← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय छह: विश्व स्वरूप का निर्माण

3.6ऋषिरुवाचइति तासां स्वशक्तीनां सतीनामसमेत्य सः ।

प्रसुप्तलोकतन्त्राणांनिशाम्य गतिमीश्वर: ॥

१॥

ऋषि: उबाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; इति--इस प्रकार; तासाम्‌--उनका; स्व-शक्तीनाम्‌-- अपनी शक्ति; सतीनाम्‌--इस प्रकारस्थित; असमेत्य--किसी संयोग के बिना; सः--वह ( भगवान्‌ ); प्रसुप्त--निलम्बित; लोक-तन्त्राणामू--विश्व सृष्टियों में;निशाम्य--सुनकर; गतिम्‌-- प्रगति; ईश्वर: -- भगवान्‌ |

मैत्रेय ऋषि ने कहा : इस तरह भगवान्‌ ने महत्‌-तत्त्व जैसी अपनी शक्तियों के संयोग न होनेके कारण विश्व के प्रगतिशील सृजनात्मक कार्यकलापों के निलम्बन के विषय में सुना।

कालसज्ज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रम: ।

त्रयोविंशति तत्त्वानां गणं युगपदाविशत्‌ ॥

२॥

काल-सज्ज्ञामू-काली के नाम से विख्यात; तदा--उस समय; देवीम्‌-देवी को; बिभ्रत्‌ू--विनाशकारी; शक्तिमू-शक्ति;उरुक़॒मः--परम शक्तिशाली; त्रय:-विंशति-- तेईस; तत्त्वानामू--तत्त्वों के; गणम्‌--उन सभी; युगपत्‌--एक ही साथ;आविशत्‌-प्रवेश किया।

तब परम शक्तिशाली भगवान्‌ ने अपनी बहिरंगा शक्ति, देवी काली सहित तेईस तत्त्वों केभीतर प्रवेश किया, क्योंकि वे ही विभिन्न प्रकार के तत्त्वों को संमेलित करती हैं।

सोशनुप्रविष्टो भगवांश्रेष्ठारूपेण तं गणम्‌ ।

भिन्न॑ संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन्‌ ॥

३॥

सः--वह; अनुप्रविष्ट: --इस तरह बाद में प्रवेश करते हुए; भगवान्‌ू-- भगवान्‌ चेष्टा-रूपेण--अपने प्रयास काली के रूप में;तम्‌--उनको; गणम्‌--सारे जीव जिनमें देवता सम्मिलित हैं; भिन्नम्‌ू--पृथक्‌-पृथक्‌; संयोजयाम्‌ आस--कार्य करने में लगाया;सुप्तम्‌--सोई हुई; कर्म--कर्म; प्रबोधयन्‌--प्रबुद्ध करते हुए

इस तरह जब भगवान्‌ अपनी शक्ति से तत्त्वों के भीतर प्रविष्ट हो गये तो सारे जीव प्रबुद्धहोकर विभिन्न कार्यों में उसी तरह लग गये जिस तरह कोई व्यक्ति निद्रा से जगकर अपने कार्य मेंलग जाता है।

प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गण: ।

प्रेरितोजनयत्स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम्‌ ॥

४॥

प्रबुद्ध-जाग्रत; कर्मा--कार्यकलाप; दैवेन--ब्रह्म की इच्छा से; त्रयः-विंशतिक: --तेईस प्रमुख अवयवों द्वारा; गण:--संमेल;प्रेरितः--द्वारा प्रेरित; अजनयतू-- प्रकट किया; स्वाभि:--अपने; मात्राभि:--स्वांश से; अधिपूरुषम्‌--विराट रूप ( विश्वरूप )को

जब परम पुरुष की इच्छा से तेईस प्रमुख तत्त्वों को सक्रिय बना दिया गया तो भगवान्‌ काविराट विश्वरूप शरीर प्रकट हुआ।

परेण विशता स्वस्मिन्मात्रया विश्वसृग्गण: ।

चुक्षोभान्योन्यमासाद्य यस्मिन्लोकाश्चराचरा: ॥

५॥

परेण--भगवान्‌ द्वारा; विशता--इस तरह प्रवेश करके; स्वस्मिनू--स्वतः ; मात्रया--स्वांश द्वारा; विश्व-सुक्‌--विश्व सृष्टि केतत्त्व; गण:--सारे; चुक्षोभ--रूपान्तरित हो गये; अन्योन्यम्‌--परस्पर; आसाद्य--प्राप्त करके; यस्मिन्‌--जिसमें; लोका: --लोक; चर-अचरा:--जड़ तथा चेतन

ज्योंही भगवान्‌ ने अपने स्वांश रूप में विश्व के सारे तत्त्वों में प्रवेश किया, त्योंही वे विराटरूप में रूपान्तरित हो गये जिसमें सारे लोक और समस्त जड़ तथा चेतन सृष्टियाँ टिकी हुई हैं।

