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अध्याय पच्चीसवाँ: भक्ति सेवा की महिमा

3.25शौनक उवाच'कपिलस्तत्त्वसड्ख्याता भगवानात्ममायया ।

जातः स्वयमज:साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम्‌ ॥

१॥

शौनकः उवाच-- श्री शौनक ने कहा; कपिल: --भगवान्‌ श्रीकपिल; तत्त्व--सत्य का; सड्ख्याता--व्याख्याता;भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; आत्म-मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; जात:--जन्म लिया; स्वयम्‌--स्वयं ही; अज:ः--अजन्मा; साक्षात्‌-- प्रकट रूप में; आत्म-प्रज्ञप्तये --दिव्य ज्ञान का विस्तार करने के लिए; नृणाम्‌--मानव जाति केलिए

श्री शौनक ने कहा : यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अजन्मा हैं, किन्तु उन्होंने अपनीअन्तरंगा शक्ति से कपिल मुनि के रूप में जन्म धारण किया।

वे सम्पूर्ण मानव जाति केलाभार्थ दिव्य ज्ञान का विस्तार करने के लिए अवतरित हुए।

न हास्य वर्ष्षण: पुंसां वरिम्ण: सर्वयोगिनाम्‌ ।

विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेइसव: ॥

२॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अस्य--उसके विषय में; वर्ष्षण: --महानतम्‌; पुंसामू--मनुष्यों में से; वरिम्ण:--अग्रगण्य;सर्व--समस्त; योगिनामू--योगियों का; विश्रुतौ--सुनने में; श्रुत-देवस्य--वेदों का स्वामी; भूरि--बारम्बार, पुनःपुनः; तृप्यन्ति--तृप्त होती हैं; मे--मेरी; असवः--इन्द्रियाँ

शौनक ने आगे कहा : स्वयं भगवान्‌ से अधिक जानने वाला कोई अन्य नहीं है।

नतो कोई उनसे अधिक पूज्य है, न अधिक प्रौढ़ योगी।

अतः वे वेदों के स्वामी हैं औरउनके विषय में सुनते रहना इन्द्रियों को सदैव वास्तविक आनन्द प्रदान करने वाला है।

यहद्विधत्ते भगवान्स्वच्छन्दात्मात्ममायया ।

तानि मे अश्रहरधानस्य कीर्तन्यान्यनुकीर्तय ॥

३॥

यत्‌ यत्‌--जो जो; विधत्ते--करते हैं; भगवान्‌-- भगवान्‌; स्व-छन्द-आत्मा--आत्म इच्छा से पूर्ण, स्वतन्त्र; आत्म-मायया--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; तानि--वे सब; मे--मुझको; श्रद्धधानस्य-- श्रद्धावान; कीर्तन्यानि--प्रशंसा केयोग्य; अनुकीर्तय--कृपया वर्णन करें।

अतः कृपया उन भगवान्‌ के समस्त कार्यकलापों एवं लीलाओं का संक्षेप में वर्णनकरें, जो स्वतन्त्र हैं और अपनी अन्तरंगा शक्ति से इन सारे कार्यकलापों को सम्पन्न करतेहैं।

सूत उबाचद्वैपायनसखत्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा ।

प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदित: ॥

४॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; द्वै६वायन-सखः--व्यासदेव के मित्र; तु--तब; एवम्‌--इस प्रकार; मैत्रेय: --मैत्रेय; भगवान्‌--पूज्य; तथा--इस तरह; प्राह--कहा; इृदम्‌--यह; विदुरम्‌--विदुर से; प्रीत:--प्रसन्न होकर;आन्वीक्षिक्याम्‌-दिव्य ज्ञान के विषय में; प्रचोदित:--पूछे जाने पर |

श्रीसूत गोस्वामी ने कहा : परम शक्तिमान ऋषि मैत्रेय व्यासदेव के मित्र थे।

दिव्यज्ञान के विषय में विदुर की जिज्ञासा से प्रोत्साहित एवं प्रसन्न होकर मैत्रेय ने इस प्रकारकहा।

मैत्रेय उवाचपितरि प्रस्थितेरण्यं मातु: प्रियचिकीर्षया ।

तस्मिन्बिन्दुसरेवात्सीद्धगवान्कपिल: किल ॥

५॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; पितरि--पिता के; प्रस्थिते--प्रस्थान करने पर; अरण्यमू--वन के लिए; मातुः--अपनी माता को; प्रिय-चिकीर्षया-- प्रसन्न करने की इच्छा से; तस्मिन्‌--उस; बिन्दुसरे--बिन्दुसरोवर में; अवात्सीतू--रुका रहा; भगवान्‌-- भगवान्‌; कपिल:--कपिल; किल--निस्सन्देह

मैत्रेय ने कहा : जब कर्दम मुनि बन चले गये तो भगवान्‌ कपिल अपनी मातादेवहूति को प्रसन्न करने के लिए बिन्दु सरोवर के तट पर रहे आये।

तमासीनमकर्माणं तत्त्वमार्गाग्रदर्शनम्‌ ।

स्वसुतं देवहूत्याह धातु: संस्मरती वचः ॥

६॥

तम्‌--उसको कपिल को ; आसीनमू--स्थित; अकर्माणम्‌--फुरसत से; तत्त्वत--परम सत्य का; मार्ग-अग्र--चरमलक्ष्य; दर्शनम्‌--जो दिखा सके; स्व-सुतम्‌--अपने पुत्र को; देवहूति: --देवहूति ने; आह--कहा; धातु:--ब्रह्मा का;संस्मरती--स्मरण करते हुए; बच: --वचन, शब्द

अपनी माँ देवहूति को परम सत्य का चरम लक्ष्य दिखला सकने में समर्थ कपिलजब उसके समक्ष फुरसत से बैठे थे तो देवहूति को वे शब्द याद आये जो ब्रह्मा ने उससेकहे थे, अतः वह कपिल से इस प्रकार प्रश्न पूछने लगी।

देवहूतिरुवाचनिर्विण्णा नितरां भूमन्नसदिन्द्रियतर्षणात्‌ ।

येन सम्भाव्यमानेन प्रपन्नान्धं तम: प्रभो ॥

७॥

देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; निर्विण्णा--ऊबी हुईं; नितरामू--अत्यधिक; भूमन्‌--हे भगवान्‌; असत्‌--क्षणिक; इन्द्रिय--इन्द्रियों की; तर्षणात्‌--उत्तेजना से; येन--जिससे; सम्भाव्यमानेन--सम्भव होने से; प्रपन्ना--मैंगिर चुकी हूँ; अन्धम्‌ तम:--अज्ञान के गर्त में; प्रभो-हे प्रभु!

