके तुम कभी सुखी नहीं रह सकते।
तुम्हें इस तरह से सुख की प्राप्ति नहीं होसकती।
"
अथापि यूयं कृतकिल्बिषा भवंये बर्हिषो भागभाजं परादु: ।
प्रसादयध्व॑ परिशुद्धचेतसाक्षिप्रप्रसादं प्रगृहीताड्पप्रिपद्ाम् ॥
५॥
अथ अपि--फिर भी; यूयम्ू--तुम सबों ने; कृत-किल्बिषा:--पाप करके; भवम्--शिव को; ये--तुम सभी; बर्हिष: --यज्ञका; भाग-भाजम्--प्राप्य भाग; परादु:--से अलग कर दिया है; प्रसादयध्वम्ू--तुम सभी प्रसन्न होओ; परिशुद्ध-चेतसा--बिनाकिसी हिचक के; क्षिप्र-प्रसादम्-तुरन्त दया; प्रगृहीत-अड्घ्रि-पद्यम्--चरणकमलों की शरण ग्रहण करके
तुम लोगों ने शिव को प्राप्य यज्ञ-भाग ग्रहण करने से वंचित किया है, अतः तुम सभी उनके चरणकमलों के प्रति अपराधी हो।
फिर भी, यदि तुम बिना किसी हिचक के उनके पास जाओऔर उनको आत्मसमर्पण करके उनके चरणकमलों में गिरो तो वे अत्यन्त प्रसन्न होंगे।
"
आशासाना जीवितमध्वरस्यलोकः सपालः कुपिते न यस्मिन् ।
तमाशु देवं प्रियया विहीनक्षमापयध्वं हृदि विद्धं दुरुक्तै: ॥
६॥
आशासाना: --पूछने के इच्छुक; जीवितमू--अवधि तक; अध्वरस्य--यज्ञ की; लोक:--समस्त लोक; स-पाल:--अपनेनियामकों सहित; कुपिते--क्रुद्ध होने पर; न--नहीं; यस्मिन्--जिसको; तम्ू--वह; आशु--तुरनन््त; देवम्--शिव से; प्रियया--अपनी प्रिया से; विहीनम्--रहित; क्षमापयध्वम्-- क्षमा माँगो; हृदि-- उसके हृदय में; विद्धम्--अत्यन्त दुखी; दुरुक्तै:--कटुबचनों से ब
्रह्मा ने उन्हें यह भी बतलाया कि शिवजी इतने शक्तिमान हैं कि उनके कोप से समस्त लोकतथा इनके प्रमुख लोकपाल तुरन्त ही विनष्ट हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि विशेषकरहाल ही में अपनी प्रियतमा के निधन के कारण वे बहुत ही दुखी हैं और दक्ष के कटुवचनों सेअत्यन्त मर्माहत हैं।
ऐसी स्थिति में ब्रह्मा ने उन्हें सुझाया कि उनके लिए कल्याणप्रद यह होगा किवे तुरन्त उनके पास जाकर उनसे क्षमा माँगें।
"
नाहं न यज्ञो न च यूयमन्येये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।
विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वायस्यात्मतन्त्रस्य क उपायं विधित्सेत् ॥
७॥
न--नहीं; अहमू--मैं; न--न तो; यज्ञ:--इन्द्र; न--न तो; च--तथा; यूयम्--तुम सभी; अन्ये--दूसरे; ये--जो; देह-भाज:--देहधारी; मुनवः--मुनि; च--तथा; तत्त्वम्--सच्चाई; विदुः--जानते हैं; प्रमाणम्--विस्तार; बल-वीर्ययो: --बल तथा वीर्य;वा--अथवा; यस्य--शिव का; आत्म-तन्त्रस्य--आत्मनिर्भर शिव का; कः--क्या; उपायम्--साधन; विधित्सेत--निकालनाचाहेगा।
ब्रह्म ने कहा कि न तो वे स्वयं, न इन्द्र, न यज्ञस्थल में समवेत समस्त सदस्य ही अथवासभी मुनिगण ही जान सकते हैं कि शिव कितने शक्तिमान हैं।
ऐसी अवस्था में ऐसा कौन होगाजो उनके चरणकमलों पर पाप करने का दुस्साहस करेगा ?"
स इत्थमादिश्य सुरानजस्तु तैःसमन्वितः पितृभि: सप्रजेशै: ।
ययौ स्वधिष्णयान्निलयं पुरद्दिषःकैलासमद्रिप्रवरं प्रियं प्रभोः ॥
८ ॥
सः--वह ( ब्रह्मा ); इत्थम्--इस प्रकार; आदिश्य--शिक्षा देकर; सुरान्ू--देवों को; अजः--ब्रह्मा; तु--तब; तैः--उनके;समन्वित:--सहित; पितृभि:--पितरों; स-प्रजेशै:ः--जीवात्माओं के स्वामियों सहित; ययौ--चले गये; स्व-धिष्ण्यात्-- अपनेस्थान से; निलयम्-- धाम; पुर-द्विष:--शिव का; कैलासम्ू--कैलास; अद्वि-प्रवरम्--पर्वतों में श्रेष्ठ; प्रियम्--प्रिय; प्रभो:--प्रभु (शिव ) का।
इस प्रकार समस्त देवताओं, पितरों तथा जीवात्माओं के अधिपतियों को उपदेश देकर ब्रह्माने उन सबों को अपने साथ ले लिया और शिव के धाम पर्वतों में श्रेष्ठ केलास पर्वत के लिए प्रस्थान किया।
"
जन्मौषधितपोमन्त्रयोगसिद्धैनरितरै: ।
जुष्टे किन्नरगन्धर्वैरप्सरोभिवृत सदा ॥
९॥
जन्म--जन्म; औषधि--जड़ी-बूटियाँ; तपः--तपस्या; मन्त्र--वैदिक मंत्र; योग--योग-अभ्यास; सिद्धै:--सिद्ध पुरुषों द्वारा;नर-इतरैः--देवताओं द्वारा; जुष्टम्-- भोगा गया; किन्नर-गन्धर्व: --किन्नरों तथा गन्धर्वों द्वारा; अप्सरोभि:--अप्सराओं द्वारा;बृतम्-पूर्ण; सदा--सदैव |
कैलास नामक धाम विभिन्न जड़ी-बूटियों तथा वनस्पतियों से भरा हुआ है और वैदिक मंत्रोंतथा योग-अभ्यास द्वारा पवित्र हो गया है।
इस प्रकार इस धाम के वासी जन्म से ही देवता हैंऔर समस्त योगशक्तियों से युक्त हैं।
इनके अतिरिक्त यहाँ पर अन्य मनुष्य हैं, जो किन्नर तथागन्धर्व कहलाते हैं और वे अपनी-अपनी सुन्दर स्त्रियों के संग रहते हैं, जो अप्सराएँ कहलाती हैं।