हिरण्मयः स पुरुष: सहस्त्रपरिवत्सरान्‌ ।

आण्डकोश उवासाप्सु सर्वसत्त्वोपबूंहित: ॥

६॥

हिरण्मय:--विराट रूप धारण करने वाले गर्भोदकशायी विष्णु; सः--वह; पुरुष:--ईश्वर का अवतार; सहस्त्र--एक हजार;परिवत्सरानू-दैवी वर्षों तक; आण्ड-कोशे--अंडाकार ब्रह्माण्ड के भीतर; उबास--निवास करता रहा; अप्सु--जल में; सर्व-सत्त्व--उनके साथ शयन कर रहे सारे जीव; उपबूंहित:--इस तरह फैले हुए।

विराट पुरुष जो हिरण्मय कहलाता है, ब्रह्माण्ड के जल में एक हजार दैवी वर्षों तक रहतारहा और सारे जीव उसके साथ शयन करते रहे।

सब विश्वसूजां गर्भो देवकर्मात्मशक्तिमान्‌ ।

विबभाजात्मनात्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥

७॥

सः--वह; वै--निश्चय ही; विश्व-सृजाम्‌--विराट रूप की; गर्भ:--सम्पूर्ण शक्ति; देव--सजीव शक्ति; कर्म--जीवन कीक्रियाशीलता; आत्म--आत्मा; शक्तिमान्‌ू--शक्तियों से पूरित; विबभाज--विभाजित कर दिया; आत्मना--अपने आप से;आत्मानम्‌--अपने को; एकधा--एक में; दशधा--दस में; त्रिधा--तथा तीन में

विराट रूप में महत्‌ तत्त्व की समग्र शक्ति ने स्वतः अपने को जीवों की चेतना, जीवन कीक्रियाशीलता तथा आत्म-पहचान के रूप में विभाजित कर लिया जो एक, दस तथा तीन मेंक्रमशः उपविभाजित हो गए हैं।

एप हाशेषसत्त्वानामात्मांश: परमात्मन: ।

आद्योवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥

८॥

एष:--यह; हि--निस्सन्देह; अशेष-- असीम; सत्त्वानामू--जीवों के; आत्मा--आत्मा; अंश: --अंश; परम-आत्मन: -- परमात्माका; आद्यः-- प्रथम; अवतार: -- अवतार; यत्र--जिसमें; असौ--वे सब; भूत-ग्राम:--समुचित सृष्टियाँ; विभाव्यते--फलती'फूलती हैं।

भगवान्‌ का विश्वरूप प्रथम अवतार तथा परमात्मा का स्वांश होता है।

वे असंख्य जीवों केआत्मा हैं और उनमें समुच्चित सृष्टि ( भूतग्राम ) टिकी रहती है, जो इस तरह फलती फूलती है।

साध्यात्म: साधिदैवश्च साधिभूत इति त्रिधा ।

विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥

९॥

स-आध्यात्म:--शरीर तथा समस्त इन्द्रियों समेत मन; स-आधिदैव: --तथा इन्द्रियों के नियंत्रक देवता; च--तथा; स-आधिभूतः--वर्तमान विषय; इति--इस प्रकार; त्रिधा--तीन; विराट्‌ू--विराट; प्राण:--चालक शक्ति; दश-विध:--दसप्रकार; एकधा--केवल एक; हृदयेन--चेतना शक्ति; च-- भी

विश्वरूप तीन, दस तथा एक के द्वारा इस अर्थ में प्रस्तुत होता है कि वे ( भगवान्‌ ) शरीरतथा मन और इन्द्रियाँ हैं।

वे ही दस प्रकार की जीवन शक्ति द्वारा समस्त गतियों की गत्यात्मकशक्ति हैं और वे ही एक हृदय हैं जहाँ जीवन-शक्ति सृजित होती है।

स्मरन्विश्वसृजामीशो विज्ञापितमधोक्षज: ।

विराजमतपत्स्वेन तेजसैषां विवृत्तये ॥

१०॥

स्मरनू--स्मरण करते हुए; विश्व-सृजाम्‌--विश्व रचना का कार्यभार सँभालने वाले देवता-गण; ईश:--भगवान्‌; विज्ञापितम्‌--स्तुति किया गया; अधोक्षज:--ब्रह्म; विराजम्‌--विराट रूप; अतपत्‌--इस तरह विचार किया; स्वेन--अपनी; तेजसा--शक्तिसे; एषाम्‌--उनके लिए; विवृत्तये--समझने के लिए |

परम प्रभु इस विराट जगत की रचना का कार्यभार सँभालने वाले समस्त देवताओं केपरमात्मा हैं।

इस तरह ( देवताओं द्वारा ) प्रार्थना किये जाने पर उन्होंने मन में विचार किया औरतब उनको समझाने के लिए अपना विराट रूप प्रकट किया।

