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अध्याय तीस: भगवान कपिल द्वारा प्रतिकूल सकाम गतिविधियों का वर्णन
3.30कपिल उबाचतस्यैतस्य जनो नूनं नायं वेदोरुविक्रमम् ।
'काल्यमानोपि बलिनो वायोरिव घनावलि: ॥
१॥
कपिल: उवाच--कपिल ने कहा; तस्य एतस्य--इसी काल का; जन: --व्यक्ति; नूनम्ू--निश्चय ही; न--नहीं;अयम्--यह; वेद--जानता है; उरु-विक्रमम्--महान् पराक्रम; काल्यमान: --दूर ले जाया जाकर; अपि--यद्यपि;बलिन:--शक्तिशाली; वायो:--ह वा द्वारा; इब--सहृश; घन--बादलों का; आवलि: --समूह |
भगवान् ने कहा : जिस प्रकार बादलों का समूह वायु के शक्तिशाली प्रभाव सेपरिचित नहीं रहता उसी प्रकार भौतिक चेतना में संलग्न व्यक्ति काल की उस महान्शक्ति से परिचित नहीं रहता, जिसके द्वारा उसे ले जाया जा रहा है।
यं यमर्थमुपादत्ते दुःखेन सुखहेतवे ।
तं तं धुनोति भगवान्पुमाड्छोचति यत्कृते ॥
२॥
यम् यम्--जो कुछ, जिस जिस; अर्थम्--वस्तु को; उपादत्ते--प्राप्त करता है; दुःखेन--कठिनाई से; सुख-हेतवे--सुख के लिए; तम् तम्--उस उस को; धुनोति--नष्ट कर देता है; भगवान्-- भगवान्; पुमान्--व्यक्ति; शोचति--शोक करता है; यत्-कृते--जिस कारण से |
तथाकथित सुख के लिए भौतिकतावादी द्वारा जो-जो वस्तुएँ अत्यन्त कष्ट तथा परिश्रम से अर्जित की जाती हैं उन-उन को कालरूप परम पुरुष नष्ट कर देता है औरइसके कारण बद्धजीव उन के लिए शोक करता है।
यदश्लुवस्य देहस्य सानुबन्धस्य दुर्मति: ।
ध्रुवाणि मन्यते मोहादगृहक्षेत्रवसूनि च ॥
३॥
यत्-क्योंकि; अध्ुवस्थ-- क्षणिक; देहस्य--शरीर का; स-अनुबन्धस्य--सम्बन्धियों से; दुर्मतिः--पशथश्रष्ट व्यक्ति;ध्रुवाणि--स्थायी; मन्यते--सोचता है; मोहात्--अज्ञानवश; गृह--घर; क्षेत्र--जमीन; वसूनि--सम्पत्ति; च--तथा |
विभ्रमित भौतिकतावादी व्यक्ति यह नहीं जानता कि उसका अपना यह शरीरअस्थायी है और घर, जमीन तथा सम्पत्ति जो इस शरीर से सम्बन्धित हैं, ये सारे आकर्षणभी क्षणिक हैं।
वह अपने अज्ञान के कारण ही हर वस्तु को स्थायी मानता है।
जन्तुर्वे भव एतस्मिन्यां यां योनिमनुव्रजेत् ।
तस्यां तस्यां स लभते निर्वृतिंन विरज्यते ॥
४॥
जन्तु:--जीव; वै--निश्चय ही; भवे--संसार में; एतस्मिन्--इस; याम् यामू--जिस-जिस; योनिम्--योनि को;अनुब्रजेत्--प्राप्त करता है; तस्याम् तस्याम्--उस उसको; सः--वह; लभते--प्राप्त करता है; निर्वृतिमू--सन्तोष को;न--नहीं; विरज्यते--पराड्मुख विरक्त होता है।
जीव जिस योनि में भी प्रकट होता है, उसको उसी योनि में एक विशेष सन्तोष प्राप्तहोता है और वह उस अवस्था में रहने से कभी विमुख नहीं होता।
नरकस्थोपि देहं वै न पुमांस्त्यक्तुमिच्छति ।
नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहित: ॥
५॥
नरक--नरक में; स्थ:--स्थित; अपि-- भी; देहम्ू--शरीर को; बै--निस्सन्देह; न--नहीं; पुमान्--मनुष्य; त्यक्तुमू--छोड़ने के लिए; इच्छति--चाहता है; नारक्याम्ू--नारकीय, नरकतुल्य; निर्वृती-- भोग; सत्याम्--रहते हुए; देव-माया--भगवान् की माया से; विमोहित:--मोह ग्रस्त |
बद्धजीव अपनी योनि-विशेष में ही सन्तुष्ट रहता है, माया के आवरणात्मक प्रभावसे मोहग्रस्त होकर वह अपने शरीर को त्यागना नहीं चाहता, भले ही वह नरक में क्यों नहो, क्योंकि उसे नारकीय भोग में ही आनन्द मिलता है।
आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु ।
निरूढमूलहदय आत्मानं बहु मनन््यते ॥
६॥
आत्म--शरीर; जाया-- पत्नी; सुत--बच्चे; अगार--घर; पशु-- पशु; द्रविण-- सम्पत्ति; बन्धुषु--मित्रों में; निरूढ-मूल--गहराई तक जड़ें जमाये, प्रगाढ़; हृदयः--उसका हृदय; आत्मानम्--अपने आपको; बहु--बहुत ऊँचा;मन्यते--सोचता है|
मनुष्य को अपने जीवनस्तर के प्रति इस प्रकार का सन्तोष अपने शरीर, पत्नी, घर,सन््तान, पशु, सम्पत्ति तथा मित्रों के प्रति प्रगाढ़ आकर्षण के कारण ही होता है।
ऐसीसंगति में बद्धजीव अपने आपको पूरी तरह सही मानता है।
सन्दह्ममानसर्वाड् एषामुद्ददनाधिना ।
करोत्यविरतं मूढो दुरितानि दुराशयः ॥
७॥
सन्दह्ममान--जलते हुए; सर्व--सभी; अड्डग:--उसके अंग; एषाम्--इन परिजनों के; उद्ददन--पालन के लिए;आधिना--चिन्ता से युक्त; करोति--करता है; अविरतम्--सदैव; मूढ:--मूर्ख; दुरितानि--पापकर्म ; दुराशय: --दुर्ब॑द्धि:
यद्यपि वह चिन्ता से सदैव जलता रहता है, तो भी ऐसा मूर्ख कभी न पूरी होने वालीआशाओं के लिए सभी प्रकार के अनिष्ट कृत्य करता है, जिससे वह अपने तथाकथितपरिवार तथा समाज का भरण-पोषण कर सके।
आक्षिप्तात्मेन्द्रियः स्रीणामसतीनां च मायया ।
रहो रचितयालापै: शिशूनां कलभाषिणाम् ॥
८॥
आक्षिप्त--मोहित; आत्म--हृदय; इन्द्रियः--इन्द्रियाँ; स्त्रीणाम्--स्त्रियों का; असतीनाम्--झूठी; च--तथा;मायया--माया के द्वारा; रहः--एकान्त स्थान में; रचितया--प्रदर्शित; आलापैः --बातचीत से; शिशूनाम्--बच्चों के;कल-भाषिणामू--मीठे-मीठे शब्दों से |
वह उस स्त्री को अपना हृदय तथा इन्द्रियाँ दे बैठता है, जो झूठे ही उसे माया से मोहलेती है।
वह उसके साथ एकान्त में आलिंगन तथा संभाषण करता है और अपने छोटे-छोटे बच्चों के मीठे-मीठे बोलों से मुग्ध होता रहता है।
गृहेषु कूटधर्मेषु दुःखतन्त्रेष्वतन्द्रितः ।
कुर्वन्दुःखप्रतीकारं सुखवन्मन्यते गृही ॥
९॥
गृहेषु--पारिवारिक जीवन में; कूट-धर्मेषु--झूठ बोलने के अभ्यास में; दुःख-तन्त्रेषु--दुख फैलाने में; अतन्द्रित:--सावधान; कुर्वनू--करते हुए; दुःख-प्रतीकारम्--दुखों को झेलना; सुख-वत्--सुख की भाँति; मन्यते--सोचते हैं;गृही--गृहस्थ |
आसक्त गृहस्थ कूटनीति तथा राजनीति से पूर्ण अपने पारिवारिक जीवन में रहा आता है।
वह सदैव दुखों का विस्तार करता हुआ और इन्द्रियतृष्ति के कार्यों से नियन्त्रितहोकर अपने सारे दुखों के फल को झेलने के लिए कर्म करता है।
यदि वह इन दुखों कोसफलतापूर्वक झेल लेता है, तो वह अपने को सुखी मानता है।
अर्थरापादितैर्गुर्व्या हिंसयेतस्ततश्॒ तान् ।
पुष्णाति येषां पोषेण शेषभुग्यात्यध: स्वयम् ॥
१०॥
अर्थै: --सम्पत्ति से; आपादितैः --अर्जित; गुर्व्या--महान्; हिंसबा--हिंसा से; इत:ः-ततः--इधर-उधर; च--तथा;तान्--उनको परिजनों को ; पुष्णाति--पालन करता है; येषामू--जिनके; पोषेण--पालन से; शेष--बचा हुआ;भुक्ू-- भोजन; याति--जाता है; अध:--नीचे की ओर; स्वयमू--स्वयं |
वह इधर-उधर हिंसा करके धन प्राप्त करता है और यद्यपि वह इसे अपने परिवार केभरण-पोषण में लगाता है, किन्तु स्वयं इस प्रकार से खरीदे भोजन का अल्पांश ही ग्रहणकरता है।
इस तरह वह उन लोगों के लिए नरक जाता है, जिनके लिए उसने अवैध ढंगसे धन कमाया था।
वार्तायां लुप्यमानायामारब्धायां पुनः पुनः ।
लोभाभिभूतो निःसत्त्व: परार्थे कुरुते स्पृहाम् ॥
११॥
वार्तायाम्--उसकी वृत्ति या जीविका के; लुप्यमानायाम्ू--अवरुद्ध होने पर; आरब्धायाम्--ग्रहण की जाती है; पुनःपुन:ः--बार-बार; लोभ--लालच से; अभिभूतः--अधीर; निःसत्त्व: --विनष्ट; पर-अर्थे--अन्यों की सम्पत्ति के लिए;कुरुते स्पृहामू--कामना करता है।
जब उसे अपनी जीविका में प्रतिकूल फल मिलते हैं, तो वह बारम्बार अपने कोसुधारने का यत्न करता है, किन्तु जब उसके सारे प्रयास असफल रहते हैं और वह विनष्टहो जाता है, तो अत्यन्त लोभवश वह अन्यों का धन स्वीकार करता है।
कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यम: ।
भ्रिया विहीनः कृपणो ध्यायड्छुसिति मूढधी: ॥
१२॥
कुटुम्ब--अपना परिवार; भरण--पालन करने में; अकल्प:--असमर्थ; मन्द-भाग्य:-- अभागा; वृथा--व्यर्थ ही;उद्यम:--जिसका प्रयास; थ्रिया--सौंदर्य, धन; विहीन: --रहित; कृपण:--कंजूस; ध्यायन्--शोक करता हुआ;श्रसिति--आहें भरता है; मूढड--मोहग्रस्त; धीः--बुद्धि वाला ।
जब वह अभागा अपने परिवार वालों के भरण-पोषण में असफल होकर समस्तसौन्दर्य से विहीन हो जाता है, तो वह सदैव लम्बी-लम्बी आहें भरता हुआ अपनीविफलता के विषय में सोचता है।
एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा ।
नाद्वियन्ते यथा पूर्व कीनाशा इव गोजरम् ॥
१३॥
एवम्--इस प्रकार; स्व-भरण--उनको पालने में; अकल्पम्-- असमर्थ; तत्ू--उसकी; कलत्र--पली; आदय: --इत्यादि; तथा--उसी प्रकार; न--नहीं; आद्रियन्ते--आदर करते हैं; यथा--जिस तरह; पूर्वम्--पहले; कीनाशा: --किसान; इब--सहश; गो-जरम्--पुराना बैल
उसे अपने पालन-पोषण में असमर्थ देखकर उसकी पत्नी तथा अन्य लोग उसे उसीतरह पहले जैसा सम्मान नहीं प्रदान करते जिस तरह कंजूस किसान अपने बुढ़े तथा थकेबैलों के साथ पहले जैसा व्यवहार नहीं करता।
तत्राप्यजातनिर्वेदो ध्रियमाण: स्वयम्भूतैः ।
जरयोपात्तवैरूप्यो मरणाभिमुखो गृहे ॥
१४॥
तत्र--वहाँ; अपि--यद्यपि; अजात--उदय नहीं हुई हो; निर्वेद:--विरुचि; प्रियमाण:--पालित होकर; स्वयम्--अपने आपसे; भृतीः--पालित लोगों से; जरया--वृद्धावस्था से; उपात्त-- प्राप्त; वैरूप्यः --विरूपता, रूप बिगड़ना;मरण--मृत्यु; अभिमुख:--पास आकर; गृहे--घर में
मूर्ख पारिवारिक व्यक्ति गृहस्थ जीवन से पराड्मुख नहीं होता, यद्यपि अब उसकापालन उन लोगों के द्वारा किया जा रहा है, जिन्हें पहले उसने पाला था।
वृद्धावस्था केकारण उसका रूप विकृत हो जाता है और वह मृत्यु की तैयारी करने लगता है।
आस्तेवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन् ।
आमयाव्यप्रदीप्ताग्निरल्पाहारोउल्पचेष्टित: ॥
१५॥
आस्ते--रहा आता है; अवमत्या--उपेक्षा भाव से; उपन्यस्तम्--जो दिया जाता है; गृह-पाल:--कुत्ता; इब--सहश;आहरन्--खाते हुए; आमयावी--रुग्ण; अप्रदीप्त-अग्नि:--अजीर्ण, मन्दाग्न्यता; अल्प--थोड़ा; आहार: -- भोजन;अल्प-- थोड़ा; चेष्टितः--उसके कार्य ।
वह घर पर पालतू कुत्ते की भाँति रह रहा होता है और उपेक्षाभाव से उसे जो भीदिया जाता है, उसे खाता है।
अजीर्ण तथा मंदाग्नि जैसी अनेक प्रकार की व्याधियों सेग्रस्त होकर, वह केवल कुछ कौर भोजन करता है और अशक्त होने के कारण कोई भीकाम नहीं कर पाता।
वह प्रसन्न रहता है।
वायुनोत्क्रमतोत्तार: कफसंरुद्धनाडिकः ।
कासश्वासकृतायासः कण्ठे घुरघुरायते ॥
१६॥
वायुना--हवा के द्वारा; उत्क्रमता--बाहर निकलने से; उत्तारः--आँखें; कफ--कफ से; संरुद्ध--सँटी हुई;नाडिकः-- श्वास नली; कास--खाँसी; ध्वास--साँस लेना; कृत--किया हुआ; आयास:--कठिनाई; कण्ठे--गले में;घुर-घुरायते--घुर-घुर का शब्द करता है।
उस रुग्ण अवस्था में, भीतर से वायु के दबाब के कारण उसकी आँखें बाहर निकलआती हैं और उसकी ग्रंथियाँ कफ से भर जाती हैं।
उसे साँस लेने में कठिनाई होती हैऔर गले के भीतर से घुर-घुर की आवाज निकलती है।
शयानः परिशोचद्धिः परिवीतः स्वबन्धुभि: ।
वाच्यमानोपि न ब्रूते कालपाशवशं गत: ॥
१७॥
शयान:--लेटा हुआ; परिशोचदिद्धिः --पश्चात्ताप करते हुए; परिवीत:--घिरा हुआ; स्व-बन्धुभि: -- अपने सम्बन्धियोंतथा मित्रों से; वाच्यमान:--बोलने के लिए कहे जाने पर; अपि--यद्यपि; न--नहीं; ब्रूते--बोलता है; काल--समयके; पाश--फंदा के; वशम्--वशीभूत; गत:--गया हुआ।
इस प्रकार वह मृत्यु के पाश में बँधकर लेट जाता है, विलाप करते उसके मित्र तथासम्बन्धी उसे घेर लेते हैं और उन सबसे बोलने की इच्छा करते हुए भी वह बोल नहींपाता, क्योंकि वह काल के वश में रहता है।
एवं कुटुम्बभरणे व्यापृतात्माजितेन्द्रिय: ।
प्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधी: ॥
१८॥
एवम्--इस प्रकार; कुटुम्ब-भरणे--परिवार का पालन करने में; व्यापृत--तल्लीन; आत्मा--उसका मन; अजित--अनियन्त्रित; इन्द्रियः--उसकी इन्द्रियाँ; प्रियते--मर जाता है; रुदताम्--रोते हुए; स्वानाम्ू--कुटुम्बियों को; उरू--महान्; वेदनया--पीड़ा से; अस्त--विहीन; धी:--चेतना |
इस प्रकार जो व्यक्ति इन्द्रियों को वश में किये बिना परिवार के भरण-पोषण मेंलगा रहता है, वह अपने रोते कुटुम्बियों को देखता हुआ अत्यन्त शोक में मरता है।
वहअत्यन्त दयनीय अवस्था में, असह्य पीड़ा के साथ, किन्तु चेतना विहीन होकर मरता है।
यमदूतौ तदा प्राप्तौी भीमौ सरभसेक्षणौ ।
स दृष्ठा त्रस्तहदयः शकृन्मूत्रं विमुज्ञति ॥
१९॥
यम-दूतौ--यमराज के दो दूत; तदा--उस समय; प्राप्ती--आकर; भीमौ--घोर; स-रभस--क्रोध से पूर्ण; ईक्षणौ --अपनी आँखें; सः--वह; दृष्टा--देखकर; त्रस्त-- भयभीत; हृदयः -- अपना हृदय; शकृत्--मल; मूत्रमू--मूत्र;विमुश्जञति--त्यागता है, निकाल देता है।
मृत्यु के समय उसे अपने समक्ष यमराज के दूत आये दिखते हैं, जिनके नेत्र क्रोध सेपूर्ण रहते हैं।
इस तरह भय के मारे उसका मल-मूत्र छूट जाता है।
यातनादेह आवृत्य पाशैर्बदध्वा गले बलातू ।
नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा ॥
२०॥
यातना--दंड के लिए; देहे--उसका शरीर; आवृत्य--ढक कर; पाशै:--रस्सियों से; बद्ध्वा--बाँध कर; गले--गलेसे; बलात्--बलपूर्वक; नयतः--ले जाते हैं; दीर्घम्--लम्बी; अध्वानम्--दूरी; दण्ड्यम्-- अपराधी; राज-भटा:--राजा के सिपाही; यथा--जिस प्रकार।
जिस प्रकार राज्य के सिपाही अपराधी को दण्डित करने के लिए उसे गिरफ्तार करतेहैं उसी प्रकार इन्द्रियतृष्ति में संलग्न अपराधी पुरुष यमदूतों के द्वारा बन्दी बनाया जाताहै।
वे उसे मजबूत रस्सी से गले से बाँध लेते हैं और उसके सूक्ष्म शरीर को ढक देते हैंजिससे उसे कठोर से कठोर दण्ड दिया जा सके।
तयोर्निभिन्नहदयस्तर्जनैर्जातवेपथु: ।
पथि श्रभिर्भक्ष्यमाण आर्तोघं स्वमनुस्मरन् ॥
२१॥
तयो:--यम के दूतों की; निर्भिन्न--टूटा हुआ; हृदयः--हृदय; तर्जनैः--डाट-फटकार से; जात--उत्पन्न; वेपथु: --कँप-कँपी; पथि--रास्ते में; श्रभि:--कुत्तों के द्वारा; भक्ष््माण:--काटा जाकर; आर्त:--दुखी; अघम्--पाप;स्वमू--अपना; अनुस्मरन्--स्मरण करते हुए
इस प्रकार यमराज के सिपाहियों द्वारा ले जाये जाते समय उसे दबाया-कुचला जाताहै और उनके हाथों में वह काँपता रहता है।
रास्ते में जाते समय उसे कुत्ते काटते हैं औरउसे अपने जीवन के पापकर्म याद आते हैं।
इस प्रकार वह अत्यधिक दुखी रहता है।
क्षुत्तटूपरीतो कंदवानलानिलै:सन्तप्यमानः पथि तप्तवालुके ।
कृच्छेण पृष्ठे कशया च ताडितश्चलत्यशक्तोपि निराश्रमोदके ॥
२२॥
क्षुत्ू-तृट्-- भूख तथा प्यास से; परीत:--व्याकुल; अर्क--सूर्य; दव-अनल--जंगल की अग्नि; अनिलै: --वायु से;सन्तप्यमान:--झुलसते हुए; पथि--रास्ते में; तप्त-वालुके--गर्म बालू पर; कृच्छेण--कष्टपूर्वक; पृष्ठे--पीठ पर;कशया--चाबुक से; च--तथा; ताडित:--मारा जाकर; चलति--चलता है; अशक्त:--असमर्थ; अपि--यद्यपि;निराभ्रम-उदके--बिना किसी विश्राम या जल के
अपराधी को चिलचिलाती धूप में गर्म बालू के रास्ते से होकर जाना पड़ता है,जिसके दोनों ओर दावाग्नि जलती रहती है।
चलने में असमर्थता के कारण सिपाहीउसकी पीठ पर कोड़े लगाते हैं और वह भूख तथा प्यास से व्याकुल हो जाता है।
किन्तुदुर्भाग्यवश रास्ते भर न तो पीने के लिए जल रहता है, न विश्राम करने के लिए कोईआश्रय मिलता है।
तत्र तत्र पतउलान्तो मूर्च्छित: पुनरुत्थित: ।
'पथा पापीयसा नीतस्तरसा यमसादनम् ॥
२३॥
तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; पतन्--गिरते हुए; श्रान्त:ः-- थका हुआ; मूर्च्छित:--बेहोश; पुन: --फिर से; उत्थितः--उठते हुए;पथा--रास्ते में; पापीयसा--अत्यन्त अशुभ; नीत:--लाया गया; तरसा--तेजी से; यम-सादनम्--यमराज केसामने।
यमराज के धाम के मार्ग पर वह थकान से गिरता-पड़ता जाता है और कभी-कभीअचेत हो जाता है, किन्तु उसे पुनः उठने के लिए बाध्य किया जाता है।
इस प्रकार उसेतेजी से यमराज के समक्ष लाया जाता है।
योजनानां सहस्त्राणि नवतिं नव चाध्वन: ।
त्रिभिमुहूर्तै्द्वा भ्यां वा नीत: प्राप्योति यातना: ॥
२४॥
योजनानाम्--योजनों की; सहस्त्राणि--हजार; नवतिम्--नब्बे; नव--नौ; च--तथा; अध्वन: --दूरी से; त्रिभि:--तीन; मुहूर्त: --क्षणों में; द्वाभ्यामू--दो; वा--अथवा; नीत:--लाया गया; प्राप्योति-- पाता है; यातना:--दण्ड |
इस तरह से ९९ हजार योजन की दूरी उसे दो या तीन पलों में पार करनी होती हैऔर फिर तुरन्त उसे घोर यातना दी जाती है, जिसे सहना पड़ता है।
आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभि: ।
आत्ममांसादनं क्वापि स्वकृत्तं परतोडषपि वा ॥
२५॥
आदीपनम्--अग्नि लगाकर; स्व-गात्राणाम्--अपने अंगों को; वेष्टयित्वा--लपेट कर; उल्मुक-आदिभि:--जलतीलकड़ी के टुकड़ों आदि से; आत्म-मांस--अपने मांस का; अदनम्-- भोजन करते; क्व अपि--कभी-कभी; स्व-कृत्तम्ू--अपने द्वारा किया गया; परत:--अन्यों द्वारा; अपि-- भी; वा--अथवा
वहाँ उसे जलती लकड़ियों के बीच में रख दिया जाता है और उसके अंगों में आगलगा दी जाती है।
कभी-कभी उसे अपना मांस स्वयं खाने के लिए बाध्य किया जाता हैअथवा अमन्यों द्वारा खाने दिया जाता है।
जीवतश्चान्त्राभ्युद्धार: श्वगृश्नेर्यमसादने ।
सर्पवृश्चिकदंशाद्यैर्दशद्धि श्रात्मवैश्सम् ॥
२६॥
जीवत:ः--जीवित; च--तथा; अन्त्र--आँतें; अभ्युद्धार:--बाहर खींचकर; श्व-गृश्नैः--कुत्तों तथा गीधों द्वारा; यम-सादने--यमराज के सदन में; सर्प--सर्प; वृश्चिक--बिच्छू; दंश--डाँस, मच्छर; आद्यै:--इत्यादि के द्वारा;दशशद््धः--काटे जाने पर; च--तथा; आत्म-वैशसम्--अपना उत्पीड़न |
नरक के कुत्तों तथा गीधों द्वारा उसकी आँखें उसके जीवित रहते और देखते-देखतेनिकाल ली जाती हैं और उसे साँपों, बिच्छुओं, डाँसों तथा अन्य काटने वाले जन्तुओं सेपीड़ा पहुँचाई जाती है।
कृन्तनं चावयवशो गजादिभ्यो भिदापनम् ।
पातनं गिरिश्रृड्भेभ्यो रोधनं चाम्बुगर्तयो: ॥
२७॥
कृन्तनमू--काट करके; च--तथा; अवयवश:ः --अंग प्रति अंग; गज-आदिभ्य:--हाथी आदि से; भिदापनम्--चिरवाया जाकर; पातनम्ू--नीचे गिराकर; गिरि--पहाड़ियों की; श्रृड्रेभ्य:--चोटियों से; रोधनम्--घेर कर; च--तथा; अम्बु-गर्तयो:--जल में या गुफा में |
फिर उसके अंग-प्रत्यंग काट डाले जाते हैं और उसे हाथियों से चिरवा दिया जाताहै।
उसे पर्वत की चोटियों से नीचे गिराया जाता है और फिर जल में या गुफा में बन्दीबना लिया जाता है।
यास्तामिस्त्रान्धतामिस्त्रा रौरवाद्याश्च यातना: ।
भुड़े नरो वा नारी वा मिथ: सड़ेन निर्मिता: ॥
२८॥
या:--जो; तामिस्त्र--नरक का नाम; अन्ध-तामिस्त्रा:--एक नरक; रौरव--एक नरक; आद्याः:--इत्यादि; च--तथा;यातना:--यातनाएँ, दण्ड; भुड्ढे -- भोगता है; नरः--मनुष्य; वा--अथवा; नारी--स्त्री; वा--अथवा; मिथ: --पारस्परिक; सड्जेन--संगति से; निर्मिता:--बनाये गये
जिन पुरुषों तथा स्त्रियों का जीवन अवैध यौनाचार में बीतता है उन्हें तामिस्त्र,अन्धतामिस्त्र तथा रौरव नामक नरकों में नाना प्रकार की यातनाएँ दी जाती हैं।
अन्नैव नरकः स्वर्ग इति मात: प्रचक्षते ।
या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिता: ॥
२९॥
अत्र--इस संसार में; एब--ही; नरकः--नरक ; स्वर्ग:--स्वर्ग; इति--इस प्रकार; मात:ः--हे माता; प्रच्क्षते--लोगकहते हैं; याः--जो जो; यातना:--यातनाएँ; वै--निश्चय ही; नारक्य:--नारकीय; ता:--वे; इह--यहाँ; अपि-- भी;उपलक्षिता:--दृष्टिगोचर होती हैं।
कपिलमुनि ने आगे कहा : हे माता, कभी-क भी यह कहा जाता है कि इसी लोक मेंहम नरक अथवा स्वर्ग का अनुभव करते हैं, क्योंकि कभी-कभी इस लोक में भीनारकीय यातनाएँ दिखाई पड़ती हैं।
एवं कुट॒म्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा ।
विसूज्येहोभयं प्रेत्य भुड़े तत्फलमीदशम् ॥
३०॥
एवम्--इस प्रकार; कुटुम्बम्--परिवार को; बिश्राण: --पालन करने वाला; उदरम्--पेट को; भर:--भरण करनेबाला; एव--केवल; वा--अथवा; विसृज्य--त्याग कर; इह--यहाँ; उभयम्--दोनों; प्रेत्य--मृत्यु के बाद; भुड़े --भोगता है; तत्--उसका; फलम्--फल; ईहशम्--ऐसा
इस शरीर को त्यागने के पश्चात् वह व्यक्ति जो पापकर्मो द्वारा अपना तथा अपनेपरिवार के सदस्यों का पालन-पोषण करता है नारकीय जीवन बिताता है और उसकेसाथ उसके परिवार वाले भी।
एक: प्रपद्यते ध्वान्तं हित्वेदं स्वकलेवरम् ।
कुशलेतरपाथेयो भूतद्रोहेण यद्भधुतम् ॥
३१॥
एकः--अकेला; प्रपद्यते--प्रवेश करता है; ध्वान्तम्--अन्धकार; हित्वा--छोड़कर; इृदम्--यह; स्व-- अपना;कलेवरम्--शरीर; कुशल-इतर--पाप; पाथेय:--सम्बल, रास्ते का खर्च; भूत--अन्य जीवों की; द्रोहेण-- क्षतिद्वारा; यत्ू--जो शरीर; भृतम्--पाला गया।
इस शरीर को त्याग कर वह अकेला नरक के अंधतम भागों में जाता है और अन्यजीवों के साथ ईर्ष्या करके उसने जो धन कमाया था वही पाथेय के रूप में उसके साथजाता है।
दैवेनासादितं तस्य शमलं निरये पुमान् ।
भुड़े कुटुम्बपोषस्य हतवित्त इवातुरः ॥
३२॥
दैवेन-- भगवान् की व्यवस्था से; आसादितम्--प्राप्त; तस्थ--उसका; शमलम्--पापपूर्ण फल, कुफल; निरये--नारकीय अवस्था में; पुमान्ू--मनुष्य; भुड़े -- भोगता है; कुटुम्ब-पोषस्थ--परिवार के पोषण का; हत-वित्त:--जिसकी सम्पत्ति लुट गई हो; इब--सहृश; आतुरः--व्याकुल |
इस प्रकार भगवान् की व्यवस्था से, परिवार का पोषणकर्ता अपने पापकर्मों कोभोगने के लिए नारकीय अवस्था में रखा जाता है मानो उसकी सारी सम्पत्ति लुट गई हो।
केवलेन हाधमेंण कुटुम्बभरणोत्सुकः ।
याति जीवोन्धतामिस्त्रं चरमं तमस: पदम् ॥
३३॥
केवलेन--केवल, निरे; हि--निश्चय ही; अधर्मेण-- अधर्म कार्यो से; कुठुम्ब--परिवार; भरण--पालने के लिए;उत्सुक:--उत्सुक; याति--जाता है; जीव:--व्यक्ति; अन्ध-तामिस्त्रमू--अन्धतामिस्त्र नरक को; चरमम्--परम;तमसः--अंधकार का; पदमू-क्षेत्रअतः
जो व्यक्ति केवल कुत्सित साधनों से अपने परिवार तथा कुटुम्बियों का पालनकरने के लिए लालायित रहता है, वह निश्चय ही अन्धतामिस्त्र नामक गहनतम नरक मेंजाता है।
अधस्तान्नरलोकस्य यावतीर्यातनादय: ।
क्रमशः समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचि: ॥
३४॥
अधस्तात्--नीचे से; नर-लोकस्य--मनुष्य जन्म; यावती:--जितनी; यातना--दण्ड, सजाएँ; आदय: --इत्यादि;क्रमशः--नियत क्रम; समनुक्रम्य--से होकर जाने पर; पुनः--फिर; अत्र--यहाँ, इस पृथ्वी पर; आब्रजेत्ू--लौटसकता है; शुचि:-शुद्ध |
समस्त कष्टकर नारकीय परिस्थितियों से तथा मनुष्य जन्म के पूर्व पशु-जीवन केनिम्नतम रूपों को क्रमशः पार करते हुए और इस प्रकार अपने पापों को भोगते हुए, वहइस पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में पुनः जन्म लेता है।