देवहूति ने कहा : हे प्रभु, मैं अपनी इन्द्रियों के विक्षोभ से ऊबी हुई हूँ और इसके'फलस्वरूप मैं अज्ञान रूपी अन्धकार के गर्त में गिर गई हूँ।

'तस्य त्वं तमसोन्धस्य दुष्पारस्थाद्य पारगम्‌ ।

सच्चक्षुर्जन्मनामन्ते लब्धं मे त्वदनुग्रहात्‌ ॥

८ ॥

तस्य--उस; त्वमू--तुम; तमसः--अज्ञान; अन्धस्य--अन्धकार का; दुष्पारस्थ--पार करना दुष्कर; अद्य--अब; पार-गम्‌--पार जाना; सत्‌--दिव्य; चक्षु:--नेत्र; जन्मनाम्‌-- जन्मों के; अन्ते--अन्त में; लब्धम्‌--प्राप्त किया; मे--मेरा;त्वतू-अनुग्रहात्‌-तुम्हारी कृपा से |

हे प्रभो, आप ही अज्ञान के इस घने अन्धकार से बाहर निकलने के एकमात्र साधनहैं, क्योंकि आप ही मेरे दिव्य नेत्र हैं जिसे मैंने आपके अनुग्रह से अनेकानेक जन्मों केपश्चात्‌ प्राप्त किया है।

य आद्यो भगवान्पुंसामी श्वरो वै भवान्किल ।

लोकस्य तमसान्धस्य चनश्षु: सूर्य इबोदित:ः ॥

९॥

यः--जो; आद्य:--मूल; भगवान्‌-- भगवान्‌; पुंसाम्‌ू--समस्त जीवों के; ईश्वर: --स्वामी; बै--वास्तव में; भवान्‌--आप; किल--निस्सन्देह; लोकस्य--ब्रह्माण्ड का; तमसा--अज्ञान के अन्धकार से; अन्धस्य--अन्धे का; चक्षु:--नेत्र; सूर्य:--सूर्य; इब--सहश; उदित:ः--उदित, उदय हुआ।

आप श्रीभगवान्‌ हैं, जो समस्त जीवों के मूल तथा परमेश्वर हैं।

आप ब्रह्माण्ड केअज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने के लिए सूर्य की किरणें विस्तारित करने के लिए उदित हुए हैं।

अथ मे देव सम्मोहमपाक्रष्टूं त्वमहसि ।

योवग्रहोहं ममेतीत्येतस्मिन्योजितस्त्ववा ॥

१०॥

अथ--अब; मे--मेरा; देव--हे भगवान्‌; सम्मोहम्‌--मोह, भ्रम; अपाक्रष्टमू-- भगाने के लिए; त्वमू--तुम; अर्हसि--प्रसन्न होवो; यः--जो; अवग्रह:-- भ्रान्त धारणा; अहम्‌--मैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; इति--इस प्रकार;एतस्मिनू-- इसमें; योजित:--लगाया हुआ; त्वया--तुम्हारे द्वारा

हे प्रभु, अब प्रसन्न हों और मेरे महा मोह को दूर करें।

अहंकार के कारण मैं आपकीमाया में व्यस्त रही और मैंने अपने आपको शरीर रूप में तथा फलस्वरूप शारीरिकसम्बन्धों के रूप में पहचाना।

तं त्वा गताहं शरणं शरण्यंस्वभृत्यसंसारतरो: कुठारम्‌ ।

जिज्ञासयाहं प्रकृतेः पूरुषस्यनमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम्‌ ॥

११॥

तम्‌--उस व्यक्ति को; त्वा--तुम तक; गता--गया हुआ; अहम्‌--मैं; शरणम्‌--शरण; शरण्यम्‌ू--शरण ग्रहण करनेयोग्य; स्व-भृत्य-- अपने आश्रितों के लिए; संसार--संसार के ; तरो:--वृक्ष की; कुठारम्‌--कुल्हाड़ी; जिज्ञासया--जानने की इच्छा से; अहम्‌--मैं; प्रकृतेः--पदार्थ स्त्री का; पूरुषस्य--आत्मा पुरुष का; नमामि-- नमस्कारकरती हूँ; सत्‌-धर्म--शाश्वत वृत्ति के; विदाम्‌--ज्ञाताओं का; वरिष्ठम्‌--महानतम को |

देवहूति ने आगे कहा : मैंने आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण की है, क्योंकिआप ही एकमात्र व्यक्ति हैं जिनकी शरण ग्रहण की जा सकती है।

आप वह कुल्हाड़ी हैंजिससे संसार रूपी वृक्ष काटा जा सकता है।

अतः मैं आपको नमस्कार करती हूँ,क्योंकि समस्त योगियों में आप महानतम हैं।

मैं आपसे पुरुष तथा स्त्री और आत्मा तथापदार्थ के सम्बन्ध के विषय में जानना चाहती हूँ।

मैत्रेय उवाचइति स्वमातुर्निरवद्यमीप्सितंनिशम्य पुंसामपवर्गवर्धनम्‌ ।

धियाभिनन्द्यात्मवतां सतां गति-बैभाष ईषत्स्मितशोभितानन: ॥

१२॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; स्व-मातु:--अपनी माता की; निरवद्यमू--कल्मषहीन; ईप्सितम्‌--इच्छा को; निशम्य--सुनकर; पुंसाम्‌ू--लोगों के; अपवर्ग--मोक्ष; वर्धनम्‌--बढ़ते हुए; धिया--मानसिक रूप से;अभिनन्द्य--धन्यवाद देकर; आत्म-वताम्‌--आत्म-साक्षात्कार में रूचि रखने वाले, आत्मज्ञ; सताम्‌--सत्यपुरुष,गुणातीतवादी; गतिः--पथ, मार्ग; बभाषे--कह सुनाया; ईषत्‌ू--कुछ-कुछ; स्मित--हँसते हुए; शोभित--सुन्दर;आनन:--मुखमण्डल

