← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची
अध्याय उन्नीस: राक्षस हिरण्याक्ष का वध
3.19मैत्रेय उवाचअवधार्य विरिज्ञस्य निर्व्यलीकामृतं बच: ।
प्रहस्यप्रेमगर्भग तदपाड्रेन सोग्रहीत् ॥
१॥
मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; अवधार्य--सुनकर; विरिक्लस्थ--ब्रह्माजी का; निर्व्यलीक--समस्त पापों से मुक्त;अमृतम्ू--अमृतमय; बच: --शब्द; प्रहस्थ--खूब हँसकर; प्रेम-गर्भग--प्रेम से पूरित; तत्--वे शब्द; अपाड्रेन--चितवन से; सः-- श्रीभगवान् ने; अग्रहीत्--स्वीकार किया।
श्री मैत्रेय ने कहा-स्त्रष्टा ब्रह्म के निष्पाप, निष्कपट तथा अमृत के समान मधुरवचनों को सुनकर भगवान् जीभरकर हँसे और उन्होंने प्रेमपूर्ण चितवन के साथ उनकीप्रार्थना स्वीकार कर ली।
ततः सपत्न॑ मुखतश्चरन्तमकुतोभयम् ।
जघानोत्पत्य गदया हनावसुरमक्षज: ॥
२॥
ततः--तब; सपतलम्--शत्रु; मुखत:--समक्ष; चरन्तमू--विचरण करते हुए; अकुतः-भयम्--निर्भीक; जघान-- प्रहारकिया; उत्पत्य--उछल कर; गदया--अपनी गदा से; हनौ--ठोड़ी पर; असुरम्-- असुर; अक्ष-ज:--ब्रह्मा के नथुने सेउत्पन्न भगवान् ने
ब्रह्मा के नथुने से प्रकट भगवान् उछल पड़े और अपने सामने निर्भय होकर विचरणकरने वाले अपने असुर शत्रु हिरण्याक्ष की ठोड़ी पर उन्होंने अपनी गदा से प्रहार किया।
साहता तेन गदया विहता भगवत्करात् ।
विघूर्णितापतद्रेजे तदद्भुतमिवाभवत् ॥
३॥
सा--वह गदा; हता-- प्रहार की गई; तेन--हिरण्याक्ष द्वारा; गदया--उसकी गदा से; विहता--छुट गयी; भगवत्--श्रीभगवान् के; करात्--हाथ से; विघूर्णिता--घूमती हुई; अपतत्--गिर पड़ी; रेजे--चमक रही थी; तत्--वह;अद्भुतम्-विचित्र; इब--निस्सन्देह; अभवत्--था।
किन्तु असुर की गदा से टकराकर भगवान् की गदा उनके हाथ से छिटक गई औरघूमती हुई जब वह नीचे गिरी तो अत्यन्त मनोरम लग रही थी।
यह अद्भुत दृश्य था,क्योंकि गदा विचित्र ढंग से प्रकाशमान थी।
स तदा लब्धतीर्थोडपि न बबाधे निरायुधम् ।
मानयन्स मृधे धर्म विष्वक्सेनं प्रकोपयन् ॥
४॥
सः--उस हिरण्याक्ष ने; तदा--तब; लब्ध-तीर्थ:--सुअवसर पाकर; अपि--यद्यपि; न--नहीं; बबाधे-- आक्रमणकिया; निरायुधम्--अस्त्र-शस्त्र विहीन; मानयनू--आदर करते हुए; सः--हिर ण्याक्ष; मृधे--युद्ध में; धर्मम्-युद्धकी आचार संहिता; विष्वक्सेनम्-- श्री भगवान् ने; प्रकोपयन्--कुपित हो करके |
यद्यपि हिरण्याक्ष को अपने निरस्त्र शत्रु पप बिना किसी रुकावट के वार करने काअच्छा अवसर प्राप्त हुआ था, किन्तु उसने युद्ध-धर्म का आदर किया जिससे किश्रीभगवान् का रोष बढ़ जाए।
गदायामपविद्धायां हाहाकारे विनिर्गते ।
