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अध्याय चौबीस: भगवान शिव द्वारा गाए गए गीत का जाप
4.24मैत्रेय उवाचविजिताश्रोधिराजासीत्पृथुपुत्र: पृथुअ्रवा:।
यवीयोभ्योददात्काष्टा भ्रातृभ्यो भ्रातृवत्सल: ॥
१॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; विजिताश्चव:--विजिताश्व नाम का; अधिराजा--सम्राट; आसीत्--हुआ; पृथु-पुत्र:--महाराज पृथुका पुत्र; पृथु- भ्रवा:--महान् कार्यों का; यवीयोभ्य:--छोटे भाइयों को; अददात्--दे दिया; काष्ठा:--विभिन्न दिशाएँ;भ्रातृभ्य:-- भाइयों को; भ्रातृ-वत्सल:ः-- भाइयों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल।
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : महाराज पृथु का सबसे बड़ा पुत्र विजिताश्च, जिसकी ख्यातिअपने पिता की ही तरह थी, राजा बना और उसने अपने छोटे भाइयों को पृथ्वी की विभिन्नदिशाओं पर राज्य करने का अधिकार सौंप दिया, क्योंकि वह अपने भाइयों को अत्यधिकचाहता था।
"
हर्यक्षायादिशत्प्राचीं धूप्रकेशाय दक्षिणाम् ।
प्रतीचीं वृकसंज्ञाय तुर्या द्रविणसे विभु; ॥
२॥
हर्यक्षाय--हर्यक्ष को; अदिशत्-- प्रदान किया; प्राचीम्--पूर्व दिशा; धूप्रकेशाय--धूप्रकेश को; दक्षिणाम्--दक्षिण दिशा;प्रतीचीम्--पश्चिम दिशा; वृक-संज्ञाय--वृक नामक भाई को; तुर्याम्--उत्तर दिशा; द्रविणसे--द्रविण को; विभुः--स्वामी |
महाराज विजिताश्व ने संसार का पूर्वी भाग अपने भाई हर्यक्ष को, दक्षिणी भाग धूप्रकेशको, पश्चिमी भाग वृक को तथा उत्तरी भाग द्रविण को प्रदान किया।
"
अन्तर्धानगतिं शक्राल्लब्ध्वान्तर्धानसंज्ञित: ।
अपत्यत्रयमाधत्त शिखण्डिन्यां सुसम्मतम् ॥
३॥
अन्तर्धान--विलुप्त होने की; गतिम्--शक्ति; शक्रात्--इन्द्र से; लब्ध्वा--पाकर; अन्तर्धान--अन्तर्धान; संज्ञित:--नाम पड़ा;अपत्य--संतानें; त्रयमू--तीन; आधत्त--उत्पन्न कीं; शिखण्डिन्याम्ू--अपनी पत्नी शिखण्डिनी से; सु-सम्मतम्--सबों द्वाराअनुमत।
पूर्वकाल में महाराज विजिताश्व ने स्वर्ग के राजा इन्द्र को प्रसन्न करके उनसे अन्तर्धान कीपदवी प्राप्त की थी।
उनकी पत्ती का नाम शिखण्डिनी था जिससे उन्हें तीन उत्तम पुत्र हुए।
"
'पावक: पवमानश्च शुचिरित्यग्नय: पुरा ।
वसिष्ठशापादुत्पन्ना: पुनर्योगगतिं गता: ॥
४॥
पावक:--पावक नामक; पवमान: --पवमान नामक; च--भी; शुच्रिः --शुचि नामक ; इति--इस प्रकार; अग्नय:--अग्निदेव;पुरा--प्राचीन काल में; वसिष्ठ--वसिष्ठ मुनि; शापात्--शाप से; उत्पन्ना:--अब उत्पन्न; पुन:--फिर से; योग-गतिम्--योगाभ्यास का पद; गता:--प्राप्त किया |
महाराज अन्तर्धान के तीनों पुत्रों के नाम थे पावक, पवमान तथा शुचि।
पूर्वकाल में ये तीनोंव्यक्ति अग्निदेव थे, परन्तु वसिष्ठ ऋषि के शाप से वे महाराज अन्तर्धान के पुत्रों के रूप में उत्पन्नहुए; फलतः वे अग्निदेवों के ही समान शक्तिमान थे और फिर से अग्निदेवों के रूप में स्थित होनेके कारण उन्होंने योगशक्ति का पद प्राप्त किया।
"
अन्तर्धानो नभस्वत्यां हविर्धानमविन्दत ।
य इन्द्रमश्वहर्तारं विद्वानपि न जध्निवान् ॥
५॥
अन्तर्धान: --अन्तर्धान राजा; नभस्वत्याम्-- अपनी पत्नी नभस्वती से; हविर्धानम्--हविर्धान नामक; अविन्दत--प्राप्त किया;यः--जो; इन्द्रमू--राजा इन्द्र को; अश्व-हर्तारम्--जो उसके पिता का घोड़ा चुरा रहा था; विद्वान अपि--जानते हुए भी; नजध्निवान्--नहीं मारा।
महाराज अन्तर्धान के नभस्वती नामक एक दूसरी पत्नी थी जिससे उन्हें हविर्धान नामक एकअन्य पुत्र की प्राप्ति हुईं।
चूँकि महाराज अन्तर्धान अत्यन्त उदार थे, अतः उन्होंने यज्ञ से अपनेपिता के घोड़े को चुराते हुए इन्द्रदेव को मारा नहीं।
"
राज्ञां वृत्ति करादानदण्डशुल्कादिदारुणाम् ।
मन्यमानो दीर्घसत्नरव्याजेन विससर्ज ह ॥
६॥
राज्ञामू--राजाओं की; वृत्तिमू--जीविका का साधन; कर--लगान, टैक्स; आदान--वसूली; दण्ड--दण्ड; शुल्क --अर्थ-दण्ड; आदि--इत्यादि; दारुणाम्--अत्यन्त कष्टप्रद; मन्यमान: --मानते हुए; दीर्घ--लम्बा; सत्त्र--यज्ञ; व्याजेन--बहाने से;विससर्ज--त्याग दिया; ह-- प्राचीन काल में।
जब भी परम शक्तिशाली अतन्तर्धान को प्रजा से कर लेना, प्रजा को दण्ड देना या उस परकठोर जुर्माना लगाना होता तो ऐसा करने को उनका जी नहीं चाहता था।
फलतः उन्होंने ऐसेकार्यो से मुख मोड़ लिया और वे विभिन्न प्रकार के यज्ञ सम्पन्न करने में व्यस्त रहने लगे।
"
तत्रापि हंसं पुरुषं परमात्मानमात्महक् ।
यजंस्तल्लोकतामाप कुशलेन समाधिना ॥
७॥
तत्र अपि--अपनी व्यस्तता के बावजूद; हंसम्ू--जो अपने सम्बन्धियों के कष्ट को दूर करता है; पुरुषम्--परम पुरुष को; परम-आत्मानम्--परम प्रिय परमात्मा; आत्म-हक्--जिसने आत्म-साक्षात्कार प्राप्त कर लिया है; यजन्--पूजा द्वारा; ततू-लोकताम्--उसी लोक को; आप--प्राप्त किया; कुशलेन--सरलतापूर्वक; समाधिना--समाधि में लीन रह कर।
यद्यपि महाराज अत्तर्धान यज्ञ करने में व्यस्त रहते थे, किन्तु स्वरूपसिद्ध व्यक्ति होने के नातेवे भक्तों के समस्त भय को दूर करने वाले भगवान् की भक्ति भी करते रहे।
इस प्रकार भगवान्की पूजा करते हुए महाराज अन्तर्धान समाधि में लीन रह कर सरलतापूर्वक भगवान् के ही लोकको प्राप्त हुए।
"
हविर्धानाद्धविर्धानी विदुरासूत घट्सुतान् ।
बर्दिषदं गयं शुक्ल कृष्णं सत्यं जितब्रतम् ॥
८ ॥
हविर्धानातू--हविर्धान से; हविर्धानी--हविर्धान की पत्नी ने; विदुर--हे विदुर; असूत--जन्म दिया; षट्ू--छह; सुतान्--पुत्रोंको; बर्हिषदम्--बर्हिंषत् नामक; गयम्--गय नामक; शुक्लम्--शुक्ल नामक; कृष्णम्--कृष्ण नामक; सत्यमू--सत्य नामक;जितकब्रतमू--जितब्रत को |
महाराज अत्तर्धान के पुत्र हविर्धान की पत्नी का नाम हविर्धानी था जिसने छह पुत्रों को जन्मदिया, जिनके नाम थे बर्हिषत्, गय, शुक्ल, कृष्ण, सत्य तथा जितत्रत।
"
बर्हिषत्सुमहा भागो हाविर्धानि: प्रजापति: ।
क्रियाकाण्डेषु निष्णातो योगेषु च कुरूद्बह ॥
९॥
बर्हिषत्ू--बर्हिषत्; सु-महा-भाग: --अत्यन्त भाग्यशाली; हाविर्धानि:--हाविर्धानि नामक; प्रजा-पति:--प्रजापति का पद;क्रिया-काण्डेषु--सकाम कर्म करने में; निष्णात:--लीन रहने वाला; योगेषु--योगाभ्यास में; च-- भी; कुरु-उद्दद--हे कुरुओंमें श्रेष्ठ ( विदुर )!
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, हविर्धान का अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र बर्हिषत् विभिन्नप्रकार के यज्ञादि, कर्मकाण्ड तथा योगाभ्यास में अत्यन्त कुशल था।
अपने महान् गुणों केकारण वह प्रजापति कहलाया।
"
यस्येदं देवयजनमनुयज्ञं वितन्वतः ।
प्राचीनाग्रै: कुशैरासीदास्तृतं वसुधातलम् ॥
१०॥
यस्य--जिसका; इृदम्ू--यह; देव-यजनम्--यज्ञों द्वारा देवों को तुष्ट करना; अनुयज्ञम्--निरन्तर यज्ञ करते रहना; वितन्वतः--करते हुए; प्राचीन-अग्रै:--पूर्व दिशा की ओर रखते हुए; कुशैः--कुशों से; आसीत्--हो गई; आस्तृतम्--बिखरे हुए; बसुधा-तलमू--पृथ्वी के ऊपरमहाराज बर्दिषत् ने संसार भर में अनेक यज्ञ किये।
उन्होंने कुश घासों को बिखेर कर उनकेअग्रभागों को पूर्व की ओर रखा।
"
सामुद्रीं देवदेवोक्तामुपयेमे शतद्गुतिम्यां वीक्ष्य चारुसर्वाड़ीं किशोरी सुष्ठवलड्डू ताम् ।
परिक्रमन्तीमुद्राहे चकमेग्नि: शुकीमिव ॥
११॥
सामुद्रीमू--समुद्र की कन्या को; देव-देव-उक्ताम्--परम देवता ब्रह्मा के कहने से; उपयेमे--विवाह किया; शतद्गुतिम्--शतद्गुतिनामक; यामू--जिसको ; वीक्ष्य--देखकर; चारु--अत्यन्त आकर्षक; सर्व-अड्जीम्--शरीर के सभी अंग; किशोरीम्--युवती;सुष्ठ--अत्यधिक; अलछ्डू तामू-- आभूषणों से सजी; परिक्रमन्तीम्-परिक्रमा करती, घूमती; उद्बाहे--विवाह में; चकमे--आकर्षित होकर; अग्नि: --अग्निदेव ने; शुकीम्--शुकी को; इब--सहश |
महाराज बर्दिषत् ( आगे प्राचीनबर्हि नाम से विख्यात ) को परम देवता ब्रह्माजी ने समुद्र कीकन्या शतद्गुति के साथ विवाह करने का आदेश दिया था।
उसके शरीर के अंग-प्रत्यंग अत्यन्तसुन्दर थे और वह अत्यन्त युवा थी।
वह समुचित परिधानों से अलंकृत थी।
जब वह विवाह-मण्डप में आकर प्रदक्षिणा करने लगी तो अग्निदेव उस पर इतने मोहित हो गये कि उन्होंने उसेसंगी बना कर उसके साथ भोग करना चाहा जिस तरह पहले भी उन्होंने शुकी के साथ करनाचाहा था।
"
विबुधासुरगन्धर्वमुनिसिद्धनरोरगा: ।
विजिता: सूर्यया दिक्षु क्वणयन्त्यैव नूपुरै: ॥
१२॥
विबुध--विद्वान; असुर-- असुर; गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; मुनि--बड़े-बड़े साधु; सिद्ध--सिद्ध लोक के वासी; नर--पृथ्वी लोक के वासी; उरगा:--नाग लोक के वासी; विजिता:--मोहित; सूर्यया--नवेली द्वारा; दिक्षु--समस्त दिशाओं में;क्वणयन्त्या--झंकार करती हुई; एब--केवल; नूपुरैः--अपने नुपूरों से
जब शतद्गुति का इस तरह विवाह हो रहा था, तो असुर, गन्धर्वलोक के वासी, बड़े-बड़ेसाधु एवं सिद्धलोक, पृथ्वीलोक तथा नागलोक के वासी, सभी परम विद्वान् होते हुए भी उसकेनुपूरों की झनकार से मोहित हो रहे थे।
"
प्राचीनबर्हिष: पुत्रा: शतद्व॒ुत्यां दशाभवन् ।
तुल्यनामत्रता: सर्वे धर्मस्नाता: प्रचेतस: ॥
१३॥
प्राचीनबर्हिष: --राजा प्राचीनबर्हि के; पुत्रा: --पुत्र; शतद्॒ुत्यामू--शतद्गुति के गर्भ से; दश--दस; अभवन्--उत्पन्न हुए; तुल्य--समान; नाम--नाम; ब्रता:--ब्रत; सर्वे--सभी; धर्म--धार्मिकता में; स्नाता:--पूर्णतया मग्न; प्रचेतस:--सबों का प्रचेता नामपड़ा
राजा प्राचीनबर्हि ने शतद्गुति के गर्भ से दस पुत्र उत्पन्न किये।
वे सभी समान रूप से धर्मात्माथे और प्रचेता नाम से विख्यात हुए।
"
पित्रादिष्टा: प्रजासगें तपसेर्णबमाविशन् ।
दशवर्षसहस्त्राणि तपसार्चस्तपस्पतिम् ॥
१४॥
पित्रा--पिता द्वारा; आदिष्टाः--आदेश पाकर; प्रजा-सर्गे--सन्तान उत्पन्न करने के विषय में; तपसे--तपस्या करने में;अर्णवम्--समुद्र में; आविशन्--प्रविष्ट होकर; दश-वर्ष--दस साल; सहस्त्राणि--हजारों; तपसा-- अपनी तपस्या से;आर्चनू--पूजा की; तपः--तपस्या के; पतिमू--स्वामी की।
जब इन सभी प्रचेताओं को उनके पिता ने विवाह करके सन््तान उत्पन्न करने का आदेशदिया तो सबों ने समुद्र में प्रवेश किया और दस हजार वर्षों तक तपस्या की।
इस प्रकार उन्होंनेसमस्त तपस्या के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की उपासना की।
"
यदुक्तं पथि दृष्टेन गिरिशेन प्रसीदता ।
तद्धयायन्तो जपन्तश्च पूजयन्तश्च संयता: ॥
१५॥
यत्--जो; उक्तम्--कहा गया; पथि--रास्ते में; दृष्टेन-- भेंट करके; गिरिशेन-- भगवान् शिव द्वारा; प्रसीदता--अत्यन्त प्रसन्नहोकर; तत्--वही; ध्यायन्त:--ध्यान करते हुए; जपन्तः च-- और जप करते हुए; पूजयन्त: च--और पूजते हुए; संयता:--अत्यन्त संयमपूर्वक |
जब प्राचीनबर्हि के सभी पुत्रों ने तपस्या करने के उद्देश्य से घर छोड़ दिया तो उन्हें शिवजीमिले, जिन्होंने अत्यन्त कृपा करके उन्हें परम सत्य के विषय में उपदेश दिया।
प्राचीनबर्हि केसभी पुत्रों ने उनके उपदेशों को अत्यन्त सावधानी तथा मनोयोग से जपते तथा पूजा करते हुएउनके विषय में ध्यान किया।
"
विदुर उवाचप्रचेतसां गिरित्रेण यथासीत्पथि सड्रमः ।
यदुताह हरः प्रीतस्तन्नो ब्रह्मन्वदार्थवत् ॥
१६॥
विदुरः उबाच--विदुर ने पूछा; प्रचेतसाम्--समस्त प्रचेताओं की; गिरित्रेण--शिवजी द्वारा; यथा--जिस प्रकार; आसीतू-- था;पथ्चि--रास्ते में; सड्रम:--भेंट; यत्ू--जो; उत आह--कहा; हरः--शिवजी ने; प्रीत:--प्रसन्न होकर; तत्--वह; न:--हमको;ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; बद--कहो; अर्थ-वत्--अर्थ समझा कर।
विदुर ने मैत्रेय से पूछा: हे ब्राह्मण, प्रचेतागण रास्ते में शिवजी से क्यों मिले? कृपया मुझेबताएँ कि उनसे किस प्रकार भेंट हुई, भगवान् शिव उनसे किस प्रकार इतने प्रसन्न हो गये औरउन्होंने क्या उपदेश दिया? निस्सन्देह, ऐसी बातें महत्वपूर्ण हैं और मैं चाहता हूँ कि आप कृपाकरके मुझसे इनका वर्णन करें।
"
सड्भमः खलूु विप्रर्षे शिवेनेह शरीरिणाम् ।
दुर्लभो मुनयो दध्युरसड्राद्यमम भीप्सितम् ॥
१७॥
सड्भडम:--संग, समागम; खलु--निश्चय ही; विप्र-ऋषे--हे ब्राह्मण श्रेष्ठ; शिवेन--शिव के साथ; इह--इस संसार में;शरीरिणाम्--भौतिक देहों में बँधे हुओं का; दुर्लभ:--कठिन; मुनयः--मुनिगण; दध्यु:--ध्यान में लगे हुए; असड्रात्- प्रत्येकवस्तु से विरक्त; यमू--जिसको; अभीप्सितम्--इच्छा करते हुए
विदुर ने आगे कहा : हे ब्राह्मणश्रेष्ट, देहधारियों के लिए शिवजी के साथ साक्षात् सम्पर्ककर पाना अत्यन्त कठिन है।
बड़े-बड़े ऋषि भी जिन्हें भौतिक आसक्ति से कोई लेनदेन नहींहोता, उनका समागम पाने के लिए ही, ध्यान में लीन रहने के बावजूद भी उनका संसर्ग प्राप्तनहीं कर पाते।
"
आत्मारामोपि यस्त्वस्थ लोककल्पस्य राधसे ।
शक्त्या युक्तो विचरति घोरया भगवान्भव: ॥
१८॥
आत्म-आराम:--आत्मतुष्ट; अपि--यद्यपि वह है; यः--जो है; तु--लेकिन; अस्य--इस; लोक-- भौतिक जगत; कल्पस्थ--प्रकट होने पर; राधसे--इस संसार की सहायता के लिए; शक्त्या--शक्ति से; युक्त:--साथ; विचरति--कार्य करता है;घोरया--अत्यन्त भयानक; भगवानू्-- भगवान्; भव:--शिव |
शिवजी जो अत्यन्त शक्तिशाली देवता हैं और वे आत्माराम हैं, जिनका नाम भगवान् विष्णुके ही बाद आता है।
यद्यपि उन्हें इस भौतिक जगत में किसी वस्तु की कोई आकांक्षा नहीं है,किन्तु वे संसारी लोगों के कल्याण कार्य में सदैव व्यस्त रहते हैं और अपनी घोर शक्तियों--यथादेवी काली तथा देवी दुर्गा--के साथ रहते हैं।
"
मैत्रेय उवाचप्रचेतस: पितुर्वाक्यं शिरसादाय साधव: ।
दिएं प्रतीचीं प्रययुस्तपस्याहतचेतस: ॥
१९॥
मैत्रेय: उवाच--ऋषि मैत्रेय ने कहा; प्रचेतस:ः--राजा प्राचीबर्हि के सारे पुत्र; पितु:--पिता के; वाक्यम्--शब्द को; शिरसा--मस्तक पर; आदाय-- धारण करके; साधव:ः--सभी पवित्र; दिशम्--दिशा की ओर; प्रतीचीम्--पश्चिमी; प्रययु:--चले गये;तपसि--तपस्या में; आहत--गम्भीरतापूर्वक स्वीकार करके ; चेतस:--हृदय में
ऋषि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, अपनी साधु प्रकृति के कारण प्राचीनबर्हि के सभी पुत्रोंने अपने पिता के वचनों को शिरोधार्य किया और पिता की आज्ञा पूरी करने के उद्देश्य से वेपश्चिम दिशा की ओर चले गये।
