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अध्याय उनतीसवां: नारद और राजा प्राचीनबरही के बीच बातचीत

4.29प्राच्चीनबर्हिरुवाचभगवंस्ते वचोस्माभिर्न सम्यगवगम्यते ।

कवयस्तद्विजानन्ति न बयं॑ कर्ममोहिता: ॥

१॥

प्राचीनबर्हि: उवाच--राजा प्राचीनबर्हि ने कहा; भगवन्‌--हे स्वामी; ते--तुम्हारे; वच:--शब्द; अस्माभि:--हमारे द्वारा; न--कभी नहीं; सम्यक्‌--पूर्णतया; अवगम्यते--समझे जाते हैं; कवयः--पटु लोग; तत्‌--वह; विजानन्ति--समझ सकते हैं; न--कभी नहीं; वयम्‌--हम; कर्म--कर्मो द्वारा; मोहिता:--मोहित |

राजा प्राचीनबर्हि ने उत्तर दिया : हे प्रभु, हम आपके कहे गये राजा पुरक्षन के रूपकआख्वयान ( अन्योक्ति ) का सारांश पूर्ण रूप से नहीं समझ सके।

वास्तव में जो आध्यात्मिक ज्ञानमें निपुण हैं, वे तो समझ सकते हैं, किन्तु हम जैसे सकाम कर्मो में अत्यधिक लिप्त पुरुषों केलिए आपके आख्यान का तात्पर्य समझ पाना अत्यन्त कठिन है।

"

नारद उबाचपुरुष पुरञ्जनं विद्याद्यद्व्यनक्त्यात्मनः पुरम्‌ ।

एकद्रित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम्‌ ॥

२॥

नारद: उवाच--नारद ने कहा; पुरुषम्‌ू--जीव, भोक्ता को; पुरक्षनमम्‌-राजा पुरञ्ञन; विद्यात्‌--जानना चाहिए; यत्‌--जिससे;व्यनक्ति--उत्पन्न करता है; आत्मन:--स्वयं का; पुरमू--वासस्थान; एक--एक; द्वि--दो; त्रि-- तीन; चतुः-पादम्‌--चार पैरोंवाला, चौपाया; बहु-पादम्‌-- अनेक पैरों वाला; अपादकम्‌--पाँवहीन ।

नारद मुनि ने कहा : तुम जानो कि पुरञ्जन रूपी जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न रूपों मेंदेहान्तर करता रहता है, जो एक, दो, तीन, चार या अनेक पाँव वाले या पाँवविहीन हो सकते हैं।

इन विभिन्न प्रकार के रूपों में देहान्तर करने वाला जीव तथाकथित भोक्ता के रूप में पुरक्षनकहा जाता है।

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योउविज्ञाताहतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वर: ।

यन्न विज्ञायते पुम्भि्नामभिर्वा क्रियागुणै: ॥

३॥

यः--जो; अविज्ञात--अज्ञात; आहत: --वर्णित; तस्थ--उस; पुरुषस्य--जीव का; सखा--चिर मित्र; ईश्वर: -- स्वामी; यत्‌--क्योंकि; न--कभी नहीं; विज्ञायते--जाना जाता है; पुम्भि:--जीवों द्वारा; नामभि:--नामों से; वा-- अथवा; क्रिया-गुणैः--कर्मो या गुणों द्वारा |

जिस पुरुष को मैंने अविज्ञात कहा है, वह जीव का स्वामी तथा शाश्वत मित्र परमेश्वर है।

चूँकि जीव भगवान्‌ को भौतिक नामों, गुणों या कर्मों द्वारा नहीं जान सकते, फलतः वहबद्धजीव के लिए सदैव अज्ञात रहता है।

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यदा जिघृश्षन्पुरुष: कार्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान्‌ ।

नदद्वारं द्विहस्ताडुप्रि तत्रामनुत साध्विति ॥

४॥

यदा--जब; जिधृक्षन्‌-- भोगने की इच्छा से; पुरुष: --जीव; कार्त्स्येन--समग्र रूप में; प्रकृतेः--प्रकृति का; गुणान्‌ू--गुण;नव-द्वारम्‌--नौ द्वारों वाला; द्वि--दो; हस्त--हाथ; अद्भध्रि-- पाँव; तत्र--वहाँ; अमनुत--उसने सोचा; साधु--उत्तम; इति--इस प्रकार।

जब जीव समग्ररूप से प्रकृति के गुणों का भोग करने की इच्छा करता है, तो वह अनेकशारीरिक रूपों में से उस शरीर को चुनता है, जिसमें नौ द्वार, दो हाथ तथा दो पाँव होते हैं।

इसप्रकार वह मनुष्य या देवता बनना श्रेयस्कर मानता है।

"

बुद्धि तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम्‌ ।

यामधिष्ठाय देहेउस्मिन्पुमान्भुड़े क्षभिर्गुणान्‌ ॥

५॥

बुद्धिम्‌-बुद्धि; तु--तब; प्रमदाम्‌--तरुणी स्त्री ( पुरझ्ननी ) को; विद्यात्‌--जानना चाहिए; मम--मेरा; अहम्‌--मैं; इति--इसप्रकार; यत्‌-कृतम्‌--बुद्धि द्वारा सम्पन्न; याम्‌--जो बुद्धि; अधिष्ठाय--शरण ग्रहण करके; देहे--शरीर में; अस्मिन्‌--इस;पुमान्‌ू--जीव; भुड्ढे --भोगता है ( कष्ट उठाता तथा सुख पाता है ); अक्षभि:--इन्द्रियों से; गुणान्‌ू--प्रकृति के तीन गुण।

नारद मुनि ने आगे कहा : इस प्रसंग में उल्लिखित प्रमदा शब्द भौतिक बुद्धि या अविद्या केलिए प्रयुक्त है।

इसे इसी रूप में समझो।

जब मनुष्य ऐसी बुद्धि का आश्रय ग्रहण करता है, तोवह अपने को शरीर समझ बैठता है।

'मैं' तथा 'मेरी ' की भौतिक बुद्धि से प्रभावित होकर वह अपनी इन्द्रियों से दुख तथा सुख का अनुभव करने लगता है।

इस प्रकार जीव बन्धन में पड़जाता है।

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सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम्‌ ।

सख्यस्तद्ुत्तय: प्राण: पञ्जञवृत्तियथोरग: ॥

६॥

सखाय:--मित्र; इन्द्रिय-गणा:--सारी इन्द्रियाँ; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; कर्म--कार्य; च-- भी; यत्‌-कृतम्‌--इन्द्रियों द्वारा किया हुआ;सख्य:--सखियाँ; तत्‌--इन्द्रियों की; वृत्तय:--व्यापार; प्राण:--प्राणवायु; पदञ्ञ-वृत्तिः--पाँच प्रकार की वृत्तियों वाला;यथा--जिस प्रकार; उरग:--सर्प |

पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँचों कर्मेन्द्रियाँ पुरश्ननी के नर मित्र हैं।

जीव को इन इन्द्रियों द्वाराज्ञान प्राप्त करने तथा कार्य में प्रवृत्त होने में सहायता मिलती है।

इन्द्रियों के व्यापार उसकीसखियाँ हैं और वह सर्प जिसे पाँच फनों वाला बताया गया है, पाँच प्रकार की क्रियाओं केभीतर कार्यशील प्राणवायु है।

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बृहद्वलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम्‌ ।

पशञ्ञाला: पञ्ञ विषया यन्मध्ये नवर्ख पुरम्‌ ॥

७॥

बृहत्‌-बलम्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; मन:--मन; विद्यात्‌--जानना चाहिए; उभय-इन्द्रिय--ज्ञान तथा कर्म दोनों प्रकार कीइन्द्रियाँ; नायकम्‌--नेता; पञ्ञाला:--पञ्ञाल नामक राज्य; पञ्ञन--पाँच; विषया: --इन्द्रिय पदार्थ; यत्‌--जिसके ; मध्ये--बीचमें; नव-खम्‌--नव छिद्रों वाली; पुरम्‌--नगरीग्यारहवाँ सेवक, जो अन्यों का नायक है, मन कहलाता है।

वह कर्मेन्द्रियों तथाज्ञानेन्द्रियों--इन दोनों का नायक है।

पञ्ञाल राज्य वह वातावरण है, जिसमें पाँच इन्द्रिय-पदार्थों( विषयों ) का भोग किया जाता है।

इस पञ्ञाल राज्य के भीतर शरीर रूपी नगरी है, जिसमें नौद्वार ( छिद्र ) हैं।

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अक्षिणी नासिके कर्णों मुखं शिश्नगुदाविति ।

द्वे द्वे द्वारा बहिरयाति यस्तदिन्द्रियसंयुत: ॥

८ ॥

अक्षिणी--दो आँखें; नासिके--दो नथुने; कर्णौ--दो कान; मुखम्‌--मुँह; शिश्न--लिंग; गुदौ--तथा मलद्वार; इति--इसप्रकार; द्वे--दो; द्वे-- दो; द्वारौ--द्वार; बहिः--बाहर; याति--जाता है; यः--जो; तत्‌--द्वारों से होकर; इन्द्रिय--इन्द्रियों केद्वारा; संयुत:--साथ-साथ |

आँखें, नथुने तथा कान--इन द्वारों की जोड़ियाँ एक स्थान पर स्थित हैं।

मुँह, शिश्न तथागुदा भी अन्य द्वार हैं।

इन नौ द्वारों वाले शरीर में स्थित होकर जीव बाह्य तटः भौतिक जगत मेंकार्य करता है और रूप तथा स्वाद जैसे इन्द्रियविषयों का भोग करता है।

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अक्षिणी नासिके आस्यमिति पदञ्ञ पुरः कृताःदक्षिणा दक्षिण: कर्ण उत्तरा चोत्तर: स्मृत: ।

पश्चिमे इत्यधो द्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते ॥

९॥

अक्षिणी--दो नेत्र; नासिके --दो नथुने; आस्यम्‌--मुँह; इति--इस प्रकार; पञ्ञ--पाँच; पुरः:--सामने; कृता:--निर्मित;दक्षिणा--दक्षिणी द्वार; दक्षिण: --दाहिना; कर्ण: --कान; उत्तरा--उत्तरी द्वार; च-- भी; उत्तरः--बायाँ कान; स्मृत:--जानाहुआ; पश्चिमे--पश्चिम दिशा में; इति--इस प्रकार; अध:--नीचे; द्वारौ--दो द्वार; गुदम्‌--मलद्वार; शिश्नमू--लिंग ( पुरुष कीइन्द्रिय ); इह--यहाँ; उच्यते--कहा जाता है।

दो आँखें, दो नथुने तथा मुँह ये पाँचों सामने स्थित हैं।

दाहिना कान दक्षिणी द्वार है औरबायाँ कान उत्तरी द्वार।

पश्चिम की ओर स्थित दो छिद्र या द्वार गुदा तथा शिश्न कहलाते हैं।

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खटद्योताविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते ।

रूप॑ विध्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः ॥

१०॥

खटद्योता--खद्योत नामक; आविर्मुखी--आविर्मुखी नामक; च-- भी; अत्र--यहाँ; नेत्रे--दो आँखें; एकत्र--एक स्थान पर;निर्मिते--निर्मित; रूपमू--रूप; विभ्राजितम्‌-विश्राजित ( चमकीला ) नामक; ताभ्याम्‌--आखों से होकर; विचष्टे -- देखते हैं;चश्लुषा--नेत्रों से; ईश्वर: --स्वामी |

खटद्योत तथा आविर्मुखी नाम से जिन दो द्वारों का वर्णन किया गया है वे एक ही स्थान परअगल-बगल स्थित दो नेत्र हैं।

विध्राजित नामक नगरी को रूप समझना चाहिए।

इस प्रकारदोनों नेत्र सदैव विभिन्न प्रकार के रूपों को देखने में व्यस्त रहते हैं।

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नलिनी नालिनी नासे गन्ध: सौरभ उच्यते ।

