← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची
अध्याय बारह: ध्रुव महाराज भगवान के पास वापस चले गये
4.12मैत्रेय उवाचध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्धय वैशसा-दपेतमन्युं भगवान्धनेश्वरः।
तत्रागतश्चारणयक्षकित्नरेःसंस्तूयमानो न््यवद॒त्कृताझ्ललिम् ॥
१॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; ध्रुवम्-- ध्रुव महाराज को; निवृत्तम्--विमुख; प्रतिबुद्धय--जानकर; बैशसात्--वध से;अपेत--शान्त; मन्युम्ू-- क्रोध; भगवान्--कुबेर; धन-ई श्वरः -- धन के स्वामी; तत्र--वहाँ; आगत:--प्रकट हुए; चारण--चारण; यक्ष--यक्षों; किन्नरैः--तथा किक्नरों द्वारा; संस्तूयमान:--पूजित होकर; न्यवदत्--बोला; कृत-अज्जञलिम्ू--हाथ जोड़ेहुए ध्रुव से |
महर्षि मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, ध्रुव महाराज का क्रोध शान्त हो गया और उन्होंने यक्षों कावध करना पूरी तरह बन्द कर दिया।
जब सर्वाधिक समृद्ध धनपति कुबेर को यह समाचार मिलातो बे श्रुव के समक्ष प्रकट हुए।
वे यक्षों, किन्नरों तथा चारणों द्वारा पूजित होकर अपने सामनेहाथ जोड़कर खड़े हुए ध्रुव महाराज से बोले।
"
धनद उबाचभो भो: क्षत्रियदायाद परितुष्टोस्मि तेडनघ ।
यत्त्वं पितामहादेशादवैरं दुस्त्यजमत्यज: ॥
२॥
धन-दः उबाच--धनपति ( कुबेर ) ने कहा; भो: भो:--ेरे; क्षत्रिय-दायाद-हे क्षत्रिय पुत्र; परितुष्ट: --अत्यन्त प्रसन्न; अस्मि--हूँ; ते--तुमसे; अनध--हे पापहीन; यत्--क्योंकि; त्वम्--तुम; पितामह--अपने पितामह के; आदेशात्-- आदेश से; बैरम्--शत्रुता, वैर; दुस्त्यजम्ू--न छोड़ी जा सकने योग्य; अत्यज:--त्याग किया है|
धनपति कुबेर ने कहा : हे निष्पाप क्षत्रियपुत्र, मुझ यह जानकर अत्यधिक प्रसन्नता हुई किअपने पितामह के आदेश से तुमने वैरभाव को त्याग दिया यद्यपि इसे तज पाना बहुत कठिनहोता है।
मैं तुमसे अत्यधिक प्रसन्न हूँ।
"
न भवानवधीद्यक्षान्न यक्षा भ्रातरं तव ।
काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयो: ॥
३॥
न--नहीं; भवान्--तुमने; अवधीत्--मारा है; यक्षान्--यक्षों को; न--नहीं; यक्षा: --यक्षों ने; भ्रातरमू-- भाई को; तव--तुम्हारे; काल:--समय, काल; एव--निश्चय ही; हि--क्योंकि; भूतानाम्ू--जीवात्माओं के; प्रभु:ः--परमे श्वर; अप्यय-भावयो:--प्रलय तथा सृजन के |
वास्तव में न तो तुमने यक्षों को मारा है न उन्होंने तुम्हारे भाई को मारा है, क्योंकि सृजन तथाविनाश का अनन्तिम कारण परमेश्वर का नित्य स्वरूप काल ही है।
"
अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात्पुरुषस्य हि ।
स्वाणीवाभात्यतद्धयानाद्यया बन्धविपर्ययौं ॥
४॥
अहम्-ैं; त्वम्--तुम; इति--इस प्रकार; अपार्था--मिथ्या; धी: --बुद्द्धि; अज्ञानातू--अज्ञान से; पुरुषस्थ--पुरुष के; हि--निश्चय ही; स्वाप्नि--स्वज; इब--सहृश; आभाति--प्रकट होती है; अ-ततू-ध्यानात्--देहात्मबुद्धि से; यया--जिससे; बन्ध--बन्धन; विपर्ययौ--तथा दुख ।
देहात्मबुद्धि के आधार पर स्व तथा अन्यों का 'मैं' तथा 'तुम' के रूप में मिथ्याबोध अविद्याकी उपज है।
यही देहात्मबुद्धि जन्म-मृत्यु के चक्र का कारण है और इसीसे इस जगत में हमेंनिरन्तर बने रहना पड़ता है।
"
तद्गच्छ श्रुव भद्गं ते भगवन्तमधोक्षजम् ।
सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥
५॥
तत्--अतः; गच्छ--आओ; ध्रुव-- ध्रुव; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; भगवन्तम्-- भगवान् को; अधोक्षजम्-- भौतिकइन्द्रियों की विचार शक्ति के परे; सर्व-भूत--समस्त जीवात्माएँ; आत्म-भावेन--उन्हें एक सोच करके; सर्व-भूत--समस्तजीवात्माओं में; आत्म--परमात्मा; विग्रहम्--मूर्ति, विग्रह रूप |
हे शरुव, आगे आओ।
ईश्वर तुम्हारा कल्याण करें।
भगवान् ही जो हमारी इन्द्रियों की विचार-शक्ति से परे हैं, समस्त जीवात्माओं के परमात्मा हैं।
इसलिए सभी जीवात्माएँ बिना किसी अन्तरके एक हैं।
अतः तुम भगवान् के दिव्य रूप की सेवा प्रारम्भ करो, क्योंकि वे ही समस्त जीवोंके अनन्तिम आश्रय हैं।
"
भजस्व भजनीयाड्ूप्रिमभवाय भवच्छिदम् ।
युक्त विरहितं शक्त्या गुणमय्यात्ममायया ॥
६॥
भजस्व--सेवा में लगो; भजनीय--पूजा के योग्य; अड्रघ्रिमू--उनको जिनके चरण कमल; अभवाय--संसार से उद्धार के लिए;भव-छिदम्--जो भौतिक बन्धन की ग्रंथि को काटता है; युक्तम्--संलग्न; विरहितम्--पृथक्, विलग; शक्त्या--उसकी शक्तिको; गुण-मय्या--त्रिगुणों से युक्त; आत्म-मायया--अपनी अकल्पनीय शक्ति से |
अतः तुम अपने आपको भगवान् की भक्ति में पूर्णरूपेण प्रवृत्त करो क्योंकि वे हीसांसारिक बन्धन से हमें छुटकारा दिला सकते हैं।
अपनी भौतिक शक्ति में आसक्त रहकर भी वेउसके क्रियाकलापों से विलग रहते हैं।
भगवान् की अकल्पनीय शक्ति से ही इस भौतिक जगतमें प्रत्येक घटना घटती है।
"
वृणीहि काम॑ नृप यन्मनोगतंमत्तस्त्वमौत्तानपदेविशद्धितः ।
वरं वराहों म्बुजना भपादयो -रनन्तरं त्वां वयमड़ शुश्रुम ॥
७॥
वृणीहि--माँगो; कामम्--इच्छा; नृप--हे राजा; यत्--जो कुछ; मनः-गतम्--तुम्हारे मन के भीतर है; मत्त: --मुझसे; त्वम्ू--तुम; औत्तानपदे--हे महाराज उत्तानपाद के पुत्र; अविशद्धित:ः--बिना हिचक के; वरम्--वरदान; वर-अर्हई:--वर प्राप्त करने केयोग्य; अम्बुज--कमल; नाभ--जिसकी नाभि; पादयो: --उनके चरमकमलों पर; अनन्तरम्--निरन्तर; त्वामू--तुमको;वयम्--हमने; अड्भ--हे श्रुव; शुश्रुम--सुना है
हे महाराज उत्तानपाद के पुत्र, ध्रुव महाराज, हमने सुना है कि तुम कमलनाभ भगवान् कीदिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर लगे रहते हो।
अतः तुम हमसे समस्त आशीर्वाद लेने के पात्र हो।
अतःबिना हिचक के जो तुम वर माँगना चाहो माँग सकते हो।
"
मैत्रेय उवाचस राजराजेन वराय चोदितोभ्रुवोी महाभागवतो महामतिः ।
हरौ स वद्रेड्चलितां स्मृतिं ययातरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः ॥
८॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; सः--वह; राज-राजेन--राजाओं के राजा ( कुबेर ) द्वारा; वराय-- आशीर्वाद के लिए;चोदितः--माँगने पर; ध्रुवः--श्रुव महाराज; महा-भागवतः--प्रथम कोटि के भक्त; महा-मति:--सर्वाधिक बुद्द्धिमान याविचारवान; हरौ-- भगवान् के प्रति; सः--उसने; वब्रे--माँगा; अचलिताम्--स्थिर, अखण्ड; स्मृतिम्ू--स्मृति; यया--जिससे;तरति--पार करता है; अयलेन--बिना कठिनाई के; दुरत्ययम्--अलंघ्य, दुस्तर; तमः--अंधकार, अज्ञान।
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, जब यक्षराज कुबेर ने ध्रुव महाराज से वर माँगने केलिए कहा तो उस परम दिद्वान् शुद्ध भक्त, बुद्धिमान तथा विचारवान् राजा श्रुव ने यही याचनाकी कि भगवान् में उनकी अखंड श्रद्धा और स्मृति बनी रहे, क्योंकि इस प्रकार से मनुष्य अज्ञानके सागर को सरलता से पार कर सकता है, यद्यपि उसे पार करना अन्यों के लिए अत्यन्त दुस्तरहै।
"
तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः ।
पश्यतोःन्तर्दधे सोपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥
९॥
तस्य--श्रुव से; प्रीतेन--परम प्रसन्न होकर; मनसा--मन से; तामू--उस स्मृति को; दत्त्वा--देकर; ऐडविड:--इडविडा का पुत्र,कुबेर; ततः--तत्पश्चात्; पश्यत: --जब श्रुव देख रहे थे; अन्तर्दधे-- अन्तर्धान हो गया; सः--वह ( ध्रुव ); अपि-- भी; स्व-पुरम्ू--अपनी पुरी को; प्रत्यपद्यत--वापस चला गया।
इडविडा के पुत्र कुबेर अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रुव महाराज कोमनचाहा वरदान दिया।
तत्पश्चात् वे श्रुव को देखते-देखते से अन्तर्धान हो गये और ध्रुव महाराजअपनी राजधानी वापस चले गये।
"
अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: ।
द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम् ॥
१०॥
अथ--तत्पश्चात्; अयजत--पूजा की; यज्ञ-ईशम्--यज्ञों के स्वामी की; क्रतुभि:--यज्ञोत्सवों द्वारा; भूरि--बड़ी; दक्षिणै:--दक्षिणा द्वारा; द्रव्य-क्रिया-देवतानाम्--यज्ञों का ( जिसमें सामग्री, कार्य तथा देवता सम्मिलित हैं ); कर्म--कर्म; कर्म-फल--कर्मों का परिणाम; प्रदमू--देनेवाला |
जब तक श्रुव महाराज घर में रहे उन्होंने समस्त यज्ञों के भोक्ता भगवान् को प्रसन्न करने केलिए यज्ञोत्सव सम्पन्न किये।
जितने भी संस्कार सम्बन्धी निर्दिष्ट यज्ञ हैं, वे भगवान् विष्णु कोप्रसन्न करने के निमित्त हैं, क्योंकि वे ही ऐसे समस्त यज्ञों के लक्ष्य हैं और यज्ञ-जन्य आशीर्वादोंके प्रदाता हैं।
"
सर्वात्मन्यच्युतेसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्रहन् ।
दर्दर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥
११॥
सर्व-आत्मनि--परमात्मा में; अच्युते--अच्युत में; असर्वे--किसी सीमा के बिना, असीम; तीब्र-ओघाम्--प्रबल वेग युक्त;भक्तिम्ू--भक्ति; उद्धहनू-- करते हुए; ददर्श--देखा; आत्मनि--परम आत्मा में; भूतेषु--समस्त जीवात्माओं में; तम्--उसको;एव--केवल; अवस्थितम्--स्थित, विराजमान; विभुम्--सर्वशक्तिमान |
ध्रुव महाराज निर्बाध-बल के साथ हर वस्तु के आगार परमेश्वर की भक्ति करने लगे।
भक्तिकरते हुए उन्हें ऐसा दिखता मानो प्रत्येक वस्तु उन्हीं ( भगवान् ) में स्थित है और वे समस्तजीवात्माओं में स्थित हैं।
भगवान् अच्युत कहलाते हैं, क्योंकि वे कभी भी अपने भक्तों कोसुरक्षा प्रदान करने के मूल कर्तव्य से चूकते नहीं।
"
तमेवं शीलसम्पन्नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम् ।
गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजा: ॥
१२॥
तम्--उसको; एवम्--इस प्रकार; शील--दैवी गुण से; सम्पन्नम्ू--युक्त; ब्रह्मण्यम्--ब्राह्मणों के प्रति श्रद्धालु; दीन--निर्धनोंके प्रति; वत्सलम्--दयालु; गोप्तारम्--रक्षक; धर्म-सेतूनाम्-- धार्मिक नियमों का; मेनिरे--सोचा; पितरम्--पिता; प्रजा: --जनता।
ध्रुव महाराज सभी दैवी गुणों से सम्पन्न थे; वे भगवान् के भक्तों के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु,दीनों तथा निर्दोषों के प्रति दयालु एवं धर्म की रक्षा करनेवाले थे।
इन गुणों के कारण वे समस्तनागरिकों के पिता तुल्य समझे जाते थे।
"
घदिंत्रशद्वर्षसाहस्त्रं शशास क्षितिमण्डलम् ।
भोगै: पुण्यक्षयं कुर्वन्नभोगैरशुभक्षयम् ॥
१३॥
घट्-त्रिंशत्--छत्तीस; वर्ष--वर्ष; साहस्रमू--हजार; शशास--राज्य किया; क्षिति-मण्डलम्--पृथ्वी लोक में; भोगैः-- भोगद्वारा; पुण्य--पवित्र कार्यों के फल का; क्षयम्ू--हानि, हास; कुर्वन्ू--करते हुए; अभोगै:--तपस्या से; अशुभ--अशुभ फलोंका; क्षयमू--हास
ध्रुव महाराज ने इस लोक पर छत्तीस हजार वर्षो तक राज्य किया; उन्होंने पुण्यों को भोगद्वारा और अशुभ फलों को तपस्या द्वारा क्षीण बनाया।
"
एवं बहुसवं काल॑ महात्माविचलेन्द्रियः ।
त्रिवर्गोपयिकं नीत्वा पुत्रायादाब्रूपासनम् ॥