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ससमुद्रमुप विस्तीर्णमपश्यन्सुमहत्सर: ।
महन्मन इव स्वच्छ प्रसन्ननलिलाशयम् ॥
२०॥
स-समुद्रमू--समुद्र के निकट ही; उप--कुछ-कुछ; विस्तीर्णम्--अत्यन्त लम्बा चौड़ा; अपश्यन्--उन्होंने देखा; सु-महत्--अत्यन्त विशाल; सर: -- जलाशय; महत्--महापुरुष; मन: --मन; इब--सहश; सु-अच्छम्--स्वच्छ, निर्मल; प्रसन्न --प्रसन्न;सलिल--जल; आशयमू--शरण में आये हुए
चलते-चलते प्रचेताओं ने एक विशाल जलाशय देखा जो समुद्र के समान ही विशालदिखता था।
इसका जल इतना शान्त था मानो किसी महापुरुष का मन हो और इसके जलचरइतने बड़े जलाशय की संरक्षण में होकर अत्यन्त शान्त तथा प्रसन्न प्रतीत हो रहे थे।
"
नीलरक्तोत्पलाम्भोजकह्ारेन्दीवराकरम् ।
हंससारसचक्राह्कारण्डवनिकूजितम् ॥
२१॥
नील--नील; रक्त--लाल; उत्पल--कमल; अम्भ:-ज--जल से उत्पन्न; कह्लार--कमल की एक किस्म; इन्दीवर--कमल कीएक किस्म; आकरम्--खान; हंस--हंस पक्षी; सारस--एक पक्षी; चक्राह्--चकवा नाम का पक्षी; कारण्डब--पक्षी विशेष;निकूजितमू--चहक रहे थे ।
उस विशाल सरोवर में विभिन्न प्रकार के कमल पुष्प थे।
कुछ नीले थे तो कुछ लाल, कुछरात्रि में खिलने वाले थे, तो कुछ दिन में और इन्दीवर जैसे कुछ कमल शाम को खिलने वालेथे।
इन सब फूलों से सारा सरोवर पुष्पों की खान सा प्रतीत हो रहा था।
फलस्वरूप सरोवर केतटों पर हंस, सारस, चक्रवाक, कारण्डव तथा अन्य सुन्दर जलपक्षी खड़े हुए थे।
"
मत्तभ्रमरसौस्वर्यहष्टरोमलताडूप्रिपम् ।
पद्मकोशरजो दिद्षु विक्षिपत्पवनोत्सवम् ॥
२२॥
मत्त--पागल; भ्रमर--भौरे; सौ-स्वर्य--भिनभिनाहट के साथ; हष्ट--प्रसन्नतापूर्वक; रोम--शरीर के बाल; लता--बेलें;अड्प्रिपम्--वृक्ष; पदा--कमल; कोश--कोश, दलपुझ्ज; रज:--केशर; दिक्षु--सभी दिशाओं में; विक्षिपत्--बिखेरते हुए;'पवन--वायु; उत्सवम्--उत्सव, पर्व |
उस सरोवर के चारों ओर तरह-तरह के वृक्ष तथा लताएँ थीं और उन पर मतवाले भौरे गूँजरहे थे।
भौंरों की मधुर गूँज से वृक्ष अत्यन्त उललसित लग रहे थे और कमल पुष्पों का केसर वायुमें बिखर रहा था।
इन सबसे ऐसा वातावरण उत्पन्न हो रहा था मानो कोई उत्सव हो रहा हो।
"
तत्र गान्धर्वमाकर्ण्य दिव्यमार्गमननोहरम् ।
विसिस्म्यू राजपुत्रास्ते मृदड़पणवाद्यनु ॥
२३॥
तत्र--वहाँ; गान्धर्वम्--मधुर ध्वनि; आकर्णर्य--सुनकर; दिव्य--स्वर्गिक; मार्ग--समान रूप से; मनः-हरम्--सुन्दर;विसिस्म्यु:--वे चकित हो गये; राज-पुत्रा:--राजा बर्हिषत के पुत्र; ते--वे सब; मृदड्र--मृदंग, ढोल; पणव--ताशा, धौंसा;आदि--सब मिलकर; अनु--सदैव ।
जब राजा के पुत्रों ने मृदंग तथा पणव के साथ-साथ अन्य राग-रागिनियों की कर्णप्रियध्वनि सुनी तो वे अत्यन्त विस्मित हुए।
"
तहोंव सरसस्तस्मान्निष्क्रामन्तं सहानुगम् ।
उपगीयमानममरप्रवरं विबुधानुगै: ॥
२४॥
तप्तहेमनिकायाभं शितिकणठं त्रिलोचनम् ।
प्रसादसुमुखं वीक्ष्य प्रणेमुर्जातकौतुका: ॥
२५॥
तहिं--इतने में; एब--निश्चय ही; सरस:--जल से; तस्मात्--उसमें से; निष्क्रामन्तम्--निकलते हुए; सह-अनुगम्--महापुरुषोंके साथ; उपगीयमानम्--अनुयायियों द्वारा वन्दित; अमर-प्रवरम्--देवताओं में प्रधान; विबुध-अनुगैः -- अपने संगियों के साथ;तप्त-हेम--पिघला सोना; निकाय-आभमू--शारीरिक अंग; शिति-कण्ठम्--नीला कंठ; त्रि-लोचनमू्--तीन नेत्र वाले;प्रसाद--दयालु; सु-मुखम्--सुन्दर चेहरा; वीक्ष्य--देखकर; प्रणेमु:ः--प्रणाम किया; जात--उत्पन्न हुआ; कौतुका: --कुतूहल
प्रचेतागण भाग्यवान थे कि उन्होंने प्रमुख देव शिवजी को उनके पार्षदों सहित जल से बाहरआते देखा।
उनकी शारीरिक कान्ति तपे हुए सोने के समान थी, उनका कंठ नीला था और उनकेतीन नेत्र थे जिनसे वे भक्तों पर कृपादृष्टि डाल रहे थे।
उनके साथ अनेक गन्धर्व गायक थे, जोउनका गुणगान कर रहे थे।
ज्यों ही प्रेचरताओं ने शिवजी को देखा उन्होंने तुरन्त ही कुतूहलवशउन्हें नमस्कार किया और वे उनके चरणों पर गिर पड़े।
"
स ताय्प्रपन्नार्तिहरो भगवान्धर्मवत्सलः ।
धर्मज्ञान्शीलसम्पन्नान्प्रीत: प्रीतानुवाच ह ॥
२६॥
सः--शिवजी; तान्--उनको; प्रपन्न-आर्ति-हर:--सभी प्रकार के भयों को दूर करने वाला; भगवान्--ई श्वर; धर्म-वत्सल:--अत्यन्त धार्मिक; धर्म-ज्ञानू-- धर्म से अवगत पुरुष; शील-सम्पन्नान्ू-- अत्यन्त सदाचारी; प्रीत:ः--प्रसन्न होकर; प्रीतान्ू-- अत्यन्तभद्र आचरण वाला; उवाच---उनसे बातें की; ह-- भूतकाल में
शिवजी प्रचेताओं से अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि सामान्यतः शिवजी पवित्र तथा सदाचारीपुरुषों के रक्षक हैं।
राजकुमारों से अत्यन्त प्रसन्न होकर वे इस प्रकार बोले।
"
श्रीरुद्र उबाचयूयं वेदिषदः पुत्रा विदितं वश्चिकीर्षितम् ।
अनुग्रहाय भद्गं व एवं मे दर्शनं कृतम् ॥
२७॥
श्री-रुद्र: उबाच--शिवजी बोले; यूयम्--तुम सब; वेदिषद:--राजा प्राचीनबर्हि के; पुत्रा:--पुत्र; विदितम्--जानते हुए; व:--तुम्हारी; चिकीर्षितम्--इच्छाएँ; अनुग्रहाय--तुम पर अनुग्रह के लिए; भद्रम्--तुम्हारा कल्याण हो; व:--तुम सभी; एवम्--इसप्रकार; मे--मेरा; दर्शनम्--दर्शन; कृतम्--प्राप्त किया
शिवजी ने कहा : तुम सभी प्राचीनबर्हि के पुत्र हो, तुम्हारा कल्याण हो।
मैं जानता हूँ कितुम क्या करने जा रहे हो, अतः मैंने तुम पर कृपा करने के लिए ही अपना दर्शन दिया है।
"
यः परं रंहसः साक्षात्त्रिगुणाज्जीवसंज्ञितातू ।
भगवतन्तं वासुदेवं प्रपन्नः स प्रियो हि मे ॥
२८ ॥
यः--जो कोई; परम्--दिव्य; रंहसः--नियामक का; साक्षात्-प्रत्यक्षतः ; त्रि-गुणात्--प्रकृति के तीनों गुणों से; जीव-संज्ञितातू-जीव कही जाने वाली जीवात्माओं से; भगवन्तम्-- श्रीभगवान्; वासुदेवम्-- श्रीकृष्ण का; प्रपन्न:--शरणागत;सः--वह; प्रियः--अत्यन्त प्यारा; हि--निस्सन्देह; मे--मुझे |
शिवजी ने आगे कहा : जो व्यक्ति प्रकृति तथा जीवात्मा में से प्रत्येक के अधिष्ठाता भगवान्कृष्ण के शरणागत है, वह वास्तव में मुझे अत्यधिक प्रिय है।
"
स्वधर्मनिष्ठ: शतजन्मभि:ः पुमान्विरिश्ञतामेति ततः पर हि माम् ।
अव्याकृतं भागवतोथ वैष्णवंपदं यथाहं विबुधा: कलात्यये ॥
२९॥
स्व-धर्म-निष्ठः--जो अपने धर्म या वृत्ति पर स्थित रहता है; शत-जन्मभि:--एक सौ जन्मों तक; पुमानू--जीवात्मा;विरिज्ञताम्-ब्रह्म का पद; एति--प्राप्त करता है; ततः--पश्चात्; परमू-- ऊपर; हि--निश्चय ही; मामू--मुझको प्राप्त करता है;अव्याकृतमू--बिना विचलित हुए; भागवत:-- भगवान् को; अथ--अत: ; वैष्णवम्-- भगवान् का शुद्ध भक्त; पदम्--पद;यथा--जिस तरह; अहम्--मैं; विबुधा:--देवतागण; कला-अत्यये--संसार के संहार के बाद।
जो व्यक्ति अपने वर्णाश्रम धर्म को समुचित रीति से एक सौ जन्मों तक निबाहता है, वहब्रह्मा के पद को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है और इससे अधिक योग्य होने पर वह शिवजीके पास पहुँच सकता है।
किन्तु जो व्यक्ति अनन्य भक्तिवश सीधे भगवान् कृष्ण या विष्णु कीशरण में जाता है, वह तुरन्त वैकुण्ठलोक में पहुँच जाता है।
शिवजी तथा अन्य देवता इस संसारके संहार के बाद ही इन लोक को प्राप्त कर पाते हैं।
"
अथ भागवता यूय॑ प्रिया: स्थ भगवान्यथा ।
न मद्धागवतानां च प्रेयानन्योस्ति कर्हिचित् ॥
३०॥
अथ--अतः; भागवता:--भक्त; यूयम्--तुम सब; प्रिया:--प्रिय; स्थ--तुम हो; भगवान्-- भगवान्; यथा--जिस तरह; न--नतो; मत्-मेरी अपेक्षा; भागवतानाम्-- भक्तों का; च-- भी; प्रेयान्-- अत्यन्त प्रिय; अन्य:--दूसरा; अस्ति--है; कहिंचित्--किसी समय, कभी।
तुम सभी भगवान् के भक्त हो, अतः तुम मेरे लिए भगवान् के समान पूज्य हो।
इस प्रकार सेमैं यह जानता हूँ कि भक्त भी मेरा आदर करते हैं और मैं उन्हें प्यारा हूँ।
इस प्रकार भक्तों को मेरेसमान अन्य कोई प्रिय नहीं हो सकता है।
"