घ्राणोवधूतो मुख्यास्यं विषणो वाग्रसविद्रसः ॥

११॥

नलिनी--नलिनी नामक; नालिनी--नालिनी नामक; नासे--दोनों नथुने; गन्ध: --सुगन्धित; सौरभ:--सौरभ ( सुगन्ध );उच्यते--कहलाता है; प्राण: --गंध की इन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय; अवधूत:--अवधूत नामक; मुख्या--मुख्या नामक( प्रमुख );आस्यम्‌-- मुँह; विषण:--विपण नामक; वाक्‌--वाणी; रस-वित्‌--रसज्ञ, स्वाद लेने में पटु; रसः--स्वाद की इन्द्रिय(जीभ )

नलिनी तथा नालिनी नामक दोनों द्वार दो नासाछिद्र ( नथुने ) हैं और सुगन्‍्ध को सौरभनामक नगरी ही कहा गया है।

अवधूत नामक मित्र प्राणेन्द्रिय है।

मुख्या नामक द्वार मुख है औरविपण वावशक्ति है।

रसज्ञ ही स्वाद की इन्द्रिय ( जीभ ) है।

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आपणो व्यवहारोत्र चित्रमन्धो बहूदनम्‌ ।

पितृहूर्दक्षिण: कर्ण उत्तरो देवहू: स्मृत: ॥

१२॥

आपणः:--आपण नामक; व्यवहार:--जीभ का कार्य; अत्र--यहाँ; चित्रमू--सभी प्रकार के; अन्ध:--खाद्य; बहूदनम्‌--बहूदन नामक; पितृ-हू: --पितृहू नामक; दक्षिण:--दाहिना; कर्ण: --कान; उत्तर: --बायाँ; देव-हू:--देवहू; स्मृतः--कहलाताहै

आपण नामक नगरी जीभ के बोलने के कार्य की सूचक है और बहूदन तरह-तरह केव्यंजनों का सूचक है।

दायाँ कान पितृहू द्वार कहलाता है और बायाँ कान देवहू द्वार।

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प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्र पञ्ञालसंज्ञितम्‌ ।

पितृयानं देवयान श्रोत्राच्छुतधरादव्जेत्‌ ॥

१३॥

प्रवृत्तमू--इन्द्रिय भोग की विधि; च--भी; निवृत्तम्‌--विरक्ति की विधि; च-- भी; शास्त्रमू-शास्त्र; पञ्ञाल--पंचाल;संज्ञितमू--के नाम से अभिहित, नामक; पितृ-यानम्‌--पितृलोक को जाते हुए; देव-यानम्‌--देवलोक को जाते हुए; श्रोत्रात्‌--सुनकर; श्रुत-धरात्‌--श्रुतधर नामक संगी से; ब्रजेत्‌ू--ऊपर उठाया जा सकता है।

नारद मुनि ने आगे कहा : दक्षिण पञ्ञनाल कही जाने वाली नगरी सकाम कर्म में भोग कीविधि अर्थात्‌ प्रवृत्ति-मार्ग को बताने वाले शास्त्रों की सूचक है।

उत्तर पञ्ञाल नामक अन्य नगरीनिवृत्ति मार्ग--सकाम कर्म को घटाने तथा ज्ञान को बढ़ाने वाला मार्ग--बताने वाले शास्त्रों केलिए प्रयुक्त है।

जीव को ज्ञान की प्राप्ति दो कानों द्वारा होती है और कुछ लोग पितृलोक तथाकुछ देवलोक को जाते हैं।

यह सब दोनों कानों द्वारा सम्भव होता है।

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आसूुरी मेढ़मर्वाद्धार्व्यवायो ग्रामिणां रति: ।

उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निरतिर्गुद उच्यते ॥

१४॥

आसुरी--आसुरी नामक; मेढ़म्‌--शिश्न ( लिंग ); अर्वाकु-मूर्खो तथा उचक्कों का; द्वा:--द्वार; व्यवाय:--स्त्री-प्रसंग करने केलिए; ग्रामिणाम्‌--सामान्य पुरुषों की; रतिः--आसक्ति; उपस्थ:--प्रजननेन्द्रिय; दुर्मद:--दुर्मद ; प्रोक्त:--कहलाती है;निरृतिः--निरऋति; गुदः--गुदा; उच्चते--कहलाती है।

ग्रामक नामक पुरी, जहाँ निचले आसुरी द्वार ( शिश्न ) से पहुँचा जाता है, स्त्री-संभोग केलिए है जो उन सामान्य पुरुषों के लिए अत्यन्त मोहक है जो निरे मूर्ख एवं धूर्त हैं।

जननेन्द्रियदुर्मद कहलाती है और गुदा निर्क्रति कहलाती है।

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वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोन्धौ तु मे श्रुणु ।

हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥

१५॥

वैशसम्‌--वैशस नामक; नरकम्‌--नरक; पायु:--गुदा नामक कर्मेन्द्रिय; लुब्धकः:--लुब्धक ( अत्यन्त लालची ) नामक;अन्धौ--अन्धा; तु--तब; मे--मुझसे; श्रुणु--सुनो; हस्त-पादौ--हाथ तथा पाँव; पुमान्‌ू--जीव; ताभ्याम्‌ू--उनके साथ;युक्त:--लगा हुआ; याति--जाता है; करोति--करता है; च--तथा |

जब यह कहा जाता है कि पुरञ्नन वैशस जाता है, तो उसका अर्थ है कि वह नरक जाता है।

उसके साथ लुब्धक रहता है, जो गुदा नामक कर्मेन्द्रिय है।

इसके पूर्व मैंने दो अंधे साथियों काभी उल्लेख किया था।

इन्हें हाथ तथा पाँव समझना चाहिए।

जीव हाथ तथा पाँव की सहायता सेसभी प्रकार के कार्य करता और इधर-उधर जाता है।

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अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते ।

तत्र मोहं प्रसादं वा हर्ष प्राप्योति तदगुणैः ॥

१६॥

अन्तः-पुरमू--रनिवास; च--तथा; हृदयम्‌--हृदय; विषूचि:--विषूचिन्‌ नामक दास; मन:ः--मन; उच्यते--कहलाता है; तत्र--वहाँ; मोहम्‌--मोह; प्रसादम्‌--सन्तोष; वा--अथवा; हर्षम्‌--हर्ष; प्राप्योति-- प्राप्त करता है; तत्‌ू--मन का; गुणैः-- प्रकृति केगुणों द्वारा)अन्तःपुर हृदय का सूचक है।

विषूचिन्‌ ( सर्वत्र जाते हुए ) मन को बताने वाला है।

जीव मनके भीतर प्रकृति के गुणों का भोग करता है।

ये सारे प्रभाव कभी मोह उत्पन्न करते हैं, तो कभीसन्‍्तोष तथा उललास।

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यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा ।

तथा तथोपद्रष्टात्मा तद्ुत्तीरनुकार्यते ॥

१७॥

यथा यथा--जिस जिस प्रकार; विक्रियते--विश्षुब्ध होती है; गुण-अक्त:--गुणों से लिप्त; विकरोति--जैसा करती है; वा--अथवा; तथा तथा--उसी उसी प्रकार; उपद्रष्टा--दर्शक; आत्मा--आत्मा; तत्‌--बुद्ध्धि का; वृत्ती:--व्यापार; अनुकार्यते--अनुकरण करता है।

पहले यह बताया जा चुका है कि रानी मनुष्य की बुद्धि है।

सोते समय या जागते हुए बुद्धिविभिन्न परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है।

दूषित बुद्धि के कारण जीव कुछ सोचता है और अपनीबुद्धि के कार्य-कारणों का केवल अनुकरण करता है।

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देहो रथस्त्विन्द्रियाश्चव: संवत्सररयोगति: ।

द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वज: पञ्ञासुबन्धुर: ॥

१८॥

मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हन्नीडो द्न्द्रकूबरः ।

पश्लेन्द्रियार्थप्रक्षेप: सप्तधातुवरूथकः ॥

१९॥

आकूतिर्विक्रमो बाह्मो मृगतृष्णां प्रधावति ।

एकादरशेन्द्रियचमू: पञ्ञलसूनाविनोदकृत्‌ ॥

२०॥

देह:--शरीर; रथ:--रथ; तु--लेकिन; इन्द्रिय--ज्ञानेन्द्रियाँ; अश्व:--घोड़े; संवत्सर--समग्र वर्ष; रयध:--जीवन अवधि, आयु;अगतिः--गतिहीन; द्वि--दो; कर्म--कर्म; चक्र:--पहिए; त्रि--तीन; गुण-- प्रकृति के गुण; ध्वज:--पताकाएँ; पञ्ञ-पाँच;असु--प्राण; बन्धुर:ः--बन्धन; मनः--मन; रश्मि: --र ज्जु; बुस्दवि-- बुद्धि; सूत:--रथ चलाने वाला, सारथी; हत्‌--हृदय;नीड:--बैठने का स्थान; इन्द्र--द्वैत भाव; कूबर:--जुए; पञ्ञ--पाँच; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रिय विषय; प्रक्षेप:--आयुध; सप्त--सात; धातु--तत्त्व; वरूथक:--आवरण; आकूति:--कर्मेन्द्रियों के प्रयास; विक्रम:--शौर्य; बाह्य: --बाहरी; मृग-तृष्णाम्‌--झूठी महत्त्वाकांक्षा; प्रधावति--पीछे-पीछे दौड़ता है; एकादश--ग्यारह; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; चमूः--सैनिक; पञ्ञ--पाँच;सूना--ईर्ष्या; विनोद--हर्ष, विलास; कृतू-कार्य |

नारद मुनि ने आगे कहा : जिसे मैने रथ कहा था, वह वास्तव में शरीर है।

इन्द्रियाँ ही वे घोड़ेहैं, जो रथ को खींचते हैं।

ज्यों-ज्यों वर्षानुवर्ष समय बीतता जाता है, ये घोड़े बिना किसीअवरशोेध के दौते हैं, किन्तु वास्तव में वे कोई प्रगति नहीं कर पाते।

पाप तथा पुण्य इस रथ के दोपहिए हैं।

प्रकृति के तीनों गुण इस रथ की ध्वजाएँ हैं।

पाँच प्रकार के प्राण जीव के बन्धन बनते हैं और मन को रस्सी ( रज्जु ) माना जाता है।

बुद्धि इस रथ का सारथी है।

हृदय रथ में बैठने कास्थान है और हर्ष तथा पीड़ा जैसे द्वन्द्द जुए हैं।

सातों तत्त्व ( धातुएँ) इस रथ के ओहार( आवरण ) हैं, पाँचों कर्मेन्द्रयाँ उसकी पाँच प्रकार की बाह्य गतियाँ हैं और ग्यारहों इन्द्रियाँसैनिक हैं।

इन्द्रिय-सुख में मग्न रहने के कारण रथ पर आसीन जीव झूठी अभिलाषाओं को पूराकरने के लिए इतराता है और जन्म-जन्मांतर तक इन्द्रियसुख के पीछे दौड़ता रहता है।

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संवत्सरश्रण्डवेग: कालो येनोपलक्षित:तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यों रात्रय: स्पृता: ।

हरन्त्यायु: परिक्रान्त्या पषष्ट्युत्तरशतत्रयम्‌ ॥

२१॥

संवत्सर:--वर्ष; चण्ड-वेग: --चण्डवेग नामक; काल:--समय; येन--जिससे; उपलक्षित:--सांकेतिक; तस्य--आयु का;अहानि--दिन; इह--इस जीवन में; गन्धर्वा:--गन्धर्वगण; गन्धर्व्य:--गन्धर्वियाँ; रात्रय:--रात्रियाँ; स्मृता: --जानी जाती हैं;हरन्ति--ले लेते हैं; आयु:--आयु, उप्र; परिक्रान्त्या-- भ्रमण करके; षष्टि--साठ; उत्तर--अधिक; शत--सौ; त्रयमू--तीन

जिसे पहले चण्डवेग अर्थात्‌ शक्तिशाली काल कहा गया था वह दिन तथा रात से बना हैजिनके नाम गन्धर्व और गन्धर्वी हैं।

शरीर की आयु दिन तथा रात के बीतने से क्रमशः घटतीजाती है जिनकी संख्या ३६० है।

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कालकन्या जरा साक्षाललोकस्तां नाभिनन्दति ।

