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अध्याय बीस: मैत्रेय और विदुर के बीच बातचीत

3.20शौनक उवाचमहीं प्रतिष्ठामध्यस्य सौते स्वायम्भुवो मनु: ।

कान्यन्वतिष्ठद्द्वाराणि मार्गायावरजन्मनाम्‌ ॥

१॥

शौनक:--शौनक; उवाच--कहा; महीम्‌--पृथ्वी को; प्रतिष्ठामू--स्थित; अध्यस्य--प्राप्त करके; सौते--हे सूतगोस्वामी; स्वायम्भुव:--स्वायंभुव; मनु:--मनु ने; कानि--क्या; अन्वतिष्ठत्‌--किया; द्वाराणि--मार्ग; मार्गाय--निकलने के लिए; अवर--बाद में; जन्मनाम्‌ू--जन्म लेनेवालों का

श्री शौनक ने पूछा-हे सूत गोस्वामी, जब पृथ्वी अपनी कक्ष्या में पुन: स्थापित होगई तो स्वायंभुव मनु ने बाद में जन्म ग्रहण करने वाले व्यक्तियों को मुक्ति-मार्ग प्रदर्शितकरने के लिए क्या-क्या किया ?

क्षत्ता महाभागवत: कृष्णस्यैकान्तिकः सुहत्‌ ।

यस्तत्याजाग्रजं कृष्णे सापत्यमघवानिति ॥

२॥

क्षत्ता--विदुर; महा-भागवतः -- भगवान्‌ का परम भक्त; कृष्णस्य-- श्रीकृष्ण का; एकान्तिक:--एकनिष्ठ भक्त;सुहत्‌--मित्र; यः--जो; तत्याज--त्याग दिया; अग्र-जम्‌--अपने बड़े भाई ( राजा धृतराष्ट्र ) को; कृष्णे--कृष्ण केप्रति; स-अपत्यम्‌--अपने सौ पुत्रों सहित; अघ-वान्‌-- अपराधी; इति--इस प्रकार।

शौनक ऋषि ने विदुर के बारे में जानना चाहा, जो भगवान कृष्ण का महान भक्तएवं सखा था और जिसने भगवान के लिए ही अपने उस ज्येष्ट भाई का साथ छोड़ दियाथा जिसने अपने पुत्रों के साथ मिलकर भगवान की इच्छा के विरुद्ध षड्यंत्र किया थो।

द्वैपायनादनवरो महित्वे तस्य देहजः ।

सर्वात्मना थ्रितः कृष्ण तत्परांश्चाप्यनुत्रतः ॥

३॥

द्वैपायनात्‌ू--व्यासदेव से; अनवर:--किसी प्रकार से हेय नहीं; महित्वे--महानता में; तस्थ--उसका ( व्यास का );देह-ज:--उसके शरीर से उत्पन्न; सर्ब-आत्मना--अपने सम्पूर्ण मन से; अ्रित:--शरण ली; कृष्णम्‌-- भगवान्‌श्रीकृष्ण की; ततू-परान्‌--उनमें अनुरक्त; च--तथा; अपि--भी; अनुव्रत:--पालन किया।

विदुर वेदव्यास के आत्मज थे और उनसे किसी प्रकार से कम न थे।

इस तरह उन्होंनेपूर्ण मनोभाव से श्रीकृष्ण के चरणकमलों को स्वीकार किया और वे उनके भक्तों के प्रति अनुरक्त थे।

किमन्वपृच्छन्मैत्रेयं विरजास्तीर्थसेवया ।

उपगम्य कुशावर्त आसीन तत्त्ववित्तमम्‌ ॥

४॥

किम्‌--क्या; अन्वपृच्छत्‌ू--पूछा; मैत्रेयम्‌--मैत्रेय ऋषि से; विरजा:--विदुर जो भौतिक कल्मष से रहित थे; तीर्थ-सेवया--तीर्थस्थलों में जाकर; उपगम्य--मिल कर; कुशावर्ते--कुशावर्त ( हरद्वार ) में; आसीनम्‌--स्थित; तत्त्व-वित्‌-तमम्‌--आत्म-विज्ञान के आदि ज्ञाता।

तीर्थस्थलों की यात्रा करने से विदुर सारी विषय वासना से शुद्ध हो गये।

अन्त में वेहरद्वार पहुँचे जहाँ आत्मज्ञान के ज्ञाता एक महर्षि से उनकी भेंट हुई जिससे उन्होंने कुछप्रश्न किये।

अत: शौनक ऋषि ने पूछा कि मैत्रेय से विदुर ने और क्या-क्या पूछा ?

तयो: संवदतो: सूत प्रवृत्ता हमला: कथा: ।

आपो गाज इवाघघ्नीहरे: पादाम्बुजाअ्या: ॥

५॥

तयो:--जब दोनों ( मैत्रेय तथा विदुर ); संवदतो:--वार्तालाप कर रहे थे; सूत--हे सूत; प्रवृत्ताः:--निकली हुई; हि--निश्चय ही; अमला:--निर्मल; कथा:--आख्यान; आप: --जल; गाड्राः--गंगा नदी का; इब--सहश; अघ-घ्नी: --समस्त पापों का नाश करने वाला; हरेः-- भगवान्‌ के; पाद-अम्बुज--चरणारविन्द; आश्रया:--आशञ्रित, शरणागत |

शौनक ने विदुर तथा मैत्रेय के बीच होने वाले वार्तालाप के सम्बन्ध में प्रश्न कियाकि भगवान्‌ की निर्मल लीलाओं के अनेक आख्यान रहे होंगे।

ऐसे आख्यानों को सुननागंगाजल में स्नान करने के सदृश है क्योंकि इससे सभी पाप-बन्धन छूट सकते हैं।

ता नः कीर्तय भद्गं ते कीर्तन्योदारकर्मण: ।

रसज्ञः को नु तृप्येत हरिलीलामृतं पिबन्‌ ॥

६॥

ताः--उनकी वार्ता; न:--हमको ; कीर्तय--सुनाइये; भद्रम्‌ ते--आपका मंगल हो; कीर्तन्य--जपना चाहिए; उदार--उदार; कर्मण: --कार्य; रस-ज्ञ:-- भक्त जो रस को समझ सके, रसिक; कः--कौन; नु--निस्सन्देह; तृप्येत-- तृप्तिका अनुभव करे; हरि-लीला-अमृतम्‌-- भगवान्‌ की लीलाओं का अमृत; पिबन्‌ू--पीते हुए

है सूत गोस्वामी, आपका मंगल हो, कृपा करके भगवान्‌ के कार्यो को कह सुनाइयेक्योंकि वे उदार एवं स्तुति के योग्य हैं।

ऐसा कौन भक्त है, जो भगवान्‌ की अमृतमयीलीलाओं को सुनकर तृप्त हो जाये ?

