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अध्याय सत्ताईस: राजा पुरंजन के शहर पर कैंडवेगा द्वारा हमला; कालकन्या का चरित्र

4.27श़नारद उबाचइत्थं पुरझ्ननं सयग्वशमानीय विश्रमै: ।

पुरञ्ञनी महाराज रेमे रमयती पतिम्‌ ॥

१॥

नारदः उवाच--नारद ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार; पुरञ्ञनम्‌--राजा पुरज्ञन को; सयक्‌--पूर्णतया; वशमानीय--अपने वश मेंकरके; विश्रमैः--अपने आकर्षण से; पुरझनी--राजा पुरञ्जन की पत्नी ने; महा-राज--हे राजा; रेमे-- भोग किया; रमयती--समस्त तुष्टि प्रदान करती; पतिम्‌--अपने पति को

महर्षि नारद ने आगे कहा : हे राजन, अनेक प्रकार से अपने पति को मोहित करके अपनेवश में करती हुईं राजा पुरञ्नन की पत्नी उसे सारा आनन्द प्रदान करने लगी और उसके साथविषयी जीवन व्यतीत करने लगी।

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श़स राजा महिषीं राजन्सुस्नातां रचिराननाम्‌ ।

कृतस्वस्त्ययनां तृप्ताम भ्यनन्ददुपागताम्‌ ॥

२॥

सः--उस; राजा--राजा ने; महिषीम्‌--रानी को; राजनू--हे राजा; सु-स्नातामू-- अच्छी तरह नहाई हुई; रुचिर-आननाम्‌--आकर्षक मुख वाली; कृत-स्वस्ति-अयनाम्‌ू--शुभ वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित; तृप्तामू--तृप्त; अभ्यनन्दत्‌--स्वागतकिया; उपागतामू--पास जाकर।

रानी ने स्नान किया और शुभ वबन्त्रों तथा आभूषणों से अपने को सुसज्जित किया।

भोजनकरने तथा परम संतुष्ट होने के बाद वह राजा के पास आई।

उस अत्यन्त सुसज्जित तथा आकर्षकमुख वाली को देखकर राजा ने उसका तन्मयता अभिनन्दन किया।

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'तयोपगूढः परिरब्धकन्धरोरहोउनुमन्त्रैरपकृष्टचेतन: ।

न कालरंहो बुबुधे दुरत्ययंदिवा निशेति प्रमदापरिग्रह: ॥

३॥

तया--रानी के द्वारा; उपगूढः-- आलिंगन किया; परिरब्ध--आलिंगित; कन्धर:--कं थे; रह: --एकान्त में; अनुमन्त्रै:--विनोदपूर्वक; अपकृष्ट-चेतन: -- चेतना को नीचे गिराकर; न--नहीं; काल-रंह:ः--समय बीतने के साथ; बुबुधे--ज्ञान था;दुरत्ययम्‌--जीतना असम्भव; दिवा--दिन; निशा--रात्रि; इति--इस प्रकार; प्रमदा--स्त्री द्वारा; परिग्रह:--मोहित |

रानी पुरझ्ननी ने राजा का आलिंगन किया और राजा ने भी उसे बाहों में भर लिया।

इस शप्रकार एकान्त में वे विनोद करते रहे और राजा पुरञ्जन अपनी सुन्दर स्त्री पर इतना मोहित रहनेलगा कि उसे अच्छे-बुरे का विचार न रहा।

वह भूल गया कि रात तथा दिन बीतने का अर्थ हैव्यर्थ ही आयु का घटते जाना।

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श़शयान उन्नद्धमदो महामनामहाईतल्पे महिषीभुजोपधि: ।

तामेव वीरो मनुते परं यत-स्तमोभिभूतो न निजं परं च यत्‌ ॥

४॥

शयानः:--लेटा हुआ; उन्नद्ध-मदः --अत्यधिक मोहग्रस्त; महा-मना:--मनस्वी; महा-अर्ह-तल्पे--बहुमूल्य शय्या पर; महिषी--रानी की; भुज--बाँहें; उपधि:--तकिया; तामू--उसको; एव--निश्चय ही; वीर:--वीर; मनुते--उसने मान लिया था; परम्‌ू--जीवन लक्ष्य; यत:ः--जिससे; तम:--अज्ञान से; अभिभूत:--आवृत; न--नहीं; निजम्‌-- अपना; परम्‌--पर मे श्वर; च--तथा;यत्‌--जो

