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अध्याय आठ: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा की अभिव्यक्ति

3.8मैत्रेय उवाचसत्सेवनीयो बत पूरुवंशोयल्लोकपालो भगवत्प्रधान:।

बभूविथेहाजितकीर्तिमालांपदे पदे नूतनयस्यभीक्षणम्‌ ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच-- श्रीमैत्रेय मुनि ने कहा; सत्‌-सेवनीय:--शुद्ध भक्तों की सेवा करने का पात्र; बत--ओह, निश्चय ही; पूरू-बंश:--राजा पूरु का वंश; यत्‌--क्योंकि; लोक-पाल:--राजा हैं; भगवत्‌-प्रधान:-- भगवान्‌ के प्रति मुख्य रूप से अनुरक्त;बभूविथ--तुम भी उत्पन्न थे; हह--इसमें; अजित--अजेय भगवान्‌; कीर्ति-मालाम्‌--दिव्य कार्यों की श्रृंखला; पदे पदे--प्रत्येक पग पर; नूतनयसि--नवीन से नवीनतर बनते हो; अभीक्ष्णमम्‌--सदैव।

महा-मुनि मैत्रेय ने विदुर से कहा : राजा पूरु का राजवंश शुद्ध भक्तों की सेवा करने केलिए योग्य है, क्योंकि उस वंश के सारे उत्तराधिकारी भगवान्‌ के प्रति अनुरक्त हैं।

तुम भी उसीकुल में उत्पन्न हो और यह आश्चर्य की बात है कि तुम्हारे प्रयास से भगवान्‌ की दिव्य लीलाएँप्रतिक्षण नूतन से नूतनतर होती जा रही हैं।

सोउहं नृणां क्षुल्लसुखाय दु:खंमहदगतानां विरमाय तस्य ।

प्रवर्तये भागवतं पुराणं यदाह साक्षाद्धगवानृषि भ्य: ॥

२॥

सः--वह; अहम्‌-मैं; नृणाम्‌--मनुष्यों के; क्षुलल--अत्यल्प; सुखाय--सुख के लिए; दुःखम्‌--दुख; महत्‌-- भारी;गतानाम्‌-को प्राप्त; विरमाय--शमन हेतु; तस्थ--उसका; प्रवर्तये--प्रारम्भ में; भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत; पुराणम्‌--पुराणमें; यत्‌ू--जो; आह--कहा; साक्षात्‌--प्रत्यक्ष; भगवानू-- भगवान्‌ ने; ऋषिभ्य:--ऋषियों से |

अब मैं भागवत पुराण से प्रारम्भ करता हूँ जिसे भगवान्‌ ने प्रत्यक्ष रूप से महान्‌ ऋषियों सेउन लोगों के लाभार्थ कहा था, जो अत्यल्प आनन्द के लिए अत्यधिक कष्ट में फँसे हुए हैं।

आसीनमुर्व्या भगवन्तमाद्यंसड्डूर्षणं देवमकुण्ठसत्त्वम्‌ ।

विवित्सवस्तत्त्वमत: परस्यकुमारमुख्या मुनयोउन्वपृच्छन्‌ ॥

३॥

आसीनमू--विराजमान; उर्व्याम्‌-ब्रह्माण्ड की तली पर; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌ को; आद्यम्‌ू--आदि; सद्डूर्षणम्‌--संकर्षण को;देवम्‌--भगवान्‌; अकुण्ठ-सत्त्वम्‌--अबाध ज्ञान; विवित्सव: --जानने के लिए उत्सुक; तत्त्वम्‌ अत:--इस प्रकार का सत्य;परस्य-- भगवान्‌ के विषय में; कुमार--बाल सन्त; मुख्या: --इत्यादि, प्रमुख; मुनयः--मुनियों ने; अन्वपृच्छन्‌ू--इसी तरह सेपूछा

कुछ काल पूर्व तुम्हारी ही तरह कुमार सन्तों में प्रमुख सनत्‌ कुमार ने अन्य महर्षियों के साथ जिज्ञासावश ब्रह्माण्ड की तली में स्थित भगवान्‌ संकर्षण से भगवान्‌ वासुदेव विषयक सत्यों केबारे में पूछा था।

स्वमेव धिष्ण्यं बहु मानयन्तंयद्वासुदेवाभिधमामनन्ति ।

प्रत्यग्धृताक्षाम्बुजकोशमीषद्‌उन्मीलयन्तं विबुधोदयाय ॥

४॥

स्वमू-स्वयं; एब--इस प्रकार; धिष्ण्यमू--स्थित; बहु--अत्यधिक; मानयन्तम्‌--माननीय; यत्‌--जो; वासुदेव-- भगवान्‌वासुदेव; अभिधम्‌-- नामक; आमनन्ति-- स्वीकार करते हैं; प्रत्यकू-धृत-अक्ष-- भीतर झाँकने के लिए टिकी आँखें; अम्बुज-कोशम्‌--कमल सहश नेत्र; ईषघत्‌--कुछ-कुछ; उनन्‍्मीलयन्तम्‌--खुली हुईं; विबुध--अत्यन्त विद्वान ऋषियों की; उदयाय--प्रगति के लिए

उस समय भगवान्‌ संकर्षण अपने परमेश्वर का ध्यान कर रहे थे जिन्हें विद्वज्नन भगवान्‌वासुदेव के रूप में सम्मान देते हैं।

किन्तु महान्‌ पंडित मुनियों की उन्नति के लिए उन्होंने अपनेकमलवत्‌ नेत्रों को कुछ-कुछ खोला और बोलना शुरू किया।

स्वर्धुन्युदाद्रं: स्‍्वजटाकलापै-रुपस्पृशन्तश्चरणोपधानम्‌ ।

पद्म यरदर्चन्त्यहिराजकन्या:सप्रेम नानाबलिभिववरार्था: ॥

५॥

स्वर्धुनी-उद--गंगा के जल से; आर्द्रै:-- भीगे हुए; स्व-जटा--बालों का गुच्छा; कलापै: --सिर पर स्थित; उपस्पृशन्तः--इसतरह छूने से; चरण-उपधानम्‌--उनके चरणों की शरण; पद्मम्‌ू--कमल चरण; यत्‌--जो; अर्चन्ति--पूजा करते हैं; अहि-राज--सर्पों का राजा; कन्या: --पुत्रियाँ; स-प्रेम--अतीव भक्ति समेत; नाना--विविध; बलिभि:--साज-सामग्री द्वारा; बर-अर्था:--पतियों की इच्छा से।

चूँकि मुनिगण गंगानदी के माध्यम से उच्चतर लोकों से निम्नतर भाग में आये थे,फलस्वरूप उनके सिर के बाल भीगे हुए थे।

उन्होंने भगवान्‌ के उन चरणकमलों का स्पर्श कियाजिनकी पूजा नागराज की कन्याओं द्वारा अच्छे पति की कामना से विविध सामग्री द्वारा की" जाती है।

मुहुर्गुणन्तो बचसानुराग-स्खलत्पदेनास्य कृतानि तज्ज्ञा: ।

किरीटसाहस्त्रमणिप्रवेकप्रद्योतितोद्यमफणासहस्त्रमू ॥

६॥

मुहुः--बार बार; गृणन्त:--गुणगान करते; वचसा--शब्दों से; अनुराग--अतीव स्नेह से; स्खलत्‌ू-पदेन--सम लय के साथ;अस्य--भगवान्‌ के; कृतानि--कार्यकलाप; तत्‌-ज्ञाः:--लीलाओं के जानने वाले; किरीट--मुकुट; साहस्त्र--हजारों; मणि-प्रवेक--मणियों के चमचमाते तेज; प्रद्योतित--उद्भासित; उद्याम--उठे हुए; फणा--फन; सहस्त्रमू--हजारों |

सनत्‌ कुमार आदि चारों कुमारों ने जो भगवान्‌ की दिव्य लीलाओं के विषय में सब कुछजानते थे, स्नेह तथा प्रेम से भरे चुने हुए शब्दों से लय सहित भगवान्‌ का गुणगान किया।

उससमय भगवान्‌ संकर्षण अपने हजारों फनों को उठाये हुए अपने सिर की चमचमाती मणियों सेतेज बिखेरने लगे।

प्रोक्त किलैतद्धगवत्तमेननिवृत्तिधर्माभिरताय तेन ।

सनत्कुमाराय स चाह पृष्ठ:साड्ख्यायनायाडु धृतब्रताय ॥

७॥

प्रोक्तमू--कहा गया था; किल--निश्चय ही; एतत्‌--यह; भगवत्तमेन-- भगवान्‌ संकर्षण द्वारा; निवृत्ति--वैराग्य; धर्म-अभिरताय--इस धार्मिक ब्रत को धारण करने वाले के लिए; तेन--उसके द्वारा; सनत्‌-कुमाराय--सनत्‌ कुमार को; सः--उसने; च-- भी; आह--कहा; पृष्ट: --पूछे जाने पर; साड्ख्यायनाय--सांख्यायन नामक महर्षि को; अड्--हे विदुर; धृत-ब्रताय--ब्रत धारण करने वाले को |

इस तरह भगवान्‌ संकर्षण ने उन महर्षि सनत्कुमार से श्रीमद्भागवत का भावार्थ कहाजिन्होंने पहले से वैराग्य का व्रत ले रखा था।

सनत्कुमार ने भी अपनी पारी में सांख्यायन मुनिद्वारा पूछे जाने पर श्रीमद्भागवत को उसी रूप में बतलाया जिस रूप में उन्होंने संकर्षण से सुनाथा।

साड्ख्यायनः पारमहंस्यमुख्यो विवक्षमाणो भगवद्विभूती: ।

जगाद सोस्मदगुरवेडन्वितायपराशरायाथ बृहस्पतेश्व ॥

८ ॥

साइ्ख्यायन:--महर्षि सांख्यायन; पारमहंस्य-मुख्य:--समस्त अध्यात्मवादियों में प्रमुख; विवक्षमाण:--बाँचते समय; भगवत्‌ू-विभूती:-- भगवान्‌ की महिमाएँ; जगाद--बतलाया; सः--उसने; अस्मत्‌--मेरे; गुरवे--गुरु को; अन्विताय--अनुसरण किया;'पराशराय--पराशर मुनि के लिए; अथ बृहस्पतेः च--बृहस्पति को भी

सांख्यायन मुनि अध्यात्मवादियों में प्रमुख थे और जब वे श्रीमद्भागवत के शब्दों में भगवान्‌की महिमाओं का वर्णन कर रहे थे तो ऐसा हुआ कि मेरे गुरु पराशर तथा बृहस्पति दोनों नेउनको सुना।

प्रोवाच मह्यं स दयालुरुक्तोमुनि: पुलस्त्येन पुराणमाद्यम्‌ ।

सोहं तवैतत्कथयामि वत्सश्रद्धालवे नित्यमनुत्रताय ॥

९॥

प्रोवाच--कहा; महाम्‌--मुझसे; सः-- उसने; दयालु:--दयालु; उक्त: --उपर्युक्त; मुनि:--मुनि; पुलस्त्येन--पुलस्त्य मुनि से;पुराणम्‌ आद्यम्‌--समस्त पुराणों में अग्रगण्य; सः अहम्‌--और वह भी मैं; तब--तुम से; एतत्‌--यह; कथयामि--कहता हूँ;बत्स--पुत्र; श्रद्धालवे-- श्रद्धालु के लिए; नित्यमू--सदैव; अनुब्रताय-- अनुयायी के लिए