एवमुग्रश्नवा: पृष्ट ऋषिभिनैमिषायनै: ।

भगवत्यर्पिताध्यात्मस्तानाह श्रूयतामिति ॥

७॥

एवम्‌--इस प्रकार; उग्रश्रवा:--सूत गोस्वामी; पृष्ट:--पूछे जाने पर; ऋषिभि:--ऋषियों द्वारा; नैमिष-अयनै: --जोनैमिष के जंगल ( नैमिषारण्य ) में एकत्र हुए थे; भगवति-- भगवान्‌ को; अर्पित--अर्पित; अध्यात्म:--अपना मन;तानू--उनसे; आह--कहा; श्रूयताम्‌--सुनो; इति--इस प्रकार |

नैमिषारण्य के ऋषियों द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर रोमहर्षण के पुत्र सूत गोस्वामीने, जिनका मन भगवान्‌ की दिव्य लीलाओं में लीन था, कहा--अब जो मैं कहता हूँ,कृपया उसे सुनें।

सूत उबाचहरेर्धृतक्रोडतनो: स्वमाययानिशम्य गोरुद्धरणं रसातलातू ।

लीलां हिरण्याक्षमवज्ञया हतंसज्जातहर्षो मुनिमाह भारत: ॥

८॥

सूतः उबाच--सूत ने कहा; हरेः-- भगवान्‌ का; धृत-- धारण किया; क़रोड--सूकर का; तनो:--शरीर; स्व-मायया--अपनी दैवी शक्ति से; निशम्य--सुनकर; गो:--पृथ्वी का; उद्धरणम्‌--उद्धार; रसातलात्‌--समुद्र के गर्भसे; लीलाम्‌--खिलवाड़; हिरण्याक्षम्‌-हिरण्याक्ष असुर; अवज्ञया--अवज्ञापूर्वक; हतम्--मारा गया; सज्भजात-हर्ष: --परम प्रफुल्लित; मुनिम्‌--मुनि ( मैत्रेय ) से; आह--कहा; भारत:--विदुर ने

सूत गोस्वामी ने आगे कहा--भरत के वंशज विदुर भगवान्‌ की कथा सुन कर परमप्रफुल्लित हुए क्योंकि भगवान्‌ ने अपनी दैवी शक्ति से शूकर का रूप धारण करकेपृथ्वी को समुद्र के गर्भ से खेल-खेल में ऊपर लाने ( लीला ) तथा हिरण्याक्ष कोउदासीन भाव से मारने का कार्य किया था।

फिर विदुर मैत्रेय से इस प्रकार बोले।

विदुर उवाचप्रजापतिपति: सृष्ठरा प्रजासगें प्रजापतीन्‌ ।

किमारभत मे ब्रह्मन्प्रबूह्मव्यक्तमार्गवित्‌ ॥

९॥

विदुरः उबाच--विदुर ने कहा; प्रजापति-पतिः--भगवानू्‌ ब्रह्मा ने; सृष्ठा--सृष्टि करके; प्रजा-सर्गे --जीवों की सृष्टिकरने के उद्देश्य से; प्रजापतीन्‌--प्रजापतियों को; किम्‌--क्या; आरभत--प्रारम्भ किया; मे--मुझको; ब्रह्मनू--हेपवित्र ऋषि; प्रत्रूहि--बताइये; अव्यक्त-मार्ग-वित्‌--न जानने वालों का ज्ञाता।

विदुर ने कहा--हे पवित्र मुनि, आप हमारी समझ में न आने वाले विषयों को भी जानते हैं, अतः मुझे यह बताएँ कि जीवों के आदि जनक प्रजापतियों को उत्पन्न करने केबाद ब्रह्मा ने जीवों की सृष्टि के लिए क्या किया ?

ये मरीच्यादयो विप्रा यस्तु स्वायम्भुवो मनु: ।

ते वै ब्रह्मण आदेशात्कथमेतदभावयन्‌ ॥

१०॥

ये--जो; मरीचि-आदय: --मरीचि आदि महर्षि; विप्रा:--ब्राह्मण; य: --जो; तु--निस्सन्देह; स्वायम्भुवः मनु;:--तथास्वायंभुव मनु; ते--वे; बै--निस्सन्देह; ब्रह्मण:-- भगवान्‌ ब्रह्म के; आदेशात्‌--आज्ञा से; कथम्‌-कैसे; एतत्‌--यहब्रह्माण्ड; अभावयन्‌--उत्पन्न हुआ

विदुर ने पूछा-प्रजापतियों ( मरीचि तथा स्वायंभुव मनु जैसे जीवों के आदि जनक )ने ब्रह्मा के आदेश के अनुसार किस प्रकार सृष्टि की और इस दृश्य जगत का किसप्रकार विकास किया ?

सद्ठितीया: किमसूजन्स्व॒तन्त्रा उत कर्मसु ।

आहो स्वित्संहता: सर्व इदं स्‍प समकल्पयन्‌ ॥

११॥

स-द्वितीया:--अपनी पत्नियों सहित; किम्‌--क्या; असृजन्‌--उत्पन्न किया; स्व-तन्‍्त्रा: --स्वतन्त्र रहकर; उत--अथवा; कर्मसु--अपने कार्यों में; आहो स्वित्‌--अथवा; संहता:--मिलकर, एकसाथ; सर्वे--सभी प्रजापति;इदम्‌--यह; सम समकल्पयन्‌--रचना की।

क्या उन्होंने इस जगत की सृष्टि अपनी-अपनी पत्नियों के सहयोग से की अथवा वेस्वतन्त्र रूप से अपना कार्य करते रहे ? या कि उन्होंने संयुक्त रूप से इसकी रचना की ?

मैत्रेय उवाचदैवेन दुर्वितक्येण परेणानिमिषेण च ।

जातक्षोभाद्धगवतो महानासीद्गुणत्रयात्‌ ॥

१२॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; दैवेन--प्रारब्ध ( भाग्य ) द्वारा; दुर्वित्क्येण--कल्पना शक्ति से परे; परेण--महाविष्णुद्वारा; अनिमिषेण--सनातन काल की शक्ति से; च--यथा; जात-क्षोभात्‌--सन्तुलन बिगड़ गया; भगवतः --श्रीभगवान्‌ का; महान्‌--समस्त भौतिक तत्त्व ( महत्‌ू-तत्त्व ); आसीत्‌--उत्पन्न हुए थे; गुण-त्रयात्‌--तीन गुणों से |

मैत्रेय ने कहा--जब प्रकृति के तीन तत्त्वों के सहयोग का सन्तुलन जीवात्मा कीअदृश्य क्रियाशीलता, महाविष्णु तथा कालशक्ति के द्वारा विश्लुब्ध हुआ तो समग्र भौतिकतत्त्व ( महत्‌-तत्त्व ) उत्पन्न हुए।