इस प्रकार अत्यधिक मोहग्रस्त होने से मनस्वी होते हुए भी राजा पुरज्लन अपनी पत्नी कीभुजाओं के तकिये पर अपना सिर रखे सदैव लेटा रहता था।

इस प्रकार वह उस रमणी को हीअपने जीवन का सर्वस्व मानने लगा।

अज्ञान के आवरण से ढका होने के कारण उसे आत्म-साक्षात्कार का स्वयं का अथवा भगवान्‌ का कोई ज्ञान न रहा।

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श़तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतस: ॥

क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः ॥

५॥

तया--उसके साथ; एवम्‌--इस प्रकार; रममाणस्य--रमण करते हुए; काम--काम से पूर्ण; कश्मल--पापपूर्ण; चेतस: --उसका हृदय; क्षण-अर्धम्‌-- आधे क्षण में; इब--सहृश; राज-इन्द्र--हे राजा; व्यतिक्रान्तम्‌ू--बीत गया; नवम्‌--नया; वय:--वायु, जीवन

हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌, इस प्रकार राजा पुरञ्नन काम तथा पापमय कर्मफलों से पूरित हृदयसे अपनी पत्नी के साथ भोग-विलास करने लगा और इस तरह आधे ही क्षण में उनका नवजीवन तथा युवावस्था बीत गयी।

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श़तस्यामजनयत्पुत्रान्पुरञ्जन्यां पुरख्ननः ।

शतान्येकादश विराडायुषो<र्धमथात्यगात्‌ ॥

६॥

तस्याम्‌--उस; अजनयतू-उत्पन्न किये; पुत्रानू-पुत्र; पुरञ्चन्याम्‌-पुरञ्ञनी से; पुरकझ्नन:--राजा पुरज्ञन ने; शतानि--सौ;एकादश --ग्यारह; विराट्‌--हे राजा; आयुष: --जीवन का; अर्धम्‌--आधा; अथ--इस तरह; अत्यगात्‌--उसने व्यतीत किया।

तब नारद मुनि ने राजा प्राचीनबर्हिषत्‌ को सम्बोधित करते हुए कहा : हे विराट, इस प्रकारराजा पुरक्षन के अपनी पतली पुरञ्जनी के गर्भ से १,९०० पुत्र उत्पन्न हुए।

किन्तु इस कार्य मेंउसका आधा जीवन व्यतीत हो गया।

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श़दुहितृर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः ।

शीलौदार्यगुणोपेता: पौरज्जन्य: प्रजापते ॥

७॥

श़दुहितृः--कन्याएँ; दश-उत्तर--दस अधिक; शतम्‌--एक सौ; पितृ--पिता; मातृ--तथा माता के समान; यशस्करी:--यशस्वी;शील--उत्तम आचरण; औदार्य--उदारता; गुण--गुण; उपेता:ः--से युक्त; पौरञ्न्य:--पुरञ्ञन की कन्याएँ; प्रजा-पते--हेप्रजापति!

हे प्रजापति राजा प्राचीनबर्हिषत्‌ू, इस तरह राजा पुरक्षन के ११० कन्याएँ भी उत्पन्न हुईं।

येसब-की-सब अपने पिता तथा माता के समान यशस्विनी थी; उनका आचरण भद्र था, ये उदारथीं और अन्य उत्तम गुणों से युक्त थीं।

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स पशञ्ञालपतिः पुत्रान्पितृवंशविवर्धनान्‌ ।

दारैः संयोजयामास दुहितृः सहशैवरै: ॥

८॥

श़सः--वह; पश्ञाल-पतिः--पश्ञाल का राजा; पुत्रानू--पुत्र; पितृ-वंश--पिता का वंश; विवर्धनान्‌--बढ़ाते हुए; दारैः--पत्लियोंसहित; संयोजयाम्‌ आस--विवाह किया; दुहितृ:--कन्याएँ; सहशैः --योग्य; वरैः--पतियों के साथ

तत्पश्चात्‌ पञ्ञाल देश के राजा पुरञ्जन ने अपने पैतृक कुल की वृद्धि के लिए अपने पुत्रों काविवाह योग्य वधुओं के साथ और अपनी कन्याओं का विवाह योग्य वरों के साथ कर दिया।