नअथ तस्याभितप्तस्य कतिधायतनानि ह ।

\िरभिद्यन्त देवानां तानि मे गदतः श्रुणु ॥

११॥

अथ--इसलिए; तस्य--उसका; अभितप्तस्थ--उसके चिन्तन के अनुसार; कतिधा--कितने; आयतनानि--विग्रह; ह-- थे;निरभिद्यन्त--विभिन्नांशों द्वारा; देवानामू--देवताओं का; तानि--उन समस्त; मे गदतः--मेरे द्वारा वर्णित; श्रुणु--सुनो

मैत्रेय ने कहा : अब तुम मुझसे यह सुनो कि परमेश्वर ने अपना विराट रूप प्रकट करने केबाद किस तरह से अपने को देवताओं के विविध रूपों में विलग किया।

तस्याग्निरास्यं निर्भिन्नं लोकपालोविशत्पदम्‌ ।

वबाचा स्वांशेन वक्तव्यं ययासौ प्रतिपद्यते ॥

१२॥

तस्य--उसकी; अग्निः--अग्नि; आस्यम्‌-- मुँह; निर्भिन्नम्‌ू--इस तरह वियुक्त; लोक-पाल:--भौतिक मामलों के निदेशक;अविशत्‌-प्रवेश किया; पदम्‌--अपने-अपने पदों को; वाचा--शब्दों से; स्व-अंशेन-- अपने अंश से; वक्तव्यम्‌--वाणी;यया--जिससे; असौ--वे; प्रतिपद्यते--व्यक्त करते हैं।

उनके मुख से अग्नि अथवा उष्मा विलग हो गई और भौतिक कार्य संभालने वाले सारेनिदेशक अपने-अपने पदों के अनुसार इस में प्रविष्ट हो गये।

जीव उसी शक्ति से शब्दों के द्वाराअपने को अभि-व्यक्त करता है।

निर्भिन्नं तालु वरूणो लोकपालोविशद्धरे: ।

जिह्यांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते ॥

१३॥

निर्भिन्नमू--वियुक्त; तालु--तालू; वरुण: --वायु का नियन्ता देव; लोक-पाल: --लोकों का निदेशक; अविशतू--प्रविष्ट हुआ;हरेः-- भगवान्‌ के; जिहया अंशेन--जीभ के अंश से; च-- भी; रसम्‌-- स्वाद; यया--जिससे; असौ--जीव ; प्रतिपद्यते--अभि-व्यक्त करता है।

जब विराट रूप का तालू पृथक्‌ प्रकट हुआ तो लोकों में वायु का निदेशक वरुण उसमेंप्रविष्ट हुआ जिससे जीव को अपनी जीभ से हर वस्तु का स्वाद लेने की सुविधा प्राप्त है।

निर्भिन्ने अश्विनौ नासे विष्णोराविशतां पदम्‌ ।

घ्राणेनांशेन गन्धस्य प्रतिपत्तियतो भवेत्‌ ॥

१४॥

निर्िन्ने--इस प्रकार से पृथक्‌ हुए; अश्विनौ--दोनों अश्विनीकुमार; नासे--दोनों नथुनों के; विष्णो:-- भगवान्‌ के;आविशताम्‌--प्रविष्ट होकर; पदम्‌--पद; घप्राणेन अंशेन-- आंशिक रूप से सूँघने से; गन्धस्य--गन्ध का; प्रतिपत्ति:--अनुभव;यतः--जिससे; भवेत्‌--होता है।

जब भगवान्‌ के दो नथुने पृथक्‌ प्रकट हुए तो दोनों अश्विनीकुमार उनके भीतर अपने-अपनेपदों पर प्रवेश कर गये।

इसके फलस्वरूप जीव हर वस्तु की गन्ध सूँघ सकते हैं।

निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोविशद्विभो: ।

चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तियतो भवेत्‌ ॥

१५॥

निर्भिन्ने--इस प्रकार से पृथक्‌ होकर; अक्षिणी--आँखें; त्वष्टा--सूर्य ने; लोक-पाल:-- प्रकाश का निदेशक; अविशतू-- प्रवेशकिया; विभो: --महान्‌ का; चक्षुषा अंशेन--दृष्टि के अंश से; रूपाणाम्‌ू--रूपों के; प्रतिपत्तिः--अनुभव; यतः--जिससे;भवेत्‌--होता है

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ के विराट रूप की दो आँखें पृथक्‌ हो गईं।

प्रकाश का निदेशक सूर्य दृष्टिके आंशिक प्रतिनिधित्व के साथ उनमें प्रविष्ट हुआ जिससे जीव रूपों को देख सकते हैं।

निर्भिन्नान्यस्थ चर्माण लोकपालोनिलोविशत्‌ ।

प्राणेनांशेन संस्पर्श येनासौ प्रतिपद्यते ॥

१६॥

निर्िन्नानि--पृथक्‌ होकर; अस्य--विराट रूप की; चर्माणि--त्वचा; लोक-पाल:--निदेशक; अनिल: --वायु ने; अविशतू --प्रवेश किया; प्राणेन अंशेन-- श्वास के अंश से; संस्पर्शम्‌-स्पर्श; येन--जिससे; असौ--जीव; प्रतिपद्यते-- अनुभव कर सकताहै।