मैत्रेय ने कहा : दिव्य साक्षात्कार के लिए अपनी माता की कल्मषरहित इच्छा कोसुनकर भगवान्‌ ने मन-ही-मन उनके प्रश्नों के लिए धन्यवाद दिया और इस प्रकारमुस्कान-युत मुख से उन्होंने आत्म-साक्षात्कार में रूचि रखने वाले अध्यात्मवादियों केमार्ग की व्याख्या की।

श्रीभगवानुवाचयोग आध्यात्मिक: पुंसां मतो नि: श्रेयसाय मे ।

अत्यन्तोपरतिर्यत्र दुःखस्य च सुखस्य च ॥

१३॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; योग:--योग प्रणाली; आध्यात्मिक: --आत्मा से सम्बन्धित; पुंसामू--जीवोंका; मतः--स्वीकृत है; निःश्रेयसाय-- चरम लाभ हेतु; मे--मेरे द्वारा; अत्यन्त--पूर्ण; उपरतिः--विरक्ति; यत्र--जहाँ;दुःखस्य--दुख से; च--तथा; सुखस्य--सुख से; च--तथा |

भगवान्‌ ने उत्तर दिया : जो योग पद्धति भगवान्‌ तथा व्यक्तिगत जीवात्मा कोजोड़ती है, जो जीवात्मा के चरम लाभ के लिए है और जो भौतिक जगत में समस्त सुखोंतथा दुखों से विरक्ति उत्पन्न करती है, वही सर्वोच्च योग पद्धति है।

तमिमं ते प्रवक्ष्यामि यमवोचं पुरानघे ।

ऋषीणां श्रोतुकामानां योगं सर्वाड्रनैपुणम्‌ ॥

१४॥

तम्‌ इमम्‌--वही; ते-- तुमको ; प्रवक्ष्यामि--बतलाऊँगा; यम्‌--जो; अवोचम्‌--मैंने बतलाया था; पुरा--पहले;अनधे-हे पूज्य माता; ऋषीणाम्‌--ऋषियों को; श्रोतु-कामानाम्‌--सुनने के लिए उत्सुक; योगम्‌--योग पद्धति;सर्व-अड्ड--सभी प्रकार से; नैपुणम्‌--उपयोगी एवं व्यावहारिक |

हे परम पवित्र माता, अब मैं आपको वही प्राचीन योग पद्धति समझाऊँगा, जिसे मैंनेपहले महान्‌ ऋषियों को समझाया था।

यही हर प्रकार से उपयोगी एवं व्यावहारिक है।

चेत: खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम्‌ ।

गुणेषु सक्त बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ॥

१५॥

चेत:--चेतना; खलु--निस्सन्देह; अस्य--उसका; बन्धाय--बन्धन के लिए; मुक्तये--मुक्ति के लिए; च--तथा;आत्मन:--जीव का; मतम्‌--माना जाता है; गुणेषु--तीनों गुणों में; सक्तम्‌--मोहित; बन्धाय--बद्धजीवन के लिए;रतम्‌ू--आसक्त; वा--अथवा; पुंसि--परमात्मा में; मुक्तये--मुक्ति के लिए।

जीवात्मा की चेतना जिस अवस्था में प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा आकृष्ट होती है,वह बद्धजीवन कहलाती है।

किन्तु जब वही चेतना श्रीभगवान्‌ के प्रति आसक्त होती है,तो मनुष्य मोक्ष की चेतना में स्थित हो ।

अहं ममाभिमानोत्थे: कामलोभादिभिर्मलै: ।

वबीत॑ यदा मन: शुद्धमदुःखमसुखं समम्‌ ॥

१६॥

अहम्‌ू-मैं; मम--मेरा; अभिमान-- भ्रान्ति से; उत्थैः--उत्पन्न, जनित; काम--काम; लोभ--लालच; आदिभि:--इत्यादि; मलैः--मलों विकारों से; वीतम्‌--मुक्त, से रहित; यदा--जब; मन:--मन; शुद्धम्‌-शुद्ध; अदुःखम्‌--दुःखरहित; असुखम्‌--सुखबिहीन; समम्‌--समभाव |

जब मनुष्य शरीर को ‘'मैं'' तथा भौतिक पदार्थों को ‘'मेरा '' मानने के झूठे भाव सेउत्पन्न काम तथा लोभ के विकारों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है, तो उसका मन शुद्ध होजाता है।

उस विशुद्धावस्था में वह तथाकथित भौतिक सुख तथा दुख की अवस्था कोलाँघ जाता है।

तदा पुरुष आत्मानं केवल प्रकृतेः परम्‌ ।

निरन्तरं स्वयंज्योतिरणिमानमखण्डितम्‌ ॥

१७॥

तदा--तब; पुरुष: --जीव; आत्मानमू--अपने आपको; केवलम्‌--शुद्ध; प्रकृतेः परम्‌--संसार से परे; निरन्तरम्‌--अभिन्न; स्वयम्‌-ज्योति:--स्वयं-प्रकाश, स्वतः तेजवान; अणिमानम्‌--सूक्ष्प; अखण्डितम्‌--खंडित नहीं, अखण्ड।

उस समय जीव अपने आपको संसार से परे, सदैव स्वयंप्रकाशित, अखंडित एवंसूक्ष्म आकार में देख सकता है।

ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियुक्तेन चात्मना ।

परिपश्यत्युदासीनं प्रकृति च हतौजसम्‌ ॥

१८ ॥

ज्ञान--ज्ञान; वैराग्य--वैराग्य; युक्तेन--से युक्त; भक्ति-- भक्ति; युक्तेन-- से युक्त; च--तथा; आत्मना--मन से;'परिपश्यति--देखता है; उदासीनम्‌--उदासीन; प्रकृतिमू--संसार को; च--तथा; हत-ओजसमू--शक्ति से वंचित।