मानयामास तद्धर्म सुनाभं चास्मरद्विभु: ॥
५॥
गदायाम्--ज्योंही उनकी गदा; अपविद्धायाम्--गिरी; हाहा-कारे--हाहाकार, कुहराम; विनिर्गते--मच गया; मानयाम्आस--स्वीकार किया; तत्--हिरण्याक्ष की; धर्मम्--सत्यता; सुनाभम्ू--सुदर्शन चक्र; च--तथा; अस्मरत्--स्मरणकिया; विभुः-- श्रीभगवान् ने
ज्योंही भगवान् की गदा भूमि पर गिर गई और देखने वाले देवताओं तथा ऋषियों केसमूह में हाहाकार मच गया, त्योंही श्रीभगवान् ने असुर की धर्मप्रियता की प्रशंसा कीऔर फिर अपने सुदर्शन चक्र का आवाहन किया।
त॑ व्यग्रचक्रं दितिपुत्राधमेनस्वपार्षदमुख्येन विषज्ञमानम् ।
चित्रा वाचोतद्विदां खेचराणांतत्र स्मासन्स्वस्ति तेडमुं जहीति ॥
६॥
तमू-- श्री भगवान् को; व्यग्र--घूमते हुए; चक्रमू--जिसका चक्र; दिति-पुत्र--दिति का पुत्र; अधमेन--नीच; स्व-पार्षद--अपने सहयोगियों का; मुख्येन-- प्रमुख सहित; विषज्ञमानम्ू--खेलते हुए; चित्रा:--विविध; वाच: --अभिव्यक्तियाँ; अ-ततू-विदाम्--न जानने वालों का; खे-चराणाम्--आकाश् में उड़ते हुए; तत्र--वहाँ; सम आसनू--घटित हुआ; स्वस्ति--कल्याण; ते--आपका; अमुम्--उसको; जहि--मार डालें; इति--इस प्रकार।
जब चक्र भगवान् के हाथों में घूमने लगा और वे अपने बैकुण्ठवासी पार्षदों केमुखिया से, जो दिति के नीच पुत्र हिरण्याक्ष के रूप में प्रकट हुआ था, खेलने लगे तोअपने-अपने विमानों से देखने वाले देवता इत्यादि प्रत्येक दिशा से विचित्र-विचित्र शब्दनिकालने लगे।
उन्हें भगवान् की वास्तविकता ज्ञात न थी, अतः वे उद्घोष करने लगे' आपकी जय हो, कृपा करके उसे मार डालें, अब उसके साथ अधिक खिलवाड़ नकरें।
'सतं निशाम्यात्तरथाड्रमग्रतोव्यवस्थितं पद्यापलाशलोचनम् ।
विलोक्य चामर्षपरिप्लुतेन्द्रियोरुषा स्वदन्तच्छदमादशच्छुसन् ॥
७॥
सः--उस असुर ने; तम्-- श्रीभगवान् को; निशाम्य--देखकर; आत्त-रथाड्रम्--सुदर्शन चक्र धारण किए हुए;अग्रतः--समक्ष; व्यवस्थितम्--खड़े हुए; पद्य--कमल-पुष्प; पलाश--पंखड़ियाँ; लोचनम्--नेत्र; विलोक्य--देखकर; च--यथा; अमर्ष--क्रोध से; परिप्लुत--तिलमिलाई हुई; इन्द्रियः --उसकी इन्द्रियाँ; रुषा--अत्यन्त रोष से;स्व-दन्त-छदम्-- अपने ही होंठ; आदशत्--काट लिया; श्वसन्ू--फुफकारता।
जब असुर ने कमल की पंखड़ियों जैसे नेत्र वाले श्रीभगवान् को सुदर्शन चक्र सेयुक्त अपने समक्ष खड़ा देखा तो क्रोध के मारे उसके अंग तिलमिला उठे।
वह साँप कीतरह फुफकारने लगा और अत्यन्त क्रोध में अपने ही होठ चबाने लगा।
करालदंष्टश्चक्षु भ्या सञ्ञक्षाणो दहन्निव ।
अभिप्लुत्य स्वगदया हतोउसीत्याहनद्धरिम् ॥
८ ॥