"
नानामणिमयै: श्रुड्ठै्ननाधातुविचित्रितैः ।
नानाहुमलतागुल्मैर्नानामृगगणावृतैः ॥
१०॥
नाना--विभिन्न प्रकार के; मणि--रल; मयै:--से निर्मित; श्रृद्ठौ:--चोटियों से; नाना-धातु-विचित्रितैः--अनेक धातुओं सेअलंकृत; नाना--विभिन्न; द्रुम--वृक्ष; लता--बेलें, लताएँ; गुल्मैः --वृक्ष; नाना--विविध; मृग-गण--हिरनों के समूहों द्वारा;आवृतैः--आबाद।
कैलास समस्त प्रकार की बहुमूल्य मणियों तथा खनिजों ( धातुओं ) से युक्त पर्वतों से भराहुआ है और सभी प्रकार के मूल्यवान वृक्षों तथा पौधों द्वारा घिरा हुआ है।
पर्वतों की चोटियाँतरह-तरह के हिरनों से शोभायमान हैं।
"
नानामलप्रस्त्रवणैर्नानाकन्दरसानुभि: ।
रमणं विहरन्तीनां रमणै: सिद्धयोषिताम् ॥
११॥
नाना--विविध; अमल--निर्मल, पारदर्शी ; प्रस्नवणै:--जल प्रपातों से; नाना--विविध; कन्दर--गुफाएँ; सानुभि:--चोटियोंसे; रमणम्--आनन्द प्रदान करती हुईं; विहरन्तीनाम्ू--विहार करती हुई; रमणैः--अपने-अपने प्रेमियों सहित; सिद्ध-योषिताम्ू--योगियों की प्रियतमाओं के |
वहाँ अनेक झरने हैं और पर्वतों में अनेक गुफाएँ हैं जिनमें योगियों की अत्यन्त सुन्दर पत्नियाँ रहती हैं।
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मयूरकेकाभिरुतं मदान्धालिविमूच्छितम् ।
प्लावितै रक्तकण्ठानां कूजितैश्व पतत्त्रिणाम्ू ॥
१२॥
मयूर--मोरों की; केका--बोली ( शोर ); अभिरुतमू--गुंजायमान; मद--मादकता से; अन्ध--अंधे हुए; अलि-- भौरों से;विमूर्च्छितम्--गुंजायमान; प्लावितै:ः --गायन से; रक्त-कण्ठानाम्ू--कोयलों के; कूजितैः--कूजन ( कलरव ) से; च--तथा;'पतत्रिणाम्ू--अन्य
पक्षियों के कैलास पर्वत पर सदैव मोरों की मधुर ध्वनि तथा भौंरों के गुंजार की ध्वनि गूँजती रहती है।
कोयलें सदैव कूजती रहती हैं और अन्य पक्षी परस्पर कलरव करते रहते हैं।
"
आह्यन्तमिवोद्धस्तैद्वि जान्कामदुषैर्दधमै: ।
ब्रजन्तमिव मातड़ै्गृणन्तमिव निझरैः ॥
१३॥
आह्यन्तम्--बुलाते हुए; इव--मानो; उत्-हस्तैः --उठे हुए हाथों ( डालियों ) से; द्विजान्--पक्षियों को; काम-दुघै:--कामप्रद,मनोरथ पूरा करने वाले; द्रमै:--वृक्षों से; ब्रजन्तम्ू--चलते हुए; इब--मानों; मातड्लैः--हाथियों द्वारा; गृणन्तम्--चिग्घाड़ करते;इब--मानो; निझरै:--झरनों के द्वारा।
वहाँ पर सीधी शाखाओं वाले ऊँचे-ऊँचे वृक्ष हैं, जो मधुर पक्षियों को बुलाते प्रतीत होते हैंऔर जब हाथियों के झुंड पर्वतों के पास से गुजरते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो कैलास पर्वतउनके साथ-साथ चल रहा है।
जब झरनों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है, तो ऐसा प्रतीत होता हैमानो कैलास पर्वत भी सुर में सुर मिला रहा हो।
"
मन्दारैः पारिजातैश्व सरलैश्लोपशोभितम् ।
तमालै: शालतालैश्व कोविदारासनार्जुनै: ॥
१४॥
चूते: कदम्बैर्नपैश्व नागपुन्नागचम्पकै: ।
पाटलाशोकबकुलै: कुन्दे: कुरबकैरपि ॥
१५॥
मन्दारैः--मन्दार से; पारिजातै:--पारिजात से; च--तथा; सरलैः--सरल से; च--तथा; उपशोभितम्--अलंकृत; तमालै:--तमाल वृक्षों से; शाल-तालैः:--शाल तथा ताड़ वृक्षों से; च--तथा; कोविदार-आसन-अर्जुनै:--कोविदार, आसन( विजयसार ) तथा अर्जुन वृक्षों से; चूतेः-- आम का एक प्रकार; कदम्बै:ः--कदम्ब वृक्षों से; नीपैः--नीपों से ( धूलि कदम्बोंसे ); च--तथा; नाग-पुन्नाग-चम्पकै:--नाग, पुन्नाग तथा चम्पक से; पाटल-अशोक-बकुलैः --पाटल, अशोक तथा बकुल से;कुन्दैः--कुन्द से; कुरबकै:--कुरबक से; अपि--भी
पूरा कैलास पर्वत अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित है, जिनमें से उल्लेखनीय नाम हैं--मन्दार, पारिजात, सरल, तमाल, ताल, कोविदार, आसन, अर्जुन, आम्र-जाति, कदम्ब, धूलि-कदम्ब, नाग, पुन्नाग, चम्पक, पाटल, अशोक, बकुल, कुंद तथा कुरबक।
सारा पर्वत ऐसे वृक्षोंसे सुसज्जित है जिनमें सुगन्धित पुष्प निकलते हैं।
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स्वर्णार्णशतपत्रै श्व वररेणुकजातिभि: ।
कुब्जकैर्मल्लिकाभिश्व माधवीभिश्व मण्डितम् ॥
१६॥
स्वर्णार्ण--सुनहरे रंग का; शत-पत्रै:ः--कमलों से; च--तथा; वर-रेणुक-जातिभि:--वर, रेणुक तथा मालती से; कुब्जकै: --कुब्जकों से; मल्लिकाभि:--मल्लिकाओं से; च--तथा; माधवीभि: --माधवी से; च--तथा; मण्डितम्ू--सुशोभित, अलंकृत ;वहाँ अन्य वृक्ष भी हैं, जो पर्वत की शोभा बढ़ाते हैं, यथा सुनहरा कमलपुष्प, दारचीनी,मालती, कुब्ज, मल्लिका तथा माधवी।