स्वसारं जगूहे मृत्यु: क्षयाय यवने श्वर: ॥

२२॥

काल-कन्या--काल की पुत्री; जरा--वृद्धावस्था; साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; लोक:--समस्त जीव; तामू--उसको; न--नहीं;अभिनन्दति--स्वागत करते हैं; स्वसारम्‌ू--अपनी बहन के रूप में; जगृहे--स्वीकार किया; मृत्यु:--मृत्यु; क्षयाय--नाश केलिए; यवन-ईश्वरः--यवनों के राजा ने |

जिसे कालकन्या कहा गया है, उसे वृद्धावस्था (जरा ) समझना चाहिए।

कोई भीवृद्धावस्था नहीं स्वीकार करना चाहता, किन्तु यवनराज, जो साक्षात्‌ मृत्यु है, जरा ( वृद्धावस्था )को अपनी बहन के रूप में स्वीकार करता है।

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आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चरा: ।

भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥

२३॥

एवं बहुविधेर्दु:खैदेवभूतात्मसम्भवै: ।

क्लिश्यमान: शतं वर्ष देहे देही तमोवृतः ॥

२४॥

प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुण: ।

शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत्‌ ॥

२५॥

आधय:--मानसिक क्लेश; व्याधय:--शारीरिक क्लेश या रोग; तस्य--यवतने श्वर के; सैनिका:--सिपाही; यवना:--यवनगण;चरा:--अनुचर; भूत--जीवों के; उपसर्ग--विपत्ति के समय; आशु--तुरन्‍्त; रयः--अत्यन्त शक्तिशाली; प्रज्वार:--प्रज्वारनामक; द्वि-विध:--दो प्रकार का; ज्वरः--ज्वर; एवम्‌--इस प्रकार; बहु-विधै:--विभिन्न प्रकारों के; दुःखै:--कष्टों के द्वारा;दैव--भाग्यवश; भूत--अन्य जीवों द्वारा; आत्म--शरीर तथा मन द्वारा; सम्भवैः--उत्पन्न; क्लिएयमान:--कष्ट पाकर; शतम्‌--सौ; वर्षम्‌--वर्ष; देहे--शरीर में; देही --जीव; तम:-वृत:-- भौतिक अंधकार से आच्छादित; प्राण--जीवन का; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; मनः--मन का; धर्मानू--गुण; आत्मनि--आत्मा को; अध्यस्य-- भ्रमवश मानते हुए; निर्गुण:--यद्यपि दिव्य;शेते--लेट जाता है; काम--इन्द्रियसुख का; लवानू--खंडों पर; ध्यायन्‌-- ध्यान करते हुए; मम--मेरा; अहम्‌--मैं; इति--इसप्रकार; कर्म-कृत्‌ू-कर्ता ॥

यवनेश्वर ( यमराज ) के अनुचर मृत्यु के सैनिक कहलाते हैं, जो शरीर तथा मन सम्बन्धीविविध क्लेश माने जाते हैं।

प्रज्वार दो प्रकार के ज्वरों का सूचक है--अत्यधिक ताप तथाअत्यधिक शीत--जैसे टाइफाइड तथा निमोनिया।

शरीर के भीतर लेटा हुआ जीव विविधक्लेशों द्वारा, जो दैविक, भौतिक तथा अपने ही शरीर तथा मन से सम्बन्धित हैं, विचलित होतारहता है।

समस्त प्रकार के क्लेशों के होते हुए भी जीव इस संसार को भोगने की इच्छा सेअनेकानेक योजनाओं में बह जाता है।

निर्गुण ( दिव्य ) होकर भी जीव अपने अज्ञान के कारणअहंकारवश ( मैं तथा मेरा ) इन भौतिक कष्टों को स्वीकार करता है।

इस प्रकार वह इस शरीरके भीतर सौ वर्षो तक रहता है।

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पुरुषस्तु विषज्नेत गुणेषु प्रकृतेः स्वहक्‌ ॥

२६॥

गुणाभिमानी स तदा कर्माणि कुरुतेडवशः ।

शुक्ल कृष्णं लोहितं वा यथाकर्माभिजायते ॥

२७॥

यदा--जब; आत्मानम्‌--परमात्मा को; अविज्ञाय-- भूलकर; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌; परम्‌--परम; गुरुम्‌--उपदेशक को;पुरुष:--जीव; तु--तब; विषज्जेत--अपने को हवाले करता है; गुणेषु--गुणों के प्रति; प्रकृते:--प्रकृति के; स्व-हक्‌--अपनाकल्याण देखने वाला; गुण-अभिमानी -- प्रकृति के गुणों से अपनी पहचान करने वाला; सः--वह; तदा--उस समय;कर्माणि--कर्म; कुरुते--करता है; अवशः --तुरन्‍्त; शुक्लम्‌-- श्वेत; कृष्णम्‌--काला, श्याम; लोहितमू--लाल; वा--अथवा;यथा--के अनुसार; कर्म--कर्म; अभिजायते--जन्म लेता है

जीव की यह प्रकृति है कि उसे अपना अच्छा या बुरा भाग्य चुनने की कुछ-कुछ छूट है,किन्तु जब वह अपने परम स्वामी भगवान्‌ को भुला देता है, तो वह अपने को प्रकृति के गुणों केहवाले कर देता है।

इस तरह प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर वह अपने को शरीर मान बैठताहै।

कभी वह तमोगुण, तो कभी रजोगुण और कभी सतोगुण के अधीन होता है।

इस प्रकारजीव प्रकृति के गुणों के अधीन रह कर विभिन्न प्रकार के शरीर प्राप्त करता है।

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शुक्लात्प्रकाशभूयिष्टॉललोकानाप्नोति कर्हिचित्‌ ।

दुःखोदर्कान्क्रियायासांस्तम:शोकोत्कटान्क्वचित्‌ ॥

२८ ॥

शुक्लात्‌--सतोगुण से; प्रकाश--प्रकाश से; भूयिष्ठान्‌--गुणसम्पन्न; लोकान्‌ू--लोक; आप्नोति--प्राप्त करता है; क्हिंचित्‌--कभी-कभी; दुःख--कष्ट; उदर्कान्‌--परिणाम; क्रिया-आयासान्‌--कठिन कार्यो से पूर्ण; तम:--अंधकार; शोक--शोक में;उत्कटानू--परिपूर्ण, बहुल; क्वचित्‌--कभी-कभी ।

जो सतोगुणी हैं, वे वैदिक आदेशों के अनुसार पुण्यकर्म करते हैं और इस तरह वेउच्चलोकों को जाते हैं जहाँ देवों का निवास है।

जो रजोगुणी हैं, वे मनुष्य लोक में विभिन्नप्रकार के उत्पादक काम करते हैं।

इसी प्रकार तमोगुणी पुरुष विभिन्न प्रकार के कष्ट उठाते हैंऔर पशु जगत में वास करते हैं।

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क्वचित्पुमान्क्वचिच्च स्त्री क्वचिन्नो भयमन्धधी: ।

देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भव: ॥

२९॥

क्वचित्‌--कभी; पुमान्‌--नर; क्वचित्‌--क भी; च-- भी; स्त्री--नारी; क्वचित्‌--कभी; न--नहीं; उभयम्‌--दोनों; अन्ध--अन्धा; धी:--जिसकी बुद्धि; देव:--देवता; मनुष्य: --मनुष्य; तिर्यक्‌ू--पशु, पक्षी आदि; बा--अथवा; यथा-- अनुसार;कर्म--कर्म के; गुणम्‌--गुण; भव:--जन्म |

भौतिक प्रकृति के तमोगुण से आच्छादित होकर जीवात्मा कभी नर, कभी नारी, कभीनपुंसक, कभी मनुष्य, कभी देवता, कभी पक्षी, पशु इत्यादि बनता है।

इस प्रकार वह इसभौतिक जगत में घूमता रहता है।

वह प्रकृति के गुणों के अधीन अपने कर्मों के कारण विभिन्नप्रकार के शरीर स्वीकार करता रहता है।

"

क्षुत्परीतो यथा दीन: सारमेयो गृहं गृहम्‌ ।

चरन्विन्दति यहिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥

३०॥

तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन्‌ ।

उपर्यधो वा मध्ये वा याति दि्टं प्रियाप्रियम्‌ ॥

३१॥

क्षुत्‌ू-परीत:-- भूख से पीड़ित; यथा--जिस प्रकार; दीन:--दरिद्र; सारमेय: -- कुत्ता; गृहम्‌--एक घर से; गृहम्‌--दूसरे घर को;चरनू--घूमते हुए; विन्दति--प्राप्त करता है; यत्‌--जिसका; दिष्टम्‌--प्रारब्ध के अनुसार; दण्डम्‌--दण्ड; ओदनम्‌-- भोजन;एव--निश्चय ही; वा--अथवा; तथा--उसी तरह; काम-आशय:--विभिन्न इच्छाओं का अनुसरण करता; जीव:--जीव;उच्च--उँचा; अवच--नीचा; पथा--रास्ते पर; भ्रमनू--घूमते हुए; उपरि--ऊपर; अध:--नीचे; वा-- अथवा; मध्ये--बीच में;वा--अथवा; याति--जाता है; दिष्टमू-- भाग्य के अनुसार; प्रिय--सुखकर; अप्रियम्‌-- अच्छा न लगने वाला

यह जीव ठीक उस कुत्ते के तुल्य है, जो भूख से परेशान भोजन पाने के लिए द्वार-द्वार जाताहै।

अपने प्रारब्ध के अनुसार वह कभी दण्ड पाता है और खदेड़ दिया जाता है, अथवा कभी-कभी खाने को थोड़ा भोजन भी पा जाता है।

इसी प्रकार, जीव भी अनेकानेक इच्छाओं केवशीभूत होकर अपने भाग्य के अनुसार विभिन्न योनियों में भटकता रहता है।

कभी वह उच्चस्थान प्राप्त करता है, तो कभी निम्न स्थान।

कभी वह स्वर्ग को जाता है, कभी नरक को, तोकभी मध्य लोकों को और ऐसा चलता रहता है।

"

दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।

जीवस्य न व्यवच्छेद: स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥

३२॥

दुःखेषु--दुखों में; एकतरेण--एक से; अपि-- भी; दैव-- भाग्य; भूत-- अन्य जीव; आत्म--मन तथा शरीर; हेतुषु--केकारण; जीवस्य--जीव का; न--कभी नहीं; व्यवच्छेद:--छुटकारा; स्थात्‌--सम्भव है; चेतू--यद्यपि; तत्‌-तत्‌--उन-उन दुखोंकी; प्रतिक्रिया--विरोधी क्रिया।

सारे जीव भाग्य, अन्य जीवों अथवा मन तथा शरीर सम्बन्धी दुखों से छुटकारा पाने काप्रयास करते हैं।

तो भी इन नियमों का प्रतिकार करने के प्रयासों के बावजूद वे प्रकृति के" यथा हि पुरुषो भारं शिरसा गुरुमुद्ठहन्‌ ।

तं स्कन्धेन स आधत्ते तथा सर्वाः प्रतिक्रिया: ॥

३३॥

यथा--जिस प्रकार; हि--निश्चय ही; पुरुष:--मनुष्य; भारम्‌ू-- भार; शिरसा--सिर पर; गुरुम्‌-- भारी; उद्ददन्‌--छोते हुए;तम्‌--वह; स्कन्धेन--कन्धे पर; सः--वह; आधत्ते--रखता है; तथा--उसी तरह; सर्वा:--सभी; प्रतिक्रिया:--विरोधीक्रियाएँ।

मनुष्य बोझ को सिर पर लेकर ढो सकता है और जब यह उसे भारी लगने लगे तो कभी-कभी वह बोझ को कन्धे पर रख कर अपने सिर को विश्राम देता है।

इस तरह वह बोझ सेछुटकारा पाने के लिए प्रयास करता है।

फिर भी, वह इस बोझ से मुक्त होने के लिए चाहे जोभी विधि निकाले, वह उस बोझ को एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखने से अधिक और कुछनहीं कर सकता।

"

नैकान्ततः प्रतीकार: कर्मणां कर्म केवलम्‌ ।

द्वयं ह्विद्योपसूतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥

३४॥

न--नहीं; एकान्ततः--अन्ततः; प्रतीकार: --निवारण; कर्मणाम्‌--विभिन्न कर्मो का; कर्म--अन्य कर्म; केवलम्‌--एकमात्र;द्वयम्‌--दोनों; हि-- क्योंकि; अविद्या--मोह के कारण; उपसृतम्‌--स्वीकृत; स्वप्ने--स्वप्न में; स्वज:--सपना; इब--सहश;अनघ--हे पापकर्मो से मुक्त, शुद्ध हृदय