कराल-भयावने; दंष्टः--दाढ़ों वाले; चक्षुभ्याम्-दोनों आँखों से; सञ्ञक्षाण:--घूरते हुए; दहन्ू--जलता हुआ;इब--मानो; अभिष्लुत्य-- आक्रमण करके; स्व-गदया--अपनी गदा से; हतः--बधे हुए; असि--तुम हो; इति--इसप्रकार; आहनत्-- प्रहार किया; हरिम्--हरि पर।
भयावनी दाढ़ों वाला वह असुर श्रीभगवान् को इस प्रकार घूर रहा था मानो वह उन्हेंभस्म कर देगा।
उसने हवा में उछलकर भगवान् पर अपनी गदा तानी और तभी जोर सेचीखा, 'तुम मारे जा चुके।
'पदा सव्येन तां साधो भगवान्यज्ञसूकरः ।
लीलया मिषत: शत्रोः प्राहरद्वातरंहसम् ॥
९॥
पदा--अपने पाँव से; सव्येन--बायें; तामू--उस गदा को; साधो--हे विदुर; भगवान्-- श्रीभगवान्; यज्ञ-सूकर:--समस्त यज्ञों के भोक्ता, अपने शूकर रूप में; लीलया--खिलवाड़ में; मिषतः--देखते हुए; शत्रो:--अपने शत्रु( हिराण्याक्ष ) का; प्राहरत्--गिरा दिया; वात-र॑ंहसम्--तूफान के वेग से
हे साधु विदुर, समस्त यज्ञों की बलि के भोक्ता श्रीभगवान् ने अपने सूकर रूप मेंअपने शत्रु के देखते-देखते खेल-खेल में उसकी उस गदा को अपने बाँए पाँव से नीचेगिरा दिया यद्यपि वह तूफान के वेग से उनकी ओर आ रही थी।
आह चायुधमाधत्स्व घटस्व त्वं जिगीषसि ।
इत्युक्त: स तदा भूयस्ताडयन्व्यनदद्धूशम् ॥
१०॥
आह--उसने कहा; च--तथा; आयुधम्--हथियार; आधत्स्व--ग्रहण करो; घटस्व--प्रयत्न करो; त्वम्--तुम;जिगीषसि--जीतने के लिए इच्छुक हो; इति--इस प्रकार; उक्त:--ललकारते हुए; सः--हिरण्याक्ष ने; तदा--उससमय; भूयः--पुनः; ताडयन्--प्रहार करते हुए; व्यनदत्--गर्जना की; भूशम्--जोर से |
तब भगवान् ने कहा, 'तुम अपना शस्त्र उठा लो और मुझे जीतने के इच्छुक हो तोपुनः प्रयत्न करो।
' इन शब्दों से ललकारे जाने पर असुर ने अपनी गदा भगवान् पर तानीऔर पुनः जोर से गरजा।
तां स आपततीं वीक्ष्य भगवान्समवस्थित: ।
जग्राह लीलया प्राप्तां गरुत्मानिव पन्नगीम् ॥
११॥
तामू--उस गदा को; सः--वह; आपततीम्--अपनी ओर आते हुए; वीक्ष्य--देखकर; भगवानू-- श्रीभगवान्;समवस्थित:--दृढ़तापूर्वक खड़े; जग्राह--पकड़ लिया; लीलया--सरलतापूर्वक; प्राप्तामू--वहीं से; गरुत्मान्--गरुड़; इब--सहश; पन्नगीम्--सर्पिणी को |
जब भगवान् ने गदा को अपनी ओर आते देखा तो बे वहीं पर हृढ़तापूर्वक खड़े रहेऔर उसे अनायास उसी प्रकार पकड़ लिया जिस प्रकार पक्षिराज गरुड़ किसी सर्प कोपकड़ ले।
स्वपौरुषे प्रतिहते हतमानो महासुरः ।
नैच्छदगदां दीयमानां हरिणा विगतप्रभ: ॥
१२॥
स्व-पौरुषे-- अपना पौरूष या उद्यम; प्रतिहते--व्यर्थ हुआ; हत--विनष्ट किया; मान:--गर्व; महा-असुरः --महान्असुर ने; न ऐच्छत्--( लेने की ) इच्छा न की; गदाम्--गदा; दीयमानाम्--देने पर; हरिणा--हरि के द्वारा; विगत-प्रभ:--तेज घटने से।