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पुत्राणां चाभवन्पुत्रा एकेकस्य शतं शतम्‌ ।

यैर्वें पौरझनो वंश: पञ्ञालेषु समेधित: ॥

९॥

पुत्राणामू--पुत्रों के; च-- भी; अभवन्‌ --उत्पन्न हुए; पुत्रा:--पुत्र; एक-एकस्य- प्रत्येक के; शतम्‌ू--एक सौ; शतम्‌--सौ;यैः--जिनसे; वै--निश्चय ही; पौरञ्नन:--राजा पुरझ्ञन का; वंश:--वंश; पञ्चालेषु--पंचाल देश में; समेधित:--फैल गया।

इन अनेक पुत्रों में से प्रत्येक के कई सौ पुत्र उत्पन्न हुए।

इस प्रकार राजा पुरज्ञन के पुत्रों तथा पौत्रों से सारा पंचाल देश भर गया।

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श़तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहकोशानुजीविषु ।

निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥

१०॥

तेषु--उनमें; तत्‌-रिक्थ-हारेषु--इस धन के लुटेरे; गृह--घर; कोश--खजाना; अनुजीविषु--सेवकों के लिए; निरूढेन--गहरी; ममत्वेन--आसक्ति से; विषयेषु--विषयों में; अन्वबध्यत--बद्ध हो गया।

ये पुत्र तथा पौत्र एक प्रकार से पुरञ्न के घर, खजाना, नौकर, सचिव एवं दूसरे सारे साज-सामान समेत सारी धन-सम्पदा को लूटने वाले थे तथा अन्य साज-सामान सारी धन सम्पदा कोलूटने वाले थे।

राजा पुरञ्जन का इन वस्तुओं से प्रगाढ़ सम्बन्ध था।

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श़ईजे च क्रतुभिर्षोरर्दीक्षित: पशुमारकै: ।

देवान्पितृन्भूतपतीन्नानाकामो यथा भवान्‌ ॥

११॥

ईजे--पूजा की; च--भी ; क्रतुभिः--यज्ञों से; घोरैः--नृशंस; दीक्षितः--प्रोत्साहित होकर; पशु-मारकै:--जिसमें पशुओं कावध किया जाता है; देवानू--देवतागण; पितृन्‌--पूर्वज, पुरखे; भूत-पतीन्‌--मानव समाज के बड़े-बड़े नेता; नाना--विविध;काम:--इच्छाओं से युक्त; यथा--जिस प्रकार; भवान्‌--तुम |

नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌, तुम्हारी ही तरह राजा पुरक्ञषन भी अनेकइच्छाओं में उलझा हुआ।

इसलिए उसने देवताओं, पितरों तथा सामाजिक नेताओं की पूजाविविध यज्ञों द्वारा की, किन्तु ये सारे यज्ञ नृशंस थे, क्योंकि उनके पीछे पशुओं के वध कीभावना काम कर रही थी।

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श़युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतस: ।

आससाद स वै कालो योउप्रिय: प्रिययोषिताम्‌ ॥

१२॥

युक्तेषु--उपयोगी कर्मों में; एवम्‌--इस प्रकार; प्रमत्तस्य--असावधान रहकर; कुटुम्ब--परिवार के प्रति; आसक्त--अनुरक्त;चेतस:--चेतना; आससाद--आ गया; सः--वह; वै--निश्चय ही; काल: --मृत्यु, समय; यः--जो; अप्रिय:--अच्छा न लगनेवाला; प्रिय-योषिताम्‌--जो पुरुष स्त्रियों में अनुरक्त रहते हैंउनके लिए

इस प्रकार राजा पुरज्जन कर्मकाण्ड में तथा अपने परिवार के प्रति अनुरक्त रहकर और दूषितचेतना होने से अन्ततः ऐसे बिन्दु पर पहुँच गया जिसे भौतिक वस्तुओं में बुरी तरह अनुरक्त लोगबिल्कुल नहीं चाहते।

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श़चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिनूप ।

