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अध्याय दस: ध्रुव महाराज की यक्षों के साथ लड़ाई

4.10मैत्रेय उवाचप्रजापतेर्दुहितरं शिशुमारस्य वै ध्रुव: ।

उपयेमे भ्रमिं नामतत्सुतौ कल्पवत्सरी ॥

१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; प्रजापतेः -- प्रजापति की; दुहितरम्‌--पुत्री; शिशुमारस्थ--शिशुमार की; बै--निश्चय ही;श्रुव:-- ध्रुव महाराज; उपयेमे--ब्याह किया; भ्रमिम्‌ू-- भ्रमि; नाम--नामक; ततू-सुतौ--उसके दो पुत्र; कल्प--कल्प;वत्सरौ--तथा वत्सर |

मैत्रेय ऋषि ने कहा : हे विदुर, तत्पश्चात्‌ ध्रुव महाराज ने प्रजापति शिशुमार की पुत्री के साथविवाह कर लिया जिसका नाम भ्रमि था।

उसके कल्प तथा वत्सर नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।

"

इलायामपि भार्यायां वायो: पुत्रयां महाबलः ।

पुत्रमुत्कलनामानं योषिद्रत्ममजीजनत्‌ ॥

२॥

इलायाम्‌--अपनी पली इला को; अपि--भी; भार्यायाम्‌--अपनी पत्नी को; वायो:--वायुदेव की; पुत्रयाम्‌--पुत्री को; महा-बलः:--शक्तिशाली श्लुव महाराज; पुत्रम्‌-पुत्र; उत्तल--उत्कल; नामानम्‌--नाम के; योषित्‌--स्त्री; रलम्‌--रल ( श्रेष्ठ );अजीजनतू--त्पन्न किया।

अत्यन्त शक्तिशाली श्रुव महाराज की एक दूसरी पत्नी थी, जिसका नाम इला था और वहवायुदेव की पुत्री थी।

उससे उन्हें एक अत्यन्त सुन्दर कन्या तथा उत्कल नाम का एक पुत्र उत्पन्नहुआ।

"

उत्तमस्त्वकृतोद्दाहो मृगयायां बलीयसा ।

हतः पुण्यजनेनाद्रौ तन्मातास्य गतिं गता ॥

३॥

उत्तम: --उत्तम; तु--लेकिन; अकृत--बिना; उद्बाह:--ब्याह; मृगयायाम्‌ू--आखेट करने में; बलीयसा--अत्यन्त बलशाली;हतः--मारा गया; पुण्य-जनेन--एक यक्ष द्वारा; अद्रौ--हिमालय पर्वत पर; तत्‌ू--उसकी; माता--माता ( सुरुचि ); अस्य--अपने पुत्र को; गतिमू--पथ; गता--अनुसरण किया।

श्रुव महाराज का छोटा भाई उत्तम, जो अभी तक अनब्याहा था, एक बार आखेट करनेगया और हिमालय पर्वत में एक शक्तिशाली यक्ष द्वारा मार डाला गया।

उसकी माता सुरुचि नेभी अपने पुत्र के पथ का अनुसरण किया ( अर्थात्‌ मर गई )।

"

श्रुवो भ्रातृवर्ध॑ श्रुत्वा कोपामर्षशुचार्पित: ।

जैत्र स्वन्दनमास्थाय गत: पुण्यजनालयम्‌ ॥

४॥

ध्रुव:--श्रुव महाराज; भ्रातृ-वधम्‌--अपने भाई की मृत्यु का; श्रुत्वा--समाचार सुनकर; कोप--क्रोध; अमर्ष--प्रतिशोध;शुचा--विलाप से; अर्पित:--पूरित होकर; जैत्रमू--विजयी; स्यन्दमम्‌--रथ पर; आस्थाय--चढ़ कर; गतः--गया; पुण्य-जन-आलयमू--यक्षों की पुरी में |

जब श्लुव महाराज ने यक्षों द्वारा हिमालय पर्वत में अपने भाई उत्तम के वध का समाचार सुनातो वे शोक तथा क्रोध से अभिभूत हो गये।

वे रथ पर सवार हुए और यक्षों की पुरी अलकापुरीपर विजय करने के लिए निकल पड़े।

"

गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम्‌ ।

ददर्श हिमवददरोण्यां पुरीं गुह्ाकसड्डू लाम्‌ ॥

५॥

गत्वा--जाकर; उदीचीम्‌--उत्तरी; दिशम्‌--दिशा; राजा--राजा श्लुव ने; रुद्र-अनुचर--रुद्र अर्थात्‌ शिव के अनुयायियों द्वारा;सेविताम्‌--बसी हुई; ददर्श--देखा; हिमवत्‌--हिमालय की; द्रोण्यामू--घाटी में; पुरीम्‌--नगरी; गुह्मक--प्रेत लोगों से;सद्जु लामू-पूर्श्रुव महाराज हिमालय प्रखण्ड की उत्तरी दिशा की ओर गये।

उन्होंने एक घाटी में एक नगरीदेखी जो शिव के अनुचर भूत-प्रेतों से भरी पड़ी थी।

"

दध्मौ शट्डुं बृहद्वाहु: खं दिशश्चानुनादयन्‌ ।

येनोद्विग्नहश: क्षत्तरुपदेव्योउत्रसन्भूशम्‌ ॥

६॥

दध ्मौ--बजाया; शद्बुम्‌--शंख; बृहत्‌-बाहु:--शक्तिशाली भुजाओं वाला; खम्‌-- आकाश; दिश: च--तथा सभी दिशाएँ;अनुनादयन्‌--गूँजते हुए; येन--जिससे; उद्विग्ग-दहश:ः--अत्यन्त चिन्तित दिखों; क्षत्त:--हे विदुर; उपदेव्य:--यक्षों की पत्नियाँ;अत्रसन्‌-- भयभीत हो गईं; भूशम्‌--अत्यधिक |

मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, जैसे ही ध्रुव महाराज अलकापुरी पहुँचे, उन्होंने तुरन्त अपनाशंख बजाया जिसकी ध्वनि सम्पूर्ण आकाश तथा प्रत्येक दिशा में गूँजने लगी।

यक्षों की पत्नियाँअत्यन्त भयभीत हो उठीं।

उनके नेत्रों से प्रकट हो रहा था कि वे चिन्ता से परिपूर्ण थीं।

"

ततो निष्क्रम्य बलिन उपदेवमहाभटा: ।

असहन्तस्तन्निनादमभिपेतुरूदायुधा: ॥

७॥

ततः--तत्पश्चात्‌; निष्क्रम्य--बाहर आकर; बलिन:--अत्यन्त बलशाली; उपदेव--कुवेर के; महा-भटा:--बड़े बड़े सैनिक;असहन्तः--असहनीय; तत्‌--शंख की; निनादम्‌ू--ध्वनि; अभिपेतु: --आक्रमण किया; उदायुधा:--विभिन्न आयुधों सेसज्जित।

हे वीर विदुर, ध्रुव महाराज के शंख की गूँजती ध्वनि को सहन न कर सकने के कारण यक्षोंके महा-शक्तिशाली सैनिक अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर अपनी नगरी से बाहर निकल आये और उन्होंने ध्रुव पर धावा बोल दिया।

"

स तानापततो वीर उग्रधन्वा महारथः ।

एकैकं युगपत्सर्वानहन्बाणैस्त्रिभिस्त्रिभि: ॥

८॥

सः--वह ( श्रुव महाराज ); तानू--उन सबों को; आपततः--अपने ऊपर टूटते हुए; वीर: --वीर; उग्र-धन्वा--शक्तिशालीधनुर्धर; महा-रथ:--जो अनेक रथों से लड़ सके; एक-एकम्‌--एक-एक करके; युगपत्‌--एकसाथ, एक समय; सर्वानू--उनसबों को; अहनू--मार डाला; बाणैः--बाणों से; त्रिभि: त्रिभिः--तीन तीन करके ।

ध्रुव महाराज, जो महारथी तथा निश्चय ही महान्‌ धनुर्धर भी थे, तुरन्त ही एकसाथ तीन-तीनबाण छोड़ करके उन्हें मारने लगे।

"

ते वै ललाटलग्नैस्तैरिषुभि: सर्व एव हि ।

मत्वा निरस्तमात्मानमाशंसन्कर्म तस्य तत्‌ ॥

९॥

ते--वे; वै--निश्चय ही; ललाट-लग्नै:--उनके सिरों से सट कर; तैः--उनके द्वारा; इषुभि:ः--बाण; सर्वे--सभी; एव--निश्चयही; हि--निस्सन्देह; मत्वा--सोचकर; निरस्तमू--पराजित; आत्मानमू--अपने आप; आशंसन्‌--प्रशंसित; कर्म--कर्म; तस्य--उसका; तत्‌--वह |

जब यक्ष वीरों ने देखा कि उनके शिरों पर श्रुव महाराज द्वारा बाण-वर्षा की जा रही है, तोउन्हें अपनी विषम स्थिति का पता चला और उन्होंने यह समझ लिया कि उनकी हार निश्चित है।

किन्तु वीर होने के नाते उन्होंने ध्रुव के कार्य की सराहना की।

"

तेडपि चामुममृष्यन्त: पादस्पर्शमिवोरगा: ।

शरैरविध्यन्युगपद्द्‌वगुणं प्रचिकीर्षव: ॥

१०॥

ते--यक्षगण; अपि-- भी; च--तथा; अमुमू-- ध्रुव पर; अमृष्यन्त:--असह्य होने पर; पाद-स्पर्शम्‌--पाँव से छुये जाकर; इब--सहश; उरगा:--सर्प; शरैः--बाणों से; अविध्यन्‌-- प्रहार किया जाकर; युगपत्‌--उसी समय; द्वि-गुणम्‌--दो गुना;प्रचिकीर्षव:--प्रतिशोध की भावना से

जिस प्रकार सर्प किसी के पाँव द्वारा कुचले जाने को सहन नहीं कर पाते, उसी प्रकार यक्षभी श्रुव महाराज के आश्चर्यजनक पराक्रम को न सह सकने के कारण, उन पर एक साथ उनसेदुगुने बाण--अर्थात्‌ प्रत्येक सैनिक छह-छह बाण--छोड़ने लगे और इस प्रकार उन्होंने अपनीशूरवीरता का बड़ी बहादुरी से प्रदर्शन किया।

"

ततः परिघनिस्त्रिशैः प्रासशूलपरश्चथै: ।

शत्त्यूष्टिभिर्भुशुण्डीभिश्चित्रवाजैः शरैरपि ॥

११॥

अभ्यवर्षन्प्रकुपिता: सरथं सहसारथिम्‌ ।

इच्छन्तस्तत्प्रतीकर्तुमयुतानां त्रयोदश ॥

१२॥

ततः--तपश्चात्‌; परिघ--लोहे के गदे; निरित्रिशै:ः--तथा तलवारों से; प्रास-शूल--त्रिशूल से; परश्चधैः --तथा बरछों से;शक्ति--तथा शक्ति से; ऋष्टिभि:--तथा भालों से; भुशुण्डीभि:--भुशुण्डी आयुध से; चित्र-वाजै:--विविध प्रकार के पंखोंवाले; शरैः--वाणों से; अपि-- भी; अभ्यवर्षन्‌-- श्रुव पर वर्षा की; प्रकुपिता:--अत्यन्त क्रुद्ध; स-रथम्‌--उनके रथ समेत;सह-सारथिम्‌--उनके रथवान सहित; इच्छन्त:--चाहते हुए; ततू--श्लुव के कार्य; प्रतीकर्तुमु--बदला लेने के लिए;अयुतानाम्‌--दस हजारों का; त्रयोदश--तेरह

यक्ष सैनिकों की संख्या एक लाख तीस हजार थी वे सभी अत्यन्त क्रुद्ध थे और श्रुवमहाराज के आश्चर्यजनक कार्यो को विफल करने की इच्छा लिए थे।

उन्होंने पूरी शक्ति सेमहाराज श्रुव तथा उनके रथ तथा सारथी पर विभिन्न प्रकार के पंखदार बाणों, परिघों, निम्त्रिशों( तलवारों ), प्रासशूलों ( त्रिशूलों ), परश्चधों (बरछों ), शक्तियों, ऋष्टियों ( भालों ) तथाभूशुण्डियों से वर्षा की।

"

औत्तानपादि: स तदा शस्त्रवर्षण भूरिणा ।

न एवाहश्यताच्छन्न आसारेण यथा गिरिः ॥

१३॥

औत्तानपादि: -- ध्रुव महाराज; सः--वह; तदा--उस समय; शस्त्र-वर्षण --शस्त्रों की वर्षा से; भूरिणा--निरन्तर; न--नहीं;एव--निश्चय ही; अहृश्यत--दिखाई पड़ता था; आच्छन्न:--ढका हुआ; आसारेण--निरन्तर वर्षा से; यथा--जिस प्रकार;गिरिः--पर्वत

ध्रुव महाराज आयुधों की निरन्तर वर्षा से पूरी तरह ढक गये मानो निरन्तर जल-दवृष्टि से कोईपर्वत ढक गया हो।

"

हाहाकारस्तदैवासीत्सिद्धानां दिवि पश्यताम्‌ ।

हतोयं मानवः सूर्यो मग्नः पुण्यजनार्णवे ॥

१४॥

हाहा-कार:--हाहाकार शब्द, निराशा की ध्वनि; तदा--उस समय; एव--निश्चय ही; आसीत्‌--प्रकट था; सिद्धानाम्‌ू--सिद्धलोक के समस्त वासियों का; दिवि--आकाश में; पश्यताम्‌--युद्ध को देखते हुए; हतः--मारा गया; अयम्‌--यह;मानव:--मनु के पौत्र का; सूर्य:--सूर्य; मग्न:--डूबा हुआ; पुण्य-जन--यक्षों के; अर्णवे --समुद्र में |

स्वर्गलोकवासी सभी सिद्धजन आकाश से युद्ध देख रहे थे और जब उन्होंने देखा कि श्लुवमहाराज शत्रु की निरन्तर बाण-वर्षा से ढक गये हैं, तो वे हाहाकार करने लगे, 'मनु के पौत्रध्रुव हार गये, हार गये।

वे चिल्ला रहे थे कि ध्रुव महाराज तो सूर्य के समान हैं और इस समयवे यक्षों के समुद्र में डूब गए हैं।

"

नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे ।

उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्कर: ॥

१५॥

नदत्सु--निनाद करते अथवा गरजते हुए; यातुधानेषु--प्रेत रूप यक्ष; जय-काशिषु--विजय घोष करते हुए; अथो--तब;मृधे--युद्ध में; उदतिष्ठत्‌--प्रकट हुआ; रथ:--रथ; तस्य-- ध्रुव महाराज का; नीहारात्‌ू--कुहरे; इब--सहश; भास्कर: --सूर्य |

क्षणिक विजय जैसी स्थिति देखकर यक्षों ने घोषित कर दिया कि उन्होंने ध्रुव महाराज परविजय प्राप्त कर ली है।

किन्तु तभी श्रुव का रथ एकाएक प्रकट हुआ, जैसे कुहरे को भेदकरसूर्य सहसा प्रकट हो जाता है।

"

धनुर्विस्फूर्जयन्दिव्यं द्विषतां खेदमुद्दहन्‌ ।

अस्त्रौघं व्यधमद्दाणैर्घधनानीकमिवानिल: ॥

१६॥

धनु:--उसका धनुष; विस्फूर्जयन्‌--टंकार, फूत्कार; दिव्यमू--आश्चर्यमय; द्विषताम्‌--शत्रुओं का; खेदम्‌--विषाद; उद्दहन्‌ --उत्पन्न करते हुए; अस्त्र-ओघम्‌--विभिन्न प्रकार के हथियार; व्यधमत्‌--तितर-बितर कर दिया; बाणैः--बाणों से; घन--बादलों का; अनीकम्‌--दल; इब--सहृश; अनिल: --वायु

श्रुव महाराज के धनुष-बाण टंकार तथा फूत्कार करने लगे जिससे उनके शत्रुओं के हृदय मेंआ्रास उत्पन्न होने लगा।

वे निरन्तर बाण बरसाने लगे, जिससे सभी के विभिन्न हथियार वैसे हीतितर-बितर हो गये, जिस प्रकार प्रबल वायु से आकाश में एकत्र बादल बिखर जाते हैं।

"

तस्य ते चापनिर्मुक्ता भित्त्वा वर्माणि रक्षसाम्‌ ।

कायानाविविशुस्तिग्मा गिरीनशनयो यथा ॥

१७॥

तस्य--श्रुव के; ते--वे बाण; चाप-- धनुष से; निर्मुक्ता:--छूटे हुए; भित्त्वा-- भेदकर; वर्माणि--कवचों को; रक्षसाम्‌--असुरों के; कायान्‌ू--शरीर में; आविविशु:--घुस गये; तिग्मा:-- प्रखर; गिरीन्‌-- पर्वत; अशनय:--वज्; यथा--जिस प्रकार |

श्रुव महाराज के धनुष से छूटे हुए प्रखर बाण शत्रुओं के कवचों तथा शरीरों में घुसने लगे,मानो स्वर्ग के राजा द्वारा छोड़ा गया वज्र हो, जो पर्वतों के शरीरों को छिन्न-भिन्न कर देता है।

"

भल्लै: सज्छिद्यमानानां शिरोभिश्चवारुकुण्डलै: ।

ऊरुभि्वेमतालाभेदोर्भिवलयवल्गुभि: ॥

१८॥

हारकेयूरमुकुटैरुष्णीषैश्व महाधनैः ।

आस्तृतास्ता रणभुवो रेजुर्वीरमनोहरा: ॥

१९॥

भल्‍्लै:--बाणों से; सज्छिद्यमानानामू--खण्ड-खण्ड हुए यक्षों के; शिरोभि:--सिरों से; चारु--सुन्दर; कुण्डलैः--कान केकुण्डलों से; ऊरुभि:--जाँघों से; हेम-तालाभे:--सुनहले ताड़ वृक्षों के समान; दोर्भि:-- भुजाओं से; वलय-वल्गुभि:--सुन्दरकंकणों से; हार--हारों से; केयूर--बाजूबन्द; मुकुटैः--तथा मुकुटों; उष्णीषै:--पगड़ियों से; च-- भी; महा-धनैः--बहुमूल्य;आस्तृता:--आच्छादित; ता:--वे; रण-भुव:--रणभूमि; रेजु:--चमकने लगे; वीर--वीरों के; मनः-हरा:--मनों कोहरनेवाले।

महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, शुव महाराज के बाणों से जो सिर छिन्न-भिन्न हुए थे वेसुन्दर कुण्डलों तथा पागों से अच्छी तरह से अलंकृत थे।

उन शरीरों के पाँव सुनहरे ताड़ के वृक्षोंके समान सुन्दर थे; उनकी भुजाएं सुनहरे कंकणों तथा बाजूबन्दों से सुसज्जित थीं और उनकेसिरों पर बहुमूल्य सुनहरे मुकुट थे।

युद्ध भूमि में बिखरे हुए ये आभूषण अत्यन्त आकर्षक लगरहे थे और किसी भी वीर के मन को मोह सकते थे।

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हतावशिष्टा इतरे रणाजिराद्‌रक्षोगणा: क्षत्रियवर्यसायकै: ।

प्रायो विवृक्णावयवा विदुद्गुव॒ु-मुंगेन्द्रविक्रोडितयूथपा इव ॥

२०॥

हत-अवशिष्टा:--मरने से बचे हुए; इतरे-- अन्य; रण-अजिरात्‌--युद्धभूमि से; रक्ष:-गणा:--यक्ष गण; क्षत्रिय-वर्य--द्षत्रियोंअथवा सैनिकों में श्रेष्ठ; सायकैः--बाणों से; प्रायः--प्राय:; विवृकण--खण्ड-खण्ड हुए; अवयवा:--शरीर के अंग;विदुद्गुवु:-- भग गये; मृगेन्द्र--सिंह द्वारा; विक्रीडित--हार कर; यूथपा: --हाथी; इब--सहृश |

जो यक्ष किसी प्रकार जीवित बच गए, उनके अंग-प्रत्यंग परम वीर श्रुव महाराज के बाणोंसे कट कर खण्ड-खण्ड हो गये।

वे युद्ध-भूमि छोड़ कर उसी तरह भागने लगे जैसे कि सिंहद्वारा पराजित होने पर हाथी भागते हैं।

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अपश्यमान: स तदाततायिनंमहामृथे कञ्जन मानवोत्तम: ।

पुरी दिदृक्षत्रपि नाविशद्द्वषांन मायिनां वेद चिकीर्षितं जन: ॥

२१॥

अपश्यमान:--न देखते हुए; सः-- ध्रुव; तदा--उस समय; आततायिनम्‌--सशस्त्र शत्रु सैनिक को; महा-मृथे--उस महायुद्ध में;कशञ्लनन--कोई; मानव-उत्तम:--नर- श्रेष्ठ; पुरीमू--पुरी, नगरी; दिहक्षन्‌ू--देखने की इच्छा से; अपि--यद्यपि; न आविशतू--प्रवेश नहीं किया; द्विषामू--शत्रुओं का; न--नहीं; मायिनाम्‌--मायावी का; वेद--जानता है; चिकीर्षितम्‌--योजनाएँ; जन:--कोई भी ।

मानवों में श्रेष्ठ श्रुव महाराज ने देखा कि उस विशाल युद्धभूमि में एक भी सशस्त्र शत्रुसैनिक शेष नहीं रहा।

तब उनकी इच्छा अलकापुरी देखने को हुई।

किन्तु उन्होंने मन में सोचा,'यक्षों की मायावी योजनाओं को कोई नहीं जानता।

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'इति ब्रुवंश्चित्ररथ: स्वसारथियत्तः परेषां प्रतियोगशद्धितः ।

शुश्राव शब्दं जलधेरिवेरितंनभस्वतो दिक्षु रजोउन्वहृश्यत ॥

२२॥

इति--इस प्रकार; ब्रुवनू--बातें करते; चित्र-रथ:--थ्रुव महाराज, जिनका रथ अत्यन्त सुन्दर था; स्व-सारथिम्‌--अपने सारथीसे; यत्त:--सावधान; परेषाम्‌--अपने शत्रुओं से; प्रतियोग--जवाबी हमला; शद्धितः--सशंकित; शुभश्राव--सुना; शब्दम्‌--शब्द; जलधे: --समुद्र से; इब--मानो; ईरितम्‌--प्रतिध्वनित; नभस्वत:--वायु के कारण; दिश्षु--सभी दिशाओं में; रज:--धूल; अनु--तब; अदृश्यत--दिखाई पड़ी |

जब श्रुव महाराज अपने मायावी शत्रुओं से सशंकित होकर अपने सारथी से बातें कर रहे थे तो उन्हें प्रचण्ड ध्वनि सुनाई पड़ी, मानो सम्पूर्ण समुद्र उमड़ आया हो।

उन्होंने देखा कि आकाशसे उन पर चारों ओर से धूल भरी आँधी आ रही है।

"

क्षणेनाच्छादितं व्योम घनानीकेन सर्वतः ।

विस्फुरत्तडिता दिश्लु त्रासयत्स्तनयित्नुना ॥

२३॥

क्षणेन--एक क्षण में; आच्छादितम्‌--ढका हुआ; व्योम--आकाश; घन--घने बादलों का; अनीकेन--समूह से; सर्वतः--सभी दिशाओं में; विस्फुरत्‌--चमकती; तडिता--बिजली से; दिक्षु--सभी दिशाओं में; त्रासबत्‌-- भयभीत करता;स्तनयित्नुना-गर्जन से |

एक क्षण में सारा आकाश घने बादलों से छा गया और घोर गर्जन सुनाई पड़ने लगा।

बिजली चमकने लगी और भीषण वर्षा होने लगी।

"

ववृषू रुधिरौघासृक्पूयविण्मूत्रमेदस: ।

निपेतुर्गगनादस्य कबन्धान्यग्रतोइनघ ॥

२४॥

ववृषु:--वर्षा होने लगी; रुधिर--रक्त की; ओघ--बाढ़; असृक्‌--श्लेष्मा; पूय--पीब; विट्‌--विष्ठा; मूत्र--मूत्र; मेदस:--तथा मज्जा; निपेतु:--गिरने लगे; गगनात्‌ू--आकाश से; अस्य-- श्रुव के; कबन्धानि--धड़; अग्रत:--समक्ष; अनघ--हे निष्पापविदुर।

हे निष्पाप विदुर, उस वर्षा में श्रुव महाराज के समक्ष भारी मात्रा में रक्त, एलेष्मा (कफ ),पीब, मल, मूत्र तथा मजा और आकाश से शरीरों के धड़ ( रुंड ) गिर रहे थे।

"

ततः खेहृश्यत गिरिरनिपेतु: सर्वतोदिशम्‌ ।

गदापरिघनिस्त्रिशमुसला: साश्मवर्षिण: ॥

२५॥

ततः--तत्पश्चात्‌: खे--आकाश में; अहश्यत--दिखाई पड़ा; गिरि:--पर्वत; निपेतु:--गिरा हुआ; सर्वतः-दिशम्‌--सभीदिशाओं से; गदा--गदा; परिघ--परिघ; निर्त्रिश--तलवारें; मुसला:--मूसल; स-अश्म--पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों की;वर्षिण:--वर्षा के साथ।

फिर आकाश में एक विशाल पर्वत दिखाई पड़ा और चारों ओर से बर्छे, गदा, तलवारें,परिघ तथा पत्थरों के विशाल खण्डों की वर्षा के साथ उपलवृष्टि होने लगी।

"

अहयोउडशनिनि: श्रासा वमन्तोउंगिंन रुषाक्षिभि: ।

अभ्यधावन्गजा मत्ताः सिंहव्याप्राश्न यूथश: ॥

२६॥

अहयः--साँप; अशनि--वज्; नि: श्रासा: -- साँस लेते हुए; वमनन्‍्त:--वमन करते; अग्निमू--अग्नि; रुषा-अक्षिभि:--क्रोधितनेत्रों से; अभ्यधावन्‌--आगे आये; गजा:--हाथी; मत्ता: --उन्मत्त; सिंह--शेर; व्याप्रा:--बाघ; च-- भी; यूथश: -- समूह केसमूह

श्रुव महाराज ने देखा कि रोषपूर्ण आँखों वाले बहुत से सर्प अग्नि उगलते हुए उनको निगलनेके लिए आगे लपक रहे हैं।

साथ ही मत्त हाथियों, सिंहों तथा बाघों के समूह भी चले आ रहे हैं।

"

समुद्र ऊर्मिभिर्भीम: प्लावयन्सर्वतों भुवम्‌ ।

आससाद महाह्वादः कल्पान्त इब भीषण: ॥

२७॥

समुद्र: --समुद्र; ऊर्मिभि: --लहरों से; भीम:--भयानक; प्लावयन्‌--डुबाता हुआ; सर्वतः--सभी दिशाओं से; भुवम्‌--पृथ्वीको; आससाद--आगे आ रहा था; महा-हादः--भीषण शोर करता; कल्प-अन्ते--कल्प के अन्त में ( प्रलय ); इब--सहश;भीषण: -- भयावना ।

फिर, समस्त जगत के लिए प्रलय-काल के समान भयानक समुद्र अपनी उत्ताल तरंगों तथाभीषण गर्जना के साथ उनके समक्ष आ पहुँचा।

"

एवंविधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम्‌ ।

ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुरा: ॥

२८॥

एवमू-विधानि--इस प्रकार के ( कौतुक ); अनेकानि--बहुत से; त्रासनानि-- डरावने; अमनस्विनाम्‌--अल्पज्ञों के लिए;ससूजु:--उत्पन्न किया; तिग्म-गतय: --क्रूर स्वभाव वाले; आसुर्या--आसुरी; मायया--माया से; असुरा:--असुर गण ।

असुर-यक्ष स्वभाव से अत्यन्त क्रूर होते हैं और अपनी आसुरी माया से वे अल्पज्ञानियों कोडराने वाले अनेक कौतुक कर सकते थे।

"

ध्रुवे प्रयुक्तामसुरैस्तां मायामतिदुस्तराम्‌ ।

निशम्य तस्य मुनयः शमाशंसन्समागता: ॥

२९॥

ध्रुवे-- धुव के विरुद्ध; प्रयुक्ताम्‌--प्रयुक्त; असुरैः--असुरों द्वारा; तामू--उस; मायाम्‌--मायावी शक्ति; अति-दुस्तराम्‌-- अत्यन्तभयावनी; निशम्य--सुनकर; तस्य--उसका; मुनयः--बड़े-बड़े मुनि; शम्‌--कल्याण; आशंसन्‌ू--प्रोत्साहित करते हुए;समागता:--एकत्र हो गये।

जब मुनियों ने सुना कि ध्रुव महाराज असुरों के मायावी करतबों से पराजित हो गये हैं, तो वेउनकी मंगल-कामना के लिए तुरन्त वहाँ एकत्र हो गये।

"

मुनय ऊचुःऔत्तानपाद भगवांस्तव शार्ड्रधन्वादेव: क्षिणोत्ववनतार्तिहरो विपक्षान्‌ ।

यन्नामधेयमभिधाय निशम्य चाद्धालोकोजझ्जञसा तरति दुस्तरमड़ मृत्युम्‌ ॥

३०॥

मुनयः ऊचुः--मुनियों ने कहा; औत्तानपाद--हे उत्तानपाद के पुत्र; भगवान्‌-- भगवान्‌; तब--तुम्हारा; शार्ड-धन्वा --शार्डनामक धनुष को धारण करनेवाला; देव: --देव, भगवान; क्षिणोतु--वध कर दे; अवनत--शरणागतों के; आर्ति--क्लेश;हरः--हरनेवाला; विपक्षान्‌ू--विपक्षियों, शत्रुओं; यत्‌--जिसका; नामधेयम्‌--पवित्र नाम; अभिधाय-- लेकर; निशम्य--सुनकर; च--भी; अद्धघा--शीघ्र ही; लोक:--लोग; अज्ञसा-- पूर्णतः; तरति--पार करते हैं; दुस्तरम्‌--दुर्लध्य; अड्ड-हे ध्रुव;मृत्युमू--मृत्यु कोसभी

मुनियों ने कहा : हे उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव, अपने भक्तों के क्लेशों को हरनेवालेशार्ड्धन्वा भगवान्‌ आपके भयानक शत्रुओं का संहार करें।

भगवान्‌ का पवित्र नाम भगवान्‌ केही समान शक्तिमान है, अतः भगवान्‌ के पवित्र नाम के कीर्तन तथा श्रवण-मात्र से अनेक लोगभयानक मृत्यु से रक्षा पा सकते हैं।

इस प्रकार भक्त बच जाता है।

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