रजःप्रधानान्महतस्त्रिलिड़ो दैवचोदितात्‌ ।

जातः ससर्ज भूतादिवियदादीनि पञ्ञशः ॥

१३॥

रजः-प्रधानात्‌ू--रजोगुण की प्रधानता से; महतः--महत्--तत्त्व से; त्रि-लिड्र:--तीन प्रकार का; दैव-चोदितातू-- श्रेष्ठअधिकारी के द्वारा प्रेरित; जात:--उत्पन्न हुआ; ससर्ज--विकसित हुआ; भूत-आदि: --अहंकार ( भौतिक तत्त्वों कामूल ); वियत्‌--शून्य; आदीनि--इत्यादि; पञ्षश: -- पाँच पाँच के समूहों में ।

जीव के भाग्य ( दैव ) की प्रेरणा से रजोगुण प्रधान महत्‌ू-तत्त्व से तीन प्रकार काअहंकार उत्पन्न हुआ।

फिर अंहकार से पाँच-पाँच तत्त्वों के अनेक समूह उत्पन्न हुए।

तानि चैकैकशः स्त्रष्टमसमर्थानि भौतिकम्‌ ।

संहत्य दैवयोगेन हैममण्डमवासूजन्‌ ॥

१४॥

तानि--उन तत्त्वों का; च--यथा; एक-एकशः --पृथक्‌ -पृथक्‌; स्क्‍रष्टम्‌--उत्पन्न करने में; असमर्थानि-- असमर्थ;भौतिकम्‌-भौतिक ब्रह्माण्ड; संहत्य--संगठित करके; दैव-योगेन--परमे श्वर की शक्ति से; हैमम्‌--सोने की तरहचमकीला; अण्डम्‌--गोलक; अवासूजनू--उत्पन्न किया |

अलग-अलग रहकर ब्रह्माण्ड की रचना करने में असमर्थ होने के कारण वे परमेश्वरकी शक्ति के सहयोग से संगठित हुए और फिर एक चमकीले अण्डे का सृजन करने मेंसक्षम छुए।

सोशयिष्टाब्धिसलिले आण्डकोशो निरात्मकः ।

साग्रं वे वर्षसाहस्त्रमन्ववात्सीत्तमी श्वर: ॥

१५॥

सः--यह; अशयिष्ट-- पड़ा रहा; अब्धि-सलिले--कारणार्णव के जल में; आण्ड-कोश:--अण्डा; निरात्मक:--अचेत अव्स्था में; साग्रमू--कुछ अधिक; बै--निस्सन्देह; वर्ष-साहस्त्रमू--एक हजार वर्षों तक; अन्ववात्सीतू--स्थितहो गया; तमू--अंडे में; ईश्वर: -- भगवान्‌ |

यह चमकीला अण्डा एक हजार वर्षो से भी अधिक काल तक अचेतन अवस्था मेंकारणार्णव के जल में पड़ा रहा।

तब भगवान्‌ ने इसके भीतर गर्भोदकशायी विष्णु केरूप में प्रवेश किया।

तस्य नाभेरभूत्पद्ां सहस्त्राकोरुदीधिति ।

सर्वजीवनिकायौको यत्र स्वयमभूत्स्वराट्‌ ॥

१६॥

तस्य-- भगवान्‌ की; नाभे:--नाभि से; अभूत्‌--बाहर निकला; पदढाम्‌--कमल; सहस्त्र-अर्क--एक हजार सूर्यों से;उरू--अधिक; दीधिति--देदीप्यमान; सर्व--समस्त; जीव-निकाय--बद्धजीवों का आश्रय; ओकः --स्थान; यत्र--जहाँ; स्वयम्‌--अपने आप; अभूत्‌--आविर्भाव हुआ; स्व-राट्‌--सर्वशक्तिमान ब्रह्माजी |

गर्भोदकशायी भगवान्‌ विष्णु की नाभि से हजार सूर्यो की दीप्ति सदृश प्रकाशमान एक कमल पुष्प प्रकट हुआ।

यह कमल पुष्प समस्त बद्धजीवों का आश्रय है और इसपुष्प से प्रकट होने वाले पहले जीवात्मा सर्वशक्तिमान ब्रह्मा थे।

सोडनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।

लोकसंस्थां यथा पूर्व निर्ममे संस्थया स्वया ॥

१७॥

सः--ब्रह्माजी ने; अनुविष्ट:--प्रविष्ट किया गया; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; यः--जो; शेते--शयन करता है; सलिल-आशये--गर्भोदक सागर में; लोक-संस्थाम्‌--ब्रह्माण्ड; यथा पूर्वम्‌--पूर्ववत्‌; निर्ममे--निर्माण किया; संस्थया--बुद्धि से; स्वया--अपनी |

जब गर्भोदकशायी भगवान्‌ ब्रह्मा के हृदय में प्रवेश कर गये तो ब्रह्मा को बुद्धि आईऔर इस बुद्धि से उन्होंने ब्रह्माण्ड की पूर्ववत्‌ सृष्टि प्रारम्भ कर दी।

ससर्ज च्छाययाविद्यां पञ्ञपर्वाणमग्रत: ।

तामिस्त्रमन्धतामिस्त्रं तमो मोहो महातमः ॥

१८॥

ससर्ज--उत्पन्न किया; छायया--अपनी छाया से; अविद्याम्‌--अज्ञान; पञ्ञ-पर्वाणम्‌--पाँच प्रकार; अग्रत:--सर्वप्रथम; तामिस्त्रमू--तामिस्त्र; अन्ध-तामिस्त्रमू-अन्ध-तामिस्त्र; तम:-तमस्‌ू; मोह: -मोह; महा-तम:-महा-तमस्‌,

ओर्‌महा-मोहब्रह्म ने सबसे पहले अपनी छाया से बद्धजीवों के अज्ञान के आवरण (कोश )उत्पन्न किये।

इनकी संख्या पाँच है और ये तामिस्त्र, अन्ध-तामिस्त्र, तमस्‌, मोह तथामहामोह कहलाते हैं।

विससर्जात्मन: काय॑ नाभिनन्दंस्तमोमयम्‌ ।

जगहुर्यक्षरक्षांसि रात्रि क्षुत्त्ट्समुद्भधवाम्‌ ॥

१९॥

विससर्ज--फेंक दिया; आत्मन:--अपना; कायम्‌--शरीर; न--नहीं; अभिनन्दन्‌-- प्रसन्न होकर; तम:-मयम्‌--अज्ञान से युक्त; जगृहु:-- अधिकार कर लिया; यक्ष-रक्षांसि--यक्ष तथा राक्षस; रात्रिमू--रात; क्षुत्‌-- भूख; तृदू--प्यास; समुद्धवाम्‌-स््रोत |

क्रोध के कारण ब्रह्मा ने उस अविद्यामय शरीर को त्याग दिया।

इस अवसर का लाभउठाकर यक्ष तथा राक्षसगण उस रात्रि रूप में स्थित शरीर पर अधिकार जमाने के लिएकूद-फाँद मचाने लगे।

