← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय चार: सती ने अपना शरीर त्याग दिया
4..4मैत्रेय उवाचएतावदुक्त्वा विरराम शट्डूरःपत्यडुनाशं ह्युभयत्र चिन्तयन्।
सुहहिहक्षु: परिशद्धिता भवा-न्रिष्क्रामती निर्विशती द्विधास सा ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; एतावत्--इतना; उक्त्वा--कह कर; विरराम--शान्त हो गये; शद्भूरः -- भगवान् शिव; पत्नी-अड्ड-नाशम्--अपनी पतली के शरीर का विनाश; हि--चूँकि; उभयत्र--दोनों प्रकार से; चिन्तयन्--सोचते हुए; सुहृत्-दिदक्षु:--अपने सम्बधियों को देखने के लिए इच्छुक; परिशड्भिता-- भयभीत; भवात्--शिव से; निष्क्रामती--बाहर आती;निर्विशती-- भीतर जाती; द्विधा--दुचित्ती; आस--थी; सा--वह ( सती )॥
मैत्रेय मुनि ने कहा : सती को असमंजस में पाकर शिवजी यह कह कर शान्त हो गये।
सतीअपने पिता के घर में अपने सम्बन्धियों को देखने के लिए अत्यधिक इच्छुक थी, किन्तु साथ हीवह शिवजी की चेतावनी से भयभीत थी।
मन अस्थिर होने से वह हिंडोले की भाँति कक्ष सेबाहर और भीतर आ-जा रही थी।
"
सुहद्दिहक्षाप्रतिघातदुर्म ना:स्नेहाद्ुद॒त्यश्रुकलातिविहला ।
भवं भवान्यप्रतिपूरुषं रुषाप्रधक्ष्यतीवैक्षत जातवेपथु: ॥
२॥
सुहृत्-दिहृक्षा-- अपने सम्बन्धियों को देखने की इच्छा की; प्रतिघात--बाधा; दुर्मना:--अनमनी होकर; स्नेहात्--स्नेहवशरुदती--रोती हुई; अश्रु-कला--आँसुओं की बूँदों से; अतिविहला--अत्यधिक व्याकुल; भवम्--शिव; भवानी--सती;अप्रति-पूरुषम्--अद्वितीय; रुषा--क्रो ध से; प्रधक्ष्यती-- भस्म करने; इब--मानो; ऐश्षत--देखा; जात-वेपथु: --हिलती हुई,थर-थर काँपती हुईं।
इस तरह अपने पिता के घर जाकर अपने सम्बन्धियों को देखने से मना किये जाने पर सतीअत्यन्त दुखी हुई।
उन सबके स्नेह के कारण उसकी आँखों से अश्रु गिरने लगे।
थरथराती एवं अत्यधिक व्याकुल होकर उसने अपने अद्वितीय पति भगवान् शंकर को इस प्रकार से देखा मानोवह अपनी दृष्टि से उन्हें भस्म करने जा रही हो।
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ततो विनि:श्रस्यथ सती विहाय त॑शोकेन रोषेण च दूयता हृदा ।
पित्रोरगास्स्रैणविमूढधीर्गृहान्प्रेम्णात्मनो योर्धमदात्सतां प्रिय: ॥
३॥
ततः--तब; विनिः श्वस्थ-- जोर-जोर से साँस लेते हुए; सती--सती; विहाय--त्याग कर; तम्ू--उसको ( शिव को ); शोकेन--शोक से; रोषेण--क्रोध से; च--तथा; दूयता--विहल; हृदा--हृदय से; पित्रो:--अपने पिता के; अगात्--चली गई; स्त्रैण --अपनी स्त्री प्रकृति के कारण; बिमूढ--प्रवंचित; धी:--बुद्धि; गृहान्ू--घर को; प्रेम्णा--प्रेमवश; आत्मन:--अपने शरीर का;यः--जो; अर्धम्--आधा; अदात्--दे दिया; सताम्--साधु पुरुषों को; प्रिय:--प्रिय |
तत्पश्चात् सती अपने पति शिवजी को, जिन्होंने प्रेमवश उसे अपना अर्धाँग प्रदान किया था,छोड़कर क्रोध तथा शोक के कारण लम्बी-लम्बी साँसें भरती हुई अपने पिता के घर को चलीगईं।
उससे यह अल्प बुद्ध्धिमत्ता-पूर्ण कार्य उसका अबला नारी होने के फलस्वरूप हुआ।
"
तामन्वगच्छन्द्रुतविक्रमां सती-मेकां त्रिनेत्रानुचरा: सहस्त्रशः ।
सपार्षदयक्षा मणिमन्मदादयःपुरोवृषेन्द्रास्तरसा गतव्यथा: ॥
४॥
तामू--उसको ( सती को ); अन्वगच्छन्--पीछा करते; द्रुत-विक्रमाम्-तेजी से छोड़ते; सतीम्--सती को; एकाम्--अकेले;त्रि-नेत्र--शिव ( तीन नेत्रों वाले ) के; अनुचरा: --अनुयायी; सहस्त्रश:--हजारों; स-पार्षद-यक्षा:--उनके पार्षदों तथा यक्षों केसहित; मणिमत्-मद-आदय:--मणिमान्, मद आदि; पुरः-वृष-इन्द्रा:--नन्दी बैल को आगे करके; तरसा--तेजी से; गत-व्यथा:--निर्भीक |
