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अध्याय पाँच: दक्ष के बलिदान की निराशा

4.5मैत्रेय उवाचभवो भवान्या निधन प्रजापतेर्‌असत्कृताया अवगम्य नारदातू ।

स्वपार्षदसैन्यं च तदध्वरभुभि-विद्रावितं क्रोधमपारमादधे ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; भव:--शिव; भवान्या:--सती का; निधनम्‌--मृत्यु; प्रजापतेः--प्रजापति दक्ष के कारण;असतू-कृताया:--अपमानित होकर; अवगम्य--सुनकर; नारदात्‌--नारद से; स्व-पार्षद-सैन्यम्‌-- अपने पार्षदों के सैनिक;च--तथा; ततू-अध्वर--उस ( दक्ष ) के यज्ञ ( से उत्पन्न ); ऋभुभि:--ऋभुओं द्वारा; विद्रावितम्‌--खदेड़ दिए गये; क्रोधम्‌--क्रोध; अपारमू-- असीम; आदधे--प्रदर्शित किया |

मैत्रेय ने कहा; जब शिव ने नारद से सुना कि उनकी पत्नी सती प्रजापति दक्ष द्वारा किये गयेअपमान के कारण मर चुकी हैं और ऋभुओं द्वारा उनके सैनिक खदेड़ दिये गये हैं, तो वेअत्यधिक क्रोधित हुए।

"

क्रुद्ध: सुदष्टीष्ठपुट: स धूर्जटि-जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम्‌ ।

उत्कृत्य रुद्र:ः सहसोत्थितो हसन्‌गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥

२॥

क्रुद्ध:--क्रुद्ध; सु-दष्ट-ओष्ठ-पुटः-- अपने होठों को दाँतों से काटते हुए; सः--वह ( शिव ); धू:-जटि:--शरीर पर जटा धारणकिये; जटाम्‌ू--एक लट; तडित्‌--बिजली की; वह्वि--अग्नि की; सटा--ज्वाला, लपट; उग्र--भीषण; रोचिषम्‌-- प्रज्वलित;उत्कृत्य--नोच कर; रुद्र:ः--शिव; सहसा--तुरनन्‍्त; उत्थित:--खड़े हो गये; हसन्‌ू--हँसते हुए; गम्भीर--गहरा; नाद:ः--ध्वनि;विससर्ज--पटक दिया; ताम्‌--उस ( बाल ) को; भुवि--पृथ्वी पर

इस प्रकार अत्यधिक क्रुद्ध होने के कारण शिव ने अपने दाँतों से होठ चबाते हुए तुरन्तअपने सिर की जटाओं से एक लट नोच ली, जो बिजली अथवा अग्नि की भाँति जलने लगी।

वेपागल की भाँति हँसते हुए तुरन्त खड़े हो गये और उस लट को पृथ्वी पर पटक दिया।

"

ततोतिकायस्तनुवा स्पृशन्दिवंसहस्त्रबाहुर्घनरुक्त्रिसूर्यटक्‌ ।

करालदंष्टी ज्वलदग्निमूर्धज:कपालमाली विविधोद्यतायुध: ॥

३॥

ततः--उस समय; अतिकाय: --विशाल शरीर वाला ( वीरभद्र ); तनुवा--अपने शरीर के साथ; स्पृशन्‌--स्पर्श करता;दिवम्‌ू--आकाश; सहस्त्र--एक हजार; बाहु:--हाथ; घन-रुक्‌--श्याम रंग का; त्रि-सूर्य-हक्‌--तीन सूर्यो के समानतेज वाला;कराल-दंष्ट:ः--अत्यन्त भयानक दाढ़ों वाला; ज्वलत्‌-अग्नि--जलती हुईं आग ( के समान ); मूर्धज:--शिर पर बाल धारणकिये; कपाल-माली--नरमुंडों की माला पहने; विविध--अनेक प्रकार से; उद्यत--उठाये हुए; आयुध:--हथियारों से लैस