जब विराट रूप से त्वचा पृथक्‌ हुई तो वायु का निदेशक देव अनिल आंशिक स्पर्श सेप्रविष्ट हुआ जिससे जीव स्पर्श का अनुभव कर सकते हैं।

कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिश: ।

श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धि येन प्रपद्यते ॥

१७॥

कर्णों--दोनों कान; अस्य--विराट रूप के; विनिर्भिन्नी--इस तरह पृथक्‌ होकर; धिष्ण्यम्‌ू--नियंत्रक देव; स्वम्‌--अपने से;विविशु:--प्रवेश किया; दिश:--दिशाओं का; श्रोत्रेण अंशेन-- श्रवण तत्त्व के साथ; शब्दस्य-- ध्वनि का; सिद्धिम्‌--सिद्धि;येन--जिससे; प्रपद्यते-- अनुभव की जाती है।

जब विराट रूप के कान प्रकट हुए तो सभी दिशाओं के नियंत्रक देव श्रवण तत्त्वों समेतउनमें प्रविष्ट हो गये जिससे सारे जीव सुनते हैं और ध्वनि का लाभ उठाते हैं।

त्वचमस्य विनिर्भिन्नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधी: ।

अंशेन रोमभिः कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते ॥

१८ ॥

त्वचमू--चमड़ी; अस्य--विराट रूप की; विनिर्भिन्नामू--अलग से प्रकट होकर; विविशु:--प्रविष्ट हुआ; धिष्ण्यम्‌--नियंत्रकदेव; ओषधी: --संस्पर्श; अंशेन--अंशों के साथ; रोमभि:--शरीर के रोओं से होकर; कण्डूम्‌--खुजली; यैः--जिससे;असौ--जीव; प्रतिपद्यते--अनुभव करता है।

जब चमड़ी की पृथक्‌ अभिव्यक्ति हुई तो अपने विविध अंशों समेत संस्पर्श नियंत्रक देवउसमें प्रविष्ट हो गये।

इस तरह जीवों को स्पर्श के कारण खुजलाहट तथा प्रसन्नता का अनुभवहोता है।

मेढ़ें तस्य विनिर्भिन्नं स्वधिष्ण्यं क उपाविशत्‌ ।

रेतसांशेन येनासावानन्दं प्रतिपद्यते ॥

१९॥

मेढ्म्‌--जननांग; तस्य--उस विराट रूप का; विनिर्मिन्नम्‌ू--पृथक्‌ होकर; स्व-धिष्ण्यम्‌ू--अपना पद; कः--ब्रह्मा, आदिप्राणी; उपाविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; रेतसा अंशेन--वीर्य के अंश सहित; येन--जिससे; असौ--जीव; आनन्दम्‌--यौन आनन्द;प्रतिपद्यते-- अनुभव करता है।

जब विराट रूप के जननांग पृथक्‌ हो गये तो आदि प्राणी प्रजापति अपने आंशिक वीर्यसमेत उनमें प्रविष्ट हो गये और इस तरह जीव यौन आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।

गुदं पुंसो विनिर्भिन्नं मित्रो लोकेश आविशत्‌ ।

पायुनांशेन येनासौ विसर्ग प्रतिपद्यते ॥

२०॥

गुदम्‌--गुदा; पुंसः--विराट रूप का; विनिर्भिन्नम्‌ू--पृथक्‌ होकर; मित्र: --सूर्यदेव; लोक-ईशः--मित्र नामक निदेशक;आविशत्‌-प्रविष्ट हुआ; पायुना अंशेन--आंशिक वायु के साथ; येन--जिससे; असौ--जीव; विसर्गम्‌--मलमूत्र त्याग;प्रतिपद्यते--सम्पन्न करता है।

फिर विसर्जन मार्ग पृथक्‌ हुआ और मित्र नामक निदेशक विसर्जन के आंशिक अंगों समेतउसमें प्रविष्ट हो गया।

इस प्रकार जीव अपना मल-मूत्र विसर्जित करने में सक्षम हैं।

हस्तावस्य विनिर्भिन्नाविन्द्र: स्वर्पतिराविशत्‌ ।

वार्तयांशेन पुरुषो यया वृत्ति प्रपद्यत ॥

२१॥

हस्तौ--दो हाथ; अस्य--विराट रूप के; विनिर्भिन्नी--पृथक्‌ होकर; इन्द्र:--स्वर्ग का राजा; स्व:-पति:--स्वर्ग लोकों काशासक; आविशतू-प्रविष्ट हुआ; वार्तया अंशेन--अंशत: व्यवसायिक सिद्धान्तों के साथ; पुरुष:--जीव; यया--जिससे;वृत्तिमू--जीविका का व्यापार; प्रपद्यते--चलाता है।