नारद ने आगे कहा : हे शुद्धहदय पुरुष, कोई भी व्यक्ति कर्मों के फल का निराकरणकृष्णभक्ति से रहित अन्य कर्म करके नहीं कर सकता।

ऐसे सारे कर्म हमारे अज्ञान के कारण हैं।

जब हम कोई कष्ठप्रद स्वप्न देखते हैं, तो हम किसी कष्टप्रद व्यामोह के द्वारा छुटकारा नहीं पासकते।

स्वप्न का निवारण तो जग कर ही किया जा सकता है।

इसी प्रकार हमारा भौतिकअस्तित्व हमारे अज्ञान तथा मोह के कारण है।

जब तक हममें कृष्णभक्ति नहीं जग जाती, ऐसेस्वप्नों से छुटकारा नहीं मिल सकता।

समस्त समस्याओं को हल कर लेने के लिए हमेंकृष्णचेतना को जागृत करना होगा।

"

अर्थ हाविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते ।

मनसा लिड्डरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥

३५॥

अर्थ--वास्तविक कारण; हि--निश्चय ही; अविद्यमाने--न रहने पर; अपि--यद्यपि; संसृतिः--संसार; न--नहीं; निवर्तते--छुटकारा पाता है; मनसा--मन से; लिड्र-रूपेण --सूक्ष्म शरीर से; स्वप्ने--स्वप्न में; विचरत:--कार्य करते हुए; यथा--जिसप्रकार

कभी-कभी हमें इसलिए कष्ट होता है, क्योंकि हमें स्वप्न में शेर या सर्प दिख जाता है,किन्तु वास्तव में वहाँ न तो शेर होता है, न सर्प।

इस प्रकार हम अपनी सूक्ष्म अवस्था में कोईपरिस्थिति उत्पन्न कर लेते हैं और उसके परिणामों को भोगते हैं।

इन कष्टों का निवारण तब तकनहीं हो सकता जब तक कि हम अपने स्वप्न से जग नहीं जाते।

"

अधात्मनोथभूतस्य यतो नर्थपरम्परा ।

संसृतिस्तद्व्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥

३६॥

वबासुदेवे भगवति भक्तियोग: समाहित: ।

सक्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥

३७॥

अथ--अतः; आत्मन:--जीव का; अर्थ-भूतस्य--वास्तविक रुचि वाले का; यत:--जिससे; अनर्थ-- अवांछित वस्तुओं का;परम्‌-परा-- श्रृंखला; संसृति: --संसार; तत्‌--उसका; व्यवच्छेद: --विच्छेद, रुकना; भक्त्या--भक्ति से; परमया--शुद्ध;गुरौ--परमेश्वर या उसके प्रतिनिधि को; वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति-- भगवान्‌; भक्ति-योग: -- भक्ति; समाहित:--एकाग्रचित्त; सश्नीचीनेन--पूर्ण रूप से; वैराग्यम्‌--विरक्ति; ज्ञानमू--पूर्णज्ञान; च--तथा; जनयिष्यति-- प्रकट करता है।

अतः;आत्मन:--जीव का; अर्थ-भूतस्य--वास्तविक रुचि वाले का; यत:--जिससे; अनर्थ--अवांछित वस्तुओं का; परमू-परा--श्रृंखला; संसृतिः--संसार; तत्‌--उसका; व्यवच्छेद: --विच्छेद, रूकना; भक्त्या--भक्ति से; परमया--शुद्ध; गुरौ--परमेश्वर याउसके प्रतिनिधि को; वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति-- भगवान्‌; भक्तियोग:-- भक्ति; समाहित:--एकाग्रचित्त; सश्चीचीनेन--पूर्ण रूप से; वैराग्यम्‌--विरक्ति; ज्ञानमू--पूर्णज्ञान; च--तथा; जनयिष्यति--प्रकट करता है।

जीव का वास्तविक हित इसमें है कि वह अविद्या से निकले जिसके कारण उसे बारम्बारजन्म तथा मृत्यु सहनी पड़ती है।

इसका एकमात्र निवारण है भगवान्‌ के प्रतिनिधि के माध्यम सेउनकी ही शरण ग्रहण करना।

जब तक मनुष्य भगवान्‌ वासुदेव की भक्ति नहीं करता, तब तकवह न तो इस भौतिक जगत से पूर्णतः विरक्त हो सकता है और न अपने असली ज्ञान को हीप्रकट कर सकता है।

"

सोचिरादेव राजर्षे स्थादच्युतकथाश्रय: ।

श्रृण्वत: श्रद्धानस्थ नित्यदा स्थादधीयतः ॥

३८ ॥

सः--वह; अचिरात्‌ू--शीघ्र; एव--ही; राज-ऋषे--हे राजाओं में श्रेष्ठ; स्थात्‌--हो जाता है; अच्युत-- भगवान्‌ की; कथा--आख्यानों पर; आश्रय:--आश्रित; श्रृण्वतः--सुनने वाले; श्रद्धानस्य-- श्रद्धावान; नित्यदा--सदैव; स्यात्‌--हो जाता है;अधीयत:--अनुशीलन द्वारा

हे राजर्षि, जो श्रद्धावान्‌ है, जो भगवान्‌ की महिमा का निरन्तर श्रवण करता रहता है, जोसदैव कृष्णचेतना के अनुशीलन तथा भगवान्‌ के कार्यकलापों को सुनने में लगा रहता है, वहशीघ्र ही भगवान्‌ का साक्षात्कार करने के योग्य हो जाता है।

"

यत्र भागवता राजन्साधवो विशदाशया: ।

भगवदगुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतस: ॥

३९॥

तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र-'पीयूषशेषसरितः परितः स्त्रवन्ति ।

ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णै-स्तान्न स्पृशन्त्यशनतृड्भयशोकमोहा: ॥

४०॥

यत्र--जहाँ; भागवता:--परमभक्तगण ; राजन्‌--हे राजा; साधवः --साधु पुरुष; विशद-आशया:--विशाल हृदय वाले;भगवत्‌-- भगवान्‌ के; गुण--गुण; अनुकथन--नियमित रूप से पाठ करना; श्रवण--सुनना; व्यग्र--उत्सुक; चेतसः --जिसकी चेतना; तस्मिन्‌ू--वहाँ; महत्‌--महापुरुषों का; मुखरिता:--मुखों से निकला; मधु-भित्‌--मधु नामक असुर के मारनेवाले का; चरित्र--कार्यकलाप या चरित्र; पीयूष--अमृत का; शेष-- अधिक; सरितः--नदियाँ; परित:--चारों ओर;स्त्रवन्ति--बहती हैं; ताः--वे सब; ये--जो; पिबन्ति--पीते हैं; अवितृष:--सन्तुष्ट हुए बिना; नृप--हे राजा; गाढ--सावधान;कर्णै:--कानों से; तानू--उनको; न--कभी नहीं; स्पृशन्ति--स्पर्श करते हैं; अशन-- भूख; तृट्‌ू--प्यास; भय--डर; शोक --दुख; मोहा:--मोह |

हे राजन, जिस स्थान में शुद्ध भक्त विधि-विधानों का पालन करते हुए तथा इस प्रकार सेनितान्त सचेष्ट रहते हुए एवं उत्सुकतापूर्वक भगवान्‌ के गुणों का श्रवण एवं कीर्तन करते रहते हैंउस स्थान में यदि किसी को अमृत के निरन्तर प्रवाह को सुनने का अवसर प्राप्त हो तो वहजीवन की आवश्यकताएँ-- भूख तथा प्यास--भूल जायेगा और समस्त प्रकार के भय, शोकतथा मोह के प्रति निश्चेष्ठ हो जायेगा।

"

एतैरुपद्गुतो नित्यं जीवलोक: स्वभावजै: ।

न करोति हरे्नूनं कथामृतनिधौ रतिम्‌ ॥

४१॥

एतै:--इनसे; उपद्गुतः--विचलित; नित्यम्‌ू--सदैव; जीव-लोक:--भौतिक संसार में बद्धजीव; स्व-भाव-जैः--प्राकृतिक; नकरोति--नहीं करता; हरेः -- भगवान्‌ का; नूनमू--निश्चय ही; कथा--शब्दों के; अमृत--अमृत के; निधौ--समुद्र में; रतिमू--आसक्ति।

चूँकि बद्धजीव सदैव भूख तथा प्यास जैसी शारीरिक आवश्यकताओं से विचलित होतारहता है, अतः उसे भगवान्‌ की अमृतवाणी सुनने का अनुराग उत्पन्न करने के लिए बहुत कमसमय मिल पाता है।

"

प्रजापतिपति: साक्षाद्धगवान्गिरिशो मनु: ।

दक्षादय: प्रजाध्यक्षा नेष्ठिकाः सनकादय: ॥

४२॥

मरीच्रित्रयद्धिरसौ पुलस्त्य: पुलहः क्रतु: ।

भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मगादिन: ॥

४३॥

अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभि: ।

पश्यन्तोपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम्‌ ॥

४४॥

प्रजापति-पति:--समस्त प्रजापतियों के पिता, ब्रह्माजी; साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; गिरिश: --शिवजी;मनुः--मनु; दक्ष-आदयः: --राजा दक्ष इत्यादि; प्रजा-अध्यक्षा: --मनुष्यों के शासक; नैष्ठिका:--प्रबल ब्रह्मचारी; सनक-आदय:--सनक इत्यादि; मरीचि:--मरीचि; अतन्रि-अड्विससौ --अत्रि तथा अंगिरा; पुलस्त्य:--पुलस्त्य; पुलह:--पुलह; क्रतुः--क्रतु; भूगुः-- भूगु; वसिष्ठ:--वसिष्ठ; इति--इस प्रकार; एते--ये सब; मत्‌-अन्ता:--मुझसे अन्त होने वाले; ब्रह्म-वादिन:--ब्राह्मण, वैदिक साहित्य के वक्ता; अद्य अपि--आज तक; वाच:-पतय: --वाणी के स्वामी; तपः--तपस्या; विद्या--ज्ञान;समाधिभि: --तथा ध्यान से; पश्यन्तः --देखते हुए; अपि--यद्यपि; न पश्यन्ति--नहीं देखते; पश्यन्तम्‌--देखने वाला; परम-ईश्वरम्‌-- भगवान्‌ को |

समस्त प्रजापतियों के पिता परम शक्तिशाली ब्रह्माजी; शिव; मनु, दक्ष तथा मानवजाति केअन्य शासक; प्रथम कोटि के ब्रह्मचारी सनक, सनातन इत्यादि चारों परम साधु; मरीचि, अत्रि,अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भूगु तथा वसिष्ठ जैसे महर्षि; तथा स्वयं मैं ( नारद )--ये सभीमहान्‌ ब्राह्मण हैं, जो वैदिक साहित्य पर अधिकारपूर्वक बोल सकते हैं।

हम सब तप, ध्यान तथाज्ञान के कारण अत्यन्त शक्तिशाली हैं।

तो भी भगवान्‌ को साक्षात्‌ देखते हुए और अन्वेषणकरने पर भी हम उनके विषय में पूर्णतः नहीं जानते।

"

शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।

मन्त्रलिड्रैव्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदु: परम्‌ ॥

४५॥

शब्द-ब्रह्मणि--वैदिक साहित्य में; दुष्पारे-- अनन्त; चरन्तः--लगे हुए; उरु--अत्यधिक ; विस्तरे-- व्यापक; मन्त्र--वैदिक मंत्रोंका; लिड्वैः--लक्षणों से; व्यवच्छिन्नम्‌-- आंशिक शक्तिशाली ( देवता ); भजन्तः--पूजा करते हुए; न विदुः--नहीं जानते;परम्‌--परमे श्वर |

अनन्त वैदिक ज्ञान के अनुशीलन तथा वैदिक मंत्रों के लक्षणों से विभिन्न देवताओं की पूजाके बावजूद देव-पूजा से परम शक्तिशाली भगवान्‌ को समझने में कोई सहायता नहीं मिलती।

"

