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अध्याय तैंतीसवाँ: कपिला की गतिविधियाँ
3..33मैत्रेय उबाचएवं निशम्य कपिलस्य वचो जनित्रीसा कर्दमस्य दयिता किल देवहूतिः ।
विस्त्रस्तमोहपटला तमभिप्रणम्यतुष्टाव तत्त्वविषयाद्धितसिद्धिभूमिम् ॥
१॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; एवम्--इस प्रकार; निशम्य--सुनकर; कपिलस्थ--कपिल के; वच:ः--शब्द;जनित्री--माता; सा--वह; कर्दमस्य--कर्दम मुनि की; दयिता--प्रिय पत्ती; किल--नामक; देवहूति:--देवहूति;विस््रस्त--से युक्त होकर; मोह-पटला--मोह का आवरण; तम्--उसको; अभिप्रणम्य--नमस्कार करके; तुष्टाव--स्तुति की; तत्त्व--मूल सिद्धान्त; विषय--के सम्बन्ध में; अद्धित--रचियता, प्रतिपादक; सिद्धि--मुक्ति की;भूमिम्-पृष्ठभूमि |
श्री मैत्रेय ने कहा : इस प्रकार भगवान् कपिल की माता एवं कर्दम मुनि की पत्नीदेवहूति भक्तियोग तथा दिव्य ज्ञान सम्बन्धी समस्त अविद्या से मुक्त हो गईं।
उन्होंने उनभगवान् को नमस्कार किया जो मुक्ति की पृष्ठभूमि सांख्य दर्शन के प्रतिपादक हैं औरतब निम्नलिखित स्तुति द्वारा उन्हें प्रसन्न किया।
देवहूतिरुवाचअथाप्यजोन्तःसलिले शयानंभूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते ।
गुणप्रवाहं सदशेषबीजंदध्यौ स्वयं यज्जठराब्जजातः ॥
२॥
देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; अथ अपि--और भी; अज:--ब्रह्मा जी; अन्तः-सलिले--जल में; शयानम्--लेटेहुए; भूत-- भौतिक तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अर्थ--विषय; आत्म--मन; मयम्--से व्याप्त; वपु:--शरीर; ते--तुम्हारा; गुण-प्रवाहम्--प्रकृति के तीन तत्त्वों की धारा का उद्गम; सत्--प्रकट; अशेष--सबों का; बीजम्ू--बीज;दध्यौ-- ध्यान किया; स्वयम्--स्वयं; यत्--जिसके; जठर--उदर से; अब्जन--कमल-पुष्प से; जात:--उत्पन्न ।
देवहूति ने कहा : ब्रह्माजी अजन्मा कहलाते हैं, क्योंकि वे आपके उदर से निकलतेहुए कमल-पुष्प से जन्म लेते हैं और आप ब्रह्माण्ड के तल पर समुद्र में शयन करते रहतेहैं।
लेकिन ब्रह्माजी ने भी केवल अनन्त ब्रह्माण्डों के उदगम स्त्रोत, आपका ध्यान हीकिया।
स एव विश्वस्य भवान्विधत्तेगुणप्रवाहेण विभक्तवीर्य: ।
सर्गाद्यमीहो वितथाभिसन्धिर्आत्मेश्वरोतर्क्यसहस्त्रशक्ति: ॥
३॥
सः--वही पुरुष; एव--निश्चय ही; विश्वस्थ--ब्रह्माण्ड का; भवानू--आप; विधत्ते--करते हैं; गुण-प्रवाहेण--गुणोंकी अन्तःक्रिया से; विभक्त--विभाजित; वीर्य:--आपकी शक्तियाँ; सर्ग-आदि--सृष्टि इत्यादि; अनीह:--निष्क्रिय;अवितथ--सार्थक; अभिसन्धि:--हढ़संकल्प; आत्म-ई श्ररः -- समस्त जीवों के स्वामी; अतर्क्य--अकल्पनीय;सहस्त्र--हजारों; शक्ति:--शक्तियों से युक्त |
हे भगवान्, यद्यपि आपको निजी रूप से कुछ करना नहीं रहता, किन्तु आपने अपनीशक्तियाँ प्रकृति के गुणों की अन्तःक्रियाओं में वितरित कर दी हैं जिसके बल परहृश्यजगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार होता है।
हे भगवान्, आप हृढ़संकल्प हैं औरसमस्त जीवों के भगवान् हैं।
आपने उन्हीं के लिए यह संसार रचा और यद्यपि आप एकहैं, किन्तु आपकी शक्तियाँ अनेक प्रकार से कार्य करती हैं।
यह हमारे लिए अकल्पनीयहै।
स त्वं भूतो मे जठरेण नाथकथं नु यस्योदर एतदासीत् ।
विश्व युगान्ते वटपत्र एक: शेते सम मायाशिशुरडूप्रिपान: ॥
४॥