रात्रि भूख तथा प्यास की स्त्रोत है।

क्षुत्तृड्भ्यामुपसूष्टास्ते तं जग्धुमभिदुद्गुवु: ।

मा रक्षतैनं जश्षध्वमित्यूचु: क्षुत्तडर्दिता: ॥

२०॥

क्षुत्‌ू-तृड्भ्यामू-- भूख तथा प्यास से; उपसूष्टा:--पराजित; ते--वे असुर ( यक्ष तथा राक्षस ); तम्‌--ब्रह्मा को;जग्धुम्‌--खाने को; अभिदुद्गुवु:--आगे को दौड़ा; मा--मत; रक्षत--बचाओ, छोड़ो; एनमू--उसको; जक्षध्वम्‌--खाओ; इति--इस प्रकार; ऊचुः--कहा; क्षुत्‌-तृट्‌-अर्दिता:-- भूख तथा प्यास से आकुल |

भूख तथा प्यास से अभिभूत होकर वे चारों ओर से ब्रह्म को खा जाने के लिए दोौड़ेऔर चिल्लाए, 'उसे मत छोड़ो, उसे खा जाओ।

देवस्तानाह संविग्नो मा मां जक्षत रक्षत ।

अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं बभूविथ ॥

२१॥

देवः--ब्रह्माजी ने; तानू--उनको; आह--कहा; संविग्न:--चिन्तित; मा--मत; माम्‌--मुझको; जक्षत--खाओ;रक्षत--रक्षा करो; अहो--ओह; मे--मेरे; यक्ष-रक्षांसि--हे यक्ष तथा राक्षसों; प्रजा:--पुत्र; यूयम्‌--तुम सब;बभूविथ--उत्पन्न हुए थे।

देवताओं के प्रधान ब्रह्माजी ने घबराकर उनसे कहा, 'मुझे खाओ नहीं, मेरी रक्षाकरो।

तुम मुझसे उत्पन्न हो और मेरे पुत्र हो चुके हो।

अतः तुम लोग यक्ष तथा राक्षसहो ।

" देवता: प्रभया या या दीव्यन्प्रमुखतोसृजत्‌ ।

ते अहार्षुदेिवयन्तो विसूष्टां तां प्रभामह: ॥

२२॥

देवता:--देवतागण; प्रभया--प्रकाश के तेज से; या: या:--जो जो; दीव्यनू--चमकते हुए; प्रमुखतः--मुख्य रूप से;असृजत्‌--उत्पन्न किया; ते--उन्होंने; अहार्ष:--अधिकार जमा लिया; देवयन्त:ः--सक्रिय होने से; विसृष्टाम्‌--पृथक्‌किया हुआ; तामू--उस; प्रभामू--तेज को; अह:--दिन |

तब उन्होंने प्रमुख देवताओं की सृष्टि की जो सात्त्विक प्रभा से चमचमा रहे थे।

उन्होंने देवताओं के समक्ष दिन का तेज फैला दिया जिस पर देवताओं ने खेल-खेल मेंही अधिकार जमा लिया।

देवोदेवाज्लघनतः: सृजति स्मातिलोलुपान्‌ ।

त एन लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिर ॥

२३॥

देवः--ब्रह्माजी ने; अदेवान्‌--असुरों को; जघनतः--अपने नितंबों से; सृजति स्म--उत्पन्न किया; अति-लोलुपान्‌ू--अत्यन्त कामुक ( विषयी ); ते--वे; एनम्‌--ब्रह्माजी; लोलुपतया--कामवश; मैथुनाय--संभोग के लिए;अभिपेदिरि--निकट आये।

ब्रह्माजी ने अपने नितंब प्रदेश से असुरों को उत्पन्न किया जो अत्यन्त कामी थे।

अत्यन्त कामी होने के कारण वे संभोग के लिए उनके निकट आ गये।

ततो हसन्स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः ।

अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत्‌ ॥

२४॥

ततः--तब; हसनू--हँसते हुए; सः भगवान्‌-- पूज्य ब्रह्माजी; असुरैः--असुरों के द्वारा; निरपत्रपै:--निर्लज्ज;अन्वीयमान: --पीछा करते हुए; तरसा--तेजी से; क्रुद्ध:--नाराज; भीत:-- भयभीत; परापतत्‌-- भाग गया।

पहले तो पूज्य ब्रह्माजी उनकी मूर्खता पर हँसे, किन्तु उन निर्लज्ज असुरों को अपनापीछा करते देखकर वे क्रुद्ध हुए और भयभीत होकर हड़बड़ी में भागने लगे।

स उपत्रज्य वरदं प्रपन्नार्तिहरं हरिम्‌ ।

अनुग्रहाय भक्तानामनुरूपात्मदर्शनम्‌ ॥

२५॥

सः--ब्रह्माजी; उपब्रज्य--पास पहुँच कर; वर-दम्‌--समस्त वरों के दाता; प्रपन्न--चरणकमल की शरण लेने वाले;आर्ति-कष्ट; हरम्‌-दूर करने वाला; हरिमू-- भगवान्‌ श्री हरि के; अनुग्रहाय--कृपावश; भक्तानामू--अपने भक्तोंके प्रति; अनुरूप--उपयुक्त रूप में; आत्म-दर्शनम्‌--अपने आप को प्रकट करने वाला |

वे भगवान्‌ श्री हरि के पास पहुँचे जो समस्त वरों को देने वाले तथा अपने भक्तों एवंअपने चरणों की शरण ग्रहण करने वालों की पीड़ा को हरने वाले हैं।

वे अपने भक्तों कीतुष्टि के लिए असंख्य दिव्य रूपों में प्रकट होते हैं।

पाहि मां परमात्मंस्ते प्रेषणेनासूजं प्रजा: ।

ता इमा यभितुं पापा उपाक्रामन्ति मां प्रभो ॥

२६॥

'पाहि--रक्षा कीजिये; माम्‌--मुझको; परम-आत्मनू्‌--हे परमेश्वर; ते--तुम्हारी; प्रेषणेन-- आज्ञा से; असृजम्‌--मैंनेउत्पन्न किया; प्रजा:--समस्त जीव; ता: इमा:--वे ही; यभितुम्‌--संभोग की इच्छा से; पापा:--पापी जीव;उपाक्रामन्ति--पास आ रहे हैं; माम्‌-मेरे; प्रभो--हे भगवान्‌ ।

भगवान्‌ के पास जाकर ब्रह्माजी ने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया--हे भगवान्‌,इन पापी असुरों से मेरी रक्षा करें, जिन्हें आपकी आज्ञा से मैंने उत्पन्न किया था।