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पनसोदुम्बराश्चत्थप्लक्षन्यग्रोधहिड्बुभि: ।
भूजैरोषधिभि: पूगै राजपूगैश्च जम्बुभि: ॥
१७॥
पनस-उदुम्बर-अश्वत्थ-प्लक्ष-न्यग्रो ध-हिड्डुभि: --पनस ( कटहल ), उदुम्बर, अश्रत्थ, प्लक्ष, न्यग्रोध तथा हींग उत्पन्न करने वालेवृक्ष; भूजैं: -- भोजपत्र से; ओषधिभि: --सुपारी वृक्षों से; पूगैः--पूण से; राजपूगैः --राजपूगों से; च--तथा; जम्बुभि:--जामुनसे
कैलास पर्वत जिन अन्य वृक्षों से सुशोभित है वे हैं कट अर्थात् कटहल, गूलर, बरगद,पाकड़, न्यग्रोध तथा हींग उत्पादक वृक्ष।
इसके अतिरिक्त सुपारी, भोजपत्र, राजपूग, जामुन तथाइसी प्रकार के अन्य वृक्ष हैं।
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खर्जूराग्रातकाम्राद्यै: प्रियालमथुकेड्डुदै: ।
द्रुमजातिभिरन्यैश्व राजितं वेणुकीचकै: ॥
१८ ॥
खर्जूर-आम्रातक-आम्र-आद्यै:--खजूर, आम्रातक, आम्र तथा अन्य वृक्षों से; प्रियाल-मधुक-इब्डुदैः--प्रियाल, मधुक तथा इंगुदसे; द्रुम-जातिभि:--वृक्षों की जातियों से; अन्यैः--अन्य; च--तथा; राजितम्--सुशोभित्; वेणु-कीचकै :--वेणु ( बाँस ) तथा'कीचक ( खोखले बाँस ) से |
वहाँ आम, प्रियाल, मधुक ( महुआ ) तथा इंगुद ( च्यूर ) के वृक्ष हैं।
इनके अतिरिक्त पतलेबाँस, कीचक तथा बाँसों की अन्य किस्में कैलास पर्वत को सुशोभित करने वाली हैं।
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कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रवनर्द्धिभि: ।
नलिनीषु कल॑ कूजत्खगवृन्दोपशोभितम् ॥
१९॥
मृगैः शाखामूृगैः क्रोडैमृगेन्द्रैसक्षशल्यकै: ।
गवयै: शरभेव्यप्रि रुरुभिर्महिषादिभि: ॥
२०॥
कुमुद--कुमुद; उत्पल--उत्पल; कह्लार--कल्हार; शतपत्र--कमल; वन--जंगल; ऋद्ध्धिभि:--से आच्छादित; नलिनीषु--झीलों में; कलम्-- अत्यन्त मधुर; कूजत्--चहकते हुए; खग--पक्षियों का; वृन्द--समूह; उपशोभितम्--से अलकूंत; मृगैः--हिरनों से; शाखा-मृगैः--बन्दरों से; क्रोडै:--सुअरों से; मृग-इन्द्रै:--सिंहों से; ऋक्ष-शल्यकै:ः--रीछों तथा साहियों से;गवयै:--नील गायों से; शरभे:--जंगली गधों से; व्याप्रै:--बाघों से; रुकूभिः--एक प्रकार के छोटे मृग से; महिष-आदिभि:--भैंसे आदि से |
वहाँ कई प्रकार के कमल पुष्प हैं यथा कुमुद, उत्पल, शतपत्र।
वहाँ का वन अलकूंत उद्यानसा प्रतीत होता है और छोटी-छोटी झीलें विभिन्न प्रकार के पक्षियों सें भरी पड़ी हैं, जो अत्यन्तमीठे स्वर से चहकती हैं।
साथ ही कई प्रकार के अन्य पशु भी पाये जाते हैं, यथा मृग, बन्दर,सुअर, सिंह, रीछ, साही, नील गाय, जंगली गधे, लघुमृग, भेंसे इत्यादि जो अपने जीवन का पूराआनन्द उठाते हैं।
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कर्णानत्रैकपदाश्रास्यर्निर्जुष्ट वृकनाभिभि: ।
कदलीखण्डसंरुद्धनलिनीपुलिनअियम् ॥
२१॥
कर्णानत्र--कर्णात्र से; एकपद--एकपद; अश्वास्यै:--अश्वास्य से; निर्जुष्टभ[-- पूर्णतः भोगा हुआ; वृक-नाभिभि:--वृक तथानाभि ( कस्तूरी मृग ) द्वारा; कदली--केला के; खण्ड--समूह से; संरुद्ध--आच्छादित; नलिनी--कमलों से भरा सरोवर;पुलिन--रेतीला किनारा; श्रियम्--अत्यन्त सुन्दर।
वहाँ पर तरह तरह के मृग पाये जाते हैं, यथा कर्णात्र, एकपद, अश्वास्य, वृक तथा कस्तूरीमृग।
इन मृगों के अतिरिक्त विविध केले के वृक्ष हैं, जो छोटी-छोटी झीलों के तटों को सुशोभितकरते हैं।
"
पर्यस्तं नन्दया सत्या: स्नानपुण्यतरोदया ।
विलोक्य भूतेशगिरिं विबुधा विस्मयं ययु: ॥
२२॥
पर्यस्तम्--घिरा हुआ; नन्दया--नन्दा नदी से; सत्या:--सती के; स्नान--स्नान से; पुण्य-तर--विशेष रूप से सुगन्धित;उदया--जल से; विलोक्य--देखकर; भूत-ईश-- भूतों के स्वामी ( शिव ) का; गिरिम्--पर्वत; विबुधा:--देवतागण;विस्मयम्--आश्चर्य; ययु:--हुआ |
वहाँ पर अलकनन्दा नामक एक छोटी सी झील है, जिसमें सती स्नान किया करती थीं।
यहझील विशेष रूप से शुभ है।
कैलास पर्वत की विशेष शोभा देखकर सभी देवता वहाँ के ऐश्वर्यसे अत्यधिक विशस्त्रित थे।
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दहशुस्तत्र ते रम्यामलकां नाम बै पुरीम् ।
बन॑ सौगन्धिकं चापि यत्र तन्नाम पड्टडूजम् ॥
२३॥
दहृशुः--देखा; तत्र--वहाँ ( कैलास में ); ते--वे ( देवता ); रम्यामू--अत्यन्त आकर्षक; अलकाम्--अलका; नाम--नामक;वै--निस्सन्देह; पुरीमू-- धाम; वनम्ू-- जंगल; सौगन्धिकम्--सौगन्धिक; च--तथा; अपि-- भी ; यत्र--जिस स्थान में; तत्-नाम--उस नाम की; पड्डूजम्--कमल पुष्पों की जाति।