गन्धर्वास्तस्थ बलिन: पषष्टयुत्तरशतत्रयम्‌ ॥

१३॥

चण्डवेग:--चण्डवेग; इति--इस प्रकार; ख्यात:ः--विख्यात; गन्धर्व--गन्धर्वलोक का वासी; अधिपतिः--राजा; नृप--हेराजा; गन्धर्वा:--अन्य गन्धर्व; तस्थ--उसके; बलिन:--अत्यन्त बलशाली सैनिक; षष्टि--साठ; उत्तर--अधिक; शत--सौ;त्रयमू--तीन |

हे राजन, गन्धर्वलोक में चण्डवेग नाम का एक राजा है।

उसके अधीन ३६० अत्यन्तशक्तिशाली गन्धर्व सैनिक हैं।

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श़गन्धर्व्यस्ताइशीरस्य मैथुन्यश्व सितासिता: ।

परिवृत्त्या विलुम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम्‌ ॥

१४॥

गन्धर्व्य:--गन्धर्विनियाँ; ताहशी:--उसी प्रकार; अस्य--चण्डवेग की; मैथुन्य:--मिथुन की संगिनी; च-- भी; सित-- श्वेत;असिता:--श्याम; परिवृत्त्या--घेरे हुए; विलुम्पन्ति--लूटती हैं; सर्व-काम--सभी प्रकार की इच्छित वस्तुएँ; विनिर्मितामू--बनीहुईचण्ड

वेग के साथ-साथ गंधर्विनियों की संख्या सैनिकों के ही समान थी और वे बारम्बारइन्द्रियसुख की सारी सामग्री लूट रही थीं।

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श़ते चण्डवेगानुचरा: पुरझ्जनपुरं यदा ।

हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत्प्रजागर: ॥

१५॥

ते--वे सब; चण्डवेग--चण्डवेग के; अनुचरा:--सेवक; पुरझ्ञन--राजा पुरज्जन की; पुरम्‌--पुरी, शहर को; यदा--जब;हर्तुमू--लूटना; आरेभिरे-- प्रारम्भ किया; तत्र--वहाँ; प्रत्यषेधत्‌--रक्षा किया; प्रजागर: --बड़े सर्प ने।

जब राजा गन्धर्वराज ( चण्डवेग ) तथा उसके सेवक पुरञ्नन की नगरी को लूटने लगे तोपाँच फनों वाले एक सर्प ने नगरी की रखवाली करनी शुरू कर दी।

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श़स सप्तभि: शतैरेको विंशत्या च शतं समा: ।

पुरञ्ञनपुराध्यक्षो गन्धरवैर्युयुधे बली ॥

१६॥

सः--वह; सप्तभि:--सात; शतैः --सौ से; एक:ः--अकेले; विंशत्या--बीस सहित; च-- भी; शतम्‌--सौ; समा:--वर्ष;पुरझ्षन--राजा पुरज्न का; पुर-अध्यक्ष:--नगर की रखवाली करने वाला; गन्धर्वै: --गन्धर्वों से; युयुधे--युद्ध किया; बली--अत्यन्त वीर।

वह पाँच फनों वाला सर्प, जो राजा पुरझन की पुरी का रक्षक था, गन्धर्वों से एक सौ वर्षोतक लड़ता रहा।

वह उनसे अकेला ही लड़ा यद्यपि उनकी संख्या ७२० थी।

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क्षीयमाणे स्वसम्बन्धे एकस्मिन्बहुभिर्युधा ।

श़चिन्तां परां जगामार्तः सराष्ट्रपुरबान्धव: ॥

१७॥

क्षीयमाणे--कमजोर पड़ने पर; स्व-सम्बन्धे--उसके अभिन्न मित्र; एकस्मिन्‌ू--अकेला; बहुभि: --अनेक वीरों के साथ;युधा--युद्ध द्वारा; चिन्तामू--चिन्ता; पराम्‌ू--अत्यधिक, परम; जगाम--प्राप्त किया; आर्त:--दुखी होकर; स--सहित; राष्ट्र--राज्य के; पुर--नगरी के; बान्धवः--मित्र तथा सम्बन्धी |

चूँकि उसे अकेले इतने सैनिकों से लड़ना था, जो सारे के सारे महावीर थे, अतः पाँच फनोंवाला सर्प क्षीण पड़ने लगा।

यह देखकर कि उसका अभिन्न मित्र क्षीण पड़ रहा है, राजा पुरञ्ननतथा उस नगरी में रहने वाले उसके सारे मित्र तथा नागरिक अत्यन्त चिन्तित हो उठे।