सः--वही पुरुष; त्वमू--तुमने; भूतः--जन्म लिया है; मे जठरेण--मेरे उदर से; नाथ--हे भगवान्; कथम्--कैसे;नु--तब; यस्य--जिसके; उदरे--पेट में; एतत्--यह; आसीत्--स्थित था; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; युग-अन्ते--कल्प केअन्त में; बट-पत्रे--वट वृक्ष के पेड़ की पत्ती पर; एक:--अकेले; शेते स्म--सोते थे; माया--अकल्पनीय शक्तियोंसे युक्त; शिशु:--बालक; अड्ध्रि--अँगूठा; पान:--चूसते हुए।
आपने मेरे उदर से श्रीभगवान् के रूप में जन्म लिया है।
हे भगवन्, यह उस परमेश्वरके लिए किस प्रकार सम्भव हो सका जिसके उदर में यह सारा हश्य-जगत स्थित है?इसका उत्तर होगा कि ऐसा सम्भव है, क्योंकि कल्प के अन्त में आप वटवृक्ष की एकपत्ती पर लेट जाते हैं और एकछोटे से बालक की भाँति अपने चरणकमल के अँगूठे कोचूसते हैं।
त्वं देहतन्त्र: प्रशमाय पाप्मनांनिदेशभाजां च विभो विभूतये ।
यथावतारास्तव सूकरादय-स्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥
५॥
त्वमू--तुमने; देह--यह शरीर; तन्त्र:ः--धारण किया है; प्रशमाय--कम करने के लिए; पाप्मनामू--पाप कर्मों का;निदेश-भाजाम्--भक्ति के उपदेश का; च--तथा; विभो--हे प्रभु; विभूतये--विस्तार के लिए; यथा--जिस प्रकार;अवतारा:--अवतार; तव--तुम्हारे; सूकर-आदय:--सूकर तथा अन्य रूप; तथा--उसी प्रकार; अयम्ू--यह कपिलअवतार; अपि--निश्चय ही; आत्म-पथ--आत्म-साक्षात्कार का मार्ग; उपलब्धये--दिखाने के लिए
हे भगवान्, आपने पतितों के पापपूर्ण कर्मों को घटाने तथा उनके भक्ति एवं मुक्तिके ज्ञान को बढ़ाने के लिए यह शरीर धारण किया है।
चूँकि ये पापात्माएँ आपके निर्देशपर आश्रित हैं, अतः आप स्वेच्छा से सूकर तथा अन्य रूपों में अवतरित होते हैं।
इसीप्रकार आप अपने आश्रितों को दिव्य ज्ञान वितरित करने के लिए प्रकट हुए हैं।
यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तनाद्यत्प्रह्मणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित् ।
श्रादोडपि सद्यः सबनाय कल्पतेकुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥
६॥
यत्--जिसका भगवान् का ; नामधेय--नाम; श्रवण --सुनना; अनुकीर्तनात्ू-कीर्तन से; यत्--जिसको;प्रह्मणात्--नमस्कार द्वारा; यत्--जिसको; स्मरणात्---स्मरण द्वारा; अपि-- भी; क्वचित्--किसी समय; श्र-अदः--कुत्ता खाने वाला; अपि-- भी; सद्यः--तुरन््त; सवनाय--वैदिक यज्ञ करने के लिए; कल्पते--पात्र बन जाता है;कुतः--क्या कहा जाय; पुनः--फिर; ते--तुम्हारे; भगवन्-- भगवान्; नु--तब; दर्शनात्--साक्षात् दर्शन से |
उन व्यक्तियों की आध्यात्मिक उन्नति के विषय में क्या कहा जाय जो परम पुरुष काप्रत्यक्ष दर्शन करते हैं, यदि कुत्ता खाने वाले परिवार में उत्पन्न व्यक्ति भी भगवान् केपवित्र नाम का एक बार भी उच्चारण करता है अथवा उनका कीर्तन करता है, उनकीलीलाओं का श्रवण करता है, उन्हें नमस्कार करता है, या कि उनका स्मरण करता है, तोवह तुरन्त वैदिक यज्ञ करने के लिए योग्य बन जाता है।
अहो बत श्रपचोतो गरीयान्यजिह्ाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुबुः सस्नुरार्याब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥
७॥