आत्म-साक्षात्कार की उस अवस्था में मनुष्य ज्ञान तथा भक्ति में त्याग के अभ्यास सेप्रत्येक वस्तु को सही रूप में देख सकता है, वह इस संसार के प्रति अन्यमनस्क हो जाताहै और उस पर भौतिक प्रभाव अत्यल्प प्रबलता के साथ काम कर पाते हैं।

न युज्यमानया भकत्या भगवत्यखिलात्मनि ।

सहशोउस्ति शिवः पन्था योगिनां ब्रह्मसिद्धये ॥

१९॥

न--नहीं; युज्यमानया--सम्पन्न की जा रही; भक्त्या-- भक्ति से; भगवति-- भगवान्‌ के प्रति; अखिल-आत्मनि--परमात्मा; सहशः--के समान; अस्ति--है; शिव:--मंगलकारी, शुभ; पन्था:--पथ; योगिनाम्‌ू--योगियों का; ब्रह्म-सिद्धये-- आत्म-साक्षात्कार की सिद्धि के लिए।

किसी भी प्रकार का योगी जब तक श्रीभगवान्‌ की भक्ति में प्रवृत्त नहीं हो जाता, तब तक आत्म-साक्षात्कार में पूर्णता नहीं प्राप्त की जा सकती, क्योंकि भक्ति ही एकमात्र शुभ मार्ग है।

प्रसड्रमजरं पाशमात्मन: कवयो विदु: ।

स एव साथुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम्‌ ॥

२०॥

प्रसड्मू--आसक्ति; अजरम्‌--प्रबल; पाशम्‌--बन्धन; आत्मन:--आत्मा का; कवय: --विद्वान पुरुष; विदु:--जानतेहैं; सः एव--वही; साधुषु-- भक्तों में; कृत:--प्रयुक्त; मोक्ष-द्वारम्‌--मुक्ति का दरवाजा; अपावृतम्‌--खुला हुआ प

्रत्येक विद्वान व्यक्ति अच्छी तरह जानता है कि सांसारिक आसक्ति ही आत्मा कासबसे बड़ा बन्धन है।

किन्तु वही आसक्ति यदि स्वरूपसिद्ध भक्तों के प्रति हो जाय तोमोक्ष का द्वार खुल जाता है।

तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम्‌ ।

अजातजशत्रवः शान्ता: साधव: साधुभूषणा: ॥

२१॥

तितिक्षवः--सहनशील; कारुणिका:--दयालु; सुहृदः --सुहृद; सर्व-देहिनाम्‌ू--समस्त जीवों के; अजात-शत्रव:--किसी के प्रति शत्रुता न रखने वाले; शान्ता:--शान्त; साधव: --शास्त्रों के अनुसार चलने वाले; साधु-भूषणा:--अलौकिक गुणों से भूषित।

साधु के लक्षण हैं कि वह सहनशील, दयालु तथा समस्त जीवों के प्रति मैत्री-भावरखता है।

उसका कोई शत्रु नहीं होता, वह शान्त रहता है, वह शास्त्रों का पालन करता हैऔर उसके सारे गुण अलौकिक होते हैं।

मय्यनन्येन भावेन भक्ति कुर्वन्ति ये हढाम्‌ ।

मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवा: ॥

२२॥

मयि--मेरे प्रति; अनन्येन भावेन-- अनन्य भाव से, अविचलित मन से; भक्तिमू--भक्ति; कुर्वन्ति--करते हैं; ये--जो;हढामू--कट्टर, दृढ़; मत्‌-कृते--मेंरे लिए; त्यक्त-्यागे हुए; कर्माण:--कर्म; त्यक्त-्यागे हुए; स्व-जन--सम्बन्धीजन; बान्धवा:--परिचितों, बन्धुगणों को |

ऐसा साधु अविचलित भाव से भगवान्‌ की कट्टर भक्ति करता है।

भगवान्‌ के लिएवह संसार के अन्य समस्त सम्बन्धों यथा पारिवारिक सम्बन्ध तथा मैत्री का परित्याग करदेता है।

मदाश्रया: कथा मृष्टा: श्रुण्वन्ति कथयन्ति च ।

तपन्ति विविधास्तापा नैतान्मद्गतचेतस: ॥

२३॥

मत्‌-आश्रया: --मेरे विषय में; कथा: --कथाएँ; मृष्टाः:-- आनन्दप्रद; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; कथयन्ति-- कीर्तन करते हैं;च--तथा; तपन्ति--कष्ट झेलते हैं; विविधा:--नाना प्रकार के; तापाः:--भौतिक क्लेश; न--नहीं; एतानू--उनको;मतू-गत--मुझमें लगाये; चेतस:--अपने विचार।

निरन्तर मेरे अर्थात्‌ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के कीर्तन तथा श्रवण में संलग्न रहकरसाधुगण किसी प्रकार का भौतिक कष्ट नहीं पाते, क्योंकि वे सैदव मेरी लीलाओं तथाकार्यकलापों के विचारों में ही निमग्न रहते हैं।

त एते साधव: साध्वि सर्वसड्भविवर्जिता: ।

सड़स्तेष्वथ ते प्रार्थ्य: सड़दोषहरा हि ते ॥

२४॥

ते एते--वे ही; साधव:--भक्तगण; साध्वि--हे साध्वी; सर्ब--समस्त; सड़--लगाव से; विवर्जिता: --मुक्त; सड्:--लगाव; तेषु--उनके प्रति; अथ--अत:ः; ते--तुम्हारे द्वारा; प्रार्थ्य:--खोजे जाने चाहिए; सड्र-दोष-- भौतिक आसक्तिके बुरे प्रभाव; हराः--हरने वाले; हि--निस्सन्देह; ते--वेहे माते