उससे आकाश के समान ऊँचा तथा तीन सूर्यों के सम्मिलित तेज के समान एक भयानकश्याम वर्ण का असुर उत्पन्न हुआ, जिसके दाँत अत्यन्त भयानक थे और उसके सिर के केशप्रज्वलित अग्नि के समान लग रहे थे।

उसके हजारों भुजाएँ थीं, जो अस्त्र-शस्त्रों से लैस थीं औरउसने नरमुंडों की माला पहन रखी थी।

"

त॑ कि करोमीति गृणन्तमाहबद्धाडलिं भगवान्भूतनाथ: ।

दक्ष सयज्ञं जहि मद्धटानांत्वमग्रणी रुद्र भटांशको मे ॥

४॥

तम्‌--उसको ( वीरभद्र को ); किम्‌--क्या; करोमि--करूँ; इति--इस प्रकार; गृणन्तम्‌--पूछने पर; आह--आदेश दिया;बद्ध-अद्जलिम्‌--हाथ जोड़ कर; भगवान्‌--समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी ( शिव ); भूत-नाथ:--भूतों के नाथ; दक्षम्‌--दक्ष को;स-यज्ञम्‌--उसके यज्ञ सहित; जहि--मारो; मत्‌-भटानाम्‌--मेंरे सभी पार्षदों के; त्वम्‌--तुम; अग्रणी:--प्रमुख; रुद्र--हे रुद्र;भट-हे युद्ध में कुशल; अंशकः--शरीर से उत्पन्न; मे--मेरे |

उस महाकाय असुर ने जब हाथ जोड़ कर पूछा, 'हे नाथ।

मैं क्या करूँ ?' भूतनाथ रूपशिव ने प्रत्यक्षतः आदेश दिया, 'तुम मेरे शरीर से उत्पन्न होने के कारण मेरे समस्त पार्षदों केप्रमुख हुए, अत: यज्ञ ( स्थल ) पर जाकर दक्ष को उसके सैनिकों सहित मार डालो।

"

आज्ञप्त एवं कुपितेन मन्युनास देवदेवं परिचक्रमे विभुम्‌ ।

मेनेतदात्मानमसडुरंहसा महीयसां तात सहः सहिष्णुम्‌ ॥

५॥

आज्ञप्त:--आज्ञा दी; एवम्‌--इस प्रकार; कुपितेन--क्रुद्ध; मन्युना--शिव द्वारा ( जो साक्षात्‌ क्रोध हैं ); सः--उसने ( वीरभद्र );देव-देवम्‌--जो देवताओं द्वारा पूजित है; परिचक्रमे--परिक्रमा की; विभुम्‌--शिव की; मेने--विचार किया; तदा--उस समय;आत्मानम्‌--स्वतः; असड्र-रंहसा--शिव की शक्ति से, जिसका विरोध नहीं किया जा सकता; महीयसाम्‌--अत्यन्त शक्तिशालीका; तात--हे विदुर; सहः--शक्ति; सहिष्णुम्‌--सहने में समर्थ |

मैत्रेय ने आगे बताया : हे विदुर, वह श्याम पुरुष भगवान्‌ का साक्षात्‌ क्रोध था और शिवजीके आदेशों का पालन करने के लिए उद्यत था।

इस प्रकार किसी भी विरोधी शक्ति का सामनाकरने में अपने को समर्थ समझ कर उसने भगवान्‌ शिव की प्रदक्षिणा की।

"

अन्वीयमानः स तु रुद्रपार्षदै-भ्रूशं नद॒द्धिव्यनदत्सुभैरवम्‌ ।

उद्यम्य शूलं जगदन्तकान्तकंसम्प्राद्रवद्धोषणभूषणाडूप्रि: ॥

६॥

अन्वीयमान:--पीछे चलते हुए; सः--वह ( वीरभद्र ); तु--लेकिन; रुद्र-पार्षदै:--शिव के सैनिकों द्वारा; भूशम्‌--शोर करतेहुए; नदद्धिः--गर्जते हुए; व्यनदत्‌-- ध्वनि की; सु-भैरवम्‌--अत्यन्त भयानक; उद्यम्य--लेकर; शूलम्‌--त्रिशूल; जगत्‌-अन्तक- मृत्यु; अन्तकम्‌-मारते हुए; सम्प्राद्रवत्‌-( दक्ष के यज्ञ ) की ओर लपके; घोषण--गर्जते हुए; भूषण-अद्डृप्रि: --अपने पैरों में कड़े पहने।