इस प्रकार देवताओं ने सौगन्धिक नामक वन में अलका नामक विचित्र सुन्दर भाग कोदेखा।
यह वन कमल पुष्पों की अधिकता के कारण सौगन्धिक कहलाता है।
सौगन्धिक काअर्थ है 'सुगन्धि से पूर्ण' ।
"
नन्दा चालकनन्दा च सरितौ बाह्मतः पुरः ।
तीर्थपादपदाम्भोजरजसातीव पावने ॥
२४॥
नन्दा--नन्दा; च--तथा; अलकनन्दा--अलकनन्दा; च--तथा; सरितौ--दो नदियाँ; बाह्मतः--बाहर की ओर; पुरः--नगरी से;तीर्थ-पाद-- भगवान् के; पद-अम्भोज--चरणकमल की; रजसा--धूलि से; अतीव--अत्यधिक; पावने--पवित्र हुईउन्होंने नन्दरा तथा अलकनन्दा नामक दो नदियाँ भी देखीं।
ये दोनों नदियाँ भगवान् गोविन्दके चरणकमलों की रज से पवित्र हो चुकी हैं।
"
ययो:ः सुरस्त्रिय: क्षत्तरवरुह्म स्वधिष्ण्यतः ।
क्रीडन्ति पुंसः सिद्ञन्त्यो विगाह् रतिकर्शिता: ॥
२५॥
ययो:--जिन दोनों ( नदियों ) में; सुर-स्त्रियः--स्वर्ग की सुन्दरियाँ अपने पतियों समेत; क्षत्त:--हे विदुर; अवरुह्म--उतर कर;स्व-धिष्णयत:ः--अपने-अपने विमानों से; क्रीडन्ति--क्री ड़ा करते हैं; पुंस:--उनके पति; सिद्ञन्त्य:--जल छिड़क कर;विगाह्म--( जल में ) प्रवेश करके; रति-कर्शिता: --जिनका रति-सुख घट चुका है।
हे क्षत्त, है विदुर, स्वर्ग की सुन्दरियाँ अपने-अपने पतियों सहित विमानों से इन नदियों मेंउतरती हैं और काम-क्रीड़ा के पश्चात् जल में प्रवेश करती हैं तथा अपने पतियों के ऊपर पानीउलीच कर आनन्द उठाती हैं।
"
ययोस्तत्स्नानविशभ्रष्टनवकुड्डू मपिञ्ञरम् ।
वितृषोपि पिबन्त्यम्भ: पाययन्तो गजा गजी: ॥
२६॥
ययो:--जिन दोनों नदियों में; तत्-स्नान--उनके स्नान से; विश्रष्ट-गिरे हुए; नव--ताजे; कुल्लू म--कुंकुम चूर्ण से; पिल्लमम्ू-पीला; वितृष:--प्यासे न होने पर; अपि-- भी; पिबन्ति--पीते हैं; अम्भ:--जल; पाययन्त:--पिलाते हैं; गजा: --हाथी;गजी:--हथिनियाँ।
स्वर्गलोक की सुन्दरियों द्वारा जल में स्नान करने के पश्चात् उनके शरीर के कुंकुम के कारण वह जल पीला तथा सुगंधित हो जाता है।
अतः वहाँ पर स्नान करने के लिए हाथीअपनी-अपनी पत्नी हथिनियों के साथ आते हैं और प्यासे न होने पर भी वे उस जल को पीते हैं।
"
तारहेममहारलविमानशतसड्डू लाम् ॥
जुष्टां पुण्यजनस्त्रीभिर्यथा खं सतडिद्धनम् ॥
२७॥
तार-हेम--मोती तथा सोने का; महा-रत्त--बहुमूल्य रत्न; विमान--विमानों का; शत--सैकड़ों; सह्लु लाम्--पुंजित; जुष्टाम्--व्यक्त, भोगा गया; पुण्यजन-स्त्रीभि: --यक्षों की पत्नियों द्वारा; यथा--जिस प्रकार; खम्--आकाश; स-तडित्-घनम्--बिजलीतथा बादलों से युक्त |
स्वर्ग के निवासियों के विमानों में मोती, सोना तथा अनेक बहुमूल्य रत्न जड़े रहते हैं।
स्वर्गके निवासियों की तुलना उन बादलों से की गई है, जो आकाश में रहकर बिजली की चमक सेसुशोभित रहते हैं।
"
हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वन॑ सौगन्धिकं च तत् ।
ब्ुमै: कामदुघैईद्यं चित्रमाल्यफलच्छदै: ॥
२८॥
हित्वा--पीछे छोड़ कर; यक्ष-ई ध्वर--यक्षों के स्वामी ( कुबेर ) का; पुरीम्-- धाम, वासस्थान; वनम्--जंगल; सौगन्धिकम्--सौगन्धिक नामक; च--तथा; तत्--वह; ब्रुमैः --वृक्षों से; काम-दुघैः:--कामनाओं को पूरा करने वाले; हृद्यमू--आकर्षक;चित्र--चित्रित; माल्य--पुष्प; फल--फल; छदैः --पत्तियों से |
यात्रा करते हुए देवता सौगन्धिक वन से होकर निकले जो अनेक प्रकार के पुष्पों, फलोंतथा कल्पवृक्षों से पूर्ण था।
इस वन से जाते हुए उन्होंने यक्षेश्वर के प्रदेशों को भी देखा।
"
रक्तकण्ठखगानीकस्वरमण्डितषट्पदम् ।
कलहंसकुलप्रेष्ठं खरदण्डजलाशयम् ॥
२९॥
रक्त--लाल; कण्ठ-गर्दन; खग-अनीक-- अनेक पक्षियों का; स्वर--मीठी बोली से; मण्डित--सुशोभित; षट्-पदम्-- भौरे;कलहंस-कुल-हंसों के झुंडों का; प्रेष्ठमू-- अत्यन्त प्रिय; खर-दण्ड--कमल पुष्प; जल-आशयम्--झील, सरोवर।
उस नेसर्गिक वन में अनेक पक्षी थे जिनकी गर्दन लाल रंग की थीं और उनका कलरव भौंरोंके गुंजार से मिल रहा था।
वहाँ के सरोवर शब्द करते हंसों के समूहों तथा लम्बे नाल वालेकमल पुष्पों से सुशोभित थे।
"
वनकुञझ्जरसडडष्टहरिचन्दनवायुना ।
अधि पुण्यजनस्त्रीणां मुहुरुन्मथयन्मन: ॥
३०॥
वबन-कुझर--जंगली हाथी से; सट्डष्ट--रगड़ा गया; हरिचन्दन--चन्दन के वृक्ष; वायुना--मन्द वायु से; अधि--अधिक;पुण्यजन-स्त्रीणाम्-यक्षों की पत्नियों के; मुहुः--पुनः पुनः; उन््मथयत्--विचलित; मन:--मन |