जैसा कि पहले कहा जा चुका है महर्षि पराशर ने महर्षि पुलस्त्य के द्वारा कहे जाने पर मुझेअग्रगण्य पुराण ( भागवत ) सुनाया।

हे पुत्र, जिस रूप में उसे मैंने सुना है उसी रूप में में तुम्हारेसम्मुख उसका वर्णन करूँगा, क्योंकि तुम सदा ही मेरे श्रद्धालु अनुयायी रहे हो।

जज फुत क्‍जलानचाज पजारएएणजयन्निद्रयामीलितहृड्न्यमीलयत्‌ ।

अहीन्द्रतल्पेदधिशयान एक:कृतक्षण: स्वात्मरतौ निरीह: ॥

१०॥

उद--जल में; आप्लुतम्‌--डूबे, निमग्न; विश्वम्‌--तीनों जगतों को; इृदमू--इस; तदा--उस समय; आसीत्‌--यह इसी तरह था;यत्‌--जिसमें; निद्रया--नींद में; अमीलित--बन्द की; हक्‌--आँखें; न्‍्यमीलयत्‌--पूरी तरह से बन्द नहीं; अहि-इन्द्र--महान्‌सर्प अनन्त; तल्पे--शय्या में; अधिशयान:--लेटे हुए; एक:--एकाकी; कृत-क्षण:--व्यस्त; स्व-आत्म-रतौ--अपनी अन्तरंगाशक्ति का आनन्द लेते; निरीह:--बहिरंगा शक्ति के किसी अंश के बिना।

उस समय जब तीनों जगत जल में निमग्न थे तो गर्भोदकशायी विष्णु महान्‌ सर्प अनन्त कीअपनी शय्या में अकेले लेटे थे।

यद्यपि वे अपनी निजी अन्तरंगा शक्ति में सोये हुए लग रहे थेऔर बहिरंगा शक्ति के प्रभाव से मुक्त थे, किन्तु उनकी आँखें पूर्णतया बन्द नहीं थीं।

सोउन्तः शरीरेउर्पितभूतसूक्ष्म:कालात्मिकां शक्तिमुदीरयाण: ।

उवास तस्मिन्सलिले पदे स्वेयथानलो दारुणि रुद्धवीर्य: ॥

११॥

सः--भगवान्‌; अन्तः-- भीतर; शरीरे--दिव्य शरीर में; अर्पित-- रखा हुआ; भूत-- भौतिक तत्त्व; सूक्ष्म: --सूक्ष्म; काल-आत्मिकाम्‌ू--काल का स्वरूप; शक्तिमू--शक्ति; उदीरयाण:--अर्जित करते हुए; उबास--निवास किया; तस्मिन्‌--उस में;सलिले--जल में; पदे--स्थान में; स्वे--निजी; यथा--जिस तरह; अनलः--अग्नि; दारुणि--लक ड़ी में; रुद्ध-वीर्य:--लीनशक्ति

जिस तरह ईंधन के भीतर अग्नि की शक्ति छिपी रहती है उसी तरह भगवान्‌ समस्त जीवोंको उनके सूक्ष्म शरीरों में लीन करते हुए प्रलय के जल के भीतर पड़े रहे।

वे काल नामक स्वतःअर्जित शक्ति में लेटे हुए थे।

चतुर्युगानां च सहस्त्रमप्सुस्वपन्स्वयोदीरितया स्वशकत्या ।

कालाख्ययासादितकर्मतन्त्रोलोकानपीतान्दहृशे स्वदेहे ॥

१२॥

चतुः--चार; युगानाम--युगों के; च-- भी; सहस्त्रमू--एक हजार; अप्सु--जल में; स्वपन्‌ू--निद्रा में स्वप्न देखते हुए; स्वया--अपनी अन्तरंगा शक्ति के साथ; उदीरितया--आगे विकास के लिए; स्व-शकत्या--अपनी निजी शक्ति से; काल-आख्यया--काल नाम से; आसादित--इस तरह व्यस्त रहते हुए; कर्म-तन्त्र:ः--सकाम कर्मो के मामले में; लोकान्‌--सारे जीवों को;अपीतान्‌ू--नीलाभ; ददहशे-- देखा; स्व-देहे -- अपने ही शरीर में |

भगवान्‌ अपनी अन्तरंगा शक्ति में चार हजार युगचक्रों तक लेटे रहे और अपनी बहिरंगाशक्ति से जल के भीतर सोते हुए प्रतीत होते रहे।

जब सारे जीव कालशक्ति द्वारा प्रेरित होकरअपने सकाम कर्मों के आगे के विकास के लिए बाहर आ रहे थे तो उन्होंने अपने दिव्य शरीर कोनीले रंग का देखा।

तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्ट दृष्टेरअन्तर्गतो$र्थो रजसा तनीयान्‌ ।

गुणेन कालानुगतेन विद्धःसूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात्‌ ॥

१३॥

तस्य--उसका; अर्थ--विषय; सूक्ष्म--सूक्ष्म; अभिनिविष्ट-दृष्टे:--जिसका ध्यान स्थिर किया गया था, उसका; अन्त:-गत:--आन्तरिक; अर्थ: -- प्रयोजन; रजसा--रजोगुण से; तनीयान्‌--अत्यन्त सूक्ष्म; गुणेन--गुणों के द्वारा; काल-अनुगतेन--कालक्रम में; विद्ध:ः--श्षुब्ध किया गया; सूष्यन्‌--उत्पन्न करते हुए; तदा--तब; अभिद्यत--वेध दिया; नाभि-देशात्‌--उदर से |

सृष्टि का सूक्ष्म विषय-तत्व, जिस पर भगवान्‌ का ध्यान टिका था, भौतिक रजोगुण द्वाराविश्षुब्ध हुआ।

इस तरह से सृष्टि का सूक्ष्म रूप उनके उदर ( नाभि ) से बाहर निकल आया।

स पद्यकोशः सहसोदतिष्ठत्‌कालेन कर्मप्रतिबोधनेन ।

स्वरोचिषा तत्सलिलं विशालंविद्योतयन्नर्क इवात्मयोनि: ॥

१४॥

सः--वह; पढ-कोश:--कमल के फूल की कली; सहसा--एकाएक; उदतिष्ठत्‌-- प्रकट हुई; कालेन--काल के द्वारा;कर्म--सकाम कर्म; प्रतिबोधनेन--जगाते हुए; स्व-रोचिषा-- अपने ही तेज से; तत्‌ू--वह; सलिलम्‌--प्रलय का जल;विशालम्‌--अपार; विद्योतवन्‌--प्रकाशित करते हुए; अर्क:--सूर्य; इब--सहृश; आत्म-योनि:--विष्णु से उत्पन्न |

जीवों के सकाम कर्म के इस समग्र रूप ने भगवान्‌ विष्णु के शरीर से प्रस्फुटित होते हुएकमल की कली का स्वरूप धारण कर लिया।

फिर उनकी परम इच्छा से इसने सूर्य की तरह हरवस्तु को आलोकित किया और प्रलय के अपार जल को सुखा डाला।

तल्लोकपदां स उ एव विष्णु:प्रावीविशत्सर्वगुणावभासम्‌ ।

तस्मिन्स्वयं वेदमयो विधातास्वयम्भुवं यं सम वदन्ति सोभूत्‌ ॥

१५॥

तत्‌--उस; लोक--ब्रह्माण्ड के; पढ्ममू--कमल को; सः--वह; उ--निश्चय ही; एब--वस्तुत: ; विष्णु: -- भगवान्‌;प्रावीविशत्‌-- भीतर घुसा; सर्व--समस्त; गुण-अवभासम्‌--समस्त गुणों का आगार; तस्मिन्‌--जिसमें; स्वयम्‌--खुद; बेद-मयः--साक्षात्‌ वैदिक; विधाता--ब्रह्माण्ड का नियंत्रक; स्वयम्‌-भुवम्‌--स्वतः उत्पन्न; यमू--जिसको; स्म--भूतकाल में;बदन्ति--कहते हैं; सः--वह; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ |

उस ब्रह्माण्डमय कमल पुष्प के भीतर भगवान्‌ विष्णु परमात्मा रूप में स्वयं प्रविष्ट हो गयेऔर जब यह इस तरह भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों से गर्भित हो गया तो साक्षात्‌ वैदिक ज्ञानउत्पन्न हुआ जिसे हम स्वयंभुव ९ ब्रह्मा ) कहते हैं।

तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया-मवस्थितो लोकमपश्यमान: ।

परिक्रमन्व्योम्नि विवृत्तनेत्र-श्वत्वारि लेभेडनुदिशं मुखानि ॥

१६॥

तस्याम्‌ू--उसमें; सः--वे; च--तथा; अम्भ: --जल; रुह-कर्णिकायाम्‌--कमल का कोश; अवस्थित:--स्थित हुआ;लोकमू्‌--जगत; अपश्यमान:--देख पाये बिना; परिक्रमन्‌--परिक्रमा करते हुए; व्योग्नि--आकाश में; विवृत्त-नेत्र: --आँखेचलाते हुए; चत्वारि--चार; लेभे--प्राप्त किये; अनुदिशम्‌--दिशाओं के रूप में; मुखानि--सिर।

कमल के फूल से उत्पन्न हुए ब्रह्मा जगत को नहीं देख सके यद्यपि वे कोश में स्थित थे।

अतः उन्होंने सारे अन्तरिक्ष की परिक्रमा की और सभी दिशाओं में अपनी आँखें घुमाते समयउन्होंने चार दिशाओं के रूप में चार सिर प्राप्त किये।

तस्माद्युगान्तश्वसनावघूर्ण-जलोर्मिचक्रात्सलिलाद्विरूढम्‌ ।

उपाश्रितः कञ्जमु लोकतत्त्वंनात्मानमद्धाविददादिदेव: ॥

१७॥

तस्मात्‌ू--वहाँ से; युग-अन्त--युग के अन्त में; श्रसन--प्रलय की वायु; अवधूर्ण--गति के कारण; जल--जल; ऊर्मि-चक्रात्‌-- भँवरों में से; सलिलात्‌--जल से; विरूढम्‌--उन पर स्थित; उपाभ्रित:--आश्रय के रूप में; कञ्ममू--कमल के फूलको; उ--आश्चर्य में; लोक-तत्त्वम्‌--सृष्टि का रहस्य; न--नहीं; आत्मानम्‌--स्वयं को; अद्धा--पूर्णरूपेण; अविदत्‌--समझसका; आदि-देव:--प्रथम देवता ।

उस कमल पर स्थित ब्रह्मा न तो सृष्टि को, न कमल को, न ही अपने आपको भलीभाँतिसमझ सके ।

युग के अन्त में प्रलय वायु जल तथा कमल को बड़ी-बड़ी भँवरों में हिलाने लगी।

कक एष योसावहमब्जपृष्ठएतत्कुतो वाब्जमनन्यदप्सु ।

अस्ति हाधस्तादिह किड्जनैत-दथिष्ठितं यत्र सता नु भाव्यम्‌ ॥

१८॥

कः--कौन; एष: --यह; यः असौ अहम्‌--जो मैं हूँ; अब्ज-पृष्ठे--कमल के ऊपर; एतत्‌--यह; कुतः--कहाँ से; वा-- अथवा;अब्जमू--कमल का फूल; अनन्यत्‌--अन्यथा; अप्सु--जल में; अस्ति-- है; हि--निश्चय ही; अधस्तात्‌--नीचे से; इह--इस में;किज्लन--कुछ भी; एतत्‌--यह; अधिष्ठितम्‌--स्थित; यत्र--जिसमें; सता--स्वत:; नु--या नहीं; भाव्यम्‌ू--होना चाहिए

ब्रह्माजी ने अपनी अनभिज्ञता से विचार किया : इस कमल के ऊपर स्थित मैं कौन हूँ? यह( कमल ) कहाँ से फूटकर निकला है? इसके नीचे कुछ अवश्य होना चाहिए और जिससे यहकमल निकला है उसे जल के भीतर होना चाहिए।

स इत्थमुद्वीक्ष्य तदब्जनाल-नाडीभिरन्तर्जलमाविवेश ।

नार्वग्गतस्तत्खरनालनाल-नाभि विचिन्व॑ंस्तदविन्दताज: ॥

१९॥

सः--वह ( ब्रह्मा ); इत्थम्‌--इस प्रकार से; उद्दीक्ष्य--विचार करके; तत्‌ू--वह; अब्जन--कमल; नाल--डंठल; नाडीभि:--नली द्वारा; अन्त:-जलम्‌--जल के भीतर; आविवेश--घुस गया; न--नहीं; अर्वाकु-गत:-- भीतर जाने के बावजूद; तत्‌-खर-नाल--कमल-नाल; नाल--नली; नाभिमू--नाभि की; विचिन्वन्‌--सोचते हुए; तत्‌--वह; अविन्दत--समझ गया; अजः--स्वयंभुव।

इस तरह विचार करते हुए ब्रह्मजी कमल नाल के र्ध्रों ( छिद्रों) से होकर जल के भीतरप्रविष्ट हुए।

किन्तु नाल में प्रविष्ट होकर तथा विष्णु की नाभि के निकटतम जाकर भी वे जड़( मूल ) का पता नहीं लगा पाये।

तमस्यपारे विदुरात्मसर्गविचिन्वतो भूत्सुमहांस्त्रिणेमि: ।

यो देहभाजां भयमीरयाण:परिक्षिणोत्यायुरजस्य हेति: ॥

२०॥

तमसि अपारे--ढूँढने के अज्ञानपूर्ण ढंग के कारण; विदुर--हे विदुर; आत्म-सर्गमू--अपनी सृष्टि का कारण; विचिन्ब॒तः --सोचते हुए; अभूत्‌--हो गया; सु-महान्‌--अत्यन्त महान्‌; त्रि-नेमि:--त्रिनेमी का काल; य:--जो; देह-भाजाम्‌ू--देहधारी का;भयम्‌--भय; ईरयाण: --उत्पन्न करते हुए; परिक्षिणोति--एक सौ वर्ष कम करते हुए; आयु:--आयु; अजस्य--अजन्मा का;हेतिः:--शाश्वत काल का चक्र |

हे विदुर, अपने अस्तित्व के विषय में इस तरह खोज करते हुए ब्रह्म अपने चरमकाल में पहुँच गये, जो विष्णु के हाथों में शाश्वत चक्र है और जो जीव के मन में मृत्यु-भय की क्रान्तिभय उत्पन्न करता है।

ततो निवृत्तोप्रतिलब्धकाम:स्वधिष्ण्यमासाद्य पुन: स देव: ।

शनैर्जितश्वासनिवृत्तचित्तोन्यषीददारूढसमाधियोग: ॥

२१॥

ततः--तत्पश्चात्‌; निवृत्त:--उस प्रयास से विरत होकर; अप्रतिलब्ध-काम:--वांछित लक्ष्य को प्राप्त किये बिना; स्व-धिष्ण्यमू--अपने आसन पर; आसाद्य-पहुँच कर; पुनः--फिर; सः--वह; देव:--देवता; शनैः--अविलम्ब; जित-ध्वास--श्वास को नियंत्रित करते हुए; निवृत्त--विरत; चित्त:--बुद्द्ि; न्‍्यषीदत्‌--बैठ गया; आरूढ--विश्वास में; समाधि-योग: --भगवान्‌ का ध्यान करने के लिए।

तत्पश्चात्‌ वॉछित लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ होकर वे ऐसी खोज से विमुख हो गये औरपुनः कमल के ऊपर आ गये।

इस तरह इन्द्रियविषयों को नियंत्रित करते हुए उन्होंने अपना मनपरमेश्वर पर एकाग्र किया।

कालेन सोज: पुरुषायुषाभि-प्रवृत्तयोगेन विरूढबोध: ।

स्वयं तदन्तईदयेवभातम्‌अपश्यतापश्यत यत्न पूर्वम्‌ ॥

२२॥

कालेन--कालक्रम में; सः--वह; अज: --स्वयंभुव ब्रह्मा; पुरुष-आयुषा--अपनी आयु से; अभिप्रवृत्त--लगा रहकर;योगेन--ध्यान में; विरूढद--विकसित; बोध: --बुद्द्धि: स्वयम्‌; स्वयम्‌--स्वतः ; तत्‌ अन्त:-हृदये--हृदय में; अवभातम्‌--प्रकटहुआ; अपश्यत--देखा; अपश्यत--देखा; यत्‌--जो; न--नहीं ; पूर्वम्‌ू--इसके पहले ।