घोर गर्जना करते हुए शिव के अन्य अनेक सैनिक भी उस भयानक असुर के साथ हो लिए।

वह एक विशाल त्रिशूल लिए हुए था, जो इतना भयानक था कि मृत्यु का भी वध करने मेंसमर्थ था और उसके पाँवों में कड़े थे, जो गर्जना करते प्रतीत हो रहे थे।

"

अथर्तिवजो यजमानः सदस्या:ककुभ्युदीच्यां प्रसमीक्ष्य रेणुम्‌ ।

तमः किमेतत्कुत एतद्रजो भू-दिति द्विजा ट्विजपल्यश्च दध्यु: ॥

७॥

अथ--उस समय; ऋत्विज:-- पुरोहित; यजमान:--यज्ञ सम्पन्न करने वाला प्रमुख व्यक्ति ( दक्ष ); सदस्या:--यज्ञस्थल में एकत्रसभी पुरुष; ककुभि उदीच्याम्‌--उत्तरी दिशा में; प्रसमीक्ष्य--देखकर; रेणुम्‌-- धूल; तम:--अधंकार; किम्‌--क्या; एतत्‌--यह; कुतः--वहाँ से; एतत्‌--यह; रज:-- धूल; अभूत्‌-- आई है; इति--इस प्रकार; द्विजा:--ब्राह्मण; द्विज-पत्य:--ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ; च--तथा; दध्यु:--विचार करने लगींउस समय यज्ञस्थल में एकत्रित सभी लोग--पुरोहित, प्रमुख यजमान, ब्राह्मण तथा उनकीपत्नियाँ--आश्चर्य करने लगे कि यह अंधकार कहाँ से आ रहा है।

बाद में उनकी समझ में आया कि यह धूलभरी आँधी थी और वे सभी अत्यन्त व्याकुल हो गये थे।

"

वाता न वान्ति न हि सन्ति दस्यवःप्राचीनबर्हिर्जीवति होग्रदण्डः ।

गावो न काल्यन्त इदं कुतो रजोलोकोथधुना कि प्रलयाय कल्पते ॥

८॥

वाता:ः--हवाएँ; न वान्ति--नहीं बह रही हैं; न--न तो; हि-- क्योंकि; सन्ति--सम्भव है; दस्यव: --लुटेरे; प्राचीन-बर्हि: --प्राचीन राजा बहहि; जीवति--जीवित है; ह--अब भी; उग्र-दण्ड:--जो कठोर दण्ड देगा; गाव: --गाएँ; न काल्यन्ते--हाँकीनहीं जाती; इदम्‌--यह; कुतः--कहाँ से; रज:--धूलि; लोक:--लोक; अधुना-- अब; किम्‌-- क्या; प्रलयाय--प्रलय केलिए; कल्पते--आया समझा जाय ।

आँधी के स्त्रोत के सम्बन्ध में अनुमान लगाते हुए उन्होंने कहा : न तो तेज हवाएँ चल रही हैंऔर न गौएं ही जा रही हैं, न यह सम्भव है कि यह धूल भरी आँधी लुटेरों द्वारा उठी है, क्योंकिअभी भी बलशाली राजा बर्हि उन्हें दण्ड देने के लिए जीवित है।

तो फिर यह धूलभरी आँधीकहाँ से आ रही है ? क्या इस लोक का प्रलय होने वाला है ?"