ऐसा वातावरण जंगली हाथियों को विचलित कर रहा था, जो चन्दन वृक्ष के जंगल में झुंडोंमें एकत्र हुए थे।
बहती हुई वायु अप्सराओं के मनों को अधिकाधिक इन्द्रियभोग के लिएविचलित किए जा रही थी।
"
बैदूर्यकृतसोपाना वाप्य उत्पलमालिनी: ।
प्राप्तं किम्पुरुषैर्दट्ठा त आराहहशुर्वटम् ॥
३१॥
बैदूर्य-कृत--वैदूर्य की बनी; सोपाना:--सीढ़ियाँ; वाप्य:--झीलें; उत्पल--कमल पुष्पों की; मालिनी:--पंक्तियों से युक्त;प्राप्तम्--बसा हुआ; किम्पुरुषै:--किम्पुरुषों द्वारा; दृष्टा--देखकर; ते--उन देवताओं ने; आरात्ू--निकट ही; दहशु:--देखा;वटम्--बरगद का वृक्ष
उन्होंने यह भी देखा कि नहाने के घाट तथा उनकी सीढ़ियाँ बैदूर्यमणि की बनी थीं।
जल कमलपुष्पों से भरा था।
ऐसी झीलों के निकट से जाते हुए देवता उस स्थान पर पहुँचे जहाँ एक बट वृक्ष था।
"
स योजनशतोत्सेध: पादोनविटपायतः ।
पर्यकृताचलच्छायो निर्नीडस्तापवर्जित: ॥
३२॥
सः--वह वट वृक्ष; योजन-शत--एक सौ योजन ( आठ सौ मील ); उत्सेध:--उँचाई; पाद-ऊन--एक चौथाई कम ( छह सौमील ); विटप--शाखाओं से; आयतः--फैला हुआ; पर्यक्ू--चारों ओर; कृत--बना हुआ; अचल--स्थिर; छाय:--छाया;निर्नीड:--बिना घोंसले का; ताप-वर्जित:--तापरहित, गर्मी से रहित।
वह वट वृक्ष आठ सौ मील ऊँचा था और उसकी शाखाएँ चारों ओर छह सौ मील तक फैलीथीं।
उसकी मनोहर छाया से सतत शीतलता छाई थी, तो भी पक्षियों की गूँज सुनाई नहीं पड़ रहीथी।
"
तस्मिन्महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुरा: ।
दहृशु: शिवमासीन त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥
३३॥
तस्मिन्ू--उस वृक्ष के नीचे; महा-योग-मये--परमेश्वर के ध्यान में मगन अनेक साधुओं से युक्त; मुमुक्षु--मुक्ति की कामना करनेवाले; शरणे--आश्रय; सुरा:--देवताओं ने; दहशु:--देखा; शिवम्--शिव को; आसीनम्--आसन लगाये; त्यक्त-अमर्षम्--क्रोधरहित; इब--मानों; अन्तकम्--अनन्त काल।
देवताओं ने शिव को, जो योगियों को सिद्धि प्रदान करने एवं समस्त लोगों का उद्धार करनेमें सक्षम थे, उस वृक्ष के नीचे आसीन देखा।
अनन्त काल के समान गम्भीर, शिवजी ऐसे प्रतीतहो रहे थे मानो समस्त क्रोध का परित्याग कर चुके हों।
"
सनन्दनादैर्महासिद्धैः शान्तैः संशान्तविग्रहम् ।
उपास्यमानं सख्या च भर्त्रां गुह्करक्षसाम् ॥
३४॥
सनन्दन-आह्यैः --सनन्दन इत्यादि चारों कुमार; महा-सिद्धै:--मुक्त जीव; शान्तै:ः --साधु प्रकृति का; संशान्त-विग्रहम्ू--गम्भीरतथा साधु प्रकृति वाले शिव; उपास्थमानम्--प्रशंसित; सख्या--कुबेर द्वारा; च--तथा; भर्त्रा--स्वामी द्वारा; गुह्क-रक्षसाम्--गुह्कों तथा राक्षसों द्वारा
वहाँ पर शिवजी कुबेर, गुह्मकों के स्वामी तथा चारों कुमारों जैसी मुक्तात्माओं से घिरे हुएबैठे थे।
शिवजी अत्यन्त गम्भीर एवं शान्त थे।
"
विद्यातपोयोगपथमास्थितं तमधी श्वरम् ।
चरन्तं विश्वसुहृदं वात्सल्याल्लोकमड़लम् ॥
३५॥
विद्या--ज्ञान; तप:--तपस्या; योग-पथम्-- भक्ति मार्ग; आस्थितम्--स्थित; तम्--उसको ( शिव को ); अधी श्वरम्--इन्दियोंके स्वामी; चरन्तम्--( तप इत्यादि ) करते हुए ); विश्व-सुहृदम्--समस्त संसार के सखा; बात्सल्यात्ू-पूर्ण स्नेह से; लोक-मड्जलम्- प्रत्येक के लिए कल्याणकर।
देवताओं ने शिवजी को इन्द्रिय, ज्ञान, सकाम कर्मों तथा सिद्धि मार्ग के स्वामी के रूप मेंस्थित देखा।
वे समस्त जगत के भिन्न हैं और सबके लिए पूर्ण स्नेह रखने के कारण वे अत्यन्तकल्याणकारी हैं।
"
लिड् च तापसाभीष्टं भस्मदण्डजटाजिनम् ।
अड्लेन सब्ध्याभ्ररुचा चन्द्रलेखां च बिभ्रतम् ॥
३६॥
लिड्रमू--चिह्त; च--तथा; तापस-अभीष्टम्-शैव साधुओं द्वारा वांछित; भस्म--राख; दण्ड--डंडा; जटा--जटाजूट;अजिनमू--मृग चर्म; अड्रेन--अपने शरीर से; सन्ध्या-आभ्र--लाल लाल; रुचा--र₹ँगा हुआ; चन्द्र-लेखाम्--अर्द्धचन्द्र कला;च--तथा; बिभ्रतम्ू-- धारण किये |
वे मृगचर्म पर आसीन थे और सभी प्रकार की तपस्या कर रहे थे।
शरीर में राख लगाये रहनेसे वे संध्याकालीन बादल की भाँति दिखाई पड़ रहे थे।
उनकी जटाओं में अरद्धचन्द्र का चिह्नथा, जो सांकेतिक प्रदर्शन है।
"
उपविष्ट दर्भमय्यां बृस््यां ब्रह्मा सनातनम् ।
नारदाय प्रवोचन्तं पृच्छते श्रण्वतां सताम्ू ॥
३७॥