तत्पश्चात्‌ जब विराट रूप के हाथ पृथक्‌ हुए तो स्वर्गलोक का शासक इन्द्र उनमें प्रविष्ट हुआऔर इस तरह से जीव अपनी जीविका हेतु व्यापार चलाने में समर्थ हैं।

पादावस्य विनिर्भिन्नी लोकेशो विष्णुराविशत्‌ ।

गत्या स्वांशेन पुरुषो यया प्राप्यं प्रपद्यते ॥

२२॥

पादौ--दो पाँव; अस्य--विराट रूप के; विनिर्भिन्नी--पृथक्‌ प्रकट हुए; लोक-ईशः विष्णु:--विष्णु नामक देवता ( भगवान्‌नहीं ); आविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; गत्या--चलने-फिरने की शक्ति द्वारा; स्व-अंशेन--अपने ही अंश सहित; पुरुष:--जीव;यया--जिससे; प्राप्मम्‌-गन्तव्य तक; प्रपद्यते--पहुँचता है।

तत्पश्चात्‌ विराट रूप के पाँव पृथक्‌ रुप से प्रकट हुए और विष्णु नामक देवता ( भगवान्‌नहीं ) ने उन में आंशिक गति के साथ प्रवेश किया।

इससे जीव को अपने गन्तव्य तक जाने मेंसहायता मिलती है।

बुद्धि चास्य विनिर्भिन्नां वागीशो थधिष्णयमाविशत्‌ ।

बोधेनांशेन बोद्धव्यम्प्रतिपत्तियतो भवेत्‌ ॥

२३॥

बुद्धिम--बुद्धि; च-- भी; अस्य--विराट रूप की; विनिर्भिन्नामू--पृथक्‌ हुई; वाक्‌-ईशः--वेदों का स्वामी ब्रह्मा; धिष्णयम्‌--नियंत्रक शक्ति; आविशत्‌--प्रविष्ट हुए; बोधेन अंशेन--अपने बुद्धि अंश सहित; बोद्धव्यम्‌--ज्ञान का विषय; प्रतिपत्ति: --समझ गया; यतः--जिससे; भवेत्‌--इस तरह होती है |

जब विराट रूप की बुद्धि पृथक्‌ रुप से प्रकट हुई तो वेदों के स्वामी ब्रह्मा बुद्धि कीआंशिक शक्ति के साथ उसमें प्रविष्ट हुए और इस तरह जीवों द्वारा बुद्धि के ध्येय का अनुभवकिया जाता है।

हृदयं चास्य निर्भिन्नं चन्द्रमा धिष्णयमाविशत्‌ ।

मनसांशेन येनासौ विक्रियां प्रतिपद्यते ॥

२४॥

हृदयम्‌--हृदय; च-- भी; अस्य--विराट रूप का; निर्मिन्नम्‌ू--पृथक्‌ से प्रकट होकर; चन्द्रमा--चन्द्र देवता; धिष्णयम्‌--नियंत्रक शक्ति समेत; आविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; मनसा अंशेन--आंशिक मानसिक क्रिया सहित; येन--जिससे; असौ--जीव;विक्रियाम्‌--संकल्प; प्रतिपद्यते--करता है

इसके बाद विराट रूप का हृदय पृथक्‌ रूप से प्रकट हुआ और इसमें चन्द्रदेबता अपनीआंशिक मानसिक क्रिया समेत प्रवेश कर गया।

इस तरह जीव मानसिक चिन्तन कर सकता है।

आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोविशत्पदम्‌ ।

कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते ॥

२५॥

आत्मानम्‌ू--मिथ्या अहंकार; च--भी; अस्य--विराट रूप का; निर्भिन्नमू--पृथक्‌ से प्रकट होकर; अभिमान:--मिथ्यापहचान; अविशत्‌ू--प्रविष्ट हुआ; पदम्‌--पद पर; कर्मणा--कर्म द्वारा; अंशेन--अंशत:; येन--जिससे; असौ--जीव;कर्तव्यमू--करणीय कार्यकलाप; प्रतिपद्यते--करता है।

तत्पश्चात्‌ विराट रूप का भौतिकतावादी अहंकार पृथक्‌ से प्रकट हुआ और इसमें मिथ्याअंहकार के नियंत्रक रुद्र ने अपनी निजी आंशिक क्रियाओं समेत प्रवेश किया जिससे जीवअपना लक्षियत कर्तव्य पूरा करता है।

सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान्धिष्ण्यमुपाविशत्‌ ।

चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञान प्रतिपद्यते ॥

२६॥

सत्त्ममू--चेतना; च-- भी; अस्य--विराट रूप की; विनिर्भिन्मम्‌ू--पृथक्‌ से प्रकट होकर; महान्‌--समग्र शक्ति, महत्‌ तत्त्व;धिष्ण्यमू--नियंत्रण समेत; उपाविशत्‌-- प्रविष्ट हुई; चित्तेन अंशेन-- अपनी अंश चेतना समेत; येन--जिससे; असौ--जीव;विज्ञानम्‌-विशिष्ट ज्ञान; प्रतिपद्यते--अनुशीलन करता है।

