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अध्याय तेईसवाँ: महाराज पृथु का घर वापस जाना

4.23मैत्रेय उवाचइष्टात्मानं प्रवयसमेकदा वैन्य आत्मवान्‌ ।

आत्मनावर्धिताशेषस्वानुसर्ग: प्रजापति: ॥

१॥

जगतस्तस्थुषश्चापि वृत्तिदो धर्मभूृत्सताम्‌ ।

निष्पादिते श्वरादेशो यदर्थमिह जज्ञिवान्‌ ॥

२॥

आत्मजेष्वात्मजां न्यस्य विरहाद्ुदुतीमिव ।

प्रजासु विमनःस्वेक: सदारोगात्तपोवनम्‌ ॥

३॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; दृष्टा--देखकर; आत्मानम्‌--शरीर की; प्रवयसम्‌--वृद्धावस्था; एकदा--एक बार;वैन्य:--राजा पृथु ने; आत्म-वान्‌ू--आध्यात्मिक शिक्षा से पूर्ण रूप से ज्ञात; आत्मना--अपने द्वारा; वर्धित--बढ़ा हुआ;अशेष--अपार; स्व-अनुसर्ग: -- भौतिक एऐश्वर्य की उत्पत्ति; प्रजा-पति:--प्रजा का रक्षक; जगत:--चल; तस्थुष:-- अचल;च--भी; अपि--निश्चय ही; वृत्ति-दः--आजीविका देने वाला; धर्म-भृत्‌--धर्म मानने वाला; सताम्‌--भक्तों का; निष्पादित--पूर्णतया सम्पन्न किया गया; ई श्वर-- भगवान्‌ की; आदेश: --आज्ञा; यत्‌-अर्थम्‌--उनकी सहमति से; इह--इस संसार में;जज्ञिवानू-किया; आत्म-जेषु--अपने पुत्रों को; आत्म-जाम्‌--पृथ्वी को; न्यस्य--सूचित करते हुए; विरहात्‌--वियोग से;रुदतीम्‌ इब--मानो विलाप करती हुईं; प्रजासु--प्रजा को; विमन:सु--दुखियारों को; एक:--अकेले; स-दार:--अपनी पत्नीसहित; अगातू--चला गया; तपः-वनम्‌--वन में जहाँ तप किया जा सके |

अपने जीवन की अन्तिम अवस्था में, जब महाराज पृथु ने देखा कि मैं वृद्ध हो चला हूँ तोउस महापुरुष ने, जो संसार का राजा था, अपने द्वारा संचित सारे ऐश्वर्य को जड़ तथा जंगमजीवों में बाँट दिया।

उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के लिए धार्मिक नियमों के अनुसार आजीविका( पेंशन ) की व्यवस्था कर दी और भगवान्‌ के आदेशों का पालन करके, उनकी पूर्ण सहमति सेउन्होंने अपने पुत्रों को अपनी पुत्रीस्वरूपा पृथ्वी को सौंप दिया।

तब महाराज पृथु अपनी प्रजाको, जो राजा के वियोग के कारण विलख रही थी, त्याग कर तपस्या करने के लिए पत्नीसहितवन को अकेले चले गये।

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तत्राप्यदा भ्यनियमो वैखानससुसम्मते ।

आरब्ध उग्रतपसि यथा स्वविजये पुरा ॥

४॥

तत्र--वहाँ; अपि-- भी; अदाभ्य--कठोर; नियम:--तपस्या; वैखानस--विरक्त जीवन ( वानप्रस्थ ) के नियम; सु-सम्मते--पूर्णतया मान्य; आरब्ध: --प्रारम्भ करते हुए; उग्र--कठोर; तपसि--तपस्या; यथा--जिस प्रकार; स्व-विजये--संसार कोजीतने में; पुरा--पहले |

पारिवारिक जीवन से निवृत्त होकर महाराज पृथु ने वानप्रस्थ जीवन के नियमों का कड़ाई सेपालन किया और वन में कठिन तपस्या की।

वे इन कार्यो में उसी गम्भीरता से जुट गये जिसतरह पहले वे शासन चलाने तथा हर एक पर विजय पाने के लिए जुट जाते थे।

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कन्दमूलफलाहारः शुष्कपर्णाशनः क्वचित्‌ ।

अब्भक्ष: कतिचित्पक्षान्वायुभक्षस्तत: परम्‌ ॥

५॥

कन्द--तना; मूल--जड़ें; फल--फल; आहार: -- खाकर; शुष्क --सूखी ; पर्ण--पत्तियाँ; अशन:-- खाकर; क्वचित्‌--कभी-कभी; अपू-भक्ष:-- जल पीकर; कतिचित्‌--कई; पक्षान्‌ू--पखवारों तक; वायु--हवा; भक्ष:--साँस लेकर; ततः परमू--

तत्पश्चात्‌तपोवन में महाराज पृथु कभी वृक्षों के तने तथा जड़ें खाते रहे तो कभी फल तथा सूखीपत्तियाँ।

कुछ हफ्तों तक उन्होंने केवल जल पिया।

अन्त में वे केवल वायु ग्रहण करके उसी सेनिर्वाह करने लगे।

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ग्रीष्मे पञ्जञतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनि: ।

आकण्ठमग्न: शिशिरे उदके स्थण्डिलेशय: ॥

६॥

ग्रीष्मे--गर्मी की ऋतु में; पञ्ञ-तपाः--पाँच प्रकार के ताप; वीर:--वीर; वर्षासु--वर्षा ऋतु में; आसारषाट्‌--वर्षा की झड़ीकी पहुँच में रहकर; मुनि:ः--मुनियों की तरह; आकण्ठ--गले तक; मग्न:--डूबे हुए; शिशिरे--जाड़े में; उदके --जल केभीतर; स्थण्डिले-शय:ः--फर्श पर लेटे हुए।