उपविष्टमू--बैठे हुए; दर्भ-मय्याम्--दर्भ से बने; बृस्थाम्--चटाई ( आसन ) पर; ब्रह्म--परम सत्य; सनातनमू--शाश्वत;नारदाय--नारद को; प्रवोचन्तम्--बोलते हुए; पृच्छते--पूछते हुए; श्रृण्वताम्ू--सुनते हुए; सताम्--साधु पुरुषों का |
वे तृण ( कुश ) के आसन पर बैठे थे और वहाँ पर उपस्थित सबों को, विशेषरूप से नारदमुनि, को परम सत्य के विषय में उपदेश दे रहे थे।
"
कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि ।
बाहुं प्रकोष्टेक्षमालामासीन तर्कमुद्रया ॥
३८ ॥
कृत्वा--रखकर; ऊरौ--जाँघ पर; दक्षिणे--दाहिनी; सव्यम्--बाँये; पाद-पद्ममू--चरणकमल; च--तथा; जानुनि--घुटने पर;बाहुम्-हाथ; प्रकोष्टे--दाहिनी हाथ की कलाई में; अक्ष-मालाम्--रुद्राक्ष की माला; आसीनमू--बैठे हुए; तर्क-मुद्रया--तर्कमुद्रा से |
उनका बायाँ पैर उनकी दाहिनी जाँघ पर रखा था और उनका बायाँ हाथ बायीं जाँघ पर था।
दाहिने हाथ में उन्होंने रुद्राक्ष की माला पकड़ रखी थी।
यह आसन वीरासन कहलाता है।
इस प्रकार वे वीरासन में थे और उनकी अँगुली तर्क-मुद्रा में थी।
"
त॑ ब्रह्मनिर्वाणसमाधिमाश्रितंव्युपाथ्नितं गिरिशं योगकक्षाम् ।
सलोकपाला मुनयो मनूना-माद्य॑ मनुं प्रा्ललय: प्रणेमु: ॥
३९॥
तम्--उसको ( शिव को ); ब्रह्म-निर्वाण-- ब्रह्मानन्द में; समाधिम्-- समाधि में; आभ्रितम्-- लीन; व्युपाभ्रितम्-टेके हुए;गिरिशम्--शिव; योग-कक्षाम्ू--अपने बायें घुटने को गांठदार कपड़े से मजबूती से कसे; स-लोक-पाला:--देवताओं सहित( इन्द्र इत्यादि ); मुन॒यः--साधुगण; मनूनाम्--समस्त चिन्तकों का; आद्यमू-- प्रमुख; मनुम्--चिन्तक; प्राज्ललय:--हाथ जोड़े;प्रणेमुः--प्रणाम किया
समस्त मुनियों तथा इन्द्र आदि देवताओं ने हाथ जोड़कर शिवजी को सादर प्रणाम किया।
शिवजी ने केसरिया वस्त्र धारण कर रखा था और समाधि में लीन थे जिससे वे समस्त साधुओंमें अग्रणी प्रतीत हो रहे थे।
"
स तूपलभ्यागतमात्मयोनिंसुरासुरेशैरभिवन्दिताडुप्रि: ।
उत्थाय चक्रे शिरसाभिवन्दन-महत्तम: कस्य यथेव विष्णु; ॥
४०॥
सः--शिव; तु--लेकिन; उपलभ्य--देखकर; आगतम्--आया हुआ; आत्म-योनिम्--ब्रह्मा को; सुर-असुर-ईशै: --सर्व श्रेष्ठदेवताओं तथा असुरों द्वारा; अभिवन्दित-अड्ध्रि:--जिनके चरण पूजित हैं; उत्थाय--खड़े होकर; चक्रे--किया; शिरसा--शिरसे; अभिवन्दनम्--सादर नमस्कार; अर्हत्तम:--वामनदेव ने; कस्य--कश्यप का; यथा एब--जिस प्रकार; विष्णु: --विष्णु
शिवजी के चरणकमल देवताओं तथा असुरों द्वारा समान रूप से पूज्य थे, फिर भी अपनेउच्च पद की परवाह न करके उन्होंने ज्योंही देखा कि अन्य देवताओं में ब्रह्मा भी हैं, तो वे तुरन्तखड़े हो गये और झुक कर उनके चरणकमलों का स्पर्श करके उनका सत्कार किया, जिसप्रकार वामनदेव ने कश्यप मुनि को सादर नमस्कार किया था।
"
तथापरे सिद्धगणा महर्षिभि-यें वै समन््तादनु नीललोहितम् ।
नमस्कृतः प्राह शशाड्डुशेखरं'कृतप्रणामं प्रहसन्निवात्मभू: ॥
४१ ॥
तथा--उसी प्रकार; अपरे-- अन्य; सिद्ध-गणा:--सिद्ध जन; महा-ऋषिभि:--बड़े-बड़े ऋषियों सहित; ये--जो; वै--निस्सन्देह; समन्तात्ू--चारों ओर से; अनु--पीछे; नीललोहितम्--शिव; नमस्कृतः -- नमस्कार करते हुए; प्राह--कहा; शशाड्र-शेखरम्--शिव से; कृत-प्रणामम्--प्रणाम करके; प्रहसन्--हँसते हुए; इब--सहृश्य; आत्मभू: --ब्रह्मा ने।
शिवजी के साथ जितने भी ऋषि, यथा नारद आदि, बैठे हुए थे उन्होंने भी ब्रह्मा को सादरनमस्कार किया।
इस प्रकार पूजित होकर शिव से ब्रह्मा हँसते हुए कहने लगे।
"
ब्रह्मोवाचजाने त्वामीशं विश्वस्थ जगतो योनिबीजयो: ।
शक्ते: शिवस्य च परं यत्तद्ह्म निरन्तरम् ॥
४२॥
ब्रह्मा उबाच--ब्रह्मा ने कहा; जाने--जानता हूँ; त्वामू--तुमको ( शिव को ); ईशम्--नियन्ता; विश्वस्थ--सम्पूर्ण भौतिक जगतका; जगतः--हृश्य जगत का; योनि-बीजयो:--माता तथा पिता दोनों का; शक्तेः--शक्ति का; शिवस्थ--शिव का; च--तथा;परम्--परब्रह्म; यत्ू--जो; तत्--वह; ब्रह्म--बिना परिवर्तन के; निरन्तरमू--बिना किसी भौतिक गुण के |
ब्रह्मा ने कहा : हे शिव, मैं जानता हूँ कि आप सारे भौतिक जगत के नियन्ता, दृश्य जगत केमाता-पिता और दृश्य जगत से भी परे परब्रह्म हैं।
मैं आपको इसी रूप में जानता हूँ।
"
त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्यो: स्वरूपयो: ।
विश्व सृजसि पास्यत्सि क्रीडब्नूर्णपपटो यथा ॥
४३॥
त्वमू--तुम; एव--ही; भगवन्--हे भगवान्; एतत्--यह; शिव-शक्त्यो:--अपनी शुभ शक्ति में स्थित होकर; स्वरूपयो: --अपने व्यक्तिगत विस्तार से; विश्वम्--यह ब्रह्माण्ड; सृजसि--उत्पन्न करते हो; पासि--पालन करते हो; अत्सि--संहार करते हो;क्रीडनू--खेलते हुए; ऊर्ण-पट:--मकड़ी का जाला; यथा--जिस प्रकार |