इदं विविक्त जप्तव्यं पवित्र मड़लं परम् ।
निःश्रेयसकरं चापि श्रूयतां तद्ददामि व: ॥
३१॥
इदम्--यह; विविक्तमू-विशेष; जप्तव्यम्ू--सदैव जप करने के लिए; पवित्रमू--अत्यन्त शुद्ध; मड्रलम्ू--कल्याणकर;परम्--दिव्य; नि: श्रेयस-करम्--अत्यन्त उपयोगी; च-- भी; अपि--निश्चय ही; श्रूयताम्ू--कृपा करके सुनें; तत्ू--वह;वदामि--मैं कह रहा हूँ; व: --तुमसे |
अब मैं एक मंत्र का उच्चारण करूँगा जो न केवल दिव्य, पवित्र तथा शुभ है वरन् जीवन-उद्देश्य को प्राप्त करने के इच्छुक हर एक के लिए यही श्रेष्ठ स्तुति भी है।
जब मैं इस मंत्र काउच्चारण करूँ तो तुम सब सावधानी से ध्यानपूर्वक सुनना।
"
मैत्रेय उवाचइत्यनुक्रोशहदयो भगवानाह ताड्िछव: ।
बद्धाझ्जलीन्राजपुत्रानज्नारायणपरो बच: ॥
३२॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; अनुक्रोश-हृदयः -- अत्यन्त दयालु, करुणाई; भगवान्-- भगवान् ने; आह--कहा; तानू--प्रचेताओं से; शिव:ः--शिवजी; बद्ध-अद्जलीन्ू--हाथ जोड़े खड़े हुए; राज-पुत्रानू--राजा के पुत्रों को; नारायण-'परः--नारायण के भक्त, शिवजी; वच:--शब्द।
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : भगवान् नारायण के परम भक्त महापुरुष शिवजी अहैतुकीकृपावश हाथ जोड़ कर खड़े हुए राजा के पुत्रों से कहते रहे।
"
श्रीरुद्र उबाचजित॑ त आत्मदिद्वर्यस्वस्तये स्वस्तिरस्तु मे ।
भवताराधसा राद्धं सर्वस्मा आत्मने नम: ॥
३३॥
श्री-रुद्र:ः उबाच--शिवजी ने कहा; जितम्ू--समस्त महिमाएँ, उत्कर्ष; ते--तुम्हारे; आत्म-वित्--स्वरूपसिद्ध; वर्य- श्रेष्ठ;स्वस्तये--कल्याण के लिए; स्वस्ति:--कल्याण; अस्तु--हो; मे--मेरा; भवता--आपसे; आराधसा--सब विधि से पूर्ण( सर्वात्मक ) द्वारा; राद्धम्--पूज्य; सर्वस्मै--परमात्मा; आत्मने--परमात्मा को; नमः--नमस्कार है।
शिवजी ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इस प्रकार स्तुति की: हे भगवान्, आप धन्य हैं।
आपसभी स्वरूपसिद्धों में महान् हैं चूंकि आप उनका सदैव कल्याण करने वाले हैं, अतः आप मेराभी कल्याण करें।
आप अपने सर्वात्मक उपदेशों के कारण पूज्य हैं।
आप परमात्मा हैं, अतःपुरुषोत्तम स्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
"
नमः पड्डूजनाभाय भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मने ।
वासुदेवाय शान्ताय कूटस्थाय स्वरोचिषे ॥
३४॥
नमः--नमस्कार है; पड्डूज-नाभाय--उन भगवान् को जिनकी नाभि से कमल प्रकट होता है; भूत-सूक्ष्म--इन्द्रिय वस्तुएँ( तन्मात्रा ); इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्मने--उत्पत्ति; वासुदेवाय-- भगवान् वासुदेव को; शान्ताय--सदैव शान्त रहने वाले को;कूट-स्थाय--अपरिवर्तित रहने वाले को; स्व-रोचिषे--स्वयं प्रकाश को |
हे भगवान्, आपकी नाभि से कमल पुष्प निकलता है, इस प्रकार से आप सृष्टि के उद्गमहैं।
आप इन्द्रियों तथा तन्मात्राओं के नियामक हैं।
आप सर्वव्यापी वासुदेव भी हैं।
आप परमशान्त हैं और स्वयंप्रकाशित होने के कारण आप छह प्रकार के विकारों से विचलित नहीं होते।
"
सट्डूर्षणाय सूक्ष्माय दुरन््तायान््तकाय च ।
नमो विश्वप्रबोधाय प्रद्युम्नायान्तरात्मने ॥
३५॥
सड्डर्षणाय--निर्माण ( समन्वय ) के स्वामी को; सूक्ष्माय--सूक्ष्म रूप या अव्यक्त को; दुरन््ताय--दुर्लध्य को; अन्तकाय--संहार के स्वामी को; च-- भी; नम:--नमस्कार; विश्व-प्रबोधाय--ब्रह्माण्ड का विकास करने वाले को; प्रद्युम्नाय--प्रद्युम्न को; अन्त:-आत्मने--घट-घट वासी परमात्मा को।
हे भगवान्, आप सूक्ष्म भौतिक तत्त्वों के उदगम, समस्त संघटन और संहार के स्वामी, संकर्षण नामक अधिष्ठाता तथा समस्त बुद्धि के अधिष्ठाता प्रद्युम्न हैं।
अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
"
नमो नमोनिरुद्धाय हषीकेशेन्द्रियात्मने ।
नमः परमहंसाय पूर्णाय निभूतात्मने ॥
३६॥
नमः--आपको नमस्कार है; नम:ः--नमस्कार है; अनिरुद्धाय--अनिरुद्ध को; हषीकेश --इन्द्रियों के स्वामी; इन्द्रिय-आत्मने--इन्द्रियों के नियामक को; नमः--नमस्कार है; परम-हंसाय--परमहंस को; पूर्णाय--परम पूर्ण को; निभृत-आत्मने--उसे जोइस जगत से अलग स्थित है।
हे परम अधिष्ठाता अनिरुद्ध रूप भगवान्, आप इन्द्रियों तथा मन के स्वामी हैं।
अतः मैंआपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ।
आप अनन्त तथा साथ ही साथ संकर्षण कहलाते हैं,क्योंकि अपने मुख से निकलने वाली धधकती हुई अग्नि से आप सारी सृष्टि का संहार करने मेंसमर्थ हैं।
"
स्वर्गापवर्गद्वाराय नित्यं शुचिषदे नमः ।
नमो हिरण्यवीर्याय चातुर्होत्राय तन््तवे ॥
३७॥
स्वर्ग--स्वर्गलोक; अपवर्ग--मोक्ष का मार्ग; द्वाराय--द्वार को; नित्यम्--शा श्वत; शुचि-षदे--परम पवित्र को; नम:ः--नमस्कारहै; नमः--नमस्कार है; हिरण्य--स्वर्ण; वीर्याय--वीर्य को; चातु:-होत्राय--चातुर्होत्र नामक वैदिक यज्ञ को; तन्तवे--विस्तारकरने वाले को |
हे भगवान् अनिरुद्ध, आपके आदेश से स्वर्ग तथा मोक्ष के द्वार खुलते हैं।
आप निरन्तरजीवों के शुद्ध हृदय में निवास करते हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
आप स्वर्ण सहशवीर्य के स्वामी हैं और इस प्रकार आप अग्नि रूप में चातुहोंत्र इत्यादि वैदिक यज्ञों में सहायताकरते हैं।
अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
"
नम ऊर्ज इषे त्रय्या: पतये यज्ञरेतसे ।
तृप्तिदाय च जीवानां नमः सर्वरसात्मने ॥
३८॥
नमः--नमस्कार है; ऊर्जे--पितृलोक के पोषक को; इषे-- समस्त देवताओं का भरण करने वाला; त्रय्या:--तीनों वेदों के;पतये--स्वामी को; यज्ञ--यज्ञ; रेतसे--चन्द्रलोक के प्रमुख श्रीविग्रह को; तृप्ति-दाय--उनको जो सबों को तृप्त करते हैं; च--भी; जीवानामू--जीवात्माओं का; नमः--नमस्कार है; सर्व-रस-आत्मने--सर्वव्यापी परमात्मा को |
हे भगवन्, आप पितृलोक तथा सभी देवताओं के भी पोषक हैं।
आप चन्द्रमा के प्रमुखश्रीविग्रह और तीनों वेदों के स्वामी हैं।
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आप समस्तजीवात्माओं की तृप्ति के मूल स्त्रोत हैं।
"
सर्वसत्त्वात्मदेहाय विशेषाय स्थवीयसे ।
नमस्त्रेलोक्यपालाय सह ओजोबलाय च ॥
३९॥
सर्व--समस्त; सत्त्व--अस्तित्व; आत्म--जीव; देहाय--शरीर को; विशेषाय--विभिन्नता को; स्थवीयसे-- भौतिक संसार को;नमः--नमस्कार; त्रै-लोक्य--तीनों लोकों के; पालाय--पालक; सह--के साथ; ओज:--ओज; बलाय--बल ( शक्ति ) को;च--भी |
हे भगवान्, आप विराटस्वरूप हैं जिसमें समस्त जीवात्माओं के शरीर समाहित हैं।
आप तीनों लोकों के पालक हैं, फलत: आप मन, इन्द्रियों, शरीर तथा प्राण का पालन करने वाले हैं।
अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
"
अर्थलिड्राय नभसे नमोःच्तर्बहिरात्मने ।
नमः पुण्याय लोकाय अमुष्मै भूरिवर्चसे ॥
४०॥
अर्थ-तात्पर्य; लिड्राय--प्रकट करने हेतु; नभसे--आकाश को; नम:--नमस्कार; अन्तः--भीतर; बहि:--तथा बाहर;आत्मने--अपने आपको; नम:--नमस्कार; पुण्याय--पुण्य कर्मों को; लोकाय--सृष्टि के लिए; अमुष्मै--मृत्यु के परे; भूरि-वर्चसे--परम तेज
हे भगवान्, आप अपनी दिव्य वाणी (शब्दों ) को प्रसारित करके प्रत्येक वस्तु कावास्तविक अर्थ प्रकट करने वाले हैं।
आप भीतर-बाहर सर्वव्याप्त आकाश हैं और इस लोक मेंतथा इससे परे किये जाने वाले समस्त पुण्यकर्मों के परम लक्ष्य हैं।
अतः मैं आपको पुनः पुनः सादर नमस्कार करता हूँ ।
"
प्रवृत्ताय निवृत्ताय पितृदेवाय कर्मणे ।
नमो<धर्मविपाकाय मृत्यवे दुःखदाय च ॥
४१॥
प्रवृत्ताय--प्रवृत्ति; निवृत्ताय--निवृत्ताय; पितृ-देवाय--पितृलोक के स्वामी को; कर्मणे--सकाम कर्मों के फल को; नम:--नमस्कार; अधर्म--अधर्म; विपाकाय--फल को; मृत्यवे--मृत्यु को; दुःख-दाय--समस्त प्रकार के दुखों का कारण; च--भी।
हे भगवान्, आप पुण्यकर्मों के फलों के दृष्टा हैं।