येविषय-वासना की भूख से क्रोधोन्माद में आकर मुझ पर आक्रमण करने आये हैं।

त्वमेक: किल लोकानां क्लिष्टानां क्लेशनाशनः ।

त्वमेकः क्लेशदस्तेषामनासन्नपदां तव ॥

२७॥

त्वमू--तुम; एक:--अकेले; किल--निस्सन्देह; लोकानाम्‌-मनुष्यों के; क्लिप्टानामू-क्लेशों से ग्रस्त; क्लेश --कष्ट; नाशन:--नाश करने के लिए; त्वम्‌ एक:--तुम्हीं अकेले; क्लेश-दः--क्लेश देने वाले; तेषामू--उन पर;अनासन्न--जो शरण नहीं लेते; पदाम्‌-पैरों की; तब--तुम्हारे |

है भगवान्‌, केवल आप ही दुखियों के कष्ट दूर करने और आपके चरणों की शरणमें न आने वालों को यातना देने में समर्थ हैं।

सोवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शन: ।

विमुज्ञात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥

२८॥

सः-परसे श्वर, हरि; अवधार्य--देखकर; अस्य--ब्रह्मा की; कार्पण्यम्‌--व्यथा; विविक्त--सन्देहरहित; अध्यात्म--अन्यों के मन; दर्शन:--जो देख सकता है; विमुज्ञ--त्याग दो; आत्म-तनुमू--अपना शरीर; घोराम्‌--अपवित्र; इतिउक्त:--इस प्रकार आदेशित होकर; विमुमोच ह--ब्रह्माजी ने छोड़ दिया।

सबों के मनों को स्पष्ट रूप से देख सकने वाले भगवान्‌ ने ब्रह्मा की वेदना समझली और वे उनसे बोले, 'तुम अपना यह अशुद्ध शरीर त्याग दो।

भगवान्‌ से आदेशपाकर ब्रह्मा ने अपना शरीर त्याग दिया।

तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्लललोचनाम्‌ ।

काझ्लीकलापविलसदुकूलच्छन्नरोधसम्‌ ॥

२९॥

तामू--उस शरीर को; क्वणत्‌--नुपुर ध्वनि करता; चरण-अम्भोजाम्‌--चरणकमल वाली; मद--नशा; विहल--विभोर; लोचनाम्‌--आँखों वाली; काञ्जी-कलाप--स्वर्णाभरण से निर्मित करधनी वाली; विलसत्‌--चमकती;दुकूल--महीन वस्त्र से; छन्न--ढकी; रोधसम्‌--कटि वाली

ब्रह्मा द्वारा परित्यक्त शरीर ने सन्ध्या का रूप धारण कर लिया जो काम को जगानेवाली दिन-रात की संधि वेला है।

असुर जो स्वभाव से कामुक होते हैं और जिनमेंरजोगुण का प्राधान्य होता है उसे सुन्दरी मान बैठे जिसके चरण-कमलों से नूपुरों कीध्वनि निकल रही थी, जिसके नेत्र मद से विस्तीर्ण थे और जिसका कटि भाग महीनवस्त्र से ढका था और जिस पर मेखला चमक रही थी।

अन्योन्यशए्लेषयोत्तुड्डनिरन्तरपयोधराम्‌ ।

सुनासां सुद्विजां स्निग्धहासलीलावलोकनाम्‌ ॥

३०॥

अन्योन्य--परस्पर; श्लेषया--चिपकने से; उत्तुड़---उठे हुए; निरन्तर--अन्तर हीन ( सटे ); पयः-धराम्‌--स्तन; सु-नासाम्‌--सुन्दर नाक; सु-द्विजाम्‌--सुन्दर दाँत; स्निग्ध--आकर्षक; हास--हँसी; लीला-अवलोकनामू्‌--विलासमयीचितवन।

एक दूसरे से सटे होने के कारण उसके स्तन ऊपर उठे हुए थे और उनके बीच मेंकोई रिक्त स्थान बचा न था।

उसकी नाक तथा दाँतों की बनावट सुन्दर थी; उसके होठोंपर आकर्षक हँसी नाच रही थी और वह असुरों को क्रीड़ापूर्ण चितवन से देख रही थी।

गूहन्तीं ब्रीडयात्मानं नीलालकवरूधिनीम्‌ ।

उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम्‌ ॥

३१॥

गूहन्तीम्‌--छिपाते हुए; ब्रीडया--लज्जावश; आत्मानम्‌--अपने आपको; नील--काले; अलक--बाल;वरूधिनीम्‌--गुच्छा; उपलभ्य--कल्पना करके; असुरा:--असुरगण; धर्म--हे विदुर; सर्वे--सभी; सम्मुमुहु:ः --मोहित हो गये; स्त्रियम्‌-स्त्री को |

काले-काले बालसमूह से विभूषित वह मानो लज्जावश अपने को छिपा रही थी।

उसबाला को देखकर सभी असुर विषय-वासना की भूख से मोहित हो गये।

अहो रूपमहो धेर्यमहो अस्या नवं वयः ।

मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति ॥

३२॥

अहो--ओह; रूपम्‌--कैसा सौन्दर्य; अहो-- ओह; धैर्यम्‌--कैसा धैर्य ( संयम ); अहो--ओह; अस्या:--इसका;नवम्‌--उभरता हुआ; वय:--यौवन; मध्ये--बीच में; कामयमानानामू--कामियों के; अकामा--कामरहित; इब--सहश; विसर्पति--साथ टहल रही है|

असुरों ने उसकी प्रशंसा की--अहा! कैसा रूप, कैसा अप्रतिम धैर्य, कैसा उभरतायौवन, हम कामपीड़ितों के बीच वह इस प्रकार विचर रही है मानो काम-भाव से सर्वथारहित हो।

वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम्‌ ।

अभिसम्भाव्य विश्रम्भाप्पर्यपृच्छन्कुमेधस: ॥

३३॥

वितर्कयन्तः--तर्क-वितर्क करते हुए; बहुधा--अनेक प्रकार से; ताम्‌--उस; सन्ध्याम्‌--संध्या वेला को; प्रमदा--तरुणी स्त्री; आकृतिम्‌--के रूप में; अभिसम्भाव्य--सम्मानपूर्वक; विश्रम्भात्‌--प्यार से; पर्यपृच्छन्‌ू--पूछी जाकर;कु-मेधसः--दुष्ट बुद्धि वाले।

तरुणी स्त्री के रूप में प्रतीत होने वाली संध्या के विषय में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क करते हुए दुष्ट-बुद्धि असुरों ने उसका अत्यन्त आदर किया और उससे प्रेमपूर्वकइस प्रकार बोले।

कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेउत्र भामिनि ।

रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे ॥

३४॥

का--कौन; असि--हो; कस्य--किसकी; असि--हो; रम्भोरु--हे सुन्दरी; कः--क्या; वा--अथवा; अर्थ: --प्रयोजन; ते--तुम्हारा; अत्र--यहाँ; भामिनि-- हे कामिनी; रूप--सौन्दर्य; द्रविण-- अमूल्य; पण्येन--सामग्री से;दुर्भगानू--अभागे; न:--हमें; विबाधसे--तरसा रही हो |

हे सुन्दरी बाला, तुम कौन हो? तुम किसकी पत्नी या पुत्री हो और तुम हम सबों केसमक्ष किस प्रयोजन से प्रकट हुई हो ? हम अभागों को तुम अपने सौन्दर्य रूपी अमूल्यसामग्री से क्‍यों तरसा रही हो ?

या वा काचित्त्वमबले दिष्टय्या सन्दर्शनं तव ।

उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मन: ॥

३५॥

या--जो कोई भी; वा--अथवा; काचित्‌--कोई; त्वम्‌ू--तुम; अबले--हे सुन्दरी बाला; दिछ्टद्या-- भाग्यवश;सन्दर्शनम्‌--दर्शन पाकर; तब--तुम्हारा; उत्सुनोषि--विचलित करती हो; ईक्षमाणानाम्‌--देखने वालों के;कन्दुक--गेंद के साथ; क्रीडया--खेल से; मन:--मन |

हे सुन्दरी बाला, तुम चाहे जो भी हो, हम भाग्यशाली हैं कि तुम्हारा दर्शन कर रहेहैं।

तुमने गेंद के अपने खेल से हम दर्शकों के मन को विचलित कर दिया है।

नैकत्र ते जयति शालिनि पादपद्ंघ्नन्त्या मुहु: करतलेन पतत्पतड़म्‌ ।

मध्यं विषीदति बृहत्स्तनभारभीतंशान्तेव दृष्टिरमला सुशिखासमूह: ॥

३६॥

न--नहीं; एकत्र--एक स्थान पर; ते--तुम्हारा; जयति--ठहरता है; शालिनि--हे सुन्दर स्त्री; पाद-पद्मम्‌ू--चरणकमल; घ्नन्त्या:--मार कर; मुहुः--पुनः पुनः; कर-तलेन--हथेली से; पतत्‌--उछालती; पतड़म्‌-गेंद को;मध्यम्‌--कटि; विषीदति--थक जाती है; बृहत्‌--पूर्ण विकसित; स्तन--तुम्हारे स्तनों के; भार--बोझ से; भीतम्‌--दुखित; शान्ता इब--मानो थकित; दृष्टि:--दृष्टि; अमला--स्वच्छ; सु--सुन्दर; शिखा--तुम्हारी चोटी; समूह: --गुच्छा।

हे सुन्दरी, जब तुम धरती से उछलती गेंद को अपने हाथों से बार-बार मारती हो तोतुम्हारे चरण-कमल एक स्थान पर नहीं रुके रहते।

तुम्हारे पूर्ण विकसित स्तनों के भारसे पीड़ित तुम्हारी कमर थक जाती है और स्वच्छ दृष्टि मन्द पड़ जाती है।

कृपया अपनेसुन्दर बालों को ठीक से गूँथ तो लो।

इति सायन्तनीं सन्ध्यामसुरा: प्रमदायतीम्‌ ।

प्रलोभयन्तीं जगृहुर्मत्वा मूढधिय: स्त्रियम्‌ ॥

३७॥

इति--इस प्रकार से; सायन्तनीम्‌--सायंकाल; सन्ध्याम्‌--सन्ध्या का प्रकाश; असुरा:-- असुरगण; प्रमदायतीम्‌--गर्वीली स्त्री की भाँति आचरण करती; प्रलोभयन्तीम्‌--लुभाती हुई; जगृहः--पकड़ लिया; मत्वा--मानकर; मूढ-धियः--मूर्ख ; स्त्रियम्‌-स्त्री को |

जिनकी बुद्धि पर पर्दा पड़ चुका है, ऐसे असुरों ने सन्ध्या को हावभाव करने वालीआकर्षक सुन्दरी मानकर उसको पकड़ लिया।

प्रहस्य भावगम्भीरं जिप्रन्त्यात्मानमात्मना ।

कान्त्या ससर्ज भगवानान्धर्वाप्सरसां गणान्‌ ॥

३८॥

प्रहस्थ--हँस कर; भाव-गम्भीरम्‌--गम्भीर प्रयोजन से; जिप्रन्त्या--समझकर; आत्मानम्‌--स्वयं को; आत्मना--अपने आप से; कान्त्या--अपनी कान्ति से; ससर्ज--उत्पन्न किया; भगवान्‌--पूज्य भगवान्‌ ब्रह्मा; गन्धर्व--नैसर्गिकगायक; अप्सरसाम्‌--तथा स्वर्ग की नर्तकियाँ; गणान्‌--समूह |

तब गम्भीर भावपूर्ण हँसी हँसते हुए पूज्य ब्रह्म ने अपनी कान्ति से, जो अपने सौन्दर्यका मानो आप ही आस्वादन करती थी, गन्धर्वों व अप्सराओं के समूह को उत्पन्न किया।

विससर्ज तनु तां वै ज्योत्स्तां कान्तिमतीं प्रियाम्‌ ।

त एव चाददुः प्रीत्या विश्वावसुपुरोगमा: ॥

३९॥

विससर्ज--त्याग दिया; तनुम्‌ू--रूप को; तामू--उस; बै--निस्सन्देह; ज्योत्स्नामू--चाँदनी; कान्ति-मतीम्‌--चमकतीहुई; प्रियामू-प्रिया; ते--गन्धर्व; एब--निश्चय ही; च--तथा; आददु:ः--अपना लिया; प्रीत्या--प्रसन्नतापूर्वक;विश्वावसु-पुरः-गमा:--विश्वावसु जिनका अग्रणी था।

तत्पश्चात्‌ ब्रह्म ने वह चाँदनी सा दीप्तिमान तथा सुन्दर रूप त्याग दिया औरविश्वावसु तथा अन्य गन्धर्वों ने प्रसन्नतापूर्वक उसे अपना लिया।

सृष्ठा भूतपिशाचां श्व भगवानात्मतन्द्रिणा ।

दिग्वाससो मुक्तकेशान्वीक्ष्य चामीलयहूशौ ॥

४०॥

सृघष्ठा--उत्पन्न करके; भूत-- भूत-प्रेत; पिशाचान्‌ू--पिशाचों को; च--तथा; भगवान्‌--ब्रह्माजी ने; आत्म--अपने;तन्द्रिणा--आलस्य से; दिकू-वासस: --नग्न; मुक्त--बिखरे; केशान्‌--बालों को; वीक्ष्य--देखकर; च--तथा;अमीलयत्‌--बन्द किया; दृशौ--दोनों नेत्र

तब पूज्य ब्रह्म ने अपनी तन्‍्द्रा से भूतों तथा पिशाचों को उत्पन्न किया, किन्तु जबउन्हें नग्न एवं बिखरे बाल वाले देखा तो उन्होंने अपनी आँखें बन्द कर लीं।

जगहुस्तद्विसूष्टां तां जुम्भणाख्यां तनु प्रभो:निद्रामिन्द्रियविक्लेदो यया भूतेषु दृश्यते ।

येनोच्छिष्टान्धर्षयन्ति तमुन्मादं प्रचक्षते ॥

४१॥

जगृहु:ः--अपना लिया; ततू-विसृष्टाम्‌--उसके द्वारा फेंका गया; तामू--उस; जृम्भण-आख्याम्‌--जम्हाई लेता हुआ;तनुम्‌--शरीर को; प्रभो: -- भगवान्‌ ब्रह्मा का; निद्राम--नींद; इन्द्रिय-विक्लेद:--लार चुआता; यया--जिससे;भूतेषु--जीवों के मध्य; दृश्यते--देखा जाता है; येन--जिससे; उच्छिष्टान्‌ू--मलमूत्र से सना; धर्षयन्ति--आक्रमणकरते हैं; तम्‌--उसे; उन्‍्मादम्‌--पागलपन; प्रचक्षते--कहा जाता है।

जीवों के सत्रष्टा ब्रह्मा द्वारा उस अँगड़ाई रूप में फेंके जाने वाले शरीर को भूत-पिशाचों ने उस शरीर को अपना लिया।

इसी को निद्रा भी कहते हैं जिसमें लार चू जातीहै।

जो लोग अशुद्ध रहते हैं उन पर ये भूत-प्रेत आक्रमण करते हैं और उनका यहआक्रमण उन्माद ( पागलपन ) कहलाता है।

ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानज: ।

साध्यान्गणान्पितृगणान्परो क्षेणासृजत्प्रभु; ॥

४२॥

ऊर्ज:-वन्तम्‌-शक्ति से परिपूर्ण; मन्यमान:--मानकर; आत्मानम्‌ू--अपने आप को; भगवान्‌--परमपूज्य; अज:--ब्रह्मा ने; साध्यान्‌ू--देवता; गणान्‌--समूह; पितृ-गणान्‌ू--तथा पितर; परोक्षेण-- अदृश्य होकर; असृजत्‌--उत्पन्नकिया; प्रभुः--जीवों के स्वामी |

जीवात्माओं के स्त्रष्टा, पूज्य ब्रह्म ने अपने आपको इच्छा तथा शक्ति से पूर्ण मानकर अपने अदृश्य रूप, अपनी नाभि, से साध्यों तथा पितरों के समूह को उत्पन्न किया।

त आत्मसर्ग तं कायं पितरः प्रतिपेदिरे ।

साध्येभ्यश्व पितृभ्यश्च॒ कवयो यद्वितन्वते ॥

४३॥

ते--वे; आत्म-सर्गम्‌--उनके अस्तित्व का स्त्रोत; तमू--उस; कायम्‌--शरीर को; पितर: --पितृगण ने; प्रतिपेदिरि--स्वीकार कर लिया; साध्येभ्य:--साध्यों के लिए; च--तथा; पितृभ्य:--पितरों को; च-- भी; कवयः--कर्मकाण्ड मेंपटु; यत्‌--जिससे; वितन्वते--पिण्डदान करते हैं।

पितृगण ने अपने अस्तित्व के स्रोत उस अहृश्य शरीर को स्वयं धारण कर लिया।

इस अदृश्य शरीर के माध्यम से ही श्राद्ध के अवसर पर कर्मकाण्ड में पटु लोग साध्योंतथा पितरों ( दिवंगत पूर्वजों के रूप में ) को पिण्डदान करते हैं।

सिद्धान्विद्याधरांक्षेव तिरोधानेन सो$सृजत्‌ ।

तेभ्योददात्तमात्मानमन्तर्धानाख्यमद्भुतम्‌ ॥

४४॥

सिद्धान्‌ू--सिद्धों को; विद्याधरान्‌ू--विद्याधरों को; च एब--तथा भी; तिरोधानेन--अदृश्य रहने के कारण; सः--ब्रह्मा ने; असृजत्‌--उत्पन्न किया; तेभ्य:--उनको; अददात्‌ू--दिया; तम्‌ आत्मानम्‌--अपना वह रूप; अन्‍्तर्धान-आख्यम्‌--अतन्तर्धान नाम से ज्ञात; अद्भुतम्‌-विचित्र |

तब दृष्टि से अदृश्य रहने की अपनी क्षमता के कारण ब्रह्माजी ने सिद्धों तथाविद्याधरों को उत्पन्न किया और उन्हें अपना अन्तर्धान नामक विचित्र रूप प्रदान किया।

स किन्नरान्किम्पुरुषान्प्रत्यात्म्येनासूजत्प्रभु: ।

मानयतन्नात्मनात्मानमात्माभासं विलोकयन्‌ ॥

४५ ॥

सः-हब्रह्मा ने; किन्नरानू-किकन्नरों को; किम्पुरुषान्‌ू-किम्पुरुषों को; प्रत्यात्म्येन--अपने प्रतिबिम्ब ( जल में ) से;असृजत्‌--उत्पन्न किया; प्रभुः--जीवों के स्वामी ( ब्रह्मा ); मानयन्‌--प्रशंसा करते हुए; आत्मना आत्मानम्‌--अपने सेअपने को; आत्म-आभासम्‌--अपना प्रतिबिम्ब; विलोकयन्‌--देखते हुए

एक दिन समस्त जीवात्माओं के सर्जक ब्रह्मा ने जल में अपनी परछाई देखी औरआत्मप्रशंसा करते हुए उन्होंने उस प्रतिबिम्ब ( परछाई ) से किन्नरों तथा किम्पुरुषों कीसृष्टि की।

ते तु तज्जगृहू रूप॑ त्यक्तं यत्परमेष्ठिना ।

मिथुनीभूय गायन्तस्तमेवोषसि कर्मभि: ॥

४६॥

ते--उन्होंने ( किन्नर तथा किम्पुरुष ); तु--लेकिन; तत्‌--वह; जगृहु:--अपना लिया; रूपमू--उस छाया रूप को;त्यक्तमू-परित्यक्त; यत्‌--जो; परमेष्ठिना--ब्रह्मा द्वारा; मिथुनी-भूय--पत्नियों सहित; गायन्त: --स्तुति; तमू--उसको; एव--केवल; उषसि--उषाकाल में; कर्मभि:--अपने कर्म के द्वारा

किम्पुरुषों तथा किब्नरों ने ब्रह्मा द्वारा त्यक्त उस छाया-शरीर को ग्रहण कर लियाइसीलिए वे अपनी पत्नियों सहित प्रत्येक प्रातःकाल उनके कर्म का स्मरण कर करकेउनकी प्रशंसा का गान करते हैं।

देहेन वै भोगवता शयानो बहुचिन्तया ।

सर्गेडनुपचिते क्रोधादुत्ससर्ज ह तद्बपु: ॥

४७॥

देहेन--शरीर से; बै--निस्सन्देह; भोगवता--पूरा फैलकर; शयान:--शयन करते हुए; बहु-- अधिक; चिन्तया--चिन्ता से; सर्गे--सृष्टि; अनुपचिते--बढ़ती न देखकर; क्रोधात्‌--क्रोधवश; उत्ससर्ज--त्याग दिया; ह--निस्सन्देह;ततू--वह; वपु:--शरीर |