प्रसूतिमि श्रा: स्त्रिय उद्विग्नचित्ताऊचुर्विपाको वृजिनस्यैव तस्य ।

यत्पश्यन्तीनां दुहितृणां प्रजेश:सुतां सतीमवदध्यावनागाम्‌ ॥

९॥

प्रसूति-मिश्रा: -- प्रसूति इत्यादि; स्त्रियः--स्त्रियाँ; उद्विग्न-चित्ता:--अत्यन्त उद्विग्न; ऊचु:--बोली; विपाक:--दुर्देव;वृजिनस्थ--पापकर्म का; एब--निस्सन्देह; तस्थ--उसका ( दक्ष का ); यत्‌--क्योंकि; पश्यन्तीनाम्‌ू--देखने वाली;दुहितृणाम्‌--अपनी बहनों का; प्रजेश:--प्रजा के स्वामी ( दक्ष ); सुताम्‌--पुत्री; सतीम्‌--सती; अवदध्यौ-- अपमानित;अनागामू--पूर्णतया निर्दोष

दक्ष की पत्नी प्रसूति एवं वहाँ पर एकत्र अन्य स्त्रियों ने अत्यन्त आकुल होकर कहा : यहसंकट दक्ष के कारण सती की मृत्यु से उत्पन्न है, क्योंकि निर्दोष सती ने अपनी बहनों के देखते-देखते अपना शरीर त्याग दिया है।

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यस्त्वन्तकाले व्युप्तजटाकलाप:स्वशूलसूच्यर्पितदिग्गजेन्द्र: ।

वितत्य नृत्यत्युदितास्त्रदोर्ध्वजा-नुच्चाइहासस्तनयित्नुभिन्नदिक्‌ ॥

१०॥

यः--जो ( शिव ); तु--लेकिन; अन्त-काले--प्रलय से समय; व्युप्त--छिटका कर; जटा-कलाप:ः--अपने बालों का गुच्छा;स्व-शूल--अपना त्रिशूल; सूचि--नोकों पर; अर्पित--बिंधा हुआ; दिक्‌-गजेन्द्र:--विभिन्न दिशाओं के शासक; वितत्य--बिखेर कर; नृत्यति--नाचता है; उदित--ऊपर उठाये; अस्त्र--हथियार; दोः --हाथ; ध्वजान्‌--झंडे; उच्च--ऊँचे स्वर से; अट्ट-हास--जोर की हँसी; स्तनयित्नु--घोर गर्जना से; भिन्न--विभाजित; दिक्‌ू--दिशाएँ |

प्रलय के समय, शिव के बाल बिखर जाते हैं और वे अपने त्रिशूल से विभिन्न दिशाओं केशासकों ( दिक्पतियों ) को बेध लेते हैं।

वे गर्वपूर्वक अट्टहास करते हुए ताण्डव नृत्य करते हैंऔर दिकपतियों की भुजाओं को पताकाओं के समान बिखेर देते हैं, जिस प्रकार मेघों की गर्जनासे समस्त लोकों में बादल छितरा जाते हैं।

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अमर्षयित्वा तमसह्मतेजसंमन्युप्लुतं दुर्निरीक्ष्यं ध्रुकुट्या ।

करालदंष्टराभिरुदस्तभागणंस्यात्स्वस्ति कि कोपयतो विधातु: ॥

११॥

अमर्षयित्वा--नाराज करके; तमू--उसको ( शिव को ); असहा-तेजसम्‌--असहनीय तेज वाले; मन्यु-प्लुतम्‌ू--क्रोध से पूरित;दुर्निरीक्ष्म्‌--देखने में असमर्थ; भ्रु-कुट्या-- भौंहों के हिलने से; कराल-दंष्टाभि: --डरावने दाँतों से; उदस्त-भागणम्‌--ज्योतिपुंजों ( तारों ) को अस्त-व्यस्त करके; स्थात्‌--हो; स्वस्ति--कल्याण; किमू--कैसे; कोपयत:--( शिव को ) क्ुद्ध करनेपर; विधातु:--ब्रह्मा का।

उस विराट श्याम पुरुष ने अपने डरावने दाँत निकाल लिए।

अपनी भौंहों के चालन से उसनेआकाश भर में तारों को तितर-बितर कर दिया और उन्हें अपने प्रबल भेदक तेज से आच्छादितकर लिया।

दक्ष के कुव्यवहार के कारण दक्ष के पिता ब्रह्म तक इस घोर कोप-प्रदर्शन से नहींबच सकते थे।