हे भगवान्, आप अपने व्यक्तिगत विस्तार से इस दृश्य जगत की सृष्टि, पालन तथा संहारउसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार मकड़ी अपना जाला बनाती है, बनाये रखती हैं और फिर अन्तकर देती है।
"
त्वमेव धर्मार्थदुघाभिपत्तयेदक्षेण सूत्रेण ससर्जिथाध्वरम् ।
त्वयैव लोकेवसिताश्न सेतवोयान्ब्राह्मणा: श्रदधते धृतब्रता: ॥
४४॥
त्वमू--आपने; एव--निश्चय ही; धर्म-अर्थ-दुघ-- धर्म तथा आर्थिक विकास से प्राप्त लाभ; अभिपत्तये--उनकी रक्षा हेतु;दक्षेण--दक्ष द्वारा; सूत्रेण--निमित्त बनाते हुए; ससर्जिथ--उत्पन्न किया; अध्वरम्--यज्ञ; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; एब--निश्चय ही;लोके--इस संसार में; अवसिता:--संयमित; च--तथा; सेतव:--वर्णा श्रम संस्था की मर्यादाएँ; यान्--जो; ब्राह्मणा:-- ब्राह्मणवर्ग; श्रद्रधते-- अत्यधिक सम्मान करते हैं; धृत-ब्रता:--ब्रत लेकर
हे भगवान्, आपने दक्ष को माध्यम बनाकर यज्ञ-प्रथा चलाई है, जिससे मनुष्य धार्मिककृत्य तथा आर्थिक विकास का लाभ उठा सकता है।
आपके ही नियामक विधानों से चारों वर्णोंतथा आश्रमों को सम्मानित किया जाता है।
अतः ब्राह्मण इस प्रथा का दृढ़तापूर्वक पालन करनेका ब्रत लेते हैं।
"
त्वं कर्मणां मड्रल मड़लानांकर्तुः स्वलोकं तनुषे स्व: परं वा ।
अमडूूलानां च तमिस्त्रमुल्बणंविपर्यय: केन तदेव कस्यचित् ॥
४५॥
त्वमू--आप; कर्मणाम्-कर्तव्यों का; मडल--हे परम शुभ; मड्रलानाम्ू--शुभ करने वालों का; कर्तुः--कर्ता का; स्व-लोकम्--क्रम से उच्च लोक; तनुषे--विस्तार करते हैं; स्व:--स्वर्गलोक; परम्--दिव्य लोक; वा--अथवा; अमड्रलानाम्ू--अमंगल का; च--तथा; तमिस्त्रमू--तमिस्त्र नरक; उल्बणम्--घोर; विपर्यय: -- उल्टा; केन--क्यों; तत् एब--निश्चय ही वह;कस्यचित्--किसी के लिए।
हे परम मंगलमय भगवान्, आपने स्वर्गलोक, वैकुण्ठलोक तथा निर्गुण ब्रह्मलोक को शुभकर्म करने वालों का गन्तव्य निर्दिष्ट किया है।
इसी प्रकार जो दुराचारी हैं उनके लिए अत्यन्त घोरनरकों की सृष्टि की है।
तो भी कभी-कभी ये गन्तव्य उलट जाते हैं।
इसका कारण तय कर पानाअत्यन्त कठिन है।
"
न वे सतां त्वच्चरणार्पितात्मनांभूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव ।
भूतानि चात्मन्यपृथग्दिहक्षतांप्रायेण रोषोडभिभवेद्यथा पशुम् ॥
४६॥
न--नहीं; बै-- लेकिन; सताम्-भक्तों का; त्वत्-चरण-अर्पित-आत्मनाम्ू--आपके चरणकमलों पर पूर्णतया समर्पण करनेबालों का; भूतेषु--जीवात्माओं में; सर्वेषु--सभी प्रकार के; अभिपश्यताम्--ठीक से देखते हुए; तब--तुम्हारा; भूतानि--जीवात्माएँ; च--तथा; आत्मनि--परब्रह्म में; अपृथक्-- अभिन्न; दिदृक्षताम्--उस प्रकार देखने वाले; प्रायेण--प्राय:, सदैव;रोष:--क्रोध; अभिभवेत्--होता है; यथा--समान; पशुम्--पशुओं के
हे भगवान्, जिन भक्तों ने अपना जीवन आपके चरण-कमलों पर अर्पित कर दिया है, वेप्रत्येक प्राणी में परमात्मा के रूप में आपकी उपस्थिति पाते हैं; फलत:ः वे प्राणी-प्राणी में भेदनहीं करते।
ऐसे लोग सभी प्राणियों को समान रूप से देखते हैं।
वे पशुओं की तरह क्रोध केवशीभूत नहीं होते, क्योंकि पशु बिना भेदबुद्धि के कोई वस्तु नहीं देख सकते।
"
पृथग्धिय: कर्महशो दुराशया:परोदयेनार्पितहद्गुजोडनिशम् ।
परान्दुरुक्तैवितुद॒न्त्यरुन्तुदास्तान्मावधीद्दैववधान्भवद्विध: ॥
४७॥
पृथक्-भिन्न रूप से; धिय:--सोचने वाले; कर्म--सकाम कर्म; दहृश:ः --दर्शक; दुराशया:--तुच्छ बुद्धि; पर-उदयेन--अन्योंकी उन्नति से; अर्पित--त्यक्त; हृत्ू--हृदय; रुज:--क्रोध; अनिशम्--सदैव; परान्ू-- अन्य; दुरुक्त:--कदु वचन से;वितुदन्ति--पीड़ा पहुँचाता है; अरुन्तुदा:--मर्मभेदी बचनों से; तानू--उनको; मा--नहीं; अवधीतू--मारो; दैव--विधाता द्वारा;वधान्--पहले से मारे हुए; भवत्--आप; विध: --चाहते हैं |
जो लोग भेद-बुद्धि से प्रत्येक वस्तु को देखते हैं, जो केवल सकाम कर्मों में लिप्त रहते हैं,जो तुच्छबुद्धि हैं, जो अन्यों के उत्कर्ष को देखकर दुखी होते हैं और उन्हें कटु तथा मर्मभेदीबचनों से पीड़ा पहुँचाते रहते हैं, वे तो पहले से विधाता द्वारा मारे जा चुके हैं।
अतः आप जैसेमहान् पुरुष द्वारा उनको फिर से मारने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
"
यस्मिन्यदा पुष्करनाभमाययादुरन्तया स्पृष्टधिय: पृथग्हशः ।
कुर्वन्ति तत्र ह्मानुकम्पया कृपांन साधवो दैवबलात्कृते क्रमम् ॥
४८ ॥
यस्मिनू--किसी स्थान में; यदा--जब; पुष्कर-नाभ-मायया--पुष्करनाभ अर्थात् भगवान् की माया से; दुरन््तया--दुर्लघ्य;स्पृष्ट-धिय:ः--मोहित; पृथक्-हशः--भिन्न-भिन्न प्रकार से देखने वाले पुरुष; कुर्वन्ति--करते हैं; तत्र--वहाँ; हि--निश्चय ही;अनुकम्पया--दयावश; कृपाम्--कृपा, अनुग्रह; न--कभी नहीं; साधव:ः--साधु पुरुष; दैव-बलात्--विधाता द्वारा; कृते--किया गया; क्रमम्--शौर्य
हे भगवान्, यदि कहीं भगवान् की दुर्लध्य माया से पहले से मोहग्रस्त भौतिकतावादी( संसारी ) कभी-कभी पाप करते हैं, तो साधु पुरुष दया करके इन पापों को गम्भीरता से नहींलेता।
यह जानते हुए कि वे माया के वशीभूत होकर पापकर्म करते हैं, वह उनका प्रतिघात करनेश़ में अपने शौर्य का प्रदर्शन नहीं करता।
"
भवांस्तु पुंसः परमस्य माययादुरन्तयास्पृष्टमति: समस्तह॒क् ।
तया हतात्मस्वनुकर्मचेतःस्व्अनुग्रहं कर्तुमिहाईसि प्रभो ॥
४९॥
भवान्--आप; तु-- लेकिन; पुंस:ः-- पुरुष की; परमस्य--परम; मायया-- भौतिक शक्ति द्वारा; दुरतया--अत्यधिक शक्ति का;अस्पृष्ट--अप्रभावित; मति: --बुद्धि; समस्त-हक्-प्रत्येक वस्तु को देखने या जानने वाला; तया--उसी माया द्वारा; हत-आत्मसु--हृदय में मोहित; अनुकर्म-चेतःसु--जिनके हृदय सकाम कर्मों द्वारा आकृष्ट हैं; अनुग्रहम्--कृपा; कर्तुमू--करने केलिए; इह--इस प्रसंग में; अहंसि--आकांक्षा करते हैं; प्रभो--हे भगवान्
हे भगवान्, आप परमात्मा की माया के मोहक प्रभाव से कभी मोहित नहीं होते।
अतः आपसर्वज्ञ हैं, और जो उसी माया के द्वारा मोहित एवं सकाम कर्मों में अत्यधिक लिप्त हैं, उन परकृपालु हों और अनुकम्पा करें।
"
कुर्वध्वरस्योद्धरणं हतस्य भो:त्वयासमाप्तस्य मनो प्रजापते: ।
न यत्र भागं तब भागिनो ददुःकुयाजिनो येन मखो निनीयते ॥
५०॥
कुरु--करो; अध्वरस्य--यज्ञ का; उद्धरणम्--उद्धार, पूरा किया जाना; हतस्य--मारे हुए का; भो:--हे; त्वया--तुम्हारे द्वारा;असमाप्तस्य--अपूर्ण यज्ञ का; मनो--हे शिव; प्रजापतेः--महाराज दक्ष का; न--नहीं; यत्र--जहाँ; भागम्-- भाग, हिस्सा;तब--तुम्हारा; भागिन: -- भाग के पात्र; ददुः--नहीं दिया; कु-याजिन:--दुष्ट पुरोहितों ने; येन--दाता से; मख:--यज्ञ;निनीयते--फल पाता है।
हे शिव, आप यज्ञ का भाग पाने वाले हैं तथा फल प्रदान करने वाले हैं।
दुष्ट पुरोहितों नेआपका भाग नहीं दिया, अतः आपने सर्वस्व ध्वंस कर दिया, जिससे यज्ञ अधूरा पड़ा है।
अबआप जो आवश्यक हो, करें और अपना उचित भाग प्राप्त करें।
"
जीवताद्यजमानो यं प्रपद्येताक्षिणी भगः ।
भूगो: एमश्रूणि रोहन्तु पूष्णो दन्ताश्व पूर्ववत् ॥
५१॥
जीवतातू्--जी उठे; यजमान:--यज्ञकर्ता ( दक्ष ); अयम्ू--यह; प्रपद्येत--उसे वापस मिल जाय; अक्षिणी--नेत्र; भग: --भगदेव; भूगो: -- भूगु मुनि की; शमश्रूणि--मूँछें; रोहन्तु-- पुनः उग आएं; पूृष्ण:--पूषादेव के; दन््ता:--दन्त पंक्ति; च--तथा;पूर्व-बत्--पहले की तरह
है भगवान्, आपकी कृपा से यज्ञ के कर्त्ता ( राजा दक्ष ) को पुनः जीवन दान मिले, भग कोउसके नेत्र मिल जाये, भूगु को उसकी मूँछें तथा पूषा को उसके दाँत मिल जाएँ।
"
देवानां भग्नगात्राणामृत्विजां चायुधाश्मभि: ।
भवतानुगृहीतानामाशु मन्योस्त्वनातुरम् ॥
५२॥
देवानाम्--देवताओं के; भग्न-गात्राणाम्-- क्षत-विक्षत अंग वाले; ऋत्विजाम्--पुरोहितों के; च--तथा; आयुध-अश्मभि: --हथियारों तथा पत्थरों से; भवता--आपके द्वारा; अनुगृहीतानाम्--कृपापात्र; आशु--शीघ्र; मन््यो--हे शिव ( क्रुद्ध रूप में );अस्तु--हो; अनातुरम्--घावों का भरना।
हे शिव, जिन देवताओं तथा पुरोहितों के अंग आपके सैनिकों द्वारा क्षत-विश्षत हो चुके हैं,वे आपकी कृपा से तुरन्त ठीक हो जाँय।
"
एष ते रुद्र भागोउस्तु यदुच्छिष्टो ध्वरस्य वे ।
यज्ञस्ते रुद्र भागेन कल्पतामद्य यज्ञहन् ॥
५३॥
एषः--यह; ते--तुम्हारा; रुद्र--हे शिव; भाग:-- भाग; अस्तु--हो; यत्--जो भी; उच्छिष्ट: --बचा हुआ, शेष; अध्वरस्य--यज्ञका; बै--निस्सन्देह; यज्ञ:--यज्ञ; ते--तुम्हारा; रुद्र--हे रुद्र; भागेन-- भाग से; कल्पताम्--पूर्ण हो; अद्य--आज; यज्ञ-हन्ू--यज्ञ के विध्वंसक!हे यज्ञविध्वंसक, आप अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करें और कृपापूर्वक यज्ञ को पूरा होने दें।
"