इस प्रकार अपने पुरुषार्थ को व्यर्थ हुआ देखकर, वह महान् असुर अत्यन्त लज्जितहुआ और उसका तेज जाता रहा।
अब वह श्रीभगवान् द्वारा लौटा दी जाने वाली गदा कोग्रहण करने में संकोच कर रहा था।
जग्राह त्रिशिखं शूलं ज्वलज्वलनलोलुपम् ।
यज्ञाय धृतरूपाय विप्रायाभिचरन्यथा ॥
१३॥
जग्राह--उठाया; त्रि-शिखम्--तीन नोकों वाला; शूलम्-त्रिशूल; ज्वलत्ू--जलती हुईं; ज्वलन-- अग्नि;लोलुपमू--लपलपाता; यज्ञाय--समस्त यज्ञों के भोक्ता; धृत-रूपाय--वराह रूप में; विप्राय--ब्राह्मण को;अभिचरन्--दुष्टतावश प्रयोग करके; यथा--जिस प्रकार।
अब उसने प्रजबलित अग्नि के समान लपलपाता त्रिशूल निकाला और समस्त यज्ञोंके भोक्ता भगवान् पर फेंका, जिस प्रकार कोई व्यक्ति किसी पवित्र ब्राह्मण परदुर्भावनावश अपनी तपस्या का प्रयोग करे।
तदोजसा दैत्यमहाभटार्पितंचकासदन्तःख उदीर्णदीधिति ।
अक्रेण चिच्छेद निशातनेमिनाहरियर्यथा तार्श््यपतत्रमुज्झितम् ॥
१४॥
तत्--वह त्रिशूल; ओजसा--अपनी सारी शक्ति से; दैत्य--असुरों में से; महा-भट--परम योद्धा के द्वारा; अर्पितम्--फेंका हुआ; चकासत्--चमकता हुआ; अन्त:-खे--आकाश के बीच में; उदीर्ण--बढ़ा हुआ; दीधिति--प्रकाश;चक्रेण--सुदर्शनचक्र से; चिच्छेद--खण्ड़ खण्ड़ कर दिये; निशात--तीखी; नेमिना--धार ( परिधि ); हरिः--इन्द्र;यथा--जिस तरह; तार्श््य--गरुड़ का; पतत्रम्--पंख; उज्लितम्--त्याग दिया।
उस परम योद्धा असुर के द्वारा पूरे बल फेंका गया वह त्रिशूल आकाश में तेजी सेचमक रहा था।
किन्तु श्रीभगवान् ने अपने तेज धार वाले सुदर्शन चक्र से उसके खण्ड-खण्ड कर दिये मानो इन्द्र ने गरुड़ का पंख काट दिया हो।
वृक््णे स्वशूले बहुधारिणा हरेःप्रत्येत्य विस्तीर्णमुरो विभूतिमत् ।
प्रवृद्धरोष: स कठोरमुष्टिनानद-्प्रहत्यान्तरधीयतासुर: ॥
१५॥
वृक्णे--कटने पर; स्व-शूले--अपना त्रिशूल; बहुधा--अनेक खण्डों में; अरिणा--सुदर्शन चक्र द्वारा; हरे: --श्रीभगवान् की; प्रत्येत्य--ओर बढ़कर; विस्तीर्णम्--चौड़ा; उर: --वक्षस्थल; विभूति-मत्-- धन की देवी काआवास; प्रवृद्ध-बढ़ा हुआ; रोष:--क्रोध; सः--हिरण्याक्ष; कठोर--कठोर; मुष्टिना--अपनी मुट्ठी से; नदन्--गर्जना करते; प्रहत्य--प्रहार करके; अन्तरधीयत--अन्तर्धान हो गया; असुरः --असुर |
जब श्रीभगवान् के चक्र से उसका त्रिशूल खण्ड खण्ड हो गया तो असुर अत्यन्तक्रोधित हुआ।
अत: वह भगवान् की ओर लपका और तेज गर्जना करते हुए उनके चौड़ेवक्षस्थल पर, जिस पर श्रीवत्स का चिह्न था, अपनी कठोर मुष्टिका से प्रहार किया।
