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अध्याय चौदह: राजा वेन की कहानी

4.14मैत्रेय उवाचभृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिन: ।

गोप्तर्यसति वैनृणां पश्यन्त: पशुसाम्यताम्‌ ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा; भूगु-आदयः:-- भृगु इत्यादि; ते--वे सब; मुनयः--मुनिगण; लोकानाम्‌--लोगों की;क्षेम-दर्शिन:--कुशल चाहनेवाले; गोप्तरि--राजा की; असति--अनुपस्थिति में; वै--निश्चय ही; नृणाम्‌--समस्त लोगों का;पश्यन्त:--जानते हुए; पशु-साम्यताम्‌--पशुतुल्य जीवन |

महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे महावीर विदुर, भूगु इत्यादि ऋषि सदैव जनता के कल्याण केलिए चिन्तन करते थे।

जब उन्होंने देखा कि राजा अंग की अनुपस्थिति में जनता के हितों कीरक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया तो उनकी समझ में आया कि बिना राजा के लोग स्वतंत्र एवंअसंयमी हो जाएँगे।

"

वीरमातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मगादिन: ।

प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्ञन्पतिं भुवः ॥

२॥

बीर--वेन की; मातरम्‌--माता को; आहूय--बुलाकर; सुनीथाम्‌--सुनी था नाम की; ब्रह्म-वादिन: --वेदों में पारंगत ऋषिगण;प्रकृति--मंत्रियों से; असम्मतम्‌--असहमत; वेनमू--वेन को; अभ्यषिज्ञनू--सिंहासन पर बैठा दिया; पतिमू--स्वामी; भुव:--विश्व का।

तब ऋषियों ने वेन की माता रानी सुनीथा को बुलाया और उनकी अनुमति से वेन को विश्वके स्वामी के रूप में सिंहासन पर बिठा दिया।

तथापि सभी मंत्री इससे असहमत थे।

"

श्रुत्वा नूपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम्‌ ।

निलिल्युर्दस्यव: सद्यः सर्पत्रस्ता इबाखव: ॥

३॥

श्रुत्वा--सुनकर; नृप--राजा का; आसन-गतम्‌--सिंहासन पर आरूढ़; वेनम्‌ू--वेन को; अति--अत्यन्त; उग्र--घोर;शासनमू--दंड देनेवाला; निलिल्यु:--अपने को छिपा लिया; दस्यवः--सभी चोर; सद्यः--तुरन्त; सर्प--साँपों से; त्रस्ता:--डरेहुए; इब--सहृश; आखव:--चूहे |

यह पहले से ज्ञात था कि वेन अत्यन्त कठोर तथा क्रूर था, अतः जैसे ही राज्य के चोरों तथाउचक्कों ने सुना कि वह राज-सिंहासन पर आरूढ़ हो गया है, वे उससे बहुत भयभीत हुए और वेसब उसी तरह छिप गये जिस प्रकार चूहे अपने आपको सर्पों से छिपा लेते हैं।

"

स आरूढनृपस्थान उन्नद्धो हष्टविभूतिभि: ।

अवमेने महाभागान्स्तब्ध: सम्भावित: स्वतः ॥

४॥

सः--राजा वेन; आरूढ--स्थित; नृप-स्थान:--राजा के आसन पर; उन्नद्ध:--अत्यन्त घमंडी; अष्ट-- आठ; विभूतिभि:--ऐश्वर्यों से; अवमेने--अपमान करने लगा; महा-भागान्‌--महापुरुषों को; स्तब्ध:--अदूरदर्शी ; सम्भावित:--महान्‌ समझते हुए;स्वतः--अपने आपको

जब राजा सिंहासन पर बैठा तो वह आठों ऐश्वर्यों से युक्त होकर सर्वशक्तिमान बन गया।

फलतः वह अत्यन्त घंमडी हो गया।

झूठी प्रतिष्ठा के कारण वह अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने लगा और इस प्रकार से वह महापुरुषों का अपमान करने लगा।

"

एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरह्ुश इव द्विप: ।

पर्यटत्रथमास्थाय कम्पयन्निव रोदसी ॥

५॥

एवम्‌--इस प्रकार; मद-अन्ध:--अधिकार के कारण अन्धा हुआ; उत्सिक्त:--घमंडी; निरहु शः--उऊहंड; इव--सहश; द्विप:--हाथी; पर्यटन्‌ू--घूमता हुआ; रथम्‌--रथ पर; आस्थाय--चढ़कर; कम्पयन्‌--हिलाता हुआ; इब--निरसन्देह; रोदसी-- आकाशतथा पृथ्वी

राजा वेन अपने ऐश्वर्य के मद से अन्धा होकर रथ पर आसीन होकर निरंकुश हाथी के समानसारे राज्य में घूमने लगा।

जहाँ-जहाँ वह जाता, आकाश तथा पृथ्वी दोनों हिलने लगते।

"

न यटष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजा: क्वचित्‌ ।

इति न्यवारयद्धर्म भेरीघोषेण सर्वशः ॥

६॥

न--नहीं; यष्टव्यमू--एक भी यज्ञ हो पाते; न--न तो; दातव्यम्‌--कोई दान दे सकता था; न--नहीं; होतव्यम्‌--आहुति दी जासकती थी; द्विजा:--हे द्विजन्मा; क्वचित्‌--किसी भी समय; इति--इस प्रकार; न्‍्यवारयत्‌--रोक दिया; धर्मम्‌-- धार्मिकनियमों की विधियाँ; भेरी--ढिंढोरा ( बाजा ); घोषेण--शब्द से; सर्वशः--सर्वत्र |

राजा वेन ने अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवा दिया कि सभी द्विजों ( ब्राह्मणों ) को अब सेकिसी भी तरह का यज्ञ करने, दान देने या घृत की आहुति देने की मनाही कर दी गईं।

दूसरे शब्दों में, उसने सभी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान बन्द करा दिये।

"

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्थ विचेष्टितम्‌ ।

विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचु: सम सत्रिण: ॥

७॥

वेनस्थ--वेन का; आवेशक्ष्य--देखकर; मुनय:--सभी मुनिगण; दुर्वृत्तस्य--धूर्त के; विचेष्टितम्‌--कार्यकलाप; विमृश्य--विचारकरके; लोक-व्यसनम्‌--सामान्य लोगों के लिए संकट; कृपया--दयावश; ऊचु:--कहा; स्म--भूतकाल में; सत्रिण:--यज्ञोंके कर्ता

अतः सभी ऋषिगण एकत्र हुए और वेन के अत्याचारों को देखकर इस निष्कर्ष पर पहुँचेकि संसार के मनुष्यों पर महान्‌ संकट तथा प्रलय आनेवाला है।

अतः वे दयावश परस्पर बातेंकरने लगे, क्योंकि वे स्वयं ही यज्ञों को सम्पन्न करनेवाले थे।

"

अहो उभयत: प्राप्त लोकस्य व्यसन महत्‌ ।

दारुण्युभयतो दीप्ते इब तस्करपालयो: ॥

८॥

अहो--ओह; उभयतः--दोनों ओर से; प्राप्तम्‌--प्राप्त; लोकस्य--लोगों का; व्यसनम्‌--संकट; महत्‌-- भारी; दारुणि--लट्टा;उभयतः--दोनों ओर से; दीप्ते--जलता हुआ; इब--सहृश; तस्कर--चोरों तथा उचक्कों से; पालयो:--तथा राजा से |

ऋषियों ने परस्पर विमर्श करके देखा कि जनता दोनों ओर से विकट स्थिति में है।

जबकिसी लट्ठे के दोनों सिरों पर अग्नि प्रज्वलित रहती है, तो बीच में स्थित चीटियाँ अत्यन्त विकटस्थिति में रहती हैं।

इसी प्रकार उस समय एक ओर अनुत्तरदायी राजा तथा दूसरी ओर चोर-उचक्कों के कारण जनता अत्यन्त विकट स्थिति में फँसी हुई थी।

"

अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हण: ।

ततोप्यासीद्धयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनामू ॥

९॥

अराजक--बिना राजा के होने से; भयात्‌-- भयवश; एष:--यह बेन; कृतः--बनाया था; राजा--राजा; अ-तत्‌-अर्हण: --अयोग्य होने पर भी; ततः--उससे; अपि-- भी; आसीतू-- था; भयम्‌--संकट; तु--तब; अद्य--अब; कथम्‌--कैसे; स्थात्‌ू--क्या हो सकता है; स्वस्ति--सुख; देहिनाम्‌--प्राणियों का।

राज्य को अराजकता से बचाने के लिए सोच-विचार कर ऋषियों ने राजनीतिक संकट केकारण बेन को, अयोग्य होते हुए भी राजा बनाया था।

किन्तु हाय! अब तो जनता राजा द्वारा हीअशान्त बनाई जा रही है।

ऐसी अवस्था में भला लोग किस प्रकार सुखी रह सकते हैं ?"

अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभूत्‌ ।

बेनः प्रकृत्येव खल: सुनीथागर्भसम्भव: ॥

१०॥

अहेः--सर्प के; इब--सहृश; पय:--दूध से; पोष:--पालन; पोषकस्य--पालक का; अपि-- भी; अनर्थ--हित विरुद्ध;भृत्‌--होता है; वेन:--राजा बेन; प्रकृत्या--प्रकृति से; एबव--निश्चय ही; खलः--दुष्ट; सुनीधा--सुनीथा के; गर्भ--गर्भ से;सम्भव:--उत्पन्न

ऋषिगण अपने आप में सोचने लगे कि सुनीथा के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण राजा वेनस्वभाव से अत्यन्त दुष्ट ( उत्पाती ) है।

इस दुष्ट राजा का समर्थन करना बैसा ही है जैसे सर्प कोदूध पिलाना।

अब यह समस्त संकटों का कारण बन गया है।

निरूपितः प्रजापाल: स जिघांसति बै प्रजा: ।

तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातक॑ स्पृशेत्‌ ॥

११॥

निरूपित:--नियुक्त; प्रजा-पाल:--राजा; सः--वह; जिघांसति-- क्षति पहुँचाना चाहता है; बै--निश्चय ही; प्रजा:--नागरिक;तथा अपि--तो भी; सान्त्वयेम--हमें समझाना चाहिए; अमुम्‌ू--उसको; न--नहीं; अस्मान्‌ू--हमको; तत्‌--उसका;पातकम्‌--पापमय फल; स्पृशेत्‌--छू सकेंगे।

हमने इस वेन को नागरिकों की सुरक्षा के हेतु नियुक्त किया था, किन्तु अब वह उनका शत्रुबन चुका है।

इन सब न्यूनताओं के होते हुए भी, हमें चाहिए कि उसे तुरन्त समझाने का प्रयत्नकरें।

ऐसा करने से हमें उसके पाप स्पर्श नहीं कर सकेंगे।

"

तद्विद्दद्धिरसद्वत्तो वेनोउस्माभि: कृतो नृप: ।

सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत्‌ ।

लोकथिक्कारसन्दग्धं दहिष्याम: स्वतेजसा ॥

१२॥

तत्‌--उसकी उत्पाती प्रकृति; विद्वद्धिः--परिचित; असत्‌-वृत्त:--अपवित्र; वेन:--वेन; अस्माभि:--हमारे द्वारा; कृत:--बनायागया; नृप:--राजा; सान्त्वितः--शान्त किये जाने या समझाने पर; यदि--यदि; न:--हमारा; वाचम्‌--शब्द; न--नहीं;ग्रहीष्यति--वह स्वीकार करेगा; अधर्म-कृत्‌--सर्वाधिक दुष्ट; लोक-धिक्‌-कार--सार्वजनिक निन्दा; सन्दग्धम्‌-- भस्म कियाहुआ; दहिष्याम: --जला देंगे; स्व-तेजसा--अपने तेज से ।

संत सदृश मुनि लोगों ने आगे सोचा : निस्सन्देह हम उसके दुष्ट स्वभाव से भली भाँतिपरिचित हैं, तो भी हमीं ने वेन को राजसिंहासन पर बैठाया है।

यदि हम उसे अपनी सलाह माननेके लिए राजी नहीं कर लेते तो जनता उसको दुत्कारेगी और हम भी उनका साथ देंगे।

इस प्रकारहम अपने तेज से उसे भस्म कर डालेंगे।

"

एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यव: ।

उपक्रज्याब्रुवन्वेनं सान्त्वयित्वा च सामभि: ॥

१३॥

एवम्‌--इस प्रकार; अध्यवसाय--निर्णय करके; एनम्‌--उसको; मुनय:--मुनियों ने; गूढ-मन्यव:ः--अपना क्रोध छिपाते हुए;उपकब्रज्य--पास जाकर; अब्लुवन्‌ू--बोले; वेनम्‌--राजा वेन से; सान्त्वयित्वा--समझा-बुझा कर; च-- भी; सामभि: --मीठेबचनों से।

ऐसा निश्चय करके ऋषिगण राजा वेन के पास गये और अपना वास्तविक क्रोध छिपाते हुएउन्होंने उसे मीठे वचनों से समझाया-बुझाया।

फिर उन्होंने इस प्रकार कहा।

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मुनय ऊचुःनृपवर्य निबोधेतद्यत्ते विज्ञापपाम भो: ।

आयु: श्रीबलकीर्तीनां तब तात विवर्धनम्‌ ॥

१४॥

मुनयः ऊचु:--मुनियों ने कहा; नृूप-वर्य--हे राजाओं में श्रेष्ठ; निबोध--समझने का यल करो; एतत्‌--यह; यत्‌--जो; ते--तुमको; विज्ञापयाम--हम उपदेश देंगे; भोः--हे राजा; आयु:--उम्र; श्री--ऐ श्वर्य; बल--शक्ति; कीर्तीनाम्‌ू--उत्तम ख्याति;तब--तुम्हारी; तात--हे पुत्र; विवर्धनम्‌--बढ़ानेवाली ।

मुनियों ने कहा: हे राजन, हम आपके पास सदुपदेश देने आये हैं।

कृपया ध्यानपूर्वक सुनें।

ऐसा करने से आपकी आयु, ऐश्वर्य, बल तथा कीर्ति बढ़ेगी।

"

धर्म आचरित: पुंसां वाइमन:कायबुद्धिभि: ।

लोकान्विशोकान्वितरत्यथानन्त्यमसड्रिनाम्‌ ॥

१५॥

धर्म:--धार्मिक नियम; आचरित:ः--पालन करते हुए; पुंसाम्‌--व्यक्तियों को; वाक्‌ु--शब्दों से; मन:ः--मन; काय--शरीर;बुद्धिभिः--तथा बुद्धि से; लोकानू--लोक; विशोकान्‌--शोकरहित; वितरति-- प्रदान करते हैं; अथ--निश्चय ही;आनन्‍्त्यमू--अपार सुख, मुक्ति; असड्रिनामू-- भौतिक प्रभावों से जो मुक्त है उन निष्काम मनुष्यों को।

जो लोग धार्मिक नियमों के अनुसार रहते हैं और जो मन, वचन, शरीर तथा बुद्धि से इनकापालन करते हैं, वे स्वर्गलोक को जाते हैं, जो समस्त शोकों ( दुखों ) से रहित है।

इस प्रकारभौतिक प्रभाव से छूट कर वे जीवन में असीम सुख प्राप्त करते हैं।

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सते मा विनएेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षण: ।

यस्मिन्विनष्टे नृपत्रिश्वर्यादवरोहति ॥

१६॥

सः--आध्यात्मिक जीवन; ते--तुम्हारे द्वारा; मा--मत; विनशेत्‌--विनष्ट होने दें; वीर--हे वीर; प्रजानाम्‌ू--लोगों का; क्षेम-लक्षण:--सम्पन्नता का कारण; यस्मिन्‌--जो; विनष्टे--नष्ट होने पर; नृपति:--राजा; ऐश्वर्यात्‌--ऐश्वर्य से; अवरोहति--नीचेगिरता है

मुनियों ने आगे कहा : अतः हे महान्‌ वीर, आपको सामान्य जनता के आध्यात्मिक जीवनको विनष्ट करने में निमित्त नहीं बनना चाहिए।

यदि आपके कार्यों से उनका आध्यात्मिक जीवनविनष्ट होता है, तो आप निश्चित रूप से अपने ऐश्वर्यपूर्ण तथा राजोचित पद से नीचे गिरेंगे।

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राजन्नसाध्वमात्ये भ्यक्षोरादिभ्य: प्रजा नृप: ।

रक्षन्यथा बलि गृह्न्निह प्रेत्य च मोदते ॥

१७॥

राजन्‌--हे राजन; असाधु --दुष्ट; अमात्येभ्य: --मंत्रियों से; चोर-आदिभ्य:--चोरों तथा उचक्कों से; प्रजा:--नागरिक; नृप:--राजा; रक्षन्‌--रक्षा करते हुए; यथा--जिस प्रकार से; बलिमू--कर; गृहन्‌--स्वीकार करते हुए; इह--इस संसार में; प्रेत्य--मरकर; च--तथा; मोदते--सुख उठाता है।

मुनियों ने आगे कहा : जब राजा दुष्ट मंत्रियों के तथा चोर-उचक्कों के उत्पातों से नागरिकोंकी रक्षा करता है, तो अपने इन पवित्र कार्यों के कारण वह अपनी प्रजा से कर प्राप्त कर सकताहै।

इस प्रकार पवित्र राजा इस संसार में और मृत्यु के बाद भी सुख भोग सकता है।

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यस्य राष्ट्र पुरे चैव भगवान्यज्ञपूरुष: ।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णा श्रमान्विति: ॥

१८ ॥

यस्य--जिसके ; राष्ट्रे--राज या राज्य में; पुरे--नगरों में; च-- भी; एबव--निश्चय ही; भगवान्‌-- भगवान्‌; यज्ञ-पूरुष: -- समस्तयज्ञों का भोक्ता; इज्यते--पूजा जाता है; स्वेन--स्वतः; धर्मेण--वृत्ति द्वारा; जनैः--मनुष्यों के द्वारा; वर्ण-आशश्रम--चार वर्णतथा चार आश्रम इन आठ सामाजिक व्यवस्थाओं की प्रणाली; अन्वितैः--पालन करनेवाले।

वह राजा पवित्र समझा जाता है, जिसके राज्य तथा नगरों में प्रजा वर्ण तथा आश्रम की आठसामाजिक व्यवस्थाओं का कठोरता से पालन करती है और जहाँ के नागरिक अपने विशिष्ट धर्म( वृत्ति ) द्वारा भगवान्‌ की सेवा में संलग्न रहते हैं।

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तस्य राज्ञो महाभाग भगवान्भूतभावन: ।

परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥

१९॥

तस्य--उससे; राज्ञ:--राजा; महा-भाग-हे श्रेष्ठ; भगवान्‌-- भगवान्‌; भूत- भावन: -- जो इस दृश्य जगत का मूल कारण है;परितुष्यति-- प्रसन्न हो जाता है; विश्व-आत्मा--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का परमात्मा; तिष्ठतः--स्थित होकर; निज-शासने-- अपनेशासन में

हे महाभाग, यदि राजा यह देखता है कि दृश्य जगत के मूल कारण भगवान्‌ तथा हर एकके भीतर स्थित परमात्मा की पूजा होती है, तो भगवान्‌ प्रसन्न होते हैं।

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तस्मिस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामी श्वरेश्वरे ।

लोकाः सपाला ह्ोतस्मै हरन्ति बलिमाहता: ॥

२०॥

तस्मिनू--जब वह; तुष्टे--संतुष्ट या प्रसन्न है; किमू--क्या; अप्राप्यम्‌--प्राप्त करना असम्भव; जगताम्‌--विश्व के; ई श्वर-ईश्वेर--नियन्ता के भी नियन्ता; लोकाः--लोकों के वासी; सपाला:--पालकों सहित; हि--इस कारण से; एतस्मै--उसको;हरन्ति--प्रदान करते हैं; बलिम्‌--पूजा की सामग्री; आहता: --अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक |

भगवान्‌ विश्व के नियन्ता बड़े-बड़े देवताओं द्वारा पूजित हैं।

जब वे प्रसन्न हो जाते हैं, तोकुछ भी प्राप्त करना दुर्लभ नहीं रह जाता।

इसीलिए सभी देवता, लोकपाल तथा उनके लोकोंके निवासी भगवान्‌ को सभी प्रकार की पूजा-सामग्री अर्पित करने में अत्यधिक प्रसन्नता काअनुभव करते हैं।

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त॑ सर्वलोकामरयज्ञसड्ग्रहंत्रयीमयं द्र॒व्यमयं तपोमयम्‌ ।

यज्ञैर्विचित्रै्यजतो भवाय तेराजन्स्वदेशाननुरोद्धुमहसि ॥

२१॥

तम्‌--उसको; सर्व-लोक--समस्त लोकों में; अमर--प्रमुख देवों सहित; यज्ञ--यज्ञ; सड्ग्रहमू--जो स्वीकार करते हैं; त्रयी-मयम्‌--तीन वेदों का सार; द्रव्य-मयम्‌--समस्त सामग्री का स्वामी; तप:ः-मयम्‌--समस्त तपस्या का उद्देश; यज्जै:--यज्ञ केद्वारा; विचित्रै:--विभिन्न; यजत:--पूजा करते हुए; भवाय--उन्नति के लिए; ते--तुम्हारी; राजनू--हे राजा; स्व-देशान्‌-- अपनेदेशवासियों को; अनुरोद्धुमू--निर्देश देना; अहसि--तुम्हें चाहिए

हे राजन, भगवान्‌ प्रमुख अधिष्ठाता देवों सहित समस्त लोकों में समस्त यज्ञों के फल केभोक्ता हैं।

परमेश्वर तीनों वेदों के सार रूप हैं, वे हर वस्तु के स्वामी हैं और सारी तपस्या के चरमलक्ष्य हैं।

अतः आपके देशवासियों को आपकी उन्नति के लिए विविध प्रकार के यज्ञ करनेचाहिए।

दर असल आपको चाहिए कि आप उन्हें यज्ञ करने के लिए निर्देशित करें।

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यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-वितायमानेन सुरा: कला हरे: ।

स्विष्टा: सुतुष्टा: प्रदिशन्ति वाजिछतं तद्धेलनं नाहसि वीर चेष्टितुम्‌ ॥

२२॥

यज्ञेन--यज्ञ से; युष्मत्‌--तुम्हारे; विषये--राज्य में; द्विजातिभि:--ब्राह्मणों द्वारा; वितायमानेन--किया जाकर; सुरा: --समस्तदेवता; कला:--विस्तार; हरेः -- भगवान्‌ के; सु-इष्टाः-- भली-भाँति पूजित होकर; सु-तुष्टाः:--अत्यधिक समन्तुष्ट; प्रदिशन्ति--प्रदान करेंगे; वाड्छितम्‌--इच्छित फल; ततू-हेलनम्‌--उनके प्रति अनादर; न--नहीं; अ्हसि--चाहिए; वीर--हे वीर;चेष्टितुमू-- करना |

जब आपके राज्य के सारे ब्राह्मण यज्ञ में संलग्न होने लगेंगे तो भगवान्‌ के स्वांश समस्तदेवता उनके कार्यों से प्रसन्न होकर आपको मनवांछित फल देंगे; अतः हे वीर, यज्ञों को बन्द नकरें।

यदि उन्हें बन्द कर ते हैं तो आप देवताओं का अनादर करेंगे।

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बेन उबाचबालिशा बत यूय॑ वा अधर्मे धर्ममानिन: ।

ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जार पतिमुपासते ॥

२३॥

वेन:--राजा बेन ने; उवाच--उत्तर दिया; बालिशा:--बच्चों जैसा; बत--ओह; यूयम्‌--तुम सब; वा--निस्सन्देह; अधर्मे--अधार्मिक नियमों में; धर्म-मानिन:--धर्म मानते हुए; ये--तुम सब जो; वृत्तिदमू--पालन करनेवाले; पतिम्‌--पति को;हित्वा--त्याग कर; जारम्‌--परपति को; पतिम्‌--पति को; उपासते--पूजा करते हैं।

राजा वेन ने उत्तर दिया : तुम तनिक भी अनुभवी नहीं हो।

यह अत्यन्त दुख की बात है कितुम लोग जो कुछ करते रहे हो वह धार्मिक नहीं है, किन्तु तुम लोग उसे धार्मिक मान रहे हो।

दरअसल, तुम लोग अपने पालनकर्ता वास्तविक पति को त्याग रहे हो और पूजा करने के लिएकिसी जार ( परपति ) की तलाश में हो।

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अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमी श्वरम्‌ ।

नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च ॥

२४॥

अवजानन्ति--अनादर करते हैं; अमी--जो; मूढा:--अज्ञानी होकर; नूप-रूपिणम्‌--राजा के रूप में; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌ को;न--नहीं; अनुविन्दन्ति--अनुभव करते हैं; ते--वे; भद्रमू-- सुख; इह--इस; लोके --संसार में; परत्र--मृत्यु के बाद; च--भी।

जो लोग अज्ञानतावश उस राजा की पूजा नहीं करते जो कि वास्तव में भगवान्‌ है, तो वे नतो इस लोक में और न परलोक में सुख का अनुभव करते हैं।

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को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीहशी ।

भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम्‌ ॥

२५॥

'कः--कौन ( है ); यज्ञ-पुरुष:--समस्त यज्ञों का भोक्ता; नाम--नाम से; यत्र--जिसको; वः--तुम्हारी; भक्ति:-- भक्ति;ईहशी--इतनी महान; भर्तू--पति के लिए; स्नेह--प्यार; विदूराणाम्‌ू--रहित; यथा--जिस प्रकार; जारे--जारपति को; कु-योषिताम्‌ू--कुलटा स्त्री का।

तुम लोग देवताओं के इतने भक्त हो, किन्तु वे हैं कौन ? निस्सन्देह, इन देवताओं के प्रति तुमलोगों का स्नेह उस कुलटा स्त्री का सा है, जो अपने विवाहित जीवन की उपेक्षा करके अपनेजारपति पर सारा ध्यान केन्द्रित कर देती है।

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विष्णुर्विरिज्ञो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रवि: ।

पर्जन्यो धनदः सोम: क्षितिरग्निरपाम्पति: ॥

२६॥

एते चान्ये च विबुधा: प्रभवो वरशापयो: ।

देहे भवन्ति नृपते: सर्वदेवमयो नृप: ॥

२७॥

विष्णु;:-- भगवान्‌ विष्णु; विरिज्ञ:-- श्री ब्रह्मा; गिरिश: -- शिवजी; इन्द्र: --इन्द्र; वायु;:--वायु; यम: --यम, मृत्यु का अधीक्षक;रवि:--सूर्यदेव; पर्जन्य:--वर्षा का निदेशक; धन-दः--कुबेर; सोम: --चन्द्रदेव; क्षिति:--पृथ्वी का अधिष्ठता देव; अग्नि: --अग्निदेव; अपामू-पति:--वरुण, जल का स्वामी; एते--ये सब; च--तथा; अन्ये-- अन्य; च--भी; विबुधा: --देवता;प्रभव:--समर्थ; वर-शापयो:--वरदान तथा शाप दोनों में; देहे--शरीर में; भवन्ति--रहते हैं; नृपतेः--राजा का; सर्व-देवमय:--सभी देवताओं से; नृप:--राजा

विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्यदेव, पर्जन्य, कुबेर, चन्द्रदेव, क्षितिदेव, अग्नि देव,वरुण तथा अन्य बड़े-बड़े देवता जो आशीर्वाद या शाप दे सकने में समर्थ हैं, वे सब राजा केशरीर में वास करते हैं।

इसीलिए राजा सभी देवताओं का आगार माना जाता है।

देवता राजा केशरीर के भिन्नांश हैं।

"

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा'यजध्वं गतमत्सरा: ।

बलिं च मह्यं हरतमत्तोन्य: कोग्रभुक्पुमान्‌ ॥

२८॥

तस्मात्‌--इस कारण से; माम्‌--मुझको; कर्मभि: --अनुष्ठान कार्यों के द्वारा; विप्रा:--हे ब्राह्मणों; यजध्वम्‌--पूजा करो; गत--बिना; मत्सरा:--ईर्ष्या किये; बलिम्‌--पूजा की सामग्री; च-- भी; महाम्‌--मुझको; हरत--लाओ; मत्त:--मेरी अपेक्षा;अन्य:--दूसरा; कः--कौन ( है ); अग्र-भुक्‌ू--प्रथम आहुति का भोक्ता; पुमान्‌ू--पुरुष |

राजा वेन ने आगे कहा : इसलिए, हे ब्राह्मणो, तुम मेरे प्रति ईर्ष्या त्याग कर अपने अनुष्ठानकार्यों द्वारा मेरी पूजा करो और समस्त पूजा-सामग्री मुझ पर ही चढ़ाओ।

यदि तुम लोग भीबुद्धिमान होगे, तो समझ सकोगे कि मुझसे श्रेष्ठ ऐसा कोई पुरुष नहीं जो समस्त यज्ञों की प्रथमआहुतियों को ग्रहण कर सके " मैत्रेय उवाचइत्थं विपर्ययमति: पापीयानुत्पथ्थं गत: ।

अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टटड्रल: ॥

२९॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार; विपर्यय-मतिः--विपरीत बुद्ध्धि वाला; पापीयानू--अत्यन्त पापी; उत्पथम्‌--सही रास्ते से; गतः--चलकर; अनुनीयमान: --सभी प्रकार से सम्मानित; ततू-याच्ञाम्‌--मुनियों की याचना; न--नहीं ; चक्रे --स्वीकार किया; भ्रष्ट--रहित; मड़ल:--समस्त पुण्यमहर्षि

मैत्रेय ने आगे कहा : इस प्रकार अपने पापमय जीवन के कारण दुर्बोध होने तथा सहीराह से विचलित होने के कारण राजा समस्त पुण्य से क्षीण हो गया।

उसने ऋषियों की सादर प्रस्तुत प्रार्थनाएँ स्वीकार नहीं कीं, अतः उसकी भर्त्सना की गई।

"

इति तेसत्कृतास्तेन द्विजा: पण्डितमानिना ।

भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रु धु; ॥

३०॥

इति--इस प्रकार; ते--समस्त ऋषि; असत्‌-कृता:--अपमानित होकर; तेन--राजा द्वारा; द्विजा:--ब्राह्मण; पण्डित-मानिना--अपने को अत्यन्त विद्वान मानते हुए; भग्नायामू--टूटकर; भव्य--शुभ; याच्ञायाम्‌-- प्रार्थना, याचना; तस्मै--उसको; विदुर--हे विदुर; चुक्रु धु:--अत्यन्त रुष्ट हुएहे विदुर, तुम्हारा कल्याण हो।

उस मूर्ख राजा ने अपने को अत्यन्त विद्वान्‌ समझकर ऋषियोंतथा मुनियों का अपमान किया।

राजा के वचनों से ऋषियों दिल टूट गया और वे उस परअत्यन्त क्रुद्ध हुए।

"

हन्यतां हन्यतामेष पाप: प्रकृतिदारुण: ।

जीवज्भगदसावाशु कुरुते भस्मसादध्सूवम्‌ ॥

३१॥

हन्यताम्‌ू--उसे मार डालो; हन्यताम्‌--मार डालो; एष:--यह राजा; पाप:--पाप रूप; प्रकृति--स्वभाव से; दारुण: --अत्यन्तदुष्ट; जीवन्‌--जीवित रहते हुए; जगत्‌--सारा संसार; असौ--वह; आशु--शीघ्र; कुरुते--करेगा; भस्मसात्‌-- भस्म, राख;भ्रुवमू--निश्चय ही |

सभी ऋषि तुरन्त हाहाकार करने लगे : इसे मारो! इसे मारो! यह अत्यन्त भयावह और पापीपुरुष है।

यदि यह जीवित रहा तो निश्चित रूप से सारे संसार को देखते-देखते भस्म कर देगा।

"

नायमर्ईत्यसद्वुत्तो नरदेववरासनम्‌ ।

योधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्द॒त्यनपत्रप: ॥

३२॥

न--कभी नहीं; अयम्‌--यह व्यक्ति; अर्हति--पात्र है; असत्-वृत्त:--अपवित्र कार्यों से पूर्ण; नर-देव--सांसारिक राजा का यादेव का; वर-आसनम्‌ू- श्रेष्ठ सिंहासन; य: -- जो; अधियज्ञ-पतिम्‌--समस्त यज्ञों का स्वामी; विष्णुम्‌-- भगवान्‌ विष्णु को;विनिन्दति--अपमान करता है; अनपत्रप: --निर्लज्ज |

ऋषियों ने आगे कहा : यह अपवित्र, दम्भी व्यक्ति सिंहासन पर बैठने के लिए सर्वथाअयोग्य है।

यह इतना निर्लज्ज है कि इसने भगवान्‌ विष्णु का भी अपमान करने का दुस्साहसकिया है।

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को बैन परिचक्षीत वेनमेकमृते शुभम्‌ ।

प्राप्त ईहृशमैश्वर्य यदनुग्रहभाजन: ॥

३३॥

कः--कौन; वा--निस्सन्देह; एनम्‌ू-- भगवान्‌; परिचक्षीत-- निन्‍्दा करेगा; वेनम्‌--राजा वेन को; एकम्‌--एकाकी; ऋते--सिवाय; अशुभम्‌--अभागा; प्राप्त:--प्राप्त करके; ईहशम्‌--ऐसा; ऐश्वर्यम्‌--ऐश्वर्य; यत्‌--जिसका; अनुग्रह--कृपा;भाजनः-पात्र

अभागे राजा बेन को छोड़कर भला ऐसा कौन होगा जो उन भगवान्‌ की निन्दा करेगा,जिनकी कृपा से सभी प्रकार की सम्पत्ति एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता हो ?"

इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यव: ।

निजल्नुईड्ड तैवेनं हतमच्युतनिन्दया ॥

३४॥

इत्थम्‌--इस प्रकार; व्यवसिता:--निश्चित; हन्तुमू--मारने के लिए; ऋषय:--मुनिगण; रूढ-- प्रकट किया; मन्यव:-- अपनाक्रोध; निजघ्नु:--मार डाला; हुम्‌-कृतैः--हुंकार या क्रोधपूर्ण शब्दों से; वेनमू--राजा बेन को; हतम्‌ू--मृत; अच्युत-- भगवान्‌के विरुद्ध; निन्दया--निन्दा से

इस प्रकार अपने छिपे क्रोध को प्रकट करते हुए ऋषियों ने राजा को तुरन्त मार डालने कानिश्चय कर लिया।

राजा वेन भगवान्‌ की निन्दा के कारण पहले से ही मृत तुल्य था।

अत: बिनाकिसी हथियार के ही मुनियों ने हुंकारों से वेन को मार डाला।

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ऋषिधि: स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम्‌ ।

सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥

३५॥

ऋषिभि:--ऋषियों द्वारा; स्व-आ श्रम-पदम्‌-- अपने-अपने आश्रमों को; गते--लौटकर; पुत्र--उसके पुत्र का; कलेवरम्‌--शरीर; सुनीथा--सुनीथा, राजा वेन की माता ने; पालयाम्‌ आस--सुरक्षित कर लिया; विद्या-योगेन--मंत्र तथा अवयवों से;शोचती--विलाप करती।

इस सब के बाद ऋषिगण अपने-अपने आश्रमों को चले गये तो राजा बेन की माता सुनीथाअपने पुत्र की मृत्यु से अत्यधिक शोकाकुल हो उठी।

उसने अपने पुत्र के शव को कुछ द्वव्यों केद्वारा तथा मंत्र के बल से सुरक्षित रखने का निश्चय किया।

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एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुता: ।

हु॒त्वाग्नीन्सत्कथाश्चक्रुरुपविष्टा: सरित्तटे ॥

३६॥

एकदा--एक बार; मुनयः--सभी साधु पुरुषों ने; ते--वे; तु--तब; सरस्वत्‌--सरस्वती नदी; सलिल--जल में; आप्लुता: --स्नान किया; ह॒त्वा--आहुति करके; अग्नीन्‌-- अग्नि में; सतू-कथा:--दिव्य विषयों पर वार्ताएँ; चक्रुः--करने लगे;उपविष्टा:--बैठकर; सरित्‌-तटे--नदी के किनारे

एक बार ये ही ऋषि सरस्वती नदी में स्नान करके यज्ञ-अग्नि में आहुति डालने का अपनानित्य कर्म कर रहे थे।

इसके पश्चात्‌ नदी के तट पर बैठ कर वे दिव्य पुरुष तथा उनकी लीलाओंके विषय में चर्चा करने लगे।

"

वीक्ष्योत्थितांस्तदोत्पातानाहुलोंक भयड्डूरान्‌ ।

अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुव:ः ॥

३७॥

वीक्ष्य--देखकर; उत्थितान्‌--उत्पन्न; तदा--तब; उत्पातानू--उपद्रव, अशान्ति; आहुः--कहने लगे; लोक--समाज में; भयम्‌-करान्‌--आतंक उत्पन्न करते हुए; अपि-- क्या; अभद्रम्‌ू-दुर्भाग्य; अनाथाया: --बिना शासक के; दस्युभ्य: --चोर-उचक्कों से;न--नहीं; भवेत्‌--होए; भुवः--विश्व का

उन दिनों देश में अनेक उपद्रव हो रहे थे जिनसे समाज में आतंक उत्पन्न हो रहा था।

अतःसभी मुनि परस्पर बातें करने लगे : चूँकि राजा मर चुका है और संसार का कोई रक्षक नहीं है,अतः चोर-उचक्ों के कारण प्रजा पर विपत्ति आ सकती है।

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एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम्‌ ।

पांसु: समुत्थितो भूरिश्नोराणामभिलुम्पताम्‌ ॥

३८ ॥

एवम्‌--इस प्रकार; मृशन्त:--विचार करते हुए; ऋषय:--बड़े-बड़े साधु पुरुष; धावताम्‌--दौड़ते हुए; सर्वतः-दिशम्‌--सभीदिशाओं से; पांसु:-- धूल; समुत्थित:--उठी हुईं; भूरिः--अत्यधिक; चोराणाम्‌--चोर-उचक्कों से; अभिलुम्पताम्‌--लूट-पाट मेंव्यस्त।

जब ऋषिगण इस प्रकार विचार-विर्मश कर रहे थे तो उन्होंने चारों दिशाओं से धूल कीआँधी उठती देखी।

यह आँधी उन चोर-उचक्कों के दौड़ा-भागी से उत्पन्न हुई थी जो नागरिकों कोलूट रहे थे।

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तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम्‌ ।

भर्तर्युपरते तस्मिन्नन्योन्यं च जिघांसताम्‌ ॥

३९॥

चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम्‌ ।

लोकान्नावारयज्छक्ता अपि तहोषदर्शिन: ॥

४०॥

तत्‌--उस समय; उपद्रवम्‌--उथल-पुथल; आज्ञाय--समझ कर; लोकस्य--जनता की; वसु-- धन-सम्पति; लुम्पताम्‌--लुटेरोंद्वारा; भर्तरि--रक्षक; उपरते--मृत होने से; तस्मिन्‌ू--राजा वेन; अन्योन्यम्‌ू--परस्पर; च-- भी; जिघां-सताम्‌--मारने की इच्छाकरते हुए; चोर-प्रायम्‌--चोरों से पूर्ण; जन-पदम्‌--राज्य; हीन--रहित; सत्त्वमू--विधान; अराजकम्‌--राज से रहित;लोकान्‌--चोर उचक्के; न--नहीं; अवारयन्‌--दमन करते हुए; शक्ता: --करने में समर्थ; अपि--यद्यपि; तत्‌-दोष--उसका दोष;दर्शिन:--मानते हुए।

उस अंधड़ को देखकर साधु पुरुषों ने समझ लिया कि राजा वेन की मृत्यु के कारणअत्यधिक अव्यवस्था फैल गई है।

बिना सरकार के राज्य कानून तथा व्यवस्था से विहीन होजाता है, फलतः उन घातक चोर-उचक्कों का प्राबल्य हो उठा जो प्रजा की सम्पत्ति को लूट रहेथे।

यद्यपि ऋषिगण इस उपद्रव को अपनी शक्ति से रोक सकते थे--जिस प्रकार उन्होंने राजा का वध किया था--किन्तु उन्होंने ऐसा करना अनुचित समझा।

अतः उन्होंने उपद्रव को रोकनेका कोई प्रयास नहीं किया।

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ब्राह्मण: समहक्शान्तो दीनानां समुपेक्षक: ।

सत्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥

४१॥

ब्राह्मण: --ब्राह्मण; सम-हक्‌ --समदर्शी; शान्त:--शान्ति-प्रिय; दीनानाम्‌--निर्धनों का; समुपेक्षक:--सर्वथा उपेक्षा'करनेवाला; स्त्रवते--रिस जाता है; ब्रह्म-- आत्म-बल; तस्य--उसका; अपि--निश्चय ही; भिन्न-भाण्डात्‌--फूटे बर्तन से;'पय:--जल; यथा--जिस प्रकार |

ऋषिगण सोचने लगे कि यद्यपि ब्राह्मण शान्त और समदर्शी होने के कारण निष्पक्ष होता है,तो भी उसका कर्तव्य है कि वह दीनों की उपेक्षा न करे।

ऐसा करने से उसका आत्मबल उसीप्रकार घट जाता है, जिस प्रकार फूटे बर्तन से पानी रिस जाता है।

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नाडुस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमहति ।

अमोघवीर्या हि नृपा वंशेउस्मिन्केशवाश्रया: ॥

४२॥

न--नहीं; अड्डस्थ--राजा अंग का; वंश: --कुल; राज-ऋषे:--राजर्षि का; एष:--यह; संस्थातुम्‌--नष्ट होने के लिए;अहति--चाहिए; अमोघ--पापरहित, शक्तिशाली; वीर्या:--उनका वीर्य; हि-- क्योंकि; नृपा:--राजा; वंशे--वंश में;अस्मिनू--इस; केशव--भगवान्‌ की; आश्रया:--शरण में |

मुनियों ने निश्चय किया कि राजर्षि अंग के वंश को नष्ट नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इसवंश का वीर्य अत्यन्त शक्तिशाली रहा है और उसकी सन्‍्तानें भगवत्परायण होती रही हैं।

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विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपते: ।

ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्वाहुको नर: ॥

४३॥

विनिश्चित्य--निश्चय करके; एवम्‌--इस प्रकार; ऋषय: --ऋषियों ने; विपन्नस्य--मृत; मही-पतेः--राजा का; ममन्थु:--मंथनकिया; ऊरुम्‌--जंघाएँ; तरसा--विशिष्ट शक्ति से; तत्र--तत्पश्चात्‌; आसीत्‌--उत्पन्न हुआ; बाहुक:--बाहुक ( बौना ) नामक;नरः-व्यक्ति।

इस निश्चय के बाद, साधु पुरुषों तथा मुनियों ने राजा वेन के मृत शरीर की जाँघों काअत्यन्त शक्तिपूर्वक तथा एक विशेष विधि से मंथन किया।

मंथन के फलस्वरूप राजा बेन केशरीर से एक बौने जैसा व्यक्ति उत्पन्न हुआ।

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काककृष्णोतिहस्वाझ् हस्वबाहुर्महाहनु: ।

हस्वपान्निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताग्रमूर्धज: ॥

४४॥

काक-कृष्ण:--कौवे के समान काला; अति-हस्व--अत्यन्त लघु; अड्डअ:--उसके अंग; हस्व--छोटे; बाहु:--उसकी भुजाएं;महा--विशाल; हनु:--जबड़े; हस्व--छोटे; पात्‌--उसके पाँव; निम्न--चपटा; नास-अग्र:--नाक का अगला भाग; रक्त--लाल; अक्ष:--आँखें; ताम्र--ताँबे जैसा; मूर्थ-ज:--केश ।

राजा वेन की जंघाओं से उत्पन्न इस व्यक्ति का नाम बाहुक था।

उसकी सूरत कौवे जैसीकाली थी।

उसके शरीर के सभी अंग ठिगने थे, उसके हाथ तथा पाँव छोटे थे और जबड़े लम्बेथे।

उसकी नाक चपटी, आँखें लाल-लाल तथा केश ताँबे जैसे रंग के थे।

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तं तु तेउबनतं दीनं कि करोमीति वादिनम्‌ ।

निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततो भवत्‌ ॥

४५॥

तम्‌--उसको; तु--तब; ते--वे ऋषि; अवनतम्‌--झुक कर; दीनम्‌--विनप्र; किम्‌--क्या; करोमि--करूँ; इति--इस प्रकार;वादिनम्‌--पूछते हुए; निषीद--बैठ जाओ; इति--इस प्रकार; अन्लुवन्‌--उन्होंने उत्तर दिया; तात--हे विदुर; सः--वह;निषाद:--निषाद नाम का; ततः--तत्पश्चात्‌; अभवत्‌--हो गया।

वह अत्यन्त विनम्र था और अपना जन्म होते ही उसने विनत होकर पूछा, 'महाशय, मैं क्‍याकरूँ?' ऋषियों ने कहा, 'बैठ जाओ ' ( निषीद )।

इस प्रकार नैघाद जाति का जनक निषादउत्पन्न हुआ।

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तस्य वंश्यास्तु नैघादा गिरिकाननगोचरा: ।

येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम्‌ ॥

४६॥

तस्य--उसके ( निषाद के ); वंश्या:--वंशज; तु--तब; नैषादा:ः--नैषाद नामक; गिरि-कानन--पहाड़ियों तथा जंगलों;गोचरा: --निवासी; येन--क्योंकि; अहरत्‌-- स्वयं धारण किया; जायमान:--उत्पन्न होकर; वेन--राजा वेन का; कल्मषम्‌--समस्त प्रकार के पाप; उल्बणम्‌--अत्यन्त भयानक |

जन्म होते ही उसने ( निषाद ने ) राजा वेन के समस्त पापपूर्ण कृत्यों के फलों को स्वयंधारण कर लिया।

इसलिए यह निषाद जाति सदैव पापपूर्ण कृत्यों में--यथा चोरी, डाका तथाश़ शिकार में--लगी रहती है।

फलतः इन्हें पर्वतों तथा जंगलों में ही रहने दिया जाता है।

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