← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय अठारह: पृथु महाराज पृथ्वी ग्रह का दोहन करते हैं
4.18मैत्रेय उवाचइत्थं पृथुमभिष्टूय रुषा प्रस्फुरिताधरम्।
पुनराहावनिर्भीता संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥
१॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने आगे कहा; इत्थम्--इस प्रकार; पृथुम्--राजा पृथु को; अभिष्टूय--स्तुति करने के बाद; रुषा--क्रो धसे; प्रस्फुरित--काँपते हुए; अधरम्--उसके होंठ; पुनः--फिर; आह--उसने कहा; अवनि:ः --पृथ्वीलोक; भीता--डरी हुई;संस्तभ्य--स्थिर होकर; आत्मानम्--मन को; आत्मना--बुद्धि से
मैत्रय ने विदुर को सम्बोधित करते हुए आगे कहा : हे विदुर, जब पृथ्वी ने स्तुति पूरी करतीतब भी राजा पृथु शान्त नहीं हुए थे, उनके होंठ क्रोध से काँप रहे थे।
यद्यपि पृथ्वी डरी हुई थी,किन्तु उसने धैर्य धारण करके राजा को आश्वस्त करने के लिए इस प्रकार कहना प्रारम्भ किया।
"
सन्नियच्छाभिभो मन्युं निबोध श्रावितं च मे ।
सर्वतः सारमादत्ते यथा मधुकरो बुध: ॥
२॥
सन्नियच्छ--कृपया शान्त करें; अभिभो--हे राजा; मन्युम्ू--क्रोध; निबोध--समझने का प्रयास करें; श्रावितम्ू--जो कुछ कहागया है; च--भी; मे--मेरे; सर्वतः--सभी जगह से; सारम्--सार; आदत्ते--ग्रहण करता है; यथा--जिस प्रकार; मधु-कर:--भौंरा; बुध:--बुद्धिमान पुरुष |
हे भगवन्, आप अपने क्रोध को पूर्णतः शान्त करें और जो कुछ मैं निवेदन कर रही हूँ, उसेधैर्यपूर्वक सुनें।
कृपया इस ओर ध्यान दें।
मैं भले ही दीन हूँ, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति सभी स्थानोंसे ज्ञान के सार को ग्रहण करता है, जिस प्रकार भौंरा प्रत्येक फूल से मधु संचित करता है।
"
अस्मिल्लोकेथवामुष्मिन्मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि: ।
इृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्न पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये ॥
३॥
अस्मिनू--इस; लोके--जीवनकाल में; अथ वा--या; अमुष्मिन्ू--अगले जन्म में; मुनिभि:--मुनियों द्वारा; तत्त्त--सत्य;दर्शिभि:ः--दर्शन कर चुकने वालों के द्वारा; दृष्टा:--संस्तुत; योगा:--विधियाँ; प्रयुक्ताः--काम में लाई गईं; च-- भी; पुंसाम्ू--मनुष्यों के; श्रेय:--लाभ; प्रसिद्धये--प्राप्त करने में |
मानव समाज को इस जीवन में ही नहीं वरन् अगले जन्म में भी लाभ पहुँचाने के लिए बड़े-बड़े ऋषियों तथा मुनियों ने जनता की सम्पन्नता के अनुकूल विभिन्न विधियों की संस्तुति की है।
"
तानातिष्ठति यः सम्यगुपायान्पूर्वदर्शितान् ।
अवर: श्रद्धयोपेत उपेयान्विन्दतेडज्खसा ॥
४॥
तानू--उन; आतिष्ठति--पालन करता है; यः--जो कोई; सम्यक् --पूर्णत:; उपायान्--नियम ; पूर्व--प्राचीनकाल में;दर्शितानू--आदेशित; अवर: --अनुभव-हीन; श्रद्धया-- श्रद्धया से; उपेत: --स्थित; उपेयान्ू--कर्मफल; विन्दते--सुख भोगताहै; अज्ञसा--सरलता से |
जो कोई प्राचीन ऋषियों द्वारा बताये गये नियमों तथा आदेशों का पालन करता है, वहव्यावहारिक कार्यों में उनका उपयोग कर सकता है।
ऐसा व्यक्ति सरलता से जीवन तथा सुखोंका भोग कर सकता है।
"
ताननाहत्य योउविद्वानर्थानारभते स्वयम् ।
तस्य व्यभिच्रन्त्यर्धा आरब्धाश्न पुन: पुनः: ॥
५॥
तान्ू--उनकी; अनाहत्य--उपेक्षा करके; यः--जो कोई; अविद्वानू-- धूर्त; अर्थानू--योजनाएँ; आरभते--प्रारम्भ करता है;स्वयम्--स्वयं; तस्य--उसके ; व्यभिचरन्ति--सफल नहीं होते; अर्था:--कार्य; आरब्धा:--प्रयत्त किये गये; च--तथा; पुनःपुनः--बार-बार।
ऐसा मूर्ख पुरुष जो कोई मनोकल्पना द्वारा अपने निजी साधन तथा माध्यम तैयार करता हैऔर साधुओं द्वारा स्थापित दोषहीन आदेशों को मान्यता नहीं प्रदान करता, वह अपने प्रयासों मेंबार-बार असफल होता है।
"
पुरा सृष्टा ह्ञोषधयो ब्रह्मणा या विशाम्पते ।
भुज्यमाना मया दृष्टा असद्धिरधृतब्रते ४ ॥
६॥
पुरा--प्राचीनकाल में; सृष्टाः:--उत्पन्न; हि--निश्चय ही; ओषधय:--जड़ी-बूटियाँ तथा अन्न; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; या:--वे जो;विशाम्-पते--हे राजा; भुज्यमाना: -- भोग किया गया; मया-- मेरे द्वारा; दृष्टा:--देखा गया; असदर्द्धिः--अभक्तों द्वारा; अधृत-ब्रतैः:--समस्त आध्यात्मिक कृत्यों से शून्य |
हे राजन्, प्राचीनकाल में ब्रह्मा ने जिन बीजों, मूलों, जड़ी-बूटियों तथा अन्नों की सृष्टि कीथी वे अब उन अभक्तों द्वारा उपभोग किये जा रहे हैं, जो समस्त आत्म-ज्ञान से शून््य हैं।
"
अपालितानाहता च भवद्धिलोकपालकै: ।
चोरीभूतेथ लोकेहं यज्ञार्थेग्रसमोषधी: ॥
७॥
अपालिता--किसी रक्षा के बिना; अनाहता--उपेक्षित; च-- भी; भवद्धिः--आपके समान; लोक-पालकै: --अध्यक्षों याराजाओं द्वारा; चोरी-भूते--चोरों से आक्रान्त होकर; अथ--अतः ; लोके--इस संसार में; अहम्--मैंने; यज्ञ-अर्थै--यज्ञ सम्पन्नकरने के हेतु; अग्रसम्--छिपा ली हैं; ओषधी:--सभी जड़ी-बूटियाँ तथा अनाज
हे राजन, अभक्तों द्वारा अन्न तथा जड़ी-बूटियों का उपयोग तो किया ही जा रहा है, मेरी भीठीक से देखभाल नहीं की जा रही।
मेरी उन राजाओं द्वारा उपेक्षा हो रही है, जो उन चोरों कोदण्ड नहीं दे रहे जो अन्न का उपयोग इन्द्रियतुष्टि के लिए कर रहे हैं।
फलस्वरूप मैंने उन समस्तबीजों को छिपा लिया है, जो यज्ञ सम्पन्न करने के निमित्त हैं।
"
नूनं ता वीरुध: क्षीणा मयि कालेन भूयसा ।
तत्र योगेन दृष्टेन भवानादातुमहति ॥
८॥
नूनमू--अतः; ताः--वे; वीरुध:--ओषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ तथा अन्न; क्षीणा:--जीर्ण-शीर्ण; मयि--मुझमें ; कालेन--समयके साथ; भूयसा--अत्यधिक; तत्र--अतः ; योगेन-- समुचित साधनों से; दृष्टेन--पूर्व आचार्यों द्वारा संस्तुत; भवानू--आप;आदातुम्--लेने के लिए; अहति--चाहिए।