१४॥
एवम्--इस प्रकार; बहु--अनेक; सवम्--वर्ष; कालम्ू--समय; महा-आत्मा--महान् पुरुष; अविचल-इन्द्रियः--इन्द्रियों केचलायमान हुए बिना; त्रि-वर्ग--तीन प्रकार के सांसारिक कार्य; औपयिकम्--करने के अनुकूल; नीत्वा--बिता करके;पुत्राय--अपने पुत्र को; अदातू-- प्रदान कर दिया; नृप-आसनम्--राज-सिंहासन ।
इस प्रकार आत्मसंयमी महापुरुष श्रुव महाराज ने तीन प्रकार के सांसारिक कार्यो--धर्म,अर्थ, तथा काम--को ठीक तरह से अनेकानेक वर्षों तक सम्पन्न किया।
तत्पश्चात् उन्होंने अपनेपुत्र को राजसिंहासन सौंप दिया।
"
मन्यमान डदं विश्व मायारचितमात्मनि ।
अविद्यारचितस्वणगन्धर्वनगरोपमम् ॥
१५॥
मन्यमान:--मानते हुए; इृदम्-यह; विश्वम्-ब्रह्माण्ड; माया--बहिरंगा शक्ति द्वारा; रचितम्-निर्मित; आत्मनि--जीवात्माको; अविद्या--मोह से; रचित--निर्मित; स्वण--स्वण; गन्धर्व-नगर--मायाजाल; उपमम्--सहश |
.श्रील ध्रुव महाराज को अनुभव हो गया कि यह दृश्य-जगत जीवात्माओं को स्वप्न अथवामायाजाल के समान मोहग्रस्त करता रहता है, क्योंकि यह परमेश्वर की बहिरंगा शक्ति माया कीसृष्टि है।
"
आत्मस्त्रयपत्यसुहददो बलमृद्धकोश-मन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्या: ।
भूमण्डलं 'जलधिमेखलमाकलय्यकालोपसृष्टमिति स प्रययौं विशालाम् ॥
१६॥
आत्म--शरीर; स्त्री--पत्नियाँ; अपत्य--सन्तानें; सुहृदः--मित्र; बलम्--प्रभाव, सेना; ऋद्ध-कोशम्--समृद्ध खजाना; अन्तः-पुरम्ू--रनिवास; परिविहार-भुव:ः--क्री ड़ा-स्थल; च--तथा; रम्या:--सुन्दर; भू-मण्डलम्--पूरी पृथ्वी; जल-धि--समुद्रोंद्वारा; मेखलम्ू--घिरा; आकलख्य--मान कर; काल--समय द्वारा; उपसृष्टम्--उत्पन्न; इति--इस प्रकार; सः--वह; प्रययौ--चला गया; विशालामू--बदरिकाश्रम को |
अन्त में ध्रुव महाराज ने सारी पृथ्वी पर फैले और महासागरों से घिरे अपने राज्य को त्यागदिया।
उन्होंने अपने शरीर, पत्नियों, सन्तानों, मित्रों, सेना, समृद्ध कोश, सुखकर महलों तथाविनोद-स्थलों को माया की सृष्टियाँ मान लिया।
इस तरह वे कालक्रम में हिमालय पर्वत परस्थित बदरिकाश्रम के वन में चले गये।
"
तस्यां विशुद्धकरण: शिववार्विगाह्मबद्ध्वासनं जितमरुन्मनसाहताक्षः ।
स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ ॥
१७॥
तस्यामू-बदरिका श्रम में; विशुद्ध--शुद्ध करके; करण: -- अपनी इन्द्रियाँ; शिव--शुद्ध; वाः--जल में; विगाह्म--स्नानकरके; बद्ध्वा--स्थिर करके; आसनम्--आसन; जित--जीतकर; मरुतू-- श्रासक्रिया; मससा--मन से; आहत--हट गई;अक्ष:--इन्द्रियाँ; स्थूले-- भौतिक; दधार--केन्द्रित किया; भगवत्-प्रतिरूपे-- भगवान् के स्थूल रूप में; एतत्--मन;ध्यायन्ू-- ध्यान करते हुए; तत्--उस; अव्यवहित:--बिना रुके; व्यसृजत्-- प्रवेश किया; समाधौ--समाधि में |
बदरिकाश्रम में ध्रुव महाराज की इन्द्रियाँ पूर्णतः शुद्ध हो गईं क्योंकि वे स्वच्छ शुद्ध जल मेंनियमित रूप से स्नान करते थे।
वे आसन पर स्थित हो गये और फिर उन्होंने योगक्रिया से श्वासतथा प्राणवायु को वश में किया।
इस प्रकार उन्होंने अपनी इन्द्रियों को पूर्ण रूप से समेट लिया।
तब उन्होंने अपने मन को भगवान् के अर्चाविग्रह रूप में केन्द्रित किया जो भगवान् का पूर्णप्रतिरूप है और इस प्रकार से उनका ध्यान करते हुए वे पूर्ण समाधि में प्रविष्ट हो गये।
"
भक्ति हरौ भगवति प्रवहन्नजस्त्र-मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्धमान: ॥
विक्लिद्यमानहृदय: पुलकाचिताड़ेनात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिड्रः ॥
१८॥
भक्तिम्ू-- भक्ति; हरौ--हरि में; भगवति-- भगवान्; प्रवहन्--निरन्तर लगे रह कर; अजस्त्रमू--सदैव; आनन्द--आनन्दमय;बाष्प-कलया--आँसुओं की धारा से; मुहुः--बारम्बार; अर्द्मान:--अभिभूत होकर; विक्लिद्यमान-- द्रवित; हृदयः--उसकाहृदय; पुलक--रोमांच; आचित--ढका; अड्भ:--उसका शरीर; न--नहीं; आत्मानम्--शरीर; अस्मरत्--स्मरण किया; असौ--बह; इति--इस प्रकार; मुक्त-लिड्र:--सूक्ष्म शरीर से मुक्त |
दिव्य आनन्द के कारण उनके नेत्रों से सतत अश्रु बहने लगे, उनका हृदय द्रवित हो उठा औरपूरे शरीर में कम्पन तथा रोमांच हो आया।
भक्ति की समाधि में पहुँचने से ध्रुव महाराज अपनेशारीरिक अस्तित्व को पूर्णतः भूल गये और तुरन्त ही भौतिक बन्धन से मुक्त हो गये।
स्वतंत्र होना पड़ता है।
यह स्वतंत्रता मुक्त-लिड्ज कहलाती है।
"
स ददर्श विमानाछयं नभसोवतरद्ध्रूव: ।
विभ्राजयद्श दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥
१९॥
सः--उसने; दरदर्श--देखा; विमान--विमान; अछयम्-- अत्यन्त सुन्दर; नभसः--आकाश से; अवतरत्--उतरते हुए; ध्रुव:--ध्रुव महाराज; विभ्राजयत्--आलोकित करते हुए; दश--दस; दिश:ः --दिशाएँ; राका-पतिम्--पूर्णचन्द्र; इब--सहश;डदितम्ू--उदित।
ज्योंही उनकी मुक्ति के लक्षण प्रकट हुए, उन्होंने एक अत्यन्त सुन्दर विमान को आकाश सेनीचे उतरते हुए देखा, मानो तेजस्वी पूर्ण चन्द्रमा दशों दिशाओं को आलोकित करते हुए नीचेआ रहा हो।
"
तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजाएयामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ ।
स्थिताववष्ट भ्य गदां सुवाससौकिरीटहाराड्रदचारुकुण्डलौ ॥
२०॥
तत्र--वहाँ; अनु--तब; देव-प्रवरौ--दो अत्यन्त सुन्दर देवता; चतु:-भुजौ--चार भुजाओं वाले; श्यामौ--श्याम वर्ण के;किशोरौ--अत्यन्त तरुण; अरुण--लाल; अम्बुज--कमल; ईक्षणौ--आँखों वाले; स्थितौ--स्थित; अवष्टभ्य--लिये;गदाम्--गदा; सुवाससौ--सुन्दर वस्त्रों से युक्त; किरीट--मुकुट; हार--माला; अड्रद--बिजावट; चारु--सुन्दर; कुण्डलौ --कान के कुण्डल सहित
ध्रुव महाराज ने विमान में भगवान् विष्णु के दो अत्यन्त सुन्दर पार्षदों को देखा।
उनके चारभुजाएँ थीं और श्याम वर्ण की शारीरिक कान्ति थी, वे अत्यन्त तरुण थे और उनके नेत्र लाल कमल-पुष्पों के समान थे।
वे हाथों में गदा धारण किये थे और उनकी वेशभूषा अत्यन्तआकर्षक थी।
वे मुकुट धारण किये थे और हारों, बाजूबन्दों तथा कुण्डलों से सुशोभित थे।
"
विज्ञाय तावुत्तमगायकिड्जूरा-वशभ्युत्थित: साध्वसविस्मृतक्रम: ।
ननाम नामानि गृणन्मधुद्विष:पार्षत्प्रधानाविति संहताझ्ञलि: ॥
२१॥
विज्ञाय--जानकर; तौ--उन दोनों को; उत्तम-गाय--( उत्तम यशवाले ) विष्णु के; किड्डूरौ--दो दास; अभ्युत्थित:--खड़ा होगया; साध्वस--हड़बड़ा कर; विस्मृत-- भूल गया; क्रम: --उचित व्यवहार; ननाम--नमस्कार किया; नामानि--नामों को;गृणन्--उच्चारण करते, जपते; मधु-द्विष:--मधु के शत्रु, भगवान् के; पार्षत्-पार्षद; प्रधानौ-- प्रमुख; इति--इस प्रकार;संहत--बद्ध; अज्जञलिः--हाथ जोड़े |
यह देखकर कि ये असाधारण पुरुष भगवान् के प्रत्यक्ष दास हैं, ध्रुव महाराज तुरन्त उठ खड़ेहुए।
किन्तु हड़बड़ाहट में जल्दी के कारण वे उचित रीति से उनका स्वागत करना भूल गये।
अतः उन्होंने हाथ जोड़ कर केवल नमस्कार किया और वे भगवान् के पवित्र नामों की महिमाका जप करने लगे।
"
त॑ कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसंबद्धाञलि प्रश्रयनप्रकन्धरम् ।
सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितंप्रत्यूचतु: पुष्करनाभसम्मतौ ॥
२२॥
तम्--उसको; कृष्ण -- भगवान् कृष्ण के; पाद--चरण कमलों का; अभिनिविष्ट--विचार में लीन; चेतसम्--जिसका हृदय;बद्ध-अद्जलिम्--हाथ जोड़े; प्रश्रय--विनीत भाव से; नम्न--झुका हुआ; कन्धरम्--जिसकी गर्दन; सुनन्द--सुनन्द; नन्दौ --तथा नन्द; उपसृत्य--पास आकर; स-स्मितम्--हँसते हुए; प्रत्यूचतु: --सम्बोधित किया; पुष्कर-नाभ--विष्णु का, जिनकेकमलनाभि है; सम्मतौ--निजी दास
भ्रुव महाराज भगवान् श्रीकृष्ण के चरण-कमलों के चिन्तन में सदैव लीन रहते थे।
उनकाहृदय कृष्ण से पूरित था।
जब परमेश्वर के दो निजी दास, जिनके नाम सुनन्द तथा नन्द थे,प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए उनके पास पहुँचे तो ध्रुव महाराज हाथ जोड़कर नग्नतापूर्वक सिर नीचाकिये खड़े हो गये।
तब उन्होंने धुत्र महाराज को इस प्रकार से सम्बोधित किया।
"
सुनन्दनन्दावूचतु:भो भो राजन्सुभद्वं ते वा नोउवहितः श्रृणु ।
यः पशञ्ञवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत् ॥
२३॥
सुनन्द-नन्दौ ऊचतु:--सुनन्द तथा नन्द ने कहा; भो: भो: राजन्--हे राजा; सु-भद्रम्ू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; वाचम्--शब्द; न:ः--हमारे; अवहितः-ध्यानपूर्वक; श्रुणु--सुनो; यः--जो; पश्च-वर्ष:--पाँच वर्ष के; तपसा--तपस्या द्वारा; भवान्--आप; देवम्-- भगवान्; अतीतृपत्-- अत्यधिक प्रसन्न |
विष्णु के दोनों विश्वस्त पार्षद सुनन्द तथा नन्द ने कहा : हे राजनू, आपका कल्याण हो।
हमजो कहें, कृपया उसे ध्यानपूर्वक सुनें।
जब आप पाँच वर्ष के थे तो आपने कठिन तपस्या की थीऔर उससे आपने पुरुषोत्तम भगवान् को अत्यधिक प्रसन्न कर लिया था।
"
तस्याखिलजगद्धातुरावां देवस्य शार्डलिण: ।
पार्षदाविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥
२४॥
तस्य--उसके; अखिल--सम्पूर्ण; जगत्ू--ब्रह्माण्ड; धातु: --स्त्रष्टा; आवाम्--हम दोनों; देवस्थ-- भगवान् के; शार्किण: --शार्ड्र धनुष को धारण करने वाले; पार्षदौ--पार्षद; इह--अब; सम्प्राप्ती--पास आये हैं; नेतुम्--ले जाने के लिए; त्वामू--तुमको; भगवत्ू-पदम्-- भगवान् के स्थान तक |
हम उन भगवान् के प्रतिनिधि हैं, जो समग्र ब्रह्माण्ड का स्त्रष्टा हैं और हाथ में शार्ड़् नामकधनुष को धारण किये रहते हैं।
आपको वैकुण्ठलोक ले जाने के लिए हमें विशेष रूप से नियुक्तकिया गया है।
"
सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वयायत्सूरयोप्राप्य विचक्षते परम् ।
आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयोग्रहर्क्षतारा: परियन्ति दक्षिणम् ॥
२५॥
सुदुर्जयम्-प्राप्त करना कठिन; विष्णु-पदम्--विष्णुलोक ; जितम्--जीता गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; यत्--जो; सूरय:--बड़े-बड़े देवता; अप्राप्प--बिना प्राप्त किये; विचक्षते--केवल देखते हैं; परमू--परम; आतिष्ठ-- आइये; तत्--उस; चन्द्र--चन्द्रमा; दिव-आकर--सूर्य; आदय:--इत्यादि; ग्रह--नौ ग्रह ( बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल बृहस्पति, शनि, युरेनस, नेष्चून तथाप्लुटो ); ऋक्ष-तारा:--नक्षत्र; परियन्ति--परिक्रमा करते हैं; दक्षिणम्--दाईं ओर।
विष्णुलोक को प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु आपने अपनी तपस्या से उसे जीतलिया है।
बड़े-बड़े ऋषि तथा देवता भी इस पद को प्राप्त नहीं कर पाते।
परमधाम( विष्णुलोक ) के दर्शन करने के लिए ही सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य ग्रह, तारे, चन्द्र-भुवन( नक्षत्र ) तथा सौर-मण्डल उसकी परिक्रमा करते हैं।
कृपया आइये, वहाँ जाने के लिए आपकास्वागत है।
"
अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यड़ कर्हिचित् ।
आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णो: परमं पदम् ॥
२६॥
अनास्थितमू--कभी भी प्राप्त नहीं हुआ; ते--तुम्हारे; पितृभि:--पूर्वजों द्वारा; अन्यै:--अन्यों के द्वारा; अपि-- भी; अड्भ--हेध्रुव; कर्हिचित्ू--कभी भी; आतिष्ठ--आकर रहिये; जगताम्--ब्रह्माण्ड के वासियों द्वारा; वन्द्यम्ू--पूज्य; तत्ू--वह;विष्णो: --विष्णु का; परमम्-परम; पदम्--पद, स्थान।
हे राजा श्रुव, आज तक न तो आपके पूर्वजों ने, न अन्य किसी ने ऐसा दिव्य लोक प्राप्तकिया है।
यह विष्णुलोक, जहाँ विष्णु निवास करते हैं, सबों से ऊपर है।
यह अन्य सभी इसब्रह्माण्डों के निवासियों द्वारा पूजित है।
आप हमारे साथ आयें और वहाँ शाश्वत वास करें।
"
एतद्ठिमानप्रवरमुत्तमशलोकमौलिना ।
उपस्थापितमायुष्मन्नधिरोढुं त्वमहसि ॥
२७॥
एतत्--वह; विमान--विमान; प्रवरम्--अद्वितीय; उत्तमशलोक-- भगवान्; मौलिना--समस्त जीवात्माओं में शिरोमणि;उपस्थापितम्-- भेजा है; आयुष्मन्--हे दीर्घजीवी; अधिरोढुम्--चढ़ने के लिए; त्वमू--तुम; अहसि--योग्य हो |
हे दीर्घजीवी, इस अद्वितीय विमान को उन भगवान् ने भेजा है, जिनकी स्तुति उत्तम एलोकोंद्वारा की जाती है और जो समस्त जीवात्माओं के प्रमुख हैं।
आप इस विमान में चढ़ने के सर्वथायोग्य हैं।
"
मैत्रेय उवाचनिशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो-मैधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रिय: ।
कृताभिषेकः कृतनित्यमड्रलोमुनीन्प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥
२८ ॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; निशम्य--सुनकर; वैकुण्ठ-- भगवान् के; नियोज्य--पार्षद; मुख्ययो:--प्रधान के; मधु-च्युतम्ू--मधु ढालनेवाले, अमृतमय; वाचम्--वचन; उरुक्रम-प्रियः--भगवान् के प्रिय, ध्रुव महाराज; कृत-अभिषेक:--स्नानकरके; कृत--निवृत्त; नित्य-मड्गडलः --अपने नैत्यिक कर्म; मुनीन्--मुनियों को; प्रणम्य--नमस्कार करके; आशिषम्--आशीर्वाद; अभ्यवादयत्--स्वीकार किया।
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: श्रुव महाराज भगवान् के अत्यन्त प्रिय थे।
जब उन्होंनेश़वैकुण्ठलोक वासी भगवान् के मुख्य पार्षदों की मधुरवाणी सुनी तो उन्होंने तुरन्त स्नान किया,अपने को उपयुक्त आभूषणों से अलंकृत किया और अपने नित्य आध्यात्मिक कर्म सम्पन्न किए।
तत्पश्चात् उन्होंने वहाँ पर उपस्थित ऋषियों को प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद ग्रहण किया।
"
परीत्याभ्यर्च्य धिष्णयाछयं पार्षदावभिवन्द्य च ।
इयेष तदधिष्टातुं बिश्रद्रूपं हिरण्मयम् ॥
२९॥
परीत्य--प्रदक्षिणा करके; अभ्यर्च्य--पूजा करके; धिष्णय-अछयम्--दिव्य विमान; पार्षदौ--दोनों पार्षदों को; अभिवन्द्य--नमस्कार करके; च--भी; इयेष--प्रयत्त करने लगे; तत्--उस यान; अधिष्ठातुम--चढ़ने के लिए; बिभ्रतू--देदीप्यमान;रूपम्ू--अपना स्वरूप; हिरण्मयम्--सुनहलाचढ़ने के पूर्व
ध्रुव महाराज ने विमान की पूजा की, उसकी प्रदक्षिणा की और विष्णु केपार्षदों को भी नमस्कार किया।
इसी दौरान वे पिघले सोने के समान तेजमय तथा देदीप्यमान होउठे।
इस प्रकार से वे उस दिव्ययान में चढ़ने के लिए पूर्णतः सन्नद्ध थे।
"
तदोत्तानपद: पुत्रो ददर्शान्तकमागतम् ।
मृत्योमूर्थिन पदं दत्त्ता आरुरोहाद्भुतं गृहम् ॥
३०॥
तदा--तब; उत्तानपदः--राजा उत्तानपाद के; पुत्र:--पुत्र ने; ददर्श--देखा; अन्तकम्--साक्षात् मृत्यु को; आगतम्ू--आयाहुआ; मृत्योः मूर्थ्नि-- मृत्यु के सिर पर; पदम्--पाँव; दत्त्ता--रखकर; आरुरोह--चढ़ गये; अद्भुतम्--आश्चर्यमय; गृहम्--विमान में जो भवन के तुल्य था।
जब श्लरुव महाराज उस दिव्य विमान में चढ़ने जा रहे थे तो उन्होंने साक्षात् काल ( मृत्यु ) कोअपने निकट आते देखा।
किन्तु उन्होंने मृत्यु की परवाह नहीं की; उन्होंने इस अवसर का लाभउठाकर काल के सिर पर अपने पाँव रख दिये और वे विमान में चढ़ गये जो इतना विशाल थाकि जैसे एक भवन हो।
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तदा दुन्दुभयो नेदुर्मृदड्णणवादय: ।
गन्धर्वमुख्या: प्रजगुः पेतु: कुसुमवृष्टयः ॥
३१॥
तदा--उस समय; दुन्दुभय:--दुन्दु भी; नेदुः--बजने लगे; मृदड़--मृदंग; पणव--ढोल; आदय:--इत्यादि; गन्धर्व-मुख्या:--गन्धर्वलोक के मुख्य निवासी; प्रजगु:--गाने लगे; पेतु:--वर्षा की; कुसुम--फूल; वृष्टय:--वर्षा की तरह।
उस समय ढोल, मृदंग तथा दुन्दुभी के शब्द आकाश से गूँजने लगे, प्रमुख-प्रमुख गंधर्व जनगाने लगे और अन्य देवताओं ने ध्रुव महाराज पर फूलों की मूसलाधार वर्षा की।
"
सच स्वरलोकमारोक्ष्यन्सुनीतिं जननीं ध्रुव: ।
अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥
३२॥
सः--वह; च-- भी; स्वः-लोकम्--दैव लोक को; आरोक्ष्यनू--चढ़ते समय; सुनीतिम्--सुनीति को; जननीम्ू--माता; श्रुवः--ध्रुव महाराज ने; अन्वस्मरत्--स्मरण किया; अगम्--प्राप्त करना कठिन; हित्वा--पीछे छोड़ कर; दीनाम्--बेचारी; यास्ये--मैंजाऊँगा; त्रि-विष्टपम्--वैकुण्ठलोक को |
ध्रुव महाराज जब उस दिव्य विमान पर बैठे थे, जो चलनेवाला था, तो उन्हें अपनी बेचारीमाता सुनीति का स्मरण हो आया।
वे सोचने लगे, 'मैं अपनी बेचारी माता को छोड़ करवैकुण्ठलोक अकेले कैसे जा सकूँगा ?'" इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ ।
दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम् ॥
३३॥
इति--इस प्रकार; व्यवसितम्--चिन्तन; तस्य-- ध्रुव का; व्यवसाय--ज्ञान; सुर-उत्तमौ--दो प्रमुख पार्षद; दर्शयाम् आसतु:--( उसको ) दिखाया; देवीम्--पूज्या सुनीति; पुर: --समक्ष; यानेन--विमान से; गच्छतीम्--आगे जाती हुईं।
वैकुण्ठलोक के महान् पार्षद नन््द तथा सुनन्द ध्रुव महाराज के मन की बात जान गये, अतःउन्होंने उन्हें दिखाया कि उनकी माता सुनीति दूसरे यान में आगे-आगे जा रही हैं।
"
तत्र तत्र प्रशंसद्द्धिः पथि वैमानिकै: सुरैः ।
अवकीर्यमाणो दहशे कुसुमै: क्रमशो ग्रहान् ॥
३४॥
तत्र तत्र--जहाँ-तहाँ; प्रशंसद््धिः-- ध्रुव महाराज के प्रशंसकों द्वारा; पथि--रास्ते में; वैमानिकै :--विभिन्न प्रकार के यानों द्वारा लेजाये जानेवाले; सुरैः--देवताओं द्वारा; अवकीर्यमाण:--बिखेरा जाकर; ददृशे--देख सके; कुसुमैः-- फूलों से; क्रमशः--एकके पश्चात् एक; ग्रहान्ू--सौर मण्डल के समस्त ग्रह ।
आकाश-मार्ग से जाते हुए श्रुव महाराज ने क्रमश: सौर मण्डल के सभी ग्रहों को देखा औररास्ते में समस्त देवताओं को उनके विमानों में से अपने ऊपर फूलों की वर्षा करते देखा।
"
त्रिलोकीं देवयानेन सोतिब्रज्य मुनीनपि ।
परस्ताद्यद्ध्रुवगतिर्विष्णो: पदमथाभ्यगात् ॥
३५॥
त्रि-लोकीम्--तीनों लोक; देव-यानेन--दिव्य विमान से; सः--ध्रुव; अतितब्रज्य--पार करके; मुनीन्ू--मुनिगण; अपि-- भी;परस्तात्--परे; यत्ू--जो; ध्रुव-गति:ः--श्लुव जिन्होंने अविचल जीवन प्राप्त किया; विष्णो: -- भगवान् विष्णु का; पदम्--धाम;अथ--तब; अभ्यगात्--प्राप्त किया।
इस प्रकार श्रुव महाराज ने सप्तर्षि कहलानेवाले ऋषियों के सात लोकों को पार किया।
इसके परे उन्होंने उस लोक में अविचल दिव्य पद प्राप्त किया जहाँ भगवान् विष्णु वास करते हैं।
"
यदभ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतोलोकामस्त्रयो ह्ानु विश्राजन्त एते ।
यन्नाव्रजञझ्ञन्तुषु येननुग्रहाब्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येडनिशम् ॥
३६॥
यत्--जो लोक; भ्राजमानम्--आलोकित; स्व-रुचा--अपने तेज से; एब--केवल; सर्वतः--सब जगह; लोका:--लोक;त्रयः--तीन; हि--निश्चय ही; अनु--तत्पश्चात्; विश्राजन्ते-- प्रकाश करते हैं; एते--ये; यत्ू--जो लोक; न--नहीं; अब्रजनू--पहुँच गये हैं; जन्तुषु--जीवात्माओं को; ये--जो; अननुग्रहा: --रुष्ट; ब्रजन्ति--पहुँचते हैं; भद्राणि--शुभ कार्य; चरन्ति--प्रवृत्तहोते हैं; ये--जो; अनिशम्--निरन्तर।
जो लोग दूसरे जीवों पर दयालु नहीं होते, वे स्वतेजोमय इन बैकुण्ठलोकों में नहीं पहुँच पाते, जिनके प्रकाश से इस भौतिक ब्रह्माण्ड के सभी लोक प्रकाशित हैं।
जो व्यक्ति निरन्तरअन्य प्राणियों के कल्याणकारी कार्यों में लगे रहते हैं, केवल वे ही वैकुण्ठलोक पहुँच पाते हैं।
"
शान्ता: समहशः शुद्धा: सर्वभूतानुरझना: ।
यान्त्यञ्ञसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवा: ॥
३७॥
शान्ताः--शान्त; सम-हृशः --समदर्शी ; शुद्धा:--पवित्र; सर्व--समस्त; भूत--जीवात्माएँ; अनुरज्जना: -- प्रसन्न करनेवाले;यान्ति--जाते हैं; अज्लसा--सरलतापूर्वक; अच्युत-- भगवान् के; पदम्--धाम को; अच्युत-प्रिय-- भगवान् के भक्त;बान्धवा:--मित्र |
जो शानन््त, समदर्शी तथा पवित्र हैं तथा जो अन्य सभी जीवात्माओं को प्रसन्न करने की कलाजानते हैं, वे भगवान् के भक्तों से ही मित्रता रखते हैं।
केवल वे ही वापस घर को अर्थात्भगवान् के धाम को सरलता से जाने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
"
इत्युत्तानपदः पुत्रो श्रुवः कृष्णपरायण: ।
अभूत्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः ॥
३८॥
इति--इस प्रकार; उत्तानपद:ः--महाराज उत्तानपाद का; पुत्र: --पुत्र; ध्रुवः-- ध्रुव महाराज; कृष्ण-परायण: --पूर्णतयाकृष्णभावनाभावित; अभूत्--हुआ; त्रयाणाम्--तीनों; लोकानाम्-- लोकों का; चूडा-मणि:--शीशफूल, श्रेष्ठ; इब--समान;अमलः- शुद्ध, पवित्र |
इस प्रकार महाराज उत्तानपाद के अति सम्माननीय पुत्र, पूरी तरह से कृष्णभावनाभावितध्रुव महाराज ने तीनों लोकों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया।
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गम्भीरवेगोनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम् ।
यस्मिन्श्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गण: ॥
३९॥
गम्भीर-वेग: -- अत्यधिक वेग से; अनिमिषम्--निरन्तर; ज्योतिषाम्--नक्षत्रों का; चक्रमू--गोलक; आहितम्--जड़ा हुआ;यस्मिनू--जिसके चारों ओर; भ्रमति--घूमता है, चक्कर लगाता है; कौरव्य--हे विदुर; मेढ्याम्--मध्यवर्ती स्तम्भ; इब--सहश;गवाम्--बैलों का; गण:--समूह |
सन्त मैत्रेय ने आगे कहा : हे कौरव वंशी विदुर, जिस प्रकार बैल अपनी दाईं ओर बाँधेमध्यवर्ती लट्ठे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसी प्रकार आकाश के सभी नक्षत्र अत्यन्त वेग सेश्रुव महाराज के धाम का निरन्तर चक्कर लगाते रहते हैं।
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महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवानृषि: ।
आतोद्य॑ं वितुदज्श्लोकान्सत्रेडगायत्प्रचेतसाम् ॥
४० ॥
महिमानम्--यश; विलोक्य--देखकर; अस्य-- ध्रुव महाराज का; नारद:--नारद मुनि; भगवान्-- भगवान् के ही समान पूज्य;ऋषि:--सनन््त; आतोद्यम्--वीणा; वितुदन्--बजाते हुए; श्लोकानू--श्लोक; सत्रे--यज्ञस्थल में; अगायत्--उच्चारण किया;प्रचेतसाम्--प्रचेताओं के |
ध्रुव महाराज की महिमा को देख कर, नारद मुनि अपनी वीणा बजाते प्रचेताओं केयज्ञस्थल पर गये और प्रसन्नतापूर्वक निम्नलिखित तीन इलोकों का उच्चार किया।
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नारद उवाचनूनं सुनीते: पतिदेवताया-स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् ।
इृष्ठाभ्युपायानपि वेदवादिनोनैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति कि नूपा: ॥
४१॥
नारदः उवाच--नारद ने कहा; नूनम्--निश्चय ही; सुनीते: --सुनीति का; पति-देवताया:--पति-परायणा, अत्यन्त पतिक्रता;तपः-प्रभावस्य--तप के प्रभाव से; सुतस्य--पुत्र का; तामू--उस; गतिम्--स्थिति को; इृष्ला--देखकर; अभ्युपायान्--साधन;अपि--यद्यपि; वेद-वादिनः--वैदिक नियमों के पालक या तथाकथित वेदान्ती; न--कभी नहीं; एव--निश्चय ही;अधिगन्तुम्ू--प्राप्त करने के लिए; प्रभवन्ति--पात्र हैं; किमू-- क्या कहा जाये; नृपा:--सामान्य राजाओं की।
महर्षि नारद ने आगे कहा : अपनी आत्मिक उन्नति तथा सशक्त तपस्या के प्रभाव से हीपतिपरायणा सुनीति के पुत्र श्रुव महाराज ने ऐसा उच्च पद प्राप्त किया है, जो तथाकथितवेदान्तियों के लिए भी प्राप्त करना सम्भव नहीं, सामान्य मनुष्यों की तो बात ही क्या कही जाये।
"
यः पञ्ञवर्षो गुरुदारवाक्शरै-भिन्नेन यातो हृदयेन दूयता ।
वन॑ मदादेशकरोऊजितं प्रभुंजिगाय तद्धक्तगुणै: पराजितम् ॥
४२॥
यः--जो; पश्ञ-वर्ष:--पाँच वर्ष की अवस्था में; गुरु-दार--अपने पिता की पत्नी के; वाक्ू-शरैः--कटु बचनों से; भिन्नेन--मर्माहत, अत्यधिक दुखित होकर; यात:-- चला गया; हृदयेन--क्योंकि उसका हृदय; दूयता--अत्यधिक पीड़ित; वनम्--जंगल; मत्-आदेश--मेरे आदेश के अनुसार; करः--कार्य करते हुए; अजितम्--न जीता जा सकने योग्य; प्रभुम्-- भगवान्को; जिगाय--परास्त कर दिया; तत्ू--उसके; भक्त--भक्तों के; गुणैः--गुणों से; पराजितम्--जीता हुआ
महर्षि नारद ने आगे कहा : देखो न, किस प्रकार श्रुव महाराज अपनी विमाता के कटुबचनों से मर्माहत होकर केवल पाँच वर्ष की अवस्था में जंगल चले गये और उन्होंने मेरे निर्देशनमें तपस्या की।
यद्यपि भगवान् अजेय हैं, किन्तु श्रुव महाराज ने भगवद्भक्तों के विशिष्ट गुणों सेसमन्वित होकर उन्हें परास्त कर दिया।
"
यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ-मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः ।
घट्पञ्जवर्षो यदहोभिरल्पै:प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम् ॥
४३॥
यः--जो; क्षत्र-बन्धु:--क्षत्रिय का पुत्र; भुवि--पृथ्वी पर; तस्य-- ध्रुव का; अधिरूढम्--उच्च पद; अनु--पीछे; आरुरुक्षेत् --प्राप्त करने की इच्छा कर सकता है; अपि-- भी; वर्ष-पूगैः--अनेक वर्षों के पश्चात्; षट्-पञ्ञ-वर्ष:--पाँच या छः वर्ष का;यत्--जो; अहोभि: अल्पै:--कुछ दिनों बाद; प्रसाद्य--प्रसन्न करके; वैकुण्ठम्-- भगवान्; अवाप--प्राप्त किया; तत्-पदम्--उस ( भगवान् ) का धाम।
श्रुव महाराज ने पाँच-छह वर्ष की अवस्था में ही छह मास तक तपस्या करके उच्च पद प्राप्तकर लिया।
ओह! कोई बड़े से बड़ा क्षत्रिय अनेक वर्षों की तपस्या के बाद भी ऐसा पद प्राप्तनहीं कर सकता।
"
मैत्रेय उवाचएतत्तेडभिहितं सर्व यत्पृष्टोडहमिह त्वया ।
ध्रुवस्योद्यामयशसश्चरितं सम्मतं सताम् ॥
४४॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; एतत्--यह; ते--तुमसे; अभिहितम्--वर्णित; सर्वम्--सब कुछ; यत्-- जो; पृष्ठ: अहम्--मुझसेपूछा गया; इह--यहाँ; त्वया--तुम्हारे द्वारा; श्रुवस्थ-- ध्रुव महाराज का; उद्दाम--उत्कर्षकारी; यशसः --जिसकी ख्याति;चरितम्--चरित्र; सम्मतम्-स्वीकृत; सताम्-भक्तों द्वारा
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, तुमने मुझसे श्रुव महाराज की परम ख्याति तथा चरित्रके विषय में जो कुछ पूछा था वह सब मैंने विस्तार से बता दिया है।
बड़े-बड़े साधु पुरुष तथाभक्त ध्रुव महाराज के विषय में सुनने की इच्छा रखते हैं।
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धन्यं यशस्यमायुष्य॑ पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
स्वर्ग्य क्षौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम् ॥
४५॥
धन्यम्ू--धन देनेवाला; यशस्यम्-- ख्याति देनेवाला; आयुष्यम्-- आयु बढ़ानेवाला; पुण्यम्--पवित्र; स्वस्ति-अयनम्--कल्याण उत्पन्न करने वाला; महत्--महान; स्वर्ग्यम्--स्वर्ग प्राप्त करानेवाला; श्रौव्यमू--या शुवलोक; सौमनस्यम्--मन कोभानेवाला; प्रशस्यम्--यशस्वी; अघ-मर्षणम्--समस्त पापों का नाश करनेवाला |
ध्रुव के आख्यान को सुनकर मनुष्य अपनी सम्पत्ति, यश तथा दीर्घायु की इच्छा को पूरा करसकता है।
यह इतना कल्याणकर है कि इसके श्रवणमात्र से मनुष्य स्वर्गलोक को जा सकता है,अथवा श्रुवलोक को प्राप्त कर सकता है।
देवता भी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि यह आख्यान इतनायशस्वी है, इतना सशक्त है कि यह सारे पापकर्मों के फल का नाश करनेवाला है।
"
श्रुत्वैतच्छुद्धयाभी क्षणमच्युतप्रियचेष्टितम् ।
भवेद्धक्तिर्भगवति यया स्यात्कलेशसड्क्षय: ॥
४६॥
श्रुत्वा--सुन कर; एतत्--यह; श्रद्धया-- श्रद्धा से; अभीक्षणम्--बारम्बार; अच्युत-- भगवान् को; प्रिय-- प्रिय; चेष्टितम्--कार्यकलाप; भवेत्--उत्पन्न करता है; भक्ति:-- भक्ति; भगवति-- भगवान् में ; यया--जिससे; स्यात्--हो सके; क्लेश--कष्टोंका; सड्क्षय:--पूर्ण विनाश जो भी
श्रुव महाराज के आख्यान को सुनता है और श्रद्धा तथा भक्ति के साथ उनके शुद्धचरित्र को समझने का बारम्बार प्रयास करता है, वह शुद्ध भक्तिमय धरातल प्राप्त करता है औरेशुद्ध भक्ति करता है।
ऐसे कार्यों से मनुष्य भौतिक जीवन के तीनों तापों को नष्ट कर सकता हैं।
"
महत्त्वमिच्छतां तीर्थ श्रोतु: शीलादयो गुणा: ।
यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम् ॥
४७॥
महत्त्वम्--बड़प्पन; इच्छताम्--इच्छा करनेवालों को; तीर्थम्--विधि; श्रोतु:--सुननेवाले का; शील-आदय: --सच्चरित्रइत्यादि; गुणा: --गुण; यत्र--जिसमें; तेज:-- तेज; तत्--वह; इच्छूनामू--कामना करनेवालों को; मान: --सम्मान; यत्र--जिसमें; मनस्विनाम्--विचारवान पुरुषों कोजो कोई भी श्रुव महाराज के इस आख्यान को सुनता है, वह उन्हीं के समान उत्तम गुणों को प्राप्त करता है।
जो कोई महानता, तेज या बड़प्पन चाहता है उन्हें प्राप्त करने की विधि यही है।
जो विचारवान पुरुष सम्मान चाहते हैं, उनके लिए उचित साधन यही है।
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प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः: समवाये द्विजन्मनाम् ।
सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत् ॥
४८॥
प्रयतः--सावधानी से; कीर्तयेत्ू-- कीर्तन करे; प्रातः--प्रातःकाल; समवाये--संगति में; द्वि-जन्मनामू--ट्विजों की; सायमू--संध्या समय; च-- भी; पुण्य-शलोकस्य--पवित्र ख्याति के; ध्रुवस्थ-- ध्रुव का; चरितम्--चरित्र; महत्--महान।
मैत्रेय मुनि ने संस्तुति की : मनुष्य को चाहिए कि प्रातः तथा सायंकाल अत्यन्त ध्यानपूर्वकब्राह्मणों अथवा अन्य की संगति में ध्रुव महाराज के चरित्र तथा कार्य-कलापों का संकीर्तन करे।
"
पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेथवा ।
दिनक्षये व्यतीपाते सड्क्रमेउर्कदिनेडपि वा ॥
४९॥
श्रावयेच्छुद्दधानानां तीर्थपादपदा श्रय: ।
नेच्छस्तत्रात्मनात्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति ॥
५०॥
पौर्णमास्याम्--पूर्णमासी के दिन; सिनीवाल्यामू--अमावस्या के दिन; द्वादश्यामू--एकादशी के एक दिन बाद, द्वादशी को;श्रवणे-- श्रवण नक्षत्र के उदयकाल में; अथवा--या; दिन-क्षये--तिथि क्षय; व्यतीपाते--नाम का विशेष दिन; सड्क्रमे--मासके अन्त में; अर्कदिने--रविवार को; अपि-- भी; वा--अथवा; श्रावयेत्--सुनाना चाहिए; श्रद्धधानानाम्-- श्रद्धालु श्रोताओंको; तीर्थ-पाद-- भगवान् का; पद-आश्रय: --चरणकमल की शरण में आये; न इच्छन्--न चाहते हुए; तत्र--वहाँ;आत्मना--स्व के द्वारा; आत्मानम्ू--मन; सन्तुष्ट:--सन्तुष्ट; इति--इस प्रकार; सिध्यति--सिद्ध हो जाता है |
जिन व्यक्तियों ने भगवान् के चरण-कमलों की शरण ले रखी है उन्हें किसी प्रकार कापारिश्रमिक लिये बिना ही श्ुव महाराज के इस आख्यान को सुनाना चाहिए।
विशेष रूप सेपूर्णमासी, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र के प्रकट होने पर, तिथिक्षय पर या व्यतीपात केअवसर पर, मास के अन्त में या रविवार को यह आख्यान सुनाया जाए निस्सन्देह, इसे अनुकूलश्रोताओं के समक्ष सुनाएँ।
इस प्रकार बिना किसी व्यावसायिक उद्देश्य के सुनाने पर वाचक तथाश्रोता दोनों सिद्ध हो जाते हैं।
"
ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेडमृतम् ।
कृपालोदीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्वते ॥
५१॥
ज्ञानमू--ज्ञान; अज्ञात-तत्त्वाय--सत्य से अपरिचितों को; यः--जो; दद्यातू-देता है; सत्ू-पथे--सत्य के मार्ग पर; अमृतम्ू--अमरत्व; कृपालो:--कृपालु; दीन-नाथस्य--दीनों के रक्षक; देवा:--देवतागण; तस्य--उसको; अनुगृह्वते--आशीर्वाद देते हैं।
भ्रुव महाराज का आख्यान अमरता प्राप्त करने के लिए परम ज्ञान है।
जो लोग परम सत्य सेअवगत नहीं हैं, उन्हें सत्य के मार्ग पर ले जाया जा सकता है।
जो लोग दिव्य कृपा के कारणदीन जीवात्माओं के रक्षक बनने का उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं, उन्हें स्वतः ही देवताओं कीकृपा तथा आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।
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इदं मया तेभिहितं कुरूद्रहध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मण: ।
हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातु-गृह च विष्णुं शरणं यो जगाम ॥
५२॥
इदम्--यह; मया--मेरे द्वारा; ते--तुमको; अभिहितम्--वर्णित; कुरु-उद्ठद--हे कुरुओं सर्वश्रेष्ठ; ध्रुवस्थ-- ध्रुव का;विख्यात--अत्यन्त प्रसिद्ध; विशुद्ध--अत्यन्त शुद्ध; कर्मण: --जिसके कर्म; हित्वा--त्यागकर; अर्भक:--बालक;क्रीडनकानि--खिलौने तथा खेलने की अन्य वस्तुएँ; मातु:--अपनी माता का; गृहम्--घर; च-- भी ; विष्णुम्--विष्णु की;शरणम्--शरण; य:--जो; जगाम--चला गया।
ध्रुव महाराज के दिव्य कार्य सारे संसार में विख्यात हैं और वे अत्यन्त शुद्ध हैं।
बचपन मेंध्रुव महाराज ने सभी खिलौने तथा खेल की वस्तुओं का तिरस्कार किया, अपनी माता कासंरक्षण त्यागा और भगवान् विष्णु की शरण ग्रहण की।
अत: हे विदुर, मैं इस आख्यान कोसमाप्त करता हूँ, क्योंकि तुमसे इसके बारे में विस्तार से कह चुका हूँ।
"
