← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय बत्तीस: सकाम गतिविधियों में उलझाव

3.32कपिल उबाचअथ यो गृहमेधीयान्धर्मानेवावसन्गृहे ।

काममर्थ चधर्मान्स्वान्दोग्धि भूय: पिपर्ति तान्‌ू ॥

१॥

कपिल: उवाच--भगवान्‌ कपिल ने कहा; अथ--अब; यः --जो व्यक्ति; गृह-मेधीयान्‌--गृहस्थों के; धर्मानू--कर्तव्य; एव--निश्चय ही; आवसन्‌--रहते हुए; गृहे--घर में; कामम्‌--इन्द्रियतृप्ति; अर्थभू-- आर्थिक विकास; च--तथा; धर्मानू--धार्मिक अनुष्ठान; स्वानू--अपने; दोग्धि-- भोगता है; भूयः--पुनः पुनः; पिपर्ति--सम्पन्न करता है;तानू--उनको

भगवान्‌ ने कहा : गृहस्थ जीवन बिताने वाला व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान करते हुएभौतिक लाभ प्राप्त करता रहता है और इस तरह वह आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्तिकी अपनी इच्छापूर्ति करता है।

वह पुनः पुनः इसी तरह कार्य करता है।

स चापि भगवद्धर्मात्काममूढ: पराड्मुख: ।

यजते क्रतुभिर्देवान्पितृंश्व॒ श्रद्धयान्वित: ॥

२॥

सः--वह; च अपि--और भी; भगवत्‌-धर्मात्‌-- भक्ति से; काम-मूढ:--कामवासना से अन्धा; पराक्‌-मुखः --'पराड्मुख, से मुख मोड़कर; यजते--पूजा करता है; क्रतुभि:--यज्ञों से; देवान्‌--देवताओं की; पितृन्‌--पूर्वजों की;च--तथा; श्रद्धया-- श्रद्धा से; अन्वित:--युक्त |

ऐसे व्यक्ति इन्द्रियतृप्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त होने के कारण भक्ति से विहीनहोते हैं, अतः अनेक प्रकार के यज्ञ करते रहने तथा देवों एवं पितरों को प्रसन्न करने केलिए बडे-बडे व्रत करते रहने पर भी वे कष्णभावनाम॒त अर्थात भक्ति में रुचि नहीं लेते।

तच्छुद्धयाक्रान्तमतिः पितृदेवब्रतः पुमान्‌ ।

गत्वा चान्द्रमसं लोक॑ सोमपा: पुनरेष्यति ॥

३॥

ततू-देवों तथा पितरों को; श्रद्धया--आदरपूर्वक; आक्रान्त--पराजित; मतिः--मन; पितृ--पितरों को; देव--देवताओं को; ब्रतः--उसका ब्रत; पुमान्‌--व्यक्ति; गत्वा--जाकर; चान्द्रमसम्‌--चन्द्रमा के; लोकमू--लोक को;सोम-पाः--सोमरस पीते हुए; पुनः--फिर; एष्यति--लौट आता है।

ऐसे भौतिकवादी व्यक्ति इन्द्रियतृप्ति से आकृष्ट होकर एवं अपने पितरों एवं देवताओंके प्रति भक्तिभाव रखकर चन्द्रलोक को जा सकते हैं, जहाँ वे सोमरस का पान करते हैंऔर फिर से इसी लोक में लौट आते हैं।

यदा चाहीन्द्रशय्यायां शेतेडनन्तासनो हरि: ।

तदा लोका लयं यान्ति त एते गृहमेधिनाम्‌ ॥

४॥

यदा--जब; च--तथा; अहि-इन्द्र--सर्पों के राजा शेषनाग की; शय्यायाम्‌ू--शय्या पर; शेते--लेटा रहता है;अनन्त-आसन:ः--जिसका आसन अनन्त शेष है; हरिः-- भगवान्‌ हरि; तदा--तब; लोकाः--लोक; लयमू-- प्रलय;यान्ति--जाते हैं; ते एते--वे ही; गृह-मेधिनाम्‌--गृहमेधियों के

जब भगवान्‌ हरि सर्पों की शय्या पर, जिसे अनन्त शेष कहते हैं, सोते हैं, तोभौतिकतावादी पुरुषों के सारे लोक, जिनमें चन्द्रमा जैसे स्वर्गलोक सम्मिलित हैं, विलीनहो जाते हैं।

ये स्वधर्मात्र दुह्मन्ति धीरा: कामार्थहेतवे ।

निःसड़जा न्यस्तकर्माण: प्रशान्ता: शुद्धचेतस: ॥

५॥

ये--जो; स्व-धर्मानू-- अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्य; न--नहीं; दुद्मन्ति--लाभ उठाते हैं; धीरा: --बुद्ध्िमान;काम--इन्द्रियतृप्ति; अर्थ--आर्थिक विकास; हेतवे--के लिए; नि:सड्भाः-- भौतिक आसक्ति से मुक्त; न्‍्यस्त--परित्यक्त; कर्माण: --सकाम कर्म; प्रशान्ता:--सन्तुष्ट; शुद्ध-चेतस:--शुद्धीकृत चेतना का |

जो बुद्धिमान हैं और शुद्ध चेतना वाले हैं, वे कृष्णभक्ति में पूर्णतया सन्तुष्ट रहते हैं।