अहो बत--ओह, धन्य है; श्र-पचः--कुत्ता खाने वाला; अत:--अतएव; गरीयान्-- पूज्य; यत्--जिसकी; जिह्ना-अग्रे--जीभ के अगले भाग पर; वर्तते--है; नाम--पवित्र नाम; तुभ्यम्--तुमको; तेपु: तप:ः--अभ्यासकृत तपस्या;ते--वे; जुहुबु:--अग्नि यज्ञ हवन सम्पन्न किये; सस्नुः--पवित्र नदियों में स्नान किया; आर्या: --आर्यजन; ब्रह्मअनूचु:--वेदों का अध्ययन किया; नाम--पवित्र नाम; गृणन्ति--स्वीकार करते हैं; ये--जो; ते--तुम्हारी
ओह! वे कितने धन्य हैं जिनकी जिह्माएँ आपके पवित्र नाम का जप करती हैं! कुत्ताखाने वाले वंशों में उत्पन्न होते हुए भी ऐसे पुरुष पूजनीय हैं।
जो पुरुष आपके पवित्र नाम का जप करते हैं उन्होंने सभी प्रकार की तपस्याएँ तथा हवन किये होंगे और आर्योके सदाचार प्राप्त किये होंगे।
आपके पवित्र नाम का जप करते रहने के लिए उन्होंनेतीर्थस्थानों में स्नान किया होगा, वेदों का अध्ययन किया होगा और अपेक्षित हर वस्तुकी पूर्ति की होगी।
त॑ त्वामहं ब्रह्म परे पुमांसंप्रत्यक्स्नोतस्यात्मनि संविभाव्यम् ।
स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहंबन्दे विष्णुं कपिल वेदगर्भम् ॥
८ ॥
तम्--उसको; त्वामू--तुमको; अहम्--मैं; ब्रह्म --ब्रह्म; परम्--परम; पुमांसमू--परमेश्वर को; प्रत्यक् -स््रोतसि--अन्तर्मुखी; आत्मनि--मन में; संविभाव्यम्-- ध्यान किया, अनुभूत; स्व-तेजसा--अपनी शक्ति से; ध्वस्त--विलीन ;गुण-प्रवाहम्--प्रकृति के गुणों का प्रभाव; बन्दे--नमस्कार करती हूँ; विष्णुमू--विष्णु को; कपिलमू--कपिलनामक; वेद-गर्भम्--वेदों के आगार।
हे भगवान्, मुझे विश्वास है कि आप कपिल नाम से स्वयं पुरुषोम भगवान् विष्णुअर्थात् परब्रह्म हैं।
सारे ऋषि-मुनि इन्द्रियों तथा मन के उद्देगों से मुक्त होकर आपका हीचिन्तन करते हैं, क्योंकि आपकी कृपा से ही मनुष्य भव-बन्धन से छूट सकता है।
प्रलयके समय सारे वेद आपपमें ही स्थान पाते हैं।
मैत्रेय उबाचईंडितो भगवानेवं कपिलाख्य: पर: पुमान् ।
वाचाविक्लवयेत्याह मातरं मातृवत्सल: ॥
९॥
" मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; ईंडित:--प्रशंसा किये जाने पर; भगवानू-- भगवान् ने; एवम्--इस प्रकार; कपिल-आख्य:--कपिल नामक; पर:--परम; पुमान्--पुरुष; वाचा--शब्दों से; अविक्लवया--गम्भीर; इति--इस प्रकार;आह--उत्तर दिया; मातरम्--अपनी माता को; मातृ-वत्सल:--अपनी माता का दुलारा।
इस प्रकार अपनी माता के शब्दों से प्रसन्न होकर मातृवत्सल भगवान् कपिल नेगम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया।
कपिल उवबाचमार्गेणानेन मातस्ते सुसेव्येनोदितेन मे ।
आस्थितेन परां काष्टरामचिरादवरोत्स्यसि ॥
१०॥
कपिल: उवाच--भगवान् कपिल ने कहा; मार्गेण--मार्ग के द्वारा; अनेन--इस; मातः--हे माता; ते--तुम्हारे लिए;सु-सेव्येन--सरलता से सम्पन्न होने वाला, सुगम; उदितेन--उपदेश दिया गया; मे--मेरे द्वारा; आस्थितेन--कियागया; परामू--परम; काष्ठाम्--लक्ष्य; अचिरात्ू--शीघ्र; अवरोत्स्यसि--प्राप्त करोगी |
भगवान् ने कहा : हे माता, मैंने आपको जिस आत्म-साक्षात्कार के मार्ग का उपदेशदिया है, वह अत्यन्त सुगम है।
आप बिना कठिनाई के इसका पालन कर सकती हैं औरऐसा करके आप इसी शरीर जन्म में शीघ्र ही मुक्त हो सकती हैं।
श्रद्धत्स्वैतन्मतं महमं जुष्टे यद्रह्मावादिभि: ।
येन मामभयं याया मृत्युमृच्छन्त्यतद्विद: ॥
११॥
श्रद्धत्व--आप आश्वस्त रहें; एतत्--इस विषय में; मतम्--उपदेश; महाम्--मेरा; जुष्टम्--पालन किया गया;यत्--जो; ब्रह्म-वादिभि:--अध्यात्मवादियों द्वारा; येन--जिससे; माम्--मुझको; अभयम्-- भयरहित; याया: -- तुमपहुँचोगी; मृत्युम्--मृत्यु को; ऋच्छन्ति--प्राप्त करते हैं; अ-तत्-विद:ः--जो लोग इससे अवगत नहीं हैं|
है माता, जो लोग वास्तव में अध्यात्मवादी हैं, वे निश्चित ही मेरे उपदेशों का पालनकरते हैं, जो मैंने आपको बताये हैं।
आप आश्वस्त रहें, यदि आप इस आत्म-साक्षात्कारके मार्ग पर सम्यक रीति से चलेंगी तो आप समस्त भयावह भौतिक कल्मष से मुक्तहोकर अन्त में मेरे पास पहुँचेंगी।
हे माता, जो लोग भक्ति की इस विधि से अवगत नहींहैं, वे जन्म-मरण के चक्र से बाहर नहीं निकल सकते।
मैत्रेय उवाचइति प्रदर्श् भगवान्सतीं तामात्मनो गतिम् ।
स्वमात्रा ब्रह्मवादिन्या कपिलोनुमतो ययौ ॥
१२॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; प्रदर्शश--उपदेश देकर; भगवान्ू-- भगवान्; सतीम्--आदरणीयाको; ताम्ू--उस; आत्मन:--आत्म-साक्षात्कार का; गतिम्--पथ; स्व-मात्रा-- अपनी माता से; ब्रह्म-वादिन्या--स्वरूपसिद्ध; कपिल:-- भगवान् कपिल के; अनुमतः--आज्ञा ली; ययौ--चला गया
श्री मैत्रेय ने कहा : अपनी ममतामयी माता को उपदेश देकर भगवान् कपिल ने उनसेआज्ञा माँगी और अपना लक्ष्य पूरा हो जाने के कारण उन्होंने अपना घर छोड़ दिया।
सा चापि तनयोक्तेन योगादेशेन योगयुक् ।
तस्मिन्नाश्रम आपीडे सरस्वत्या: समाहिता ॥
१३॥
सा--वह; च--तथा; अपि-- भी; तनय-- अपने पुत्र द्वारा; उक्तेन--कहा गया; योग-आदेशेन--योग सम्बन्धी उपदेशसे; योग-युक्ू--भक्तियोग में लगी हुईं; तस्मिन्ू--उस; आश्रमे--कुटिया में; आपीडे--फूलों का मुकुट;सरस्वत्या:--सरस्वती का; समाहिता--समाधि में स्थिर
अपने पुत्र के उपदेशानुसार देवहूति उसी आश्रम में भक्तियोग का अभ्यास करनेलगीं।
उन्होंने कर्दम मुनि के घर में समाधि लगाई, जो फूलों से इस प्रकार सुसज्जित थामानो सरस्वती नदी का फूलों का मुकुट हो।
अभीक्ष्णावगाहकपिशान्जटिलान्कुटिलालकान् ।
आत्मानं चोग्रतपसा बिभ्रती चीरिणं कृशम् ॥
१४॥
अभीक्ष्ण--पुनः पुनः, बारम्बार; अवगाह--नहाने से; कपिशानू-- भूरे; जटिलानू--जटा रूप; कुटिल--घुंघराले;अलकानू--बाल; आत्मानम्--उनका शरीर; च--तथा; उग्र-तपसा--कठोर तपस्या से; बिभ्रती--हो गया;चीरिणम्--चिथड़ों से ढकी; कृशम्--दुबली |
वे तीन बार स्नान करने लगीं और इस तरह उनके घुँघराले काले-काले बाल क्रमशःभूरे पड़ गये।
तपस्या के कारण उनका शरीर धीरे-धीरे दुबला हो गया और वे पुराने वस्त्रधारण किये रहीं।
प्रजापते: कर्दमस्य तपोयोगविजूम्भितम् ।
स्वगाहस्थ्यमनौपम्यं प्रार्थ वैमानिकेरपि ॥
१५॥
प्रजा-पतेः--प्रजापति, मानव जाति के जनक; कर्दमस्य--कर्दम मुनि की; तपः--तपस्या से; योग--योग से;विजृम्भितम्--विकसित, समृद्ध; स्व-गाईस्थ्यम्--अपना घर तथा गृहस्थी; अनौपम्यम्--अद्वितीय; प्रार्थ्यम्--ईर्ष्याकी वस्तु; वैमानिकै:--स्वर्ग के वासियों से; अपि-- भी |
प्रजापति कर्दम का घर तथा उनकी गृहस्थी उनकी तपस्या तथा योग के बल पर इसप्रकार समृद्ध थी कि उनके ऐश्वर्य से आकाश में विमान से यात्रा करने वाले लोग भीईर्ष्या करते थे।
'पयःफेननिभा: शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदा: ।
आसनानि च हैमानि सुस्पर्शास्तरणानि च ॥
१६॥
'पयः--दूध का; फेन--फेन; निभा: --सहश; शय्या: -- पलँग; दान्ता:ः--हाथी-दाँत के ; रुक्म--सुनहले;परिच्छदा:--पर्दों सहित; आसनानि--कुर्सियाँ तथ बेंचें; च--तथा; हैमानि--सोने की; सु-स्पर्श--छूने में मुलायम;आस्तरणानि-गद्दियाँ; च--तथा |
यहाँ पर कर्दम मुनि के घरेलू ऐश्वर्य का वर्णन हुआ है।
चादर तथा चटाइयाँ दूध केफेन के समान श्वेत थीं, कुर्सियाँ तथा बेंचें हाथीदाँत की बनी थीं और वे सुनहरी जरीदारवस्त्र से ढकी थीं तथा पलँग सोने के बने थे जिन पर अत्यन्त मुलायम गद्दियाँ थीं।
स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।
रलप्रदीपा आभान्ति ललना रत्नसंयुता: ॥
१७॥
स्वच्छ--शुद्ध; स्फटिक--संगमरमर; कुड्येषु--दीवालों पर; महा-मारकतेषु-- मूल्यवान मरकत मणि से अलंकृत;च--तथा; रत-प्रदीपाः--मणियों के दीपक; आभान्ति--चमकते है; ललना:--स्त्रियाँ; रतत--आभूषणों से;संयुता:--अलंकृत ।
घर की दीवालें उत्तमकोटि के संगमरमर की थीं और बहुमूल्य मणियों से अलंकृतथीं।
वहाँ प्रकाश की आवश्यकता न थी, क्योंकि इन मणियों की किरणों से घरप्रकाशित था।
घर की सभी स्त्रियाँ आभूषणों से अलंकृत थीं।
गृहोद्यानं कुसुमितै रम्यं बह्ममरद्रुमै: ।
कूजद्विहड्गरमिथुनं गायन्मत्तमधुव्रतम् ॥
१८ ॥
गृह-उद्यानम्-घरेलू बाग; कुसुमितैः--फूलों तथा फलों से; रम्यम्--सुन्दर; बहु-अमर-द्रुमैः --अनेक कल्पवृक्षोंसहित; कूजत्-गाते हुए; विहड्गन-- पक्षियों का; मिथुनम्--जोड़ा; गायत्--गुनगुनाती; मत्त--मतवाली; मधु-ब्रतम्--मधुमक्खियों सहित।
मुख्य घर का आँगन सुन्दर बगीचों से घिरा था जिनमें मधुर सुगन्धित फूल तथाअनेक वृक्ष थे जिनमें ताजे फल उत्पन्न होते थे और वे ऊँचे तथा सुन्दर थे।
ऐसे बगीचोंका आकर्षण यह था कि गाते पक्षी वृक्षों पर बैठते और उनके कलरव से तथामधुमक्खियों की गुंजार से सारा वातावरण यथासम्भव मोहक बना हुआ था।
यत्र प्रविष्टमात्मानं विबुधानुचरा जगुः ।
वाप्यामुत्पलगन्धिन्यां कर्दमेनोपलालितम् ॥
१९॥
यत्र--जहाँ; प्रविष्टम्--प्रविष्ट हुए; आत्मानम्--अपने ही; विबुध-अनुचरा:--स्वर्ग के वासियों के संगी; जगुः--गाया; वाप्यामू--ताल में; उत्पल--कमल; गन्धिन्याम्--सुगंध से; कर्दमेन--कर्दम द्वारा; उपलालितम्--सावधानी सेपाला गया।
जब देवहूति उस सुन्दर बगीचे में कमल फूलों से भरे हुए ताल में स्नान करने केलिए प्रवेश करतीं तो स्वर्गवासियों के संगी गर्न्धवगण कर्दम के महिमामय गृहस्थ जीवनका गुणगान करते।
देवहूति के महान् पति कर्दम उन्हें सभी कालों में सुरक्षा प्रदान करतेरहे।
हित्वा तदीप्सिततममप्याखण्डलयोषिताम् ।
किश्ञिच्चकार बदन पुत्रविश्लेषणातुरा ॥
२०॥
हित्वा--त्याग कर; तत्--वह घर; ईप्सित-तमम्--अभीष्ट; अपि--ही; आखण्डल-योषिताम्--इन्द्र की पत्नियों द्वारा;किझ्जित् चकार वदनम्-- उसके मुख पर उदासी छायी थी; पुत्र-विश्लेषण--अपने पुत्र के वियोग से; आतुरा--दुखी |
यद्यपि उनकी स्थिति सभी प्रकार से अद्वितीय थी, किन्तु साध्वी देवहूति ने इतनीसम्पत्ति होते हुए भी, जिसकी ईर्ष्या स्वर्ग की सुन्दरियाँ भी करती थीं, अपने सारे सुखत्याग दिये।
उन्हें यह शोक था कि उनका इतना महानू् पुत्र उनसे विलग हो रहा है।
बन॑ प्रत्नजिते पत्यावपत्यविरहातुरा ।
ज्ञाततत्त्वाप्यभून्रष्टे वत्से गौरिव वत्सला ॥
२१॥
वनम्--वन को; प्रत्नजिते पत्यौ--पति के चले जाने पर; अपत्य-विरह--अपने पुत्र के विरह से; आतुरा--अत्यन्तदुखी; ज्ञात-तत्त्वा--सत्य का ज्ञान; अपि--यद्यपि; अभूत्--हो गई; नष्टे वत्से--बछड़ा मर जाने पर; गौ: --गाय;इब--के सहश; वत्सला--स्नेहिल |