वानप्रस्थ के नियमों तथा ऋषियों-मुनियों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए पृथु महाराजने ग्रीष्म ऋतु में पञ्ञाग्नियों का सेवन किया, वर्षा ऋतु में वे वर्षा की झड़ी में बाहर ही रहे औरजाड़े की ऋतु में गले तक जल के भीतर खड़े रहे।

वे भूमि पर बिना बिस्तर के सोते रहे।

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तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरता जितानिल: ।

आरिराधयिषु: कृष्णमचरत्तप उत्तमम्‌ ॥

७॥

तितिक्षु;:--सहन करते हुए; यत--वश में करते हुए; वाक्‌ु--शब्द; दान्तः--इन्द्रियों को वश में करते हुए; ऊर्ध्ब-रेता:--वीर्यस्खलन के बिना; जित-अनिल:--प्राण वायु को जीतते हुए; आरिराधयिषु: --केवल इच्छा करते हुए; कृष्णम्‌--कृष्ण को;अचरत्‌--अभ्यास किया; तपः--तपस्या; उत्तमम्‌- श्रेष्ठ |

अपनी वाणी तथा इन्द्रियों को वश में करने, वीर्य स्खलित न होने देने तथा अपने शरीर केभीतर प्राण-वायु को वश में करने के लिए महाराज पृथु ने ये सारी कठिन तपस्याएँ साधीं।

यहसब उन्होंने श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किया।

इसके अतिरिक्त उनका कोई अन्य प्रयोजननथा।

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तेन क्रमानुसिद्धेन ध्वस्तकर्ममलाशयः ।

प्राणायामै: सन्निरुद्धषड्वर्गए्छन्नबन्धन: ॥

८ ॥

तेन--इस तरह तपस्या करने से; क्रम--क्रमश:; अनु--निरन्तर; सिद्धेन--सिद्धि से; ध्वस्त--विनष्ट; कर्म--सकाम कर्म;मल--गंदी वस्तुएँ; आशयः:--इच्छा; प्राण-आयामै: -- प्राणायाम योग के अभ्यास से; सन्‌--होकर; निरुद्ध--रुका हुआ; षटू-वर्ग:--मन तथा इन्द्रियाँ; छिन्न-बन्धन:--समस्त बन्धनों से मुक्त |

इस प्रकार कठिन तपस्या करने से महाराज पृथु क्रमशः आध्यात्मिक जीवन में स्थिर औरसकाम कर्म की समस्त इच्छाओं से पूर्ण रूप से मुक्त हो गये।

उन्होंने मन तथा इन्द्रियों को वश मेंकरने के लिए प्राणायाम योग का भी अभ्यास किया जिससे वे सकाम कर्म की समस्त इच्छाओंसे पूर्ण रूप से मुक्ति पा गये।

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सनत्कुमारो भगवान्यदाहाध्यात्मिकं परम्‌ ।

योगं तेनैव पुरुषमभजत्पुरुषर्षभ: ॥

९॥

सनतू-कुमार:--सनत्कुमार ने; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; यत्‌ू--जो; आह--कहा; आध्यात्मिकम्‌--जीवन कीआध्यात्मिक उन्नति; परमू--चरम; योगम्‌ू--योग; तेन--उससे; एव--निश्चय ही; पुरुषम्‌--परम पुरुष; अभजत्‌--पूजा की;पुरुष -ऋषभः--मनुष्यों में श्रेष्ठ |

इस प्रकार मनुष्यों में श्रेष्ठ महाराज पृथु ने आध्यात्मिक उन्नति के उस पथ का अनुसरणकिया जिसका उपदेश सनत्कुमार ने किया था; अर्थात्‌ उन्होंने भगवान्‌ कृष्ण की पूजा की।

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भगवद्धर्मिण: साधो: श्रद्धया यततः सदा ।

भक्तिर्भगवति ब्रह्मण्यनन्यविषयाभवत्‌ ॥

१०॥

भगवत्‌ू-धर्मिण: -- भगवान्‌ की भक्ति करने वाला; साधो:--भक्त का; श्रद्धया-- श्रद्धा से; यतत:--प्रयास करते हुए; सदा--सदैव; भक्ति:-- भक्ति; भगवति-- भगवान्‌ की; ब्रह्मणि--निर्गुण ब्रह्म की उत्पत्ति; अनन्य-विषया--बिना किसी विचलन के,हढ़; अभवत्‌--हो गया।

इस प्रकार महाराज पृथु चौबीसों घंटे कठोरता से विधि-विधानों का पालन करते हुए पूर्णरूप से भक्ति में लग गये।

इससे भगवान्‌ कृष्ण के प्रति इनमें प्रेम तथा भक्ति का उदय हुआ औरवे स्थिर हो गये।

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तस्यानया भगवत:ः परिकर्मशुद्ध-सत्त्वात्मनस्तदनुसंस्मरणानुपूर्त्या ।

ज्ञानं विरक्तिमदभून्रिशितेन येनचिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम्‌ ॥

११॥

तस्य--उसका; अनया--इससे; भगवतः-- भगवान्‌ का; परिकर्म--भक्ति के कार्य; शुद्ध-शुद्ध, दिव्य; सत्त्व-- अस्तित्व;आत्मन:--मन का; तत्‌--पर मे श्वर का; अनुसंस्मरण--निरन्तर स्मरण; अनुपूर्त्या--ठीक से किये जाने पर; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान;विरक्ति--अनासक्ति; मत्‌--रखते हुए; अभूत्‌--प्रकट हुआ; निशितेन--उत्कट कार्यों से; येन--जिससे; चिच्छेद--पृथक्‌ होतेहैं; संशय-पदम्‌--संदेह की स्थिति; निज--अपनी; जीव-कोशम्‌--जीवात्मा का आवरण ( कोश )।

निरन्तर भक्ति करते रहने से पृथु महाराज का मन शुद्ध हो गया, अतः वे भगवान्‌ केचरणारविन्द का निरन्तर चिन्तन करने लगे।

इससे वे पूरी तरह से विरक्त हो गये और पूर्णज्ञानप्राप्त करके समस्त संशयों से परे हो गये।

इस तरह वे मिथ्या अहंकार तथा जीवन के भौतिकबोध से मुक्त हो गये।

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छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-स्तत्तत्यजेच्छिनदिदं वयुनेन येन ।

तावन्न योगगतिभियतिरप्रमत्तोयावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यातू ॥

१२॥

छिन्न--पृथक्‌ होकर; अन्य-धी:--जीवन के अन्य बोध ( देहात्म बुद्धि )) अधिगत--पूर्ण आश्वस्त होकर; आत्म-गति:--आध्यात्मिक जीवन का चरम लक्ष्य; निरीह:--इच्छारहित; तत्‌--उसे; तत्यजे--त्याग दिया; अच्छिनत्‌--काट दिया था;इदम्‌--यह; वयुनेन--ज्ञान से; येन--जिससे; तावत्‌--तब तक; न--कभी नहीं; योग-गतिभि:--योग पद्धति का अभ्यास;यति:ः--अभ्यास करने वाला; अप्रमत्त:--बिना किसी भ्रम के; यावत्‌--जब तक; गदाग्रज--कृष्ण का; कथासु--शब्द;रतिमू--आकर्षण; न--कभी नहीं; कुर्यात्‌ू--इसे करो

जब महाराज पृथु देहात्मबुद्धि से पूर्ण रूप से मुक्त हो गये तो उन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्ण कोपरमात्मा रूप में प्रत्येक के हृदय में स्थित देखा।

इस प्रकार उनसे सारे आदेश पाने में समर्थ होनेपर उन्होंने योग तथा ज्ञान की अन्य सारी विधियाँ त्याग दीं।

ज्ञान तथा योग की सिद्ध्ियों में भीउनकी रुचि नहीं रह गई, क्योंकि उन्होंने पूरी तरह यह अनुभव किया कि जीवन का चरम लक्ष्यतो श्रीकृष्ण की भक्ति है और जब तक योगी तथा ज्ञानी कृष्णकथा के प्रति आकृष्ट नहीं होते,संसार सम्बन्धी उनके सारे भ्रम ( मोह ) कभी भी दूर नहीं हो सकते।

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एवं स वीरप्रवर: संयोज्यात्मानमात्मनि ।

ब्रह्मभूतो द॒ढं काले तत्याज स्वं कलेवरम्‌ ॥

१३॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--उसने; वीर-प्रवर: --वीरों में श्रेष्ठ; संयोज्य--प्रयुक्त करके; आत्मानमू--मन को; आत्मनि--परमात्मामें; ब्रह्म-भूतः--मुक्त होकर; हृढम्‌--ह॒ढ़तापूर्वक; काले--समय आने पर; तत्याज--त्याग दिया; स्वमू--अपना; कलेवरम्‌--शरीर

समय आने पर जब पृथु महाराज को अपना शरीर त्याग करना था उन्होंने अपने मन कोहढ़तापूर्वक श्रीकृष्ण के चरणकमलों में स्थिर कर लिया और इस प्रकार से ब्रह्मभूत अवस्था मेंस्थित होकर उन्होंने भौतिक शरीर त्याग दिया।

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सम्पीड् पायुं पार्णि भ्यां वायुमुत्सारयज्छनै: ।

नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुरःकण्ठशीर्षणि ॥

१४॥

सम्पीड्य--रोककर; पायुम्‌--गुदाद्वार; पार्णिणभ्यामू--एड़ी से; वायुमू--ऊपर जाने वाली वायु को; उत्सारयन्‌--ऊपरधकेलकर; शनै:--धीरे-धीरे; नाभ्यामू--नाभि से; कोष्ठेषु--हृदय तथा कण्ठ में; अवस्थाप्य--स्थिर करके ; हत्‌--हृदय में;उरः--ऊपर की ओर; कण्ठ--गला, कंठ; शीर्षण--दोनों भौहों के मध्य ( मस्तक ) में ।

जब महाराज पृथु ने विशेष यौगिक आसन साधा तो उन्होंने अपनी एड़ियों से अपना गुदाद्वारबन्द कर लिया और दोनों एड़ियों को दबाया, फिर धीरे-धीरे प्राणवायु को नाभिचक्र से होते हुएवे हृदय तथा कण्ठ तक ऊपर की ओर ले गये और अन्त में उसे दोनों भौहों के मध्य पहुँचादिया।

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उत्स्पयंस्तु त॑ मूर्थ्नि क्रमेणावेश्य निःस्पृहः ।

वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत्‌ ॥

१५॥

उत्सर्पयन्‌--इस प्रकार स्थापित करते हुए; तु--लेकिन; तम्‌--वायु को; मूर्ध्नि--सिर में; क्रमेण-- धीरे-धीरे; आवेश्य--रखतेहुए; निःस्पृहः--समस्त इच्छाओं से मुक्त होकर; वायुमू--शरीर के वायु भाग को; वायौ--ब्रह्मण्डकोश की समग्र वायु में;क्षितौ--सम्पूर्ण पृथ्वीकोश में; कायम्‌-- भौतिक शरीर को; तेज:--शरीर की अग्नि; तेजसि-- भौतिक कोश की सम्पूर्ण अग्निमें; अयूयुजत्‌--मिला दिया ।

इस प्रकार पृथु महाराज अपने प्राणवायु को धीरे धीरे ब्रह्मरन्थ्न तक ऊपर ले गये जिससेउनकी समस्त सांसारिक आकांक्षाएँ समाप्त हो गईं।

उन्होंने धीरे-धीरे अपने प्राण वायु को समष्टिवायु में, अपने शरीर को समष्टि पृथ्वी में और अपने शरीर की अग्नि ( तेज ) को समष्टि अग्नि मेंलीन कर दिया।

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खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागश: ।

क्षितिमम्भसि तत्तेजस्थदो वायौ नभस्यमुम्‌ ॥

१६॥

खानि--शरीर में विभिन्न इन्द्रियों के द्वार ( छिद्र )।

आकाशे--आकाश में; द्रवम्‌--तरल पदार्थ; तोये--जल में; यथा-स्थानम्‌--उपयुक्त स्थान पर; विभागशः--जिस प्रकार बे विभाजित हैं; क्षितिम्‌--पृथ्वी; अम्भसि--जल में; तत्‌ू--वह; तेजसि-- अग्नि में;अदः--अग्नि; वायौ--वायु में; नभसि-- आकाश में; अमुम्‌--उस |

इस प्रकार पृथु महाराज ने अपनी इन्द्रियों के छिद्रों को आकाश में और अपने शरीर के द्रवों,यथा रक्त तथा विभिन्न स्त्रावों को, समष्टि जल में, पृथ्वी को जल में, फिर जल को अग्नि में,अग्नि को वायु में और वायु को आकाश में मिला दिया ( लीन कर दिया )।

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इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्धवम्‌ ।

भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥

१७॥

इन्द्रियेषु--इन्द्रियों में; मनः--मन; तानि--इन्द्रियों को; तत्‌ू-मात्रेषु--इन्द्रियों के पदार्थों में; यथा-उद्धवम्‌--जहाँ से उनकीउत्पत्ति हुई; भूत-आदिना--पाँचों तत्त्वों द्वारा; अमूनि--वे सारे इन्द्रिय पदार्थ ( तन्मात्राएँ ); उत्कृष्प--बाहर निकाल कर;महति--महत्तत्व में; आत्मनि-- अहंकार को; सन्दधे--लीन कर दिया।

उन्होंने स्थितियों के अनुसार मन को इन्द्रियों में और इन्द्रियों को इन्द्रियपदार्थों ( तन्मात्राओं )में और अहंकार को समष्टि भौतिक शक्ति, महत्‌ तत्त्व, में लीन कर दिया।

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त॑ सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात्‌त॑ चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान्‌ ।

ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोजहात्प्रभु; ॥

१८॥

तम्‌--उसको; सर्व-गुण-विन्यासम्‌ू--समस्त गुणों के अगार; जीवे--उपाधियों को; माया-मये--समस्त शक्तियों का आगार;न्यधात्‌ू--स्थित किया; तम्‌--उस; च--भी; अनुशयम्‌--उपाधि; आत्म-स्थम्‌--आत्म-साक्षात्कार में स्थित; असौ--वह अनुशयी--जीवात्मा; पुमान्‌-- भोक्ता; ज्ञान--ज्ञान; वैराग्य--विरक्ति; वीर्येण--वीर्य से; स्वरूप-स्थ:--अपनी स्वाभाविकस्थिति में स्थित; अजहात्‌-- धाम को वापस गया; प्रभु:--नियन्ता के |

तब पृथु महाराज ने जीवात्मा की सम्पूर्ण उपाधि माया के परम प्रभु ( नियन्ता ) को सौंप दी।

ज्ञान तथा वैराग्य एवं भक्ति की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा वे जीवात्मा की उन समस्त उपाधियोंसे मुक्त हो गये, जिनसे वे घिरे थे।

इस प्रकार कृष्णभावना की अपनी मूल स्वाभाविक स्थिति( स्वरूप-स्थिति ) में रहकर उन्होंने प्रभु ( इन्द्रियों के नियन्‍्ता ) के रूप में अपने शरीर को त्यागदिया।

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अर्चिर्नाम महाराज्ञी तत्पत्यनुगता वनम्‌ ।

सुकुमार्यतदर्हा च यत्पद्भ्यां स्पर्शनं भुवः ॥

१९॥

अर्चि: नाम--अर्चि नामक; महा-राज्ञी--महारानी; तत्‌-पत्नी--महाराज पृथु की पत्नी; अनुगता--अपने पति के साथ जानेवाली; वनम्‌--वन को; सु-कुमारी --अत्यन्त कोमल शरीर वाली; अ-तत्‌-अर्हा--योग्य न होना; च-- भी; यत्‌-पद्भ्याम्‌--जिसके चरण से; स्पर्शनम्‌--स्पर्श; भुवः--पृथ्वी पर |

पृथु महाराज की पत्नी महारानी अर्चि अपने पति के साथ वन को गई थीं।

महारानी होने केकारण उनका शरीर अत्यन्त कोमल था।

यद्यपि वे वन में रहने के योग्य न थीं, किन्तु उन्होंनेस्वेच्छा से अपने चरणकमलों से पृथ्वी का स्पर्श किया।

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अतीव भर्तुब्रतधर्मनिष्ठयाशुश्रूषया चार्षदेहयात्रया ।

नाविन्दतारति परिकर्शितापि साप्रेयस्करस्पर्शनमाननिर्वृति: ॥

२०॥

अतीव--अत्यधिक; भर्तु:--पति का; ब्रत-धर्म--सेवा का ब्रत; निष्ठया--संकल्प से; शुश्रूषया--सेवा से; च-- भी; आर्ष--ऋषि के समान; देह--शरीर; यात्रया--रहन-सहन; न--नहीं; अविन्दत--देखा; आर्तिम्‌-कोई कष्ट; परिकर्शिता अपि--दुर्बलहोने पर भी; सा--वह; प्रेयः-कर--अत्यन्त सुखद; स्पर्शन--स्पर्श; मान--लगा हुआ; निर्वृतिः--आनन्द

यद्यपि महारानी अर्चि ऐसे कष्टों को सहने की अभ्यस्त न थीं, तो भी वन में रहने केअनुष्ठानादि में उन्होंने ऋषियों की तरह अपने पति का साथ दिया।

वे भूमि पर शयन करतीं औरकेवल फल, फूल और पत्तियाँ खातीं।

चूँकि वे इन कार्यों के लिए उपयुक्त न थीं, अतः वेअत्यन्त दुर्बल हो गईं।

फिर भी अपने पति की सेवा करने से उन्हें जो आनन्द प्राप्त होता था उसकेकारण उन्हें किसी कष्ट का अनुभव नहीं होता था।

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देहं विपन्नाखिलचेतनादिकंपत्यु: पृथिव्या दयितस्य चात्मन: ।

आलक्ष्य किश्धिच्च विलप्य सा सतीचितामथारोपयदद्विसानुनि ॥

२१॥

देहम्‌--शरीर; विपन्न--पूर्णतया रहित; अखिल--समस्त; चेतन--जीवन से; आदिकम्‌--लक्षणों; पत्यु:-- अपने पति के;पृथिव्या:--संसार; दयितस्य--दयालु का; च आत्मन:--तथा अपना; आलक्ष्य--देखकर; किश्ञित्‌--अत्यल्प; च--तथा;विलप्य--विलाप करके; सा--वह; सती--पतिक्रता; चितामू--चिता पर; अथ--अब; आरोपयत्‌--रखा; अद्वि--पर्वत;सानुनि--चोटी पर।

जब महारानी अर्चि ने अपने पति को, जो उनके प्रति तथा पृथ्वी के प्रति अत्यन्त दयालु थे,जीवन के लक्षणों से रहित देखा तो उन्होंने थोड़ा विलाप किया और फिर पर्वत की चोटी परचिता बनाकर अपने पति के शरीर को उस पर रख दिया।

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विधाय कृत्यं ह्दिनीजलाप्लुतादत्त्वोदकं भर्तुरुदारकर्मण: ।

नत्वा दिविस्थांस्त्रिदरशांस्त्रि: परीत्यविवेश वह्ििं ध्यायती भर्तृपादी ॥

२२॥

विधाय--सम्पन्न करके; कृत्यम्‌ू--अनुष्ठान; हृदिनी--छोटी नदी के जल में; जल-आप्लुता--अच्छी तरह स्नान करके; दर्त्वाउदकम्‌--जलाझलि देकर; भर्तुः--अपने पति की; उदार-कर्मण:--जो अत्यन्त उदार था; नत्वा--नमस्कार करके; दिवि-स्थानू--आकाश में स्थित; त्रि-दशान्‌--तीन करोड़ देवता; त्रि:--तीन बार; परीत्य--परिक्रमा करके; विवेश--प्रवेश किया;वहिम्‌--अग्नि में; ध्यायती--ध्यान करती हुई; भर्त्‌--अपने पति के; पादौ--दोनों चरणकमल।

इसके पश्चात्‌ महारानी ने आवश्यक दाह-कृत्य किये और जलाझलि दी।

फिर नदी में स्नानकरके उन्होंने आकाश स्थित विभिन्न लोकों के विभिन्न देवताओं को नमस्कार किया।

तब अग्निकी प्रदक्षिणा की और अपने पति के चरणकमलों का ध्यान करते हुए उन्होंने अग्नि की लपटोंमें प्रवेश किया।

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विलोक्यानुगतां साध्वीं पृथुं वीरवरं पतिम्‌ ।

तुष्ठवुर्वरदा देवैद्देवपल्य: सहस्त्रश: ॥

२३॥

विलोक्य--देखकर; अनुगताम्‌ू--पति के बाद मरते; साध्वीम्‌--पतिक्रता स्त्री को; पृथुम्‌--राजा पृथु की; वीर-वरम्‌ू--परमयोद्धा; पतिम्‌--पति; तुष्ठवु:--स्तुति की; वर-दाः--वर देने में समर्थ, वरदायिनी; देवै:--देवताओं के साथ; देव-पत्य: --देवताओं की पत्नियों ने; सहस्नरश:--हजारों |

महान्‌ राजा पृथु की पतिब्रता पत्नी अर्चि के इस वीरतापूर्ण कार्य को देखकर हजारोंदेवपत्रियों ने प्रसन्न होकर अपने पतियों सहित रानी की स्तुति की।

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कुर्वत्य: कुसुमासारं तस्मिन्मन्दरसानुनि ।

नदत्स्वमर्तूर्येषु गृणन्ति सम परस्परम्‌ ॥

२४॥

कुर्वत्यः:--करते हुए; कुसुम-आसारम्‌--फूलों की वर्षा; तस्मिन्‌--उसमें; मन्दर--मन्दर पर्वत की; सानुनि--चोटी पर;नदत्सु--बजते हुए; अमर-तूर्येषु--देवताओं के नगाड़े की ध्वनि; गृणन्ति स्म--बातें कर रही थीं; परस्परम्‌ू--एक दूसरे से |

उस समय देवता मन्दर पर्वत की चोटी पर आसीन थे।

उनकी पत्नियाँ चिता की अग्नि पर फूलों की वर्षा करने लगीं और एक दूसरे से ( इस प्रकार ) बातें करने लगीं।

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देव्य ऊचुःअहो इयं वधूर्धन्या या चैव॑ भूभुजां पतिम्‌ ।

सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीर्वंधूरिव ॥

२५॥

देव्य: ऊचु:--देवों की पत्नियों ( देवियों ) ने कहा; अहो--ओह; इयम्‌-- यह; वधू: --पली; धन्या-- धन्य है; या--जो; च--भी; एवम्‌--जिस तरह; भू--संसार का; भुजाम्‌--सारे राजाओं का; पतिमू--राजा को; सर्व-आत्मना--सब प्रकार से;पतिम्‌--पति को; भेजे--पूजा की; यज्ञ-ईशम्‌-- भगवान्‌ विष्णु को; श्री:--लक्ष्मी; वधू: --पत्नी; इब--समान ।

देवताओं की पत्नियों ने कहा : महारानी अर्चि धन्य हैं! हम देख रही हैं कि राज राजेश्वर पृथुकी इस महारानी ने अपने पति की अपने मन, वाणी तथा शरीर से उसी प्रकार सेवा की है, जिसप्रकार ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी भगवान्‌ यज्ञेश अथवा विष्णु की करती हैं।

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सैषा नून॑ ब्रजत्यूथ्वमनु वैन्यं पतिं सती ।

पश्यतास्मानतीत्यार्चिददुर्विभाव्येन कर्मणा ॥

२६॥

सा--वह; एषा--यह; नूनम्‌ू-- अवश्य ही; ब्रजति--जा रही है; ऊर्ध्वमू--ऊपर की ओर; अनु--पीछे-पीछे ; वैन्यम्‌--वेन केपुत्र, पृथु; पतिमू--पति; सती--सती; पश्यत--जरा देखो तो; अस्मान्‌--हमको; अतीत्य--ऊपर से पार करके, लाँघकर;अर्चि:--अर्चि; दुर्विभाव्येन-- अकल्पनीय ; कर्मणा--कार्यों से |

देवों की पत्नियों ने आगे कहा : जरा देखो तो कि वह सती नारी अर्चि किस प्रकार अपनेअच्न्त्य पुण्य कर्मों के प्रभाव से अब भी अपने पति का अनुगमन करती हुई ऊपर की ओर,जहाँ तक हम देख सकती हैं, चली जा रही है।

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तेषां दुरापं कि त्वन्यन्मर्त्यानां भगवत्पदम्‌ ।

भुवि लोलायुषो ये वै नैष्कर्म्य साधयन्त्युत ॥

२७॥

तेषाम्‌ू--उनके लिए; दुरापम्‌ू--प्राप्त करना कठिन, दुर्लभ; किम्‌ू--क्या; तु--लेकिन; अन्यत्‌--और कुछ; मर्त्यानामू--मनुष्योंका; भगवत्‌ू-पदम्‌-- भगवान्‌ का राज्य; भुवि--संसार में; लोल--क्षणिक; आयुष:--जीवन अवधि; ये--वे; वै--निश्चय ही;नैष्कर्म्यम्‌-मोक्ष का मार्ग; साधयन्ति--पालन करते हैं; उत--सही सही |

इस संसार में प्रत्येक मनुष्य का जीवन-काल लघु है, किन्तु जो भक्ति में अनुरक्त हैं, वेभगवान्‌ के धाम वापस जाते हैं, क्योंकि वे सचमुच मोक्ष के मार्ग पर होते हैं।

ऐसे लोगों के लिएकुछ भी दुर्लभ नहीं है।

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स वश्ञितो बतात्मध्रुक्ृच्छेण महता भुवि ।

लब्ध्वापवर्ग्य मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥

२८॥

सः--वह; वज्चित:--ठगा गया; बत--निश्चय ही; आत्म-श्रुक्‌--अपने से ईर्ष्या करने वाला; कृच्छेण -- कठिनाई से; महता--महान्‌ कार्यो से; भुवि--इस संसार में; लब्ध्वा--पाकर; आपवर्ग्यम्‌-मोक्ष का मार्ग; मानुष्यमू--मनुष्य के शरीर में; विषयेषु --इन्द्रियतृप्ति के कार्य में, वासनाओं में; विषज्जते--लगा रहता है।

जो मनुष्य इस संसार में अत्यन्त संघर्षमय कार्यों को सम्पन्न करने में लगा रहता है, और जो मनुष्य का शरीर पाकर-जो कि दुखों से मोक्ष प्राप्त करने का एक अवसर होता है--कठिनसकाम कार्यो को करता रहता है, तो उसे ठगा गया तथा अपने ही प्रति ईर्ष्यालु समझना चाहिए।

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मैत्रेय उवाचस्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोक॑ गता वधू: ।

यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्य: प्रापाच्युताअ्रयः: ॥

२९॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; स्तुवतीषु--स्तुति कर रही; अमर-स्त्रीपु--देवताओं की पत्नियों द्वारा; पति-लोकम्‌--जिसलोक में पति गया था; गता--पहुँचकर; वधू: --पत्नी; यम्‌--जहाँ; वा--अथवा; आत्म-विदाम्‌--स्वरूपसिद्ध पुरुषों का;धुर्य; --सर्वोच्च; वैन्य: --वेन का पुत्र ( पृथु महाराज ); प्राप--प्राप्त किया; अच्युत-आ श्रय:-- भगवान्‌ का आश्रय |

मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, जब देवताओं की पत्नियाँ इस प्रकार परस्पर बातें कररही थीं तो अर्चि ने उस लोक को प्राप्त कर लिया था जहाँ उनके पति सर्वोत्कृष्ट स्वरूपसिद्धमहाराज पृथु पहुँच चुके थे।

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इत्थम्भूतानुभावोसौ पृथु: स भगवत्तम: ।

कीर्तितं तस्य चरितमुद्दामचरितस्य ते ॥

३०॥

इत्थम्‌-भूत--इस प्रकार; अनुभाव: --अत्यन्त महान्‌, शक्तिमान; असौ--उस; पृथु:--राजा पृथु; सः--वह; भगवत्‌-तम:--स्वामियों में श्रेष्ठ; कीर्तितमू--वर्णित; तस्थ--उसका; चरितम्‌-- चरित्र; उद्याम--अत्यन्त महान; चरितस्य--ऐसे गुणों से युक्त;ते--तुमसे |