आप प्रवृत्ति, निवृत्ति तथा उनके कर्म-रूपीपरिणाम ( फल ) हैं।
आप अधर्म से जनित जीवन के दुखों के कारणस्वरूप हैं, अत: आप मृत्यु हैं।
मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
"
नमस्त आशिषामीश मनवे कारणात्मनेनमो धर्माय बृहते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
पुरुषाय पुराणाय साड्ख्ययोगेश्वराय च ॥
४२॥
नमः--नमस्कार; ते--तुमको; आशिषाम् ईश--हे समस्त आशीर्वादों को प्रदान करने वालों में श्रेष्ठ; मनवे--परम मन या परममनु को; कारण-आत्मने--समस्त कारणों के कारण; नम:ः--नमस्कार; धर्माय--समस्त धर्मों के ज्ञाता को; बृहते--सर्व श्रेष्ठ;कृष्णाय--कृष्ण को; अकुण्ठ-मेधसे--जिनकी चेतना कभी कुण्ठित नहीं होती उन्हें; पुरुषाय--परम पुरुष को; पुराणाय--सबसे प्राचीन; साड्ख्य-योग-ई श्रराय--सांख्य योग के नियमों के अधीश्वर को; च--तथा |
है भगवान्, आप आशीर्वादों के समस्त प्रदायकों में सर्वश्रेष्ठ, सबसे प्राचीन तथा समस्तभोक्ताओं में परम भोक्ता हैं।
आप समस्त सांख्य योग-दर्शन के अधिष्ठाता हैं।
आप समस्तकारणों के कारण भगवान् कृष्ण हैं।
आप सभी धर्मों में श्रेष्ठ है, आप परम मन हैं और आपकामस्तिष्क ( बुद्धि ) ऐसा है, जो कभी कुण्ठित नहीं होता।
अत: मैं आपको बारम्बार नमस्कारकरता हूँ।
"
शक्तित्रयसमेताय मीदुषेहड्डू तात्मने ।
चेतआकूतिरूपाय नमो वाचो विभूतये ॥
४३॥
शक्ति-त्रय--तीन प्रकार की शक्तियाँ; समेताय--आगार को; मीढुषे--रुद्र को; अहड्डू त-आत्मने--अहंकार के स्त्रोत; चेत: --ज्ञान; आकृति--कार्य करने की उत्सुकता; रूपाय--रूप को; नमः--मेरा नमस्कार है; वाच:--वाणी को; विभूतये --विभिन्नप्रकार के ऐश्वर्यों कोहे भगवान्, आप कर्ता, करण और कर्म--इन तीनों शक्तियों के नियामक हैं।
अतः आपशरीर, मन तथा इन्द्रियों के परम नियन्ता हैं।
आप अहंकार के परम नियन्ता रुद्र भी हैं।
आपवैदिक आदेशों के ज्ञान तथा उनके अनुसार किए जाने वाले कर्मो के स्त्रोत हैं।
"
दर्शन नो दिहृक्षूणां देहि भागवतार्चितम् ।
रूप॑ प्रियतमं स्वानां सर्वेन्द्रिगगुणाजझ्ननम् ॥
४४॥
दर्शनम्--दर्शन; नः--हमारी; दिदृदक्षूणाम्--देखने की इच्छा; देहि--कृपा करके दिखाएं; भागवत--भक्तों का; अर्चितम्--उनके द्वारा पूजित; रूपमू-- स्वरूप; प्रिय-तमम्--सर्वाधिक प्रिय; स्वानाम्ू--अपने भक्तों का; सर्व-इन्द्रिय--सभी इन्द्रियाँ;गुण--गुण; अज्जनम्--अत्यन्त मनोहर
हे भगवान्, मैं आपको उस रूप में देखने का इच्छुक हूँ, जिस रूप में आपके अत्यन्त प्रियभक्त आपकी पूजा करते हैं।
आपके अन्य अनेक रूप हैं, किन्तु मैं तो उस रूप का दर्शन करनाचाहता हूँ जो भक्तों को विशेष रूप से प्रिय है।
आप मुझ पर अनुग्रह करें और मुझे वह स्वरूपदिखलाएं, क्योंकि जिस रूप की भक्त पूजा करते हैं वही इन्द्रियों की इच्छाओं को पूरा करसकता है।
"
स्निग्धप्रावृड्घनश्यामं सर्वसौन्दर्यसड्ग्रहम् ।
चार्वायतचतुर्बाहु सुजातरुचिराननम् ॥
४५॥
'पद्यकोशपलाशाक्ष सुन्दरभ्रु सुनासिकम् ।
सुद्विजं सुकपोलास्यं समकर्णविभूषणम् ॥
४६॥
स्निग्ध--चिकना; प्रावृटू--वर्षाकाल के; घन-श्यामम्--घने बादलों सा; सर्व--समस्त; सौन्दर्य--सुन्दरता; सड्ग्रहम्ू--राशि;चारू--सुन्द; आयत--शारीरिक अंग; चतु:-बाहु--चार भुजाओं वाले को; सु-जात--अत्यन्त सुन्दर; रुचिर--अत्यन्तमनोहर; आननमू्--मुख; पढ्य-कोश--कमल पुष्पों का गुच्छा; पलाश--पंखड़ियाँ, दल; अक्षम्--नेत्र; सुन्दर--सुन्दर; भ्रु--भौहें; सु-नासिकम्--उन्नत नाक; सु-द्विजम्ू--सुन्दर दाँत; सु-कपोल--सुन्दर मस्तक; आस्यम्--मुख; सम-कर्ण--एकसमानसुन्दर कान; विभूषणम्--पूर्णतः सज्जित ॥
भगवान् की सुन्दरता वर्षाकालीन श्याम मेघों के समान है।
उनके शारीरिक अंग वर्षा जलके समान चमकौीले हैं।
दरअसल, वे समस्त सौंदर्य के समष्टि ( सारसर्वस्व ) हैं।
भगवान् की चारभुजाएं हैं, सुन्दर मुख है और उनके नेत्र कमलदलों के तुल्य हैं।
उनकी नाक उन्नत, उनकी हँसीमोहने वाली, उनका मस्तक सुन्दर तथा उनके कान सुन्दर और आभूषणों से सज्जित हैं।
"
प्रीतिप्रहसितापाड्रमलकै रूपशोभितम् ।
लसत्पड्डजकिञ्ञल्कदुकूलं मृष्टकुण्डलम् ॥
४७॥
स्फुरत्किरीटवलयहारनूपुरमेखलम् ।
शद्डभुचक्रगदापद्ममालामण्युत्तमर्द्धमत् ॥
४८॥
प्रीति--अनुग्रहपूर्ण; प्रहसित--हास्य; अपाड्ुमू--तिरछी चितवन; अलकै:--घुँघराले वालों से; रूप--सौंदर्य; शोभितम्--सुशोभित; लसत्--चमकता हुआ; पड्डूज--कमल का; किल्ञल्क--केशर; दुकूलम्-- वस्त्र; मृष्ट--झलमलाते; कुण्डलम्--कान के आभूषण; स्फुरत्--चमचमाता; किरीट--मुकुट; वलय--कंकण; हार--गले की माला; नूपुर--पाँव का घुँघुरूदारआभूषण; मेखलम्--करधनी; शद्भु--शंख; चक्र--चक्र; गदा--गदा; पढ्य--कमल का फूल; माला--फूल की माला;मणि--मोती; उत्तम- श्रेष्ठ; ऋद्धि-मत्--इस कारण और भी सुन्दर।
भगवान् अपने मुक्त तथा दयापूर्ण हास्य तथा भक्तों पर तिरछी चितवन के कारण अनुपमसुन्दर लगते हैं।
उनके बाल काले तथा घुँघराले हैं।
हवा में उड़ता उनका वस्त्र कमल के फूलों मेंसे उड़ते हुए केशर-रज के समान प्रतीत होता है।
उनके झलमलाते कुण्डल, चमचमाता मुकुट,कंकण, बनमाला, नूपुर, करधनी तथा शरीर के अन्य आभूषण शंख, चक्र, गदा तथा कमलपुष्प से मिलकर उनके वक्षस्थल पर पड़ी कौस्तुभमणि की प्राकृतिक शोभा को बढ़ाते हैं।
"
सिंहस्कन्धत्विषो बिभ्रत्सौभगग्रीवकौस्तुभम् ।
भ्रियानपायिन्या क्षिप्तनिकषाश्मोरसोल्लसत् ॥
४९॥
सिंह--शेर; स्कन्ध--कंधे; त्विष:--बालों की लटें; बिभ्रत्-- धारण किये हुए; सौभग-- भाग्यवाली; ग्रीव--गर्दन;कौस्तुभम्--कौस्तुभ मणि; थ्रिया--सुन्दरता; अनपायिन्या--कभी न घटने वाली; क्षिप्त--मात करने वाली; निकष--कसौटी;अश्म--पत्थर; उरसा--वक्षस्थल के साथ; उल्लसतू--झिलमिलाती है।
भगवान् के कन्धे सिंह के समान हैं।
इन पर मालाएँ, हार एवं घुँघराले बाल पड़े हैं, जो सदैवझिलमिलाते रहते हैं।
इनके साथ ही साथ कौस्तुभमणि की सुन्दरता है और भगवान् के श्यामवक्षस्थल पर श्रीवत्स की रेखाएँ हैं, जो लक्ष्मी के प्रतीक हैं।
इन सुवर्ण रेखाओं की चमाहटसुवर्ण कसौटी पर बनी सुवर्ण लकीरों से कहीं अधिक सुन्दर है।
दरअसल ऐसा सौन्दर्य सुवर्णकसौटी को मात करने वाला है।
"
पूरेचकसंविग्नवलिवल्गुदलोदरम् ।
प्रतिसड्क्रामयद्विश्व॑ नाभ्यावर्तनभीरया ॥
५०॥
पूर-- श्रास; रेचक--निः ध्रास; संविग्न--चलायमान; वलि--उदर में पड़ने वाली सिलवटें; वल्गु--सुन्दर; दल--बरगद के पत्तेके समान; उदरम्-पेट; प्रतिसड्क्रामयत्--नीचे की ओर भँवरदार; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; नाभ्या--नाभि; आवर्त--कुण्डली;गभीरया--गहराई में |
भगवान् का उदर ( पेट ) त्रिवली के कारण सुन्दर लगता है।
गोल होने के कारण उनका उदर वटवृक्ष के पत्ते के समान जान पड़ता है और जब वे श्वास-प्रश्चास लेते हैं, तो इन सलबटोंका हिलना-जुलना अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता हैं।
भगवान् की नाभि के भीतर की कुण्डली इतनीगहरी है मानो सारा ब्रह्माण्ड उसी में से उत्पन्न हुआ हो और पुन: उसी में समा जाना चाहता हो।
"
श्यामश्रोण्यधिरोचिष्णुदुकूलस्वर्णमेखलम् ।
समचार्वड्प्रिजड्जीरूनिम्नजानुसुदर्शनम् ॥
५१॥
श्याम--श्याम वर्ण का; श्रोणि--कमर के निचे वाला भाग; अधि--अतिरिक्त; रोचिष्णु --सुहावना; दुकूल--वस्त्र; स्वर्ण --सुनहली; मेखलम्--करधनी; सम--समान; चारु --सुन्दर; अड्घ्रि--चरणकमल; जड्ढ--पिंडली; ऊरु -- जाँघें; निम्न--निचली; जानु--घुटने; सु-दर्शनम्--सुघड़, दर्शनीय |
भगवान् की कटि का अधोभाग श्यामल रंग का है और पीताम्बर से ढका है।
उसमेंसुनहली, जरीदार करधनी है।
उनके एक समान चरणकमल, पिंडलियाँ, जाँघें तथा घुटने अनुपमसुन्दर हैं।
निस्सन्देह, भगवान् का सम्पूर्ण शरीर अत्यन्त सुडौल प्रतीत होता है।
"
'पदा शरत्पद्मपलाशरोचिषानखघद्युभिनोंउन्तरघं विधुन्वता ।
प्रदर्शय स्वीयमपास्तसा ध्वसंपदं गुरो मार्गगुरुस्तमोजुषाम् ॥