हे साध्वी, ये उन महान्‌ भक्तों के गुण हैं, जो समस्त आसक्तियों से मुक्त हैं।

तुम्हें ऐसे पवित्र पुरुषों की संगति करनी चाहिए, क्योंकि ऐसी संगति भौतिक आसक्तिके समस्त कुप्रभावों को हरने वाली है।

सतां प्रसझन्मम वीर्यसंविदोभवन्ति हत्कर्णरसायना: कथा: ।

तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनिश्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥

२५॥

सताम्‌--शुद्ध भक्तों की; प्रसड्रातू--संगति से; मम--मेरे; वीर्य--अलौकिक कार्यो; संविद:--चर्चा से; भवन्ति--होजाते हैं; हत्‌--हृदय को; कर्ण--कान को; रस-अयना:--अच्छी लगने वाली; कथा:--कथाएँ; तत्‌--उसके;श़जोषणात्‌--अनुशीलन से, सेवन से; आशु--तुरन्‍्त; अपवर्ग--मोक्ष के; वर्त्मनि--मार्ग पर; श्रद्धा --हढ़ विश्वास;रतिः--आकर्षण; भक्ति:--भक्ति; अनुक्रमिष्यति--क्रमश: आएँगी |

शुद्ध भक्तों की संगति में श्रीभगवान्‌ की लीलाओं तथा उनके कार्यकलापों कीचर्चा कान तथा हृदय को अत्यधिक रोचक एवं प्रसन्न करने वाली होती है।

ऐसे ज्ञान केअनुशीलन मे मनुष्य धीरे-धीरे मोक्ष मार्ग में अग्रसर होता है, तत्पश्चात्‌ मुक्त हो जाता हैऔर उसका आकर्षण स्थिर हो जाता है।

तब असली समर्पण तथा भक्तियोग काशुभारम्भ होता है।

भक्त्या पुमाज्जातविराग ऐन्द्रियाद्‌दृष्टश्रुतान्मद्रचनानुचिन्तया ।

चित्तस्य यत्तो ग्रहणे योगयुक्तोयतिष्यते ऋजुभियोंगमार्गं: ॥

२६॥

भक्त्या-- भक्ति से; पुमान्‌--मनुष्य; जात-विराग: --अरुचि उत्पन्न होने पर; ऐन्द्रियात्‌--इन्द्रियतृप्ति के लिए; दृष्ट--इस संसार में देखा हुआ; श्रुतातू-- अगले संसार में सुना हुआ; मत्‌-रचन--सृष्टि के मेरे कार्यकलाप इत्यादि;अनुचिन्तया--निरन्तर चिन्तन करने से; चित्तस्य--मन का; यत्त:--लगा हुआ; ग्रहणे--नियन्त्रण में; योग-युक्त: --भक्ति योग में स्थित; यतिष्यते-- प्रयास करेगा; ऋजुभि:-- सरल; योग-मार्गै: --योग की विधियों के द्वारा |

इस प्रकार भक्तों की संगति में सचेत होकर भक्ति करते हुए भगवान्‌ केकार्यकलापों के विषय में निरन्तर सोचते रहने से मनुष्य को इस लोक में तथा परलोक मेंइन्द्रियतृप्ति के प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है।

कृष्णभावनामृत की यह विधि योग कीसरलतम विधि है।

जब मनुष्य भक्तियोग के मार्ग में सही-सही स्थित हो जाता है, तो यहअपने चित्त मन को नियन्त्रित करने में सक्षम होता है।

असेवयाय॑ प्रकृतेर्गुणानांज्ञानेन वैराग्यविजृम्भितेन ।

योगेन मय्यर्पितया च भक्‍त्यामां प्रत्यगात्मानमिहावरुन्धे ॥

२७॥

असेवया--सेवा न करते हुए; अयम्‌--यह पुरूष; प्रकृतेः गुणानाम्‌-प्रकृति के गुणों का; ज्ञानेन--ज्ञान से;वैराग्य--वैराग्य से; विजृम्भितेन--विकसित; योगेन--योग के अभ्यास से; मयि--मुझको; अर्पितया--अर्पित, हृढ़रहकर; च--तथा; भकत्या-- भक्ति से; माम्‌--मुझको; प्रत्यक्‌-आत्मानमू--परम सत्य; इह--इसी जीवन में;अवरुन्धे-- प्राप्त कर लेता है|

इस तरह प्रकृति के गुणों की सेवा में न लगकर, अपितु कृष्णभक्ति विकसितकरके, वैराग्य युक्त ज्ञान प्राप्त करके तथा योग के अभ्यास से, जिसमें मनुष्य का मनसदैव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान की भक्तिमय सेवा में स्थिर रहता है, मनुष्य इसी जीवन मेंमेरा साहचर्य संगति प्राप्त कर लेता है, क्योंकि मैं परम पुरुष अर्थात्‌ परम सत्य हूँ।

देवहूतिरुवाचकाचित्त्वय्युच्चिता भक्ति: कीहशी मम गोचरा ।

यया पदं ते निर्वाणमञ्जसान्वाशनवा अहम्‌ ॥

२८॥

देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; काचित्‌--क्या; त्वयि--तुमको; उचिता--उचित; भक्ति:-- भक्ति; कीहशी--किस प्रकार की; मम--मेरे द्वारा; गो-चरा--अभ्यास की जाने के लिए उपयुक्त; यया--जिससे; पदम्‌--पाँव; ते--तुम्हारे; निर्वाणम्‌--मुक्ति; अज्ञसा--तुरन्‍्त; अन्वाश्नवै--प्राप्त करूँगी; अहम्‌--मैं |

भगवान्‌ का यह वचन सुनकर देवहूति ने पूछा : मैं किस प्रकार के भक्तियोग का विकास और अभ्यास करूँ जिससे मुझे आपके चरणकमलों की सेवा तत्काल एवंसरलता से प्राप्त हो सके ?