फिरवह अदृश्य हो गया।
तेनेत्थमाहतः क्षत्तर्भगवानादिसूकरः ।
नाकम्पत मनावकक्वापि स्त्रजा हत इव द्विप: ॥
१६॥
तेन--हिरण्याक्ष द्वारा; इत्थम्--इस प्रकार; आहत: --प्रहार किया गया; क्षत्त:--हे विदुर; भगवान् -- श्री भगवान्आदि-सूकरः--प्रथम शूकर; न अकम्पत--हिला-डुला नहीं; मनाक्--तनिक भी; क््व अपि--कहीं भी; सत्रजा--पुष्प की माला से; हतः--मारा गया; इब--सहश; द्विप:--हाथी |
हे विदुर, असुर द्वारा इस प्रकार प्रहार किये जाने पर आदि वराह रूप भगवान् केशरीर का कोई अंग तनिक भी हिला-डुला नहीं मानो किसी हाथी पर फूलों की माला सेप्रहार किया गया हो।
अथोरुधासूजन्मायां योगमायेश्वरे हरौ ।
यां विलोक्य प्रजास्त्रस्ता मेनिरेडस्योपसंयमम् ॥
१७॥
अथ--तब; उरुधा--अनेक प्रकार से; असृजत्--चलाईं; मायाम्--कपटपूर्ण चालें; योग-माया-ई श्वर--योगमाया केईश्वर; हरौ--हरि पर; यामू--जिसको; विलोक्य--देखकर; प्रजा:--लोग; त्रस्ता:-- भयभीत; मेनिरे--सोचा;अस्य--इस ब्रह्माण्ड का; उपसंयमम्--संहार, प्रलय ।
किन्तु असुर ने योगेश्वर श्रीभगवान् पर अनेक कपटपूर्ण चालों का प्रयोग किया।
यहदेखकर सभी लोग भयभीत हो उठे और सोचने लगे कि ब्रह्माण्ड का संहार निकट है।
प्रववुर्वायवश्चण्डास्तम: पांसवमैरयन् ।
दिग्भ्यो निपेतुग्रावाण: क्षेपणै: प्रहिता इव ॥
१८ ॥
प्रववु:--बह रही थी; वायव:--हवाएँ; चण्डा:-- भयानक; तमः--अन्धकार; पांसवम्-- धूल से उत्पन्न; ऐरयन्--फैल रहे थे; दिग्भ्य:--सभी दिशाओं से; निपेतु:--गिरे; ग्रावाण: --पत्थर; क्षेपणैः --मशीनगनों से; प्रहिता: --फेंकेगये; इब--मानो |
सभी दिशाओं से प्रचण्ड वायु बहने लगी और धूल तथा उपलवृष्टि से अन्धकार फैलगया, प्रत्येक दिशा से पत्थर गिरने लगे मानो वे मशीनगनों द्वारा फेंके जा रहे हों।
दौर्नष्ठभगणाभ्रौधे: सविद्युत्ततनयित्नुभि: ।
वर्षद्धि: पूयकेशासूग्विण्मूत्रास्थीनि चासकृत् ॥
१९॥
चौ:--आकाश; नष्ट--विलुप्त; भ-गण--नक्षत्र गण; अभ्र--बादलों के; ओघै:--समूहों से; स--सहित; विद्युत्--बिजली; स्तनयित्नुभि:ः--तथा कड़क ( गर्जना ) से; वर्षर्द्धः--बरसने से; पूय--पीब; केश--बाल; असृक्--रक्त;विट्--विष्ठा; मूत्र--मूत्र; अस्थीनि--हड्डियाँ; च--यथा; असकृत्-पुनः
पुनःबिजली तथा गर्जना से युक्त आकाश में बादलों के समूह घिर आने से नक्षत्रगणविलुप्त हो गए।
आकाश से पीब, बाल, रक्त, मल, मूत्र तथा हड्डियों की वर्षा होने लगी।
गिरय: प्रत्यहश्यन्त नानायुधमुचोनघ ।
दिग्वाससो यातुधान्य: शूलिन्यो मुक्तमूर्धजा: ॥
२०॥