वे प्रकृति के गुणों से मुक्त होकर वे इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म नहीं करते; अपितु वेअपने-अपने कर्मो में लगे रहते हैं और विधानानुसार कर्म करते हैं।

निवृत्तिधर्मनिरता निर्ममा निरहड्डू ता: ।

स्वधर्माप्तेन सत्त्वेन परिशुद्धेन चेतसा ॥

६॥

निवृत्ति-धर्म--विरक्ति के लिए धार्मिक कार्यों में; निरता:--निरन्तर लगे हुए; निर्ममा:--स्वामित्व के ज्ञान बिना;निरहड्डू ताः--अहंकाररहित; स्व-धर्म --अपने वृत्तिपरक कर्तव्य से; आप्तेन--सम्पन्न; सत्त्वेन--अच्छाई से;परिशुद्धेन--पूर्णतः शुद्ध; चेतसा--चेतना से |

अपने कर्तव्य-निर्वाह, विरक्तभाव से तथा स्वामित्व की भावना से अथवा अहंकारसे रहित होकर काम करने से मनुष्य पूर्ण शुद्ध चेतना के द्वारा अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आसीन होकर और इस प्रकार से भौतिक कर्तव्यों को करते हुए सरलता के साथ ईश्वरके धाम में प्रविष्ट हो सकता है।

सूर्यद्वारेण ते यान्ति पुरुषं विश्वतोमुखम्‌ ।

परावरेशं प्रकृतिमस्योत्पत्त्यन्तभावनम्‌ ॥

७॥

सूर्य-द्वारेण-- प्रकाश मार्ग से होकर; ते--वे; यान्ति--निकट जाते हैं; पुरुषम्‌-- भगवान्‌ के; विश्वतः-मुखम्‌--जिसका मुख सर्वत्र घूमता है; पर-अवर-ईशम्‌--आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का स्वामी; प्रकृतिम्‌ू-- भौतिककारण; अस्य--संसार की; उत्पत्ति--प्राकट्य का; अन्त--प्रलय का; भावनम्‌--कारण |

ऐसे मुक्त पुरुष प्रकाशमान मार्ग से होकर भगवान्‌ तक पहुँचते हैं, जो भौतिक तथाआध्यात्मिक जगतों का स्वामी है और इन जगतों की उत्पत्ति तथा अन्त का परम कारणहै।

द्विपरार्धावसाने यः प्रलयो ब्रह्मणस्तु ते ।

तावदध्यासते लोक॑ परस्य परचिन्तका: ॥

८॥

द्वि-परार्ध--दो परार्धों के; अवसाने--अन्त में; य:--जो; प्रलय: --मृत्यु; ब्रह्मण: -- भगवान्‌ ब्रह्म की; तु--लेकिन;ते--वे; तावत्‌ू--तब तक; अध्यासते--रहते हैं; लोकम्‌--लोक में; परस्य--परमे श्वर का; पर-चिन्तका:-- भगवान्‌का चिन्तन करते हुए।

भगवान्‌ के हिरण्यगर्भ विस्तार के उपासक इस संसार में दो परार्धों के अन्त तक रहेआते हैं, जब ब्रह्मा की भी मृत्यु हो जाती है।

क्ष्माम्भोउनलानिलवियन्मनइन्द्रियार्थ-भूतादिभि: परिवृतं प्रतिसझ्िहीर्षु: ।

अव्याकृतं विशति यर्हिं गुणत्रयात्माकालं पराख्यमनुभूय परः स्वयम्भूः ॥

९॥

क्ष्मा--पृथ्वी; अम्भ:--जल; अनल--अग्नि; अनिल--वायु; वियत्‌--शून्य; मन: --मन; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अर्थ--इन्द्रियों के विषय; भूत--अहंकार; आदिभि:--इत्यादि से; परिवृतम्‌--आच्छादित; प्रतिसज्िहीर्षु:--संहार करने कीइच्छा से; अव्याकृतम्‌-परिर्वतनहीन वैकुण्ठ; विशति--प्रवेश करता है; यहिं--जिस समय; गुण-त्रय-आत्मा--तीनगुणों से युक्त; कालम्‌--काल; पर-आख्यम्‌--दो परार्ध; अनुभूय--अनुभव करके; पर:--प्रमुख; स्वयम्भू:--भगवान्‌

ब्रह्मात्रिगुणात्मिका प्रकृति के निवास करने योग्य दो परा्धों के काल का अनुभव करकेश्री ब्रह्मा इस ब्रह्माण्ड का, जो पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, अहंकार आदिके आवरणों से ढका हुआ है, संहार कर देते हैं और भगवान्‌ के पास चले जाते हैं।

एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागा: ।

तेनैव साकममृतं पुरुष पुराणंब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमाना: ॥

१०॥

एवमू--इस प्रकार; परेत्य--दूर तक जाकर; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌ ब्रह्मा; अनुप्रविष्टा:--प्रविष्ट; ये--जो; योगिन: --योगीजन; जित--वश में किये हुए; मरुत्‌-- श्वास; मनसः विरागा:--विरक्त; तेन--ब्रह्मा से; एब--निस्सन्देह;साकम्‌--साथ; अमृतम्‌-- आनन्द रूप; पुरुषम्‌-- भगवान्‌ को; पुराणम्‌--प्राचीनतम; ब्रह्म प्रधानम्‌--परब्रहा;उपयान्ति--जाते हैं; अग॒त--न गये हुए; अभिमाना:--जिनका अहंकार

