← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय तीन: भगवान शिव और सती के बीच बातचीत
4.3मैत्रेय उवाचसदा विद्विषतोरेवं कालो वै प्रचियमाणयो: ।
जामातु: श्वशुरस्थापि सुमहानतिचक्रमे ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; सदा--निरन्तर; विद्विषतो:--तनाव; एवम्--इस प्रकार; काल:--समय; बै--निश्चय ही;प्रियमाणयो: --सहन करते हुए; जामातु:--दामाद का; श्वशुरस्थ--ससुर का; अपि-- भी; सु-महान्--अत्यधिक;अतिचक्रमे--बीत गया।
मैत्रेय ने आगे कहा : इस प्रकार से जामाता शिव तथा श्वसुर दक्ष के बीच दीर्घकाल तकतनाव बना रहा।
"
यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेषप्ठिना ।
प्रजापतीनां सर्वेषामाधिपत्ये स्मयोभवत् ॥
२॥
यदा--जब; अभिषिक्त:--नियुक्त; दक्ष:--दक्ष; तु--लेकिन; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; परमेष्ठिना--परम शिक्षक; प्रजापतीनाम्--प्रजापतियों का; सर्वेषाम्--समस्त; आधिपत्ये--प्रधान के रूप में; समय: --गर्वित; अभवत्--हो गया।
ब्रह्मा ने जब दक्ष को समस्त प्रजापतियों का मुखिया बना दिया तो दक्ष गर्व से फूल उठा।
"
इष्टा स वाजपेयेन ब्रह्नमिष्ठानभिभूय च ।
बृहस्पतिसवं नाम समारेभे क्रतूत्तमम् ॥
३॥
इष्ठा--सम्पन्न करके; सः--वह ( दक्ष ); वाजपेयेन--वाजपेय यज्ञ से; ब्रह्मिप्ठानू--शिव तथा उनके अनुयायियों को;अभिभूय--उपेक्षा करके; च--तथा; बृहस्पति-सवम्-- बृहस्पति-सव; नाम--नामक; समारेभे-- प्रारम्भ किया; क्रतु-उत्तमम्ू--यज्ञों में श्रेष्ठ |
दक्ष ने वाजपेय नामक यज्ञ प्रारम्भ किया और उसे अत्यधिक विश्वास था कि ब्रह्माजी कासमर्थन तो प्राप्त होगा ही।
तब उसने एक अन्य महान् यज्ञ किया जिसे बृहस्पति-सव कहते हैं।
"
तस्मिन्ब्रह्मर्षय: सर्वे देवर्षिपितृदेवता: ।
आसन्कृतस्वस्त्ययनास्तत्पल्यश्च सभर्तृकाः ॥
४॥
तस्मिन्ू--उस ( यज्ञ ) में; ब्रहय-ऋषय: --ब्रह्मर्षि गण; सर्वे--समस्त; देवर्षि--देवर्षिगण; पितृ--पूर्वज, पितरगण; देवता: --देवता; आसनू-- थे; कृत-स्वस्ति-अयना: --आभूषणों से अच्छी प्रकार से अलंकृत किया गया; तत्ू-पत्य:--उनकी पत्नियाँ;च--तथा; स-भर्तृका:ः--अपने-अपने पतियों सहित ।
जब यज्ञ सम्पन्न हो रहा था ब्रह्माण्ड के विभिन्न भागों से अनेक ब्रह्मर्षि, मुनि, पितृकुल केदेवता तथा अन्य देवता, आभूषणों से अलंकृत अपनी-अपनी पत्नियों सहित उसमें सम्मिलितहुए।
"
तदुपश्रुत्य नभसि खेचराणां प्रजल्पताम् ।
सती दाक्षायणी देवी पितृयज्ञमहोत्सवम् ॥
५॥
ब्रजन्ती: सर्वतो दिग्भ्य उपदेववरस्त्रिय: ।
विमानयाना: सप्रेष्ठा निष्ककण्ठी: सुवासस: ॥
६॥
इष्ठा स्वनिलयाभ्याशे लोलाश्षीर्मुष्टकुण्डला: ।
पतिं भूतपतिं देवमौत्सुक्यादभ्यभाषत ॥
७॥
तत्--तब; उपश्रुत्य--सुनकर; नभसि--आकाश में; खे-चराणाम्--आकाश मार्ग से जाने वाले ( गन्धर्व ); प्रजल्पताम्--संलाप; सती--सती; दाक्षायणी--दक्ष की पुत्री; देवी--शिव की पत्नी; पितृ-यज्ञ-महा-उत्सवम्--अपने पिता द्वारा सम्पन्नकिया जाने वाला महान् यज्ञ; ब्रजन्ती: --जा रहे थे; सर्वतः--सभी; दिग्भ्य:--दिशाओं से; उपदेव-वर-स्त्रियः --देवताओं कीसुन्दर स्त्रियाँ; विमान-याना:--अपने-अपने विमानों में उड़ती हुई; स-प्रेष्ठाः--अपने-अपने पतियों के संग; निष्क-कण्ठी:--लाकेट से युक्त सुन्दर हार पहने; सु-वासस:--सुन्दर वस्त्रों से आभूषित; हृष्टा--देखकर; स्व-निलय-अभ्याशे -- अपने घर केनिकट; लोल-अक्षी: --चंचल नेत्रोंवाली; मृष्ट-कुण्डला: --सुन्दर कान के आभूषण; पतिम्--अपने पति; भूत-पतिम्-- भूतों केस्वामी; देवम्--देवता; औत्सुक्यात्--उत्सुकता से; अभ्यभाषत--वह बोली |
दक्ष कन्या साध्वी सती ने आकाश मार्ग से जाते हुए स्वर्ग के निवासियों को परस्पर बातें करते हुए सुना कि उसके पिताद्वारा महान् यज्ञ सम्पन्न कराया जा रहा हैं।
जब उसने देखा किसभी दिशाओं से स्वर्ग के निवासियों की सुन्दर पत्लियाँ, जिनके नेत्र अत्यन्त सुन्दरता से चमकरहे थे, उसके घर के समीप से होकर सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित होकर तथा कानों में कुण्डल एवंगले में लाकेट युक्त हार से अलंकृत होकर जा रही हैं, तो वह अपने पति भूतनाथ के पासअत्यन्त उद्िगता-पूर्वक गई और इस प्रकार बोली।
"
सत्युवाचप्रजापतेस्ते श्वशुरस्य साम्प्रतंनिर्यापितो यज्ञमहोत्सवः किल ।
बयं च तत्राभिसराम वाम तेयद्यर्थितामी विबुधा ब्रजन्ति हि ॥
८॥
सती उवाच--सती ने कहा; प्रजापतेः--दक्ष का; ते--तुम्हारे; श्रशुरस्थ--ससुर का; साम्प्रतम्ू--इस समय; निर्यापित:--प्रारम्भकिया गया है; यज्ञ-महा-उत्सव:--महान् यज्ञ; किल--निश्चय ही; वयम्--हम; च--तथा; तत्र--वहाँ; अभिसराम--जा सकें;वाम-हे प्राणप्रिय शिव; ते--तुम्हारा; यदि--यदि; अर्थिता--इच्छा; अमी--ये; विबुधा:--देवता; ब्रजन्ति-- जा रहे हैं; हि--क्योंकि
सती ने कहा : हे प्राणप्रिय शिव, इस समय आपके श्वसुर महान् यज्ञ कर रहे हैं और सभीदेवता आमंत्रित होकर वहीं जा रहे हैं।
यदि आप कहें तो हम भी चले चलें।
"
तस्मिन्भगिन्यो मम भर्तृभिः स्वकै-भ्रुव॑ं गमिष्यन्ति सुहृद्िहक्षव: ।
अहं च तस्मिन्भवताभिकामयेसहोपनीतं परिबर्हमर्हितुम् ॥
९॥
तस्मिन्ू--उस यज्ञ में; भगिन्य:--बहनें; मम--मेरी; भर्तृभि:-- अपने-अपने पतियों सहित; स्वकै:--अपनी ओर से; श्रुवम्--निश्चय ही; गमिष्यन्ति--जाएंगी; सुहत्-दिदृक्षव:ः --अपने परिजनों से भेंट करने की इच्छुक; अहम्--मैं; च--तथा; तस्मिन्--उस उत्सव में; भवता--आपके ( शिव के ) साथ; अभिकामये--इच्छा करती हूँ; सह--साथ; उपनीतमू्--प्रदत्त; परिबर्हम्--आभूषण; अर्हितुम्ू--स्वीकार करने।
मैं सोचती हूँ कि मेरी सभी बहनें अपने सम्बन्धियों से भेंट करने की इच्छा से अपने-अपनेपतियों सहित इस महान् यज्ञ में अवश्य आयी होंगी।
मैं भी अपने पिता द्वारा प्रदत्त आभूषणों सेअपने को अलंकृत करके आपके साथ उस उत्सव में भाग लेने की इच्छुक हूँ।
"
तत्र स्वसूर्मे ननु भर्तृसम्मितामातृष्वसू: क्लिन्नधियं च मातरम् ।
द्रक्ष्ये चिरोत्कण्ठमना महर्षिभिर्उन्नीयमानं च मृडाध्वरध्वजम् ॥
१०॥
तत्र--वहाँ; स्वसू:--अपनी बहनें; मे--मेरी; ननु--निश्चय ही; भर्तु-सम्मिता:--अपने-अपने पतियों के साथ; मातृ-स्वसृ:--मौसियाँ; क्लिन्न-धियम्--स्नेहिल; च--तथा; मातरम्ू--माता को; द्रक्ष्ये--देखूँगी; चिर-उत्कण्ठ-मना:--दीर्घकाल से उत्सुक;महा-ऋषिभि: --महान् ऋषियों द्वारा; उन्नीयमानमू--उठाये हुए; च--तथा; मूृड--हे शिव; अध्वर--यज्ञ; ध्वजम्ू--झंडे
वहाँ पर मेरी बहनें, मौसियाँ तथा मौसे एवं अन्य प्रिय परिजन एकत्र होंगे; अतः यदि मैं वहाँतक जाऊँ तो उन सबों से मेरी भेंट हो जाये और साथ ही मैं उड़ती हुई ध्वजाएँ तथा ऋषियों द्वारासम्पन्न होते यज्ञ को भी देख सकूँगी।
हे प्रिय, इसी कारण से मैं जाने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।
"
त्वय्येतदाश्चर्यमजात्ममाययाविनिर्मितं भाति गुणत्रयात्मकम् ।
तथाप्यहं योषिदतत्त्वविच्च तेदीना दिदक्षे भव मे भवक्षितिम् ॥
११॥
त्वयि--तुममें; एतत्--वह; आश्चर्यम्--विस्मथघजनक; अज--हे शिव; आत्म-मायया--परमे श्वर की बहिरंगा शक्ति से;विनिर्मितम्--विरचित; भाति--प्रतीत होती है; गुण-त्रय-आत्मकम्--प्रकृति के तीनों गुणों की अन्तःक्रिया होने से; तथाअपि--तो भी; अहम्--मैं; योषित्--स्त्री; अतत्त्व-वित्--सत्य से अनजान; च--तथा; ते--तुम्हारी; दीना--गरीब, दुखिया;दिदृदक्षे--देखना चाहती हूँ; भव--हे शिव; मे--मेरी ( अपनी ); भव-क्षितिम्--जन्म भूमि |
यह दृश्य जगत त्रिगुणों की अन्तःक्रिया अथवा परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति की अदभुत सृष्टिहै।
आप इस वास्तविकता से भलीभाँति परिचित हैं।
किन्तु मैं तो अबला स्त्री हूँ और जैसा आपजानते हैं मैं सत्य से अनजान हूँ।
अतः मैं एक बार फिर से अपनी जन्मभूमि देखना चाहती हूँ।
"
पश्य प्रयान्तीरभवान्ययोषितो'प्यलड्डू ताः कान्तसखा वरूथश: ।
यासां ब्रजद्धि: शितिकण्ठ मण्डितंनभो विमान: कलहंसपाण्डुभि: ॥
१२॥
पश्य--देखो तो; प्रयान्ती:--जाती हुई; अभव--हे अजन्मा; अन्य-योषित:--अन्य स्त्रियाँ; अपि--निश्चय ही; अलड्डू ता: --सजी-धजी; कान्त-सखा: --अपने पतियों तथा मित्रों सहित; वरूथश:--झुंड की झुंड; यासाम्--जिनके; ब्रजद्धि:--उड़ते हुए;शिति-कण्ठ--हे नीलकण्ठ; मण्डितम्--सुशोभित; नभ:--आकाश; विमानै:--विमानों से; कल-हंस--हंस; पाण्डुभि:--श्वेत
हे अजमा हे नीलकण्ठ न केवल मेरे सम्बन्धी वरन् अन्य स्त्रियाँ भी अच्छे अच्छे वस्त्र पहनेऔर आभूषणों से अलंकृत होकर अपने पतियों तथा मित्रों के साथ जा रही हैं।
जरा देखो तो कि उनके श्वेत विमानों के झुण्डों ने सारा आकाश को किस प्रकार सुशोभित कर रखा है!" कथ॑ं सुताया: पितृगेहकौतुकंनिशम्य देह: सुरवर्य नेड़ते ।
अनाहुता अप्यभियन्ति सौहदंभर्तुर्गुरोदेहकृतश्च केतनम् ॥
१३॥
'कथम्--कैसे; सुताया:--पुत्री को; पितृ-गेह-कौतुकम्--पिता के घर में उत्सव; निशम्य--सुनकर; देह:--शरीर; सुर-वर्य--हेदेवों में श्रेष्ठ; न--नहीं; इड़ते--विचलित; अनाहुता:--बिना बुलाये; अपि--ही; अभियन्ति--जाता है; सौहदम्--मित्र; भर्तु:--पति के; गुरोः--गुरु के; देह-कृतः--पिता के; च--तथा; केतनम्--घर |
हे देवश्रेष्ठ, भला एक पुत्री का शरीर यह सुनकर कि उसके पिता के घर में कोई उत्सव होरहा है, विचलित हुए बिना कैसे रह सकता है? यद्यपि आप यह सोच रहे होंगे कि मुझे आमंत्रितनहीं किया गया, किन्तु अपने मित्र, पति, गुरु या पिता के घर बिना बुलाये भी जाने में कोईहानि नहीं होती।
"
तन्मे प्रसीदेदममर्त्य वाउिछतंकर्तु भवान्कारुणिको बताईति ।
त्वयात्मनोर्थेउहमदभ्रचक्षुषानिरूपिता मानुगृहाण याचितः ॥
१४॥
तत्--अतः; मे--मुझ पर; प्रसीद--कृपालु हों; इदम्--यह; अमर्त्य--हे अमर; वाउ्छितम्--इच्छा; कर्तुमू--करने की;भवान्--आप; कारुणिक: --दयालु; बत--हे स्वामी; अर्हति--समर्थ; त्वया--आपके द्वारा; आत्मन:--आपके ही शरीर के;अर्धे--आधे भाग में; अहम्--मैं; अदभ्च-चक्षुषा--सभी ज्ञान से युक्त; निरूपिता--स्थित; मा--मुझको; अनुगृहाण -- अनुग्रहीतकरें; याचितः --प्रार्थित |
हे अमर शिव, कृपया मुझ पर दयालु हों और मेरी इच्छा पूरी करें।
आपने मुझे अद्धांगिनी केरूप में स्वीकार किया है, अतः मुझ पर दया करके मेरी प्रार्थना स्वीकार करें।
"
ऋषिरुवाचएवं गिरित्र: प्रिययाभिभाषितःप्रत्यभ्यधत्त प्रहसन्सुहृत्प्रियः ।
संस्मारितो मर्मभिदः कुवागिषून्यानाह को विश्वसूजां समक्षत: ॥
१५॥
ऋषि: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; एवम्--इस प्रकार; गिरित्र:-- भगवान् शिव ने; प्रियया-- अपनी प्रिया द्वारा;अभिभाषितः--कहे जाने पर; प्रत्यभ्यधत्त--उत्तर दिया; प्रहसन्--हँसते हुए; सुहृत्-प्रियः--परिजनों के प्रिय; संस्मारित:--स्मरण करते हुए; मर्म-भिद:ः--मर्म भेदी, हृदय में चुभने वाले; कुवाक्-इषून्ू--द्वेषपूर्ण शब्द; यान्--जो ( शब्द )आह--कहा;कः--कौन ( दक्ष ); विश्व-सृजाम्--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टाओं की; समक्षतः--उपस्थिति में |
मैत्रेय महर्षि ने कहा : इस प्रकार अपनी प्रियतमा द्वारा सम्बोधित किये जाने पर कैलाशपर्वत के उद्धारक शिव ने हँसते हुए उत्तर दिया यद्यपि उसी समय उन्हें विश्व के समस्त प्रजापतियोंके समक्ष दक्ष द्वारा कहे गये द्वेषपूर्ण मर्मभेदी शब्द स्मरण हो आये।
"
श्रीभगवानुवाचत्वयोदितं शोभनमेव शोभनेअनाहुता अप्यभियन्ति बन्धुषु ।
ते यद्यनुत्पादितदोषदृष्टयोबलीयसानात्म्यमदेन मन्युना ॥
१६॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; त्वया--तुम्हारे द्वारा; उदितम्ू--कहा; शोभनम्--सही है; एव--निश्चय ही; शोभने--मेरी सुन्दर पतली; अनाहुता:--बिना बुलाये; अपि--ही; अभियन्ति--जाते हैं; बन्धुषु--मित्रों के बीच; ते--वे ( मित्र ); यदि--यदि; अनुत्पादित-दोष-दृष्टय:--दोष न निकालकर; बलीयसा--अधिक महत्त्वपूर्ण; अनात्म्य-मदेन--देह से उत्पन्न अभिमान से;मन्युना--क्रोध से।
प्रभु ने उत्तर दिया : हे सुन्दरी, तुमने कहा कि अपने मित्र के घर बिना बुलाये जाया जासकता है।
यह सच है, किन्तु तब जब वह देहात्मबोध के कारण अतिथि में दोष न निकाले और उस पर क्रुद्ध न हो।
"
विद्यातपोवित्तवपुर्वयःकुलैःसतां गुणै: षड्भरसत्तमेतरै: ।
स्मृतौ हतायां भृतमानदुर्दशःस्तब्धा न पश्यन्ति हि धाम भूयसाम् ॥
१७॥
विद्या--शिक्षा; तप:--तपस्या; वित्त--सम्पत्ति; वपु:--शरीर की सुन्दरता इत्यादि; वबः--यौवन; कुलैः--कुल से; सताम्ू--पवित्र लोगों का; गुणैः--ऐसे गुणों के कारण; षड्भिः--छह; असत्तम-इतरैः--जो महान्-आत्मा नहीं हैं उनके विपरीतआचरण वाले; स्मृतौ--अच्छा भाव; हतायाम्--खोया हुआ; भृत-मान-दुर्दश: --गर्व से अन्धा; स्तब्धा:--घमंडी होकर; न--नहीं; पश्यन्ति--देखते हैं; हि--क्योंकि; धाम--यश; भूयसाम्--महान् आत्माओं का।
यद्यपि शिक्षा, तप, धन, सौन्दर्य, यौवन और कुलीनता--ये छह गुण अत्यन्त उच्च होते हैं,किन्तु जो इनको प्राप्त करके मदान्ध हो जाता है और इस प्रकार वह सदज्ञान खो बैठता है, वहमहापुरुषों के महिमा को स्वीकार नहीं कर पाता।
"
नैताइशानां स्वजनव्यपेक्षयागृहान्प्रतीयादनवस्थितात्मनाम् ।
येभ्यागतान्वक्रधियाभिचक्षतेआरोपितशभ्रूभिरमर्षणाक्षिभि: ॥
१८॥
न--नहीं; एताहशानाम्--इस प्रकार; स्व-जन--सम्बन्धी के; व्यपेक्षया--उस पर निर्भर रह कर; गृहान्--घर में; प्रतीयात्--जाना चाहिए; अनवस्थित--विचलित; आत्मनाम्--मन; ये--जो; अभ्यागतान्ू--अतिथि; वक़-धिया--अनादर से;अभिचक्षते--देखते हुए; आरोपित-भ्रूभि:--उठी हुई भूकुटियों से; अमर्षण--क्रुद्ध; अक्षिभि:--आँखों से |
मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसी स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति के घर न जाये, भले ही वहउसका सम्बन्धी या मित्र ही क्यों न हो, जब वह मन से श्लुब्ध हो और अतिथि को तनी हुईं भूकुटियों एवं क्रुद्ध नेत्रों से देख रहा हो।
"
तथारिभिर्न व्यथते शिलीमुखै:ःशेतेडर्दिताड़ो हृदयेन दूयता ।
स्वानां यथा वक्रधियां दुरुक्तिभिर्दिवानिशं तप्यति मर्मताडित: ॥
१९॥
तथा-- अतः; अरिभि:--शत्रु के द्वारा; न--नहीं; व्यथते--आहत; शिलीमुखै:--वाणों द्वारा; शेते--लेटता है; अर्दित--दुखित;अड्ड--अंग, कोई भाग; हृदयेन--हृदय से; दूयता--कष्ट पहुँचाता हुआ; स्वानाम्--स्वजनों का; यथा--जिस प्रकार; वक्र-धियाम्ू--कुटिल बुद्द्धि, छली; दुरुक्तिभिः--कटु वचनों से; दिवा-निशम्--अहर्निश, दिन-रात; तप्यति--बेचैन रहता है; मर्म-ताडित:--जिसकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है मर्माहत
शिवजी ने कहा : यदि कोई शत्रु के बाणों से आहत हो तो उसे उतनी व्यथा नहीं होतीजितनी कि स्वजनों के कटु बचनों से होती है क्योंकि यह पीड़ा रात-दिन हृदय में चुभती रहतीहै।
"
व्यक्त त्वमुत्कृष्टगते: प्रजापतेःप्रियात्मजानामसि सुभ्रु मे मता ।
तथापि मान न पितु: प्रपत्स्यसेमदाश्रयात्क: परितप्यते यतः ॥
२०॥
व्यक्तम्ू-स्पष्ट है; त्वम्--तुम; उत्कृष्ट-गतेः--उत्तम आचरण वाली; प्रजापतेः--प्रजापति दक्ष की; प्रिया--अत्यन्त प्रिय;आत्मजानाम्--पुत्रियों में; असि--हो; सुभ्रु--हे सुन्दर भौंहों वाली; मे--मेरा; मता--विचार कर; तथा अपि--फिर भी;मानम्--सम्मान; न--नहीं; पितुः--अपने पिता से; प्रपत्स्यसे--प्राप्त करोगी; मत्-आश्रयात्-- मुझसे सम्बन्धित होने से; क:ः--दक्ष; परितप्यते--पीड़ा का अनुभव करता है; यतः--जिससे |
हे शुभ्रांगिनी प्रिये, यह स्पष्ट है कि तुम दक्ष को अपनी पुत्रियों में सबसे अधिक प्यारी हो, तोभी तुम उसके घर में सम्मानित नहीं होगी, क्योंकि तुम मेरी पत्नी हो।
उल्टे तुम्हें ही दुख होगा कितुम मुझसे सम्बन्धित हो।
"
पापच्यमानेन हृदातुरेन्द्रियःसमृद्ध्धिभिः पूरुषबुद्धिसाक्षिणाम् ।
अकल्प एषामधिरोढुमझसापरं पद द्वेष्टि यथासुरा हरिम्ू ॥
२१॥
पापच्यमानेन--जलते हुए; हृदा--हृदय में; आतुर-इन्द्रियः--संकट ग्रस्त; समृद्द्धिभि:--पतवित्र ख्याति इत्यादि से; पूरुष-बुद्धि-साक्षिणामू-परमे श्वर के ध्यान में सदैव लीन रहने वालों का; अकल्प: --असमर्थ होकर; एषाम्--उन पुरुषों का; अधिरोढुम्--उठने के लिए; अज्ञसा--शीघ्र; परमू--केवल; पदम्--स्तर तक; द्वेष्टि--द्वेष रखता है, कुढ़ता रहता है; यथा--जितना कि;असुरा:--असुरगण; हरिम्-- श्री भगवान् से |
जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित होकर सदैव मन से तथा इन्द्रियों से संतापित रहता है, वह स्वरूप-सिद्ध पुरुषों के ऐश्वर्य को सहन नहीं कर पाता।
आत्म-साक्षात्कार के पद तक उठने मेंअक्षम होने से वह ऐसे पुरुषों से उसी प्रकार से ईर्ष्या करता है, जिस प्रकार असुर श्रीभगवान् सेईर्ष्या करते हैं।
"
प्रत्युद्गमप्र भ्रयणाभिवादनंविधीयते साधु मिथ: सुमध्यमे ।
प्राज्रेः परस्मै पुरुषाय चेतसागुहाशयायैव न देहमानिने ॥
२२॥
प्रत्युदूगम-- अपने आसन पर खड़े होना; प्रश्रगण --स्वागत करना; अभिवादनम्--नमस्कार; विधीयते--किये जाते हैं; साधु --उचित; मिथ:--पारस्परिक ; सु-मध्यमे--हे मेरी प्रिये; प्राज्ैः--बुद्ध्धिमान द्वारा; परस्मै--परमे श्वर को; पुरुषाय--परमात्मा को;चेतसा--बुद्धि से; गुहा-शयाय--शरीर के भीतर बैठकर; एव--निश्चय ही; न--नहीं; देह-मानिने--देह रूप पुरुष को ।
हे तरुणी भार्ये, निस्सन्देह, मित्र तथा स्वजन खड़े होकर एक दूसरे का स्वागत औरनमस्कार करके परस्पर अभिवादन करते हैं।
किन्तु जो दिव्य पद पर ऊपर उठ चुके हैं, वे प्रबुद्धहोने के कारण ऐसा सम्मान प्रत्येक शरीर में वास करने वाले परमात्मा का ही करते हैं,देहाभिमानी पुरुष का नहीं।
"
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितंयदीयते तत्र पुमानपावृतः ।
सत्त्वे च तस्मिन्भगवान्वासुदेवोह्ाधोक्षजो मे नमसा विधीयते ॥
२३॥
सत्त्वम्-चेतना; विशुद्धम््-शुद्ध; वसुदेव--वसुदेव; शब्दितम्--नाम से विख्यात; यत्--क्योंकि; ईयते--प्रकट होता है;तत्र--वहाँ; पुमानू--परम पुरुष; अपावृत:--किसी आवरण के बिना; सत्त्वे--चेतना में; च--तथा; तस्मिन्ू--उसमें;भगवान्-- भगवान्; वासुदेव:--वासुदेव; हि-- क्योंकि; अधोक्षज: --दिव्य; मे--मेरे द्वारा; नमसा--नमस्कार से; विधीयते--पूजित।
मैं शुद्ध कृष्णचेतना में भगवान् वासुदेव को सदैव नमस्कार करता रहता हूँ।
कृष्णभावनामृतही सदैव शुद्ध चेतना है, जिसमें वासुदेव नाम से अभिहित श्रीभगवान् का बिना किसी प्रकार कादुराव का अनुभव होता है।
"
तत्ते निरीक्ष्यो न पितापि देहकृद्दक्षो मम द्विट्तदनुव्रताश्व ये ।
यो विश्वसृग्यज्ञगतं वरोरु मा-मनागसं दुर्वचचसाकरोत्तिर: ॥
२४॥
तत्--अतः; ते--तुम्हारा; निरीक्ष्य:--देखने जाने के लिए; न--नहीं; पिता--तुम्हारा पिता; अपि--यद्यपि; देह-कृत्--तुम्हारेशरीर का दाता; दक्ष:--दक्ष; मम--मेरा; द्विट्ू--ईर्ष्यालु; तत्-अनुव्रता: --उसके ( दक्ष के ) अनुयायी; च-- भी; ये--जो;यः--जो ( दक्ष ); विश्व-सुक्ू--विश्वस्कों के; यज्ञ-गतम्--यज्ञ में उपस्थित होने से; वर-ऊरू--हे सती; माम्ू--मुझको;अनागसमू--निर्दोष होने से; दुर्वचसा--कटुवचनों से; अकरोत् तिर:-- अपमान किया है
अतः तुम्हें अपने पिता को, यद्यपि वह तुम्हारे शरीर का दाता है, मिलने नहीं जाना चाहिएक् योंकि वह और उसके अनुयायी मुझसे ईर्ष्या करते हैं।
हे परम पूज्या, इसी ईर्ष्या के कारण मेरेनिर्दोष होते हुए भी उसने अत्यन्त कटु शब्दों से मेरा अपमान किया है।
"
यदि ब्रजिष्यस्यतिहाय मद्बचोभद्रं भवत्या न ततो भविष्यति ।
सम्भावितस्य स्वजनात्पराभवोयदा स सद्यो मरणाय कल्पते ॥
२५॥
यदि--यदि; ब्रजिष्यसि--तुम जाओगी; अतिहाय--उपेक्षा करके; मत्-वच:--मेरे वचन; भद्रमू--कल्याण; भवत्या: --तुम्हारा; न--नहीं; ततः--तब; भविष्यति--होगा; सम्भावितस्य--अत्यन्त सम्माननीय; स्वजनात्-- अपने सम्बन्धियों द्वारा;पराभव:ः--अपमानित होते हैं; यदा--जब; सः--वह अपमान; सद्य:--तुरन््त; मरणाय-- मृत्यु के; कल्पते--तुल्य है
यदि इस शिक्षा के बावजूद मेरे बचनों की उपेक्षा करके तुम जाने का निश्चय करती हो तोतुम्हारे लिए भविष्य अच्छा नहीं होगा।
तुम अत्यन्त सम्माननीय हो और जब तुम स्वजन द्वाराअपमानित होगी तो यह अपमान तुरन्त ही मृत्यु के तुल्य हो जाएगा।
"