मेरे भीतर दीर्घ काल से भीगे रहने के कारण सारे धान्य-बीज निश्चित रूप से जीर्ण हो चुकेहैं।
अत: आप तुरन्त आचार्यो अथवा शास्त्रों द्वारा बताई गई मानक विधि से उन्हें निकालने कीव्यवस्था करें।
"
वत्सं कल्पय मे वीर येनाहं वत्सला तव ।
धोक्ष्ये क्षरमयान्कामाननुरूपं च दोहनम् ॥
९॥
दोग्धारं च महाबाहो भूतानां भूतभावन ।
अन्नमीप्सितमूर्जस्वद्धगवान्वाउ्छते यदि ॥
१०॥
वत्सम्--बछड़ा; कल्पय--व्यवस्था करो; मे--मेरे लिए; वीर--हे वीर; येन--जिससे; अहम्--मैं; वत्सला--स्नेहपूर्ण; तव--तुम्हारा; धोक्ष्ये--पूरी करूँगी; क्षीर-मयान्ू--दूध के रूप में; कामान्--इच्छित वस्तुएँ; अनुरूपम्--विभिन्न जीवात्माओं के अनुसार; च--भी; दोहनम्ू--दोहनी, पात्र; दोग्धारम्ू--दुहनेवाला; च-- भी; महा-बाहो--हे सशक्त भुजाओंवाले; भूतानाम्ू--समस्त जीवात्माओं के; भूत-भावन--जीवात्माओं के रक्षक; अन्नम्--अन्न; ईप्सितम्--वांछित; ऊर्ज:-वत्--पोषणयुक्त;भगवानू्--पूज्य आप; वाउ्छते--इच्छा करते हैं; यदि--यदि।
हे परम वीर, जीवात्माओं के रक्षक, यदि आप जनता को प्रचुर अन्न देकर उनके कष्टों कानिवारण करना चाहते हैं और यदि आप मुझे दुह कर उनका पोषण करना चाहते हैं, तो इसकेलिए आपको उपयुक्त बछड़ा तथा दूध रखने के लिए दोहनी की व्यवस्था करनी होगी।
साथ हीदुहनेवाले का भी प्रबन्ध करना होगा।
चूँकि मैं अपने बछड़े के प्रति अत्यन्त वत्सला हूँगी, अतःमुझसे दुग्ध प्राप्त करने की आपकी मनोकामना पूरी हो जाएगी।
"
समां च कुरु मां राजन्देववृष्टे यथा पयः ।
अपर्तावषि भद्ठं ते उपावर्तेत मे विभो ॥
११॥
समाम्ू--समतल; च-- भी; कुरू-- करो; माम्-- मुझको; राजन्--हे राजा; देव-वृष्टम्--इन्द्र की कृपा से होनेवाली वर्षा;यथा--जिससे; पयः--जल; अप-ऋतौ--वर्षा ऋतु के न रहने पर; अपि-- भी; भद्रमू--कल्याण; ते--तुम तक; उपावर्तेत--यह रुक सकता है; मे--मुझ पर; विभो--हे भगवान् |
हे राजनू, मैं आपको बता रही हूँ कि आपको समस्त भूमण्डल की सतह समतल बनानीहोगी।
वर्षा ऋतु न रहने पर भी इससे मुझे सहायता मिलेगी।
राजा इन्द्र की कृपा से वर्षा होती है।
इससे वर्षा का जल भूमण्डल पर टिका रहेगा जिससे पृथ्वी सदैव आर्द्र (नम ) रहेगी और इसप्रकार से यह सभी तरह के उत्पादन के लिए शुभ होगा।
"
इति प्रियं हितं वाक्यं भुव आदाय भूपतिः ।
वत्सं कृत्वा मनुं पाणावदुहत्सकलौषधी: ॥
१२॥
इति--इस प्रकार; प्रियमू--अच्छे लगनेवाले; हितम्--उपयोगी, लाभप्रद; वाक्यम्--शब्द; भुवः--पृथ्वी के; आदाय--विचारकरके; भू-पतिः--राजा; वत्समू--बछड़ा; कृत्वा--बनाकर; मनुम्--स्वायंभुव मनु को; पाणौ--हाथों में; अदुहत्--दुहा;सकल--समस्त; ओषधी:--जड़ी-बूटियाँ तथा अन्नप