५२॥
'पदा--चरणकमल द्वारा; शरत्--शरद ऋतु; पद्य--कमल पुष्प; पलाश--दल; रोचिषा--अत्यन्त मनोहर; नख--नाखून;झुभिः--तेज से; नः--हमारा; अन्तः-अघम्--मल; विधुन्वता--धो सकने वाला; प्रदर्शय--दिखलाइये; स्वीयम्-- अपना;अपास्त--घटता हुआ; साध्वसम्--जगत का कष्ट; पदम्ू--चरणकमल; गुरो--हे गुरु; मार्ग--पथ; गुरु:--गुरु; तमः-जुषाम्ू--अज्ञान के कारण कष्ट उठाने वाले व्यक्ति |
हे भगवन्, आपके दोनों चरणकमल इतने सुन्दर हैं मानो शरत् ऋतु में उगने वाले कमल पुष्पके खिलते हुए दो दल हों।
दरअसल आपके चरणकमलों के नाखूनों से इतना तेज निकलता हैकि वह बद्धजीव के हृदय के सारे अंधकार को तुरन्त छिन्न कर देता है।
हे स्वामी, मुझे आपअपना वह स्वरूप दिखलायें जो किसी भक्त के हृदय के अन्धकार को नष्ट कर देता है।
मेरेभगवन्, आप सबों के परम गुरु हैं, अतः आप जैसे गुरु के द्वारा अज्ञान के अंधकार से आवृतसारे बद्धजीव प्रकाश प्राप्त कर सकते हैं।
"
एतद्रूपमनुध्येयमात्मशुद्ध्धिमभीप्सताम् ।
यद्धभक्तियोगो भयदः स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ॥
५३॥
एतत्--यह; रूपम्--रूप; अनुध्येयम्- ध्यान करना चाहिए; आत्म--स्व; शुद्धिमू--शुद्धि; अभीप्सताम्--इच्छा रखने वालोंका; यत्--जो; भक्ति-योग: -- भक्ति; अभय-दः --निर्भय कराने वाली; स्व-धर्मम्--अपने वृत्तिपरक कार्यों को;अनुतिष्ठताम्-करने में |
हे भगवन्, जो लोग अपने जीवन को परिशुद्ध बनाना चाहते हैं, उन्हें उपर्युक्त विधि सेआपके चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए।
जो अपने वर्ण के अनुरूप कार्य को पूरा करनेकी धुन में हैं और जो भय से मुक्त होना चाहते हैं, उन्हें भक्तियोग की इस विधि का अनुसरणकरना चाहिए।
"
भवान्भक्तिमता लक्यो दुर्लभ: सर्वदेहिनाम् ।
स्वाराज्यस्याप्यभिमत एकान्तेनात्मविद्गति: ॥
५४॥
भवान्ू--आप; भक्ति-मता--भक्त द्वारा; लभ्य:--प्राप्य; दुर्लभ:--प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन; सर्व-देहिनामू-- अन्य समस्तदेहधारियों ( जीवात्माओं ) का; स्वाराज्यस्य--स्वर्ग के राजा का; अपि-- भी; अभिमतः -- अन्तिम लक्ष्य; एकान्तेन--तादात्म्यके द्वारा; आत्म-वित्--स्वरूपसिद्ध का; गति:--गन्तव्य |
हे भगवन्, स्वर्ग का राजा इन्द्र भी जीवन के परम लक्ष्य--भक्ति--को प्राप्त करने काइच्छुक रहता है।
इसी प्रकार जो अपने को आपसे अभिन्न मानते हैं ( अहं ब्रह्मास्मि), उनके भीएकमात्र लक्ष्य आप ही हैं।
किन्तु आपको प्राप्त कर पाना उनके लिए अत्यन्त कठिन है जब किभक्त सरलता से आपको पा सकता है।
"
त॑ दुराराध्यमाराध्य सतामपि दुरापया ।
एकान्तभकत्या को वाउछेत्पादमूलं विना बहि: ॥
५५॥
तम्--उसको ( तुमको ); दुराराध्यम्--पूजा करना अत्यन्त कठिन; आराध्य--पूजा करके; सताम् अपि--सत्पुरुषों के लिए भी;दुरापया--प्राप्त कर पाना दुष्कर; एकान्त--शुद्ध; भक्त्या-- भक्ति से; क:ः--ऐसा कौन है; वाउ्छेत्--चाहेगा; पाद-मूलम्--चरणकमल; विना--रहित; बहि:--बाहरी लोग
हे भगवन्, शुद्ध भक्ति कर पाना तो मुक्त पुरुषों के लिए भी कठिन है, किन्तु आप हैं किएकमात्र भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं।
अत: जीवन-सिद्ध्धि का इच्छुक ऐसा कौन पुरुष होगा जोआत्म-साक्षात्कार की अन्य विधियों को अपनाएगा ?"
दुष्कर है।
यत्र निर्विष्टमरणं कृतान्तो नाभिमन्यते ।
विश्व विध्वंसयन्वीर्यशौर्यविस्फूर्जितश्रुवा ॥
५६॥
यत्र--जहाँ; निर्विष्टम् अरणम्--शरणागत प्राणी; कृत-अन्तः--दुर्दम्य काल; न अभिमन्यते-- आक्रमण नहीं करता; विश्वम्--समूचा ब्रह्माण्ड; विध्वंसयन्--संहार द्वारा; वीर्य--पराक्रम; शौर्य--प्रभाव; विस्फूर्जित--मात्र विस्तार से; भ्रुवा--भौंहों के |
उनके भृकुटि-विस्तार-मात्र से जो दुर्जेय काल तद्क्षण सारे ब्रह्माण्ड का संहार कर सकताहै, वही दुर्जेज काल आपको चरणकमलों की शरण में गये भक्त के निकट तक नहीं पहुँचपाता।
"
क्षणार्धेनापि तुलये न स्वर्ग नापुनर्भवम् ।
भगवत्सड्विसड्रस्य मर्त्यानां किमुताशिष: ॥
५७॥
क्षण-अर्धन--आधा क्षण; अपि--भी; तुलये--तुलना कर सकता; न--कभी नहीं; स्वर्गम्--स्वर्गलोक; न--न तो; अपुनः-भवम्--ब्रह्म से तादात्म्य; भगवत्-- भगवान् के; सड़ि--संगी; सड़स्य--संग का लाभ उठाने वाला; मर्त्यानामू--बद्धजीव का;किम् उत--वहाँ क्या है; आशिष: -- आशीर्वाद |
संयोग से भी यदि कोई क्षण भर के लिए भक्त की संगति पा जाता है, तो उसे कर्म औरज्ञान के फलों का तनिक भी आकर्षण नहीं रह जाता।
तब उन देवताओं के वरदानों में उसकेलिए रखा ही क्या है, जो जीवन और मृत्यु के नियमों के अधीन हैं ?"
अथानघाडुश्नेस्तव कीर्तितीर्थयो-रन्तर्बहिःस्नानविधूतपाप्मनाम् ।
भूतेष्वनुक्रोशसुसत्त्वशीलिनांस्यात्सड्रमोउनुग्रह एब नस्तव ॥
५८॥
अथ--अतः; अनघ-अड््रे:-- भगवान् के, जिनके चरण समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं; तब--तुम्हारी ( आपकी );कीर्ति--कीर्ति महिमा; तीर्थयो: --पवित्र गंगा जल; अन्तः--भीतर; बहिः --बाहर; स्नान--स्नान करना; विधूत--धोया हुआ;पाप्मनामू--मन की दूषित अवस्था; भूतेषु--सामान्य जीवों को; अनुक्रोश--कृपा या वर; सु-सत्त्व--पूर्णतया सतोगुण में;शीलिनाम्--ऐसे गुणों वालों का; स्थात्ू--हो; सड्रम:--साथ, समागम; अनुग्रह:--कृपा; एष:--यह; न:--हमको; तब--तुम्हारी ( आपकी )
हे भगवन्, आपके चरणकमल समस्त कल्याण के कारण हैं और समस्त पापों के कल्मषको विनष्ट करने वाले हैं।
अतः मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे अपने भक्तों की संगति काआशीर्वाद दें, क्योंकि आपके चरणकमलों की पूजा करने से वे पूर्णतया शुद्ध हो चुके हैं औरबद्धजीवों पर अत्यन्त कृपालु हैं।
मेरी समझ में तो आपका असली आशीर्वाद यही होगा कि आपमुझे ऐसे भक्तों की संगति करने की अनुमति दें।
"
न यस्य चित्त बहिरर्थविभ्रमंतमोगुहायां च विशुद्धमाविशत् ।
यद्भक्तियोगानुगृहीतमझझजसामुनिर्विचष्टे ननु तत्र ते गतिम् ॥
५९॥
न--कभी नहीं; यस्य--जिसका; चित्तम्--हृदय; बहिः--बाहरी; अर्थ--रुचि; विश्रमम्--मोहित; तम: -- अंधकार;गुहायाम्-कूप ( गुफा ) में; च--भी; विशुद्धम्ू-शुद्ध; आविशत्-- प्रवेश किया; यत्--जो; भक्ति-योग-- भक्ति;अनुगृहीतम्--कृपा प्राप्त; अज्खसा--प्रसन्नतापूर्वक; मुनिः--विचारवान; विच्ष्टे--देखता है; ननु--फिर भी; तत्र--वहाँ; ते--तुम्हारे; गतिमू--कार्यकलाप |
जिसका हृदय भक्तियोग से पूर्ण रूप से पवित्र हो चुका हो तथा जिस पर भक्ति देवी कीकृपा हो, ऐसा भक्त कभी भी अंधकूप सहश माया द्वारा मोहग्रस्त नहीं होता।
इस प्रकार समस्तभौतिक कल्मष से रहित होकर ऐसा भक्त आपके नाम, यश, स्वरूप, कार्य इत्यादि को अत्यन्तप्रसन्नतापूर्वक समझ सकता है।
"
यत्रेदं व्यज्यते विश्व विश्वस्मिन्ननभाति यत् ।
तत्त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव विस्तृतम् ॥
६०॥
यत्र--जहाँ; इदम्--यह; व्यज्यते--प्रकट है; विश्वम्ू--ब्रह्माण्ड; विश्वस्मिन्ू--हृश्य जगत में; अवभाति-- प्रकट होता है; यत्--जो; तत्ू--वह; त्वमू--तुम ( आप ); ब्रह्म--निर्गुण ब्रह्म; परम्-दिव्य; ज्योति:--तेज; आकाशम्--अकाश; इब--सहश;विस्तृतमू-फैला हुआ
हे भगवन्, निर्गुण ब्रह्म सूर्य के प्रकाश अथवा आकाश की भाँति सर्वत्र फैला हुआ है।
औरजो सारे ब्रह्माण्ड भर में फैला है तथा जिसमें सारा ब्रह्माण्ड दिखाई देता है, वह निर्गुण ब्रह्म आपही हैं।
"
यो माययेदं पुरुरूपयासृजद् बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः ।
यद्धेदबुद्धिः सदिवात्मदुःस्थयात्वमात्मतन्त्रं भगवन्प्रतीमहि ॥
६१॥
यः--जो; मायया--माया से; इदम्--यह; पुरु--अनेक; रूपया--रूपों के द्वारा; असृजत्--उत्पन्न किया; बिभर्ति--पालनकरता है; भूयः--पुनः; क्षपयति--संहार करता है; अविक्रिय:--बिना किसी परिवर्तन के; यत्--जो; भेद-बुद्धधि:--अन्तरकरने की बुद्धि; सतू-शाश्वत; इब--सहश; आत्म-दुःस्थया--अपने आपको कष्ट देते हुए; त्वम्ू--तुमको; आत्म-तन्त्रम्ू--पूर्णतया स्वतंत्र; भगवन्--हे भगवन्; प्रतीमहि--मैं समझता हूँ।