यो योगो भगवद्दाणो निर्वाणात्मंस्त्वयोदित: ।

कीहशः कति चाड्भानि यतस्तत्त्वावबोधनम्‌ ॥

२९॥

यः--जो; योग: --योग विधि; भगवत्‌-बाण:-- भगवान्‌ को लक्ष्य की गई; निर्वाण-आत्मनू--हे निर्वाणस्वरूप;त्वया--तुम्हारे द्वारा; उदित:--कही गई; कीहश:--किस तरह की; कति--कितनी; च--तथा; अड्रानि--शाखाएँ;यतः--जिससे; तत्त्व--सत्य का; अवबोधनम्‌--ज्ञान |

आपने जैसा बताया है कि योग पद्धति का उद्देश्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ को प्राप्तकरने और सांसारिक अस्तित्व माया के पूर्णतया विनाश के लिए है, तो कृपया मुझेउस योग पद्धति की प्रकृति बतलाएँ।

उस अलौकिक योग को यथार्थ रूप में कितनीविधियों से समझा जा सकता है ?

तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीहरे ।

सुखं बुद्धग्रेय दुर्बोधं योषा भवदनुग्रहात्‌ ॥

३०॥

तत्‌ एतत्‌--वही; मे--मुझको; विजानीहि--कृपया समझावें; यथा--जिससे; अहम्‌--मैं; मन्द--कुन्द; धीः --बुद्धिवाली; हरे--हे भगवान्‌; सुखम्‌--सरलतापूर्वक; बुद्धयेय--समझ सकूँ; दुर्बोधम्‌--न समझ में आने वाली;योषा--स्त्री; भवत्‌-अनुग्रहात्‌-- आपके अनुग्रह से |

मेरे पुत्र कपिल, आखिर मैं एक स्त्री हूँ।

परम सत्य को समझ पाना मेरे लिए अत्यन्तकठिन है, क्योंकि मेरी बुद्धि इतनी कुशाग्र नहीं है।

यद्यपि मैं इतनी बुद्धिमान नही हूँ।

किन्तु तो भी, यदि आप मुझे कृपा करके समझाएँगे तो मैं उसे समझ कर दिव्य सुख काअनुभव कर सकूँगी।

मैत्रेय उवाचविदित्वार्थ कपिलो मातुरित्थ॑जातस्नेहो यत्र तन्वाभिजातः ।

तत्त्वाम्नायं यत्प्रवदन्ति साड्ख्यंप्रोवाच वै भक्तिवितानयोगम्‌ ॥

३१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; विदित्वा--जानकर; अर्थम्‌--अभिप्राय; कपिल:--कपिल; मातु:--अपनी माता का;इत्थम्‌--इस प्रकार; जात-स्नेह:--दया आ गईं; यत्र--उस पर; तन्वा--अपने शरीर से; अभिजात: -- उत्पन्न; तत्त्व-आम्नायम्‌--शिष्य-परम्परा से प्राप्त सत्य; यत्‌--जो; प्रवदन्ति--पुकारते हैं; साइख्यम्‌--सांख्य दर्शन; प्रोवाच--वर्णन किया; बै--वास्तव में; भक्ति-- भक्ति; वितान--विस्तार; योगम्‌--योग

श्रीमैत्रेय ने कहा : अपनी माता का कथन सुनकर कपिल उसका प्रयोजन समझ गयेऔर उसके प्रति दयारद्द्र हो उठे, क्योंकि उन्होंने उसके शरीर से जन्म लिया था।

उन्होंने सांख्य दर्शन का वर्णन किया जो शिष्य-परम्परा से प्राप्त भक्ति तथा योगिक साक्षात्कार का एक मिलाजुला रूप है।

श्रीभगवानुवाचदेवानां गुणलिड्भानामानु श्रविककर्मणाम्‌ ।

सत्त्व एवैकमनसो वृत्ति: स्वाभाविकी तु याअनिमित्ता भागवती भक्ति: सिद्धेर्गगीयसी ॥

३२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- श्री भगवान्‌ ने कहा; देवानामू--इन्द्रियों के प्रमुख देवों या इन्द्रियों का; गुण-लिड्ञनाम्‌--जोविषयों को पहचानते हैं; आनुभश्रविक--शास्त्रों के अनुसार; कर्मणाम्‌ू--कौन सा कर्म; सत्त्वे--मन को या भगवान्‌को; एब--केवल; एक-मनसः ---अविभाजित मन वाले व्यक्ति का; वृत्तिः--झुकाव; स्वाभाविकी -- प्राकृतिक ;तु--वास्तव में; या--जो; अनिमित्ता--निमित्तरहित; भागवती-- भगवान्‌ के प्रति; भक्ति:--भक्ति; सिद्धेः--मोक्ष कीअपेक्षा; गरीयसी-- श्रेयस्कर |

भगवान्‌ कपिल ने कहा : ये इन्द्रियाँ दैवों की प्रतीकात्मक प्रतिनिधि हैं और इनकास्वाभाविक झुकाव बैदिक आदेशों के अनुसार कर्म करने में है।

जिस प्रकार इन्द्रियाँदेवताओं देवताओं की प्रतीक हैं, उसी प्रकार मन भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ काप्रतिनिधि है।

मन का प्राकृतिक कार्य सेवा करना है।

जब यह सेवा-भाव किसी हेतु केबिना श्रीभगवान्‌ की सेवा में लगा रहता है, तो यह सिद्धि से कहीं बढ़कर है।

जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥

३३॥

'जरयति--पचा देती है; आशु--तुरन्‍्त; या--जो; कोशम्‌--सूक्ष्म शरीर को; निगीर्णम्‌--खाई वस्तुओं को; अनल:ः--अग्नि; यथा--जिस प्रकार।

भक्ति जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर को बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के उसी प्रकारविलय कर देती है, जिस प्रकार जठराग्नि खाये हुए भोजन को पचा देती है।

नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिन्‌मत्पादसेवाभिरता मदीहाः ।

येडन्योन्यतो भागवताः प्रसज्यसभाजयन्ते मम पौरुषाणि ॥

३४॥

न--कभी नहीं; एक-आत्मताम्‌--एकाकार होना; मे--मेरा; स्पृहयन्ति--इच्छा करते हैं; केचित्‌--कोई भी; मत्‌ू-पाद-सेवा--मेरे चरणकमलों की सेवा में; अभिरता:--लगे हुए; मत्‌-ईहा:--मुझे प्राप्त करने का प्रयास करते हुए;ये--जो; अन्योन्यतः--परस्पर; भागवता:-- शुद्ध भक्त; प्रसज्य--जुट कर; सभाजयन्ते--गुणगान करते हैं; मम--मेरे; पौरुषाणि--पराक्रमों का

जो भक्ति-कार्यों में संलग्न है और जो मेरे चरणकमलों की सेवा में निरन्तर लगा रहता है, ऐसा शुद्ध भक्त कभी भी मुझसे तदाकार एकात्म होना नहीं चाहता।

ऐसा भक्त जो अविचिलित होकर लगा रहता है सदैव मेरी लीलाओं तथा कार्य-कलापों कागुणगान करता है।

पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्‍तःप्रसन्नवक्त्रार॒णलोचनानि ।

रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानिसाकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति ॥

३५॥

'पश्यन्ति--देखते हैं; ते--वे; मे--मेरा; रुचिराणि-- सुन्दर; अम्ब--हे माता; सन्‍्तः--भक्तजन; प्रसन्न--हँसता हुआ;वक्त्र--मुखमंडल; अरुण --प्रभातकालीन सूर्य के समान; लोचनानि--नेत्र; रूपाणि--रूप; दिव्यानि--दिव्य ; वर-प्रदानि--वरदायक; साकम्‌--मेरे साथ; वाचम्‌--शब्द; स्पृहणीयाम्‌-- अनुकूल; वदन्ति--कहते हैं |

हे माता, मेरे भक्त नित्य ही उदीयमान प्रभात के सूर्य सदृश नेत्रों से युक्त मेरे प्रसन्नमुखमण्डल वाले रूप का अवलोकन करते हैं।

वे मेरे विभिन्न दिव्य मित्रवत रूपों कोदेखना चाहते हैं और साथ ही मुझसे अनुकूल सम्भाषण करना चाहते हैं।

तैर्दर्शनीयावयवैरुदार-विलासहासेक्षितवामसूक्ते: ।

हतात्मनो हतप्राणांश्व भक्ति-रनिच्छतो मे गतिमण्वीं प्रयुड़े ॥

३६॥

तैः--उन रूपों से; दर्शनीय--मोहक; अवयवै:--अंगों-प्रत्यंगों से; उदार--उदार; विलास--लीलाएँ; हास--मुसकान; ईक्षित--चितवन; वाम--मनोहर; सूक्तै:--आनन्दायक शब्दों से; हत--मोहित; आत्मन:--मन; हत--मोहित; प्राणानू--इन्द्रियाँ; च--तथा; भक्ति:-- भक्ति; अनिच्छत:--न चाहते हुए; मे--मेरा; गतिम्‌ू-- धाम;अण्वीम्‌--सूक्ष्म; प्रयुड़े --प्राप्त करता है

भगवान्‌ के मुसकाते तथा आकर्षक स्वरूप को देखकर तथा उनके अत्यन्त मोहकशब्दों को सुनकर शुद्ध भक्त अपनी अन्य समस्त चेतना खो बैठते हैं।

उनकी इन्द्रियाँअन्य समस्त कार्यों से मुक्त होकर भक्ति में तल्‍लीन हो जाती हैं।

इस प्रकार अनिच्छित हीसही उसे अनायास मुक्तिप्राप्त हो जाती है।

अथो विभूतिं मम मायाविनस्ता-मैश्वर्यमष्टाड्रमनुप्रवृत्तम्‌ ।

श्रियं भागवतीं वास्पृहयन्ति भद्रांपरस्य मे तेउश्नुवते तु लोके ॥

३७॥

अथो--तब; विभूतिम्‌--ऐश्वर्य; मम--मेरे; मायाविन:--माया के स्वामी का; ताम्‌--उस; ऐ श्वर्यमू--योग की सिद्ध्धिको; अष्ट-अड्र्म्‌--आठ अंगों वाली; अनुप्रवृत्तम्‌--पालन करते हुए; अ्ियमू--चमक-दमक; भागवतीम्‌--ईश्वर केसाम्राज्य को; वा--अथवा; अस्पृहयन्ति--कामना नहीं करते; भद्रामू--शुभ; परस्य--परमे श्वर का; मे--मेरा; ते--वेभक्त; अश्नुवते-- भोग करते हैं; तु--लेकिन; लोके --इस जीवन में

इस प्रकार मेरे ही विचारों में निमग्न रहने के कारण भक्त को स्वर्गलोक में प्राप्य श्रेष्ठवर जिसमें सत्यलोक सम्मिलित है की भी इच्छा नहीं रह जाती।

उसमें योग से प्राप्तहोने वाली अष्ट सिद्धियों की भी कामना नहीं रह जाती, न ही वह ईश्वर के धाम पहुँचनाचाहता है।

तथापि न चाहते हुए भी, इसी जीवन में भक्त प्रदान किए गये उन समस्तवरदानों को भोगता है।

न कर्हिचिन्मत्परा: शान्तरूपेनदडुछ्ष्यन्ति नो मेडनिमिषो लेढि हेति: ।

येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्चसखा गुरु: सुहृदो दैवमिष्टम्‌ ॥

३८ ॥

न--नहीं; कर्हिचित्‌ू--सदैव; मत्‌-परा: --मेरे भक्त; शान्त-रूपे--हे माता; नड्छ्यन्ति--खो देंगे; नो--नहीं; मे--मेरा; अनिमिष:--समय ; लेढि--नष्ट करता है; हेतिः:--आयुध; येषामू--जिनका; अहम्‌--मैं; प्रियः--प्यारा;आत्मा--स्व; सुतः--पुत्र; च--तथा; सखा--मित्र; गुरुः--शिक्षक; सुहृदः--शुभचिन्तक; दैवम्‌--देवता, विग्रह;इष्टम्‌-हृष्ट, अभीष्ट |

भगवान्‌ ने आगे कहा : हे माते, जो भक्त ऐसा दिव्य ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं, वेउससे कभी वंचित नहीं होते।

ऐसे ऐश्वर्य को न तो आयुध, न काल-परिवर्तन ही विनष्टकर सकता है।

चूँकि भक्तगण मुझे अपना मित्र, सम्बन्धी, पुत्र, शिक्षक, शुभचिन्तकतथा परमदेव मानते हैं, अतः किसी काल में भी उनसे यह ऐश्वर्य छीना नहीं जा सकता।

इमं लोक॑ तथैवामुमात्मानमुभयायिनम्‌ ।

आत्मानमनु ये चेह ये राय: पशवो गृहा: ॥

३९॥

विसृज्य सर्वानन्यांश्व मामेवं विश्वतोमुखम्‌ ।

भजन्त्यनन्यया भकत्या तान्मृत्योरतिपारये ॥

४०॥

इमम्‌--इस; लोकम्‌--संसार; तथा--उसी तरह; एव--निश्चय ही; अमुम्‌--वह संसार; आत्मानम्‌--सूक्ष्म देह;उभय--दोनों में; अयिनम्‌-- भ्रमण करते; आत्मानम्‌--शरीर; अनु--के साथ-साथ; ये--जो; च-- भी; इह--इससंसार में; ये--जो; राय:--सम्मति; पशव:--पशु; गृहा: --घर; विसृज्य--त्याग कर; सर्वानू--सभी; अन्यान्‌ू--अन्य; च--तथा; मामू--मुझको; एवम्‌--इस प्रकार; विश्वतः -मुखम्‌--ब्रह्माण्डव्यापी भगवान्‌ को; भजन्ति--पूजतेहैं; अनन्यया--अनन्य भाव से; भक्त्या--भक्ति से; तानू--उनको; मृत्यो: --मृत्यु के; अतिपारये--पार ले जाता हूँ

इस प्रकार जो भक्त मुझे सर्वव्यापी, जगत्‌ के स्वामी की अनन्य भाव से पूजा करताहै, वह स्वर्ग जैसे उच्चतर लोकों में भेजे जाने अथवा इसी लोक में धन, सन्‍तति, पशु, घरअथवा शरीर से सम्बन्धित किसी भी वस्तु के साथ सुख पूर्वक रहने की समस्तकामनाओं को त्याग देता है।

मैं उसे जन्म और मृत्यू के सागर के उस पार ले जाता हूँ।

नान्यत्र मद्भगवत:ः प्रधानपुरुषेश्वरात्‌ ।

आत्मनः सर्वभूतानां भयं तीब्रं निवर्तते ॥

४१॥

न--नहीं; अन्यत्र--दूसरा; मत्‌--मेरे सिवा; भगवतः-- श्रीभगवान्‌ ; प्रधान-पुरुष-ई श्वरात्‌ू--ईश्वर जो प्रकृति तथापुरुष दोनों है; आत्मन:--आत्मा; सर्व-भूतानाम्‌--समस्त जीवों में; भयम्‌-- भय; तीव्रमू--विकट; निवर्तते--छुटकारा पाता है।

यदि कोई मुझको छोड़कर अन्य की शरण ग्रहण करता है, तो वह जन्म तथा मृत्युके विकट भय से कभी छुटकारा नहीं पा सकता, क्‍योंकि मैं सर्वशक्तिमान, परमेश्वरअर्थात्‌ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌, समस्त सृष्टि का आदि स्त्रोत तथा समस्त आत्माओं काभी परमात्मा हूँ।

मद्धयाद्वाति वातोयं सूर्यस्तपति मद्धयात्‌ ।

वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्वरति मद्भयात्‌ ॥

४२॥

मत्‌-भयात्‌--मेरे भय से; वाति--बहती है; वात:--वायु; अयम्‌--यह; सूर्य: --सूर्य; तपति--चमकता है; मत्‌ू-भयातू--मेरे भय से; वर्षति--बरसता है; इन्द्र:--इनद्र; दहति--जलती है; अग्निः-- अग्नि; मृत्यु: --मृत्यु; चरति--जाती है; मत्‌-भयात्‌--मेरे भय से ।

यह मेरी श्रेष्ठता है कि मेरे ही भय से हवा बहती है, मेरे ही भय से सूर्य चमकता हैऔर मेघों का राजा इन्द्र मेरे ही भय से वर्षा करता है।

मेरे ही भय से अग्नि जलती है औरमेरे ही भय से मृत्यु इतनी जानें लेती है।

ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिन: ।

क्षेमाय पादमूलं मे प्रविशन्त्यकुतोभयम्‌ ॥

४३॥

ज्ञान--ज्ञान; वैराग्य--तथा वैराग्य से; युक्तेन--सज्जित; भक्ति-योगेन-- भक्तियोग के द्वारा; योगिन:--योगीजन;क्षेमाय--शाश्रत लाभ के लिए; पाद-मूलम्‌--चरणों में; मे--मेरे; प्रविशन्ति--शरण ग्रहण करते हैं; अकुतः-भयम्‌--निडर, निर्भय |

योगीजन दिव्य ज्ञान तथा त्याग से युक्त होकर एवं अपने शाश्रत लाभ के लिए मेरेचरणकमलों में शरण लेते हैं और चूंकि मैं भगवान्‌ हूँ, अतः वे भयमुक्त होकरभगवद्धाम में प्रवेश पाने के लिए पात्र हो जाते हैं।

एतावानेव लोकेस्मिन्पुंसां नि: श्रेयसोदय: ।

तीब्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरमू ॥

४४॥

एतावान्‌ एव--इतना ही; लोके अस्मिन्‌--इस संसार में; पुंसामू--मनुष्यों का; नि:श्रेयस--जीवन की अन्तिम सिद्धिकी; उदय:--प्राप्ति; तीत्रेण --तीत्; भक्ति-योगेन-- भक्ति के अभ्यास से; मनः--मन; मयि--मुझमें; अर्पितम्‌--लगेहुए; स्थिरम्‌--स्थिर।

अतः जिन व्यक्तियों के मन भगवान्‌ में स्थिर हैं, वे भक्ति का तीव्र अभ्यास करते हैं।

जीवन की अन्तिम सिद्धि प्राप्त करने का यही एकमात्र साधन है।

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