देवहूति के पति ने पहले ही गृहत्याग करके संन्यास आश्रम ग्रहण कर लिया था औरतब उनके एकमात्र पुत्र कपिल ने घर छोड़ दिया।
यद्यपि उन्हें जीवन तथा मृत्यु के सारेसत्य ज्ञात थे और यद्यपि उनका हृदय सभी प्रकार के मल से रहित था, किन्तु वे अपनेपुत्र के जाने से इस तरह दुखी थीं जिस प्रकार कि बछड़े के मरने पर गाय दुखी होती है।
तमेव ध्यायती देवमपत्यं कपिल हरिम् ।
बभूवाचिरतो वत्स निःस्पृहा ताहशे गृहे ॥
२२॥
तम्--उसको; एव--निश्चय ही; ध्यायती--ध्यान करती; देवम्--दैवी; अपत्यम्--पुत्र; कपिलमू--कपिल को;हरिम्ू-- भगवान्; बभूव--हो गयी; अचिरत:--तुरन्त; वत्स--हे विदुर; निःस्पृहा--अनासक्त; ताहशे गृहे--ऐसे घरके प्रति
हे विदुर, इस प्रकार अपने पुत्र भगवान् कपिलदेव का ध्यान करती हुईं वे शीघ्र हीउत्तम ढंग से सजे अपने घर के प्रति अनासक्त हो उठीं।
ध्यायती भगवद्गूपं यदाह ध्यानगोचरम् ।
सुतः प्रसन्नवदनं समस्तव्यस्तचिन्तया ॥
२३॥
ध्यायती--ध्यानमग्न; भगवत्-रूपम्-- भगवान् के स्वरूप को; यत्--जो; आह--उपदेश दिया; ध्यान-गोचरम्--ध्यान की वस्तु; सुत:--अपना पुत्र; प्रसन्न-वदनम्-- प्रसन्नमुख से; समस्त--समग्र; व्यस्त--अंगों का; चिन्तया--अपने मन से
तत्पश्चात् निरन्तर हँसमुख अपने पुत्र भगवान् कपिलदेव से अत्यन्त उत्सुकतापूर्वकएवं विस्तारपूर्वक सुनकर देवहूति परमेश्वर के विष्णुस्वरूप का निरन्तर ध्यान करने लगीं।
भक्तिप्रवाहयोगेन वैराग्येण बलीयसा ।
युक्तानुष्ठानजातेन ज्ञानेन ब्रह्महतुना ॥
२४॥
विशुद्धेन तदात्मानमात्मना विश्वतोमुखम् ।
स्वानुभूत्या तिरोभूतमायागुणविशेषणम् ॥
२५॥
भक्ति-प्रवाह-योगेन--निरन्तर भक्ति में लगे रहने से; बैराग्येण--वैराग्य द्वारा; बलीयसा--अत्यन्त प्रबल; युक्त-अनुष्ठान--उचित ढंग से कर्मो को करने से; जातेन--उत्पन्न; ज्ञानेन--ज्ञान से; ब्रह्म-हेतुना--ब्रह्म-साक्षात्कार होने से;विशुद्धेन--शुद्धिकरण से; तदा--तब; आत्मानम्-- भगवान् को; आत्मना--मन से; विश्वत:-मुखम्--जिसका मुखचारों ओर घूमता है; स्व-अनुभूत्या--आत्म-साक्षात्कार से; तिर:-भूत--अप्रकट; माया-गुण--प्रकृति के गुणों का;विशेषणम्--विशेष |
उन्होंने भक्ति में गम्भीरतापूर्वक संलग्न रह कर ऐसा किया।
चूँकि उनका वैराग्यप्रबल था, अतः उन्होंने मात्र शरीर की आवश्यकताओं को ग्रहण किया।
वे ब्रह्म-साक्षात्कार के कारण ज्ञान में व्यवस्थित हुईं, उनका हृदय शुद्ध हो गया, वे भगवान् केध्यान में पूर्णतः निमग्न हो गईं और प्रकृति के गुणों से उत्पन्न सारी दुर्भावनाएँ समाप्त होगईं।
ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसं श्रये ।
निवृत्तजीवापत्तित्वात्क्षीणक्लेशाप्तनिर्वृति: ॥
२६॥
ब्रह्मणि--ब्रह्म में; अवस्थित--स्थित; मति:--मन; भगवति-- भगवान् में; आत्म-संश्रये--सभी जीवों में वास करनेवाला; निवृत्त--मुक्त; जीव--जीवात्मा का; आपत्तित्वात्-दुर्भाग्य से; क्षीण--लुप्त; क्लेश--कष्ट; आप्त--प्राप्त;निर्वृतिः--दिव्य आनन्द
उनका मन भगवान् में पूर्णतः निमग्न हो गया और उन्हें स्वतः निराकार ब्रह्म का बोधहो गया।
ब्रह्म-सिद्ध आत्मा के रूप में वे भौतिक जीवन-बोध की उपाधियों से मुक्त होगईं।
इस प्रकार उनके सारे क्लेश मिट गये और उन्हें दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ।
नित्यारूढसमाधित्वात्परावृत्तगुण भ्रमा ।
न सस्मार तदात्मानं स्वप्ने दृष्टमिवोत्थित: ॥
२७॥
नित्य--शाश्वत; आरूढ--स्थित; समाधित्वात्--समाधि से; परावृत्त--मुक्त; गुण--प्रकृति के गुणों का; भ्रमा--भ्रम; न सस्मार--उसे स्मरण नहीं आया; तदा--तब; आत्मानम्--अपना शरीर; स्वप्ने-- स्वप्न में; दृष्टमू-- देखा हुआ;इब--जिस प्रकार; उत्थित:--जागा हुआ।
नित्य समाधि में स्थित होने तथा प्रकृति के गुणों से उत्पन्न भ्रम से मुक्त होने केकारण उन्हें अपना शरीर वैसे ही भूल गया जिस तरह मनुष्य को स्वप्न में अपने विविधशरीर भूल जाते हैं।
तद्देह: परत: पोषोप्यकृशश्चाध्यसम्भवात् ।
बभौ मलैरवच्छन्न: सधूम इव पावक: ॥
२८॥
तत्-देह:--उनका शरीर; परतः--अन्यों से कर्दम द्वारा उत्पन्न युवतियों से ; पोष:--पाला गया; अपि--यद्यपि;अकृशः--दुबला नहीं; च--तथा; आधि--चिन्ता; असम्भवात्--उत्पन्न न होने से; बभौ--चमका; मलै:-- धूल से;अवच्छन्न:--ढका हुआ; स-धूम:--धुएँ से घिरा; इब--सहृश; पावक:--अग्नि।
उसके शरीर की देखभाल उसके पति कर्दम द्वारा उत्पन्न अप्सराओं द्वारा की जा रहीथी और चूँकि उस समय उसे किसी प्रकार की मानसकि चिन्ता न थी, अतः उसका शरीरदुर्बल नहीं हुआ।
वह धुएँ से घिरी हुई अग्नि के समान प्रतीत हो रही थी।
स्वाड्रं तपोयोगमयं मुक्तकेशं गताम्बरम् ।
दैवगुप्तं न बुबुधे वासुदेवप्रविष्टधी: ॥
२९॥
स्व-अड्डम्ू--अपना शरीर; तप:ः--तपस्या; योग--योगाभ्यास; मयम्--पूर्णतया संलग्न; मुक्त--खुले हुए; केशम्--बाल; गत--अस्तव्यस्त; अम्बरम्--वस्त्र; दैव-- भगवान् द्वारा; गुप्तम्--रक्षित; न--नहीं; बुबुधे--उसे पता था;वासुदेव-- भगवान् में; प्रविष्ट--तल्लीन; धी: --विचार
भगवान् के विचार में सदैव तलल्लीन रहने के कारण उसे इसकी सुधि भी न रही किउसके बाल बिखर गये हैं और उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं।
एवं सा कपिलोक्तेन मार्गेणाचिरत: परम् ।
आत्मानं ब्रह्मनिर्वाणं भगवन्तमवाप ह ॥
३०॥
एवम्--इस प्रकार; सा--वह देवहूति ; कपिल--कपिल द्वारा; उक्तेन--बताये; मार्गेण--मार्ग से; अचिरतः --शीघ्र; परमू--परम; आत्मानम्--परमात्मा को; ब्रह्म--ब्रह्म; निर्वाणमम्ू--जीवन का अन्त; भगवन्तम्-- भगवान् को;अवाप- प्राप्त किया; ह--निश्चय ही
हे विदुर, कपिल द्वारा बताये गये नियमों का पालन करते हुए देवहूति शीघ्र ही भव-बन्धन से मुक्त हो गई और बिना कठिनाई के परमात्मास्वरूप भगवान् को प्राप्त हुईं।
तद्दवीरासीत्पुण्यतमं क्षेत्र त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
नाम्ना सिद्धपदं यत्र सा संसिद्धिमुपेयुषी ॥
३१॥
तत्--वह; वीर--हे वीर विदुर; आसीतू-- था; पुण्य-तमम्--सर्वाधिक पवित्र; क्षेत्रम्ू--स्थान; त्रै-लोक्य--तीनोंलोकों में; विश्रुतम्--विख्यात; नाम्ना--नाम से; सिद्ध-पदम्--सिद्ध पद; यत्र--जहाँ; सा--उसने देवहूति ने ;संसिद्धिम्--सिद्धि; उपेयुषी -- प्राप्त की
हे विदुर, जिस स्थान पर देवहूति ने सिद्धि प्राप्त की वह स्थान अत्यन्त पवित्र मानाजाता है।
यह तीनों लोकों में सिद्धपद के नाम से विख्यात है।
तस्यास्तद्योगविधुतमार्त्य मर्त्यमभूत्सरित् ।
सत्रोतसां प्रवरा सौम्य सिद्धिदा सिद्धसेविता ॥
३२॥
तस्या:--देवहूति का; तत्ू--वह; योग--योग द्वारा; विधुत--परित्यक्त; मार्त्यमू-- भौतिक तत्त्व; मर्त्यम्--समस्तनदियों में; अभूत्--हो गया; सरित्--नदी; स्रोतसाम्--समस्त नदियों में; प्रवरा--अग्रणी; सौम्य--हे भद्ग विदुर;सिद्धि-दा--सिद्धि देने वाली; सिद्ध--सिद्धि के इच्छुक पुरुषों द्वारा; सेविता--सेवित |
हे विदुर, उनके शरीर के तत्त्व पिघलकर जल बन गये और अब समस्त नदियों मेंसबसे पवित्र नदी के रूप में बह रहे हैं।
जो भी इस नदी में स्नान करता है उसे सिद्धिप्राप्त होती है, अतः सिद्धि के इच्छुक लोग उसमें स्नान करते हैं।
कपिलोपि महायोगी भगवान्पितुरा श्रमात् ।
मातरं समनुज्ञाप्य प्रागुदीचीं दिशं ययौ ॥
३३॥
कपिल:-- भगवान् कपिल; अपि--निश्चय ही; महा-योगी--ऋषि; भगवान्-- भगवान्; पितु:--अपने पिता के;आश्रमात्--कुटी में; मातरम्--अपनी माता से; समनुज्ञाप्प--आज्ञा लेकर; प्राकू-उदीचीम्--उत्तर-पूर्व, ईशानकोण;दिशम्--दिशा को; ययौ--चला गया।
हे विदुर, महामुनि भगवान् कपिल अपनी माता की आज्ञा से अपने पिता का आश्रमछोड़कर उत्तरपूर्व दिशा की ओर चले गये।
सिद्धचारणगन्धर्वर्मुनिभिश्चाप्सरोगणै: ।
स्तूयमानः समुद्रेण दत्ताहणनिकेतन: ॥
३४॥
सिद्ध--सिद्धों द्वारा; चारण--चारणों द्वारा; गन्धर्वै: --गन्धर्वों द्वारा; मुनिभि:--मुनियों द्वारा; च--तथा; अप्सरः-गणै:--अप्सराओं स्वर्ग लोक की सुन्दरियाँ द्वारा; स्तूयमान:--स्तुति किये गये; समुद्रेण--समुद्र द्वारा; दत्त--दियागया; अहण--पूजन; निकेतन:--रहने का स्थान ।
जब वे उत्तर दिशा की ओर जा रहे थे तो चारणों, गन्धर्बों, मुनियों तथा अप्सराओं नेउनकी स्तुति की और सब प्रकार से उनका सम्मान किया।
समुद्र ने उनका पूजन कियाऔर रहने के लिए स्थान दिया।
आस्ते योगं समास्थाय साड्ख्याचार्यरभिष्टृत: ।
त्रयाणामपि लोकानामुपशान्त्यै समाहित: ॥
३५॥
आस्ते--रह रहा है; योगम्--योग; समास्थाय-- अभ्यास करके; साड्ख्य--सांख्य दर्शन के; आचार्य :--महान्शिक्षकों द्वारा; अभिष्ठृत:--पूजित; त्रयाणाम्ू--तीन; अपि-- भी; लोकानाम्--लोकों के ; उपशान्त्यै--उद्धार के लिए;समाहित:ः--समाधि में स्थित।
आज भी कपिल मुनि तीनों लोकों के बद्धजीवों के उद्धार हेतु वहाँ समाधिस्थ हैंऔर सांख्य दर्शन के समस्त आचार्य उनकी पूजा करते हैं।
एतन्निगदितं तात यत्पृष्टोहं तवानघ ।
कपिलस्य च संवादो देवहूत्याश्व पावन: ॥
३६॥
एतत्--यह; निगदितम्--कहा गया; तात--हे विदुर; यत्--जो; पृष्ट:--पूछे जाने पर; अहम्--मैंने; तव-- तुम्हारेद्वारा; अनघ--हे पापरहित विदुर; कपिलस्थ--कपिल की; च--तथा; संवाद:--वार्ता; देवहूत्या:--देवहूति की;च--तथा; पावन:-शुद्ध |
हे पुत्र, तुम्हारे पूछे जाने पर मैंने तुम्हें बताया।
हे पापरहित, कपिलदेव तथा उनकीमाता के वृत्तान्त तथा उनके कार्यकलाप समस्त वार्ताओं में शुद्धतम् हैं।
य इदमनुश्रुणोति योभिथत्तेकपिलमुनेर्मतमात्मयोगगुहाम् ।
भगवति कृतधी: सुपर्णकेताव्उपलभते भगवत्पदारविन्दम् ॥
३७॥
यः--जो भी; इृदम्--इसे; अनुश्रुणोति--सुनता है; यः--जो भी; अभिधत्ते--व्याख्या करता है; कपिल-मुने:--कपिल मुनि का; मतम्--उपदेश; आत्म-योग-- भगवान् के ध्यान पर आधारित; गुहाम्--गुप्त, गूढ़; भगवति--भगवान् पर; कृत-धी:--स्थिर मन से; सुपर्ण-केतौ--गरुड़ की ध्वजा वाले; उपलभते--प्राप्त करता है; भगवत्--भगवान् के; पद-अरविन्दम्--चरणकमल।
कपिलदेव तथा उनकी माता के व्यवहारों का विवरण अत्यन्त गोपनीय है और जोभी इस वृत्तान्त को सुनता या पढ़ता है, वह गरुड़ध्वज भगवान् का भक्त बन जाता हैऔर बाद में उनकी दिव्य प्रेमा-भक्ति में प्रवृत्त होने के लिए भगवद्धाम में प्रवेश करताहै।