अपने सौ वर्षों के बाद जब ब्रह्मा का ध्यान पूरा हुआ तो उन्होंने वांछित ज्ञान विकसित किया" जिसके फलस्वरूप वे अपने ही भीतर अपने हृदय में परम पुरुष को देख सके जिन्हें वे इसकेपूर्व महानतम्‌ प्रयास करने पर भी नहीं देख सके थे।

मृणालगौरायतशेषभोग-पर्यट्डू एकं पुरुष शयानम्‌ ।

'फणातपत्रायुतमूर्थरत्तझुभिहतध्वान्तयुगान्ततोये ॥

२३॥

मृणाल--कमल का फूल; गौर--पूरी तरह सफेद; आयत--विराट; शेष-भोग--शेषनाग का शरीर; पर्यद्ले--शय्या पर;एकम्‌--अकेले; पुरुषम्‌--परम पुरुष; शयानम्‌--लेटे हुए; फण-आतपत्र--सर्प के फन का छाता; आयुत--सज्जित; मूर्ध--सिर; रत्न--रत्न की; द्युभि:--किरणों से; हत-ध्वान्त--अँधेरा दूर हो गया; युग-अन्त--प्रलय; तोये--जल में |

ब्रह्म यह देख सके कि जल में शेषनाग का शरीर विशाल कमल जैसी श्वेत शय्या था जिसपर भगवान्‌ अकेले लेटे थे।

सारा वायुमण्डल शेषनाग के फन को विभूषित करने वाले रत्नों कीकिरणों से प्रदीप्त था और इस प्रकाश से उस क्षेत्र का समस्त अंधकार मिट गया था।

प्रेक्षां क्षिपन्तं हरितोपलादिःसब्ध्याभ्रनीवेरुरुरुक्ममूर्ध्न: ।

रत्नोदधारौषधिसौमनस्यवनस्त्रजो वेणुभुजाडुप्रिपाड्स़े: ॥

२४॥

प्रेक्षामू--दृश्य; क्षिपन्तम्‌--उपहास करते हुए; हरित--हरा; उपल--मूँगे के; अद्वेः--पर्वत का; सन्ध्या-अभ्च-नीवे: --सांध्यकालीन आकाश का वस्त्र; उरु--महान्‌; रुक्म--स्वर्ण ; मूर्धश्ध; --शिखर पर; रत्तन--रल; उदधार--झरने; औषधि--जड़ी -बूटियाँ; सौमनस्य--हृश्य का; वन-स्त्रज:--फूल की माला; वेणु--वस्त्र; भुज--हाथ; अड्घ्रिप--वृक्ष; अद्ख्रे:--पाँव |

भगवान्‌ के दिव्य शरीर की कान्ति मूँगे के पर्वत की शोभा का उपहास कर रही थी।

मूँगे कापर्वत संध्याकालीन आकाश द्वारा सुन्दर ढंग से वस्त्राभूषित होता है, किन्तु भगवान्‌ का पीतवस्त्रउसकी शोभा का उपहास कर रहा था।

इस पर्वत की चोटी पर स्वर्ण है, किन्तु रत्नजटितभगवान्‌ का मुकुट इसकी हँसी उड़ा रहा था।

पर्वत के झरने, जड़ी-बूटियाँ आदि फूलों के दृश्यके साथ मालाओं जैसे लगते हैं, किन्तु भगवान्‌ का विराट शरीर तथा उनके हाथ-पाँव रत्नों,मोतियों, तुलसीदल तथा फूलमालाओं से अलंकृत होकर उस पर्वत के दृश्य का उपहास कर रहेथे।

आयामतो विस्तरतः स्वमान-देहेन लोकत्रयसड्ग्रहेण ।

विचित्रदिव्याभरणांशुकानांकृतश्रियापाश्रितवेषदेहम्‌ ॥

२५॥

आयामतः--लम्बाई से; विस्तरत:--चौड़ाई से; स्व-मान--अपने ही माप से; देहेन--दिव्य शरीर से; लोक-त्रय--तीन( उच्चतर, मध्य तथा निम्न ) लोक; सड्ग्रहेण --पूर्ण निमग्नता द्वारा; विचित्र--नाना प्रकार का; दिव्य--दिव्य; आभरण-अंशुकानाम्‌ू--आभूषणों की किरणों से; कृत-भ्रिया अपाश्रित--उन वस्त्रों तथा आभूषणों से उत्पन्न सौन्दर्य; वेष--वेश;देहम्‌ू--दिव्य शरीर

उनके दिव्य शरीर की लम्बाई तथा चौड़ाई असीम थी और वह तीनों लोकों-उच्च, मध्यतथा निम्न-लोकों में फैली हुई थी।

उनका शरीर अद्वितीय वेश तथा विविधता सेस्वतःप्रकाशित था और भलीभाँति अलंकृत था।

पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै -रभ्यर्चतां कामदुघाडुप्रिपद्यम्‌ ।

प्रदर्शयन्तं कृपया नखेन्दु-मयूखभिन्नाडुलिचारुपत्रम्‌ ॥

२६॥

पुंसामू-मनुष्यों का; स्व-कामाय--अपनी इच्छा के अनुसार; विविक्त-मार्गं:--शक्ति मार्ग द्वारा; अभ्यर्चताम्‌--पूजित; काम-दुघ-अड्प्रि-पद्ममू-- भगवान्‌ के चरणकमल जो मनवांछित फल देने वाले हैं; प्रदर्शयन्तम्‌--उन्हें दिखलाते हुए; कृपया--अहैतुकी कृपा द्वारा; नख--नाखून; इन्दु-- चन्द्रमा सहश; मयूख--किरणें; भिन्न--विभाजित; अद्डुलि--अँगुलियाँ; चारु-पत्रमू--अतीव सुन्दर

भगवान्‌ ने अपने चरणकमलों को उठाकर दिखलाया।

उनके चरणकमल समस्त भौतिककल्मष से रहित भक्ति-मय सेवा द्वारा प्राप्त होने वाले समस्त वरों के स्त्रोत हैं।

ऐसे वर उन लोगोंके लिए होते हैं, जो उनकी पूजा शुद्ध भक्तिभाव में करते हैं।

उनके पाँव तथा हाथ के चन्द्रमासहश नाखूनों से निकलने वाली दिव्य किरणों की प्रभा ( छटा ) फूल की पंखुड़ियों जैसी प्रतीतहो रही थी।

तमहं भजामि में अंकित किया है।

मुखेन लोकार्तिहरस्मितेनपरिस्फुरत्कुण्डलमण्डितेन ।

शोणायितेनाधरबिम्बभासाप्रत्यहयन्तं सुनसेन सुप्वा ॥

२७॥

मुखेन--मुख के संकेत से; लोक-आर्ति-हर--भक्तों के कष्ट को हरनेवाले; स्मितेन--हँसी के द्वारा; परिस्फुरत्‌--चकाचौं धकरते; कुण्डल--कुण्डल से; मण्डितेन--सुसज्जित; शोणायितेन--स्वीकार करते हुए; अधर--अपने होठों का; बिम्ब--प्रतिबिम्ब; भासा--किरणें; प्रत्यहयन्तम्‌-- आदान-प्रदान करते हुए; सु-नसेन--अपनी मनोहर नाक से; सु-प्वा--तथा मनोहरभौहों से |

उन्होंने भक्तों की सेवा भी स्वीकार की और अपनी सुन्दर हँसी से उनका कष्ट मिटा दिया।

कुंडलों से सज्जित उनके मुख का प्रतिबिम्ब अत्यन्त मनोहारी था, क्योंकि यह उनके होठों कीकिरणों तथा उनकी नाक एवं भौंहों की सुन्दरता से जगमगा रहा था।

कदम्बकिज्लल्कपिशड्रवाससास्वलड्डू तं मेखलया नितम्बे ।

हारेण चानन्तधनेन वत्सश्रीवत्सवक्ष:स्थलवल्लभेन ॥

२८॥

कदम्ब-किल्लल्क--कदम्ब फूल की केसरिया धूल; पिशड्ग--रंगीन परिधान; वाससा--वस्त्रों से; सु-अलड्डू तम्‌--अच्छी तरहसुसज्जित; मेखलया--करधनी से; नितम्बे--कमर पर; हारेण--हार से; च-- भी; अनन्त--अत्यन्त; धनेन--मूल्यवान; वत्स--हे विदुर; श्रीवत्स--दिव्य चिह्न का; वक्ष:-स्थल--छाती पर; वलल्‍लभेन--अत्यन्त मनोहर |

हे विदुर, भगवान्‌ की कमर पीले वस्त्र से ढकी थी जो कदम्ब फूल के केसरिया धूल जैसाप्रतीत हो रहा था और इसको अतीव सज्जित करधनी घेरे हुए थी।

उनकी छाती श्रीवत्स चिन्ह सेतथा असीम मूल्य वाले हार से शोभित थी।

परार्ध्यकेयूरमणिप्रवेक -पर्यस्तदोर्दण्डसहसत्रशाखम्‌ ।

अव्यक्तमूलं भुवनाडूप्रिपेन्द्र-महीन्द्रभोगैरधिवीतवल्शम्‌ ॥

२९॥

परार्ध्य--अत्यन्त मूल्यवान; केयूर-- आभूषण; मणि-प्रवेक--अत्यन्त मूल्यवान मणि; पर्यस्त--फैलाते हुए; दोर्दण्ड-- भुजाएँ;सहस्त्र-शाखम्‌--हजारों शाखाओं से युक्त; अव्यक्त-मूलम्‌--आत्मस्थित; भुवन--विश्व; अद्धघ्रिप--वृशक्ष; इन्द्रमू--स्वामी;अहि-इन्द्र--अनन्तदेव; भोगैः--फनों से; अधिवीत--घिरा; वल्शम्‌--कंघा |

जिस तरह चन्दन वृक्ष सुगन्धित फूलों तथा शाखाओं से सुशोभित रहता है उसी तरह भगवान्‌का शरीर मूल्यवान मणियों तथा मोतियों से अलंकृत था।

वे आत्म-स्थित ( अव्यक्त मूल ) वृक्षऔर विश्व के अन्य सभी के स्वामी थे।

जिस तरह चन्दन वृक्ष अनेक सर्पों से आच्छादित रहता हैउसी तरह भगवान्‌ का शरीर भी अनन्त के फनों से ढका था।

चराचरौको भगवन्‍न्महीक्ष-महीन्द्रबन्धुं सलिलोपगूढम्‌ ।

किरीटसाहस््रहिरण्यश्रुड्र-माविर्भवत्कौस्तुभरलगर्भम्‌ ॥

३०॥

चर--गतिशील पशु; अचर--स्थिर वृक्ष; ओकः--स्थान या स्थिति; भगवत्‌-- भगवान्‌ मही ध्रम्‌--पर्वत; अहि-इन्द्र-- श्रीअनन्तदेव; बन्धुम्‌-मित्र; सलिल--जल; उपगूढम्‌--निमग्न; किरीट--मुकुट; साहस्त्र--हजारों; हिरण्य--स्वर्ण ; श्रूड़म्‌--चोटियाँ; आविर्भवत्‌--प्रकट किया; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि; रत्ल-गर्भम्‌--समुद्र |

विशाल पर्वत की भाँति भगवान्‌ समस्त जड़ तथा चेतन जीवों के लिए आवास की तरहखड़े हैं।

वे सर्पों के मित्र हैं, क्योंकि अनन्त देव उनके मित्र हैं।

जिस तरह पर्वत में हजारों सुनहरीचोटियाँ होती हैं उसी तरह अनन्त नाग के सुनहरे मुकुटों वाले हजारों फनों से युक्त भगवान्‌ दीखरहे थे।

जिस तरह पर्वत कभी-कभी रत्नों से पूरित रहता है उसी तरह उनका शरीर मूल्यवान रत्नोंसे पूर्णतया सुशोभित था।

जिस तरह कभी-कभी पर्वत समुद्र जल में डूबा रहता है उसी तरहभगवान्‌ कभी-कभी प्रलय-जल में डूबे रहते हैं।

निवीतमाम्नायमधुव्रतश्रियास्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम्‌ ।

सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमं त्रिधामभिःपरिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम्‌ ॥

३१॥

निवीतम्‌ू--इस प्रकार घिरा; आम्नाय--वैदिक ज्ञान; मधु-व्रत-भ्रिया-- सौन्दर्य में मधुर ध्वनि; स्व-कीर्ति-मय्या-- अपनी हीमहिमा से; बन-मालया--फूल की माला से; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ को; सूर्य --सूरज; इन्दु--चन्द्रमा; वायु--वायु; अग्नि--आग;अगमम्‌--न पहुँचने योग्य दुर्गम; त्रि-धामभि:--तीनों लोकों द्वारा; परिक्रमत्‌--परिक्रमा करते हुए; प्राधनिकै:--युद्ध के लिए;दुरासदम्‌--पहुँचने के लिए कठिन।

इस तरह पर्वताकार भगवान्‌ पर दृष्टि डालते हुए ब्रह्मा ने यह निष्कर्ष निकाला कि वे भगवान्‌हरि ही हैं।

उन्होंने देखा कि उनके वक्षस्थल पर पड़ी फूलों की माला वैदिक ज्ञान के मधुर गीतोंसे उनका महिमागान कर रही थी और अतीव सुन्दर लग रही थी।

वे युद्ध के लिए सुदर्शन चक्रद्वारा सुरक्षित थे और सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि इत्यादि तक उनके पास फटक नहीं सकते थे।

तहाोंव तन्नाभिसरःसरोजम्‌आत्मानमम्भ: श्वसन वियच्च ।

ददर्श देवो जगतो विधातानातः पर लोकविसर्गदृष्टि: ॥

३२॥

तहिं--अतः; एव--निश्चय ही; तत्‌ू--उसकी; नाभि--नाभि; सर:--झील; सरोजम्‌--कमल का फूल; आत्मानमू्‌--ब्रह्मा;अम्भ:--प्रलय का जल; श्वसनम्‌--सुखाने वाली वायु; वियत्‌--आकाश; च-- भी; ददर्श--देखा; देव:--देवता; जगत: --ब्रह्माण्ड का; विधाता--भाग्य का निर्माता; न--नहीं; अत: परम्‌--परे; लोक-विसर्ग--विराट जगत की सृष्टि; दृष्टि: --चितवन।

जब ब्रह्माण्ड के भाग्य विधाता ब्रह्मा ने भगवान्‌ को इस प्रकार देखा तो उसी समय उन्होंने सृष्टि पर नजर दौड़ाई।

ब्रह्मा ने विष्णु की नाभि में झील ( नाभि सरोवर ) तथा कमल देखा औरउसी के साथ प्रलयकारी जल, सुखाने वाली वायु तथा आकाश को भी देखा।

सब कुछ उन्हें इृष्टिगोचर हो गया।

स कर्मबीजं॑ रजसोपरक्तःप्रजा: सिसृक्षन्रियदेव दृष्टा ।

अस्तौद्विसर्गाभिमुखस्तमीड्य-मव्यक्तवर्त्मन्यभिवेशितात्मा ॥

३३॥

सः--वह ( ब्रह्मा ); कर्म-बीजम्‌--सांसारिक कार्यो का बीज; रजसा उपरक्त:--रजोगुण द्वारा प्रेरित; प्रजा:--जीव; सिसृक्षन्‌--सनन्‍्तान उत्पन्न करने की इच्छा से; इयत्‌--सृष्टि के सभी पाँचों कारण; एब--इस तरह; दृष्टा--देखकर; अस्तौत्‌--स्तुति की;विसर्ग--भगवानू द्वारा सृष्टि के पश्चात्‌ सृष्टि; अभिमुख:--की ओर; तम्‌--उसको; ईंड्यम्‌--पूजनीय; अव्यक्त--दिव्य;वर्त्मनि-- के मार्ग पर; अभिवेशित--स्थिर; आत्मा--मन |

इस तरह रजोगुण से प्रेरित ब्रह्मा सूजन करने के लिए उन्मुख हुए और भगवान्‌ द्वारा सुझायेगये सृष्टि के पाँच कारणों को देखकर वे सृजनशील मनोवृत्ति के मार्ग पर सादर स्तुति करनेलगे।

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