यदा यस्यानुगृह्वाति भगवानात्मभावितः ।

स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम्‌ ॥

४६॥

यदा--जब; यस्य--जिसका; अनुगृह्वाति-- अहैतुकी कृपा करता है; भगवानू-- भगवान्‌; आत्म-भावित:--भक्त द्वारा अनुभूत;सः--ऐसा भक्त; जहाति-त्यागता है; मतिम्‌--चेतना; लोके-- भौतिक जगत में; वेदे--वैदिक कार्यों में; च-- भी;परिनिष्ठिताम्‌--स्थिर।

जब मनुष्य पूर्णतः भक्ति में लगा रहता है, तो अहैतुकी कृपा प्रदर्शित करने वाले भगवान्‌उस पर कृपा करते हैं।

ऐसे अवसर पर जाग्रत भक्त सारे भौतिक कार्यों तथा वेदों में वर्णित अनुष्ठानों को त्याग देता है।

"

तस्मात्कर्मसु बर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु ।

मार्थदृष्टिं कृथा: श्रोत्रस्पर्शिष्वस्पृष्टवस्तुषु ॥

४७॥

तस्मात्‌ू--अतः; कर्मसु--कर्म में; ब्हिष्मन्‌--हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌; अज्ञानातू--अज्ञान से; अर्थ-काशिषु-- भड़कीले कर्मफलमें; मा--कभी नहीं; अर्थ-दृष्टिमू--जीवन लक्ष्य मानकर; कृथा:--कररते हैं; श्रोत्र-स्पर्शिषु--कर्णप्रिय, मधुर; अस्पृष्ट--बिनास्पर्श किये; वस्तुषु--वास्तविक हित, स्वार्थ |

हे राजा बर्दिष्मानू, तुम्हें अज्ञानवश कभी भी वैदिक अनुष्ठानों या सकाम कर्मों को अपनानानहीं चाहिए, भले ही वे कर्णप्रिय क्‍यों न हों, अथवा आत्म सिद्धि के लक्ष्य प्रतीत होते हों।

तुम्हेंचाहिए कि इन्हें कभी भी जीवन का चरम लक्ष्य न समझो।

"

स्वं लोक॑ न विदुस्ते वै यत्र देवो जनार्दनः ।

आहुर्धूप्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः ॥

४८ ॥

स्वमू--अपना, निजी; लोकम्‌--घर को; न--कभी नहीं; विदुः--जानते हैं; ते--ऐसे व्यक्ति; वै--निश्चय ही; यत्र--जहाँ;देव:--भगवान्‌; जनार्दन: --कृष्ण या विष्णु; आहुः--कहते हैं; धूम्र-धिय:--अल्पज्ञानी व्यक्ति; वेदम्‌--चारों बेद; स-कर्मकम्‌--अनुष्ठानों से पूर्ण; अ-तत्‌-विदः--ऐसे व्यक्ति जिल्हें ज्ञान नहीं है।

अल्पज्ञानी मनुष्य वैदिक अनुष्ठानों को ही सब कुछ मान बैठते हैं।

उन्हें यह ज्ञान नहीं है किवेदों का प्रयोजन अपने निजी धाम (घर ) को जानना है जहाँ भगवान्‌ निवास करते हैं।

अपनेअसली धाम में रुचि न रखकर वे मोहग्रस्त होकर, अन्य धामों की खोज करते रहते हैं।

"

आस्तीर्य दर्भ: प्रागग्रै: कार्त्स्येन क्षितिमण्डलम्‌स्तब्धो बृहद्वधान्मानी कर्म नावैधि यत्परम्‌ ।

तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥

४९॥

आस्तीर्य--आच्छादित करके; दर्भ:--कुशा से; प्राक्‌-अग्रै:-- पूर्व की ओर मुख किये; कार्त्स्येन--सम्पूर्ण; क्षिति-मण्डलम्‌ू--संसार भर में; स्तब्ध: --गर्वीली शुरुआत; बृहत्‌--अत्यधिक, महान्‌; वधात्‌--बध के द्वारा; मानी--अपने को अत्यन्तमहत्त्वपूर्ण समझने वाला, अभिमानी; कर्म--कर्म; न अवैषि--नहीं जानते हो; यत्‌--जो; परम्‌--परम; तत्‌--उस; कर्म--कर्म;हरि-तोषम्‌-- भगवान्‌ को प्रसन्न करना; यत्‌--जो; सा--वह; विद्या--शिक्षा; तत्‌-- भगवान्‌ को; मतिः--चेतना; यया--जिससे।

हे राजन, सारा संसार कुशों के तीखे अग्र भाग से ढका है और इस कारण तुम्हें अभिमान होगया है क्योंकि तुमने यज्ञों में अनेक प्रकार के पशुओं का वध किया है।

अपनी मूर्खतावश तुम्हेंयह ज्ञात नहीं है कि भगवान्‌ को प्रसन्न करने का एकमात्र उपाय भक्ति है।

तुम इस तथ्य को नहींसमझ सकते।

तुम्हें वे ही कार्य करने चाहिए जिनसे भगवान्‌ प्रसन्न हों।

हमारी शिक्षा ऐसी होनीचाहिए कि हम कृष्णचेतना के स्तर तक ऊपर उठ सकें।

"

हरिदेहभूतामात्मा स्वयं प्रकृतिरी श्वरः ।

तत्पादमूलं शरणं यतः क्षेमो नृणामिह ॥

५०॥

हरिः-- श्रीहरि; देह-भृताम्‌--देहधारी जीवों का; आत्मा--परमात्मा; स्वयम्‌--स्वयं; प्रकृतिः-- भौतिक प्रकृति; ईश्वर: --नियामक; तत्‌ू--उसका; पाद-मूलम्‌ू-- पाँव; शरणम्‌--शरण; यतः--जिससे; क्षेम: --सौभाग्य; नृणाम्‌--मनुष्यों का; इह--इस संसार में ॥

भगवान्‌ श्रीहरि इस संसार के समस्त देहधारी जीवों के परमात्मा तथा प्रदर्शक हैं।

वे प्रकृतिके समस्त भौतिक कार्यों के परम नियामक हैं।

वे हमारे श्रेष्ठ सखा भी हैं, अतः प्रत्येक व्यक्तिको उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए।

ऐसा करने से जीवन कल्याणमय होजाएगा।

"

स वै प्रियतमश्चात्मा यतोी न भयमण्वपि ।

इति बेद स बै विद्वान्यो विद्वान्स गुरुहरि: ॥

५१॥

सः--वह; बै--निश्चय ही; प्रिय-तम:--अत्यन्त प्रिय; च-- भी; आत्मा--परमात्मा; यत:--जिससे; न--कभी नहीं; भयम्‌--डर; अणु--सूक्ष्; अपि-- भी; इति--इस प्रकार; वेद--( जो ) जानता है; सः--वह; बै--निश्चय ही; विद्वानू--शिक्षित; यः--जो; विद्वानू--शिक्षित; स:ः--वह; गुरु:--गुरु; हरिः-- भगवान्‌ से अभिन्

नजो भक्ति में लगा हुआ है, वह इस संसार से रंचमात्र भी नहीं डरता।

इसका कारण यह हैकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ परम आत्मा हैं और सबके मित्र हैं।

जो इस रहस्य को जानता है, वहीवास्तव में शिक्षित है और ऐसा शिक्षित व्यक्ति ही संसार का गुरु हो सकता है।

जो वस्तुतःप्रामाणिक गुरु अर्थात्‌ कृष्ण का प्रतिनिधि है, वह कृष्ण से अभिन्न होता है।

"

नारद उवाचप्रश्न एवं हि सठिछन्नो भवतः पुरुषर्षभ ।

अत्र मे बदतो गुह्य॑ं निशामय सुनिश्चितम्‌ ॥

५२॥

नारदः उवाच--नारद ने कहा; प्रश्न: --प्रश्न; एवम्‌--इस प्रकार; हि--निश्चय ही; सउिछलन्न: --उत्तरित; भवतः--तुम्हारा; पुरुष-ऋषभ-हे श्रेष्ठ पुरुष; अत्र--यहाँ; मे वदत:--मैं जिस तरह कह रहा हूँ; गुह्ाम्‌--रहस्यपूर्ण, गुप्त; निशामय--सुनो; सु-निश्चितम्‌ू-- भली-भाँति निश्चित किया।

महर्षि नारद ऋषि ने आगे कहा : हे महापुरुष, तुमने जो कुछ मुझसे पूछा है मैंने उसकासमुचित उत्तर दे दिया है।

अब एक अन्य आख्यान सुनो जो साधु पुरुषों द्वारा स्वीकृत है औरअत्यन्त गुह्य है।

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क्षुद्रं चरं सुमनसां शरणे मिथित्वारक्त षडड्धप्रिगणसामसु लुब्धकर्णम्‌ ।

अग्रे वृकानसुतृपो विगणय्य यान्तंपृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम्‌ ॥

५३॥

क्षुद्रमू--घास; चरम्‌--चरते हुए; सुमनसाम्‌--सुन्दर फूलों के उद्यान की; शरणे--रक्षा में; मिथित्वा--मैथुन करते हुए; रक्तम्‌--अनुरक्त; षट्‌ू-अड्ध्रि--घट्पद या भौंरों का; गण--समूह; सामसु--गाने के प्रति; लुब्ध-कर्णम्‌--जिसके कान आकृष्ट हैं;अग्रे--सामने; वृकान्‌-- भेड़िये; असु-तृप:--दूसरों को खाकर जीने वाले; अविगणय्य--अपेक्षा करके; यान्तमू--जाते हुए;पृष्ठ--पीछे; मृगम्‌--हिरन को; मृगय--ढूँढो; लुब्धक--शिकारी के; बाण--बाणों से; भिन्नम्‌--बेधे जाने वाला

हे राजा, उस हिरन की खोज करो जो एक सुन्दर उद्यान में अपनी हिरनी के साथ घास चरनेमें मस्त है।

वह हिरन अपने कार्य ( चरने ) में अत्यधिक अनुरक्त है और उस उद्यान के भौरों केमधुर गुंजार का आनन्द ले रहा है।

उसकी स्थिति को समझने का प्रयास करो।

उसे इसका पताही नहीं कि उसके सामने भेड़िया है, जो अन्यों के मांस को खाकर अपना पेट पालन करने काआदी है।

हिरन के पीछे शिकारी है, जो उसे तीक्ष्ण बाणों से बेधने के लिए तैयार है।

इस प्रकारहिरन की मृत्यु निश्चित है।

"

सुमनःसमधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधुगन्धवत्क्षुद्रममं काम्यकर्मविपाकजं कामसुखलवंजैह्व्यौपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय तदभिनिवेशितमनसंषडड़्प्रिगणसामगीतवदतिमनोहरवनितादिजनालापेष्वतितरामतिप्रलोभितकर्णमग्रे ।

वृकयूथवदात्मन'आयुर्हईरतोहोरात्रान्तानकाललवविशेषानविगण य्य गृहेषु विहरन्तं पृष्ठत एव परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकःकृतान्तोन्तः शरेण यमिह पराविध्यति तमिममात्मानमहो राजन्भिन्नहृदयं द्रष्टमहसीति ॥

५४॥

सुमनः--फूल; सम-धर्मणाम्‌--समानधर्मा , हूबहू; स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों की; शरणे--शरण में; आश्रमे--गृहस्थ जीवन; पुष्प--फूलों में; मधु--शहद की; गन्ध--सुगन्ध; वत्‌--सहृश; क्षुद्र-तमम्‌-- अत्यन्त क्षुद्र, नगण्य; काम्य--इच्छित; कर्म--कर्मों का;विपाक-जम्‌--के फलस्वरूप प्राप्त; काम-सुख--इन्द्रियतृप्ति का; लवम्‌--एक खंड; जैह्व्य--जिह्ना सुख; औपस्थ्य--संभोगसुख; आदि--इत्यादि; विचिन्वन्तम्‌--सदैव चिन्तन करते हुए; मिथुनी-भूय--संभोगरत; तत्‌--अपनी पत्नी के साथ;अभिनिवेशित--सदैव मग्न; मनसमू--जिसका मन; षट्‌-अडद्धप्रि-- भौरों का; गण--समूह; साम--मधुर; गीत--गुंजार; बत्‌--सहश; अति--अत्यन्त; मनोहर--आकर्षक; वनिता-आदि-- पत्नी इत्यादि; जन--लोगों का; आलापेषु--बातों में;अतितराम्‌--अत्यधिक; अति--अधिक; प्रलोभित--आसक्त; कर्णम्‌--जिसके कान; अग्रे--आगे; वृक-यूथ-- भेड़ियों काझुंड; बत्‌--सहृ॒श; आत्मन:--अपने आप का; आयु: --उ्र; हरत:--हरण करते हुए; अहः-रात्रानू--दिन तथा रातें; तानू--वेसब; काल-लव-विशेषान्‌ू--समय के क्षण; अविगणय्य--बिना विचारे; गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; विहरन्तम्‌-- भोगते या विहारकरते; पृष्ठतः--पीछे से; एब--निश्चय ही; परोक्षम्‌-- अदृश्य रूप से; अनुप्रवृत्त:--पीछा करते हुए; लुब्धक:--शिकारी; कृत-अन्त:--यमराज; अन्तः--हृदय में; शरेण--बाण से; यम्‌ू-- जिसको; इह--इस संसार में; पराविध्यति--बेधता है; तमू--उस;इमम्‌--यह; आत्मानम्‌--अपने आप, स्वतः; अहो राजन्‌--हे राजा; भिन्न-हृदयम्‌--बिंधे हुए हृदय वाला; द्रष्टम्‌--देखने केलिए; अर्ईसि--तुम्हें चाहिए; इति--इस प्रकार |

हे राजन्‌, स्त्री उस पुष्प के समान है, जो प्रारम्भ में अत्यन्त आकर्षक एवं अन्त में अत्यन्त घृणा योग्य हो जाता है।

जीव कामेच्छाओं के कारण स्त्री के साथ फँसता है और वह उसी प्रकारसंभोग-सुख प्राप्त करता है, जिस प्रकार फूलों की सुगन्ध का भोग किया जाता है।

इस प्रकारवह जिह्ना से लेकर शिश्न तक इन्द्रियतृप्ति का जीवन बिताता है और इस प्रकार जीव अपने कोगृहस्थ जीवन में अत्यन्त सुखी मानता है।

अपनी स्त्री के साथ रहते हुए वह सदैव ऐसे विचारों मेंमग्न रहता है।

वह अपनी पतली तथा बच्चों की बातें सुनने में आनन्द का अनुभव करता है।

ये उनभौंरों की मधुर गुंजार के तुल्य होती हैं, जो प्रत्येक फूल से मधु एकत्र करते रहते हैं।

वह भूलजाता है कि उसके समक्ष काल खड़ा है, जो दिन-रात के बीतने के साथ ही उसकी आयु काहरण करता जा रहा है।

उसे न तो धीरे-धीरे हो रही अपनी आयु-क्षय दिखती है और न उसेयमराज की ही परवाह रहती है, जो पीछे से उसे मारने का प्रयत्न करते रहते हैं।

तुम इसे समझनेका प्रयास करो।

तुम अत्यन्त शोचनीय स्थिति में हो और चारों ओर से संकट से घिरे हो।

"

स त्वं विचक्ष्य मृगचेष्टितमात्मनो न्‍्त-श्वित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनीं च चित्ते ।

जहाडुनाश्रममसत्तमयूथगार्थप्रीणीहि हंसशरणं विरम क्रमेण ॥

५५॥

सः--वही पुरुष; त्वमू--तुम; विचक्ष्य--विचार करके; मृग-चेष्टितम्‌--हिरन के कार्य; आत्मन:--स्वयं के; अन्तः--भीतरी;चित्तम्‌--चेतना; नियच्छ--स्थिर करो; हृदि--हृदय में; कर्ण-धुनीम्‌--कर्णेन्द्रिय; च--तथा; चित्ते--चेतना को; जहि--छोड़दो; अड्न्‍डना-आश्रमम्‌--गृहस्थ जीवन; असत्‌-तम--अत्यन्त घृणित; यूथ-गाथम्‌--नर तथा नारी की गाथाओं से पूर्ण;प्रीणीहि--स्वीकार करो; हंस-शरणम्‌--मुक्त जीवों की शरण; विरम--विरक्त बनो; क्रमेण--क्रमशः ।

हे राजन, तुम हिरन की अन्योक्ति की स्थिति को समझने का प्रयास करो।

तुम अपने प्रतिपूर्ण सचेत रहो और कर्म के द्वारा स्वर्गलोक जाने के श्रवण-सुख को त्याग दो।

गृहस्थ जीवन त्याग दो, क्योंकि वह विषयभोगों से तथा ऐसी वस्तुओं की कथाओं से पूर्ण है।

तुम मुक्त पुरुषोंकी कृपा से भगवान्‌ की शरण ग्रहण करो।

इस प्रकार से इस संसार के प्रति अपनी आसक्ति कात्याग करो।

"

राजोबाचश्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मम्भगवान्यदभाषत ।

नैतज्जानन्त्युपाध्याया: किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥

५६॥

राजा उबाच--राजा ने कहा; श्रुतम्‌--सुना गया; अन्वीक्षितम्‌--विचार किया गया; ब्रह्मन्‌ू--हे ब्राह्मण; भगवान्‌--अत्यन्तशक्तिमान; यत्‌--जो; अभाषत--तुमने कहा है; न--नहीं; एतत्‌--यह; जानन्ति--जानते हैं; उपाध्याया:--कर्मकाण्ड केशिक्षक; किम्‌-क्यों; न ब्रूयु:--उन्होंने शिक्षा नहीं दी; विदु:--वे जानते थे; यदि--अगर

राजा ने कहा : हे ब्राह्मण, आपने जो कुछ कहा है उसे मैंने अत्यन्त मनोयोग से सुना है औरसम्यक्‌ विचार के पश्चात्‌ मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि जिन आचार्यों ( शिक्षकों ) ने मुझेकर्मकाण्ड में प्रवृत्त किया, वे इस गुह्य ज्ञान को नहीं जानते थे।

और यदि वे इससे अवगत थे तोफिर उन्होंने मुझे क्‍यों नहीं बताया ?"

संशयोऊत्र तु मे विप्र सड्छन्नस्तत्कृतो महान्‌ ।

ऋषयोपि हि मुहान्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तय: ॥

५७॥

संशयः--सन्देह; अत्र--यहाँ; तु--लेकिन; मे--मेरा; विप्र--हे ब्राह्मण; स्छिन्न:--काट दिया, दूर कर दिया; तत्‌-कृत:--उससे किया गया; महान्‌--महान; ऋषय:--ऋषिगण; अपि-- भी; हि--निश्चय ही; मुहान्ति--मोहग्रस्त हो जाते हैं; यत्र--जहाँ;न--नहीं; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; वृत्तय:--कार्यकलाप।

हे ब्राह्मण, आपके आदेशों तथा मुझे कर्मकाण्ड में प्रवृत्त करने वाले मेरे गुरुओं के उपदेशोंमें विरोधाभास जान पड़ता है।

मैं अब भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य के अन्तर को समझ सकता हूँ।

मुझे पहले इनके विषय में कुछ संशय थे, किन्तु आपने कृपा करके इन संशयों को मिटा दियाहै।

अब मैं समझ सकता हूँ कि बड़े बड़े ऋषि भी जीवन के वास्तविक उद्देश्य के विषय में कैसेमोहग्रस्त होते हैं।

निस्सन्देह, इन्द्रियतृप्ति का कोई सवाल ही नहीं उठता।

"

कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय तम्‌ ।

अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥

५८ ॥

कर्माणि--सकाम कर्म; आरभते--करना प्रारम्भ करता है; येन--जिससे; पुमान्‌ू-- जीव; इह--इस जीवन में; विहाय--त्यागकर; तमू--उस; अमुत्र--अगले जीवन में; अन्येन--दूसरे; देहेन--शरीर के द्वारा; जुष्टानि--परिणाम; सः--वह; यत्‌--जो;अश्नुते-- भोगता है|

इस जीवन में जीव जो कुछ भी करता है, उसका फल वह अगले जीवन में भोगता है।

"

इति बेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह ।

कर्म यत्क्रियते प्रोक्त परोक्षं न प्रकाशते ॥

५९॥

इति--इस प्रकार; वेद-विदाम्‌--वेदों के ज्ञाता; वादः--कथन; श्रूयते--सुना जाता है; तत्र तत्र--जगह जगह, जहाँ तहाँ; ह--निश्चय ही; कर्म--कर्म; यत्‌ू-- जो; क्रियते--किया जाता है; प्रोक्तमू--जैसा कहा जा चुका है; परोक्षम्‌--अज्ञात; नप्रकाशते--प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हो पाता |

वेदवादियों का कथन है कि मनुष्य अपने पूर्व कर्मों के फल का भोग करता है।

किन्तुव्यावहारिक रूप में यह देखा जाता है कि पिछले जन्म में जिस शरीर ने कर्म किया था वह तोनष्ट हो चुका होता है।

अतः उस कर्म का भोग एक भिन्न शरीर द्वारा किस प्रकार सम्भव है ?"

नारद उवाचयेनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान्‌ ।

भुड़े हाव्यवधानेन लिड़ेन मनसा स्वयम्‌ ॥

६०॥

नारद: उवाच--नारद ने कहा; येन--जिसके द्वारा; एबव--निश्चय ही; आरभते--प्रारम्भ करता है; कर्म--सकाम कर्म; तेन--उसी शरीर से; एव--निश्चय ही; अमुत्र--अगले जीवन में; तत्‌--वह; पुमानू--जीव; भुड्ढे -- भोग करता है; हि-- क्योंकि;अव्यवधानेन--किसी परिवर्तन के बिना; लिड्रेन--सूक्ष्म शरीर से; मनसा--मन से; स्वयम्‌--स्वयं, खुद ।

नारद मुनि ने आगे कहा : इस जीवन में जीव स्थूल शरीर में कर्म करता है।

यह शरीर मन,बुद्धि तथा अहंकार से निर्मित सूक्ष्म शरीर द्वारा कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता है।

इसस्थूल शरीर के विनष्ट होने पर भी सूक्ष्म शरीर फल भोगने या कष्ट उठाने के लिए बना रहता है।

अतः इससे कोई परिवर्तन नहीं होता।

"

शयानमिममुत्सूज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा ।

कर्मात्मन्याहितं भुड्डे ताहशेनेतरेण वा ॥

६१॥

शयानमू--ब्स्तर में लेटे हुए; इमम्‌ू--यह शरीर; उत्सूज्य-त्याग कर; श्रसन्तम्‌-- श्वास लेता हुआ; पुरुष: --जीव; यथा--जिसप्रकार; कर्म--कार्य; आत्मनि--मन में; आहितम्‌--सम्पन्न हुआ; भुड्ढे --भोगता है; ताइशेन--वैसे ही शरीर से; इतरेण--भिन्नशरीर से; वा--अथवा।

स्वप्न देखते समय जीव अपने वास्तविक शरीर को त्याग देता है और अपने मन तथा बुद्धिके कार्यों से वह दूसरे शरीर में, यथा देवता या कुत्ते के शरीर में, प्रवेश करता है।

इस स्थूलशरीर को त्याग कर जीव इस लोक में अथवा अन्य लोक में किसी पशु या देवता के शरीर मेंप्रवेश करता है।

इस प्रकार वह अपने पिछले जीवन के कर्मफलों को भोगता है।

"

ममैते मनसा यद्यद्सावहमिति ब्रुवन्‌ ।

गृह्नीयात्तत्पुमात्राद्धं कर्म येन पुनर्भव: ॥

६२॥

मम--मेरा; एते--ये सब; मनसा--मन से; यत्‌ यत्‌ू--जो जो; असौ--वह; अहम्‌--मैं ( हूँ ); इति--इस प्रकार; ब्रुवन्‌--स्वीकार करते हुए; गृह्लीयात्‌--अपने ऊपर ले लेता है; तत्‌--वह; पुमान्‌ू--जीव; राद्धम्‌--पूर्ण; कर्म--कर्म; येन--जिससे;पुनः--फिर; भव:--संसार |

जीव इस देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत कार्य करता है कि, 'मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, यह मेरा कर्तव्यहै, अतः मैं इसे करूँगा।

ये सब मानसिक संस्कार है और ये सारे कर्म अस्थायी हैं; फिर भीभगवान्‌ के अनुग्रह से जीव को अपने समस्त मनोरथ पूरे करने का अवसर प्राप्त होता है।

इसलिए उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है।

"

यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितैः ।

एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभि: ॥

६३॥

यथा--जिस प्रकार; अनुमीयते-- अनुमान लगाया जा सकता है; चित्तम्‌ू--चेतना या मानसिक स्थिति; उभयै: --दोनों; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; ईहितैः --क्रियाओं के द्वारा; एवम्‌--उसी तरह; प्राक्‌--पूर्व; देहजम्‌--शरीर द्वारा सम्पन्न; कर्म--कर्म; लक्ष्यते--देखा जा सकता है; चित्त--चेतना के; वृत्तिभिः--व्यापारों से |

जीव की मानसिक स्थिति को दो प्रकार की इन्द्रियों--कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों--द्वारासमझा जा सकता है।

इसी प्रकार किसी मनुष्य की मानसिक स्थिति से उसके पूर्वजन्म कीस्थिति को समझा जा सकता है।

"

नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम्‌ ।

कदाचिदुपलभ्येत यद्वूपं याहगात्मनि ॥

६४॥

न--कभी नहीं; अनुभूतम्‌-- अनुभव किया गया; क्व--किसी समय; च-- भी; अनेन देहेन--इस शरीर से; अदृष्टमू--कभी नदेखा गया; अश्रुतम्‌--कभी न सुना हुआ; कदाचित्‌--क भी कभी; उपलभ्येत-- अनुभव किया जा सकता है; यत्‌--जो;रूपमू--रूप; याहक्‌ू--जैसा भी; आत्मनि--मन में |

कभी-कभी हमें ऐसी वस्तु का अचानक अनुभव होता है, जिसे हमने इस शरीर में देख यासुनकर कभी अनुभव नहीं किया।

कभी-कभी हमें ऐसी वस्तुएँ अचानक स्वप्न में दिख जाती हैं।

"

तेनास्य ताहशं राजल्लिड्डिनो देहसम्भवम्‌ ।

श्रद्धत्स्वाननुभूतो थीं न मनः स्प्रष्टमहति ॥

६५॥

तेन--अतः; अस्य--जीव का; ताह॒शम्‌--उसके समान; राजनू--हे राजन; लिड्डिन:--सूक्ष्म मानसिक आवरण वाला; देह-सम्भवम्‌--पूर्वशरीर में उत्पन्न; श्रद्धत्स्व--इसे तथ्य मानो; अननुभूतः-- अनदेखा; अर्थ: --वस्तु; न--कभी नहीं; मन:--मन में;स्प्रष्टमू--प्रकट करने के लिए; अर्हति--समर्थ है।

अतः हे राजन, सूक्ष्म मानसिक आवरण वाला यह जीव अपने पूर्व शरीर के कारण सभीप्रकार के विचार तथा प्रतिबिम्ब विकसित करता रहता है।

मेरी बात को तुम निश्चय समझो।

जबतक पूर्व शरीर में कोई वस्तु देखी हुई नहीं रहती, तब तक मन के द्वारा उसकी कल्पना करने कीसम्भावना नहीं उठती।

"

मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ।

भविष्यतश्च भद्रं ते तथेव न भविष्यत: ॥

६६॥

मनः--मन; एव--निश्चय ही; मनुष्यस्थ--मनुष्य के; पूर्व--विगत; रूपाणि---अनेक रूप; शंसति--सूचित करता है;भविष्यत:--आगे जन्म लेने वाले का; च-- भी; भद्रमू--कल्याण; ते--तुम्हारा; तथा--उसी तरह; एब--निश्चय ही; न--नहीं;भविष्यत:--भावी जन्म लेने वाले का

हे राजन, तुम्हारा कल्याण हो।

यह मन प्रकृति के साहचर्य के अनुसार जीव द्वारा विशेषप्रकार का शरीर धारण करने का कारण है।

मनुष्य अपने मानसिक संघटन के अनुसार यह जानसकता है कि पूर्वजन्म में वह कैसा था और भविष्य में वह कैसा शरीर धारण करेगा।

इस प्रकारमन भूत ( गत ) तथा भावी शरीरों की सूचना देता है।

"

अद्दष्टमश्रुतं चात्र क्वचिन्मनसि हृश्यते ।

यथा तथानुमन्तव्यं देशकालक्रिया श्रयम्‌ ॥

६७॥

अदृष्टमू--न देखी गई; अश्रुतम्‌--न सुनी गई; च--तथा; अतन्र--इस जीवन में; क्वचित्‌--कभी; मनसि--मन में; दृश्यते--देखेजाते हैं; यथा--जिस प्रकार; तथा--उसी प्रकार; अनुमन्तव्यम्‌ू--समझा जाना चाहिए; देश--स्थान; काल--समय; क्रिया--कर्म; आश्रयम्‌--आश्रित |

कभी-कभी स्वण में हम ऐसी वस्तु देखते हैं, जिसको हम इस जीवन में कभी न तो अनुभवकिये होते और न सुने होते हैं, किन्तु ये सभी घटनाएँ विभिन्न कालों, स्थानों तथा परिस्थितियों मेंअनुभव की गई होती हैं।

"

सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचरा: ।

आयान्ति बहुशो यान्ति सर्वे समनसो जना: ॥

६८ ॥

सर्वे-- सभी; क्रम-अनुरोधेन-- क्रमानुसार; मनसि-- मन में; इन्द्रिय--इन्द्रियों द्वारा; गोचरा:--अनुभूत; आयान्ति--आते हैं;बहुश:--अनेक प्रकार से; यान्ति--चले जाते हैं; सर्वे--सभी; समनस:--मन से; जना:--जीव ।

जीव का मन विभिन्न स्थूल शरीरों में रहा करता है और इन्द्रियतृप्ति के लिए व्यक्ति कीइच्छाओं के अनुसार मन विविध विचारों को अंकित करता रहता है।

ये मन में विभिन्न मिश्रणों( मेलों ) के रूप में प्रकट होते हैं।

अतः कभी-कभी ये प्रतिबिम्ब ऐसी वस्तुओं के रूप में प्रकटहोते हैं, जो पहले न तो कभी सुनी गई और न देखी गई होती हैं।

"

सत्त्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि ।

तमश्चन्द्रससीवेदमुपरज्यावभासते ॥

६९॥

सत्त्व-एक-निष्टे -- पूर्ण कृष्णचेतना में; मनसि--मन में; भगवत्‌-- भगवान्‌ के साथ; पार्श्व-वर्तिनि--लगातार साथ रहने से;तमः--अंध ग्रह; चन्द्रमसि--चन्द्रमा में; इब--सहृश; इृदम्‌--यह हृश्य जगत; उपरज्य--सम्बन्धित होकर; अवभासते--प्रकटहोता

हैकृष्ण-चेतना का अर्थ है ऐसी मानसिक दशा में भगवान्‌ के साथ निरन्तर साहचर्य जिससेकि भक्त इस दृश्य जगत्‌ को वैसा ही देख सके जैसा कि भगवान्‌ देख सकते हैं।

ऐसा देख पानासदैव सम्भव नहीं होता, लेकिन यह राहु नामक अंधग्रह के समान प्रकट होता है, जो पूर्ण चन्द्रहोने पर ही देखा जाता है।

"

नाह ममेति भावोयं पुरुषे व्यवधीयते ।

यावद्दुद्धिमनो क्षार्थगुणव्यूहो हाानादिमान्‌ ॥

७०॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; भाव:--चेतना; अयम्‌--यह; पुरुषे--जीव में; व्यवधीयते--विलग रहताहै; यावत्‌ू--जब तक; बुद्धि--बुद्धि; मनः--मन; अक्ष--इन्द्रियाँ; अर्थ--इन्द्रिय विषय; गुण--गुणों का; व्यूह:--प्राकट्य;हि--निश्चय ही; अनादि-मान्‌--सूक्ष्म शरीर ( अनादि काल से विद्यमान )

जब तक बुद्धि, मन, इन्द्रियों, विषयों तथा भौतिक गुणों के प्रतिफलों से बना हुआ सूक्ष्मभौतिक शरीर रहता है तब तक मिथ्या अहंकार और स्थूल शरीर भी रह जाते हैं।

"

सुप्तिमूच्छोपतापेषु प्राणायनविघाततः ।

नेहतेहमिति ज्ञान मृत्युप्रज्यारयोरपि ॥

७१॥

सुप्ति--प्रगाढ़ निद्रा में; मूर्छ--बेहोशी; उपतापेषु--या आघात पहुँचने पर; प्राण-अयन--प्राण वायु के संचरण का;विघाततः--रुकावट से; न--नहीं; ईहते--सोचता है; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; ज्ञानमू--ज्ञान; मृत्यु--मरते हुए;प्रज्वारयो: --या प्रखर ज्वर होने पर; अपि-- भी |

जब जीव गाढ़ निद्रा, मूर्च्छा, किसी गंभीर क्षति से उत्पन्न गहन आघात, मृत्यु के समय याप्रखर ज्वर की अवस्था में रहता है, तो प्राण-वायु का संचरण रुक जाता है।

उस समय जीवआत्मा से शरीर की पहचान करने का ज्ञान खो देता है।

"

गर्भ बाल्येप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा ।

लिड़ं न दृश्यते यूनः कुह्नां चन्द्रमसो यथा ॥

७२॥

गर्भे--गर्भ में; बाल्ये--बाल्यकाल में; अपि-- भी; अपौष्कल्यात्‌-- अविकसित होने के कारण; एकादश--दस इन्द्रियाँ तथामन; विधम्‌--के रूप में; तदा--उस समय; लिड्रम्‌--सूक्ष्म शरीर अथवा मिथ्या अहंकार; न--नहीं; दृश्यते--दिखाई पड़ता है;यून:--तरुण का; कुह्माम्‌--अमावस्या में; चन्द्रमस:ः --चन्द्रमा; यथा--जिस तरह

जब मनुष्य तरुण होता है, तो दसों इन्द्रियाँ तथा मन पूरी तरह दिखाई पड़ते हैं, किन्तु माताके गर्भ या बाल्यकाल में इन्द्रियाँ तथा मन उसी तरह ढके रहते हैं जिस तरह अमावस्या की रात्रिके अंधकार से पूर्ण-चन्द्रमा ढका रहता है।

"

अर्थ हाविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते ।

ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेडनर्थागमो यथा ॥

७३॥

अर्थ--इन्द्रिय विषय; हि--निश्चय ही; अविद्यमाने-- अनुपस्थिति में; अपि--यद्यपि; संसृतिः:-- भौतिक संसार; न--कभी नहीं;निवर्तते--रूक जाता है; ध्यायत:--ध्यान करते हुए; विषयान्‌--इन्द्रिय विषयों के बारे में; अस्य--जीव का; स्वप्ने--स्वप्न में;अनर्थ--अवांछित वस्तुओं का; आगम:--प्राकट्य; यथा--जिस प्रकार।

जब जीव स्वण देखता है, तो वास्तव में इन्द्रियविषय उपस्थित नहीं रहते।

किन्तुइन्द्रियविषयों के साथ मनुष्य का सम्पर्क होने से वे प्रकट हो जाते हैं।

इसी प्रकार अविकसितइन्द्रियों वाले जीव का भौतिक रूप से अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता, भले ही वह इन्द्रियविषयोंके सम्पर्क में न हो।

"

एवं पञ्जविधं लिड़ुं त्रिवृत्बोडश विस्तृतम्‌ ।

एष चेतनया युक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥

७४॥

एवम्‌--इस प्रकार; पञ्ञ-विधम्‌--पाँच इन्द्रियविषयों; लिड्डमू--सूक्ष्म शरीर; त्रि-वृत्‌--तीनों गुणों से प्रभावित; घोडश--सोलह; विस्तृतम्‌ू--फैला हुआ; एष: --यह; चेतनया--जीव के साथ; युक्त:--जुड़ा हुआ; जीव:--बद्धजीव; इति--इसप्रकार; अभिधीयते--माना जाता है|

पाँच इन्द्रिय विषय, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन--ये सोलह भौतिक विस्तारहैं।

ये सब जीव के साथ संयोजित रहते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा प्रभावित होते हैं।

इसप्रकार बद्धजीव के अस्तित्व को समझा जाता है।

"

अनेन पुरुषो देहानुपादत्ते विमुझ्ञति ।

हर्ष शोकं भयं दुःखं सुखं चानेन विन्दति ॥

७५॥

अनेन--इस विधि से; पुरुष:--जीव; देहान्‌--स्थूल शरीरों को; उपादत्ते--प्राप्त करता है; विमुल्ञति--त्यागता है; हर्षम्‌--प्रसन्नता; शोकम्‌--शोक; भयम्‌-- भय, डर; दुःखम्‌--दुख; सुखम्‌--सुख; च-- भी; अनेन--स्थूल शरीर से; विन्दति--भोगता है।

सूक्ष्म शरीर की क्रियाओं से जीव स्थूल शरीरों को विकसित करता और त्यागता रहता है।

यह आत्मा का देहान्तरण कहलाता है।

इस प्रकार आत्मा विभिन्न प्रकार के हर्ष, शोक, भय,सुख तथा दुख का अनुभव करता है।

"

यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ।

न त्यजेन्प्रियमाणोपि प्राग्देहाभिमतिं जन: ॥

७६॥

यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम्‌ ।

मन एव मनुष्येन्द्र भूतानां भवभावनम्‌ ॥

७७॥

यथा--जिस प्रकार; तृण-जलूका--एक प्रकार का कीट; इयम्‌--यह; न अपयाति--जाती नहीं है; अपयाति--जाती है; च--भी; न--नहीं; त्यजेत्‌--त्याग देता है; प्रियमाण:--मरणप्राय; अपि-- भी; प्राक्‌--पूर्व; देह--शरीर के साथ; अभिमतिम्‌--पहचान; जनः--व्यक्ति; यावत्‌ू--जब तक; अन्यम्‌--दूसरा; न--नहीं; विन्देत-- प्राप्त करता है; व्यवधानेन--रूकने से;कर्मणाम्‌--कर्मो का; मन:--मन; एव--निश्चय ही; मनुष्य-इन्द्र--हे पुरुषों के शासक; भूतानाम्‌ू--समस्त जीवों का; भव--ससार का; भावनम्‌्-- कारण ।

इल्ली ( कीट विशेष ) एक पत्ती को छोड़ने के पहले दूसरी पत्ती को पकड़ कर एक से दूसरी पत्ती में जाती है।

इसी प्रकार जीव को अपना शरीर त्यागने के पूर्व अपने पूर्व कर्म के अनुसारअन्य शरीर को ग्रहण करना होता है।

इसका कारण यह है कि मन सभी प्रकार की इच्छाओं काआगार ( भण्डार ) है।

"

यदाक्षैश्वरितान्ध्यायन्कर्माण्याचिनुतेउसकृत्‌ ।

सति कर्मण्यविद्यायां बन्ध: कर्मण्यनात्मन: ॥

७८॥

यदा--जब; अक्षै:ः--इन्द्रियों द्वारा; चरितान्‌ू-- भोगे गये सुख; ध्यायन्‌--चिन्तन करते हुए; कर्माणि--कर्म; आचिनुते--करताहै; असकृत्‌ू--सदैव; सति कर्मणि--जब भौतिक व्यापार होते रहते हैं; अविद्यायामू--मोहवश; बन्ध:--बन्धन; कर्मणि--कर्ममें; अनात्मनः-- भौतिक शरीर का।

जब तक हम इन्द्रियसुखों का भोग करना चाहते हैं तब तक हम भौतिक कार्यों की सृष्टिकरते रहते हैं।

जब जीव भौतिक क्षेत्र में कर्म करता है, तो वह इन्द्रियों को भोगता है और ऐसाकरने से वह भौतिक कर्मों की एक और श्रृंखला को जन्म देता है।

इस प्रकार जीवात्मा बद्धआत्मा के रूप में जकड़ जाता है।

"

अतस्तदपवादार्थ भज सर्वात्मना हरिम्‌ ।

पश्यंस्तदात्मकं विश्व स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः ॥

७९॥

अतः--अतएव; तत्‌--उस; अपवाद-अर्थमू--छुटकारा पाने के लिए; भज--भक्ति में लगो; सर्व-आत्मना--अपनी सारीइन्द्रियों सहित; हरिम्‌-- भगवान्‌ को; पश्यन्‌--देखते हुए; तत्‌ू-- भगवान्‌ का; आत्मकम्‌--वश में ; विश्वम्‌--हृश्य जगत;स्थिति--पालन; उत्पत्ति--सृष्टि; अप्यया:--तथा संहार; यत:--जिससे |

तुम्हें यह सदैव जानना चाहिए कि भगवान्‌ की इच्छा से ही इस दृश्य जगत की उत्पत्ति,पालन तथा संहार होता है।

फलतः इस दृश्य जगत के अन्तर्गत सारी वस्तुएँ भगवान्‌ के अधीनहैं।

इस पूर्ण ज्ञान से प्रकाश प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदैव भगवद्भक्ति में लगे रहनाचाहिए।

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मैत्रेय उवाचभागवतमुख्यो भगवान्नारदो हंसयोगगतिम्‌ ।

प्रदर्श्य ह्ामुमामनत्रय सिद्धलोक॑ ततोडगमत्‌ ॥

८०॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; भागवत--भक्तों का; मुख्य:--प्रमुख; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; नारद:--नारद मुनि;हंसयो:--जीव तथा भगवान्‌ की; गतिम्‌ू--स्वाभाविक स्थिति; प्रदर्श--दिखला कर; हि--निश्चय ही; अमुम्‌--उस ( राजा )को; आमन््य--बुलाकर; सिद्ध-लोकम्‌--सिद्ध लोक को; ततः--तत्पश्चात्‌; अगमत्‌--चला गया।

मैत्रेय ऋषि ने कहा : महान्‌ सन्‍त तथा परम भक्त नारद ने इस प्रकार राजा प्राचीनबर्हि केसमक्ष भगवान्‌ तथा जीव की स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या प्रस्तुत की।

राजा को आमंत्रितकरते हुए नारद मुनि सिद्धलोक को वापस चले गये।

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प्राचीनब्ीं राजर्षि: प्रजासर्गाभिरक्षणे ।

आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम्‌ ॥

८१॥

प्राचीनबर्हि:--राजा प्राचीनबर्हि; राज-ऋषि:--साधु राजा; प्रजा-सर्ग--नागरिकों का समूह; अभिरक्षणे--रक्षा करने के लिए;आदिश्य--आदेश देकर; पुत्रानू--अपने पुत्रों को; अगमत्‌-- प्रस्थान किया; तपसे--तपस्या करने के लिए; कपिल-आश्रमम्‌-कपिलाश्रम नामक तीर्थ स्थल को |

अपने मंत्रियों की उपस्थिति में राजर्षि प्राच्चीनबर्हि ने अपने पुत्रों को नागरिकों की रक्षा करनेके लिए आदेश छोड़ा।

तब उन्होंने घर छोड़ दिया और तपस्या हेतु कपिलाश्रम नामक तीर्थस्थानके लिए प्रस्थान किया।

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तत्रैकाग्रमना धीरो गोविन्दचरणाम्बुजम्‌ ।

विमुक्तसड्रोनुभजन्भक्त्या तत्साम्यतामगात्‌ ॥

८२॥

तत्र--वहाँ; एक-अग्र-मना:--पूर्ण मनोयोग से; धीर:--गम्भीर; गोविन्द--कृष्ण के; चरण-अम्बुजम्‌--चरणकमलों की;विमुक्त--मुक्त होकर; सड्भ:-- भौतिक संगति; अनुभजन्‌--लगातार भक्ति में लगकर; भक्त्या--शुद्ध भक्ति से; ततू-- भगवान्‌के साथ; साम्यताम्‌--समता; अगातू--प्राप्त किया |

कपिलाश्रम में तपस्या करके राजा प्राचीनबर्हि ने समस्त भौतिक उपाधियों से पूर्ण मुक्तिप्राप्त कर ली।

वह भगवान्‌ की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर लगा रहा और गुणात्मक दृष्टि सेभगवान्‌ के ही समान आध्यात्मिक पद पर पहुँच गया।

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एतदथध्यात्मपारोक्ष्यं गीत॑ देवर्षिणानघ ।

यः श्रावयेद्य: श्रृणुयात्स लिड्रेन विमुच्यते ॥

८३॥

एतत्‌--यह; अध्यात्म--आध्यात्मिक; पारोक्ष्यमू-- प्रामाणिक विवरण; गीतम्‌--वर्णन किये गये; देव-ऋषिणा--देवर्षि नारदके द्वारा; अनघ--हे निष्पाप विदुर; यः--जो; श्रावयेतू--वर्णन कर सकता है; यः--जो; श्रूणुयात्‌--सुन सकता है; सः--वह;लिड्रेन--देहात्मबुद्धि से; विमुच्यते--छूट जाता है।

हे बिदुर, जो कोई जीव के आध्यात्मिक अस्तित्व को समझने से सम्बद्ध, नारद द्वारा कहेगये इस आख्यान को सुनता है या ऐसे अन्यों को सुनाता है, वह देहात्मबुद्धि की अवधारणा सेमुक्त हो जाएगा मुक्त हो जाएगा।

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एतन्मुकुन्दयशसा भुवन पुनानंदेवर्षिवर्यमुखनि:सृतमात्मशौचम्‌ ।

यः कीरत्यमानमधिगच्छति पारमेष्ठयंनास्मिन्भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्ध: ॥

८४॥

एतत्‌--यह आख्यान; मुकुन्द-यशसा-- भगवान्‌ कृष्ण की ख्याति से; भुवनम्‌--यह भौतिक जगत; पुनानम्‌-पतवित्र करनेवाला; देव-ऋषि--ऋषियों के; वर्य--प्रमुख; मुख--मुख से; निःसृतम्‌ू--निकला हुआ; आत्म-शौचम्‌--हृदय को पवित्र करनेवाला; यः--जो कोई; कीर्त्यमानम्‌--कीर्तन किया गया; अधिगच्छति--वापस जाता है; पारमेष्ठयमम्‌-- आध्यात्मिक जगत को;न--कभी नहीं; अस्मिन्‌ू--इसमें; भवे-- भौतिक जगत में; भ्रमति--घूमता है; मुक्त--मुक्त होकर; समस्त--सभी; बन्ध:--बन्धनों से |

नारद मुनि द्वारा उदबोधित यह आख्यान ( कथा ) भगवान्‌ की दिव्य ख्याति से पूर्ण है।

अतःजब इस आख्यान का वर्णन किया जाता है, तो वह इस भौतिक जगत को पवित्र कर देता है।

वह जीव के हृदय को पवित्र करता है और उसे आध्यात्मिक स्वरूप प्राप्त करने में सहायक होताहै।

जो कोई इस दिव्य आख्यान को सुनाता है, वह समस्त भौतिक बन्धनों से मुक्त हो जाएगाऔर उसे इस भौतिक जगत में भटकना नहीं पड़ेगा।

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अध्यात्मपारोक्ष्यमिदं मयाधिगतमद्भुतम्‌ ।

एवं स्त्रियाश्रम: पुंसश्छन्नोमुत्र च संशय: ॥

८५॥

अध्यात्म--आध्यात्मिक; पारोक्ष्यमू-- अधिकारी द्वारा वर्णित; इृदम्‌--यह; मया--मेरे द्वारा; अधिगतम्‌--सुना हुआ; अद्भुतम्‌--आश्चर्यजनक; एवम्‌--इस प्रकार; स्त्रिया--स्त्री के साथ; आश्रम:--शरण; पुंसः--जीव का; छिन्न:--मिट जाता है; अमुत्र--अगले जन्म के विषय में; च-- भी; संशय: --सन्देह |

यहाँ पर अधिकार पूर्वक वर्णित राजा पुरझ्न का रूपक मैंने अपने गुरु से सुना था।

यहअध्यात्मिक ज्ञान से पूर्ण है।

यदि कोई इस रूपक के उद्देश्य को समझ ले तो वह निश्चय हीदेहात्मबुद्धि से छुटकारा पा जाएगा और मृत्यु के पश्चात्‌ जीवन को ठीक से समझ सकेगा।

यदिवह आत्मा के देहान्तर को ठीक से न समझ पाये तो वह इस आख्यान को पढ़कर उसे अच्छीतरह समझ सकता है।

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