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बह्वेवमुद्रिग्नहशोच्यमानेजनेन दक्षस्य मुहुर्महात्मनः ।

उत्पेतुरुत्पाततमा: सहस्त्रशोभयावहा दिवि भूमौ च पर्यक्‌ ॥

१२॥

बहु--अनेक; एवम्‌--इस प्रकार; उद्विग्न-हशा--कातर दृष्टि से; उच्यमाने--जब ऐसा कहा जा रहा था; जनेन--( यज्ञ मेंएकत्र ) व्यक्तियों द्वारा; दक्षस्य--दक्ष के; मुहुः--पुनः-पुनः; महा-आत्मन:--पुष्ट हृदय वाले, निडर; उत्पेतु:--प्रकट हुआ;उत्पात-तमा:--अत्यन्त प्रबल लक्षण; सहस्त्रश:--हजारों; भय-आवहा:-- भय उत्पन्न करने वाले; दिवि--आकाश् में; भूमौ --भूमि पर; च--तथा; पर्यकु--सभी दिशाओं से।

जब सभी लोग परस्पर बातें कर रहे थे तो दक्ष को समस्त दिशाओं से, पृथ्वी से तथाआकाश से, अशुभ संकेत ( अपशकुन ) दिखाई पड़ने लगे।

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तावत्स रुद्रानुचरैरमहामखोनानायुधेर्वामनकैरुदायुथैः ।

पिड़्ैः पिशड्रैर्मकरोदराननै:पर्याद्रवद्धिर्विदुरान्‍्वरुध्यत ॥

१३॥

तावत्‌--शीघ्र ही; सः--वह; रुद्र-अनुचरैः--शिव के अनुयायियों द्वारा; महा-मख:--महान्‌ यज्ञस्थल; नाना--विविध प्रकारके; आयुधे:--हथियारों सहित; वामनकै:--नाटे कदके; उदायुधै:--ऊपर उठे हुए; पिड्जैः--श्यामाभ भूरे; पिशड्रैः--पीले;मकर-उदर-आननै: --मगर के समान पेट तथा मुख वालों से; पर्याद्रवद्धि:--चारों ओर दौड़ते हुए; विदुर--हे विदुर;अन्वरुध्यत--घिरा हुआ था

हे विदुर, शिव के समस्त अनुचरों ने यज्ञस्थल को घेर लिया।

वे नाटे कद के थे और अनेकप्रकार के हथियार लिये हुए थे उनके शरीर मकर के समान कुछ-कुछ काले तथा पीले थे।

वेयज्ञस्थल के चारों ओर दौड़दौड़कर उत्पात मचाने लगे।

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केचिद्नभज्ञुः प्राग्वंशं पत्नीशालां तथापरे ।

सद आग्नीश्वशालां च तद्विहारं महानसम्‌ ॥

१४॥

केचित्‌--किन्हीं ने; बभज्जञु;--गिरा दिया; प्राकु-वंशम्‌--यज्ञ-मंडप के ख भों को; पली-शालाम्‌--स्त्रियों के कक्ष; तथा--भी; अपरे--अन्य; सदः --यज्ञशाला; आग्नी ध्र-शालाम्‌--पुरोहितों का आवास; च--तथा; तत्‌-विहारम्‌--यजमान का घर;महा-अनसम्‌--पाकशाला।

कुछ सैनिकों ने यज्ञ-पंडाल के आधार-स्तम्भों को नीचे गिरा दिया, कुछ स्त्रियों के कक्ष मेंघुस गये, कुछ ने यज्ञस्थान को विनष्ट करना प्रारम्भ कर दिया और कुछ रसोई घर तथाआवासीय कक्षों में घुस गये।

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रुसजुर्यज्ञपात्राणि तथेके ग्नीननाशयन्‌ ।

कुण्डेष्वमूत्रयन्केचिद्विभिदुर्वेदिमिखला: ॥

१५॥

रुरुजु:--तोड़ डाला; यज्ञ-पात्राणि--यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले पात्रों को; तथा--इस प्रकार; एके --कुछ ने; अग्नीन्‌ू--यज्ञ कीअग्नियाँ; अनाशयन्‌--बुझा दीं; कुण्डेषु--यज्ञ स्थल में; अमूत्रयन्‌ू--पेशाब कर दिया; केचित्‌--किन्‍्हीं ने; बिभिदु:--फाड़डाला; वेदि-मेखला:--यज्ञस्थल की सीमा रेखाएँ।

उन्होंने यज्ञ के सभी पात्र तोड़ दिये और उनमें से कुछ यज्ञ-अग्नि को बुझाने लगे।

कुछेक नेतो यज्ञस्थल की सीमांकन मेखलाएँ तोड़ दी और कुछ ने यज्ञस्थल में पेशाब कर दिया।

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अबाधन्त मुनीनन्ये एके पत्नीरतर्जयन्‌ ।

अपरे जगुहुर्देवान्प्रत्यासन्नान्पलायितान्‌ ॥

१६॥

अबाधन्त--रास्ता रोक लिया; मुनीन्‌--मुनियों को; अन्ये--दूसरे; एके--कुछ ने; पतली: --स्त्रियों को; अतर्जयन्‌--डराया-धमकाया; अपरे-- अन्य; जगृहु: --बन्दी कर लिया; देवान्‌ू--देवताओं को; प्रत्यासन्नान्‌ू--निकट ही; पलायितानू-- भगने वालोंको

इनमें से कुछ ने भागते मुनियों का रास्ता रोक लिया, किन्हीं ने वहाँ पर एकत्र स्त्रियों कोडराया-धमकाया और कुछ ने पण्डाल से भागते हुए देवताओं को बन्दी बना लिया।

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भूगुं बबन्ध मणिमान्वीरभद्र: प्रजापतिम्‌ ।

चण्डेशः पूषणं देवं भगं नन्‍्दी श्वरोग्रहीत्‌ ॥

१७॥

भृगुम्‌-- भूगु मुनि को; बबन्ध--बन्दी कर लिया; मणिमान्‌--मणिमान ने; वीरभद्गर:--वीरभद्र ने; प्रजापतिम्‌--प्रजापति दक्षको; चण्डेश: -- चण्डेश ने; पूषणम्‌--पूषा को; देवम्‌--देवता; भगम्‌-- भग; नन्‍्दी श्वर: --नन्दी श्वर ने; अग्रहीत्‌ू-- बन्दी करलिया

शिव के एक अनुचर मणिमान ने भृगु मुनि को बन्दी बना लिया तथा श्याम असुर वीरभद्र नेप्रजापति दक्ष को पकड़ लिया।

एक अन्य अनुचर चण्डेश ने पूषा को तथा नन्‍न्दीश्वर ने भग देवताको बन्दी बना लिया।

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सर्व एवर्त्वजो इृष्टा सदस्या: सदिवौकस: ।

तैरच्माना: सुभूशं ग्रावभिनेकधाद्रवन्‌ ॥

१८॥

सर्वे--सभी; एव--निश्चय ही; ऋत्विज: --पुरोहित; हृष्टा--देखकर; सदस्या: --यज्ञ में एकत्र सभी सदस्य; स-दिवौकसः--देवताओं सहित; तैः--उन ९ पत्थरों ); अर्द्यमाना:--विचलित होकर; सु-भूशम्‌--अत्यधिक; ग्रावभि: --पत्थरों से; न एकधा--विभिन्न दिशाओं में; अद्रबन्‌--तितर-बितर हो गये।

लगातार पत्थरों की वर्षा के कारण समस्त पुरोहित तथा यज्ञ में एकत्र अन्य सदस्य महान्‌संकट में पड़ गये।

अपने प्राणों के भय से वे चारों ओर तितर-बितर हो गये।

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जुह्बतः स्त्रुवहस्तस्य एमश्रूणि भगवान्भव: ।

भगोर्लुलुल्ले सदसि योहसच्छ्म श्रु दर्शयन्‌ ॥

१९॥

जुह्तः--हवन करते हुए; स्नरुब-हस्तस्य--हाथ में स्त्रुवा लिए; श्मश्रूणि --मूँछ; भगवान्‌ू--समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; भव:--वीरभद्र; भूगो: -- भूगुमुनि की; लुलुझ्षे--नोंच लीं; सदसि--भरी सभा में; य:--जो ( भृगुमुनि )) अहसत्‌--हँसा था; श्मश्रु--मूँछ; दर्शयन्‌ू--दिखाते हुएवीरभद्र ने अपने हाथों से अग्नि में आहुति डालते हुए भूगुमुनि की मूँछ नोच ली।

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भगस्य नेत्रे भगवान्पातितस्य रुषा भुवि ।

उज्जहार सदस्थोक्ष्णा यः शपन्तमसूसुचत्‌ ॥

२०॥

भगस्य-- भग की; नेत्रे--दोनों आँखें; भगवान्‌--वीरभद्र; पातितस्य--गिरा करके; रुषा--रोषपूर्वक; भुवि--पृथ्वी पर;उजहार--निकाल लीं; सद-स्थ:--विश्वसृक्‌ की सभा में स्थित; अक्ष्णा--अपनी भृकुटियों के हिलने से; यः--जो ( भग );शपन्तमू--( शिव को ) शाप देता ( दक्ष ); असूसुचत्‌--उकसाया था।

वीरभद्र ने तुरन्त उस भग को पकड़ लिया, जो भूगु द्वारा शिव को शाप देते समय अपनीभौहे मटका रहा था।

उसने अत्यन्त क्रोध में आकर भग को पृथ्वी पर पटक दिया और बलपूर्वक उसकी आँखें निकाल लीं।

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पृष्णो ह्पातयहन्तान्कालिड्रस्य यथा बल: ।

शप्यमाने गरिमणि योहसहर्शयन्दतः ॥

२१॥

पृष्ण:--पूषा का; हि--चूँकि; अपातयत्‌--निकाल लिया; दन्तान्‌ू--दाँत; कालिड्रस्थ--कलिंग के राजा के; यथा--जिसप्रकार; बल:--बलदेव ने; शप्यमाने--शाप दिये जाने पर; गरिमणि--शिव; य:--जो ( पूषा ); अहसतू-- हँसा था; दर्शयन्‌--दिखाते हुए; दतः--दाँत |

जिस प्रकार बलदेव ने अनिरुद्ध के विवाहोत्सव में द्यूतक्रीड़ा के समय कलिंगराज दंतवक्रके दाँत निकाल लिये थे, उसी प्रकार से वीरभद्र ने दक्ष तथा पूषा दोनों के दाँत उखाड़ लिये,क्योंकि दक्ष ने शिव को शाप दिये जाते समय दाँत दिखाये थे और पूषा ने भी सहमति स्वरूपहँसते हुए दाँत दिखाए थे।

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आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।

छिन्दन्नपि तदुद्धर्तु नाशक्नोत्त्यम्बकस्तदा ॥

२२॥

आक्रम्य--बैठकर; उरसि--छाती पर; दक्षस्थ--दक्ष की; शित-धारेण--तीक्ष्ण धार वाले; हेतिना--हथियार से; छिन्दन्‌--काटते हुए; अपि-- भी; तत्‌--वह ( सिर ); उद्धर्तुमू-पृथक्‌ करने में; न अशकनोत्‌--समर्थ न हुआ; त्रि-अम्बक:--वीरभद्र( तीन नेत्रों वाला ); तदा--तत्पश्चात्‌

तब वह दैत्य सहृश पुरुष वीरभद्र दक्ष की छाती पर चढ़ बैठा और तीक्ष्ण हथियार से उसकेशरीर से सिर काटकर अलग करने का प्रयत्न करने लगा, किन्तु सफल नहीं हुआ।

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शस्त्रैरस्त्रान्वितिरेवमनिर्भिन्नत्वचं हर: ।

विस्मयं परमापन्नो दध्यौँ पशुपतिश्चिरम्‌ ॥

२३॥

शस्त्र: --हथियार से; अस्त्र-अन्वितै:ः--मंत्रों से; एवम्‌--इस प्रकार; अनिर्भिन्न--न कटने से; त्वचम्‌--चमड़ा; हर: --वीरभद्र ने;विस्मयम्‌ू--विस्मित; परम्‌--अत्यधिक; आपतन्न:-- चकित; दध्यौ--सोचा; पशुपति:-- वीरभद्र; चिरमू--दीर्घ-काल तक

उसने मंत्रों तथा हथियारों के बल पर दक्ष का सिर काटना चाहा, किन्तु दक्ष के सिर कीचमड़ी तक को काट पाना दूभर हो रहा था।

इस प्रकार वीरभद्र अत्यधिक चकित हुआ।

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इृष्टा संज्ञपनं योगं पशूनां स पतिर्मखे ।

यजमानपशोः कस्य कायात्तेनाहरच्छिर: ॥

२४॥

इृष्ठा--देखकर; संज्ञपनम्‌--यज्ञ में पशुओं के वध के लिए; योगम्‌--युक्ति; पशूनाम्‌--पशुओं की; सः--वह ( वीरभद्र );'पति:--स्वामी; मखे--यज्ञ में; यजमान-पशो:--यजमान रूपी पशु; कस्य--दक्ष का; कायात्‌--शरीर से; तेन--उस ( युक्ति )से; अहरतू--काट दिया; शिरः--उसका सिर

तब वीरभद्र ने यज्ञशाला में लकड़ी की बनी युक्ति ( करनी ) देखी जिससे पशुओं का वधकिया जाता था।

उसने दक्ष का सिर काटने में इसका लाभ उठाया।

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साधुवादस्तदा तेषां कर्म तत्तस्य पश्यताम्‌ ।

भूतप्रेतपिशाचानां अन्येषां तद्विपर्यय: ॥

२५॥

साधु-वाद:--वाहवाही; तदा--उस समय; तेषाम्‌ू--उनके ( शिव के अनुचरों के ); कर्म--क्रिया; तत्‌--वह; तस्य--उस( वीरभद्र ) का; पश्यताम्‌-देखते हुए; भूत-प्रेत-पिशाचानाम्‌-- भूतों, प्रेतों तथा पिशाचों का; अन्येषाम्‌--अन्यों ( दक्ष केदल ) का; ततू-विपर्यय:--इसके विपरीत ( शोकपूर्ण शब्द, हाहाकार )

वीरभद्र के कार्य से शिवजी के दल को प्रसन्नता हुई और वह वाह-वाह कर उठा तथा जितनेभी भूत, प्रेत तथा असुर वहाँ आये थे, उन सबों ने भयानक किलकारियाँ भरी।

दूसरी ओर, यज्ञका भार सँभालने वाले ब्राह्मण दक्ष की मृत्यु के कारण शोक से चीत्कार करने लगे।

जुहावैतच्छिरस्तस्मिन्दक्षिणाग्नावमर्षित: ।

तद्देवयजन दबग्ध्वा प्रातिष्ठद्गुह्यकालयम्‌ ॥

२६॥

जुहाव--आहुति की; एतत्‌--वह; शिर: --सिर; तस्मिन्‌--उसमें; दक्षिण-अग्नौ--दक्षिण दिशा की यज्ञ-अग्नि में; अमर्षित: --अत्यन्त क्रुद्ध वीरभद्र; तत्‌ू--दक्ष का; देव-यजनम्‌--देवताओं के यज्ञ की व्यवस्था; दग्ध्वा--आग लगाकर; प्रातिष्ठत्‌--विदाहुआ; गुह्मक-आलयम्‌--गुह्मकों के धाम ( कैलास )

फिर वीरभद्र ने उस सिर को लेकर अत्यन्त क्रोध से यज्ञ अग्नि की दक्षिण दिशा में आहुतिके रूप में डाल दिया।

इस प्रकार शिव के अनुचरों ने यज्ञ की सारी व्यवस्था तहस-नहस करडाली और समस्त यज्ञ क्षेत्र में आग लगाकर अपने स्वामी के धाम, कैलास के लिए प्रस्थानकिया।

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