मैत्रेय ने आगे कहा : भक्तों में महान्‌ महाराज पृथु अत्यन्त शक्तिशाली थे और उनका चरित्रअत्यन्त उदार तथा उद्दाम था।

मैंने यथासम्भव तुमसे उसका वर्णन किया है।

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य इदं सुमहत्पुण्यं श्रद्धयावहितः पठेत्‌ ।

श्रावयेच्छुणुयाद्वापि स पृथो: पदवीमियात्‌ ॥

३१॥

यः--जो; इृदम्‌--इस; सु-महत्‌--अत्यन्त महान्‌; पुण्यम्‌--पवित्र; श्रद्धया-- श्रद्धा-समेत; अवहितः--ध्यानपूर्वक; पठेत्‌ू--पढ़ता है; श्रावयेत्‌--व्याख्या करता है; श्रुणुयात्‌--सुनता है; वा--अथवा; अपि--निश्चय ही; सः--वह व्यक्ति; पृथो:--राजापृथु के; पदवीम्‌ू--पद को; इयात्‌-- प्राप्त करता है

जो व्यक्ति श्रद्धा तथा ध्यानपूर्वक राजा पृथु के महान्‌ गुणों को पढ़ता है, या स्वयं सुनता हैअथवा अन्यों को सुनाता है, वह अवश्य ही महाराज पृथु के लोक को प्राप्त होता है।

दूसरे शब्दोंमें, ऐसा व्यक्ति भी वैकुण्ठलोक अर्थात्‌ भगवान्‌ के धाम को वापस जाता है।

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ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी राजन्यो जगतीपतिः ।

वैश्य: पठन्विट्पतिः स्याच्छूद्र: सत्तमतामियात्‌ ॥

३२॥

ब्राह्मण:--ब्राह्मण; ब्रह्म-वर्चस्वी --आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त हुआ; राजन्य:--राजसी; जगती-पति:--संसार का राजा;वैश्य:--वैश्य वर्ण; पठन्‌--पढ़ने से; विट्‌ू-पति:--पशुओं का स्वामी; स्यात्‌--हो जाता है; शूद्र:-- श्रमिक वर्ग; सत्तम-ताम्‌--महाभक्त का पद; इयात्‌--प्राप्त करता है।

यदि कोई पृथु महाराज के गुणों को सुनता है और यदि वह ब्राह्मण है, तो वह ब्रह्मशक्ति मेंनिपुण हो जाता है; यदि वह क्षत्रिय है, तो संसार का राजा बन जाता है; यदि वह वैश्य है, तोअन्य वैश्यों तथा अनेक पशुओं का स्वामी हो जाता है और यदि शूद्र हुआ तो वह उच्चकोटि काभक्त बन जाता है।

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त्रिः कृत्व इदमाकर्ण्य नरो नार्यथवाहता ।

अप्रज: सुप्रजतमो निर्धनो धनवत्तम: ॥

३३॥

त्रिः--तीन बार; कृत्व:--उच्चारण करके; इृदम्‌--यह; आकर्णर्य--सुनकर; नरः--मनुष्य; नारी--स्त्री; अथवा--या;आहता--समादरित; अप्रज:--सन्तान-हीन; सु-प्रज-तम: --अनेक सन्‍्तानों वाला; निर्धन:--गरीब; धन-वत्‌-- धनी; तम:--सर्वाधिक

चाहे नर हो या नारी, जो कोई भी महाराज पृथु के इस वृत्तान्त को अत्यन्त आदरपूर्वकसुनता है, वह यदि निःसन्तान है, तो सन्तान युक्त और यदि निर्धन है, तो वह धनवान बन जाताहै।

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अस्पष्टकीर्ति: सुयशा मूर्खो भवति पण्डित: ।

इदं स्वस्त्ययनं पुंसाममड्गल्यनिवारणम्‌ ॥

३४॥

अस्पष्ट-कीर्ति:--जिसका यश प्रकट न हो; सु-यशा:--अत्यन्त प्रसिद्ध; मूर्खः--निरक्षर; भवति--हो जाता है; पण्डित:--विद्वान; इदम्‌--यह; स्वस्ति-अयनम्‌--कल्याण; पुंसाम्‌-मनुष्यों का; अमड्ूल्य-- अशुभ; निवारणम्‌--दूर करने वाला

जो इस वृत्तान्त को तीन बार सुनता है, वह यदि विख्यात हो जाएगा और यदि निरक्षर है, तो परम विद्वान्‌ बन जाएगा।

दूसरे शब्दों में, पृथुमहाराज का वृत्तान्त सुनने में इतना शुभ है कि वह समस्त दुर्भाग्य को दूर भगाता है।

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धन्यं यशस्यमायुष्य॑ स्वर्य कलिमलापहम्‌धर्मार्थकाममोक्षाणां सम्यक्सिद्धिमभीप्सुभि: ।

श्रद्धयैतदनुश्राव्यं चतुर्णा कारण परम्‌ ॥

३५॥

धन्यम्‌ू--धन का साधन; यशस्यम्‌--यश का स्त्रोत; आयुष्यम्‌-दीर्घ जीवन का स्त्रोत; स्वग्यम्‌--स्वर्ग जाने का साधन;कलि--कलियुग में; मल-अपहम्‌--कल्मष को घटाने वाला; धर्म--धर्म; अर्थ--आर्थिक विकास; काम--इन्द्रियतृप्ति;मोक्षाणाम्‌--मोक्ष का; सम्यक्‌--पूर्णतया; सिद्धिम्‌--सिद्धि; अभीप्सुभि:--इच्छुकों के द्वारा; श्रद्धबा--अत्यन्त श्रद्धा से;एतत्‌--यह चरित्र; अनुश्राव्यम्‌ू--सुना जाना चाहिए; चतुर्णाम्‌--चारों; कारणम्‌--कारणों का; परमू--चरम

पृथु महाराज के चरित्र को सुनकर मनुष्य महान्‌ बन सकता है, अपनी जीवन-अवधि( आयु ) बढ़ा सकता है, स्वर्ग को जा सकता है और इस कलिकाल के कल्मषों का नाश करसकता है।

साथ ही वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के हितों में उन्नति ला सकता है।

अतः सभीप्रकार से यही अच्छा है कि जो लोग ऐसी वस्तुओं में रुचि रखते हैं, वे पृथु महाराज के जीवनतथा चरित्र के विषय में पढ़ें तथा सुनें।

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विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान्‌ ।

बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजान: पृथवे यथा ॥

३६॥

विजय-अभिमुख: --जो विजय के लिए प्रस्थान करने वाला होता है; राजा--राजा; श्रुत्वा--सुनकर; एतत्‌--यह; अभियाति--प्रस्थान करता है; यानू--रथ पर; बलिम्‌--कर या भेंट; तस्मै--उसको; हरन्ति-- भेंट करते हैं; अग्रे--समक्ष; राजान:--अन्यराजा; पृथवे--राजा पृथु को; यथा--जिस तरह करते थे।

यदि विजय तथा शासन-शक्ति का इच्छुक कोई राजा अपने रथ पर चढ़कर प्रस्थान करनेके पूर्व पृथु महाराज के चरित्र का तीन बार जप करता है, तो उसके अधीन सारे राजा उसकेआदेश से ही सारा कर उसी प्रकार लाकर रखते हैं जिस प्रकार महाराज पृथु के अधीन राजाउनको दिया करते थे।

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मुक्तान्यसड्ो भगवत्यमलां भक्तिमुद्रहन्‌ ।

वैन्यस्य चरितं पुण्यं श्रुणुयाच्छावयेत्पठेत्‌ ॥

३७॥

मुक्त-अन्य-सड्ृ:--समस्त भौतिक कल्मष से रहित होकर; भगवति-- भगवान्‌ के प्रति; अमलाम्‌-विशुद्ध; भक्तिम्‌-- भक्ति;उद्ददनू--करते हुए; वैन्यस्थ--महाराज वेन के पुत्र का; चरितम्‌--चरित्र; पुण्यमू--पवित्र; श्रुणुयात्‌--सुने; श्रावयेत्‌--सुनाए;पठेत्‌ू--तथा पढ़े ।

शुद्ध भक्त भक्तियोग की विविध विधियों का पालन करते हुए कृष्ण-चेतना में पूर्णतयालीन होने के कारण दिव्य पद पर स्थित हो सकता है, किन्तु तो भी भक्ति करते समय उसे पृथुमहाराज के जीवन तथा चरित्र के विषय में सुनना, दूसरों को सुनने की प्रेरणा देना तथा पढ़नाचाहिए।

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वैचित्रवीर्याभिहितं महन्माहात्म्यसूचकम्‌ ।

अस्मिन्कृतमतिमर्त्य पार्थवीं गतिमाप्नुयात्‌ू ॥

३८ ॥

वैचित्रवीर्य--हे विचित्रवीर्य के पुत्र ( विदुर )अभिहितम्‌--कहा गया; महत्‌--महान्‌; माहात्म्य--महानता; सूचकम्‌--उद्दुद्धकरने वाला; अस्मिन्‌--इसमें; कृतम्‌--किया हुआ; अति-मर्त्यम्‌--असामान्य; पार्थवीम्‌--पृथु महाराज के सम्बन्ध में; गतिम्‌--उन्नति, लक्ष्य; आणुयात्‌--प्राप्त करना चाहिए।

मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : हे विदुर, मैंने यथासम्भव पृथु महाराज के चरित्र के विषय में बतलाया है, जो मनुष्य के भक्तिभाव को बढ़ाने वाला है।

जो कोई भी इसका लाभ उठाता है,वह भी महाराज पृथु की तरह ही भगवान्‌ के धाम को वापस जाता है।

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अनुदिनमिदमादरेण श्रृण्वन्‌पृथुचरितं प्रथयन्विमुक्तसड्र: ।

भगवति भवसिन्धुपोतपादेसच निपुणां लभते रतिं मनुष्य: ॥

३९॥

अनु-दिनम्‌-- प्रतिदिन; इदम्‌ू--यह; आदरेण--आदरपूर्वक; श्रण्वन्‌ू--सुनते हुए; पृथु-चरितम्‌-पृथु महाराज के वृत्तान्त को;प्रथयन्‌--कीर्तन करते हुए; विमुक्त--मुक्त; सड़:--साथ; भगवति-- भगवान्‌ के प्रति; भव-सिन्धु-- अज्ञानरूपी सागर; पोत--नाव; पादे--जिनके चरणकमल; सः--वह; च--भी; निपुणाम्‌--पूर्ण; लभते--प्राप्त करता है; रतिमू--आसक्ति, अनुराग;मनुष्य:--मनुष्य |

जो भी महाराज पृथु के कार्यकलापों के वृत्तान्त को नियमित रूप से अत्यन्त श्रद्धापूर्वकपढ़ता, कीर्तन करता तथा वर्णन करता है, उसका अविचल विश्वास तथा अनुराग निश्चय हीभगवान्‌ के चरणकमलों के प्रति नित्यप्रति बढ़ता जाता है।

भगवान्‌ के चरणकमल वह नौकाहै, जिसके द्वारा मनुष्य अज्ञान के सागर को पार करता है।

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