ृथ्वी के कल्याणकारी तथा प्रिय बचनों को राजा ने अंगीकार कर लिया।
तब उन्होंनेस्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाया और गोरूप पृथ्वी से समस्त ओषधियों और अन्न का दोहन करके उन्हें अपनी अंजुली में भर लिया।
"
तथापरे च सर्वत्र सारमाददते बुधा: ।
ततोडन्ये च यथाकामं दुदुहुः पृुथुभाविताम् ॥
१३॥
तथा--उसी तरह; अपरे--अन्य; च--भी; सर्वत्र--सभी जगह; सारम्--रस, निचोड़; आददते--ग्रहण कर लिया; बुधा:--बुद्धिमान पुरुष; तत:ः--तत्पश्चात्; अन्ये-- अन्य लोग; च-- भी; यथा-कामम्--इच्छानुसार; दुदुहु:--दुह लिया; पृथु-भाविताम्--महाराज पृथु के वश में हुई पृथ्वी को |
अन्य लोगों ने, जो महाराज पृथु के ही समान बुद्धिमान थे, पृथ्वी में से सार निकाल लिया।
निस्सन्देह, प्रत्येक व्यक्ति ने राजा पृथु के पद-चिह्नों का अनुसरण करते हुए इस अवसर का लाभ उठाया और पृथ्वी से अपनी मनोवाउिछत वस्तुएँ प्राप्त कीं।
"
ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम ।
वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयएछन्दोमयं शुच्चि ॥
१४॥
ऋषय:--ऋषियों ने; दुदुहुः--दुहा; देवीम्--पृथ्वी को; इन्द्रियेषु--इन्द्रियों में; अथ--तब; सत्तम--हे विदुर; वत्सम्--बछड़ा;बृहस्पतिम्--बृहस्पति मुनि को; कृत्वा--करके; पयः--दूध; छन्दः-मयम्--वैदिक स्तोत्रों के रूप में; शुचि--शुद्ध |
समस्त ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा बनाया और इन्द्रियों को दोहनी।
उन्होंने शब्द, मनतथा श्रवण को पवित्र करनेवाले समस्त प्रकार के वैदिक ज्ञान को दुह लिया।
"
कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् ।
हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बल॑ पयः: ॥
१५॥
कृत्वा--बनाकर; वत्समू--बछड़ा; सुर-गणा: --देवताओं ने; इन्द्रमू-स्वर्ग के राजा इन्द्र को; सोमम्--अमृत; अदूदुहन्--दुहलिया; हिरण्मयेन--सोने के; पात्रेण--पात्र से; वीर्यमू--मानसिक शक्ति; ओज:--इन्द्रियों की शक्ति; बलम्--शारीरिक शक्ति;पय:-दूध |
समस्त देवताओं ने स्वर्ग के राजा इन्द्र को बछड़ा बनाया और उन्होंने पृथ्वी में से सोम रसअर्थात् अमृत दुह लिया।
इस प्रकार वे मानसिक, शारीरिक तथा ऐन्द्रिय शक्ति में अत्यन्तबलशाली हो गये।
"
दैतेया दानवा वत्सं प्रह्मदमसुरर्षभम् ।
विधायादूदुहन्क्षीरमय:पात्रे सुरासवम् ॥
१६॥
दैतेया:--दिति के पुत्र; दानवा:--असुरों ने; वत्सम्--बछड़ा; प्रह्मदम्-- प्रहाद महाराज को; असुर--दानव; ऋषभम्-- प्रधान;विधाय--बनाकर; अदूदुहन्--दुह लिया; क्षीरम्--दूध; अयः--लोह; पात्रे--पात्र में; सुरा--शराब; आसवम्--खमीर सेबनाया गया द्रव यथा यवसुरा |
दिति के पुत्रों तथा असुरों ने असुर-कुल में उत्पन्न प्रहाद महाराज को बछड़ा बनाया औरउन्होंने अनेक प्रकार की सुरा तथा आसव निकाल कर उसे लोहे के पात्र में रख दिया।
"
गन्धर्वाप्सरसो<थुक्षन्पात्रे पद्मामये पय: ।
वल्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्व मधु सौभगम् ॥
१७॥
गन्धर्व--गन्धर्व लोक के वासी; अप्सरस:--अप्सरा लोक के वासी; अधुक्षन्--दुह लिया; पात्रे--पात्र में; पद्य-मये--कमलके; पयः--दूध; वत्सम्ू--बछड़ा; विश्वावसुम्--विश्वावसु को; कृत्वा--बना कर; गान्धर्वमू--गीत; मधु--मीठा, मधुर;सौभगम्--सुन्दरता।
गन्धर्व लोक तथा अप्सरालोक के निवासियों ने विश्वावसु को बछड़ा बनाया और कमलपुष्प के पात्र में दूध दुह्ा ।
इस दूध ने मधुर संगीत-कला तथा सुन्दरता का रूप धारण किया।
"
वत्सेन पितरोर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत ।
आमपात्रे महाभागा: श्रद्धया श्राद्धदेवता: ॥
१८॥
वत्सेन--बछड़े से; पितर:--पितृलोक के वासी; अर्यम्णा--पितृलोक के देव अर्यमा से; कव्यम्--पितरों को दी जानेवालीबलि; क्षीरम्--दूध; अधुक्षत--निकाला; आम-पात्रे--मिट्टी के कच्चे पात्र में; महा-भागा:--अत्यन्त भाग्यशाली; श्रद्धया--अत्यन्त श्रद्धा समेत; श्राद्ध-देवता:--मृत परिजनों के सम्मान में किये जानेवाले श्राद्ध कर्म के मुख्य देवता
श्राद्ध कर्म के मुख्य देवता एवं पितुलोक के भाग्यशाली निवासियों ने अर्यमा को बछड़ाबनाया।
उन्होंने अत्यन्त श्रद्धा सहित मिट्टी के कच्चे पात्र में कव्य ( पितरों को दी जानेवालीबलि ) दुह लिया।
"
प्रकल्प्य वत्सं कपिल सिद्धाः सट्डल्पनामयीम् ।
सिद्धि नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादय: ॥
१९॥
प्रकल्प्य--नियुक्त करके ; वत्सम्ू--बछड़ा; कपिलम्--कपिल मुनि को; सिद्धाः:--सिद्धलोक के वासी; सट्जलूल्पना-मयीम्--इच्छा से आगे बढ़नेवाली; सिद्द्धिमू--योगशक्तियाँ; नभसि--आकाश में; विद्यामू--ज्ञान; च-- भी; ये-- जो; च-- भी;विद्याधर-आदय:--विद्याधर लोक के वासी तथा अन्य |
तत्पश्चात् सिद्धलोक तथा विद्याधरलोक के वासियों ने कपिल मुनि को बछड़ा बनाया औरसम्पूर्ण आकाश को पात्र बना कर अणिमादि सारी योगशक्तियाँ दुह लीं।
निस्सन्देह, विद्याधरलोक के वासियों ने आकाश में उड़ने की कला प्राप्त की।
"
अन्ये च मायिनो मायामन्तर्धानाद्भुतात्मनाम् ।
मयं प्रकल्प्य वत्सं ते दुदुहुर्धारणामयीम् ॥
२०॥
अन्ये-- अन्य; च-- भी; मायिन:--मायावी जादूगर; मायाम्--मायावी शक्तियाँ; अन्तर्धान-- अहृश्य होने; अद्भुत--आश्चर्यजनक; आत्मनाम्--शरीर का; मयम्--मय नामक असुर को; प्रकल्प्य--बनाकर; वत्सम्--बछड़ा; ते-- उन्होंने;दुदुहः--दुहा; धारणामयीम्--इच्छा से उत्पन्न होनेवाली किम्प
ुरुष-लोक के वासियों ने भी मय दानव को बछड़ा बनाया और उन्होंने योगशक्तियाँदुह लीं जिनसे मनुष्य किसी दूसरे की दृष्टि से तुर्तत ओझल हो सकता है और अन्य किसी रूप मेंपुनः प्रकट हो सकता है।
"
यक्षरक्षांसि भूतानि पिशाचा: पिशिताशना: ।
भूतेशवत्सा दुदुहुः कपाले क्षतजासवम् ॥
२१॥
यक्ष--यक्षगण ( कुबेर के वंशज ); रक्षांसि--राक्षसगण ( मांसभक्षी ); भूतानि-- भूतों; पिशाचा: --पिशाचों ने; पिशित-अशना:--मांस खाने के अभ्यस्त; भूतेश--रूद्र रूपी शिव-अवतार; वत्सा:--बछड़ा; दुदुहुः --दुह लिया; कपाले--कपाल केपात्र में; क्षत-ज--रक्त; आसवम्--खमीर उठा पेय |
" तब मांसाहार के आदी यश्षों, राक्षसों, भूतों तथा पिशाचों ने श्री शिव के अवतार रुद्र( भूतनाथ ) को बछड़ा बनाया और रक्त से निर्मित पेय पदार्थों को दुहकर उन्हें कपालों से बनेपात्रों में रखा।
तथाहयो दन्दशूकाः सर्पा नागाश्न तक्षकम् ।
विधाय वत्सं दुदुहुर्बिलपात्रे विषं पय: ॥
२२॥
तथा--उसी प्रकार; अहयः--बिना फनवाले साँप; दन्दशूका:--बिच्छू; सर्पाः--फनवाले साँप; नागा:--बड़े सर्प; च--तथा;तक्षकम्--सर्पो के प्रमुख, तक्षक को; विधाय--बनाकर; वत्सम्--बछड़ा; दुदुहुः--दुह लिया; बिल-पात्रे--साँप के बिल रूपीपात्र में; विषम्--विष; पय: --दूध के रूप में ॥
तत्पश्चात् फनवाले तथा बिना फनवाले साँपों, नागों, बिच्छुओं तथा अन्य विषैले पशुओं नेपृथ्वी के दूध के रूप में अपना-अपना विष दुह लिया और इस विष को साँप के बिलों में रखदिया।
उन्होंने तक्षक को बछड़ा बनाया था।
"
'पशवो यव्सं क्षीरं वत्सं कृत्वा च गोवृषम् ।
अर्ण्यपात्रे चाधुक्षन्मृगेन्द्रेण च दंष्टिण: ॥
२३॥
क्रव्यादा: प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे कलेवरे ।
सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च ॥
२४॥
'पशव:--पशु; यवसम्--हरी घास को; क्षीरमू--दूध; वत्सम्--बछड़ा; कृत्वा--बनाकर; च-- भी; गो-वृषम्--शिवजी कावाहन, बैल; अरण्य-पात्रे--जंगल रूपी पात्र में; च-- भी; अधुक्षन्--दुहा; मृग-इन्द्रेण --सिंह के द्वारा; च--तथा; दंष्टिण: --तेज दाँतोंवाले पशु; क्रव्य-अदा: --कच्चा मांस खानेवाले पशु; प्राणिन:--जीवात्माएँ; क्रव्यम्--मांस; दुदुहः--दुह लिया;स्वे--अपने; कलेवरे-- अपने शरीर रूपी पात्र में; सुपर्ण--गरुड़ रूपी; वत्सा:--बछड़ा; विहगा: --पक्षी; चरम्ू--चरजीवात्माएँ; च-- भी; अचरम्--अचर ( जड़ ) जीवात्माएँ; एब--निश्चय ही; च-- भी |
गायों जैसे चौपाये पशुओं ने शिव के वाहन बैल को बछड़ा और जंगल को दुहने का पात्रबनाया।
इस प्रकार उन्हें खाने के लिए ताजी हरी घास मिल गई।
बाघों जैसे हिंस्त्र पशुओं ने सिंहको बछड़ा बनाया और इस प्रकार वे दूध के रूप में मांस प्राप्त कर सके ।
पक्षियों ने गरुड़ कोवत्स बनाया और पृथ्वी से चर कीटों तथा अचर घासों तथा पौधों के रूप में दूध प्राप्त किया।
"
वटवत्सा वनस्पतय: पृथग्रसमयं पयः ।
गिरयो हिमवद्वत्सा नानाधातून्स्वसानुषु ॥
२५॥
वट-वत्सा:--बरगद के वृक्ष को बछड़ा बनाकर, बट रूपी बछड़ा; वन:-पतय:--वृक्षों ने; पृथक्--विभिन्न; रस-मयम्--रसोंके रूप में; पयः--दूध; गिरय:--पर्वत; हिमवतू-वत्सा:--हिमालय रूपी बछड़ा; नाना--विविध; धातून्ू-- धातुएँ; स्व--अपनी; सानुषु--चोटियों पर।
वृक्षों ने बरगद के पेड़ को बछड़ा बनाकर अनेक सुस्वादु रसों को दूध के रूप में दुह लिया।
पर्वतों ने हिमालय को बछड़ा तथा पर्वत श्रृंगों को पात्र बनाकर नाना प्रकार की धातुएँ दुहीं।
"
सर्वे स्वमुख्यवत्सेन स्वे स्वे पात्रे पृथक्पय: ।
सर्वकामदुघां पृथ्वीं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥
२६॥
सर्वे--सभी ने; स्व-मुख्य--अपने-अपने प्रधानों द्वारा; वत्सेन--बछड़े के रूप में; स्वे स्वे-- अपने-अपने; पात्रे--पात्रों में;पृथक्-भिन्न -भिन्न; पयः--दूध; सर्व-काम--सभी वांछित वस्तु; दुघाम्ू-दूध के रूप में; पृथ्वीम्--पृथ्वीलोक को;दुदुहः--दुहा; पृथु-भाविताम्--राजा पृथु द्वारा शासित |
पृथ्वीलोक ने सबों को अपना-अपना भोजन प्रदान किया है।
राजा पृथु के काल में, पृथ्वीपूर्ण रूप से राजा के अधीन थी।
अतः पृथ्वी के सभी वासी अपना-अपना बछड़ा उत्पन्न करकेतथा विभिन्न प्रकार के पात्रों में अपने विशिष्ट प्रकार के दूध को रख कर अपना भोजन प्राप्त करसके।
"
एवं पृथ्वादय: पृथ्वीमन्नादा: स्वन्नमात्मनः ।
दोहवत्सादिभेदेन क्षीरभेदं कुरूद्रह ॥
२७॥
एवम्--इस प्रकार; पृुथु-आदय:--राजा पृथु तथा अन्यों ने; पृथ्वीम्--पृथ्वी को; अन्न-अदा:--अन्न के इच्छुक समस्त जीव;सु-अन्नम्ू--अपना वांछित खाद्य पदार्थ; आत्मन:-- अपने निर्वाह हेतु; दोह--दुहने के लिए; वत्स-आदि--बछड़े, पात्र तथादुहनेवाले के द्वारा; भेदेन--विभिन्न; क्षीर--दूध; भेदम्--विभिन्न; कुरु-उद्दद--हे कुरुओं में प्रधान
हे कुरुश्रेष्ठ विदुर जी, इस प्रकार राजा पृथु तथा अन्नभोजियों ने विभिन्न प्रकार के बछड़ेउत्पन्न किये और अपने-अपने खाद्य-पदार्थों को दुह लिया।
इस तरह उन्होंने विभिन्न प्रकार केखाद्य-पदार्थ प्राप्त किये जो दूध का प्रतीक हैं।
"
ततो महीपतिः प्रीतः सर्वकामदुघां पृथु: ।
दुहितृत्वे चकारेमां प्रेम्णा दुहितृबत्सलः ॥
२८ ॥
ततः--तत्पश्चात्; मही-पति:--राजा; प्रीत:--प्रसन्न होकर; सर्व-काम--समस्त इच्छाएँ; दुघाम्ू--दूध के रूप में उत्पन्न'करनेवाला; पृथु:--राज पृथु; दुहितृत्वे--अपनी पुत्री मानकर; चकार--किया; इमाम्--पृथ्वी को; प्रेम्णा--प्रेम के कारण;दुहितृ-वत्सलः --अपनी पुत्री के प्रति स्नेहमय ।
तत्पश्चात् राजा पृथु पृथ्वी से अत्यन्त प्रसन्न हो गये क्योंकि उसने विभिन्न जीवात्माओं के लिएप्रचुर मात्रा में भोजन की पूर्ति की।
इस प्रकार पृथ्वी के प्रति राजा स्नेहिल हो उठा, मानो बहउसकी पुत्री हो।
"
चूर्णयन्स्वधनुष्कोट्या गिरिकूटानि राजराट् ।