तत्पश्चात्‌ जब विराट रूप से उसकी चेतना पृथक्‌ होकर प्रकट हुई तो समग्र शक्ति अर्थात्‌महतत्त्व अपने चेतन अंश समेत प्रविष्ट हुआ।

इस तरह जीव विशिष्ट ज्ञान को अवधारण करने मेंसमर्थ होता है।

शीष्णोंस्य द्यौर्धरा पद्भ्यां खं नाभेरुदपद्यत ।

गुणानां वृत्तयो येषु प्रतीयन्ते सुरादयः ॥

२७॥

शीर्ष्ण:--सिर; अस्य--विराट रूप का; द्यौ:--स्वर्गलोक; धरा--पृथ्वीलोक; पद्भ्याम्‌--उसके पैरों पर; खम्‌--आकाश;नाभे: --नाभि से; उदपद्यत--प्रकट हुआ; गुणानाम्‌--तीनों गुणों के; वृत्तव:--फल; येषु--जिनमें; प्रतीयन्ते--प्रकट होते हैं;सुर-आदयः--देवता इत्यादि

तत्पश्चात्‌ विराट रूप के सिर से स्वर्गलोक, उसके पैरों से पृथ्वीलोक तथा उसकी नाभि सेआकाश पृथक्‌-पृथक्‌ प्रकट हुए।

इनके भीतर भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के रूप में देवताइत्यादि भी प्रकट हुए।

आत्यन्तिकेन सच्त्वेन दिवं देवा: प्रपेदिरे ।

धरां रज:स्वभावेन पणयो ये च ताननु ॥

२८॥

आत्यन्तिकेन--अत्यधिक; सत्त्वेन--सतोगुण द्वारा; दिवम्‌--उच्चतर लोकों में; देवा: --देवता; प्रपेदिरि--स्थित है; धराम्‌--पृथ्वी पर; रज:--रजोगुण; स्वभावेन--स्वभाव से; पणय:--मानव; ये--वे सब; च-- भी; तानू--उनके; अनु--अधीन |

देवतागण, अति उत्तम गुण, सतोगुण के द्वारा योग्य बनकर, स्वर्गलोक में अवस्थित रहते हैं।

जबकि मनुष्य अपने रजोगुणी स्वभाव के कारण अपने अधीनस्थों की संगति में पृथ्वी पर रहते हैं।

तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिता: ।

उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणा: ॥

२९॥

तार्तीयेन--तृतीय गुण अर्थात्‌ तमोगुण के अत्यधिक विकास द्वारा; स्वभावेन--ऐसे स्वभाव से; भगवत्‌-नाभिम्‌-- भगवान्‌ केविराट रूप की नाभि में; आशभ्रिता:--स्थित; उभयो:--दोनों के; अन्तरम्‌--बीच में; व्योम--आकाश; ये--जो सब; रुद्र-पार्षदाम्‌ू-रूद्र के संगी; गणा:--लोग।

जो जीव रुद्र के संगी हैं, वे प्रकृति के तीसरे गुण अर्थात्‌ तमोगुण में विकास करते हैं।

वेपृथ्वीलोकों तथा स्वर्गलोकों के बीच आकाश में स्थित होते हैं।

मुखतोवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।

यस्तून्मुखत्वाद्वर्णानां मुख्योभूद्राह्मणो गुरु: ॥

३०॥

मुखतः--मुँह से; अवर्तत--उत्पन्न हुआ; ब्रह्म--वैदिक ज्ञान; पुरुषस्थ--विराट पुरुष का; कुरु-उद्दद-हे कुरुवंश के प्रधान;यः--जो; तु--के कारण; उन्मुखत्वात्‌--उन्मुख; वर्णानामू--समाज के वर्णो का; मुख्य:--मुख्य; अभूत्‌--ऐसा हो गया;ब्राह्मण: --ब्राह्मण कहलाया; गुरु:--मान्य शिक्षक या गुरु

हे कुरुवंश के प्रधान, विराट अर्थात्‌ विश्व रुप के मुख से वैदिक ज्ञान प्रकट हुआ।

जो लोगइस वैदिक ज्ञान के प्रति उन्मुख होते हैं, वे ब्राह्मण कहलाते हैं और वे समाज के सभी वर्णों केस्वाभाविक शिक्षक तथा गुरु हैं।

बाहुभ्योउवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुब्रत: ।

यो जातस्त्रायते वर्णान्पौरुष: कण्टकक्षतात्‌ ॥

३१॥

बाहुभ्य:--बाहुओं से; अवर्तत--उत्पन्न हुआ; क्षत्रमू--संरक्षण की शक्ति; क्षत्रिय:--संरक्षण की शक्ति के सन्दर्भ में; तत्‌--वह;अनुव्रत:--अनुयायी; यः--जो; जात:--ऐसा होता है; त्रायते--उद्धार करता है; वर्णान्‌ू--अन्य वृत्तियाँ; पौरुष: -- भगवान्‌ काप्रतिनिधि; कण्टक--चोर उचक्के जैसे उपद्रवी तत्त्व; क्षतात्‌--दुष्टता से

तत्पश्चात्‌ विराट रूप की बाहुओं से संरक्षण शक्ति उत्पन्न हुई और ऐसी शक्ति के प्रसंग मेंसमाज का चोर-उचक्ों के उत्पातों से रक्षा करने के सिद्धान्त का पालन करने से क्षत्रिय भीअस्तित्व में आये।

विशोवर्तन्त तस्योरवोर्लोकवृत्तिकरीर्विभो: ।

वैश्यस्तदुद्धवो वार्ता नृणां यः समवर्तयत्‌ ॥

३२॥

विशः--उत्पादन तथा वितरण द्वारा जीविका का साधन; अवर्तन्त--उत्पन्न किया; तस्य--उसका ( विराट रूप का ); ऊर्वो:--जाँघों से; लोक-वृत्तिकरी:--आजीविका के साधन; विभो:-- भगवान्‌ के; वैश्य: --वैश्य जाति; तत्‌ू--उनका; उद्धव:--समायोजन ( जन्म ); वार्तामू--जीविका का साधन; नृणाम्‌--सारे मनुष्यों की; यः--जिसने; समवर्तयत्‌--सम्पन्न किया।

समस्त पुरुषों की जीविका का साधन, अर्थात्‌ अन्न का उत्पादन तथा समस्त प्रजा में उसकावितरण भगवान्‌ के विराट रूप की जाँघों से उत्पन्न किया गया।

वे व्यापारी जन जो ऐसे कार्यको संभालते हैं वैश्य कहलाते हैं।

पद्भ्यां भगवतो जज्ने शुश्रूषा धर्मसिद्धये ।

तस्यां जात: पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरि: ॥

३३॥

पद्भ्यामू-पैरों से; भगवतः--भगवान्‌ के; जज्ञे--प्रकट हुआ; शुश्रूषा--सेवा; धर्म--वृत्तिपरक कार्य; सिद्धये--के हेतु;तस्यामू--उसमें; जात:--उत्पन्न हुआ; पुरा--प्राचीन काल में; शूद्र:ः--सेवक; यत्‌-वृत्त्या--वृत्ति जिससे; तुष्यते--तुष्ट होता है;हरिः-- भगवान्‌ |

तत्पश्चात्‌ धार्मिक कार्य पूरा करने के लिए भगवान्‌ के पैरों से सेवा प्रकट हुई।

पैरों पर शूद्रस्थित होते हैं, जो सेवा द्वारा भगवान्‌ को तुष्ट करते हैं।

एते वर्णा: स्वधर्मेंण यजन्ति स्वगुरुं हरिम्‌ ।

श्रद्धयात्मविशुद्धयर्थ यज्जाता: सह वृत्तिभि: ॥

३४॥

एते--ये सारे; वर्णा:--समाज की श्रेणियाँ; स्व-धर्मेण-- अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों द्वारा; यजन्ति--पूजा करते हैं; स्व-गुरुम--अपने गुरु; हरिमू-- भगवान्‌ को; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; आत्म--आत्मा; विशुद्धि-अर्थम्‌--शुद्ध करने केलिए; यत्‌--जिससे; जाता: -- उत्पन्न; सह-- के साथ; वृत्तिभि:--वृत्तिपरक कर्तव्यये

भिन्न-भिन्न समस्त सामाजिक विभागअपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों तथा जीवनपरिस्थितियों के साथ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ से उत्पन्न होते हैं।

इस तरह अबद्धजीवन तथाआत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य को गुरु के निर्देशानुसार परम प्रभु की पूजा करनी होती है।

एतक्क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिण: ।

कः श्रद्धध्यादुपाकर्तु योगमायाबलोदयम्‌ ॥

३५॥

एतत्‌--यह; क्षत्त:--हे विदुर; भगवतः-- भगवान्‌ का; दैव-कर्म-आत्म-रूपिण:--विराट रूप के दिव्य कर्म, काल तथाप्रकृति का; कः--और कौन; श्रद्दध्यात्‌--आकांक्षा कर सकता है; उपाकर्तुम्‌ू--समग्र रूप में मापने के लिए; योगमाया--अन्तरंगाशक्ति के; बल-उदयम्‌--बल द्वारा प्रकट |

हे विदुर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की अन्तरंगा शक्ति द्वारा प्रकट किये गये विराट रूप केदिव्य काल, कर्म तथा शक्ति को भला कौन माप सकता है या उसका आकलन कर सकता है?

तथापि कीर्तयाम्यड्र यथामति यथा श्रुतम्‌ ।

कीर्ति हरेः स्वां सत्कर्तु गिरमन्याभिधासतीम्‌ ॥

३६॥

तथा--इसलिए; अपि--यद्यपि ऐसा है; कीर्तयामि--मैं वर्णन करता हूँ; अड्ग--हे विदुर; यथा--जिस तरह; मति--बुद्धि;यथा--जिस तरह; श्रुतम्‌--सुना हुआ; कीर्तिमू--यश; हरेः-- भगवान्‌ का; स्वाम्‌ू--निजी; सत्-कर्तुम्‌-शुद्ध करने हेतु;गिरम्‌ू--वाणी; अन्याभिधा-- अन्यथा; असतीम्‌--अपवित्र |

अपनी असमर्थता के बावजूद मैं ( अपने गुरु से) जो कुछ सुन सका हूँ तथा जितनाआत्मसात्‌ कर सका हूँ उसे अब शुद्ध वाणी द्वारा भगवान्‌ की महिमा के वर्णन में लगा रहा हूँ,अन्यथा मेरी वाक्शक्ति अपवित्र बनी रहेगी।

एकान्तलाभं बचसो नु पुंसांसुश्लोकमौलेगुणवादमाहु: ।

श्रुतेश्च विद्वद्धिरुपाकृतायांकथासुधायामुपसम्प्रयोगम्‌ ॥

३७॥

एक-अन्त--बेजोड़; लाभम्‌--लाभ; वचस:--विवेचना द्वारा; नु पुंसामू-परम पुरुष के बाद; सुश्लोक--पवित्र; मौले:--कार्यकलाप; गुण-वादम्‌--गुणगान; आहु:--ऐसा कहा जाता है; श्रुते:--कान का; च-- भी; विद्वद्धिः --विद्वान द्वारा;उपाकृतायाम्‌--इस तरह सम्पादित; कथा-सुधायाम्‌--ऐसे दिव्य सन्देश रूपी अमृत में; उपसम्प्रयोगम्‌--असली उद्देश्य को पूराकरता है

निकट होने सेमानवता का सर्वोच्च सिद्धिप्रद लाभ पवित्रकर्ता के कार्यकलापों तथा महिमा की चर्चा मेंप्रवृत्त होना है।

ऐसे कार्यकलाप महान्‌ विद्वान ऋषियों द्वारा इतनी सुन्दरता से लिपिबद्ध हुए हैंकि कान का असली प्रयोजन उनके निकट रहने से ही पूरा हो जाता है।

आत्मनोवसितो वत्स महिमा कविनादिना ।

संवत्सरसहस्त्रान्ते धिया योगविपक्कया ॥

३८ ॥

आत्मन:--परमात्मा की; अवसित:ः--ज्ञात; वत्स--हे पुत्र; महिमा--महिमा; कविना--कवि ब्रह्मा द्वारा; आदिना--आदि;संवत्सर--दैवी वर्ष; सहस्त्र-अन्ते--एक हजार वर्षो के अन्त में; धिया--बुद्धि द्वारा; योग-विपक्रया--परिपक्व ध्यान द्वारा |

हे पुत्र, आदि कवि ब्रह्मा एक हजार दैवी वर्षो तक परिपक्व ध्यान के बाद केवल इतनाजान पाये कि भगवान्‌ की महिमा अचिन्त्य है।

अतो भगवतो माया मायिनामपि मोहिनी ।

यत्स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥

३९॥

अतः--इसलिए; भगवत:--ई श्वरीय; माया--शक्तियाँ; मायिनामू-- जादूगरों को; अपि-- भी; मोहिनी--मोहने वाली; यत्‌--जो; स्वयम्‌--अपने से; च-- भी; आत्म-वर्त्त--आत्म-निर्भर; आत्मा--आत्म; न--नहीं; वेद--जानता है; किम्‌--क्या; उत--विषय में कहना; अपरे--अन्यों के |

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की आश्चर्यजनक शक्ति जादूगरों को भी मोहग्रस्त करने वाली है।

यह निहित शक्ति आत्माराम भगवान्‌ तक को अज्ञात है, अतः अन्यों के लिए यह निश्चय हीअज्ञात है।

यतोप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्च मनसा सह ।

अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥

४०॥

यतः--जिससे; अप्राप्प--माप न सकने के कारण; न्यवर्तन्त--प्रयास करना बन्द कर देते हैं; वाच:--शब्द; च-- भी;मनसा--मन से; सह--सहित; अहम्‌ च--अहंकार भी; अन्ये-- अन्य; इमे--ये सभी; देवा:--देवतागण; तस्मै--उस;भगवते-- भगवान्‌ को; नम:ः--नमस्कार करते हैं।

अपने-अपने नियंत्रक देवों सहित शब्द, मन तथा अहंकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ कोजानने में असफल रहे हैं।

अतएव हमें विवेकपूर्वक उन्हें सादर नमस्कार करना होता है।

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची