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अध्याय अट्ठाईसवां: भक्ति सेवा के निष्पादन पर कपिला के निर्देश

3.28श्रीभगवानुवाचयोगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।

मनो येनैव विधिना प्रसन्न॑ याति सत्पथम्‌ ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; योगस्थ--योग पद्धति का; लक्षणम्‌--वर्णन; वक्ष्ये--कहूँगा; सबीजस्य--प्रामाणिक; नृप-आत्म-जे--हे राजपुत्री; मन:--मन; येन--जिससे; एव--निश्चय ही; विधिना-- अभ्यास से;प्रसन्नम्‌ू-- प्रसन्न; याति--प्राप्त करता है; सत्‌-पथम्‌--परम सत्य का मार्ग

भगवान्‌ ने कहा: हे माता, हे राजपुत्री, अब मैं आपको योग विधि बताऊँगाजिसका उद्देश्य मन को केन्द्रित करना है।

इस विधि का अभ्यास करने से मनुष्य प्रसन्नरहकर परम सत्य के मार्ग की ओर अग्रसर होता है।

स्वधर्माचरणं शकत्या विधर्माच्च निवर्तनम्‌ ।

देवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम्‌ ॥

२॥

स्व-धर्म-आचरणम्‌--अपने कर्तव्यों का पालन; शक्त्या--अपनी शक्ति भर; विधर्मात्‌--शास्त्रविरुद्ध कर्तव्य से;च--तथा; निवर्तनम्‌--बचते हुए; दैवात्‌-- भगवान्‌ की कृपा से; लब्धेन--जो कुछ प्राप्त हो उससे; सनन्‍्तोष: --संतुष्ट;आत्म-वित्‌--स्वरूपसिद्ध जीव के; चरण--पाँव की; अर्चनम्‌--पूजा।

मनुष्य को चाहिए कि वह यथाशक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करे और उन कर्मोको करने से बचे, जो उसे नहीं करने हैं।

उसे ईश्वर की कृपा से जो भी प्राप्त हो उसी सेसन्तुष्ट रहना चाहिए और गुरु के चरणकमलों की पूजा करनी चाहिए।

ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा ।

मितमेध्यादनं शश्वद्विविक्तक्षेमसेवनम्‌ ॥

३॥

ग्राम्य--परम्परागत; धर्म--धार्मिक प्रथा; निवृत्तिः--समाप्ति; च--तथा; मोक्ष--मोक्ष के लिए; धर्म--धार्मिक प्रथा;रतिः--अनुरक्ति; तथा--उसी तरह; मित--कुछ; मेध्य--शुद्ध; अदनमू-- भोजन करना; शश्वत्‌--सदैव; विविक्त--एकान्त; क्षेम--शान्तिपूर्ण; सेवनम्‌--घर |

मनुष्य को चाहिए कि परम्परागत धार्मिक प्रथाओं का परित्याग कर दे और उनप्रथाओं में अनुरक्त हो जो मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली हैं।

उसे स्वल्प भोजन करनाचाहिए और सदैव एकान्तवास करना चाहिए जिससे उसे जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त होसके।

अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रह: ।

ब्रह्मचर्य तप: शौच स्वाध्याय: पुरुषार्चनम्‌ ॥

४॥

अहिंसा--अहिंसा; सत्यम्‌--सत्यनिष्ठा; अस्तेयम्‌ू--चोरी न करना; यावत्‌-अर्थ--आवश्यकतानुसार; परिग्रह: --संग्रह; ब्रह्मचर्यम्‌--ब्रह्मचर्य ब्रत; तपः--तपस्या; शौचम्‌-- स्वच्छता; स्व-अध्याय:--वेदों का अध्ययन; पुरुष-अर्चनम्‌ू-- भगवान्‌ की पूजा

मनुष्य को चाहिए कि अहिंसा तथा सत्य का आचरण करे, चोरी से बचे और अपनेनिर्वाह के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही संग्रह करे।

वह विषयी जीवन से बचे,तपस्या करे, स्वच्छ रहे, वेदों का अध्ययन करे और भगवान्‌ के परमस्वरूप की पूजाकरे।

मौन सदासनजय: स्थेर्य प्राणजय:ः शनेः ।

प्रत्याहारश्रेन्द्रियणां विषयान्मनसा हृदि ॥

५॥

मौनम्‌ू--मौन, मूकता; सत्‌--अच्छा; आसन--योग के आसन; जय:--वश में करते हुए; स्थैर्यमू--स्थिरता; प्राण-जय:--प्राणवायु को साधना; शनै:--धीरे-धीरे; प्रत्याहारः--निकालना; च--तथा; इन्द्रियाणाम्‌--इन्द्रियों का;विषयात्‌--विषयों से; मनसा--मन से; हृदि--हृदय में |

मनुष्य को इन विधियों अथवा अन्य किसी सही विधि से अपने दूषित तथा चंचलमन को वश में करना चाहिए, जिसे भौतिक भोग के द्वारा सदैव आकृष्ट किया जातारहता है और इस तरह अपने आप को भगवान्‌ के चिन्तन में स्थिर करना चाहिए।

स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम्‌ ।

वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधान तथात्मन: ॥

६॥

स्व-धिष्ण्यानाम्‌--प्राणचक्रों के भीतर; एक-देशे--एक स्थान में; मनसा--मन से; प्राण--प्राणवायु; धारणम्‌--स्थिर करना; वैकुण्ठ-लीला-- श्रीभगवान्‌ की लीलाओं में; अभिध्यानम्‌-- ध्यान; समाधानम्‌--समाधि; तथा--इसतरह; आत्मन:--मन की |

शरीर के भीतर के षटचक्रों में से किसी एक में प्राण तथा मन को स्थिर करना औरइस प्रकार से अपने मन को भगवान्‌ की दिव्य लीलाओं में केन्द्रित करना समाधि या मनका समाधान कहलाता है।

एतैरन्यैश्व पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम्‌ ।

बुद्धया युज्ञीत शनकैर्जितप्राणो हमतन्द्रित: ॥

७॥

एतै:--इनसे; अन्यैः--दूसरे से; च--यथा; पथ्चिभि:--विधियों से; मनः--मन; दुष्टम्‌--कलुषित; असत्‌-पथम्‌--सांसारिक भोग के पथ पर; बुद्धया--बुद्धि से; युज्ञीत--वश में करना चाहिए; शनकै: -- धीरे-धीरे; जित-प्राण: --प्राणवायु को स्थिर करके; हि--निस्सन्देह; अतन्द्रितः--सतर्क

इन विधियों से या अन्य किसी सही विधि से मनुष्य को अपने दूषित तथा भौतिकभोग के द्वारा सदैव आकृष्ट होने वाले चंचल मन को वश में करना चाहिए और इस तरहअपने आपको भगवान्‌ के चिन्तन में स्थिर करना चाहिए।

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्प विजितासन आसनम्‌ ।

तस्मिन्स्वस्ति समासीन ऋजुकायः समभ्यसेत्‌ ॥

८॥

शुचौ देशे--पवित्र स्थान में; प्रतिष्ठाप्प--स्थापित करके ; विजित-आसन:--आसनों को वश में करते हुए;आसनमू--आसन, स्थान; तस्मिन्‌--उस स्थान में; स्वस्ति समासीन:--आरामदेह आसन में बैठे हुए; ऋजु-काय:--शरीर को सीधा रखते हुए; समभ्यसेत्‌--अभ्यास करना चाहिए

अपने मन तथा आसनों को वश में करने के बाद मनुष्य को चाहिए कि किसीएकान्त तथा पवित्र स्थान में अपना आसन बिछा दे, उस पर शरीर को सीधा रखते हुएसुखपूर्वक आसीन होकर श्वास नियन्त्रण प्राणायाम का अभ्यास करे।

प्राणस्य शोधयेन्मार्ग पूरकुम्भकरेचकै: ।

प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचञ्जलम्‌ ॥

९॥

प्राणस्य--प्राणवायु के; शोधयेत्‌--स्वच्छ करे; मार्गम्‌ू--रास्ते को; पूर-कुम्भक-रेचकै:-- श्वास खींचकर, रोककरतथा निकालकर; प्रतिकूलेन--उलटने से; वा--अथवा; चित्तमू--मन को; यथा--जिसमें; स्थिरम्‌--स्थिर, स्थायी;अचञ्जलम्‌--अवरोधों से युक्त |

योगी को चाहिए कि प्राणवायु के मार्ग को निम्नलिखित विधि से श्वास लेकर इसप्रकार से स्वच्छ करे-पहले बहुत गहरी श्वास अंदर ले, फिर उस श्वास को धारण कियेरहे और अन्त में श्रास बाहर निकाल दे।

या फिर इस विधि को उलट कर योगी पहलेश्वास निकाले, फिर श्वास रोके रखे और अन्त में श्वास भीतर ले जाय।

ऐसा इसलिएकिया जाता है, जिससे मन स्थिर हो और बाहरी अवरोधों से मुक्त हो सके।

मनोचिरात्स्याद्विरजं जितश्रासस्यथ योगिन: ।

वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम्‌ ॥

१०॥

मनः--मन; अचिरातू--शीघ्र ही; स्थात्‌ू--हो सकता है; विरजम्‌--उद्देगों से मुक्त; जित-श्रासस्थ--जिसने श्वास परविजय पा ली है; योगिन:--योगी का; वायु-अग्निभ्याम्‌ू--वायु तथा अग्नि से; यथा--जिस प्रकार; लोहमू--स्वर्ण ;ध्मातम्‌--हवा किये जाने पर; त्यजति--मुक्त हो जाता है; बै--निश्चय ही; मलम्‌--अशुद्धि से |

जो योगी ऐसे प्राणायाम का अभ्यास करते हैं, वे तुरन्त समस्त मानसिक उद्देगों सेउसी तरह मुक्त हो जाते हैं जिस प्रकार हवा की फुहार से अग्नि में रखा सोना सारीअशुद्धियों से रहित हो जाता है।

प्राणायामैर्दहिद्योषान्धारणाभिश्च किल्बिषान्‌ ।

प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानी श्वरान्गुणान्‌ ॥

११॥

प्राणायामै:--प्राणायाम के अभ्यास से; दहेत्‌ू--समूल नष्ट कर सकता है; दोषानू--कल्मषों को; धारणाभि:--मनको केन्द्रित करने से; च--यथा; किल्बिषान्‌--पाप कर्म; प्रत्याहरेण--इन्द्रियों को रोकने से; संसर्गान्‌ू-- भौतिकसंगति; ध्यानेन-- ध्यान करने से; अनी श्वरान्‌ गुणान्‌-- भौतिक प्रकृति के गुणों को

प्राणायाम विधि के अभ्यास से मनुष्य अपने शारीरिक दोषों को समूल नष्ट करसकता है और अपने मन को एकाग्र करने से वह सारे पापकर्मो से मुक्त हो सकता है।

इन्द्रियों को वश में करने से मनुष्य भौतिक संसर्ग से अपने को मुक्त कर सकता है औरभगवान्‌ का ध्यान करने से वह भौतिक आसक्ति के तीनों गुणों से मुक्त हो सकता है।

यदा मन: स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम्‌ ।

काष्ठटां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकन: ॥

१२॥

यदा--जब; मनः--मन; स्वम्‌ू--अपने से; विरजम्‌--शुद्ध; योगेन--योगाभ्यास से; सु-समाहितम्‌--वशीभूत,नियंत्रित; काष्ठाम्‌-पूर्ण अंश; भगवत:-- श्री भगवान्‌ का; ध्यायेत्‌-- ध्यान करना चाहिए; स्व-नासा-अग्र--अपनीनाक का अग्रभाग; अवलोकन: --देखते हुए

जब इस योगाभ्यास से मन पूर्णतया शुद्ध हो जाय, तो मनुष्य को चाहिए किअधखुलीं आखों से नाक के अग्रभाग में ध्यान को केन्द्रित करे और भगवान्‌ के स्वरूपको देखे।

प्रसन्नवदनाम्भोजं॑ पद्मगर्भारुणेक्षणम्‌ ।

नीलोत्पलदलश्यामं शट्डुचक्रगदाधरम्‌ ॥

१३॥

प्रसन्न--प्रसन्न; बदन--मुख; अम्भोजमू--कमलवत्‌; पद्य-गर्भ--कमल का भीतरी भाग; अरुण--लाल; ईक्षणम्‌--आँखों से; नील-उत्पल--नील कमल; दल--पंखड़ियाँ; श्यामम्‌-श्याम रंग की; शबट्भु--शंख; चक्र--चक्र ; गदा--गदा; धरम्‌-- धारण किये हुए।

भगवान्‌ का मुख उत्फुल्ल कमल के समान है और लाल लाल आँखें कमल केकोश भीतरी भाग के समान हैं।

उनका श्यामल शरीर नील कमल की पंखड़ियों केसमान है।

वे अपने तीन हाथों में शट्ढु, चक्र तथा गदा धारण किये हैं।

लसत्पड्डूजकिञ्लल्कपीतकौशेयवाससम्‌ ।

श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम्‌ ॥

१४॥

लसत्‌--चमकता हुआ; पड्डज--कमल के; किल्लल्क--तन्तु; पीत--पीला; कौशेय--रेशमी ; वाससम्‌--जिनकावस्त्र; श्रीवत्स--श्रीवत्स चिह्न से युक्त; वक्षसम्‌--वक्षस्थल; भ्राजत्‌--प्रकाशमान; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि;आमुक्त--पहने हुए; कन्धरम्‌-गला।

उनकी कटि पीले पद्-केशर के सहश चमकदार वस्त्र से आवरित है।

उनकेवशक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न श्वेत बालों का गुच्छा है।

उनके गले में चमचमाती कौस्तुभमणि लटक रही है।

मत्तद्विरिफकलया परीतं वनमालया ।

परार्ध्यहारवलयकिरीटाड्रदनूपुरम्‌ ॥

१५॥

मत्त--मतवाले; द्वि-रफ--भौंरों से; कलया--गुंजार करते; परीतम्‌--हार पहने; बन-मालया--वन के फूलों कीमाला से; परार्ध्य--अमूल्य; हार--मोती की माला; वलय--कंकण; किरीट--मुकुट; अड्भद--बाजूबंद; नूपुरम्‌--नूपुर।

वे अपने गले में वनपुष्पों की आकर्षक माला भी धारण करते हैं जिसकी सुगन्धि सेमतवाले भौंरों के झुंड माला के चारों ओर गुंजार करते हैं।

वे मोती की माला, मुकुट,एक जोड़ी कंकण, बाजूबंद तथा नूपुर से अत्युत्तम ढंग से सुसज्जित हैं।

काञ्ञीगुणोल्लसच्छोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम्‌ ।

दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम्‌ ॥

१६॥

काञ्जी--करधनी; गुण--गुण; उल्लसत्‌--चमकीली; श्रोणिम्‌--कमर तथा कूल्हे; हदय--हृदय; अम्भोज--कमल;विष्टरमू--जिनका आसन; दर्शनीय-तमम्‌--देखने में सर्वाधिक मोहक; शान्तम्‌--शान्त, गम्भीर; मन:--मन, हृदय;नयन--आँखें; वर्धनम्‌--प्रसन्न करने वाला।

उनकी कमर तथा कूल्हे पर करधनी पड़ी है और वे भक्तों के हदय-कमल पर खड़ेहुए हैं।

वे देखने में अत्यन्त मोहक हैं और उनका शान्त स्वरूप देखने वाले भक्तों के नेत्रोंको तथा आत्माओं को आनन्दित करने वाला है।

अपीच्यदर्शनं शश्वत्सर्वलोकनमस्कृतम्‌ ।

सन्त वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम्‌ ॥

१७॥

अपीच्य-दर्शनम्‌--देखने में अतीव सुन्दर; शश्वत्‌--नित्य; सर्व-लोक-- प्रत्येक लोक से समस्त वासियों द्वारा; नमः-कृतम्‌--पूज्य; सन्‍्तमू--स्थित; वयसि--युवावस्था में; कैशोरे--बाल्यपन में; भृत्य-- अपने भक्तों पर; अनुग्रह--आशीर्वाद देने के लिए; कातरम्‌ू--उत्सुक |

भगवान्‌ शाश्वत रूप से अत्यन्त सुन्दर हैं और प्रत्येक लोक के समस्तवासियों द्वारापूजित हैं।

वे चिर-युवा रहते हैं और अपने भक्तों को आशीष देने के लिए उत्सुक रहते" हैं।

कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम्‌ ।

ध्यायेद्देवं समग्राड़ुंं यावन्न च्यवते मन: ॥

१८॥

कीर्तन्य--गाये जाने के योग्य; तीर्थ-यशसम्‌-- भगवान्‌ की महिमा; पुण्य-शलोक--भक्तों के; यशः-करम्‌--यश कोबढ़ाने वाले; ध्यायेत्‌-- ध्यान करना चाहिए; देवम्‌-- भगवान्‌ का; समग्र-अड्रम्‌--सारे अंग; यावत्‌ू--जब तक; न--नहीं; च्यवते--विचलित होवे; मन:--मन

भगवान्‌ का यश वन्दनीय है, क्योंकि उनका यश भक्तों के यश को बढ़ाने वाला है।

अतः मनुष्य को चाहिए कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ तथा उनके भक्तों का ध्यान करे।

मनुष्य को तब तक भगवान्‌ के शाश्वत रूप का ध्यान करना चाहिए जब तक मन स्थिरन हो जाय।

स्थितं ब्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम्‌ ।

प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा ॥

१९॥

स्थितम्‌-खड़े रहते हुए; ब्रजन्तम्‌--चलते; आसीनम्‌--बैठे; शयानम्‌-- लेटे; वा--अथवा; गुहा-आशयम्‌--हृदय मेंवास करने वाले भगवान; प्रेक्षणीय--सुन्दर; ईहितम्‌--लीलाएँ; ध्यायेत्‌-- ध्यान करना चाहिए; शुद्ध- भावेन--शुद्ध;चेतसा--मन से |

इस प्रकार भक्ति में सदैव तल्‍लीन रहकर योगी अपने अन्तर में भगवान्‌ को खड़े रहतेहुए, चलते, लेटे या बैठे हुए देखता है, क्योंकि परमेश्वर की लीलाएँ सुन्दर तथा आकर्षक होती हैं।

तस्मिल्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम्‌ ।

विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादड़े भगवतो मुनि: ॥

२०॥

तस्मिनू-- भगवान्‌ के स्वरूप में; लब्ध-पदम्‌--स्थिर; चित्तम्‌--मन को; सर्व--सारे; अवयव--अआंगों में;संस्थितम्‌--स्थिर किया हुआ; विलक्ष्य--अन्तर जान करके ; एकत्र--एक स्थान पर; संयुज्यात्‌--मन को स्थिर करे;अड्ले--हर अंग में; भगवत:--भगवान्‌ के; मुनि:--मुनि।

भगवान्‌ के नित्य रूप में अपना मन स्थिर करते समय योगी को चाहिए कि वहभगवान्‌ के समस्त अंगों पर एक ही साथ विचार न करके, भगवान्‌ के एक-एक अंग पर मन को स्थिर करे।

सश्ञिन्तयेद्धगवतश्चरणारविन्दंवज़ाड्लु शध्वजसरोरुहलाउछनाढ्यम्‌ ॥

उत्तुड़रक्तविलसन्नखचक्रवाल-ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धूदयान्धकारम्‌ ॥

२१॥

सशञ्ञिन्तयेत्‌--उसे केन्द्रित करना चाहिए; भगवत:ः -- भगवान्‌ के; चरण-अरविन्दम्‌--चरणकमलों पर; वज्ञ--वज़;अछ्'ु श--हाथी हाँकने का दंड, अंकुश; ध्वज--पताका; सरोरूह--कमल; लाउ्छन--चिह्न से; आढ्यम्‌--अलंकृत;उत्तुड़-उमड़े हुए; रक्त--लाल; विलसत्‌--चमकीले; नख--नाखून; चक्रवाल--चन्द्रमण्डल; ज्योत्स्नाभि:--चन्द्रिका से; आहत--दूर किया गया; महत्‌--घना; हृदय--हृदय का; अन्धकारम्‌--अँधेरा

भक्त को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपना मन भगवान्‌ के चरणकमलों में केन्द्रितकरे जो वज्ज, अंकुश, ध्वजा तथा कमल चिन्हों से सुशोभित रहते हैं।

सुन्दर माणिक सेउनके नाखूनों की शोभा चन्द्रमण्डल से मिलती-जुलती है और हृदय के गहन तम को दूरकरने वाली है।

यच्छौचनि:सृतसरित्प्रवरोदकेनतीर्थेन मूर्ध्यधिकृतेन शिव: शिवोभूत्‌ ।

ध्यातुर्मन:शमलशैलनिसूष्टवज्नंध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम्‌ ॥

२२॥

यत्‌--भगवान्‌ के चरणकमल; शौच--धोने से, प्रक्षालन से; निःसृत--निकली हुईं; सरित्‌-प्रवर--गंगा नदी के;उदकेन--जल से; तीर्थेन--पतवित्र; मूर्थिनि--सर पर; अधिकृतेन--उत्पन्न; शिव:--शिवजी; शिव:--शुभ; अभूत्‌--होगया; ध्यातु:ः--ध्यान करने वाले का; मन:ः--मन; शमल-शैल--पाप का पहाड़; निसृष्ट--फेंका गया; वज़म्‌--वज़;ध्यायेत्‌ू-- ध्यान करना चाहिए; चिरम्‌--दीर्घकाल तक; भगवतः-- भगवान्‌ के; चरण-अरविन्दम्‌--चरणकमलोंकोपूज्य

शिवजी भगवान्‌ के चरणकमलों के प्रक्षालित जल से उत्पन्न गंगा नदी केपवित्र जल को अपने शिर पर धारण करके और भी पूज्य हो जाते हैं।

भगवान्‌ के चरणउस वज के तुल्य हैं, जो ध्यान करने वाले भक्त के मन में संचित पाप के पहाड़ कोध्वस्त करने के लिए चलाया जाता है।

अतः मनुष्य को दीर्घताल तक भगवान्‌ केचरणकमलों का ध्यान करना चाहिए ॥

" जानुद्दयं जलजलोचनया जनन्यालक्ष्म्याखिलस्य सुरवन्दितया विधातु: ।

ऊर्वोर्निधाय करपललवरोचिषा यत्‌संलालितं हृदि विभोरभवस्य कुर्यात्‌ ॥

२३॥

जानु-द्रयम्‌--घुटनों तक; जलज-लोचनया--कमल-नेत्र वाली; जनन्या--माता; लक्ष्म्या-- लक्ष्मी द्वारा;अखिलस्य--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की; सुर-वन्दितया--देवताओं द्वारा पूजित; विधातु: --ब्रह्मा को; ऊर्वो: --जाँघों पर;निधाय--रख कर; कर-पल्‍लव-रोचिषा-- अपनी कान्तिमान अँगुलियों से; यत्‌--जो; संलालितम्‌--चापे जाकर,दबाये जाकर; हृदि--हृदय में; विभो: -- भगवान्‌ का; अभवस्य--इस संसार से परे; कुर्यातू-ध्यान करना चाहिए

योगी को चाहिए कि वह सभी देवताओं द्वारा पूजित तथा सर्वोपरि जीव ब्रह्मा कीमाता, ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मीजी के कार्यकलापों में अपने हृदय को स्थिर कर दे।

वे सदैवदिव्य भगवान्‌ के पाँवों तथा जंघाओं को चाँपती हुई देखी जा सकती हैं।

इस प्रकार वेसावधानी के साथ उनकी सेवा करती हैं।

ऊरू सुपर्णभुजयोरधि शो भमाना-वोजोनिधी अतसिकाकुसुमावभासौ ।

व्यालम्बिपीतवरवाससि वर्तमान-काञझ्लजीकलापपरिरम्भि नितम्बबिम्बम्‌ ॥

२४॥

ऊरू--दोनों जंघाएँ; सुपर्ण--गरुड़ की; भुजयो:--दो कंधे; अधि--ऊपर; शोभमानौ--सुन्दर; ओज:-निधी--समस्त शक्ति का आगार; अतसिका-कुसुम--अलसी के फूल की; अवभासौ--कान्ति जैसी; व्यालम्बि--लटकतेहुए; पीत--पीला; वर-- श्रेष्ठ; वाससि--वस्त्र पर; वर्तमान--रहकर; काज्नी-कलाप--करधनी से; परिरम्भि--घिराहुआ; नितम्ब-बिम्बम्‌--गोलाकार नितम्ब |

फिर, ध्यान में योगी को अपना मन भगवान्‌ की जाँघों पर स्थित करना चाहिए जोसमस्त शक्ति की आगार हैं।

वे अलसी के फूलों की कान्ति के समान सफेद-नीली हैं और जब भगवान्‌ गरुड़ पर चढ़ते हैं, तो ये जाँघें अत्यन्त भव्य लगती है।

योगी कोचाहिए कि वह भगवान्‌ के गोलाकार नितम्बों का ध्यान धरे, जो करधनी से घिरे हुए हैऔर यह करधनी भगवान्‌ के एड़ी तक लटकते पीताम्बर पर टिकी हुई है।

नाभिह॒दं भुवनकोशगुहोदरस्थंयत्रात्मयोनिधिषणाखिललोकपदाम्‌ ।

व्यूढे हरिन्मणिवृषस्तनयोरमुष्यध्यायेद्द्‌वयं विशद्‌हारमयूखगौरम्‌ ॥

२५॥

नाभि-हृदम्‌--नाभि रूपी सरोवर; भुवन-कोश--समस्त लोकों का; गुहा--आधार; उदर--आमाशय पर; स्थम्‌--स्थित; यत्र--जहाँ; आत्म-योनि--ब्रह्मा का; धिषण--वास; अखिल-लोक--समस्त लोकों सहित; पद्ममू--कमल;व्यूढमू--ऊपर निकला; हरित्‌ू-मणि--मरकत मणि के समान; वृष--अति सुन्दर; स्तनयो:--दोनों चूचुक; अमुष्य--भगवान्‌ के; ध्यायेत्‌--ध्यान करे; द्यम्‌--युगल; विशद-- श्वेत; हार--मोती की मालाओं का; मयूख--प्रकाश से;गौरम्‌ू--गोरा।

तब योगी को चाहिए कि वह भगवान्‌ के उदर के मध्य में स्थित चंद्रमा जैसी नाभिका ध्यान करे।

उनकी नाभि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारशिला है जहाँ से समस्त लोकोंसे युक्त कमलनाल प्रकट हुआ।

यह कमल आदि जीव ब्रह्मा का वासस्थान है।

इसी तरह योगी को अपना मन भगवान्‌ के स्तनाग्रों पर केन्द्रित करना चाहिए जो श्रेष्ठ मरकत मणिकी जोड़ी के सदश है और जो उनके वक्षस्थल को अलंकृत करने वाली मोतीमाला कीदुग्धधवल किरणों के कारण श्वेत प्रतीत होती है।

वक्षोदधिवासमृषभस्य महाविभूते:पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम्‌ ।

'कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थकुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥

२६॥

वक्ष:--छाती; अधिवासम्‌ू--आवास; ऋषभस्य-- भगवान्‌ का; महा-विभूते:--महालक्ष्मी का; पुंसामू--मनुष्यों के;मनः--मन को; नयन--नेत्रों को; निर्वृतिमू--दिव्य आनन्द; आदधानम्‌--प्रदान करते हुए; कण्ठम्‌--गला; च-- भी;कौस्तुभ-मणे: --कौस्तुभ मणि का; अधिभूषण-अर्थम्‌--सुन्दरता को बढ़ाने वाला; कुर्यात्‌-- ध्यान करे; मनसि--मन में; अखिल-लोक--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड द्वारा; नमस्कृतस्य--पूजित |

फिर योगी को भगवान्‌ के वक्षस्थल का ध्यान करना चाहिए जो देवी महालक्ष्मी काआवास है।

भगवान्‌ का वक्षस्थल मन के लिए समस्त दिव्य आनन्द तथा नेत्रों को पूर्णसंतोष प्रदान करने वाला है।

तब योगी को अपने मन में सम्पूर्ण विश्व द्वारा पूजित भगवान्‌की गर्दन का ध्यान धारण करना चाहिए।

भगवान्‌ की गर्दन उनके वक्षस्थल पर लटकनेवाले कौस्तुभ मणि की सुन्दरता को बढ़ाने वाली है।

बाहूंश्व मन्दरगिरे: परिवर्तनेननिर्णिक्तबाहुबलयानधिलोकपालानू ।

सश्जिन्तयेहशशतारमसह्मतेज:श् च तत्करसरोरुहराजहंसम्‌ ॥

२७॥

बाहूनू-- भुजाओं का; च--तथा; मन्दर-गिरे: --मन्दर पर्वत का; परिवर्तनेन--घूमने से; निर्णिक्त--पालिश किया,रगड़ खाया; बाहु-बलयान्‌--बाहु के आभूषण; अधिलोक-पालान्‌--ब्रह्माण्ड के नियामकों का स्त्रोत; सश्चिन्तयेत्‌--ध्यान करे; दश-शत-अरम्‌--दस सौ आरे, सुदर्शन चक्र; असहा-तेज:--चकाचौं ध, द्युति; शब्डमू--शंख; च-- भी;तत्‌-कर--भगवान्‌ के हाथ में; सरोरूह--कमल जैसे; राज-हंसम्‌--हंस की तरह |

इसके बाद योगी को भगवान्‌ की चारों भुजाओं का ध्यान करना चाहिए जो प्रकृतिके विभिन्न कार्यों का नियन्त्रण करने वाले देवताओं की समस्त शक्तियों के स्त्रोत हैं।

फिर योगी चमचमाते उन आभूषणों पर मन केन्द्रित करे जो मन्दराचल के घूमने से रगड़गये थे।

उसे चाहिए कि भगवान्‌ के चक्र सुदर्शन चक्र का भी ठीक से चिन्तन करेजो एक हजार आरों से तथा असह्वय तेज से युक्त है।

साथ ही वह शंख का ध्यान करे जोउनकी कमल-सहण हथेली में हंस सा प्रतीत होता है।

कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेतदिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।

मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टांचैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥

२८॥

कौमोदकीम्‌--कौमोदकी नामक गदा; भगवतः -- भगवान्‌ की; दयिताम्‌-- अत्यन्त प्रिय; स्मरेत--स्मरण करे;दिग्धाम्‌--सनी हुईं; अराति--शत्रुओं के; भट--सैनिक; शोणित-कर्दमेन--रक्त के धब्बों से; मालामू--माला, हार;मधुव्रत--भौंरों का; वरूथ--झुंड़; गिरा-- ध्वनि से; उपधुष्टाम्‌--घिरा; चैत्यस्थ--जीव का; तत्त्वमू--सिद्धान्त तत्त्व;अमलम्‌-शुद्ध; मणिम्‌ू--मोती की माला; अस्य-- भगवान्‌ के; कण्ठे--गले में |

फिर योगी को चाहिए कि वह प्रभु की कौमोदकी नामक गदा का ध्यान करे जोउन्हें अत्यन्त प्रिय है।

यह गदा शत्रुतापूर्ण सैनिक असुरों को चूर-चूर करने वाली है औरउनके रक्त से सनी हुई है।

योगी को भगवान्‌ के गले में पड़ी हुई सुन्दर माला का भीध्यान करना चाहिए जिस पर मधुर गुंजार करते हुए भौरे मँडराते रहते हैं।

भगवान्‌ कीमोती की माला का भी ध्यान करना चाहिए जो उन शुद्ध आत्माओं की सूचक है, जोभगवान्‌ की सेवा में लगे रहते हैं।

भृत्यानुकम्पितधियेह गृहीतमूर्ते:सशञ्ञिन्तयेद्धशवतो वदनारविन्दम्‌ ।

यद्विस्फुरन्मकरकुण्डलवल्गितेनविद्योतितामलकपोलमुदारनासम्‌ ॥

२९॥

भृत्य-- भक्तों के लिए; अनुकम्पित-धिया--अनुकम्पावश; इह--इस संसार में; गृहीत-मूर्तें: --विभिन्न रूपों कोधारण करने वाला; स्िन्तयेत्‌-- ध्यान करे; भगवत:-- भगवान्‌ का; वदन--मुखमण्डल; अरविन्दम्‌--कमल-सहश; यत्‌--जो; विस्फुरन्‌ू--चमचमाता; मकर--मगर की आकृति का; कुण्डल--कान की बालियों का;वल्गितेन--हिलने-डुलने से; विद्योतित-- प्रकाशित; अमल--स्वच्छ; कपोलम्‌ू--गाल; उदार--सुस्पष्ट, सुघड़;नासमू--नाक

तब योगी को भगवान्‌ के कमल-सहृश मुखमण्डल का ध्यान करना चाहिएजोइस जगत में उत्सुक भक्तों के लिए अनुकम्पावश अपने विभिन्न रूप प्रकट करते हैं।

उनकी नाक अत्यन्त उन्नत है और उनके स्वच्छ गाल उनके मकराकृत कुण्डलों के हिलनेसे प्रकाशमान हो रहे हैं।

यच्छीनिकेतमलिभि: परिसेव्यमानंभूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम्‌ ।

मीनद्वया श्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रंध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उललसद्श्रु ॥

३०॥

यत्‌--भगवान्‌ का जो मुखमण्डल; श्री-निकेतम्‌--कमल; अलिभि:--भौंरों से; परिसेव्यमानम्‌--घिरा हुआ;भूत्या--छटा से; स्वया--अपनी; कुटिल--घुँघराले; कुन्तल--बालों का; वृन्द--झुंड के झुंड; जुष्टम्‌ू--सुशोभित;मीन--मछली का; द्वय--जोड़ा; आश्रयम्‌--निवास; अधिक्षिपत्‌--लजाने वाला; अब्ज--कमल; नेत्रमू--नेत्र वाला;ध्यायेत्‌-- ध्यान करे; मन:ः-मयम्‌--मन में निर्मित; अतन्द्रित:--सतर्क ; उल्लसत्‌--नाचती हुई; भ्रु-- भौहें |

तब योगी भगवान्‌ के सुन्दर मुखमण्डल का ध्यान करता है, जो घुँघराले बालों,कमल जैसे नेत्रों तथा नाचती भौंहों से सुशोभित है।

इसकी शोभा छटा के आगे भौरोंसे घिरा कमल तथा तैरती हुई मछलियों की जोड़ी मात खा जाती है।

तस्यावलोकमधिकं कृपयातिघोर-तापत्रयोपशमनाय निसृष्टमक्ष्णो: ।

स्निग्धस्मितानुगुणितं विपुलप्रसादंध्यायेच्चिरं विपुलभावनया गुहायाम्‌ ॥

३१॥

तस्य-- भगवान्‌ की; अवलोकम्‌--चितवन; अधिकम्‌--प्राय:; कृपया--अनुग्रह से; अतिघोर--अत्यन्त भयावह;ताप-त्रय--तीन प्रकार के कष्ट; उपशमनाय--कम करने के लिए; निसृष्टम्‌--चितवन; अक्ष्णो:--आँखों से;स्निग्ध--चिकनी, प्यारी; स्मित--मुस्कान; अनुगुणितम्‌--के साथ-साथ; विपुल--प्रचुर; प्रसादम्‌ू--दया से युक्त;ध्यायेत्‌-- ध्यान करे; चिरम्‌--दीर्घकाल तक; विपुल--पूर्ण; भावनया-- भक्ति से; गुहायाम्‌--हृदय में |

योगी को चाहिए कि भगवान्‌ के नेत्रों की कृपापूर्ण चितवन का ध्यान पूर्ण समर्पणभाव से करे, क्योंकि उससे भक्तों के अत्यन्त भयावह तीन प्रकार के कष्टों का शमनहोता है।

प्रेमभरी मुसकान से युक्त उनकी चितवन विपुल प्रसाद से पूर्ण है।

हासं हरेरवनताखिललोकतीकब्र-शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम्‌ ।

सम्मोहनाय रचितं निजमाययास्यभ्रूमण्डलं मुनिकृते मकरध्वजस्य ॥

३२॥

हासमू--मुसकान; हरे: -- श्री हरि का; अवनत--झुका हुआ; अखिल--समस्त; लोक--मनुष्यों के लिए; तीब्र-शोक--धोर दुख से उत्पन्न; अश्रु-सागर--आँसुओं का समुद्र; विशोषणम्‌--सुखाने के लिए; अति-उदारम्‌-- अत्यन्तउपकारी; सम्मोहनाय--मोहने के लिए; रचितम्‌--उत्पन्न किया गया; निज-मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से;अस्य--इसका; भ्रू-मण्डलम्‌--टेढ़ी भौंहें; मुनि-कृते--मुनियों की भलाई के लिए; मकर-ध्वजस्य--कामदेव का

इसी प्रकार योगी को भगवान्‌ श्री हरि की उदार मुसकान का ध्यान करना चाहिएजो घोर शोक से उत्पन्न उनके अश्रुओं के समुद्र को सुखाने वाली है, जो उनको नमस्कारकरते हैं।

उसे भगवान्‌ की चाप सदृश भौंहों का भी ध्यान करना चाहिए जो मुनियों कीभलाई के लिए कामदेव को मोहने के लिए भगवान्‌ की अन्तरंगा शक्ति से प्रकट है।

ध्यानायनं प्रहसितं बहुलाधरोष्ठ-भासारुणायिततनुद्धिजकुन्दपड्धि ।

ध्यायेत्स्वदेहकुहरेउवसितस्य विष्णो-भक्त्याद्रयार्पितमना न पृथग्दिहृक्षेत्‌ ॥

३३॥

ध्यान-अयनम्‌--सरलतापूर्वक ध्यान किया गया; प्रहसितम्‌--हँसी, अट्टहास; बहुल--प्रभूत; अधर-ओएष्ठ --उनकेहोठों की; भास--भव्यता से; अरुणायित--गुलाबी हुए; तनु--छोटे-छोटे; द्विज--दाँत; कुन्द-पड्लि --चमेली कीकलियों की पंक्ति के समान; ध्यायेत्‌-- ध्यान करे; स्व-देह-कुहरे--अपने हृदय के मध्य में; अवसितस्य--वास करनेवाला; विष्णो: --विष्णु का; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; आर्द्रया--प्रेम में डूबा; अर्पित-मना:--मन को स्थिर किये; न--नहीं; पृथक्‌ू--अन्य कुछ; दिदक्षेत्‌--देखने की कामना करे।

योगी को चाहिए कि प्रेम में ड़बा हुआ भक्तिपूर्वक अपने अन्तरतम में भगवान्‌ विष्णुके अट्टहास का ध्यान करे।

उनका यह अट्टहास इतना मोहक है कि इसका सरलता सेध्यान किया जा सकता है।

भगवान्‌ के हँसते समय उनके छोटे-छोटे दाँत चमेली कीकलियों जैसे दिखते हैं और उनके होठों की कान्ति के कारण गुलाबी प्रतीत होते हैं।

एकबार अपना मन उनमें स्थिर करके, योगी को कुछ और देखने की कामना नहीं करनी चाहिए।

भकत्या द्रवद्धूदय उत्पुलकः प्रमोदात्‌ ।

औत्कण्ट्यबाष्पकलया मुहुरर्ध्मान-स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैव्वियुड्भे ॥

३४॥

एवम्‌--इस प्रकार; हरौ--हरि के प्रति; भगवति--भगवान्‌; प्रतिलब्ध--विकसित; भाव: -- शुद्ध प्रेम; भक्त्या--भक्ति से; द्रवत्‌--द्रवी भूत हुआ; हृदय: --उसका हृदय; उत्पुलक:--शरीर में रोमांच होना; प्रमोदात्‌--अत्यधिकप्रसन्नता से; औत्कण्ठ्य--तीक्र प्रेम से; बाष्प-कलया--आँसुओं की धारा से; मुहुः--लगातार; अर्द्यमान:-- भीगा;तत्‌--वह; च--यथा; अपि-- भी; चित्त--मन; बडिशम्‌--वंशी, कँटिया; शनकै :--धीरे-धीरे; वियुड्डे --हटा लेताहैइस मार्ग का अनुसरण करते हुए धीरे-धीरे योगी में भगवान्‌ हरि के प्रति प्रेम उत्पन्नहो जाता है।

इस प्रकार भक्ति करते हुए अत्यधिक आनन्द के कारण शरीर में रोमांच होनेलगता है और गहन प्रेम के कारण शरीर अश्रुओं की धारा से नहा जाता है।

यहाँ तक किधीरे-धीरे वह मन भी भौतिक कर्म से विमुख हो जाता है, जिसे योगी भगवान्‌ कोआकृष्ट करने के साधन रूप में प्रयुक्त करता है, जिस प्रकार मछली को आकृष्ट करने केलिये कँटिया प्रयुक्त की जाती है।

मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तंनिर्वाणमृच्छति मन: सहसा यथार्चि: ।

आत्मानमत्र पुरुषोव्यवधानमेक -मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाह: ॥

३५॥

मुक्त-आश्रयम्‌--मुक्ति में स्थित; यहिं--जिस समय; निर्विषयम्‌--विषयों से विरक्त; विरक्तम्‌--उदासीन; निर्वाणम्‌--बुझना, अन्त; ऋच्छति--प्राप्त करता है; मनः--मन; सहसा--तुरन्त; यथा--जिस तरह; अर्चि:--लपट;आत्मानमू--मन; अत्र--इस समय; पुरुष:--व्यक्ति; अव्यवधानम्‌--किसी प्रकार के वियोग के बिना; एकम्‌--एक;अन्वीक्षते--अनुभव करता है; प्रतिनिवृत्त--मुक्त; गुण-प्रवाह:--गुणों के प्रवाह से

इस प्रकार जब मन समस्त भौतिक कल्मष से रहित और विषयों से विरक्त हो जाताहै, तो यह दीपक की लौ के समान हो जाता है।

उस समय मन वस्तुतः परमेश्वर जैसा होजाता है और उनसे जुड़ा हुआ अनुभव किया जाता है, क्योंकि यह भौतिक गुणों केपारस्परिक प्रवाह से मुक्त हो जाता है।

सोप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्यातस्मिन्महिम्न्यवसितः सुखदुःखबाहो ।

हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्यत्‌स्वात्मन्विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ट: ॥

३६॥

सः--योगी; अपि--इसके अतिरिक्त; एतया--इससे; चरमया-- अन्तिम; मनसः--मन का; निवृत्त्या--कर्मफल केरुकने अन्त से; तस्मिन्‌ू--उसमें; महिम्नि-- अन्तिम महिमा; अवसितः --स्थित; सुख-दुःख-बाहो --सुख तथा दुखसे बाहर; हेतुत्वम्‌--कारण; अपि--निस्सन्देह; असति--अविद्या का फल; कर्तरि--अहंकार में; दुःखयो:--सुखतथा दुख का; यत्‌--जो; स्व-आत्मन्‌--अपने आपको; विधत्ते--उपलक्षित करता है; उपलब्ध-- प्राप्त; पर-आत्म--भगवान्‌ का; काष्ठः--सर्वोच्च सत्य |

इस प्रकार उच्चतम दिव्य अवस्था में स्थित मन समस्त कर्मफलों से निवृत्त होकरअपनी महिमा में स्थित हो जाता है, जो सुख तथा दुख के सारे भौतिक बोध से परे है।

उस समय योगी को परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध का बोध होता है।

उसे पता चलता हैकि सुख तथा दुख तथा उनकी अन्तःक्रियाएँ, जिन्हें वह अपने कारण समझता था,वास्तव में अविद्याजनित अहंकार के कारण थीं।

चरमः स्थितमुत्थितं वासिद्धो विपश्यति यतोध्यगमत्स्वरूपम्‌ ।

दैवादुपेतमथ दैववशादपेतंवासो यथा परिकृतं मदिरामदान्ध: ॥

३७॥

देहमू-- भौतिक शरीर; च--तथा; तमू--वह; न--नहीं; चरम: -- अन्तिम; स्थितम्‌--आसीन; उत्थितम्‌--उठा हुआ;वा--अथवा; सिद्ध:--सिद्ध जीव; विपश्यति--सोच सकता है; यत:ः--क्योंकि; अध्यगमत्‌--प्राप्त कर चुका है;स्व-रूपमू--अपनी असली पहचान; दैवात्‌-- भाग्य के अनुसार; उपेतम्‌--पहुँचा हुआ; अथ--और भी; दैव-वशात्‌--भाग्य के अनुसार; अपेतमू--गया हुआ; वास:--वस्त्र; यथा--जिस तरह; परिकृतम्‌--पहने गये; मदिरा-मद-अन्ध:--शराब पीने से अन्धा हुआ

अपना असली स्वरूप प्राप्त कर लेने के कारण पूर्णतया सिद्ध जीव को इसका कोईबोध नहीं होता है कि यह भौतिक देह किस तरह हिल-डुल रही है या काम कर रही है,जिस तरह कि नशा किया हुआ व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह अपने शरीर में वस्त्रधारण किये हैं अथवा नहीं।

देहोपि दैववशग: खलु कर्म यावत्‌स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एवं सासु: ।

त॑ सप्रपक्लमधिरूढसमाधियोग:स्वाप्न॑ पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तु: ॥

३८ ॥

देह:--शरीर; अपि--इसके अतिरिक्त; दैव-वश-ग:--भगवान्‌ के वश में; खलु--निस्सन्देह; कर्म--कर्म; यावत्‌--जब तक; स्व-आरम्भकम्‌-- अपने आप प्रारम्भ किया गया; प्रतिसमीक्षते--कार्य करता रहता है; एबव--निश्चय ही;स-असु:--इन्द्रियों के साथ-साथ; तम्‌--शरीर; स-प्रपञ्लम्‌--अपने विस्तारों सहित; अधिरूढ-समाधि-योग: --योगाभ्यास द्वारा समाधि में स्थित; स्वाप्म्‌--स्वप्न-जनित; पुनः--फिर; न--नहीं; भजते--अपनाता है; प्रतिबुद्ध--प्रबुद्ध, जाग्रत; वस्तु:--अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति।

ऐसे मुक्त योगी के इन्द्रियों सहित शरीर का भार भगवान्‌ अपने ऊपर ले लेते हैं औरयह शरीर तब तक कार्य करता रहता है जब तक इसके दैवाधीन कर्म समाप्त नहीं होजाते।

इस प्रकार अपनी स्वाभाविक स्थिति के प्रति जागरूक तथा योग की चरमसिद्धावस्था, समाधि, में स्थित मुक्त भक्त शरीर के गौण फलों को निजी कह करस्वीकार नहीं करता।

इस प्रकार वह अपने शारीरिक कार्यकलापों को स्वण में सम्पन्न कार्यकलाप सहृश मानता है।

यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथड्मर्त्य: प्रतीयते ।

अप्पात्मत्वेनाभिमताहेहादेः पुरुषस्तथा ॥

३९॥

यथा--जिस प्रकार; पुत्रातू-पुत्र से; च--तथा; वित्तात्‌--सम्पत्ति से; च--भी; पृथक्‌--भिन्न रूप से; मर्त्य:--नाशवान पुरुष; प्रतीयते--समझा जाता है; अपि--ही; आत्मत्वेन--स्वभाव से; अभिमतातू--प्रिय से; देह-आदे:--अपने भौतिक शरीर, इन्द्रियों तथा मन से; पुरुष:--मुक्त जीव; तथा--उसी तरह

परिवार तथा सम्पत्ति के प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण मनुष्य पुत्र तथा सम्पत्ति कोअपना मानने लगता है और भौतिक शरीर के प्रति स्नेह होने से वह सोचता है कि यहमेरा है।

किन्तु वास्तव में जिस तरह मनुष्य समझ सकता है कि उसका परिवार तथाउसकी सम्पत्ति उससे पृथक्‌ हैं, उसी तरह मुक्त आत्मा समझ सकता है कि वह तथाउसका शरीर एक नहीं हैं।

यथोल्मुकाद्विस्फुलिड्राद्धूमाद्वापि स्वसम्भवात्‌ ।

अप्पात्मत्वेनाभिमताद्यथाग्नि: पृथगुल्मुकात्‌ ॥

४०॥

यथा--जिस प्रकार; उल्मुकात्‌--लौ से; विस्फुलिड्ञातू-चिनगारियों से; धूमात्‌-- धुएँ से; बा--अथवा; अपि--भी;स्व-सम्भवात्‌-- अपने आप से उद्भूत; अपि--यद्यपि; आत्मत्वेन--प्रकृति स्वभाव से; अभिमतातू--घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित; यथा--जिस प्रकार; अग्नि:--अग्नि; पृथक्‌ --भिन्न; उल्मुकात्‌--

लौ से प्रज्बलित अग्नि ज्वाला से, चिनगारी से तथा धुएँ से भिन्न है, यद्यपि ये सभी उससेघनिष्ठ रूप से सम्बन्धित होते हैं, क्योकि वे एक ही प्रज्वलित काष्ठ से उत्पन्न होते हैं।

भूतेन्द्रियान्तःकरणात्प्रधानाज्जीवसंज्ञितात्‌ ।

आत्मा तथा पृथग्द्रष्टा भगवान्ब्रह्मसंज्ञित: ॥

४१॥

भूत--पंच तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अन्त:ः-करणात्‌--मन से; प्रधानात्‌ू--प्रधान से; जीव-संज्ञितातू--जीवात्मा से;आत्मा--परमात्मा; तथा--उसी तरह; पृथक्‌-भिन्न; द्रष्टा--देखनेवाला; भगवान्‌-- भगवान्‌; ब्रह्म-संज्ञित:--ब्रह्म'कहलाने वाला।

परब्रह्म कहलाने वाला भगवान्‌ द्रष्टा है।

वह जीवात्मा या जीव से भिन्न है, जोइन्द्रियों, पंचतत्त्वों तथा चेतना से संयुक्त है।

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

ईक्षेतानन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम्‌ ॥

४२॥

सर्व-भूतेषु--समस्त जीवों में; च--तथा; आत्मानम्‌--आत्मा को; सर्व-भूतानि--समस्त जीव; च--यथा;आत्मनि--परमेश्वर में; ईक्षेत-- उसे देखना चाहिए; अनन्य-भावेन--समभाव से; भूतेषु--समस्त जीवों में; इब--सहश; ततू-आत्मताम्‌--स्व की प्रकृति

योगी को चाहिए कि समस्त जीवों में उसी एक आत्मा को देखे, क्योंकि जो कुछभी विद्यमान है, वह सब परमेश्वर की विभिन्न शक्तियों का प्राकट्य है।

इस तरह से भक्तको चाहिए कि वह समस्त जीवों को बिना भेदभाव के देखे।

यही परमात्मा कासाक्षात्कार है।

स्वयोनिषु यथा ज्योतिरेक॑ नाना प्रतीयते ।

योनीनां गुणवैषम्यात्तथात्मा प्रकृतो स्थित: ॥

४३॥

स्व-योनिषु--काष्ट के रूप में; यथा--जिस प्रकार; ज्योति:ः--अग्नि; एकम्‌ू--एक; नाना--भिन्न-भिन्न प्रकार से;प्रतीयते--प्रकट होती है; योनीनाम्‌--विभिन्न गर्भों में; गुण-वैषम्यात्‌--विभिन्न गुणों के कारण; तथा--उसी प्रकार;आत्मा--आत्मा; प्रकृतौ-- भौतिक प्रकृति में; स्थित: --स्थित |

जिस प्रकार अग्नि काष्ठ के विभिन्न प्रकारों में प्रकट होती है उसी प्रकार प्रकृति केगुणों की विभिन्न परिस्थितियों के अन्तर्गत शुद्ध आत्मा अपने आपको विभिन्न शरीरों मेंप्रकट करता है।

तस्मादिमां स्वां प्रकृति दैवीं सदसदात्मिकाम्‌ ।

दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥

४४॥

तस्मात्‌ू--इस प्रकार; इमामू--इस; स्वाम्‌--निज; प्रकृतिमू-- भौतिक शक्ति को; दैवीम्‌--दैवी; सत्‌-असत्‌-आत्मिकाम्‌--कारण तथा कार्य से युक्त; दुर्विभाव्यामू--समझने में कठिन; पराभाव्य--जीतकर; स्व-रूपेण--स्वरूपसिद्ध स्थिति में; अवतिष्ठते--रहा आता है।

इस प्रकार माया के दुलघ्य सम्मोहन को जीतकर योगी स्वरूपसिद्ध स्थिति में रहसकता है।

यह माया इस जगत में अपने आपको कार्य-कारण रूप में उपस्थित करती है,अतः इसे समझ पाना अत्यन्त कठिन है।

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