जब उन्होंने सती को तेजी से अकेले जाते देखा तो शिवजी के हजारों अनुत्तर, जिनमेंमणिमान तथा मद प्रमुख थे, नन््दी बैल को आगे करके तथा यक्षों को साथ लेकर जल्दी से सतीके पीछे-पीछे हो लिए।
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तां सारिकाकन्दुकदर्पणाम्बुज-श्वेतातपत्रव्यजनस्त्रगादिभि: ।
गीतायनैर्दुन्दुभिशद्डुवेणुभि-वृषिन्द्रमारोप्य विटड्डिता ययु; ॥
५॥
तामू--उसकी ( सती को ); सारिका--पालतू पक्षी मैना; कन्दुक--गेंद; दर्पण--शीशा; अम्बुज--कमल का फूल; श्वेत-आततपत्र--सफेद छाता; व्यजन--पंखा; सत्रकू--माला; आदिभि:--इत्यादि; गीत-अयनै:--संगीत के साथ; दुन्दुभि--डुग्गी,ढोल; शद्भु--शंख; वेणुभि:--मुरली से; वृष-इन्द्रमू--बैल पर; आरोप्य--चढ़ाकर; विटछ्लिता:--आभूषित; ययु:--वे गये।
शिव के अनुचरों ने सती को बैल पर चढ़ा लिया और उन्हें उनकी पालतू चिड़िया ( मैना ) देदी।
उन्होंने कमल का फूल, एक दर्पण तथा उनके आमोद-प्रमोद की सारी सामग्री ले ली औरउनके ऊपर एक विशाल छत्र तान दिया।
उनके पीछे ढोल, शंख तथा बिगुल बजाता हुआ दलराजसी शोभा यात्रा के समान भव्य लग रहा था।
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आब्रह्मघोषोर्जितयज्ञवैशसंविप्रर्षिजुष्ट विबुधेश्व सर्वशः ।
मृद्दार्ववःकाझनदर्भचर्मभि-निसृष्टठभाण्डं यजनं समाविशत् ॥
६॥
आ--चारों ओर से; ब्रह्म-घोष--वैदिक मंत्रों की ध्वनियों से; ऊर्जित--सजाया; यज्ञ--यज्ञ; वैशसम्-- पशु बलि; विप्रर्षि-जुष्टम्ू--जुटे हुए ऋषि; विबुधे:--देवताओं से; च--तथा; सर्वशः--सभी दिशाओं में; मृत्ू--मिट्टी के; दारु--काठ के;अयः--लोह; काझ्जनन--सोने के ; दर्भ--कुश; चर्मभि: --खालों से; निसृष्ट--बने; भाण्डम्--बलि पशु तथा भांडे ( बर्तन );यजनमू--यज्ञ; समाविशत्-- प्रवेश किया
तब सती अपने पिता के घर पहुँची जहाँ यज्ञ हो रहा था और उसने यज्ञस्थल में प्रवेश कियाजहाँ वैदिक स्तोत्रों का उच्चारण हो रहा था।
वहाँ सभी ऋषि, ब्राह्मण तथा देवता एकत्र थे।
वहाँपर अनेक बलि-पशु थे और साथ ही मिट्टी, पत्थर, सोने, कुश तथा चर्म के बने पात्र थे जिनकीयज्ञ में आवश्यकता पड़ती है।
"
तामागतां तत्र न कश्चनाद्वियद्विमानितां यज्ञकृतो भयाज्जनः ।
ऋते स्वसूर्वे जननीं च सादराः प्रेमा श्रुकण्ठ्य: परिषस्वजुर्मुदा ॥
७॥
तामू--उसके ( सती के ); आगताम्--आगमन से; तत्र--वहाँ; न--नहीं; कश्चन--किसी ने; आद्रवियत्--स्वागत किया;विमानिताम्ू--आदर न पाकर; यज्ञ-कृतः--यज्ञकर्ता ( दक्ष ); भयात्-- भय से; जन:--व्यक्ति; ऋते--के अतिरिक्त; स्वसृ:--उसकी बहनें; वै--निस्सन्देह; जननीम्--माता; च--तथा; स-आदराः:--आदर सहित; प्रेम-अश्रु-कण्ठ्य:--स्नेह-अश्रुओं सेभरे हुए कण्ठ; परिषस्वजु:--आलिंगन किया; मुदा--प्रसन्न मुख से |
जब सती अनुचरों सहित यज्ञस्थल में पहुँचीं, तो किसी ने उनका स्वागत नहीं किया, क्योंकिवहाँ पर एकत्रित सभी लोग दक्ष से भयभीत थे।
उनकी माता तथा बहनों ने अश्रुपूरित नेत्रों तथाप्रसन्न मुखों से उसका स्वागत किया और उससे बड़े ही प्रेम से बातें कीं।
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सौदर्यसम्प्रश्नसमर्थवार्तयामात्रा च मातृष्वसृभिश्च सादरम् ।
दत्तां सपर्या वरमासनं च सानादत्त पित्राप्रतिनन्दिता सती ॥
८॥
सौदर्य--अपनी बहनों का; सम्प्रश्न--समादर; समर्थ--उचित; वार्तया--कुशल समाचार; मात्रा --अपनी माता द्वारा; च--तथा; मातृ-स्वसृभि:--मौसियों द्वारा; च--तथा; स-आदरम्--आदरपूर्वक; दत्तामू--दी गईं; सपर्याम्-पूजा; वरम्--भेंटें;आसनमू--आसन; च--तथा; सा--उस; न आदत्त--ग्रहण नहीं किया; पित्रा--अपने पिता द्वारा; अप्रतिनन्दिता--समादरित नहोने से; सती--सती ने
यद्यपि उनकी बहनों तथा माता ने उनका स्वागत-सत्कार किया, किन्तु उन्होंने उनकेस्वागत-बचनों का कोई उत्तर नहीं दिया।
यद्यपि उन्हें आसन तथा उपहार दिये गये, किन्तु उन्होंनेकुछ भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनके पिता न तो उनसे बोले और न उनका कुशल-दश्षेमपूछ कर उनका स्वत्कार किया।
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अरुद्रभागं तमवेक्ष्य चाध्वरंपित्रा च देवे कृतहेलनं विभौ ।
अनाहता यज्ञसदस्यधी श्वरीचुकोप लोकानिव धक्ष्यती रूुषा ॥
९॥
अरुद्र-भागम्--शिव का यज्ञभाग न पाकर; तम्--उसे; अवेक्ष्य--देखकर; च--तथा; अध्वरमू--यज्ञस्थल; पित्रा--अपने पिताद्वारा; च--तथा; देवे--शिव की; कृत-हेलनम्--अवहेलना करके; विभौ--स्वामी के; अनाहता--अनादर की गई; यज्ञ-सदसि--यज्ञ की सभा में; अधी श्वरी --सती; चुकोप-- अत्यधिक क्रुद्ध हुई; लोकान्--चौदहों लोक; इब--मानो; धक्ष्यती --जलाती हुई; रुषा--क्रोध से |
यज्ञस्थल में जाकर सती ने देखा कि उनके पति शिवजी का कोई यज्ञ भाग नहीं रखे गये हैं।
तब उन्हें यह आभास हुआ कि उनके पिता ने शिव को आमंत्रित नहीं किया; उल्टे जब दक्ष नेशिव की पूज्य पत्नी को देखा तो उसने उसका भी आदर नहीं किया।
अतः इससे वे अत्यन्त क्रुद्धहुईं; यहां तक कि वह और अपने पिता को इस प्रकार देखने लगीं मानो उसे अपने नेत्रों से भस्मकर देंगी।
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जग सामर्षविपन्नया गिराशिवद्दिषं धूमपथश्रमस्मयम् ।
स्वतेजसा भूतगणान्समुत्थितान्निगृह्ा देवी जगतोउभिश्रुण्वत: ॥
१०॥
जगर--निन््दा करने लगी; सा--वह; अमर्ष-विपन्नया--क्रोध के कारण अस्फुट; गिरा--वाणी से; शिव-द्विषम्--शिव काशत्रु; धूम-पथ--यज्ञों में; श्रम--कष्टों से; स्मयम्--अत्यन्त गर्वित; स्व-तेजसा--अपनी आज्ञा से; भूत-गणानू-- भूतों के;समुत्थितानू--सन्नद्ध, तत्पर ( दक्ष को मारने के लिए ); निगृह्य--रोका; देवी--सती ने; जगतः--सबों की उपस्थिति में;अभिश्रुण्वत:ः--सुना जाकर।
शिव के अनुचर, भूतगण दक्ष को क्षति पहुँचाने अथवा मारने के लिए तत्पर थे, किन्तु सतीने आदेश देकर उन्हें रोका।
वे अत्यन्त क्रुद्ध और दुखी थीं और उसी भाव में वे यज्ञ केसकामकर्मों की विधि की तथा उन व्यक्तियों की, जो इस प्रकार के अनावश्यक एवं कष्टकरयज्ञों के लिए गर्व करते हैं, भर्तस्सना करने लगीं।
उन्होंने सबों के समक्ष अपने पिता के विरुद्धबोलते हुए उसकी विशेष रूप से निन््दा की।
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देव्युवाचन यस्य लोकेस्त्यतिशायन: प्रिय-स्तथाप्रियो देहभूतां प्रियात्मन: ।
तस्मिन्समस्तात्मनि मुक्तवैरकेऋते भवन्तं कतमः प्रतीपयेत् ॥
११॥
देवी उबाच--देवी ( सती ) ने कहा; न--नहीं; यस्य--जिसका; लोके-- इस जगत में; अस्ति-- है; अतिशायन: --प्रतिद्वन्द्दी नहोना; प्रिय: --प्रिय; तथा--उसी प्रकार; अप्रिय:--शत्रु; देह-भृताम्--देहधारी; प्रिय-आत्मन:--अत्यन्त प्रिय; तस्मिन्ू--शिवके प्रति; समस्त-आत्मनि--संसार भर के प्राणी; मुक्त-बैरके --जो समस्त शत्रुता से मुक्त है, शत्रुविहीन; ऋते--अतिरिक्त;भवन्तमू--आपके; कतम:--कौन; प्रतीपयेत्--ईर्ष्यालु होगा ।
देवी सती ने कहा : भगवान् शिव तो समस्त जीवात्माओं के लिए अत्यन्त प्रिय हैं।
उनकाकोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है।
न तो कोई उनका अत्यन्त प्रिय है और न कोई उनका शत्रु है।
आपकेसिवा और ऐसा कौन है, जो ऐसे विश्वात्मा से द्वेष करेगा, जो समस्त वैर से रहित हैं?"
दोषान्परेषां हि गुणेषु साधवोगृहनन्ति केचिन्न भवाहशो द्विज ।
गुणां श्र फल्गून्बहुली करिष्णवोमहत्तमास्तेष्वविदद्धवानघम् ॥
१२॥
दोषान्--दोष; परेषाम्--अन्यों के; हि--क्योंकि; गुणेषु--गुणों में; साधव:--साधुजन; गृहन्ति--पाते हैं; केचित्--कुछ;न--नहीं; भवाहशः--आपके समान; द्विज-हे द्विज; गुणान--गुण; च--तथा; फल्गूनू--छोटा; बहुली-करिष्णव:--अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा देता है; महत्-तमा:--महापुरुष; तेषु--उनमें से; अविदत्--ढूँढते हैं; भवान्ू--आप; अघम्--दोष, त्रुटि
हे द्विज दक्ष, आप जैसा व्यक्ति ही अन्यों के गुणों में दोष ढूँढ सकता है।
किन्तु शिव अन्योंके गुणों में कोई दोष नहीं निकालते, विपरीत इसके यदि किसी में थोड़ा भी गुण होता है, तो वेउसे और भी अधिक बढ़ा देते हैं।
दुर्भाग्यवश आपने ऐसे महापुरुष पर दोषारोपण किया है।
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नाश्चर्यमेतद्यदसत्सु सर्वदामहद्विनिन्दा कुणपात्मवादिषु ।
सेष्य महापूरुषपादपांसुभि-निरस्ततेज:सु तदेव शोभनम् ॥
१३॥
न--नहीं; आश्चर्यमू--विस्मयपूर्ण; एतत्--यह; यत्--जो; असत्सु--बुराई; सर्वदा--सदैव; महत्-विनिन्दा--महात्माओं कीनिन््दा; कुणप-आत्म-वादिषु--शव को ही जिन्होंने आत्मरूप मान रखा है उनमें; स-ईर्ष्यम्--ईर्ष्या; महा-पूरुष--महापुरुषों की;पाद-पांसुभि:--चरण-रज से; निरस्त-तेज:सु--घटा हुआ तेज; तत्--वह; एव--निश्चय ही; शोभनमू्--अति उत्तम
जिन लोगों ने इस नश्वर भौतिक शरीर को ही आत्मरूप मान रखा है, उनके लिए महापुरुषोंकी निन्दा करना कोई आश्चर्य की बात नहीं।
भौतिकतावादी पुरुषों के लिए ऐसी ईर्ष्या ठीक हीहै, क्योंकि इसी प्रकार से उनका पतन होता है।
वे महापुरुषों की चरण-रज से लघुता प्राप्त करतेहैं।
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यददव्यक्षरं नाम गिरेरितं नृणांसकृत्प्रसड्रादघधमाशु हन्ति तत् ।
पवित्रकीर्ति तमलड्घ्यशासनंभवानहों द्वेष्टि शिवं शिवेतरः ॥
१४॥
यतू--जो; द्वि-अक्षरम्--दो अक्षरों वाले; नाम--नाम; गिरा ईरितम्--जीभ से उच्चरित होकर; नृणाम्--मनुष्यों की; सकृत्ू--एक बार; प्रसड्भात्ू--हृदय से; अधम्--पापपूर्ण कृत्य; आशु--तुरन्त; हन्ति--नष्ट कर देता है; तत्--वह; पवित्र-कीर्तिम्--शुद्ध यश; तम्--उसको; अलड्घ्य-शासनम्--जिनके आदेश की उपेक्षा नहीं की जाती; भवान्--आप; अहो--ओह; द्वेष्टि--द्वेष करते हैं; शिवम्-- भगवान् शिव से; शिव-इतर:--अशुभ |
सती ने आगे कहा : हे पिता, आप शिव से द्वेष करके घोरतम अपराध कर रहे हैं क्योंकिउनका दो अक्षरों, शि तथा व, वाला नाम मनुष्य को समस्त पापों से पवित्र करने वाला है।
उनकेआदेश की कभी उपेक्षा नहीं होती।
शिवजी सदैव शुद्ध हैं और आपके अतिरिक्त अन्य कोई उनसेद्वेष नहीं करता।
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यत्पादपद्ां महतां मनोइलिभि-निषिवितं ब्रह्सासवार्थिभि: ।
लोकस्य यद्वर्षति चाशिषोरथिन-स्तस्मै भवान्द्रुह्मति विश्वबन्धवे ॥
१५॥
यत्-पाद-पदाम्--जिनके चरणकमल; महताम्--महान् पुरुषों के; मनः-अलिभि:--मनरूपी भौरों से; निषेवितम्--संलग्नरहकर; ब्रह्म-गरस--दिव्य आनन्द ( ब्रह्मानन्द ) का; आसव-अर्थिभि:-- अमृत की खोज में; लोकस्य--सामान्य जन की; यत्--जो; वर्षति--पूरी करता है; च--तथा; आशिष: --इच्छाएँ; अर्थिन: --ढूँढते हुए; तस्मै--उस; भवानू--आप; ब्रुह्मति--द्रोहकरते हैं; विश्व-बन्धवे--तीनों लोक की समस्त जीवात्माओं के मित्र के प्रति
आप उन शिव से द्रोह करते हैं, जो तीनों लोकों के समस्त प्राणियों के मित्र हैं।
वे सामान्यपुरुषों की समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाले हैं और ब्रह्मानन्द ( दिव्य आनन्द ) की खोज करनेवाले उन महापुरुषों को भी आशीर्वाद देते हैं, जो उनके चरण-कमलों के ध्यान में लीन रहते हैं।
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कि वा शिवाख्यमशिवं न विवुस्त्वदन्येब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटा: एमशाने ।
तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-ये मूर्थभिर्दधति तच्चरणावसूष्टम् ॥
१६॥
किम् वा--अथवा; शिव-आख्यम्--शिव कहलाने वाले; अशिवम्--अशुभ, अमंगल; न विदु:--नहीं जानते; त्वत् अन्ये--आपके अतिरिक्त, अन्य; ब्रहा-आदय:--ब्रह्मा इत्यादि; तम्--उनको ( शिव को ); अवकीर्य--बिखेरे हुए; जटा:--जटा बनाये;श्मशाने--श्मशान में; तत्-माल्य-भस्म-नू-कपाली --जो नर-मुंडों की माला पहने और राख लगाये हुए हैं; अवसत्--संग रहनेवाले; पिशाचै:--असुरों के साथ; ये--जो; मूर्धभि:ः--शिर से; दधति--धारण करते हैं; तत्-चरण-अवसृष्टम्--उनकेचरणकमल से गिरी हुईं
क्या आप यह सोचते हैं कि आपसे भी बढ़कर सम्माननीय व्यक्ति जैसे भगवान् ब्रह्मा, इसशिव नाम से विख्यात अमंगल व्यक्ति को नहीं जानते ? वे श्मशान में असुरों के साथ रहते हैं,उनकी जटाएँ शरीर के ऊपर बिखरी रहती हैं, वे नरमुंडों की माला धारण करते हैं और एमशानकी राख शरीर में लपेटे रहते हैं, किन्तु इन अशुभ गुणों के होते हुए भी ब्रह्मा जैसे महापुरुषउनके चरणों पर चढ़ाये गये फूलों को आदरपूर्वक अपने मस्तकों पर धारण करके उनका सम्मानकरते हैं।
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'कर्णों पिधाय निरयाद्यदकल्प ईशेधर्मावितर्यसृणिभिनृभिरस्यमाने ।
छिन्द्यात्प्रसह्य रुशतीमसती प्रभुश्ने-जिह्वामसूनपि ततो विसूजेत्स धर्म: ॥
१७॥
कर्णो--दोनों कान; पिधाय--बन्द करके; निरयात्--चले जाना चाहिए; यत्--यदि; अकल्प:-- असमर्थ; ईशे -- स्वामी; धर्म-अवितरि--धर्म का नियंत्रक; असृणिभि: --निरंकुश; नृभि:--व्यक्ति; अस्यमाने--कलंकित होकर; छिन्द्यात्--काट देनाचाहिए; प्रसह्य --बलपूर्वक; रुशतीम्--निन््दा करने वाली; असतीम्--निन्दक की; प्रभुः--समर्थ; चेत्--यदि; जिह्मामू--जी भ;असून्ू--( अपना ) जीवन; अपि--निश्चय ही; तत:--तब; विसृजेत्--त्याग देना चाहिए; सः--वह; धर्म:--विधि है|
सती ने आगे कहा : यदि कोई किसी निरंकुश व्यक्ति को धर्म के स्वामी तथा नियंत्रक कीनिन््दा करते सुने और यदि वह उसे दण्ड देने में समर्थ नहीं है, तो उसे चाहिए कि कान मूँद करवहाँ से चला जाय।
किन्तु यदि वह मारने में सक्षम है, तो उसे चाहिए कि वह बलपूर्वक निन्दककी जीभ काट ले और अपराधी का वध कर दे।
तत्पश्चात् वह अपने भी प्राण त्याग दे।
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अतस्तवोत्पन्नमिदं कलेवरंन धारयिष्ये शितिकण्ठगर्हिण: ।
जग्धस्य मोहादिद्वि विशुद्धिमन्धसोजुगुप्सितस्योद्धरणं प्रचक्षते ॥
१८॥
अतः--इसलिए; तब--तुम से; उत्पन्नम्--प्राप्त; इदम्--यह; कलेवरम्--शरीर; न धारयिष्ये-- धारण नहीं करूँगी; शिति-'कण्ठ-गर्हिण:--शिव को अपमानित करने वाला; जग्धस्य--खाया गया; मोहात्-- भूल से; हि-- क्योंकि; विशुद्धिम्-- शुद्धि;अन्धसः-- भोजन का; जुगुप्सितस्थ--विषैला; उद्धरणम्--वमन, कै; प्रचक्षते--घोषित किया जाता है।
अतः मैं इस अयोग्य शरीर को, जिसे मैंने आपसे प्राप्त किया है और अधिक काल तकधारण नहीं करूँगी, क्योंकि आपने शिवजी की निन्दा की है।
यदि कोई विषैला भोजन कर लेतो सर्वोत्तम उपचार यही है कि उसे वमन कर दिया जाय।
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न वेदवादाननुवर्तते मतिः स्व एव लोके रमतो महामुने: ।
यथा गतिर्देवमनुष्ययो: पृथक्स्व एव धर्मे न परं क्षिपेत्स्थित: ॥
१९॥
न--नहीं; वेद-वादान्--वेदों के विधि-विधान; अनुवर्तते--पालन करते; मति:ः --मन; स्वे-- अपनी ओर से; एब--निश्चय ही;लोके--आत्म में; रमत:-- भोगता हुआ; महा-मुने: --दिव्य पुरुषों का; यथा--जिस प्रकार; गति:--मार्ग, ढंग; देव-मनुष्ययो: --मनुष्यों तथा देवताओं का; पृथक्ू--अलग-अलग; स्वे--अपने में; एब-- अकेले; धर्मे--कर्तव्य; न--नहीं;परम्--अन्य; क्षिपेतू--आलोचना करे; स्थित:--स्थित होकर ।
दूसरों की आलोचना करने से श्रेयस्कर है कि अपना कर्तव्य निभाया जाये।
बड़े-बड़े दिव्यपुरुष भी कभी-कभी वेदों के विधि-विधानों का उल्लंघन कर देते हैं, क्योंकि उन्हें अनुसरणकरने की आवश्यकता नहीं होती, ठीक उसी प्रकार जैसे कि देवता तो आकाश मार्ग में विचरतेहैं, किन्तु सामान्य जन धरती पर चलते हैं।
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कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्यृतंवेदे विविच्योभयलिड्रमाथ्रितम् ।
विरोधि तद्यौगपदैककर्तारिद्ववयं तथा ब्रह्मणि कर्म नरच्छति ॥
२०॥
कर्म-कार्य; प्रवृत्तम्-- भौतिक सुख में आसक्त; च--तथा; निवृत्तम्--भौतिक दृष्टि से विरक्त; अपि--निश्चय ही; ऋतम्--सत्य; वेदे--वेदों में; विविच्य--अन्तर वाले; उभय-लिड्डम्ू-दोनों के लक्षण; आश्रितम्--निर्देशित; विरोधि--विरोधी; तत्--वह; यौगपद-एक-कर्तरि--एक ही व्यक्ति में दोनों कर्म; द्ययम्ू--दो; तथा--अतः ; ब्रह्मणि--दिव्य पुरुष में; कर्म--कार्य; नऋच्छति-- उपेक्षित होते हैं।
वेदों में दो प्रकार के कर्मों के निर्देश दिये गये हैं--एक उनके लिए जो भौतिक सुख मेंलिप्त हैं और दूसरा उनके लिए जो भौतिक रूप से विरक्त हैं।
इन दो प्रकार के कर्मों का विचारकरते हुए दो प्रकार के मनुष्य हैं जिनके लक्षण भिन्न-भिन्न हैं।
यदि कोई एक ही व्यक्ति में इनदोनों प्रकार के कर्मों को देखना चाहता है, तो यह विरोधाभास होगा।
किन्तु दिव्य पुरुष के द्वाराइन दोनों प्रकार के कर्मों की उपेक्षा की जा सकती है।
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मा व: पदव्य: पितरस्मदास्थिताया यज्ञशालासु न धूमवर्त्मभि: ।
तदन्नतृप्तैरसु भूद्धिरीडिताअव्यक्तलिड्रा अवधूतसेविता: ॥
२१॥
मा--नहीं हैं; व:--तुम्हारे; पदव्य:ः--ऐश्वर्य; पित:--हे पिता; अस्मत्-आस्थिता:--हमारे द्वारा प्राप्त; या:--जो ( ऐश्वर्य ); यज्ञ-शालासु--यज्ञ की अग्नि में; न--नहीं; धूम-वर्त्मभि:--यज्ञों के पथ द्वारा; ततू-अन्न-तृप्तैः--यज्ञ के अन्न द्वारा तृप्त; असु-भूद्धिः--शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला; ईंडिता: -- प्रशंसित; अव्यक्त-लिड्रा:--जिसका कारण प्रकट नहीं है;अवधूत-सेविता: --स्वरूपसिद्ध व्यक्तियों द्वारा प्राप्त
हे पिता, हमारे पास जो ऐश्वर्य है उसकी कल्पना कर पाना न तो आपके लिए और न आपकेचाटुकारो के लिए सम्भव है, क्योंकि जो पुरुष महान् यज्ञों को सम्पन्न करके सकाम कर्म मेंप्रवृत्त होते हैं, वे तो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को यज्ञ में अर्पित अन्न खाकर पूरा करनेकी चिन्ता में लगे रहते हैं।
हम वैसा सोचने मात्र से ही अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन कर सकते हैं।
ऐसा वे ही कर सकते हैं, जो विरक्त, स्वरूपसिद्ध महापुरुष हैं।
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नैतेन देहेन हरे कृतागसोदेहोद्धवेनालमलं कुजन्मना ।
ब्रीडा ममाभूत्कुजनप्रसड़तस्तज्जन्म धिग्यो महतामवद्यकृत् ॥
२२॥
न--नहीं; एतेन--इस; देहेन--देह के द्वारा; हरे--शिव के प्रति; कृत-आगसः--अपराध करके ; देह-उद्धवेन--आपके शरीर सेउत्पन्न; अलम् अलम्--बहुत हुआ, बहुत हुआ, बस बस; कु-जन्मना--निन्दनीय जन्म से; ब्रीडा--लज्जा; मम--मेरा; अभूत्--था; कु-जन-प्रसड्त:--बुरे व्यक्ति के साथ से; तत् जन्म--वह जन्म; धिक्--धिक्कार है, लजाजनक; यः--जो; महताम्ू--महापुरुषों का; अवद्य-कृत्ू--अपराधी |
आप भगवान् शिव के चरणकमलों के प्रति अपराधी हैं और दुर्भाग्यवश मेरा शरीर आपसेउत्पन्न है।
मुझे अपने इस शारीरिक सम्बन्ध के लिए अत्यधिक लज्जा आ रही है और मैं अपनीस्वयं भर्त्सना करती हूँ कि मेरा शरीर ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध से दूषित है, जो महापुरुष केचरणकमलों के प्रति अपराधी है।
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गोत्र त्वदीयं भगवान्वृषध्वजोदाक्षायणीत्याह यदा सुदुर्मना: ।
व्यपेतनर्मस्मितमाशु तदाहंव्युत्त्रक्ष्य एतत्कुणपं त्वदड़जम् ॥
२३॥
गोत्रमू--पारिवारिक सम्बन्ध; त्वदीयम्ू--आपका; भगवान्--समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; वृषध्वज:--शिव; दाक्षायणी--दक्ष कीकन्या, दाक्षायणी; इति--इस प्रकार; आह--कहती है; यदा--जब; सुदुर्मना:--अत्यन्त खिन्न; व्यपेत--अहृश्य होते हैं; नर्म-स्मितमू--मेरी प्रसन्नता तथा हँसी; आशु--तुरन््त; तदा--तब; अहमू--मैं; व्युत्सत्रक्ष्ये--त्याग दूँगी; एतत्--यह ( शरीर );कुणपम्--मृत शरीर; त्वत्-अड्भ-जम्--तुम्हारे शरीर से उत्पन्न ।
जब शिवजी मुझे दाक्षायणी कह कर पुकारते हैं, तो अपने पारिवारिक सम्बन्ध के कारण मैंतुरन्त खिन्न हो उठती हूँ और मेरी सारी प्रसन्नता तथा हँसी तुरन्त भाग जाती है।
मुझे अत्यन्त खेदहोता है कि मेरा यह थेले जैसा शरीर आपके द्वारा उत्पन्न है।
अतः मैं इसे त्याग दूँगी।
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मैत्रेय उवाचइत्यध्वरे दक्षमनूद्य शत्रुहन्क्षितावुदीचीं निषसाद शान्तवाक् ।
स्पृष्ठा जल॑ पीतदुकूलसंबृतानिमील्य हृग्योगपर्थं समाविशत् ॥
२४॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; अध्वरे--यज्ञस्थल में; दक्षम्-दक्ष को; अनूद्य--बोल कर; शत्रु-हन्--शत्रुओं के विनाशकर्ता; क्षितौ--पृथ्वी पर; उदीचीम्--उत्तर की ओर; निषसाद--बैठ गई; शान्त-वाक्--चुप होकर; स्पृष्ठा --छूकर; जलमू--जल; पीत-दुकूल-संवृता--पीले वस्त्रों से आच्छादित; निमील्य--मूँद कर; हक्--दृष्टि; योग-पथम्--योगक्रिया; समाविशत्-- ध्यानमग्न हो गई।
मैत्रय ऋषि ने विदुर से कहा : हे शत्रुओं के संहारक, यज्ञस्थल में अपने पिता से ऐसा कहकर सती भूमि पर उत्तरमुख होकर बैठ गईं।
केसरिया वस्त्र धारण किये उन्होंने जल से अपने कोपवित्र किया और योगक्रिया में अपने को ध्यानमग्न करने के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।
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कृत्वा समानावनिलौ जितासनासोदानमुत्थाप्य च नाभिचक्रतः ।
शनेईदि स्थाप्य धियोरसि स्थितंकण्ठादश्रुवोर्म ध्यमनिन्दितानयत् ॥
२५॥
कृत्वा--स्थापित करके; समानौ--साम्यावस्था में; अनिलौ--प्राण तथा अपान वायुओं को; जित-आसना--आसन को वक्ष मेंकरके; सा--वह ( सती ); उदानम्--प्राण वायु; उत्थाप्य--उठाकर; च--तथा; नाभि-चक्रत:--नाभिचक्र पर; शनै: -- धीरे-धीरे; हदि--हृदय में; स्थाप्य--स्थापित करके ; धिया--बुद्धि से; उरसि--फुफ्फुस मार्ग की ओर; स्थितम्--स्थापित कीजाकर; कण्ठातू--कंठ से होकर; भ्रुवो:--भौंहों के; मध्यम्--बीच में; अनिन्दिता--निष्कलंक ( सती ); आनयत्--ऊपर लेगई।
सबसे उन्होंने अपेक्षित रीति से आसन जमाया और फिर प्राणवायु को ऊपर खींचकर नाभिके निकट सन्तुलित अवस्था में स्थापित कर दिया।
तब प्राणवायु को उत्थापित करके,बुद्धिपूर्वक उसे वे हृदय में ले गई और फिर धीरे-धीरे श्वास मार्ग से होते हुए क्रमश: दोनों भौंहोंके बीच में ले आईं।
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एवं स्वदेहं महतां महीयसामुहुः समारोपितमड्डमादरात् ।
जिहासती दक्षरुषा मनस्विनीदधार गात्रेष्वनिलाग्निधारणाम् ॥
२६॥
एवम्--इस प्रकार; स्व-देहम्--अपना शरीर; महताम्-महान् सन््तों का; महीयसा--अत्यन्त पूज्य; मुहुः--पुनः पुनः;समारोपितम्ू--आसीन; अड्डूम्ू--गोद में; आदरात्--आदरपूर्वक; जिहासती --त्यागने की इच्छा से पूर्ण; दक्ष-रुषा--दक्ष केप्रति रोष के कारण; मनस्विनी--स्वेच्छा से; दधार--स्थापित किया; गात्रेषु--शरीर के अंगों में; अनिल-अग्नि-धारणाम्--अग्नि तथा वायु का ध्यान
इस प्रकार महर्षियों तथा सन््तों द्वारा आराध्य शिव की गोद में जिस शरीर को अत्यन्त आदरतथा प्रेम से बैठाया गया था, अपने पिता के प्रति रोष के कारण सती ने अपने उस शरीर कापरित्याग करने के लिए अपने शरीर के भीतर अग्निमय वायु का ध्यान करना प्रारम्भ कर दिया।
श" ततः स्वभर्तुश्वरणाम्बुजासवंजगदगुरोश्विन्तयती न चापरम् ।
ददर्श देहो हतकल्मष: सतीसद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥
२७॥
ततः--वहाँ; स्व-भर्तु:--अपने पति का; चरण-अम्बुज-आसवम्--चरणकमलों के अमृत पर; जगत्-गुरो:--ब्रह्माण्ड के गुरुका; चिन्तवती--चिन्तन करती हुई; न--नहीं; च--तथा; अपरम्--दूसरा ( अपने पति के अतिरिक्त ); ददर्श--देखा; देह: --शरीर; हत-कल्मष:--पाप का विनाश होकर; सती--सती; सद्य: --तुरन्त; प्रजज्वाल--जल गई; समाधि-ज-अग्निना-- ध्यानसे उत्पन्न अग्नि द्वारा ॥
सती ने अपना सारा ध्यान अपने पति जगद्गुरु शिव के पवित्र चरणकमलों पर केन्द्रित करदिया।
इस प्रकार वे समस्त पापों से शुद्ध हो गईं।
उन्होंने अग्निमय तत्त्वों के ध्यान द्वारा प्रज्वलितअग्नि में अपने शरीर का परित्याग कर दिया।
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तत्पश्यतां खे भुवि चाद्भधुतं महद्हा हेति वादः सुमहानजायत ।
हन्त प्रिया दैवतमस्य देवीजहावसून्केन सती प्रकोषिता ॥
२८॥
ततू--उस; पश्यताम्ू-देखने वालों का; खे--आकाश में; भुवि--पृथ्वी पर; च--तथा; अद्भुतम्-- अद्भुत; महत्--अत्यधिक; हा हा--हाहाकार; इति--इस प्रकार; वाद:--गर्जन; सु-महान्--अत्यन्त शोर युक्त; अजायत--हुआ; हन्त--हाय;प्रिया--प्राणप्रिय; दैव-तमस्य--सर्वाधिक पूज्य देवता ( शिव ) की; देवी--सती ने; जहौ--त्याग दिया; असून्--अपना प्राण;केन--दक्ष द्वारा; सती--सती; प्रकोषिता--क्रुद्ध हुई
जब सती ने कोपवश अपना शरीर भस्म कर दिया तो समूचे ब्रह्माण्ड में घोर कोलाहल मचगया कि सर्वाधिक पूज्य देवता शिव की पत्नी सती ने इस प्रकार अपना शरीर क्यों छोड़ा ? अहो अनात्म्यं महदस्य पश्यतप्रजापतेर्यस्य चराचरं प्रजा: ।
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जहावसून्यद्विमतात्मजा सतीमनस्विनी मानमभीक्ष्णममहति ॥
२९॥
अहो--ओह; अनात्म्यम्--उपेक्षा; महत्-- भारी; अस्य--दक्ष की; पश्यत--जरा देखो तो; प्रजापते: -- प्रजापति; यस्य--जिसकी; चर-अचरम्--समस्त जीवात्माएँ; प्रजा:--सन्तान; जहौ--त्याग दिया; असूनू--अपना शरीर; यत्--जिससे;विमता--अनादरित; आत्म-जा--अपनी पुत्री; सती--सती; मनस्विनी--स्वेच्छा से; मानम्--आदर, सम्मान; अभीक्षणम्--बारम्बार; अर्हति--योग्यता रखती थी।
यह आश्चर्यजनक बात है कि प्रजापति दक्ष, जो समस्त जीवात्माओं का पालनहारा है, अपनीपुत्री सती के प्रति इतना निरादरपूर्ण था कि उस परम साध्वी एवं महान् आत्मा ने उसकी उपेक्षाके कारण अपना शरीर त्याग दिया।
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सोथयं दुर्मर्षहदयो ब्रह्मध्रुक्कलोकेपकीर्ति महतीमवाप्स्यति ।
यदड़जां स्वां पुरुषद्विडुद्यतांन प्रत्यषेधन्मृतयेउपराधत: ॥
३०॥
सः--वह; अयम्--यह; दुर्मर्ष-हदय: -- कठोर हृदय; ब्रह्म-धुक्--ब्राह्मण होने के अयोग्य; च--तथा; लोके--संसार में;अपकीर्तिम्ू--अपयश; महतीम्-- अत्यधिक; अवाप्स्यति--प्राप्त करेगा; यत्-अड्भ-जाम्--जिसकी पुत्री; स्वाम्-- अपने; पुरुष-द्विटू--शिव का शत्रु; उद्यतामू--उद्यत, तैयार; न प्रत्यषेधत्--रोका नहीं; मृतये--मृत्यु से; अपराधत:--अपने अपराधों केकारण
ऐसा दक्ष जो इतना कठोर-हृदय है कि ब्राह्मण होने के अयोग्य है, वह अपनी पुत्री के प्रतिकिये गये अपराधों के कारण अतीव अपयश को प्राप्त होगा, क्योंकि उसने अपनी पुत्री को मरनेसे नहीं रोका और वह भगवान् के प्रति अत्यन्त द्वेष रखता था।
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बदत्येवं जने सत्या इृष्ठासुत्यागमद्भुतम् ।
दक्ष तत्पार्षदा हन्तुमुदतिष्ठन्नुदायुधा: ॥
३१॥
वदति--बातें कर रहे थे; एवम्--इस प्रकार; जने--जबकि लोग; सत्या:--सती की; दृष्टा--देखकर; असु-त्यागम्--मृत्यु,देह-त्याग; अद्भुतम्-- आश्चर्यमय; दक्षम्--दक्ष; तत्-पार्षदा:--शिव के अनुचर; हन्तुमू--मारने के लिए; उदतिष्ठन्--उठकरखड़े हुए; उदायुधा:--अपने हथियार उठाये।
जिस समय सब लोग सती की आश्चर्यजनक स्वेच्छित मृत्यु के विषय में परस्पर बातें कर रहेथे, उसी समय शिव के पार्षद, जो सती के साथ आये थे, अपने-अपने हथियार लेकर दक्ष कोमारने के लिए उद्यत हो गये।
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तेषामापततां वेग निशाम्य भगवान्भूगु: ।
यज्ञघ्नघ्नेन यजुषा दक्षिणाग्नौ जुहाव ह ॥
३२॥
तेषामू-- उनके; आपतताम्--निकट पहुँचे; वेगम्--वेग; निशाम्य--देखकर; भगवान्--समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी; भूगुः--भृगुमुनि; यज्ञ-घ्त-घ्नेन--यज्ञ को विध्वंस करने वालों को मारने के लिए; यजुषा--यजुर्वेद के मंत्रों से; दक्षिण-अग्नौ--यज्ञ कीअग्नि की दक्षिण दिशा में; जुहाव--आहुति दी; ह--निश्चय ही |
वे बलपूर्वक आगे बढ़े, किन्तु भूगु मुनि ने संकट को ताड़ लिया और याज्ञिक अग्नि की दक्षिण दिशा में आहुति डालते हुए उन्होंने तुरन्त यजुर्वेद से मंत्र पढ़े जिससे यज्ञ को विध्वंस करनेवाले तुरन्त मर जाएँ।
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अध्वर्युणा हूयमाने देवा उत्पेतुरोजसा ।
ऋभवो नाम तपसा सोम॑ प्राप्ता: सहस्त्रश: ॥
३३॥
अध्वर्युणा--पुरोहित, भृगु द्वारा; हूयमाने--आहुति डाले जाने पर; देवा:--देवता; उत्पेतु: --प्रकट हुए; ओजसा--परमशक्तिपूर्वक; ऋभव:--ऋभुगण; नाम--नामक; तपसा--तपस्या द्वारा; सोमम्--सोम; प्राप्ता:--प्राप्त हुए; सहस््रश:--हजारों |
जब भूगु मुनि ने अग्नि में आहुति डाली तो तत्क्षण ऋभु नामक हजारों देवता प्रकट हो गये।
वे सभी शक्तिशाली थे और उन्होंने सोम अर्थात् चन्द्र से शक्ति प्राप्त की थी।
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तैरलातायुथे: सर्वे प्रभथा: सहगुहाका: ।
हन्यमाना दिशो भेजुरुशद्धिर्ब्रह्मतजसा ॥
३४॥
तैः--उनके द्वारा; अलात-आयुधैः--अग्नि के हथियारों से; सर्वे--सभी; प्रमथा:-- भूतगण; सह-गुहाका:--गुह्यकों सहित;हन्यमाना:--आक्रमण किये गये; दिश:ः--विभिन्न दिशाओं में; भेजु:-- भग गये; उशद्धि:--जलते हुए; ब्रह्य-तेजसा--ब्रह्मशक्ति से।
जब ऋशभु देवताओं ने भूतों तथा गुह्कों पर यज्ञ की अधजली समिधाओं से आक्रमण करदिया तो सती के सारे अनुचर विभिन्न दिशाओं में भागकर अदृश्य हो गये।
यह ब्रह्मतेज अर्थात्ब्राह्मणशक्ति के कारण ही सम्भव हो सका।
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