हे भगवन्, आपकी शक्तियाँ अनेक हैं और वे नाना रूपों में प्रकट होती हैं।
आपने ऐसी हीशक्तियों से इस दृश्य जगत की उत्पत्ति की है और यद्यपि आप इसका पालन इस प्रकार करते हैंमानो यह चिरस्थायी हो, किन्तु अन्त में आप इसका संहार कर देते हैं।
यद्यपि आप कभी-भीऐसे परिवर्तनों द्वारा विचलित नहीं होते, किन्तु जीवात्माएँ इनसे विचलित होती रहती हैं, इसलिएवे इस हश्य जगत को आपसे भिन्न अथवा पृथक् मानती हैं।
हे भगवन्, आप सर्वदा स्वतंत्र हैंऔर मैं तो इसे प्रत्यक्ष देख रहा हूँ।
"
क्रियाकलापैरिदमेव योगिनःश्रद्धान्विता: साधु यजन्ति सिद्धये ।
भूतेन्द्रियान्तःकरणोपलक्षितंबेदे च तन्त्रे च त एव कोविदा: ॥
६२॥
क्रिया--कार्य; कलापै:ः--विधियों से; इदम्--यह; एव--निश्चय ही; योगिन:--योगीजन; श्रद्धा-अन्विता:-- श्रद्धा तथा दृढ़निश्चय से; साधु--उचित रीति से; यजन्ति--पूजा करते हैं; सिद्धये--सिद्धि के लिए; भूत-- भौतिक शक्ति; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ;अन्तः-करण--हृदय; उपलक्षितम्--के द्वारा लक्षित; वेदे--वेदों में; च-- भी; तन्त्रे--शास्त्रों में; च-- भी; ते--आप; एव--निश्चय ही; कोविदा:--पदु, मर्मज्ञ
है भगवन्, आपका विराट रूप, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहंकार (जो भौतिक हैं ) तथा आपके अंश रूप सर्व नियामक परमात्मा इन सभी पाँच तत्त्वों से बना है।
भक्तों के अतिरिक्तअन्य योगी--यथा कर्मयोगी तथा ज्ञानयोगी--अपने-अपने पदों में अपने-अपने कार्यो द्वाराआपकी पूजा करते हैं।
वेदों में तथा शास्त्रों में जो वेदों के निष्कर्ष हैं, कहा गया है कि केवलआप ही पूज्य हैं।
सभी वेदों का यही अभिमत है।
"
त्वमेक आद्य:ः पुरुष: सुप्तशक्ति-स्तया रजःसत्त्वतमो विभिद्यते ।
महानहं ख॑ मरुदग्निवार्धरा:सुरर्षयो भूतगणा इदं यतः ॥
६३॥
त्वमू--तुम; एक:--अकेले; आद्य:--आदि; पुरुष: --पुरुष; सुप्त--सोई हुई; शक्ति:--शक्ति; तया--उससे; रज:--रजोगुण;सत्त्व--सतोगुण; तम:ः--अज्ञान, तमोगुण; विभिद्यते-- अनेक भेद हो जाते हैं; महान्ू--समष्टि शक्ति; अहम्--अहंकार; खम्--आकाश; मरुतू--वायु; अग्नि-- अग्नि; वा:-- जल; धरा:--पृथ्वी; सुर-ऋषय: --देवता तथा ऋषिगण; भूत-गणा:--जीव;इदम्--यह सब; यतः--जिससे
हे भगवन्, आप समस्त कारणों के कारण एकमात्र परम पुरुष हैं।
इस भौतिक जगत कीसृष्टि के पूर्व आपकी भौतिक शक्ति सुप्त रहती है, किन्तु जब आपकी शक्ति गतिमान होती है, तोआपके तीनों गुण--सत्त्व, रज तथा तमो गुण--क्रिया करते हैं।
फलस्वरूप समष्टि भौतिकशक्ति अर्थात् अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तथा विभिन्न देवता एवं ऋषिगणप्रकट होते हैं।
इस प्रकार भौतिक जगत की उत्पत्ति होती है।
"
सृष्टे स्वशक्त्येदमनुप्रविष्ट-श्वतुर्विध॑ पुरमात्मांशकेन ।
अथो विदुस्तं पुरुष सन्तमन्तर्भुड़े हषीकैर्मधु सारघं यः ॥
६४॥
सृष्टम्--सृष्टि में; स्व-शक्त्या--अपनी ही शक्ति से; इदम्--इस दृश्य जगत में; अनुप्रविष्ट: -- प्रवेश करते हुए; चतु:-विधम्--चार प्रकार के; पुरमू--शरीर; आत्म-अंशकेन--अपने ही अंश रूप; अथो--अतः ; विदु:--जानो; तम्--उस; पुरुषम्-- भोक्ताको; सन्तम्--स्थित; अन्त:-- भीतर; भुड़े --भोग करता है; हषीकै: --इन्द्रियों द्वारा; मधु--मिठास; सार-घम्--मधु, शहद;यः--जो।
है भगवन्, आप अपनी शक्तियों के द्वारा सृष्टि कर लेने के बाद, सृष्टि में चार रूपों में प्रवेशकरते हैं।
आप जीवों के अन्तःकरण में स्थित होने के कारण उन्हें जानते हैं और यह भी जानते हैंकि वे किस प्रकार इन्द्रिय-भोग कर रहे हैं।
इस भौतिक जगत का तथाकथित सुख ठीक वैसाही है जैसा कि शहद के छत्ते में मधु एकत्र होने के बाद मधुमक्खी द्वारा उसका आस्वाद।
"
स एष लोकानतिचण्डवेगोविकर्षसि त्वं खलु कालयान: ।
भूतानि भूतैरनुमेयतत्त्वोघनावलीर्वायुरिवाविषह्य: ॥
६५॥
सः--वह; एष:--यह; लोकानू्--सारे लोकों को; अति-- अत्यधिक; चण्ड-वेग:--प्रचण्ड वेग; विकर्षसि--नष्ट करता है;त्वमू--तुम; खलु--फिर भी; काल-यान:--समय आने पर; भूतानि--सभी जीव; भूतैः--अन्य जीवों से; अनुमेय-तत्त्व: --परम सत्य का अनुमान लगाया जा सकता है घन-आवली:--बादल वायु:--वायु; इब--सहश; अविषह्ाय:--असहा।
हे भगवन्, आपकी परम सत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता, किन्तु संसार कीगतिविधियों को देखकर कि समय आने पर सब कुछ विनष्ट हो जाता है, इसका अनुमान लगायाजा सकता है।
काल का वेग अत्यन्त प्रचण्ड है और प्रत्येक वस्तु किसी अन्य वस्तु के द्वाराविनष्ट होती जा रही है--जैसे एक पशु दूसरे पशु द्वारा निगल लिया जाता है।
काल प्रत्येक वस्तुको उसी प्रकार तितर-बितर कर देता है, जिस प्रकार आकाश में बादलों को वायु छिन्न-भिन्नकर देती है।
"
प्रमत्तमुच्चैरिति कृत्यचिन्तयाप्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् ।
त्वमप्रमत्त: सहसाभिपद्यसेक्षुल्लेलिहानोउहिरिवाखुमन्तकः ॥
६६॥
प्रमत्तमू--पागल पुरुष; उच्चै:--जोर से; इति--इस प्रकार; कृत्य--किये जाने वाले; चिन्तया--ऐसी इच्छा से; प्रवृद्ध--अत्यधिक अग्रसर; लोभम्ू--लालच; विषयेषु-- भौतिक सुख में; लालसम्--ऐसा चाहते हुए; त्वमू--तुम; अप्रमत्त: --पूर्णतयासमाधि में; सहसा--एकाएक; अभिपद्यसे--उन्हें पकड़ लेता है; क्षुत्-- भूखा; लेलिहान:--लालची जीभ से; अहि:ः--साँप;इब--सहृश; आखुम्--चूहे को; अन्तकः--विनष्ट करने वाला, काल।
हे भगवन्, इस संसार के सारे प्राणी कुछ-न-कुछ योजना बनाने में पागल हैं तथा यह यावह करते रहने की इच्छा से काम में जुटे रहते हैं।
अनियंत्रित लालच के कारण यह सब होता है।
जीवात्मा में भौतिक सुख की लालसा सदैव बनी रहती है, किन्तु आप नित्य सतर्क रहते हैं औरसमय आने पर आप उस पर उसी प्रकार टूट पड़ते हैं जिस प्रकार सर्प चूहे पर झपटता है औरआसानी से निगल जाता है।
"
कस्त्वत्पदाब्ज॑ विजहाति पण्डितोयस्तेउवमानव्ययमानकेतन: ।
विशड्ज॒यास्मद्गुरुरर्चति सम यद्विनोपपत्ति मनवश्चतुर्दश ॥
६७॥
कः--कौन; त्वत्--तुम्हारे; पद-अब्जमू--चरणकमल; विजहाति---अवहेलना करेगा; पण्डित:--विद्वान; यः --जो; ते--तुमको; अवमान--उपेक्षा करते हुए; व्ययमान--घटाते हुए; केतन:--यह शरीर; विशड्जूया--बिना किसी सन्देह के; अस्मत्--हमारे; गुरु:ः--गुरु, पिता; अर्चति स्म--पूजा करता था; यत्--जो; विना--बिना; उपपत्तिमू--विक्षोभ; मनव:--मनुगण;चतु:-दश--चौदह।
हे भगवन्, कोई भी विद्वान् पुरुष जानता है कि आपकी पूजा के बिना सारा जीवन व्यर्थ है।
भला यह जानते हुए वह आपके चरणकमलों की उपासना क्यों त्यागेगा? यहाँ तक कि हमारेगुरु तथा पिता ब्रह्मा ने बिना किसी भेदभाव के आपकी आराधना की और चौदहों मनुओं नेउनका अनुसरण किया।
"
अथ त्वमसि नो ब्रह्मन्परमात्मन्विपश्चिताम् ।
विश्व रुद्रभयध्वस्तमकुतश्चिद्धया गति: ॥
६८॥
अथ--अत:ः; त्वम्--तुम, हे स्वामी; असि--हो; न:--हमारे; ब्रह्मनू--हे परब्रह्म; परम-आत्मन्--हे परमात्मा; विपश्चिताम्--विद्वान मनुष्यों के लिए; विश्वम्--सारा ब्रह्माण्ड; रुद्र-भय--रुद्र से भयभीत; ध्वस्तम्--संहार किया हुआ; अकुतश्चित्-भया--निश्चित रूप से निर्भर, भयशून्य; गति:--गन्तव्य, आश्रय |
हे भगवन्, जो वास्तव में दिद्वान् मनुष्य हैं, वे सभी आपको परब्रह्म एवं परमात्मा के रूप मेंजानते हैं।
यद्यपि सारा ब्रह्माण्ड भगवान् रुद्र से भयभीत रहता है, क्योंकि वे अन्ततः प्रत्येक वस्तुको नष्ट करने वाले हैं, किन्तु विद्वान् भक्तों के लिए आप निर्भय आश्रय हैं।
"
इदं जपत भद्गं वो विशुद्धा नृपनन्दना: ।
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो भगवत्यर्पिताशया: ॥
६९॥