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स एव पुर्या मधुभुक्‍्पञ्ञालेषु स्वपार्षदैः ।

उपनीतं बलि गृहन्सत्रीजितो नाविदद्धयम्‌ ॥

१८ ॥

श़सः--वह; एव--निश्चय ही; पुर्यामू--नगरी के भीतर; मधु-भुक्‌ू--विषयी जीवन भोगते हुए; पञ्ञालेषु-- अपने राज्य पद्ञाल में( पाँच विषय ); स्व-पार्षदैः --अपने पार्षदों सहित; उपनीतमू--लाया जाकर; बलिम्‌ू--कर; गृहन्‌--स्वीकार करके; स्त्री-जितः-स्त्रियों के वश में हुआ; न--नहीं; अविदत्‌--समझ सका; भयम्‌--मृत्यु भय को |

राजा पुरक्षन पञ्ञाल नामक नगरी से कर एकत्र करता और विषय-भोग में लगा रहता।

स्त्रियों के पूरी तरह वश में होने से वह समझ ही नहीं पाया कि उसका जीवन बीता जा रहा हैऔर वह मृत्यु के निकट पहुँच रहा है।

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किकालस्य दुहिता काचित्व्रिलोकीं वरमिच्छती ।

पर्यटन्ती न बर्दिष्मन्प्रत्यनन्दर कश्चन ॥

१९॥

कालस्य--काल की; दुहिता--कन्या, पुत्री; काचित्‌ू--कोई ; त्रि-लोकीम्‌--तीनों लोकों में; वरम्‌--पति; इच्छती --कीआंकाक्षा से; पर्यटन्ती--सारे संसार में घूमती हुई; न--कभी नहीं; बर्हिष्मन्‌--हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌; प्रत्यनन्दत--प्रस्तावस्वीकार कर लिया; कश्चन--कोई |

हे राजा प्राचीनबर्हिषतू, इसी समय काल की कन्या तीनों लोकों में पति की खोज कर रही थी।

यद्यपि उसे ग्रहण करने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ, किन्तु वह घूमती रही।

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दौर्भाग्येनात्मनो लोके विश्रुता दुर्भगेति सा ।

या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात्पूरवे वरम्‌ ॥

२०॥

दौर्भाग्येन--दुर्भाग्य से; आत्मन:--अपने आप; लोके--संसार में; विश्रुता--विख्यात; दुर्भगा--अत्यन्त भाग्यहीन; इति--इसप्रकार; सा--वह; या--जो; तुष्टा--संन्तुष्ट होकर; राज-ऋषये --महान्‌ राजा को; तु--लेकिन; वृता--स्वीकार होकर;अदातू--दे दिया; पूरवे--राजा पूरु को; वरमू--वर।

काल की कन्या ( जरा ) बड़ी अभागिन थी।

फलतः लोग उसे दुर्भगा कहते थे।

किन्तु एकबार वह एक महानू्‌ राजा पर प्रसन्न हो गई और चूँकि राजा ने उसे स्वीकार कर लिया था,इसलिए उसने उसे वरदान दिया।

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श़कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम्‌ ।

वद्रे बृहदव्तं मां तु जानती काममोहिता ॥

२१॥

कदाचित्‌--एक बार; अटमाना--घूमती हुई; सा--वह; ब्रह्मगलोकात्‌ू--ब्रह्मलोक से; महीम्‌--पृथ्वी पर; गतम्‌--आ कर;बब्रे-- प्रस्ताव रखा; बृहत्‌-ब्रतम्‌--नैष्ठिक ब्रह्मचारी; माम्‌--मुझको; तु--तब; जानती--जानते हुए; काम-मोहिता--कामासक्त

एक बार जब मैं सर्वोच्च लोक, ब्रहलोक से इस पृथ्वी पर आ रहा था, तो संसार भर काभ्रमण करते हुए काल की कन्या से मेरी भेंट हुई।

वह मुझे नैप्ठिक ब्रह्माचारी जान कर मुझपरअत्यन्त कामातुर हो गई और उसने प्रस्ताव रखा कि मैं उसे अपना लूँ।

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मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदु:सहम्‌ ।