गिरय: --पर्वत; प्रत्यदश्यन्त--दिखने लगे; नाना--अनेक प्रकार के; आयुध--अस्त्र-शस्त्र; मुच:--छोड़ते हुए;अनघ--हे पापमुक्त विदुर; दिकु-वासस:--नंगी; यातुधान्य:--राक्षसिनियाँ; शूलिन्य:--त्रिशूलों से सज्जित; मुक्त--लटकते; मूर्धजा:--बाल |
हे अनघ विदुर, पर्वतों से नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र निकलने लगे और त्रिशूलधारण किये हुए नग्न राक्षसिनियाँ अपने खुले केश लटकाते हुए प्रकट हो गईं।
बहुभिरयक्षरक्षोभि: पत्त्यश्वरथकुड्धरै: ।
आततायिभिरुत्सृष्टा हिंस्रा वाचोउतिवैशसा: ॥
२१॥
बहुभि:--अनेक; यक्ष-रक्षोभि:--यक्षों तथा राक्षसों के द्वारा; पत्ति--पैदल; अश्व--घुड़सवार; रथ--रथ पर चढ़े हुए;कुझरैः:--अथवा हाथियों से; आततायिभि:--आततायियों द्वारा; उत्सूष्टा:--उच्चारित; हिंस्त्रा:--क्रूर; वाच:--शब्द;अति-वैशसा:--हिंसक ।
यक्षों तथा राक्षस आततायियों के समूह के समूह अत्यन्त क्रूर एवं अशिष्ट नारे लगारहे थे, जिनमें से अनेक या तो पैदल जा रहे थे, या घोड़े, हाथियों अथवा रथों पर सवारथे।
प्रादुष्कृतानां मायानामासुरीणां विनाशयत् ।
सुदर्शनास्त्रं भगवान्प्रायुड्रः दयितं त्रिपात् ॥
२२॥
प्रादुष्कृतानाम्-- प्रदर्शित; मायानाम्--जादुई शक्तियाँ, इन्द्रजाल; आसुरीणाम्--असुर द्वारा प्रदर्शित; विनाशयत्--विनष्ट करने का इच्छुक; सुदर्शन-अस्त्रमू--सुदर्शन चक्र; भगवान् -- श्रीभगवान् ने; प्रायुड्र --फेंका; दयितम्--प्रिय;त्रि-पातू--समस्त यज्ञों के भोक्ता।
तब समस्त यज्ञों के भोक्ता श्रीभगवान् ने अपना प्रिय सुदर्शन चक्र छोड़ा जो असुरद्वारा प्रदर्शित समस्त इन्द्रजाल की शक्तियों ( माया जाल ) को तहस-नहस करने में समर्थथा।
तदा दितेः समभवत्सहसा हृदि वेषथु: ।
स्मरन्त्या भर्तुरादेशं स्तनाच्चासृक्प्रसुस्त्रेवे ॥
२३॥
तदा--उसी क्षण; दितेः--दिति के; समभवत्--उत्पन्न हुआ; सहसा--अचानक ; हृदि--हृदय में; वेपथु:--कम्पन;स्मरन्त्या:--स्मरण करके; भर्तु:--अपने पति, कश्यप के; आदेशम्--वचन; स्तनात्--स्तन से; च--यथा;असृक्--रक्त; प्रसुस्रुवे--बहने लगा।
उसी क्षण, हिरण्याक्ष की माता दिति के हृदय में सहसा एक थरथराहट हुई।
उसेअपने पति कश्यप के वचनों का स्मरण हो आया और उसके स्तनों से रक्त बहने लगा।
विनष्टासु स्वमायासु भूयश्चात्रज्य केशवम् ।
रुषोपगूहमानोमुं दहृशेवस्थितं बहि: ॥
२४॥
विनष्टासु--दूर हो जाने पर; स्व-मायासु--अपनी माया शक्ति; भूय:--पुन:; च--यथा; आद्रज्य--सामने आकर;केशवम्-- श्रीभगवान् को; रुषा--क्रोध से पूर्ण; उपगूहमान: --आलिंगन करते; अमुम्-- भगवान् को; दहशे--देखा;अवस्थितम्ू--खड़े हुए; बहि:ः--बाहर |