एक बार ब्रह्माजी अपने शरीर को पूरी तरह फैलाकर लेटे थे।

वे अत्यधिक चिन्तितथे कि उनकी सृष्टि का कार्य आगे नहीं बढ़ रहा है, अतः उन्होंने रोष में आकर उस शरीरको भी त्याग दिया।

येउहीयन्तामुत: केशा अहयस्तेउड़ जज्ञिरि ।

सर्पाः प्रसर्पतः क्रूरा नागा भोगोरुकन्धरा: ॥

४८॥

ये--जो; अहीयन्त--गिर गये; अमुत:--उससे; केशा: --बाल; अहयः --सर्प; ते--वे; अड़--हे विदुर; जज्ञिरि--केरूप में जन्म लिया; सर्पा:--साँप; प्रसर्पत:ः--रेंगने वाले शरीर से; क्रूरा:--ईर्ष्यालु; नागा:--काले साँप; भोग--फनोंसे; उरु--विशाल; कन्धरा:--जिनके कंधे।

हे विदुर, उस शरीर से जो बाल गिरे वे सर्पों में परिणत हो गये।

उनके हाथ-पैरसिकोड़ कर चलने से उस शरीर से क्रूर सर्प तथा नाग उत्पन्न हुए जिनके फन फैले हुएहोते हैं।

स आत्मानं मन्यमान: कृतकृत्यमिवात्मभू: ।

तदा मनून्ससर्जान्ते ममसा लोकभावनान्‌ ॥

४९॥

सः--ब्रह्मा ने; आत्मानम्‌--अपने आपको; मन्यमान:--मानकर; कृत-कृत्यम्‌--जीवन उद्देश्य को प्राप्त, धन्य; इब--मानो; आत्मभू: --परमेश्वर से उत्पन्न; तदा--तब; मनून्‌ू--सभी मनुओं को; ससर्ज--उत्पन्न किया; अन्ते--अन्त में;मनसा--अपने मन से; लोक--संसार का; भावनान्‌--कल्याणकारी |

एक दिन स्वयंजन्मा प्रथम जीवात्मा ब्रह्म ने अनुभव किया कि उन्होंने अपने जीवनका उद्देश्य प्राप्त कर लिया है।

उस समय उन्होंने अपने मन से मनुओं को उत्पन्न किया, जोब्रह्माण्ड के कल्याण-कार्यो की वृद्धि करने वाले हैं।

तेभ्य: सोसृजत्स्वीयं पुरं पुरुषमात्मवान्‌ ।

तान्हष्ठा ये पुरा सृष्टा: प्रशशंसु: प्रजापतिम्‌ ॥

५०॥

तेभ्य:--उनके लिए; सः--ब्रह्मा ने; असृजत्‌--प्रदान किया; स्वीयमू--निज; पुरम्‌ू--शरीर; पुरुषम्‌--मनुष्य का;आत्म-वान्‌--स्व-युक्त; तान्‌ू--उनको; दृष्ठा--देखकर; ये--जो; पुरा--इससे पूर्व; सृष्टा:--रचे गये ( देव, गंधर्वआदि, जिनकी सृष्टि पहले हो चुकी थी ); प्रशशंसु:--बड़ाई की; प्रजापतिम्‌--ब्रह्मा ( उत्पन्न जीवों के स्वामी ) की ।

आत्मवान स्रष्टा ने उन्हें अपना मानवी रूप दे दिया।

मनुओं को देखकर, उनसे पूर्वउत्पन्न देवता, गन्धर्व आदि ब्रह्माण्ड के स्वामी ब्रह्मा की स्तुति करने लगे।

अहो एतज्गर्स्रष्ट: सुकृतं बत ते कृतम्‌ ।

प्रतिष्ठिता: क्रिया यस्मिन्साकमन्नमदाम हे ॥

५१॥

अहो--ओह; एतत्‌--यह; जगत्‌-स्त्रष्ट:--हे ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा; सुकृतम्‌--अच्छा किया; बत--निस्सन्देह; ते--तुम्हारेद्वारा; कृतम्‌-उत्पन्न; प्रतिष्ठिता:--भलीभाँति स्थापित; क्रिया:--समस्त विधि-विधान; यस्मिन्‌ू--जिसमें; साकम्‌--इसके साथ साथ; अन्नम्‌--यज्ञ की आहुति, हव्य; अदाम--अपना अपना भाग लेंगे

हे-हे !उन्होंने स्तुति की-हे ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा, हम प्रसन्न हैं, आपने जो भी सृष्टि की है, वहसुन्दर है।

चूँकि इस मानवी रूप में अनुष्ठान-कार्य पूर्णतया स्थापित हो चुके हैं, अतः हमहवि में साझा कर लेंगे।

तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।

ऋषीनृषिहषीकेश: ससर्जाभिमता: प्रजा: ॥

५२॥

तपसा--तप से; विद्यया--पूजा से; युक्त: --संलग्न होकर; योगेन--भक्ति में मन को एकाग्र करके; सु-समाधिना--सुन्दर चिन्तन से; ऋषीन्‌--ऋषियों में; ऋषि:--प्रथम दूत ( ब्रह्मा ); हषीकेश: --इन्द्रियों को वश में करने वाला;ससर्ज--उत्पन्न किया; अभिमता: --प्रिय ; प्रजा:--पुत्र |

फिर आत्म-भू जीवित प्राणी ब्रह्मा ने अपने आपको कठोर तप, पूजा, मानसिकएकाग्रता तथा भक्ति-तल्लीनता से सुसज्जित करके एवं निष्काम भाव से अपनी इन्द्रियोंको वश में करते हुए महर्षियों को अपने पुत्रों ( प्रजा ) के रूप में उत्पन्न किया।

तेभ्यश्लेकेकशः स्वस्य देहस्यांशमदादज: ।

यत्तत्समाधियोगर्द्धितपोविद्याविरक्तिमत्‌ ॥

५३॥

तेभ्य:--उनको; च--तथा; एकैकश:--हर एक को; स्वस्थ--अपने; देहस्य--देह का; अंशम्‌ू--अंश, भाग;अदातू--प्रदान किया; अज:--अजन्मा ब्रह्मा; यत्‌--जो; तत्‌--वह; समाधि--गहन ध्यान; योग--मन की एकाग्रता;ऋद्धि--नैसर्गिक शक्ति; तपः--तपस्या; विद्या--ज्ञान; विरक्ति--वैराग्य; मत्‌--युक्त |

ब्रह्माण्ड के अजन्मा स्त्रष्टा ( ब्रह्मा ) ने इन पुत्रों में से प्रत्येक को अपने शरीर काएक-एक अंश प्रदान किया जो गहन चिन्तन, मानसिक एकाग्रता, नैसर्गिक शक्ति,तपस्या, पूजा तथा वैराग्य के लक्षणों से युक्त था।

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