श़स्थातुमहसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने ॥

२२॥

मयि--मुझको; संरभ्य--कुद्ध होकर; विपुल--अपार; मदातू--मोहवश; शापम्‌--शाप; सु-दुःसहम्‌--असहनीय; स्थातुम्‌अहसि--रुकना चाहोगे; न--कभी नहीं; एकत्र--एक स्थान में; मत्‌--मेरी; याच्ञा--याचना; विमुख:--नकार कर; मुने--हेमुनि

महर्षि नारद ने आगे कहा : जब मैंने उसकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी तो वह मुझपर अत्यन्तक्रुद्ध हुई और मुझे घोर शाप देने लगी।

चूँकि मैंने उसकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी थी, अतःउसने कहा कि तुम किसी एक स्थान पर अधिक काल तक टिक नहीं सकोगे।

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ततो विहतसड्डूल्पा कन्यका यवनेश्वरम्‌ ।

मयोपदिष्टमासाद्य वब्रे नाम्ना भयं पतिम्‌ ॥

२३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; विहत-सड्जडल्पा--निराश होकर; कन्यका--काल की कन्या; यवन-ईश्वरम्‌-- अछूतों के राजा को; मयाउपदिष्टम्‌-मेरे द्वारा सूचित; आसाद्य--पास आकर; वद्रे--स्वीकार कर लिया; नाम्ना--नामक; भयम्‌-- भय; पतिम्‌--पतिरूप में

इस प्रकार जब वह मेरी ओर से निराश हो गई तो मेरी अनुमति से वह यवनों के राजा केपास गई जिसका नाम भय था और उसे ही अपने पति रूप में स्वीकार कर लिया।

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श़ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम्‌ ।

सड्डूल्पस्त्वयि भूतानां कृत: किल न रिष्यति ॥

२४॥

ऋषभम्‌-- श्रेष्ठ; यवनानाम्‌--अछूतों में; त्वाम्‌ू--तुमको; वृणे--मैं स्वीकार करती हूँ; बीर--हे वीर; ईप्सितम्‌ू--वांछित;पतिम्‌ू--पति; सट्डूल्प:--हृढ़ निश्चय; त्वयि--तुमको; भूतानाम्‌ू--समस्त जीवों का; कृत:--यदि किया गया; किल--निश्चयही; न--कभी नहीं; रिष्यति--विफल नहीं होता ।

यवनों के राजा के पास पहुँचकर काल-कन्या ने उसे वीर रूप में सम्बोधित करते हुएकहा : महाशय, आप अछूतों में श्रेष्ठ हैं।

मैं आपको प्रेम करती हूँ और आपको पति रूप में ग्रहणकरना चाहती हूँ।

मैं जानती हूँ कि यदि कोई आपसे दोस्ती करता है, तो वह निराश नहीं होता।

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श़द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।

यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति ॥

२५॥

द्वौ--दो प्रकार के; इमौ--ये; अनुशोचन्ति--पश्चात्ताप करते हैं; बालौ--अज्ञानी; असत्‌--मूर्ख; अवग्रहौ--पथ का अनुसरणकरते हुए; यत्‌ू--जो; लोक--प्रथानुसार; शास्त्र--शास्त्रों के अनुसार; उपनतम्‌--प्रस्तुत; न--कभी नहीं; राति--पालन करताहै; न--कभी नहीं; तत्‌--वह; इच्छति--इच्छा करता है।

जो लोकरीति के अनुसार अथवा शास्त्रों के आदेशानुसार दान नहीं देता और जो इस प्रकारके दान का ग्रहण नहीं करता, उन दोनों को ही तमोगुणी समझना चाहिए।

ऐसे लोग मूर्खो केपथ का अनुसरण करते हैं।

निश्चित ही उन्हें अन्त में पछताना पड़ता है।

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श़अथो भजस्व मां भद्र भजन्तीं मे दयां कुरु ।

एतावान्पौरुषो धर्मो यदार्ताननुकम्पते ॥

२६॥

अथो--अतः:; भजस्व--स्वीकार करो; माम्‌--मुझको; भद्ग--हे महाशय; भजन्तीम्‌--सेवा करने के लिए इच्छुक; मे--मुझको; दयाम्‌--दया; कुरू--करो; एतावान्‌--इस तरह के; पौरुष:--किसी पुरुष के लिए; धर्म:--धर्म; यत्‌--वह;आर्तानू--आर्त को; अनुकम्पते--दयालु है।

काल कन्या ने आगे कहा: हे भद्ग, मैं आपकी सेवा के लिए उपस्थित हूँ।

कृपया मुझेस्वीकार करके मेरे ऊपर दया करें।

पुरुष का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि दुखी व्यक्ति परअनुकम्पा करे।

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कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वर: ।

चिकीर्षुदेवगुह्मं स सस्मितं तामभाषत ॥

२७॥

काल-कन्या--काल की पुत्री द्वारा; उदित--कहे गये; वच:--शब्द; निशम्य--सुनकर; यवन-ईश्वर: --यवनों का राजा;चिकीर्षु;:--पालन करने की इच्छा से; देव--विधाता का; गुहाम्‌--गुप्त कार्य; सः--उसने; स-स्मितम्‌--हँसते हुए; तामू--उसको; अभाषत--सम्बोधित किया

श़कालकन्या का कथन सुनकर यवनराज हँसने लगा और विधाता का गुप्त कार्य पूरा करनेकी युक्ति खोजने लगा।

तब उसने काल-कन्या को इस प्रकार सम्बोधित किया।

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मया निरूपितस्तुभ्यं पतिरात्मसमाधिना ।

नाभिनन्दति लोकोयं त्वामभद्रामसम्मताम्‌ ॥

२८ ॥

श़मया--मेरे द्वारा; निरूपित:--निश्चित किया गया; तुभ्यम्‌ू--तुम्हारे लिए; पति: --पति; आत्म--मन के; समाधिना-- ध्यान से;न--कभी नहीं; अभिनन्दति--स्वागत है; लोक:--लोग; अयम्‌--ये; त्वामू--तुमको; अभद्रामू-- अशुभ; असम्मताम्‌--अस्वीकार्य |

यवनराज ने उत्तर दिया: मैंने बहुत सोच-विचार के बाद तुम्हारे लिए एक पति निश्चित कियाहै।

वास्तव में सबों की दृष्टि में तुम अशुभ तथा उत्पाती हो।

चूँकि तुम्हें कोई भी पसन्द नहींकरता, अतः तुम्हें कोई पत्नी रूप में कैसे स्वीकार कर सकता है ?"

त्वमव्यक्तगतिर्भुड्क्ष्व लोक॑ कर्मविनिर्मितम्‌ ।

या हि मे पृतनायुक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि ॥

२९॥

त्वमू--तुम; अव्यक्त-गति:--जिसकी गति अलक्षित हो; भुड्क्व-- भोग करो; लोकम्‌--यह संसार; कर्म-विनिर्मितम्‌-- सकामकर्मों द्वारा निर्मित; या--जो; हि--निश्चय ही; मे--मेरा; पृतना--सैनिक की; युक्ता--सहायता से ; प्रजा-नाशम्‌--जीवों कासंहार; प्रणेष्यसि--बिना बाधा के कर सकोगी।

यह संसार सकाम कर्मों का प्रतिफल है।

अतः तुम सभी लोगों पर अलक्षित रह करआक्रमण कर सकती हो।

मेरे सैनिकों के बल की सहायता से तुम बिना किसी विरोध के उनकासंहार कर सकती हो।

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श़प्रज्वारोयं मम भ्राता त्वं च मे भगिनी भव ।

चराम्युभाभ्यां लोकेउस्मिन्नव्यक्तो भीमसैनिक: ॥

३०॥

प्रज्वार: -- प्रज्यार नामक; अयम्‌--यह; मम--मेरा; भ्राता-- भाई; त्वम्‌ू--तुम; च-- भी; मे--मेरी; भगिनी-- बहिन; भव--बनजाओ; चरामि--मैं विचरण करूँगा; उभाभ्याम्‌--तुम दोनों के द्वारा; लोके--संसार में; अस्मिन्‌ू--इस; अव्यक्त:--अप्रकट;भीम--भयंकर; सैनिक:--सैनिकों सहित।

यवनराज ने कहा : यह मेरा भाई प्रज्वार है।

तुम्हें में अपनी बहिन के रूप में स्वीकार करताहूँ।

मैं तुम दोनों का तथा अपने भयंकर सैनिकों का उपयोग इस संसार के भीतर अदृश्य रूप सेकरूँगा।

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