जब असुर ने देखा कि उसकी मायाशक्ति विलुप्त हो गई है, तो वह एक बार फिरश्रीभगवान् केशव के सामने आया और उन्हें रौंद देने की इच्छा से तमतमाते हुए अपनेबाहुओं में भर कर उनको जकड़ लेना चाहा।
किन्तु उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहाजब उसने भगवान् को अपने बाहु-पाश से बाहर खड़े देखा।
तं॑ मुष्टिभिर्विनिष्नन्तं वज़्सारैरधोक्षज: ।
'करेण कर्णमूलेहन्यथा त्वाष्ट्र मरुत्पति: ॥
२५॥
तम्--हिरण्याक्ष को; मुष्टिभि:--अपने मुक्कों से; विनिष्तन्तम्--प्रहार करते हुए; वज़-सारैः--वज़ के समान कठोर;अधोक्षज:-- भगवान् अधोक्षज ने; करेण--हाथ से; कर्ण-मूले--कनपटी पर; अहनू--मारा; यथा-- जैसे; त्वाप्टमू--वृत्रासुर ( त्वष्टा का पुत्र ) को; मरुत्-पति:--मरुतों के स्वामी इन्द्र ने।
तब वह असुर भगवान् को कठोर मुक्कों से मारने लगा किन्तु भगवान् अधोक्षज नेउसकी कनपटी में उस तरह थप्पड़ मारा जिस प्रकार मरुतों के स्वामी इन्द्र ने वृत्रासुर कोमारा था।
स आहतो विश्वजिता हावज्ञयापरिभ्रमद्गात्र उदस्तलोचन: ।
विशीर्णबाह्नड्प्रिशिरोरुहो पतद्यथा नगेन्द्रो लुलितो नभस्वता ॥
२६॥
सः--वह; आहत:--चोट खाकर; विश्व-जिता-- श्रीभगवान् द्वारा; हि--यद्यपि; अवज्ञया --उपेक्षापूर्वक; परिभ्रमत्--चकराकर; गात्र:--शरीर; उदस्त--बाहर निकली; लोचन:--आँखें; विशीर्ण--छितन्न-भिन्न; बाहु-- भुजाएँ;अड्प्रि--पाँव; शिर:ः-रूह:--बाल; अपतत्--गिर पड़ा; यथा--जैसे; नग-इन्द्र:--विशाल वृक्ष; लुलित:--उखड़ाहुआ; नभस्वता--आँधी से |
सर्वजेता भगवान् ने यद्यपि अत्यन्त उपेक्षापूर्वक प्रहार किया था, किन्तु उससे असुरका शरीर चकराने लगा।
उसकी आँखे बाहर निकल आईं।
उसके हाथ तथा पैर टूट गये,सिर के बाल बिखर गये और वह अंधड़ से उखड़े हुए विशाल वृक्ष की भाँति मृत होकरगिर पड़ा।
क्षितौ शयानं तमकुण्ठवर्चसकरालदंष्ट परिदष्टदच्छदम् ।
अजादयो वीक्ष्य शशंसुरागताअहो इमं को नु लभेत संस्थितिमू ॥
२७॥
क्षितौ--पृथ्वी पर; शयानम्--लेटे हुए; तम्--हिरण्याक्ष को; अकुण्ठ---अमलिन; वर्चसमू--तेज; कराल--भयावने;दंष्रमू--दाँत; परिदष्ट--काटे हुए; दत्-छदम्--ओंठ; अज-आदय:ः --ब्रह्मा इत्यादि ने; वीक्ष्य--देखकर; शशंसु:--प्रशंसा में कहा; आगता: --आये हुए; अहो--ओह; इमम्--यह; कः--कौन; नु--निस्सन्देह; लभेत--प्राप्त करसकता है; संस्थितिम्--मृत्यु |
उस स्थान भूमि पर लेटे भयावने दाँतों वाले तथा अपने होंठों को काटते हुए उसअसुर को देखने के लिए ब्रह्मा तथा अन्य देवता आ गये।
उसके मुखमण्डल का तेज अबभी अमलिन था।
ब्रह्मा ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, ओह! ऐसी भाग्यशाली मृत्यु किसकी हो सकती है ?