जो योगी प्राणायाम तथा मन-निग्रह द्वारा इस संसार से विरक्त हो जाते हैं, वेब्रह्मलोक पहुँचते हैं, जो बहुत ही दूर है।

वे अपना शरीर त्याग कर ब्रह्मा के शरीर मेंप्रविष्ट होते हैं, अतः जब ब्रह्मा को मोक्ष प्राप्त होता है और वे भगवान्‌ के पास जाते हैं,जो परब्रह्म हैं, तो ऐसे योगी भी भगवद्धाम में प्रवेश करते हैं।

अथ त॑ सर्वभूतानां हत्पदोषु कृतालयम्‌ ।

श्रुतानुभावं शरणं ब्रज भावेन भामिनि ॥

११॥

अथ--अत:; तम्‌ू-- भगवान्‌ को; सर्व-भूतानाम्‌--समस्त जीवों के; हत्‌ू-पदोषु--कमल हृदयों में; कृत-आलयम्‌--निवास करते हुए; श्रुत-अनुभावम्‌--जिनका यश आपने सुना; शरणम्‌--शरण में; ब्रज--जाओ; भावेन--भक्तिद्वारा; भामिनि--हे माता

अतः हे माता, आप प्रत्यक्ष भक्ति द्वारा जन-जन के हृदय में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ की शरण ग्रहण करें।

आद्य: स्थिरचराणां यो वेदगर्भ: सहर्षिभि: ।

योगेश्वर: कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तक: ॥

१२॥

भेददृष्य्याभिमानेन नि:सड्रेनापि कर्मणा ।

कर्तृत्वात्सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम्‌ ॥

१३॥

स संसृत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना ।

जाते गुणव्यतिकरे यथापूर्व प्रजायते ॥

१४॥

ऐश्वर्य पारमेछ्यं च तेडपि धर्मविनिर्मितम्‌ ।

निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरे सति ॥

१५॥

आद्य:--स्रष्टा, ब्रह्म; स्थिर-चराणाम्‌--जड़ तथा जंगम का; य:--जो; वेद-गर्भ:--वेदगर्भ; सह--साथ;ऋषिभि:--ऋषियों के; योग-ईश्वरैः--महान्‌ योगियों के साथ; कुमार-आद्यै:--कुमारगण तथा अन्य; सिद्धैः--सिद्धपुरुषों के साथ; योग-प्रवर्तकैः--योग पद्धति के जन्मदाता; भेद-दृष्य्या--स्वतन्त्र दृष्टि के कारण; अभिमानेन-गर्वसे; निःसड्रेन--निष्काम; अपि--यद्यपि; कर्मणा--कार्यो से; कर्तृत्वात्‌ू-कर्ता होने के भाव से; स-गुणम्‌--दैवीगुणों से युक्त; ब्रहा--ब्रह्म ; पुरुषम्‌-- भगवान्‌; पुरुष-ऋषभम्‌-- प्रथम पुरुष अवतार को; सः--वह; संसृत्य--प्राप्तकरके; पुनः--फिर; काले--समय पर; कालेन--काल द्वारा; ईश्वर-मूर्तिना-- भगवान्‌ का रूप; जाते गुण-व्यतिकरे--जब गुणों की प्रतिक्रिया होती है; यथा--जिस तरह; पूर्वम्‌--पहले; प्रजायते--उत्पन्न होता है; ऐश्वर्यम्‌--ऐश्वर्य; पारमेछ्यम्‌्--राजोचित; च--तथा; ते--ऋषिगण; अपि-- भी; धर्म--अपने पुण्य कर्मों से; विनिर्मितम्‌--उत्पन्न; निषेव्य-- भोगा जाकर; पुनः--फिर; आयान्ति--लौटते हैं; गुण-व्यतिकरे सति--जब गुणों की प्रतिक्रियाहोती है।

हे माता, भले ही कोई किसी विशेष स्वार्थ से भगवान्‌ की पूजा करे, किन्तु ब्रह्माजैसे देवता, सनत्कुमार जैसे ऋषि-मुनि तथा मरीचि जैसे महामुनि सृष्टि के समय इसजगत में पुनः लौट आते हैं।

जब प्रकृति के तीनों गुणों की अन्तःक्रिया प्रारम्भ होती है,तो काल के प्रभाव से इस दृश्य जगत के स्त्रष्टा तथा वैदिक ज्ञान से पूर्ण ब्रह्मा एवंआध्यात्मिक मार्ग तथा योग-पद्धति के प्रवर्तक बड़े-बड़े ऋषि वापस आ जाते हैं।

वेअपने निष्काम कर्मों से मुक्त तो हो जाते हैं और पुरुष के प्रथम अवतार आदि पुरुष को प्राप्त होते हैं, किन्तु सृष्टि के समय वे पुनः अपने पहले के ही रूपों तथा पदों मेंवापस आ जाते हैं।

ये त्विहासक्तमनस: कर्मसु श्रद्धयान्विता: ।

कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्सनश: ॥

१६॥

ये--जो; तु--लेकिन; इह--इस संसार में; आसक्त--अनुरक्त; मनस:--जिनके मन; कर्मसु--कर्मो में; श्रद्धया--श्रद्धा से; अन्विता: --युक्त; कुर्वन्ति--करते हैं; अप्रतिषिद्धानि--फल के प्रति आसक्ति सहित, काम्य; नित्यानि--नियत कर्म; अपि--निश्चय ही; च--तथा; कृत्स्नश: --बारम्बार |

जो लोग इस संसार के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं, वे अपने नियत कर्मों को बड़े हीढंग से तथा अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सम्पन्न करते हैं।

वे ऐसे नित्यकर्मों को कर्मफल कीआशा से करते हैं।

रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोजितेन्द्रिया: ।

पितृन्यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशया: ॥

१७॥

रजसा--रजोगुण द्वारा; कुण्ठ--चिन्ताओं से पूर्ण; मनस:--मन; काम-आत्मान:--इन्दियतृप्ति की इच्छा करते हुए;अजित--अनियन्त्रित; इन्द्रिया:--इन्द्रियाँ; पितृन्‌--पूर्वजों, पितरगणों; यजन्ति--पूजा करते हैं; अनुदिनम्‌-- प्रतिदिन;गृहेषु--घरेलू जीवन में; अभिरत--लगे हुए; आशया:--मन |

ऐसे लोग, रजोगुण से प्रेरित होकर चिन्ताओं से व्याप्त रहते हैं और इन्द्रियों को वशमें न कर सकने के कारण सदैव इन्द्रियतृप्ति की कामना करते रहते हैं।

वे पितरों कोपूजते हैं और अपने परिवार, सामाजिक या राष्ट्रीय जीवन की आर्थिक स्थिति सुधारने मेंरात-दिन लगे रहते हैं।

त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधस: ।

कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विष: ॥

१८ ॥

त्रै-वर्गिका:--तीन उन्नतिकारी विधियों में रूचि रखने वाले; ते--वे; पुरुषा: व्यक्ति; विमुखा:--रुचि न रखने वाले;हरि-मेधस:-- भगवान्‌ हरि की; कथायाम्‌--लीलाओं में; कथनीय--कीर्तन करने योग्य; उरू-विक्रमस्थ--जिनकासर्वोत्तम विक्रम शौर्य ; मधु-द्विष:--मधु असुर के वध करने वाले

ऐसे लोग त्रैवर्गिक कहलाते हैं, क्योंकि वे तीन उन्नतिकारी विधियों-पुरुषार्थो-मेंरुचि लेते हैं।

वे उन भगवान्‌ से विमुख हो जाते हैं, जो बद्धजीवों को विश्राम प्रदान करनेवाले हैं।

वे भगवान्‌ की उन लीलाओं में कोई अभिरुचि नहीं दिखाते, जो भगवान्‌ केदिव्य विक्रम के कारण श्रवण करने योग्य हैं।

नूनं दैवेन विहता ये चाच्युतकथासुधाम्‌ ।

हित्वा श्रुण्वन्त्यसद्गाथा: पुरीषमिव विड्भुज: ॥

१९॥

नूनम्‌--निश्चय ही; दैवेन-- भगवान्‌ की आज्ञा से; विहता: --निन्दित; ये--जो; च-- भी; अच्युत--अमोघ भगवान्‌की; कथा--कहानियाँ; सुधाम्‌--अमृत; हित्वा--त्याग कर; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; असत्‌-गाथा:-- भौतिकतावादीपुरुषों की कहानियाँ; पुरीषमू--मल; इब--सहश; विट्‌-भुज:--विष्ठा

भोजी सूकर ऐसे व्यक्ति भगवान्‌ के परम आदेशानुसार निन्दित होते हैं।

चूँकि वे भगवान्‌ केकार्यकलाप रूपी अमृत से विमुख रहते हैं, अतः उनकी तुलना विष्ठाभोजी सूकरों से कीगई है।

वे भगवान्‌ के दिव्य कार्यकलापों को न सुनकर भौतिकतावादी पुरुषों कीकुत्सित कथाएँ सुनते हैं।

दक्षिणेन पथार्यम्ण: पितृलोकं ब्रजन्ति ते ।

प्रजामनु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृत: ॥

२०॥

दक्षिणेन--दक्षिणी; पथा--मार्ग से; अर्यम्ण: --सूर्य के; पितृ-लोकम्‌--पितृ लोक को; ब्रजन्ति--जाते हैं; ते--वे;प्रजामू--अपने परिवार; अनु--के साथ; प्रजायन्ते--जन्म लेते हैं; शमशान--मरघट; अन्त--अन्त में; क्रिया--सकामकर्म; कृतः--करते हुए

ऐसे भौतिकतावादी व्यक्तियों को सूर्य के दक्षिण मार्ग से पितूलोक जाने दिया जाताहै, किन्तु वे इस लोक में पुन: आकर अपने-अपने परिवारों में जन्म लेते हैं और जन्म सेलेकर जीवन के अन्त तक पुनः उसी तरह कर्म करते हैं।

ततस्ते क्षीणसुकृता: पुनर्लोकमिमं सति ।

'पतन्ति विवशा देवै: सद्यो विभ्रंशितोदया: ॥

२१॥

ततः--तब; ते--वे; क्षीण--चुक जाने पर; सु-कृताः--पुण्य कर्मों के फल; पुन:--फिर; लोकम्‌ इमम्‌ू--इस लोकमें; सति--हे सती माता; पतन्ति--गिरते हैं; विवशा:--असहाय; देवै:--दैववश; सद्यः--अचानक; विभ्रेशित--गिराये जाकर; उदया:--उनकी सम्पन्नता।

जब उनके पुण्यकर्मों का फल चुक जाता है, तो वे दैववश नीचे गिरते हैं और पुनःइस लोक में आ जाते हैं जिस प्रकार किसी व्यक्ति को ऊँचे उठाकर सहसा नीचे गिरादिया जाये।

तस्मात्त्वं सर्वभावेन भजस्व परमेष्टिनम्‌ ।

तद्गुणाश्रयया भक्त्या भजनीयपदाम्बुजम्‌ ॥

२२॥

तस्मात्‌ू--अतः; त्वमू-तुम देवहूति ; सर्व-भावेन--प्रेमानु भूति में; भजस्व--पूजा करो; परमेष्ठटिनम्‌-- भगवान्‌ को;ततू-गुण-- भगवान्‌ के गुण; आश्रयया--से सम्बन्धित; भक्त्या--भक्ति से; भजनीय--पूज्य; पद-अम्बुजम्‌ू--जिनकेचरणकमल।

अतः हे माता, मैं आपको सलाह देता हूँ कि आप भगवान्‌ की शरण ग्रहण करेंजिनके चरणकमल पूजनीय हैं।

इसे आप समस्त भक्ति तथा प्रेम से स्वीकार करें,क्योंकि इस तरह से आप दिव्य भक्ति को प्राप्त हो सकेंगी।

वबासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित: ।

जनयत्याशु बैराग्यं ज्ञानं यद्वह्मदर्शनम्‌ ॥

२३॥

वासुदेवे--कृष्ण के प्रति; भगवति-- भगवान्‌; भक्ति-योग: -- भक्ति; प्रयोजित: --की गयी; जनयति--उत्पन्न करतीहै; आशु--तुरन्त; वैराग्यम्‌--विरक्ति; ज्ञाममू--ज्ञान; यत्‌ू--जो; ब्रह्म-दर्शनम्‌--आत्म-साक्षात्कार।

कृष्णचेतना में लगने और भक्ति को कृष्ण में लगाने से ज्ञान, विरक्ति तथा आत्म-साक्षात्कार में प्रगति करना सम्भव है।

यदास्य चित्तमर्थेषु समेष्विन्द्रियवृत्तिभि: ।

न विगृह्ाति वैषम्यं प्रियमप्रियमित्युत ॥

२४॥

यदा--जब; अस्य-- भक्त का; चित्तम्‌--मन; अर्थेषु--विषयों में; समेषु--सम; इन्द्रिय-वृत्तिभि:--इन्द्रियों कीक्रियाओं से; न--नहीं; विगृह्ञाति--देखता है; वैषम्यम्‌-- अन्तर; प्रियम्‌--स्वीकार्य; अप्रियम्‌--अस्वीकार्य; इति--इस प्रकार; उत--निश्चय ही।

उच्च भक्त का मन इन्द्रिय-वृत्तियों में समदर्शी हो जाता है और वह प्रिय तथा अप्रियसे परे हो जाता है।

स तदैवात्मनात्मानं नि:सड़ं समदर्शनम्‌ ।

हेयोपादेयरहितमारूढं पदमीक्षते ॥

२५॥

सः--वह; तदा--तब; एब--निश्चय ही; आत्मना--अपनी दिव्य बुद्धि से; आत्मानम्‌--अपने आपको; निःसड्डमू--भौतिक आसक्ति से रहित; सम-दर्शनम्‌ू--दृष्टि में समभाव; हेय--त्याज्य; उपादेय--ग्राह्म; रहितम्‌--विहीन;आरूढम्‌--आसीन; पदम्‌--दिव्य पद पर; ईक्षते--देखता है।

अपनी दिव्य बुद्धि के कारण शुद्ध भक्त समदर्शी होता है और अपने आपको पदार्थके कल्मष से रहित देखता है।

वह किसी वस्तु को श्रेष्ठ या निम्न नहीं मानता और परमपुरुष के गुणों में समान होने के कारण अपने आपको परम पद पर आरूढ़ अनुभवकरता है।

ज्ञानमात्रं पर ब्रह्म परमात्मेश्वर: पुमान्‌ ।

हृश्यादिभिः पृथग्भावैर्भगवानेक ईयते ॥

२६॥

ज्ञान-नज्ञान; मात्रमू-केवल; परम्‌--दिव्य; ब्रह्म--ब्रह्म ; परम-आत्मा--परमात्मा; ईश्वर: --ई धर, नियामक;पुमान्‌--परमात्मा; हशि-आदिभि:--दार्शनिक खोज तथा अन्य विधियों से; पृथक्‌ भाव: --ज्ञान की विविध विधियोंके अनुसार; भगवानू-- श्री भगवान्‌; एक:--अकेला; ईयते--अनुभव किया जाता है।

केवल भगवान्‌ ही पूर्ण दिव्य ज्ञान हैं, किन्तु समझने की भिन्न-भिन्न विधियों केअनुसार वे या तो निर्गुण ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्‌ या पुरुष अवतार के रूप में भिन्न-भिन्नप्रतीत होते हैं।

एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः ।

युज्यतेउभिमतो हार्थों यदसड़स्तु कृत्सनश: ॥

२७॥

एतावान्‌--इतना; एव--ही; योगेन--योगाभ्यास द्वारा; समग्रेण--सम्पूर्ण; हह--इस संसार में; योगिन:--योगी का;युज्यते--प्राप्त होता है; अभिमत:--इच्छित; हि--निश्चय ही; अर्थ:--अभिप्राय, उद्देश्य; यत्‌--जो; असड्डभ:--वैराग्य;तु--निस्सन्देह; कृत्स्नशः--पूर्णतया |

समस्त योगियों के लिए सबसे बड़ी सूझबूझ तो पदार्थ से पूर्ण विरक्ति है, जिसे योगके विभिन्न प्रकारों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

ज्ञानमेक॑ पराचीनैरिन्द्रियैब्रह्य निर्गुणम्‌ ।

अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा ॥

२८॥

ज्ञानमू--ज्ञान; एकम्‌--एक; पराचीनै:--पराड्रमुख; इन्द्रिये:--इन्द्रियों के द्वारा; ब्रह्म--परम सत्य; निर्गुणम्‌-गुणोंसे परे; अवभाति-- प्रकट होता है; अर्थ-रूपेण--विभिन्न विषयों के रूप में; भ्रान्या-- भूल से; शब्द-आदि--शब्दइत्यादि; धर्मिणा--से युक्त

जो अध्यात्म से पराड्मुख हैं वे परम सत्य परमेश्वर को कल्पित इन्द्रिय-प्रतीतिद्वारा अनुभव करते हैं, अतः भ्रान्तिवश उन्हें प्रत्येक वस्तु सापेक्ष प्रतीत होती है।

यथा महानहंरूपस्त्रिवृत्पज्ञविध: स्वराट्‌ ।

एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद्यतः ॥

२९॥

यथा--जिस तरह; महान्‌ू--महत्-तत्त्व; अहमू-रूप:--मिथ्या, अहंकार; त्रि-वृत्‌ू--प्रकृति के तीन गुण; पञ्ञ-विध:--पाँच भौतिक तत्त्व; स्व-राट्‌--व्यष्टि चेतना; एकादश-विध:--ग्यारह इन्द्रियाँ; तस्थ--जीव की; वपु:--शरीर; अण्डम्‌ू--ब्रह्मण्ड; जगत्‌--विश्व; यत:--जिससे

मैंने महत्‌ तत्त्व या समग्र शक्ति से अहंकार, तीनों गुण, पाँचों तत्त्व, व्यष्टि चेतना,ग्यारह इन्द्रियाँ तथा शरीर उत्पन्न किये हैं।

इसी प्रकार मुझ भगवान्‌ से ही सारा ब्रह्माण्डप्रकट हुआ।

एतट्टे श्रद्धया भक्त्या योगाभ्यासेन नित्यशः ।

समाहितात्मा निःसझ् विरक्त्या परिपश्यति ॥

३०॥

एतत्‌--यह; वै--निश्चय ही; श्रद्धया-- श्रद्धा से; भक्त्या-- भक्ति से; योग-अभ्यासेन--योगाभ्यास से; नित्यश:--सदैव; समाहित-आत्मा--स्थिर चित्त वाला; निःसड्रः--भौतिक संगति से विलग; विरक्त्या--विरक्ति से;'परिपश्यति--समझता है।

यह पूर्ण ज्ञान उस व्यक्ति को प्राप्त होता है, जो पहले से ही श्रद्धा, तन्मयता तथा पूर्णविरक्ति सहित भक्ति में लगा रहता है और भगवान्‌ के विचार में निरन्तर निमग्न रहता है।

वह भौतिक संगति से निर्लिप्तदूर रहता है।

इत्येतत्कथितं गुर्वि ज्ञानं तद्बह्मदर्शनम्‌ ।

येनानुबुद्धबते तत्त्वं प्रकृते: पुरुषस्थ च ॥

३१॥

इति--इस प्रकार; एतत्‌--यह; कथितम्‌-- वर्णित; गुर्वि-- आदरणीय माता; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; तत्‌--उस; ब्रह्म--परमसत्य; दर्शनम्‌--प्राकट्य; येन--जिससे; अनुबुद्धयते--समझा जाता है; तत्त्वम्‌--सत्य; प्रकृतेः--पदार्थ का;पुरुषस्थ--आत्मा का; च--तथा

आदरणीय माता, मैंने पहले ही आप को ही परम सत्य जानने का मार्ग बता दिया है, जिससे मनुष्य पदार्थ तथा आत्मा एवं उनके सम्बन्ध के वास्तविक सत्य को समझ सकता है।

ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षण: ।

द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षण: ॥

३२॥

ज्ञान-योग: --दार्शनिक शोध; च--तथा; मत्‌-निष्ठ:--मुझको लक्षित करके; नैर्गुण्य:--प्रकृति के गुणों से मुक्त;भक्ति-- भक्ति; लक्षण:--नामक; द्वयो:--दोनों का; अपि-- और; एक:--एक; एव--निश्चय ही; अर्थ:--अभिप्राय;भगवत्‌-- भगवान्‌; शब्द--शब्द से; लक्षण:--बताने वाला।

दार्शनिक शोध का लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ को जानना है।

इस ज्ञान को प्राप्तकरके जब मनुष्य प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है, तो उसे भक्ति की अवस्था प्राप्तहोती है।

मनुष्य को चाहे, प्रत्यक्षतः भक्ति से हो या दार्शनिक शोध से हो, एक ही गन्तव्यकी खोज करनी होती है और वह है भगवान्‌।

यथेन्द्रिय: पृथम्द्वारैरर्थों बहुगुणा श्रयः ।

एको नानेयते तद्वद्भगवान्शास्त्रवर्त्मभि: ॥

३३॥

यथा--जिस प्रकार; इन्द्रिये:--इन्द्रियों से; पृथक्‌-द्वारै:ः--विभिन्न प्रकार से; अर्थ:--वस्तु; बहु-गुण--अनेक गुणों;आश्रयः--से युक्त; एक:--एक; नाना--भिन्न-भिन्न प्रकार से; ईयबते--अनुभव किया जाता है; तद्बत्‌--उसी प्रकार;भगवान्‌-- भगवान्‌; शास्त्र-वर्त्मभि: --विभिन्न शास्त्रीय आदेशों के अनुसार।

एक ही वस्तु अपने विभिन्न गुणों के कारण भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा भिन्न-भिन्नप्रकार से ग्रहण की जाती है।

इसी तरह भगवान्‌ एक है, किन्तु विभिन्न शास्त्रीय आदेशोंके अनुसार वह भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है।

क्रियया क्रतुभिदनिस्तपःस्वाध्यायमर्शने: ।

आत्मेन्द्रियजयेनापि सन्न्यासेन च कर्मणाम्‌ ॥

३४॥

योगेन विविधाड़ेन भक्तियोगेन चैव हि ।

धर्मेणोभयचिदह्वेन यः प्रवृत्तिनिवृत्तिमान्‌ ॥

३५॥

आत्मतत्त्वावबोधेन वैराग्येण हढेन च ।

ईयते भगवानेभि: सगुणो निर्गुण: स्वहक्‌ ॥

३६॥

क्रियया--सकाम कर्म से; क्रतुभि:--यज्ञ से; दानैः--दान से; तपः--तपस्या; स्वाध्याय--वैदिक साहित्य काअध्ययन; मर्शनै:--तथा ज्ञानयोग के द्वारा; आत्म-इन्द्रिय-जयेन--मन तथा इन्द्रियों को वश में करने से; अपि-- भी;सन्न्यासेन--संन्यास के द्वारा; च--तथा; कर्मणाम्‌--सकाम कर्मो का; योगेन--योग से; विविध-अड्रेन--विविधविभागों वाले; भक्ति-योगेन-- भक्ति से; च--तथा; एव--निश्चय ही; हि--निस्सन्देह; धर्मेण--नियत कार्यों से;उभय-चिह्नेन--दोनों लक्षणों वाले; यः--जो; प्रवृत्ति--आसक्ति; निवृत्ति-मान्‌--वैराग्य से युक्त; आत्म-तत्त्व--आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान; अवबोधेन--ज्ञान से; वैराग्येण--वैराग्य से; इढेन--हढ़; च--तथा; ईयते-- अनुभवकिया जाता है; भगवानू-- भगवान्‌; एभि: -- इनसे; स-गुण:-- भौतिक संसार में; निर्गुण: --गुणों से परे; स्व-हक्‌--अपनी वैधानिक स्थिति को देखने वाला।

सकाम कर्म तथा यज्ञ सम्पन्न करके, दान देकर, तपस्या करके, विविध शास्त्रों केअध्ययन से, ज्ञानयोग से, मन के निग्रह से, इन्द्रियों के दमन से, संन्यास ग्रहण करकेतथा अपने आश्रम के कर्तव्यों का निर्वाह करके, योग की विभिन्न विधियों को सम्पन्नकरके, भक्ति करके तथा आसक्ति और विरक्ति के लक्षणों से युक्त भक्तियोग को प्रकटकरके, आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को जान करके तथा प्रबल वैराग्य भाव जागृतकरके आत्म-साक्षात्कार की विभिन्न विधियों को समझने में अत्यन्त पटु व्यक्ति उस रूपमें भगवान्‌ का साक्षात्कार करता है जैसा कि वे भौतिक जगत में तथा अध्यात्म में निरूपित किये जाते हैं।

प्रावोचं भक्तियोगस्य स्वरूपं ते चतुर्विधम्‌ ।

कालस्य चाव्यक्तगतेरयों उन्तर्धावति जन्तुषु ॥

३७॥

प्रावोचम्‌--कहा गया; भक्ति-योगस्य-- भक्ति का; स्वरूपमू--पहचान, स्वरूप; ते--तुमसे; चतु:-विधम्‌--चारविभागों में; कालस्य--समय का; च-- भी; अव्यक्त-गतेः--जिसकी गति अलक्षित है; य:--जो; अन्तर्धावति--पीछाकरता है; जन्तुषु--जीवों का

है माताआपसे मैं भक्तियोग तथा चार विभिन्न आश्रमों में इसके स्वरूप की व्याख्याकर चुका हूँ।

मैं आपको यह भी बता चुका कि शाश्वत काल किस तरह जीवों का पीछाकर रहा है यद्यपि यह उनसे अदृश्य रहता है।

जीवस्य संसृतीर्बद्वीरविद्याकर्मनिर्मिता: ।

यास्वड् प्रविशन्नात्मा न वेद गतिमात्मनः ॥

३८॥

जीवस्य--जीव की; संसृती:--संसार के मार्ग; बह्नी:ः--अनेक; अविद्या--अज्ञान; कर्म--कार्य से; निर्मिता:--उत्पन्न;यासु--जिनमें; अड्ग--हे माता; प्रविशन्‌--प्रवेश करते हुए; आत्मा--जीव; न--नहीं; वेद--जानता है; गतिमू--गति; आत्मन:-- अपनी

अज्ञान में किये गये कर्म अथवा अपनी वास्तविक पहचान की विस्मृति के अनुसारजीवात्मा के लिए अनेक प्रकार के भौतिक अस्तित्व होते हैं।

हे माता, यदि कोई इसविस्मृति में प्रविष्ट होता है, तो वह यह नहीं समझ पाता कि उसकी गतियों का अन्त कहाँहोगा।

नैतत्खलायोपदिशेन्नाविनीताय कर्हिचित्‌ ।

न स्तब्धाय न भिन्नाय नैव धर्मध्वजाय च ॥

३९॥

न--नहीं; एतत्‌--यह उपदेश; खलाय--ईर्ष्यालुओं को; उपदिशेत्‌--उपदेश देना चाहिए; न--नहीं; अविनीताय--अविनीत को; कहिंचित्‌--क भी; न--नहीं; स्तब्धाय--घमंडी को; न--नहीं; भिन्नाय--दुराचारी को; न--नहीं;एव--निश्चय ही; धर्म-ध्वजाय--दम्भियों को; च-- भी |

भगवान्‌ कपिल ने आगे कहा : यह उपदेश उन लोगों के लिए नहीं है, जो ईर्ष्यालु हैं,अविनीत हैं या दुराचारी हैं।

न ही यह उपदेश दम्भियों या उन व्यक्तियों के लिए है, जिन्हेंअपनी भौतिक सम्पदा का गर्व है।

न लोलुपायोपदिशेन्न गृहारूढचेतसे ।

नाभक्ताय च मे जातु न मद्धक्तद्विषामपि ॥

४०॥

न--नहीं; लोलुपाय--लालची को; उपदिशेत्‌--उपदेश देवे; न--नहीं; गृह-आरूढ-चेतसे --गृहस्थ जीवन के प्रतिआसक्त को; न--नहीं; अभक्ताय--अभक्त को; च--तथा; मे--मेरा; जातु--कभी; न--नहीं; मत्‌--मेरे; भक्त--भक्तगण; द्विषामू--ईर्ष्यालुओं को; अपि-- भी

यह उपदेश न तो उन लोगों को दिया जाय जो अत्यन्त लालची हैं और गृहस्थ जीवनके प्रति अत्यधिक आसक्त हैं, न ही अभक्तों और भक्तों एवं भगवान्‌ के भक्तों तथाभगवान्‌ के प्रति ईर्ष्या रखने वालों को दिया जाय।

अ्रद्धानाय भक्ताय विनीतायानसूयवे ।

भूतेषु कृतमैत्राय शु श्रूषाभिरताय च ॥

४१॥

अ्रदधधानाय-- श्रद्धालु; भक्ताय-- भक्त के लिए; विनीताय--विनीत; अनसूयवे--ईर्ष्यारहित; भूतेषु--समस्त जीवोंको; कृत-मैत्राय--मैत्री भाव; शुश्रूषा--सेवा; अभिरताय--करने के लिए इच्छुक; च--तथा।

ऐसे श्रद्धालु भक्त को उपदेश दिया जाय जो गुरु के प्रति सम्मानपूर्ण, द्वेष न करनेवाला, समस्त जीवों के प्रति मैत्री भाव रखने वाला हो तथा श्रद्धा और निष्ठापूर्वक सेवाकरने के लिए उत्सुक हो।

बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम्‌ ।

निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रिय: ॥

४२॥

बहि:--बाहरी; जात-विरागाय--विरागी को, अनासक्त को; शान्त-चित्ताय--शान्त मन वाले को; दीयताम्‌--उपदेशदिया जाय; निर्मत्सराय--मत्सरशून्य, द्वेष न रखने वाले को; शुचये-- पूर्णतया शुद्ध; यस्थय--जिसका; अहम्‌--मैं;प्रेयसाम्‌--प्रियों में; प्रिय: --अत्यन्त प्रिय

गुरु द्वारा यह उपदेश ऐसे व्यक्तियों को दिया जाय जो भगवान्‌ को अन्य किसी भीवस्तु से अधिक प्रिय मानते हैं, जो किसी के प्रति द्वेष नहीं रखते, जो पूर्ण शुद्ध चित्त हैंऔर जिन्होंने कृष्णचेतना की परिधि के बाहर विराग उत्पन्न कर लिया है।

य इदं श्रृणुयादम्ब अश्रद्धया पुरुष: सकृत्‌ ।

यो वाभिधत्ते मच्चित्त: स होति पदवीं च मे ॥

४३॥

यः--जो; इृदम्‌--इसको; श्रृणुयात्‌--सुनेगा; अम्ब--हे माता; श्रद्धया-- श्रद्धा से; पुरुष: -- व्यक्ति; सकृतू--एकबार; यः--जो; वा--अथवा; अभिधत्ते--उच्चारण करता है; मत्‌-चित्त:--अपने मन को मुझ पर स्थित करके;सः--वह; हि--निश्चय ही; एति--प्राप्त करता है; पदवीम्‌-- धाम को; च--तथा; मे--मेरा ।

जो कोई श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक एक बार मेरा ध्यान करता है, मेरे विषय में सुनतातथा कीर्तन करता है, वह निश्चय ही भगवान्‌ के धाम को वापस जाता है।

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची