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अध्याय नौ: रचनात्मक ऊर्जा के लिए ब्रह्मा की प्रार्थना

3.9ब्रह्मोवाचज्ञातोअसि मेड सुचिरात्ननु देहभाजांन ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्‌।

नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धमायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासि ॥

१॥

ब्रह्मा उबाच--ब्रह्मा ने कहा; ज्ञात:--ज्ञात; असि--हो; मे--मेरे द्वारा; अद्य--आज; सुचिरात्‌--दीर्घकाल के बाद; ननु--लेकिन; देह-भाजाम्‌-- भौतिक देह वाले का; न--नहीं; ज्ञायते--ज्ञात है; भगवत:-- भगवान्‌ का; गति:ः--रास्ता; इति--इसप्रकार; अवद्यम्‌--महान्‌ अपराध; न अन्यत्‌--इसके परे कोई नहीं; त्वत्‌--तुम; अस्ति--है; भगवन्‌--हे भगवान्‌; अपि--यद्मपि है; तत्‌ू--जो कुछ हो सके; न--कभी नहीं; शुद्धमू--परम; माया-- भौतिक शक्ति के; गुण-व्यतिकरात्‌-गुणों केमिश्रण के कारण; यत्‌--जिसको; उरु:--दिव्य; विभासि--तुम हो |

ब्रह्माजी ने कहा : हे प्रभु, आज अनेकानेक वर्षों की तपस्या के बाद मैं आपके विषय मेंजान पाया हूँ।

ओह! देहधारी जीव कितने अभागे हैं कि वे आपके स्वरूप को जान पाने मेंअसमर्थ हैं।

हे स्वामी, आप एकमात्र ज्ञेय तत्व हैं, क्योंकि आपसे परे कुछ भी सर्वोच्च नहीं है।

यदि कोई वस्तु आपसे श्रेष्ठ प्रतीत होती भी है, तो वह परम पूर्ण नहीं है।

आप पदार्थ की सृजनशक्ति को प्रकट करके ब्रह्म रूप में विद्यमान हैं।

रूप॑ यदेतदवबोधरसोदयेनशश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय ।

आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजंयन्नाभिपदाभवनादहमाविरासम्‌ ॥

२॥

रूपम्‌--स्वरूप; यत्‌ू--जो; एतत्‌--वह; अवबोध-रस--आपकी अन्तरंगा शक्ति के; उदयेन--प्राकट्य से; शश्वत्‌--चिरन्तन;निवृत्त--से मुक्त; तमस:ः--भौतिक कल्मष; सतू-अनुग्रहाय--भक्तों के हेतु; आदौ--पदार्थ की सृजनशक्ति में मौलिक;गृहीतम्‌--स्वीकृत; अवतार--अवतारों का; शत-एक-बीजम्‌--सैकड़ों का मूल कारण; यत्‌--जो; नाभि-पद्मय--नाभि सेनिकला कमल का फूल; भवनात्‌--घर से; अहम्‌--मैं; आविरासम्‌--उत्पन्न हुआ।

मैं जिस रूप को देख रहा हूँ वह भौतिक कल्मष से सर्वथा मुक्त है और अन्तरंगा शक्ति कीअभिव्यक्ति के रूप में भक्तों पर कृपा दिखाने के लिए अवतरित हुआ है।

यह अवतार अन्यअनेक अवतारों का उदगम है और मैं स्वयं आपके नाभि रूपी घर से उगे कमल के फूल से उत्पन्नहुआ हूँ।

नातः पर परम यद्धवतः स्वरूप-मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्च: ।

पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन्‌भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाभ्रितोउस्मि ॥

३॥

न--नहीं; अतः परम्‌--इसके पश्चात्‌; परम--हे परमेश्वर; यत्‌ू--जो; भवतः--आपका; स्वरूपम्‌ू--नित्यरूप; आनन्द-मात्रम्‌--निर्विशेष ब्रह्म्योति; अविकल्पम्‌--बिना परिवर्तन के; अविद्ध-वर्च:--शक्ति के हास बिना; पश्यामि--देखता हूँ; विश्व-सृजम्‌ू--विराट जगत के स्त्रष्टा को; एकम्‌--अद्बय; अविश्वम्‌--फिर भी पदार्थ का नहीं; आत्मन्‌--हे परम कारण; भूत--शरीर;इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्मक--ऐसी पहचान से; मदः--गर्व; ते--आपके प्रति; उपाभ्रित:--शरणागत; अस्मि--हूँ।

हे प्रभु, मैं आपके इस सच्चिदानन्द रूप से श्रेष्ठ अन्य कोई रूप नहीं देखता।

वैकुण्ठ मेंआपकी निर्विशेष ब्रह्मज्योति में न तो यदाकदा परिवर्तन होता है और न अन्तरंगा शक्ति में कोईहास आता है।

मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ, क्योंकि जहाँ मैं अपने भौतिक शरीर तथाइन्द्रियों पर गर्वित हूँ वहीं आप विराट जगत का कारण होते हुए भी पदार्थ द्वारा अस्पृश्य हैं।

तद्ठा ड्दं भुवनमड़्ुल मड़लायध्याने सम नो दर्शितं त उपासकानाम्‌ ।

तस्मै नमो भगवतेनुविधेम तुभ्यंयोनाहतो नरकभाग्भिरसत्प्रसड़ैः ॥

४॥

तत्‌--भगवान्‌ श्रीकृष्ण; वा--अथवा; इदम्‌--यह वर्तमान स्वरूप; भुवन-मड़ल--हे समस्त ब्रह्माण्डों के लिए सर्वमंगलमय;मड्लाय--समस्त सम्पन्नता के लिए; ध्याने-ध्यान में; स्म--मानो था; न:ः--हमको; दर्शितम्‌-- प्रकट; ते--तुम्हारे;उपासकानाम्‌--भक्तों का; तस्मै--उनको; नम:ः--मेरा सादर नमस्कार; भगवते-- भगवान्‌ को; अनुविधेम--सम्पन्न करता हूँ;तुभ्यमू--तुमको; यः--जो; अनाहत: --उपेक्षित है; नरक-भाग्भि:--नरक जाने वाले व्यक्तियों द्वारा; असत्‌-प्रसड्रैः-- भौतिककथाओं द्वारा

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ कृष्ण का यह वर्तमान रूप या उनके द्वारा विस्तार किया हुआ कोईभी दिव्य रूप सारे ब्रह्माण्डों के लिए समान रूप से मंगलमय है।

चूँकि आपने यह नित्य साकाररूप प्रकट किया है, जिसका ध्यान आपके भक्त करते हैं, इसलिए मैं आपको सादर नमस्कारकरता हूँ।

जिन्हें नरकगामी होना बदा है वे आपके साकार रूप की उपेक्षा करते हैं, क्योंकि वेलोग भौतिक विषयों की ही कल्पना करते रहते हैं।

ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धंजिप्रन्ति कर्णविवरे: श्रुतिवातनीतम्‌ ।

भक्‍त्या गृहीतचरण: परया च तेषांनापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम्‌ू ॥

५॥

ये--जो लोग; तु--लेकिन; त्वदीय--आपके ; चरण-अम्बुज--चरणकमल; कोश-- भी तर; गन्धम्‌--सुगन्ध; जिप्रन्ति--सूँघतेहैं; कर्ण-विवरैः--कानों के मार्ग से होकर; श्रुति-वात-नीतम्‌--वैदिक ध्वनि की वायु से ले जाये गये; भक्त्या--भक्ति द्वारा;गृहीत-चरण:--चरणकमलों को स्वीकार करते हुए; परया--दिव्य; च-- भी; तेषामू-- उनके लिए; न--कभी नहीं; अपैषि--पृथक्‌; नाथ--हे प्रभु; हदय--हृदय रूपी; अम्बु-रुहात्‌ू--कमल से; स्व-पुंसामू--अपने ही भक्तों के

हे प्रभु, जो लोग वैदिक ध्वनि की वायु द्वारा ले जाई गई आपके चरणकमलों की सुगन्धको अपने कानों के द्वारा सूँघते हैं, वे आपकी भक्ति-मय सेवा को स्वीकार करते हैं।

उनके लिएआप उनके हृदय रूपी कमल से कभी भी विलग नहीं होते।

तावद्धयं द्रविणदेहसुहनब्निमित्तंशोक: स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभ: ।

तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलंयावन्न तेडड्प्रिमभयं प्रवृणीत लोक: ॥

६॥

तावत्‌--तब तक; भयमू-- भय; द्रविण--सम्पत्ति; देह--शरीर; सुहृत्‌-- सम्बन्धी जन; निमित्तमू--के लिए; शोक:--शोक;स्पृहा--इच्छा; परिभव: --साज-सामग्री; विपुल:--अत्यधिक; च-- भी; लोभ:-- लालच; तावत्‌--उस समय तक; मम--मेरा;इति--इस प्रकार; असत्‌--नश्वर; अवग्रहः --दुराग्रह; आर्ति-मूलम्‌--चिन्‍्ता से पूर्ण; यावत्‌--जब तक; न--नहीं ; ते--तुम्हारे;अद्प्रिम्‌ अभयम्‌--सुरक्षित चरणकमल; प्रवृणीत--शरण लेते हैं; लोक:--संसार के लोग।

हे प्रभु, संसार के लोग समस्त भौतिक चिन्ताओं से उद्विग्न रहते हैं--वे सदैव भयभीत रहतेहैं।

वे सदैव धन, शरीर तथा मित्रों की रक्षा करने का प्रयास करते हैं, वे शोक तथा अवैधइच्छाओं एवं साज-सामग्री से पूरित रहते हैं तथा लोभवश 'मैं' तथा 'मेरे' की नश्वरधारणाओंपर अपने दुराग्रह को आधारित करते हैं।

जब तक वे आपके सुरक्षित चरणकमलों की शरणग्रहण नहीं करते तब तक वे ऐसी चिन्ताओं से भरे रहते हैं।

दैवेन ते हतधियो भवत:ः प्रसड़ा-त्सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये ।

कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीनालोभाभिभूतमनसोकुशलानि शश्वत्‌ ॥

७॥

दैवेन--दुर्भाग्य से; ते--वे; हत-धियः--स्मृति से वंचित; भवतः--आपकी; प्रसड्ञात्‌ू--कथाओं से; सर्व--समस्त; अशुभ--अकल्याणकारी; उपशमनात्‌--शमन करते हुए; विमुख--के विरुद्ध बने हुए; इन्द्रिया:--इन्द्रियाँ; ये--जो; कुर्वन्ति--करते हैं;काम--इन्द्रिय-तृप्ति; सुख--सुख; लेश--अल्प; लवाय-- क्षण भर के लिए; दीना:--बेचारे; लोभ-अभिभूत--लोभ सेग्रसित; मनस:--मन वाले; अकुशलानि--अशुभ कार्यकलाप; शश्वत्‌--सदैव |

हे प्रभु, वे व्यक्ति जो आपके दिव्य कार्यकलापों के विषय में सर्वमंगलकारी कीर्तन तथाश्रवण करने से वंचित हैं निश्चित रूप से वे अभागे हैं और सह्दुद्धि से विहीन हैं।

वे तनिक देर केलिए इन्द्रियतृष्ति का भोग करने हेतु अशुभ कार्यों में लग जाते हैं।

ऊपर उठ पाते हैं।

क्षुत्तट्त्रिधातुभिरिमा मुहुरर्ध्यमाना:शीतोष्णवातवरषैरितरेतराच्च ।

कामाग्निनाच्युतरुषा च सुदुर्भरणसम्पश्यतो मन उरुक्रम सीदते मे ॥

८ ॥

क्षुत्‌ू- भूख; तृट्‌--प्यास; त्रि-धातुभिः--तीन-रस, यथा कफ, पित्त तथा वायु; इमा:--ये सभी; मुहुः--सदैव; अर्द्यमाना: --व्यग्र; शीत--जाड़ा; उष्ण--गर्मी ; वात--वायु; वरषै:--वर्षा द्वारा; इतर-इतरात्‌--तथा अन्य अनेक उत्पात; च-- भी; काम-अग्निना--प्रबल यौन इच्छा से; अच्युत-रुषा--दुःसह क्रोध; च-- भी; सुदुर्भरण -- अत्यन्त असहा; सम्पश्यत:--देखते हुए;मनः--मन; उरुक्रम--हे महान्‌ कर्ता; सीदते--निराश होता है; मे--मेरा |

हे महान्‌ कर्ता, मेरे प्रभु, ये सभी दीन प्राणी निरन्तर भूख, प्यास, शीत, कफ तथा पित्त सेव्यग्र रहते हैं, इन पर कफ युक्त शीतऋतु, भीषण गर्मी, वर्षा तथा अन्य अनेक क्षुब्ध करने वालेतत्त्व आक्रमण करते रहते हैं और ये प्रबल कामेच्छाओं तथा दुःसह क्रोध से अभिभूत होते रहतेहैं।

मुझे इन पर दया आती है और मैं इनके लिए अत्यन्त सन्तप्त रहता हूँ।

यावत्पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थ-मायाबलं भगवतो जन ईंश पश्येत्‌ ।

तावन्न संसृतिरसौ प्रतिसड्क्रमेतव्यर्थापि दुःखनिवहं बहती क्रियार्था ॥

९॥

यावत्‌--जब तक; पृथक्त्वमू--विलगाव; इृदम्‌--यह; आत्मन:--शरीर का; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रियतृप्ति के लिए; माया-बलमू--बहिरंगा शक्ति का प्रभाव; भगवतः-- भगवान्‌ का; जन:--व्यक्ति; ईश-हे प्रभु; पश्येत्‌ू--देखता है; तावत्‌--तबतक; न--नहीं; संसृतिः--भौतिक जगत का प्रभाव; असौ--वह मनुष्य; प्रतिसड्क्रमेत--लाँघ सकता है; व्यर्था अपि--यद्यपिअर्थहीन; दुःख-निवहम्‌-- अनेक दुख; बहती --लाते हुए; क्रिया-अर्था--सकाम कर्मो के लिए

हे प्रभु, आत्मा के लिए भौतिक दुखों का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता।

फिर भी जबतक बद्धात्मा शरीर को इन्द्रिय भोग के निमित्त देखता है तब तक वह आपकी बहिरंगा शक्तिद्वारा प्रभावित होने से भौतिक कष्टों के पाश से बाहर नहीं निकल पाता।

अह्न्यापृतार्तकरणा निशि निःशयानानानामनोरथधिया क्षणभग्ननिद्रा: ।

दैवाहतार्थरचना ऋषयोपि देवयुष्मत्प्रसड्रविमुखा इह संसरन्ति ॥

१०॥

अहि-दिन के समय; आपृत--व्यस्त; आर्त--दुखदायी कार्य; करणा:--इन्द्रियाँ; निशि--रात में; निःशयाना:--अनिद्रा;नाना--विविध; मनोरथ--मानसिक चिन्तन; धिया--बुद्धि द्वारा; क्षण--निरन्तर; भग्न--टूटी हुई; निद्रा:--नींद; दैव--अतिमानवीय; आहत-अर्थ--हताश; रचना:--योजनाएँ; ऋषय:--ऋषिगण; अपि-- भी; देव--हे प्रभु; युष्मत्‌-- आपकी;प्रसड्र---कथा से; विमुखा:--विरुद्ध; इह--इस ( जगत ) में; संसरन्ति--चक्कर लगाते हैं।

ऐसे अभक्तगण अपनी इन्द्रियों को अत्यन्त कष्टप्रद तथा विस्तृत कार्य में लगाते हैं और रातमें उनिद्र रोग से पीड़ित रहते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि विविध मानसिक चिन्ताओं के कारणउनकी नींद को लगातार भंग करती रहती है।

वे अतिमानवीय शक्ति द्वारा अपनी विविधयोजनाओं में हताश कर दिए जाते हैं।

यहाँ तक कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि यदि आपकी दिव्य कथाओं से विमुख रहते हैं, तो वे भी इस भौतिक जगत में ही चक्कर लगाते रहते हैं।

त्वं भक्तियोगपरिभावितहत्सरोजआस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्‌ ।

यद्यद्द्विया त उरुगाय विभावयन्तितत्तद्वपु: प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥

११॥

त्वमू--तुमको; भक्ति-योग--भक्ति में; परिभावित--शत प्रतिशत लगे रहकर; हत्‌--हदय के; सरोजे--कमल में; आस्से--निवास करते हो; श्रुत-ईक्षित--कान के माध्यम से देखा हुआ; पथ:--पथ; ननु--अब; नाथ--हे स्वामी; पुंसाम्‌ू--भक्तों का;यतू-यत्‌--जो जो; धिया--ध्यान करने से; ते--तुम्हारा; उरुगाय--हे बहुख्यातिवान्‌; विभावयन्ति--विशेष रूप से चिन्तनकरते हैं; तत्‌-तत्‌--वही वही; वपु:--दिव्य स्वरूप; प्रणयसे--प्रकट करते हो; सत्‌-अनुग्रहाय--अपनी अहैतुकी कृपा दिखानेके लिए

हे प्रभु, आपके भक्तगण प्रामाणिक श्रवण विधि द्वारा कानों के माध्यम से आपको देखसकते हैं और इस तरह उनके हृदय विमल हो जाते हैं तथा आप वहाँ पर अपना स्थान ग्रहण करलेते हैं।

आप अपने भक्तों पर इतने दयालु हैं कि आप अपने को उस अध्यात्म के विशेष नित्यरूप में प्रकट करते हैं जिसमें वे सदैव आपका चिन्तन करते हैं।

नातिप्रसीदति तथोपचितोपचारै-राराधितः सुरगणईदि बद्धकामै: ।

यत्सर्वभूतदययासदलभ्ययैकोनानाजनेष्ववहितः सुहृदन्तरात्मा ॥

१२॥

न--कभी नहीं; अति--अत्यधिक; प्रसीदति--तुष्ट होता है; तथा--जितना; उपचित--ठाठबाट से; उपचारैः--पूजनीय साजसामग्री सहित; आराधितः--पूजित होकर; सुर-गणै:--देवताओं द्वारा; हृदि बद्ध-कामै:--समस्त प्रकार की भौतिक इच्छाओं सेपूरित हृदय से; यत्‌--जो; सर्व--समस्त; भूत--जीव; दयया--उन पर अहैतुकी कृपा दिखाने के लिए; असत्‌--अभक्त;अलभ्यया-्राप्त न हो सकने से; एक:--अद्वितीय; नाना--विविध; जनेषु--जीवों में; अवहित:--अनुभूत; सुहत्‌--शुभेच्छुमित्र; अन्तः-- भीतर; आत्मा--परमात्मा |

हे प्रभु, आप उन देवताओं की पूजा से बहुत अधिक तुष्ट नहीं होते जो आपकी पूजा अत्यन्तठाठ-बाट से तथा विविध साज-सामग्री के साथ करते तो हैं, किन्तु भौतिक लालसाओं से पूर्णहोते हैं।

आप हर एक के हृदय में परमात्मा के रूप में अपनी अहैतुकी कृपा दर्शाने के लिए स्थित रहते हैं।

आप नित्य शुभचिन्तक हैं, किन्तु आप अभक्तों के लिए अनुपलब्ध हैं।

पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै-दनिन चोग्रतपसा परिचर्यया च ।

आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो धर्मोडर्पित: कर्हिंचिद्म्रियते न यत्र ॥

१३॥

पुंसामू--लोगों का; अत:--इसलिए; विविध-कर्मभि: --नाना प्रकार के सकाम कर्मों द्वारा; अध्वर-आद्यै:--वैदिक अनुष्ठानसम्पन्न करने से; दानेन--दान के द्वारा; च--तथा; उग्र-- अत्यन्त कठोर; तपसा--तपस्या से; परिचर्यया--दिव्य सेवा द्वारा;च--भी; आराधनम्‌-- पूजा; भगवतः -- भगवान्‌ की; तव--तुम्हारा; सत्‌-क्रिया-अर्थ:--एकमात्र आपको प्रसन्न करने केलिए; धर्म: --धर्म; अर्पित:--इस प्रकार अर्पित; क्हिंचितू--किसी समय; प्रियते--विनष्ट होता है; न--कभी नहीं; यत्र--वहाँ।

किन्तु वैदिक अनुष्ठान, दान, कठोर तपस्या तथा दिव्य सेवा जैसे पुण्य कार्य भी, जो लोगोंद्वारा सकाम फलों को आपको अर्पित करके आपकी पूजा करने तथा आपको तुष्ट करने केउद्देश्य से किये जाते हैं, लाभप्रद होते हैं।

धर्म के ऐसे कार्य व्यर्थ नहीं जाते।

शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद-मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै ।

विश्वोद्धवस्थितिलयेषु निमित्तलीला-रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥

१४॥

शश्वत्‌-शा श्रत रूप से; स्वरूप--दिव्य रूप; महसा--महिमा के द्वारा; एब--निश्चय ही; निपीत--विभेदित; भेद--अन्तर;मोहाय--मोहमयी धारणा के हेतु; बोध-- आत्म-ज्ञान; धिषणाय--बुद्धि; नमः--नमस्कार; परस्मै--ब्रह्म को; विश्व-उद्धव--विराट जगत की सृष्टि; स्थिति--पालन; लयेषु--संहार भी; निमित्त--के हेतु; लीला--ऐसी लीलाओं से; रासाय-- भोग हेतु;ते--तुम्हें; नम:--नमस्कार; इृदम्‌--यह; चकूम--मैं करता हूँ; ईश्वराय--परमे श्वर को |

मैं उन परब्रह्म को नमस्कार करता हूँ जो अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा शाश्वत विशिष्टअवस्था में रहते हैं।

उनका विभेदित न किया जा सकने वाला निर्विशेष स्वरूप आत्म-साक्षात्कारहेतु बुद्धि द्वारा पहचाना जाता है।

मैं उनको नमस्कार करता हूँ जो अपनी लीलाओं के द्वाराविराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार का आनच्द लेते हैं।

यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानिनामानि येसुविगमे विवशा गृणन्ति ।

तेनैकजन्मशमलं सहसैव हित्वासंयान्त्यपावृतामृतं तमजं प्रपद्ये ॥

१५॥

यस्य--जिसके; अवतार--अवतार; गुण--दिव्य गुण; कर्म--कर्म; विडम्बनानि--सभी रहस्यमय; नामानि--दिव्य नाम; ये--वे; असु-विगमे--इस जीवन को छोड़ते समय; विवशा:--स्वतः; गृणन्ति--आवाहन करते हैं; ते--वे; अनैक--अनेक;जन्म--जन्म; शमलम्‌--संचित पाप; सहसा--तुरन्‍्त; एव--निश्चय ही; हित्वा--त्याग कर; संयान्ति--प्राप्त करते हैं;अपावृत--खुली; अमृतम्‌-- अमरता; तमू--उस; अजम्‌--अजन्मा की; प्रपद्ये--मैं शरण लेता हूँ।

मैं उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ जिनके अवतार, गुण तथा कर्म सांसारिकमामलों के रहस्यमय अनुकरण हैं।

जो व्यक्ति इस जीवन को छोड़ते समय अनजाने में भी उनके दिव्य नाम का आवाहन करता है उसके जन्म-जन्म के पाप तुरन्त धुल जाते हैं और वह उनभगवान्‌ को निश्चित रूप से प्राप्त करता है।

यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं चस्थित्युद्धवप्रलयहेतव आत्ममूलम्‌ ।

भिन्त्वा त्रिपाद्ववृध एक उरुप्ररोहस्‌तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥

१६॥

यः--जो; वै--निश्चय ही; अहम्‌ च--मैं भी; गिरिश: च--शिव भी; विभुः--सर्वशक्तिमान; स्वयम्‌--स्वयं ( विष्णु रूप में );च--तथा; स्थिति--पालन; उद्धव--सृजन; प्रलय--संहार; हेतवः -- कारण; आत्म-मूलम्‌--स्वतःस्थित; भित्त्वा-- भेदकर;त्रि-पातू--तीन तने; ववृधे--उगा; एक:--अद्वितीय; उरुू--अनेक ; प्ररोह:--शाखाएँ; तस्मै-- उसे; नम:--नमस्कार;भगवते-- भगवान्‌ को; भुवन-द्रुमाय--लोक रूपी वृक्ष को |

आप लोक रूपी वृक्ष की जड़ हैं।

यह वृक्ष सर्वप्रथम भौतिक प्रकृति को तीन तनों के रूपमें--मुझ, शिव तथा सर्वशक्तिमान आपके रूप में--सृूजन, पालन तथा संहार के लिए भेदकरनिकला है और हम तीनों से अनेक शाखाएँ निकल आई हैं।

इसलिए हे विराट जगत रूपी वृजक्ष,मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तःकर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे ।

यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशांसद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोस्तु तस्मै ॥

१७॥

लोकः:--सामान्य लोग; विकर्म--अविचारित कर्म में; निरत:--लगे हुए; कुशले--लाभप्रद कार्य में; प्रमत्त:--लापरवाह;कर्मणि--कर्म में; अयम्‌--यह; त्वत्‌--आपके द्वारा; उदिते--घोषित; भवत्‌-- आपकी; अर्चने--पूजा में; स्वे-- अपने; य:--जो; तावत्‌ू--जब तक; अस्य--सामान्य लोगों का; बलवान्‌--अत्यन्त शक्तिमान; इह--यह; जीवित-आशाम्‌--जीवन-संघर्ष;सद्यः--प्रत्यक्षतः; छिनत्ति--काट कर खण्ड खण्ड कर दिया जाता है; अनिमिषाय--नित्य काल द्वारा; नम:--नमस्कार;अस्तु--हो; तस्मै--उसके लिएसामान्य लोग मूर्खतापूर्ण कार्यो में लगे रहते हैं।

वे अपने मार्गदर्शन हेतु आपके द्वारा प्रत्यक्षघोषित लाभप्रद कार्यों में अपने को नहीं लगाते।

जब तक उनकी मूर्खतापूर्ण कार्यों की प्रवृत्तिबलवती बनी रहती है तब तक जीवन-संघर्ष में उनकी सारी योजनाएँ छिन्न-भिन्न होती रहेंगी।

अतएव मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ जो नित्यकाल स्वरूप हैं।

यस्माद्विभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य-मध्यासित: सकललोकनमस्कृतं यत्‌ ।

तेपे तपो बहुसवोवरुरुत्समान-स्तस्मै नमो भगवतेधिमखाय तुभ्यम्‌ ॥

१८॥

यस्मात्‌--जिससे; बिभेमि--डरता हूँ; अहम्‌--मैं; अपि-- भी; द्वि-पर-अर्ध--४, ३०, ००, ००, ०००७२५३०००१२५१०० सौरवर्षो की सीमा तक; धिष्ण्यम्‌--स्थान में; अध्यासित:--स्थित; सकल-लोक--अन्य सारे लोकों द्वारा; नमस्कृतम्‌-- आदरित;यत्‌--जिसने; तेपे--किया; तप:ः--तपस्या; बहु-सव:--अनेकानेक वर्ष; अवरुरुत्समान:--आपको प्राप्त करने की इच्छा से;तस्मै--उन को; नमः--मैं नमस्कार करता हूँ; भगवते-- भगवान्‌ को; अधिमखाय--समस्त यज्ञों के भोक्ता; तुभ्यमू--आपको |

हे प्रभु, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ जो अथक काल तथा समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं।

यद्यपि मैं ऐसे स्थान में स्थित हूँ जो दो परार्धों की अवधि तक विद्यमान रहेगा, और यद्यपि मैंब्रह्माण्ड के अन्य सभी लोकों का अगुआ हूँ, और यद्यपि मैंने आत्म-साक्षात्कार हेतु अनेकानेकवर्षो तक तपस्या की है, फिर भी मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

तिर्यड्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि-घ्वात्मेच्छयात्मकृतसेतुपरीप्सया यः ।

रैमे निरस्तविषयोप्यवरुद्धदेह-स्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥

१९॥

तिर्यक्‌--मनुष्येतर पशु; मनुष्य--मानव आदि; विबुध-आदिषु--देवताओं इत्यादि; जीव-योनिषु--विभिन्न जीव योनियों में;आत्म--आत्मा; इच्छया--इच्छा द्वारा; आत्म-कृत--स्वतःउत्पन्न; सेतु--दायित्व; परीप्सया--बनाये रखने की इच्छा से; यः--जो; रेमे--दिव्य लीला सम्पन्न करते हुए; निरस्त--अधिक प्रभावित हुए बिना; विषय:-- भौतिक कल्मष; अपि--निश्चय ही;अवरुद्ध-प्रकट; देह: --दिव्य शरीर; तस्मै--उस; नम:--मेरा नमस्कार; भगवते-- भगवान्‌ को; पुरुषोत्तमाय--आदिभगवान्‌)

हे प्रभु, आप अपनी दिव्य लीलाएँ सम्पन्न करने हेतु स्वेच्छा से विविध जीवयोनियों में,मनुष्येतर पशुओं में तथा देवताओं में प्रकट होते हैं।

आप भौतिक कल्मष से तनिक भी प्रभावितनहीं होते।

आप धर्म के अपने सिद्धान्तों के दायित्वों को पूरा करने के लिए ही आते हैं, अतः, हेपरमेश्वर ऐसे विभिन्न रूपों को प्रकट करने के लिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

योविद्ययानुपहतोपि दशार्धवृत्त्यानिद्रामुबाह जठरीकृतलोकयात्र: ।

अन्तर्जलेडहिकशि पुस्पर्शानुकूलांभीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन्‌ ॥

२०॥

यः--जो, जिसने; अविद्यया--अविद्या से प्रभावित; अनुपहतः--प्रभावित हुए बिना; अपि-- भी; दश-अर्ध--पाँच; वृत्त्या--अन्योन्य क्रिया; निद्रामू--नींद; उबाह--स्वीकार किया; जठरी--उदर के भीतर; कृत--ऐसा करते हुए; लोक-यात्र:--विभिन्नजीवों का पालन पोषण; अन्त:ः-जले--प्रलयरूपी जल के भीतर; अहि-कशिपु--सर्प-शय्या पर; स्पर्श-अनुकूलाम्‌--स्पर्श केलिए सुखी; भीम-ऊर्मि--प्रचण्ड लहरों की; मालिनि-- श्रृंखला; जनस्य--बुदर्ध्धिमान पुरुष का; सुखम्‌--सुख; विवृण्वन्‌--प्रदर्शित करते हुए।

हे प्रभु, आप उस प्रलयकालीन जल में शयन करने का आनन्द लेते हैं जहाँ प्रचण्ड लहरेंउठती रहती हैं और बुद्धिमान लोगों को अपनी नींद का सुख दिखाने के लिए आप सर्पों कीशय्या का आनन्द भोगते हैं।

उस काल में ब्रह्माण्ड के सारे लोक आपके उदर में स्थित रहते हैं।

यन्नाभिपदाभवनादहमासमीड्यलोकत्रयोपकरणो यदनुग्रहेण ।

तस्मै नमस्त उदरस्थभवाय योग-निद्रावसानविकसन्नलिनेक्षणाय ॥

२१॥

यत्‌--जिसकी; नाभि--नाभि; पद्मय--कमल रूपी; भवनात्‌ू--घर से; अहम्‌ू--मैं; आसम्‌-- प्रकट हुआ; ईड्यू--हे पूजनीय;लोक-त्रय--तीनों लोकों के; उपकरण:--सृजन में सहायक बनकर; यत्‌--जिसकी; अनुग्रहेण--कृपा से; तस्मै--उसको;नमः--मेरा नमस्कार; ते--तुमको; उदर-स्थ--उदर के भीतर स्थित; भवाय--ब्रह्माण्ड से युक्त; योग-निद्रा-अवसान--उसदिव्य निद्रा के अन्त होने पर; विकसत्‌--खिले हुए; नलिन-ईक्षणाय--जिसकी खुली आँखें कमलों के समान हैं उसे |

हे मेरी पूजा के लक्ष्य, मैं आपकी कृपा से ब्रह्माण्ड की रचना करने हेतु आपके कमल-नाभि रूपी घर से उत्पन्न हुआ हूँ।

जब आप नींद का आनन्द ले रहे थे, तब ब्रह्माण्ड के ये सारेलोक आपके दिव्य उदर के भीतर स्थित थे।

अब आपकी नींद टूटी है, तो आपके नेत्र प्रातःकालमें खिलते हुए कमलों की तरह खुले हुए हैं।

सो5यं समस्तजगतां सुहदेक आत्मा सत्त्वेन यन्मूडयते भगवान्भगेन ।

तेनैव मे हशमनुस्पृशताद्य थाहं स्त्रक्ष्यामि पूर्ववदिदं प्रणतप्रियोउसौ ॥

२२॥

सः--वह; अयमू-- भगवान्‌; समस्त-जगताम्‌--समस्त ब्रह्माण्डों में से; सुहत्‌ एक:--एकमात्र मित्र तथा दार्शनिक; आत्मा--परमात्मा; सत्त्वेन--सतोगुण के द्वारा; यत्‌ू--जो; मृडयते--सुख उत्पन्न करता है; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; भगेन--छ: ऐश्वर्यों द्वारा;तेन--उसके द्वारा; एब--निश्चय ही; मे--मुझको; दृशम्‌--आत्मपरी क्षण की शक्ति, अन्तर्दष्टि; अनुस्पृशतात्‌--वह दे; यथा--जिस तरह; अहम्‌--ैं; स््रक्ष्यामि--सृजन कर सकूँगा; पूर्व-वत्‌--पहले की तरह; इृदम्‌--यह ब्रह्माण्ड; प्रणत--शरणागत;प्रियः--प्रिय; असौ--वह ( भगवान्‌ )॥

परमेश्वर मुझ पर कृपालु हों।

वे इस जगत में सारे जीवों के एकमात्र मित्र तथा आत्मा हैं औरवे अपने छः ऐश्वर्यों द्वारा जीवों के चरम सुख हेतु इन सबों का पालन-पोषण करते हैं।

वे मुझपर कृपालु हों, जिससे मैं पहले की तरह सृजन करने की आत्मपरीक्षण शक्ति से युक्त हो सकूँ,क्योंकि मैं भी उन शरणागत जीवों में से हूँ जो भगवान्‌ को प्रिय हैं।

एष प्रपन्नवरदो रमयात्मशक्त्यायद्यत्करिष्यति गृहीतगुणावतार: ।

तस्मिन्स्वविक्रममिदं सृजतोपि चेतोयुज्जीत कर्मशमलं च यथा विजद्याम्‌ ॥

२३॥

एव: --यह; प्रपन्न--शरणागत; वर-दः --वर देने वाला; रमया--लक्ष्मीदेवी के साथ रमण करते हुए; आत्म-शकत्या--अपनीअन्तरंगा शक्ति सहित; यत्‌ यत्‌ू--जो जो; करिष्यति--वह कर सके ; गृहीत--स्वीकार करते हुए; गुण-अबतार:--सतोगुण काअवतार; तस्मिन्‌--उसको; स्व-विक्रमम्‌--सर्वशक्तिमत्ता से; इदम्‌--इस विराट जगत को; सृजतः--रचते हुए; अपि-- भी;चेत:--हृदय; युज्ञीत--लगा रहे; कर्म--कार्य; शमलम्‌-- भौतिक प्रभाव, व्याधि; च-- भी; यथा--यथासम्भव; विजह्याम्‌--मैंत्याग सकता हूँ।

भगवान्‌ सदा ही शरणागतों को वर देने वाले हैं।

उनके सारे कार्य उनकी अन्तरंगा शक्ति रमा या लक्ष्मी के माध्यम से सम्पन्न होते हैं।

मेरी उनसे यही विनती है कि भौतिक जगत के सृजन मेंवे मुझे अपनी सेवा में लगा लें और मेरी यही प्रार्थना है कि मैं अपने कर्मो द्वारा भौतिक रूप सेप्रभावित न होऊँ, क्योंकि इस तरह मैं स्त्रष्टा होने की मिथ्या-प्रतिष्ठा त्यागने में सक्षम हो सकूँगा।

नाभिहृदादिह सतोम्भसि यस्य पुंसोविज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्ति: ।

रूप॑ विचित्रमिदमस्य विवृण्वतो मेमा रीरिषीष्ट निगमस्य गिरां विसर्ग: ॥

२४॥

नाभि-हृदात्‌ू--नाभिरूपी झील से; इह--इस कल्प में; सत:--लेटे हुए; अम्भसि--जल में; यस्य--जिसका; पुंसः--भगवान्‌का; विज्ञान--सप्पूर्ण ब्रह्माण्ड की; शक्ति:--शक्ति; अहम्‌ू--मैं; आसम्‌--उत्पन्न हुआ था; अनन्त-- असीम; शक्ते: --शक्तिशाली का; रूपमू--स्वरूप; विचित्रम्‌--विचित्र; इदम्‌--यह; अस्य--उसका; विवृण्बत:--प्रकट करते हुए; मे--मुझको; मा--नहीं; रीरिषीष्ट--लुप्त; निगमस्य--वेदों की; गिराम्‌--ध्वनियों का; विसर्ग:--कम्पन |

भगवान्‌ की शक्तियाँ असंख्य हैं।

जब वे प्रलय-जल में लेटे रहते हैं, तो उस नाभिरूपी झीलसे, जिसमें कमल खिलता है, मैं समग्र विश्वशक्ति के रूप में उत्पन्न होता हूँ।

इस समय मैं विराटजगत के रूप में उनकी विविध शक्तियों को उद्धाटित करने में लगा हुआ हूँ।

इसलिए मैं प्रार्थनाकरता हूँ कि अपने भौतिक कार्यों को करते समय मैं वैदिक स्तुतियों की ध्वनि से कहींविचलित न हो जाऊँ।

सोसावदभ्रकरुणो भगवान्विवृद्ध-प्रेमस्मितेन नयनाम्बुरुहं विजृम्भन्‌ ।

उत्थाय विश्वविजयाय च नो विषादंमाध्व्या गिरापनयतात्पुरुषः पुराण: ॥

२५॥

सः--वह ( भगवान्‌ ); असौ--उस; अदभ्र-- असीम; करुण: --कृपालु; भगवान्‌-- भगवान्‌; विवृद्ध-- अत्यधिक; प्रेम --प्रेम;स्मितेन--हँसी द्वारा; नयन-अम्बुरुहमू--कमललनेत्रों को; विजृम्भन्‌ू--खोलते हुए; उत्थाय-- उत्थान हेतु; विश्व-विजयाय--विराटसृष्टि की महिमा के गायन हेतु; च-- भी; न: --हमारी; विषादम्‌--निराशा; माध्व्या--मधुर; गिरा--शब्द; अपनयतात्‌--वे दूरकरें; पुरुष: --परम; पुराण: --सबसे प्राचीन |

भगवान्‌ जो कि परम हैं और सबसे प्राचीन हैं, अपार कृपालु हैं।

मैं चाहता हूँ कि वे अपनेकमलनेत्रों को खोल कर मुसकाते हुए मुझे वर दें।

वे सम्पूर्ण विराट सृष्टि का उत्थान कर सकतेहैं और अपने कृपापूर्ण आदेशों के द्वारा हमारा विषाद दूर कर सकते हैं।

मैत्रेय उबाचस्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभि: ।

यावन्मनोवच: स्तुत्वा विरराम स खिन्नवत्‌ ॥

२६॥

मैत्रेयः उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; स्व-सम्भवम्‌-- अपने प्राकट्य का स्त्रोत; निशाम्य--देखकर; एवम्‌--इस प्रकार; तपः--तपस्या; विद्या--ज्ञान; समाधिभि:--तथा मन की एकाग्रता द्वारा; यावत्‌--यथासम्भव; मन:--मन; वच: --शब्द; स्तुत्वा--स्तुति करके; विरराम--मौन हो गया; सः--वह ( ब्रह्मा ); खिन्न-वत्‌--मानो थक गया हो

मैत्रेय मुनि ने कहा : हे विदुर, अपने प्राकट्य के स्त्रोत अर्थात्‌ भगवान्‌ को देखकर ब्रह्मा नेअपने मन तथा वाणी की क्षमता के अनुसार उनकी कृपा हेतु यथासम्भव स्तुति की।

इस प्रकारस्तुति करने के बाद वे मौन हो गये मानो अपनी तपस्या, ज्ञान तथा मानसिक एकाग्रता के कारणवे थक गये हों।

अथाभिप्रेतमन्वीक्ष्य ब्रह्मणो मधुसूदन: ।

विषण्णचेतसं तेन कल्पव्यतिकराम्भसा ॥

२७॥

लोकसंस्थानविज्ञान आत्मन: परिखिद्यतः ।

तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥

२८॥

अथ-त्पश्चात्‌; अभिप्रेतम्‌-मंशा, मनोभाव; अन्वीक्ष्य--देखकर; ब्रह्मण: --ब्रह्मा का; मधुसूदन: --मधु नामक असुर केवधकर्ता; विषणण--खिन्न; चेतसमू--हृदय के; तेन--उसके द्वारा; कल्प--युग; व्यतिकर-अम्भसा--प्रलयकारी जल; लोक-संस्थान--लोक की स्थिति; विज्ञाने--विज्ञान में; आत्मन:--स्वयं को; परिखिद्यत:--अत्यधिक चिन्तित; तम्‌--उससे; आह--कहा; अगाधया--अ त्यन्त विचारपूर्ण; वाचा--शब्दों से; कश्मलम्‌--अशुद्द्धियाँ; शमयन्‌--हटाते हुए; इब--मानो |

भगवान्‌ ने देखा कि ब्रह्माजी विभिन्न लोकों की योजना बनाने तथा उनके निर्माण को लेकरअतीव चिन्तित हैं और प्रलयंकारी जल को देखकर खिन्न हैं।

वे ब्रह्मा के मनोभाव को समझगये, अतः उन्होंने उत्पन्न मोह को दूर करते हुए गम्भीर एवं विचारपूर्ण शब्द कहे।

श्रीभगवानुवाचमा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह ।

तन्मयापादित ह्ग्रे यन्मां प्रार्थथते भवान्‌ ॥

२९॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; मा--मत; वेद-गर्भ--वैदिक ज्ञान की गहराई तक पहुँचने वाले; गा: तन्द्रीमू--निराशहो; सर्गे--सूजन के लिए; उद्यमम्‌--अध्यवसाय; आवह--जरा हाथ तो लगाओ; तत्‌--वह ( जो तुम चाहते हो ); मया--मेरेद्वारा; आपादितमू--सम्पन्न हुआ; हि--निश्चय ही; अग्रे--पहले ही; यत्‌--जो; माम्‌--मुझसे; प्रार्थयते--माँग रहे हो; भवान्‌--तुम

तब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ ने कहा, 'हे ब्रह्मा, हे वेदगर्भ, तुम सृष्टि करने के लिए न तोनिराश होओ, न ही चिन्तित।

तुम जो मुझसे माँग रहे हो वह तुम्हें पहले ही दिया जा चुका है।

भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम्‌ ।

ताभ्यामन्तईदि ब्रह्मन्लोकान्द्रक्ष्यस्यपावृतान्‌ू ॥

३०॥

भूयः--पुनः ; त्वमू--तुम; तपः--तपस्या; आतिष्ठ--स्थित होओ; विद्याम्‌--ज्ञान में; च-- भी; एव--निश्चय ही; मत्‌--मेरा;आश्रयाम्‌--संरक्षण में; ताभ्याम्‌ू--उन योग्यताओं द्वारा; अन्त:-- भीतर; हृदि--हृदय में; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; लोकान्‌--सारेलोक; द्रक्ष्य्सि--देखोगे; अपावृतान्‌ू-- प्रकट हुआ

हे ब्रह्मा, तुम अपने को तपस्या तथा ध्यान में स्थित करो और मेरी कृपा पाने के लिए ज्ञानके सिद्धान्तों का पालन करो।

इन कार्यों से तुम अपने हृदय के भीतर से हर बात को समझसकोगे।

तत आत्मनि लोके च भक्तियुक्त: समाहितः ।

द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन्मयि लोकांस्त्वमात्मन: ॥

३१॥

ततः--तत्पश्चात्‌: आत्मनि--तुम अपने में; लोके--ब्रह्माण्ड में; च-- भी; भक्ति-युक्त:--भक्ति में स्थित; समाहितः--पूर्णतयानिमग्न; द्रष्टा असि--तुम देखोगे; माम्‌--मुझको; ततम्‌--सर्वत्र व्याप्त; ब्रह्मनू--हे ब्रह्मा; मयि--मुझमें; लोकान्‌-- सारेब्रह्माण्डों को; त्वम्‌ू--तुम; आत्मन:--जीव |

हे ब्रह्मा, जब तुम अपने सर्जनात्मक कार्यकलाप के दौरान भक्ति में निमग्न रहोगे तो तुममुझको अपने में तथा ब्रह्माण्ड भर में देखोगे और तुम देखोगे कि मुझमें स्वयं तुम, ब्रह्माण्ड तथासारे जीव हैं।

यदा तु सर्वभूतेषु दारुष्वग्निमिव स्थितम्‌ ।

प्रतिचक्षीत मां लोको जद्यात्तहव कश्मलम्‌ ॥

३२॥

यदा--जब; तु-- लेकिन; सर्व--समस्त; भूतेषु--जीवों में; दारुषु--लकड़ी में; अग्निम्‌--अग्नि; इब--सहश; स्थितम्‌--स्थित; प्रतिचक्षीत--तुम देखोगे; मामू--मुझको; लोक:--तथा ब्रह्माण्ड; जह्यात्‌-त्याग सकता है; तहिं--तब तुरन्त; एब--निश्चय ही; कश्मलमू-मोह |

तुम मुझको सारे जीवों में तथा ब्रह्माण्ड में सर्वत्र उसी प्रकार देखोगे जिस तरह काठ में अग्निस्थित रहती है।

केवल उस दिव्य दृष्टि की अवस्था में तुम सभी प्रकार के मोह से अपने को मुक्तकर सकोगे।

यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियपुणाशयै: ।

स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन्स्वाराज्यमृच्छति ॥

३३॥

यदा--जब; रहितम्‌--से मुक्त; आत्मानम्‌--आत्मा; भूत--भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय-- भौतिक इन्द्रियाँ; गुण-आशयै:-- भौतिकगुणों के प्रभाव के अधीन; स्वरूपेण--शुद्ध जीवन में; मया--मेरे द्वारा; उपेतम्‌ू--निकट आकर; पश्यन्‌--देखने से;स्वाराज्यमू-- आध्यात्मिक साम्राज्य; ऋच्छति-- भोग करते हैं।

जब तुम स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के विचार से मुक्त होगे तथा तुम्हारी इन्द्रियाँ प्रकृति के सारेप्रभावों से मुक्त होंगी तब तुम मेरी संगति में अपने शुद्ध रूप की अनुभूति कर सकोगे।

उस समयतुम शुद्ध भावनामृत में स्थित होगे।

नानाकर्मवितानेन प्रजा बह्नीः सिसृक्षत: ।

नात्मावसीदत्यसिंमस्ते वर्षीयान्मदनुग्रह: ॥

३४॥

नाना-कर्म--तरह तरह की सेवा; वितानेन--विस्तार से; प्रजा:--जनता; बह्ली:ः--असंख्य; सिसृक्षत:--वृद्द्धि करने की इच्छाकरते हुए; न--कभी नहीं; आत्मा--आत्मा; अवसीदति--वंचित होगा; अस्मिनू--पदार्थ में; ते--तुम्हारा; वर्षीयान्‌ू--सदैवबढ़ती हुई; मत्‌--मेरी; अनुग्रह:--अहैतुकी कृपा।

चूँकि तुमने जनसंख्या को असंख्य रूप में बढ़ाने तथा अपनी सेवा के प्रकारों को विस्तारदेने की इच्छा प्रकट की है, अतः तुम इस विषय से कभी भी वंचित नहीं होगे, क्योंकि सभीकालों में तुम पर मेरी अहैतुकी कृपा बढ़ती ही जायेगी।

ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्‍्त्वां रजोगुण: ।

यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजा: संसजतोउपि ते ॥

३५॥

ऋषिम्‌--ऋषि को; आद्यम्‌--सर्वप्रथम; न--कभी नहीं; बध्नाति--पास फटकता है; पापीयान्‌--पापी; त्वामू--तुम; रज:-गुण:--रजोगुण; यत्‌--क्योंकि; मन:--मन; मयि--मुझमें; निर्बद्धम्‌--लगे रहने पर; प्रजा:--सन्तति; संसृजतः--उत्पन्न करतेहुए; अपि-- भी; ते--तुम्हारे |

तुम आदि ऋषि हो और तुम्हारा मन सदैव मुझमें स्थिर रहता है इसीलिए विभिन्न सन्ततियाँउत्पन्न करने के कार्य में लगे रहने पर भी तुम्हारे पास पापमय रजोगुण फटक भी नहीं सकेगा।

ज्ञातोहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोपि देहिनाम्‌ ।

यम्मां त्वं मन्यसेयुक्त भूतेन्द्रियगुणात्मभि: ॥

३६॥

ज्ञातः--ज्ञात; अहम्‌--मैं; भवता--तुम्हारे द्वारा; तु--लेकिन; अद्य--आज; दुः--कठिन; विज्ञेय:--जाना जा सकना; अपि--के बावजूद; देहिनामू--बद्धजीव के लिए; यत्‌--क्योंकि; मामू--मुझको; त्वम्‌--तुम; मन्यसे--समझते हो; अयुक्तम्‌-बिनाबने हुए; भूत-- भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय-- भौतिक इन्द्रियाँ; गुण-- भौतिक गुण; आत्मभि:ः--तथा मिथ्या अभिमान यथा बद्धआत्मा द्वारा |

यद्यपि मैं बद्ध आत्मा द्वारा सरलता से ज्ञेय नहीं हूँ, किन्तु आज तुमने मुझे जान लिया है,क्योंकि तुम जानते हो कि मैं किसी भौतिक वस्तु से विशेष रूप से पाँच स्थूल तथा तीन सूक्ष्मतत्त्वों से नहीं बना हूँ।

तुभ्यं मद्विचिकित्सायामात्मा मे दर्शितोबहिः ।

नालेन सलिले मूलं॑ पुष्करस्य विचिन्बतः ॥

३७॥

तुभ्यम्‌--तुमको; मत्‌--मुझको; विचिकित्सायाम्‌--जानने के तुम्हारे प्रयास करने पर; आत्मा--आत्मा; मे--मेरा; दर्शित: --प्रदर्शित; अबहि:-- भीतर से; नालेन--डंठल से; सलिले--जल में; मूलम्‌--जड़; पुष्करस्थ--आदि स्त्रोत कमल का;विचिन्वत:--चिंतन करते हुए।

जब तुम यह सोच-विचार कर रहे थे कि तुम्हारे जन्म के कमल-नाल के डंठल का कोईस्त्रोत है कि नहीं और तुम उस डंठल के भीतर प्रविष्ट भी हो गये थे, तब तुम कुछ भी पता नहींलगा सके थे।

किन्तु उस समय मैंने भीतर से अपना रूप प्रकट किया था।

यच्चकर्थाड़ु मत्स्तोत्रं मत्कथाभ्युदयाड्वितम्‌ ।

यद्वा तपसि ते निष्ठा स एब मदनुग्रह: ॥

३८ ॥

यत्‌--वह जो; चकर्थ--सम्पन्न किया; अड्र--हे ब्रह्मा; मत्‌-स्तोत्रम्‌ू-मेरे लिए प्रार्थना; मत्‌-कथा--मेरे कार्यकलापों के विषयमें शब्द; अभ्युदय-अड्भितम्‌-मेरी दिव्य लीलाओं की परिगणना करते हुए; यत्‌--या जो; वा--अथवा; तपसि--तपस्या में;ते--तुम्हारी; निष्ठा-- श्रद्धा; सः--वह; एष:--ये सब; मत्‌--मेरी; अनुग्रह:-- अहैतुकी कृपा |

हे ब्रह्मा, तुमने मेरे दिव्य कार्यों की महिमा की प्रशंसा करते हुए जो स्तुतियाँ की हैं, मुझेसमझने के लिए तुमने जो तपस्याएँ की हैं तथा मुझमें तुम्हारी जो हढ़ आस्था है--इन सबों कोतुम मेरी अहैतुकी कृपा ही समझो।

प्रीतोहमस्तु भद्वं ते लोकानां विजयेच्छया ।

यदस्तौषीर्गुणमयं निर्गुणं मानुवर्णयन्‌ ॥

३९॥

प्रीत:ः--प्रसन्न; अहम्‌--मैं; अस्तु--ऐसा ही हो; भद्रमू--समस्त आशीर्वाद; ते--तुमको; लोकानाम्‌--लोकों का; विजय--गुणगान की; इच्छया--तुम्हारी इच्छा से; यत्‌--वह जो; अस्तौषी:--तुमने प्रार्थना की है; गुण-मयम्‌--दिव्य गुणों का वर्णनकरते हुए; निर्गुणम्‌--यद्यपि मैं समस्त भौतिक गुणों से रहित हूँ; मा--मुझको; अनुवर्णयन्‌--अच्छे ढंग से वर्णन करते हुए।

मेरे दिव्य गुण जो कि संसारी लोगों को सांसारिक प्रतीत होते हैं, उनका जो वर्णन तुम्हारेद्वारा प्रस्तुत किया गया है उससे मैं अतीव प्रसन्न हूँ।

अपने कार्यो से समस्त लोकों को महिमामयकरने की जो तुम्हारी इच्छा है उसके लिए मैं तुम्हें वर देता हूँ।

य एतेन पुमात्रित्य॑ स्तुत्वा स्तोत्रेण मां भजेतू ।

तस्याशु सम्प्रसीदेयं सर्वकामवरेश्वर: ॥

४०॥

यः--जो कोई; एतेन--इतने से; पुमानू--मनुष्य; नित्यमू--नियमित रूप से; स्तुत्वा--स्तुति करके; स्तोत्रेण--श्लोकों से;माम्‌--मुझको; भजेत्‌--पूजे; तस्य--उसकी; आशु--अतिशीघ्र; सम्प्रसीदेयम्‌--मैं पूरा करूँगा; सर्व--समस्त; काम--इच्छाएँ; वर-ईश्वरः --समस्त वरों का स्वामी ।

जो भी मनुष्य ब्रह्म की तरह प्रार्थना करता है और इस तरह जो मेरी पूजा करता है, उसे शीघ्रही यह वर मिलेगा कि उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हों, क्योंकि मैं समस्त वरों का स्वामी हूँ।

पूर्तन तपसा यज्लैदनिर्योगसमाधिना ।

राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम्‌ ॥

४१॥

पूर्तेन-- परम्परागत अच्छे कार्य द्वारा; तपसा--तपस्या से; यज्जै:--यज्ञों के द्वारा; दानैः--दान के द्वारा; योग--योग द्वारा;समाधिना--समाधि द्वारा; राद्धमू--सफलता; नि: श्रेयसमू--अन्ततोगत्वा लाभप्रद; पुंसामू--मनुष्य की; मत्‌--मेरी; प्रीति: --तुष्टि; तत्तत-वित्‌--दक्ष अध्यात्मवादी; मतमू--मत।

दक्ष अध्यात्मवादियों का यह मत है कि परम्परागत सत्कर्म, तपस्या, यज्ञ, दान, योग कर्म,समाधि आदि सम्पन्न करने का चरम लक्ष्य मेरी तुष्टि का आवाहन करना है।

अहमात्मात्मनां धातः प्रेष्ठ: सन्प्रेयसामपि ।

अतो मयि रतिं कुयहिहादिरयत्कृते प्रिय: ॥

४२॥

अहम्‌ू-मैं; आत्मा--परमात्मा; आत्मनाम्‌--अन्य सारी आत्माओं का; धात:--निदेशक; प्रेष्ठ: --प्रियतम; सन्‌--होकर;प्रेयसाम्‌--समस्त प्रिय वस्तुओं का; अपि--निश्चय ही; अत:--इसलिए; मयि--मेरे प्रति; रतिम्‌--अनुरक्ति; कुर्यात्‌ू--करे;देह-आदि:--शरीर तथा मन; यत्‌-कृते--जिसके कारण; प्रिय:--अत्यन्त प्रियमैं प्रत्येक जीव का परमात्मा हूँ।

मैं परम निदेशक तथा परम प्रिय हूँ।

लोग स्थूल तथा सूक्ष्मशरीरों के प्रति झूठे ही अनुरक्त रहते हैं; उन्हें तो एकमात्र मेरे प्रति अनुरक्त होना चाहिए।

सर्ववेदमयेनेदमात्मनात्मात्मयोनिना ।

प्रजा: सृज यथापूर्व याश्व मय्यनुशेरते ॥

४३॥

सर्व--समस्त; वेद-मयेन--पूर्ण वैदिक ज्ञान के अधीन; इृदम्‌--यह; आत्मना--शरीर द्वारा; आत्मा--तुम; आत्म-योनिना--सीधे भगवान्‌ से उत्पन्न; प्रजा:--जीव; सृज--उत्पन्न करो; यथा-पूर्वम्‌--पहले की ही तरह; या:--जो; च-- भी; मयि--मुझमें ;अनुशेरते--स्थित हैं।

मेरे आदेशों का पालन करके तुम पहले की तरह अपने पूर्ण बैदिक ज्ञान से तथासर्वकारण-के-कारण-रूप मुझसे प्राप्त अपने शरीर द्वारा जीवों को उत्पन्न कर सकते हो।

मैत्रेय उबाचतस्मा एवं जगत्स्ष्टे प्रधानपुरुषे श्वरः ।

व्यज्येदं स्वेन रूपेण कझ्जनाभस्तिरोदथे ॥

४४॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; तस्मै-- उससे; एवम्‌--इस प्रकार; जगत््‌-स्त््टे--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा के प्रति; प्रधान-पुरुष-ईश्वर:-- आदि भगवान्‌; व्यज्य इदम्‌--यह आदेश देकर; स्वेन--अपने; रूपेण --स्वरूप द्वारा; कञ्ल-नाभ:-- भगवान्‌ नारायण;तिरोदधे--अन्तर्धान हो गये |

मैत्रेय मुनि ने कहा : ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा ब्रह्म को विस्तार करने का आदेश देकर आदिभगवान्‌ अपने साकार नारायण रूप में अन्तर्धान हो गये।

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