भूमण्डलमिदं वैन्य: प्रायश्चक्रे समं विभु: ॥
२९॥
चूर्णयन्ू--खण्ड-खण्ड करते हुए; स्व--अपने; धनु:-कोट्या--धनुष के बल से; गिरि--पर्वतों के; कूटानि--शिखरों को;राज-राट्ू--सम्राट; भू-मण्डलम्--समस्त पृथ्वी; इदम्--यह; वैन्य:--वेन के पुत्र ने; प्रायः--प्राय: ; चक्रे --कर दिया;समम्--समतल; विभु:--शक्तिमान |
फिर राजधिराज महाराज पृथु ने अपने बाण की शक्ति से पर्वतों को तोड़ कर भूमण्डल केसमस्त ऊबड़-खाबड़ स्थानों को समतल कर दिया।
उनकी कृपा से भूमण्डल की पूरी सतहप्रायः सपाट हो गई।
"
अथास्मिन्भगवान्वैन्य: प्रजानां वृत्तिद: पिता ।
निवासान्कल्पयां चक्रे तत्र तत्र यथाहत: ॥
३०॥
अथ--इस प्रकार; अस्मिन्--इस पृथ्वी पर; भगवानू-- श्रीभगवान्; वैन्य:--वेन का पुत्र; प्रजानाम्--प्रजा का; वृत्तिदः --जीविका देनेवाला; पिता--पिता; निवासानू--आवास, वास-स्थान; कल्पयाम्--उपयुक्त; चक्रे --बनाया; तत्र तत्र--जहाँ-तहाँ;यथा--जिस प्रकार; अर्हतः--वांछित, उपयुक्त |
राजा पृथु अपनी सारी प्रजा के लिए पिता तुल्य था।
वह उन्हें उचित जीविका देने में प्रत्यक्ष रूप से व्यस्त था।
उसने भूमण्डल की सतह को समतल करके जितने भी निवास-स्थानों कीआवश्यकता थी उनके लिए विभिन्न स्थल नियत कर दिये।
"
ग्रामान्पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च ।
घोषान्व्रजान्सशिबिरानाकरान्खेटखर्वटान् ॥
३१॥
ग्रामानू--गाँव; पुरः--नगर; पत्तनानि--बस्तियाँ; दुर्गाणि--किले; विविधानि--नाना प्रकार के; च-- भी; घोषान्ू--ग्वालों कीबस्तियाँ; ब्रजानू--गोशालाएँ; स-शिबिरान्--छावनियाँ; आकरान्--खानें; खेट--खेतिहरों की बस्तियाँ; खर्वटान्ू--पहाड़ीगाँव
इस प्रकार राजा ने अनेक प्रकार के गाँवों, बस्तियों, नगरों की स्थापना की और अनेककिले, ग्वालों की बस्तियाँ, पशुशालाएँ, छावनियाँ, खानें, खेतिहर बस्तियाँ तथा पहाड़ी गाँवबनवाये।
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प्राक्पूथोरिह् नैवैषा पुरग्रामादिकल्पना ।
यथासुखं वसन्ति सम तत्र तत्राकुतोभया: ॥
३२॥
प्राकु-पूर्व; पृथो:--राजा पृथु के; इह--इस पृथ्वी पर; न--कभी नहीं; एब--निश्चय ही; एघा--यह; पुर--नगरों की; ग्राम-आदि--गाँवों आदि की; कल्पना--नियोजित व्यवस्था; यथा--जिस प्रकार; सुखम्--सुविधाजनक; वसन्ति स्म--रहते थे;तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; अकुत:-भयाः--बिना हिचक के, बेखटके ।
राजा पृथु के शासन के पूर्व विभिन्न नगरों, ग्रामों, गोचरों इत्यादि की सुनियोजित व्यवस्था नथी।
सब कुछ तितर-बितर था और हर व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार अपना वास-स्थानबनाता था।
किन्तु राजा पृथु के काल से नगरों तथा ग्रामों की योजनाएँ बनने लगीं।
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