इदम्--यह; जपत--जपते हुए; भद्रमू--समस्त कल्याण; व:--तुम सभी; विशुद्धा: --शुद्ध; नृप-नन्दना: --राजा के पुत्र; स्व-धर्मम्--अपने-अपने कार्य; अनुतिष्ठन्त:--करते हुए; भगवति-- भगवान् को; अर्पित-- अर्पित कर; आशया: --समस्तआज्ञाकारिता से युक्त
हे राजपुत्रो, तुम लोग विशुद्ध हृदय से राजाओं की भाँति अपने-अपने नियत कर्म करते रहो।
भगवान् के चरणकमलों पर अपने मन को स्थिर करते हुए इस स्तुति (स्तोत्र ) का जप करो।
इससे तुम्हारा कल्याण होगा, क्योंकि इससे भगवान् तुम पर अत्यधिक प्रसन्न होंगे।
"
तमेवात्मानमात्मस्थ॑ सर्वभूतेष्ववस्थितम् ।
'पूजयध्वं गृणन्तश्न ध्यायन्तश्चासकृद्धरिम् ॥
७०॥
तम्--उस; एव--निश्चय ही; आत्मानम्--परमात्मा को; आत्म-स्थम्--अपने हृदय में; सर्व--समस्त; भूतेषु--प्रत्येक जीव मेंस्थित; अवस्थितम्--स्थित; पूजयध्वम्--उनकी पूजा करो; गृणन्तः च--सदैव कीर्तन करते हुए; ध्यायन्त: च--ध्यान करतेहुए; असकृत्ू--निरन्तर; हरिम्ू-- श्रीभगवान् का |
अतः हे राजकुमारो, भगवान् सबके हृदयों में स्थित हैं।
वे तुम लोगों के भी हृदयों में हैं,अतः भगवान् की महिमा का जप करो और निरन्तर उसी का ध्यान करो।
"
योगादेशमुपासाद्य धारयन्तो मुनिव्रता: ।
समाहितधियः सर्व एतदभ्यसताहता: ॥
७१॥
योग-आदेशम्-- भक्तियोग का यह आदेश; उपासाद्य--निरन्तर पढ़ते हुए; धारयन्तः--तथा आत्मसात करते हुए; मुनि-ब्रता:--मुनियों का व्रत, मौन ब्रत लो; समाहित--मन में सदैव स्थिर, एकाग्रभाव से; धियः--बुद्धि से; सर्वे--तुम सब; एतत्--यह;अभ्यसत--अभ्यास करो; आहता:--अत्यन्त आदरपूर्वक |
हे राजपुत्रो, मैंने स्तुति के रूप में तुम्हें पवित्र नाम-जप की योगपद्धति बतला दी है।
तुम सबइस स्तोत्र को अपने मनों में धारण करते हुए इस पर हढ़ रहने का व्रत लो जिससे तुम महान् मुनिबन सको |
तुम्हें चाहिए कि मुनि की भाँति मौन धारण करके तथा ध्यानपूर्वक एवं आदर सहितइसका पालन करो।
"
इदमाह पुरास्माकं भगवान्विश्वसृक्पति: ।
भृग्वादीनामात्मजानां सिसृक्षु: संसिसृक्षताम् ॥
७२॥
इदम्--यह; आह--कहा; पुरा--पहले; अस्माकम्--हमसे; भगवान्--स्वामी; विश्व-सृक्--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा; पति: --स्वामी;भूगु-आदीनाम्-- भूगु इत्यादि ऋषियों का; आत्मजानाम्ू--उनके पुत्रों का; सिसृक्षु;:--उत्पत्तिके इच्छुक; संसिसृक्षताम्--सृष्टि केलिए उत्तरदायी |
सर्वप्रथम समस्त प्रजापतियों के स्वामी ब्रह्मा ने हमें यह स्तुति सुनायी थी।
भूगु आदिप्रजापतियों को भी इसी स्तोत्र की शिक्षा दी गई थी, क्योंकि वे सन््तानोत्पत्ति करना चाह रहे थे।
"
ते बयं नोदिताः सर्वे प्रजासर्ग प्रजेश्वरा: ।
अनेन ध्वस्ततमस: सिसृक्ष्मो विविधा: प्रजा: ॥
७३॥
ते--उसके द्वारा; बयम्--हम सब; नोदिताः --आज्ञापित; सर्वे--सभी; प्रजा-सर्गे --प्रजा उत्पन्न करते समय; प्रजा-ई श्वरा: --समस्त जीवों के नियन्ता; अनेन--इसके द्वारा; ध्वस्त-तमसः --सभी प्रकार के अज्ञान से मुक्त होकर; सिसृक्ष्म: --हमने उत्पन्नकिया; विविधा:--अनेक प्रकार के; प्रजा:--जीव
जब ब्रह्मा द्वारा हम सब प्रजापतियों को प्रजा उत्पन्न करने का आदेश हुआ तो हमने भगवान्की प्रशंसा में इस स्तोत्र का जप किया जिससे हम समस्त अविद्या से पूरी तरह से मुक्त हो गये।
इस तरह हम विविध प्रकार के जीवों की उत्पत्ति कर पाये।
"
अथेदं नित्यदा युक्तो जपन्नवहितः पुमान् ।
अचिराच्छेय आणोति वासुदेवपरायण: ॥
७४॥
अथ--इस प्रकार; इृदम्--यह; नित्यदा--नियमित रूप से; युक्त:--मनोयोग से; जपन्--मन के भीतर जपने से; अवहित:--पूर्ण रूप से सतर्क; पुमान्ू--मनुष्य; अचिरात्--अविलम्ब; श्रेय: --कल्याण; आष्नोति--प्राप्त करता है; वासुदेव-परायण:--भगवान् कृष्ण का भक्त
भगवान् कृष्ण के भक्त जिसका मन सदैव उन्हीं में लीन रहता है और जो अत्यन्त ध्यान तथाआदरपूर्वक इस स्तोत्र का जप करता है शीघ्र ही जीवन की परम सिद्धि प्राप्त होगी।
"
श्रेयसामिह सर्वेषां ज्ञानं नि: श्रेयसं परम् ।
सुखं तरति दुष्पारं ज्ञाननौर्व्यसनार्णवम् ॥
७५॥
श्रेयसाम्--समस्त उपलब्धियों का; इह--इस संसार में; सर्वेषाम्--प्रत्येक पुरुष का; ज्ञानम्ू--ज्ञान; निःश्रेयसम्--परम लाभ;परमू--दिव्य; सुखम्--सुख; तरति--लाँघ जाता है; दुष्पारम्--दुस्तर; ज्ञान--ज्ञान रूपी; नौ:--नाव; व्यसन--खतरा;अर्णवम्--समुद्र |
इस संसार में उपलब्धि के अनेक प्रकार हैं, किन्तु इन सबों में ज्ञान की उपलब्धि सर्वोपरिमानी जाती है, क्योंकि ज्ञान की नौका में आरूढ़ होकर ही अज्ञान के सागर को पार किया जासकता है।
अन्यथा यह सागर दुस्तर है।
"
य इमं॑ श्रद्धया युक्तो मद्गीत॑ भगवत्स्तवम् ।
अधीयानो दुराराध्यं हरिमाराधयत्यसौ ॥
७६॥
यः--जो कोई; इमम्--यह; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; युक्त:--अनुरक्तिपूर्वक; मत्-गीतम्--मेरे द्वारा रचित गीत या मेरे द्वारा गायागीत; भगवत््-स्तवम्-- भगवान् की प्रार्थना; अधीयान:--नियमित पाठ द्वारा; दुराराध्यम्--पूजा करना अत्यन्त कठिन; हरिम्--भगवान् को; आराधयति--किन्तु पूजा कर सकता है; असौ--ऐसा मनुष्य |
यद्यपि भगवान् की भक्ति करना एवं उनकी पूजा करना अत्यन्त कठिन है, किन्तु यदि कोईमेरे द्वारा रचित एवं गाये गये इस स्तोत्र का केवल पाठ करता है, तो वह सरलतापूर्वक भगवान्की कृपा प्राप्त कर सकता है।
"
विन्दते पुरुषो मुष्माद्यद्यदिच्छत्यसत्वरम् ।
मदगीतगीतात्सुप्रीताच्छेयसामेकवल्लभात् ॥
७७॥
विन्दते--प्राप्त करता है; पुरुष:-- भक्त; अमुष्मात्-- भगवान् से; यत् यत्--जो जो; इच्छति--कामना करता है; असत्वरम्--स्थिर होकर; मत्-गीत--मेरे द्वारा गाया हुआ; गीतात्--गीत से; सु-प्रीतात्-- भगवान् से, जो अत्यन्त प्रसन्न होते हैं; श्रेयसाम्--समस्त आशीर्वादों ( वर ) में से; एक--एक; वल्लभातू--प्रियतम से
समस्त शुभ आशीर्वादों में से सर्वप्रिय वस्तु भगवान् हैं।
जो मनुष्य मेरे द्वारा गाये गये इसगीत को गाता है, वह भगवान् को प्रसन्न कर सकता है।
ऐसा भक्त भगवान् की भक्ति में स्थिरहोकर परमेश्वर से मनवाउिछत फल प्राप्त कर सकता है।
"
इृदं यः कल्य उत्थाय प्राज्जलि: श्रद्धयान्वितः ।
श्रुणुयाच्छावयेन्मरत्यों मुच्यते कर्मबन्धने: ॥
७८ ॥
इदम्--यह स्तुति; यः--जो भक्त; कल्ये--प्रातःकाल; उत्थाय--उठकर; प्राज्ललि:ः--हाथ जोड़ कर; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक;अन्वित:--लीन रहकर; श्रूणुयात्--स्वयं जपता तथा सुनता है; श्रावयेत्--तथा सुनाता है; मर्त्य:--ऐसा मनुष्य; मुच्यते--मुक्तहो जाता है; कर्म-बन्धनै:--सकाम कर्मों से उत्पन्न सभी प्रकार के कर्म बन्धनों से |
जो भक्त प्रातःकाल उठकर हाथ जोड़कर शिवजी के द्वारा गाई गई इस स्तुति का जप करता है और अन्यों को सुनाता है, वह निश्चय ही समस्त कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है।
"
गीत॑ मयेदं नरदेवनन्दनाःपरस्य पुंसः परमात्मनः स्तवम् ।
जपन्त एकाग्रधियस्तपो महत्चरध्वमन्ते तत आप्स्यथेप्सितम् ॥
७९॥
गीतम्--गाया गया; मया--मेरे द्वारा; इदम्--यह; नरदेव-नन्दना: --हे राजपुत्रो; परस्य-- परमे श्वर का; पुंसः-- भगवान्; परम-आत्मन: -- प्रत्येक का परमात्मा; स्तवम्--प्रार्थना, स्तोत्र; जपन्त:ः--जप करते हुए; एक-अग्र--पूर्ण मनोयोग से; धिय: --बुद्धि;तपः--तपस्या; महत्--महान; चरध्वम्--तुम अभ्यास करो; अन्ते--अन्त में; तत:--तत्पश्चात्: आप्स्यथ--प्राप्त करोगे;ईप्सितम्--अभीष्ट, वांछित फल |
हे राजकुमारो, मैंने तुम्हें जो स्तुति गाकर सुनाई वह परमात्मा स्वरूप भगवान् को प्रसन्न करनेके निमित्त थी।
मैं तुम्हें इस स्तुति को गाने की सलाह देता हूँ, क्योंकि यह बड़ी-से-बड़ी तपस्याके समान प्रभावशाली है।
इस प्रकार जब तुम सब परिपक्व हो जाओगे तो तुम्हारा जीवन सफलहोगा और तुम्हें सारे अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त हो सकेंगे।
"