यं योगिनो योगसमाधिना रहोध्यायन्ति लिड्रादसतो मुमुक्षया ।
तस्यैष देत्यऋषभ: पदाहतोमुखं प्रपशयंस्तनुमुत्ससर्ज ह ॥
२८ ॥
यम्--जिसको; योगिन: --योगी जन; योग-समाधिना--योग की समाधि में; रह:--एकान्त में; ध्यायन्ति-- ध्यान धरतेहैं; लिड्जात्ू--शरीर से; असत: --मिथ्या; मुमुक्षया--मुक्ति की इच्छा से; तस्य--उसका; एष:--यह; दैत्य--दिति कापुत्र; ऋषभ:-- श्रेष्ठ मणि; पदा--पाँव से; आहत: --मारा गया; मुखम्-- मुँह; प्रपश्यन्--देखते या ताकते हुए;तनुम्ू--शरीर; उत्ससर्ज--छोड़ दिया; ह--निस्सन्देह
ब्रह्म ने आगे कहा--योगीजन योगसमाधि में अपने मिथ्या भौतिक शरीरों से छूटनेके लिए जिसका एकान्त में ध्यान करते हैं, उन श्रीभगवान् के पादाग्र से इस पर प्रहारहुआ है।
दिति के पुत्रों में शिरोमणि इसने भगवान् का मुख देखते-देखते अपने मर्त्यशरीर का त्याग किया है।
एतौ तौ पार्षदावस्य शापाद्यातावसद्गतिम् ।
पुनः कांतपय: स्थान प्रपत्स्थत ह जन्माभ: ॥
२९॥
एतौ--ये दोनों; तौ--दोनों; पार्षदौ--पार्षद; अस्य-- भगवान् के; शापात्--शाप के कारण; यातौ--गये हैं; असत्-गतिम्--आसुरी परिवार में जन्म लेना; पुन:--फिर; कतिपयै: --कुछ; स्थानम्ू-- अपना स्थान; प्रपत्स्येते--पुनः प्राप्तकरेंगे; ह--निस्सन्देह; जन्मभि:--जन्मों के पश्चात्
भगवान् के इन दोनों पार्षदों को शापवश असुर-परिवारों में जन्म लेना पड़ा।
ऐसेकुछ जन्मों के पश्चात् ये अपने-अपने स्थानों में लौट जायेंगे।
देवा ऊचु:नमो नमस्तेडखिलयज्ञतन्तवेस्थितौ गृहीतामलसत्त्वमूर्तये ।
दिछ्टय्या हतोयं जगतामरुन्तुद-स्त्वत्यादभक्त्या वयमीश निर्वृता: ॥
३०॥
देवा:--देवताओं ने; ऊचु:--कहा; नम: --नमस्कार; नम: --नमस्कार; ते--तुमको; अखिल-यज्ञ-तन्तवे--समस्तयज्ञों के भोक्ता; स्थितौ--स्थिति को बनाए रखने के निमित्त; गृहीत-- धारण किया; अमल--शुद्ध; सत्त्त--अच्छाई;मूर्तये--रूप; दिष्टयया--सौभाग्यवश; हतः--मारा गया; अयमू--यह; जगताम्--लोकों को; अरुन्तुदः--कष्ट देनेवाला; त्वत्ू-पाद--आपके चरण की; भक्त्या--भक्ति से; वयम्--हमने; ईश--हे भगवान्; निर्वृता:--सुख प्राप्तकिया है।
देवताओं ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा--हम आपको नमस्कार करते हैं।
आप समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं और आपने शुद्ध सात्विक भाव में विश्व की स्थिति बनायेरखने के लिए वराह रूप धारण किया है।
यह हमारा सौभाग्य है कि समस्त लोकों कोकष्ट देने वाला असुर आपके हाथों मारा गया और हे भगवान्, अब हम आपके चरण-कमलों की भक्ति करने के लिए स्वतन्त्र हैं।
मैत्रेय उवाचएवं हिरण्याक्षमसह्मविक्रमंस सादयित्वा हरिरादिसूकर: ।
जगाम लोकं स्वमखण्डितोत्सवंसमीडित: पुष्करविष्टरादिभि: ॥
३१॥
मैत्रेयः उवाच-- श्रीमैत्रेय ने कहा; एवम्--इस प्रकार; हिरण्याक्षम्-हिरण्याक्ष को; असह्य-विक्रमम्-- अत्यन्तशक्तिमान; सः-- भगवान् ने; सादयित्वा--मारकर; हरि: -- श्रीभगवान् ने; आदि-सूकरः --सूकर योनियों का मूल;जगाम--वापस गया; लोकम्--अपने धाम; स्वम्ू--निजी; अखण्डित-- अनवरत्; उत्सवम्-- उत्सव; समीडितः --प्रशंसित; पुष्कर-विष्टर--कमल-आसन ( कमलासन ); आदिभि:--तथा अन्य ।
श्री मैत्रेय ने आगे कहा--इस प्रकार अत्यन्त भयानक असुर हिरण्याक्ष को मारकरआदि वराह-रूप भगवान् हरि अपने धाम वापस चले गये जहाँ निरन्तर उत्सव होता रहताहै।
ब्रह्म आदि समस्त देवताओं ने भगवान् की प्रशंसा की।
मया यथानृक्तमवादि ते हरेःकृतावतारस्य सुमित्र चेष्टितम् ।
यथा हिरण्याक्ष उदारविक्रमो महामृथे क्रीडनवन्निराकृतः ॥
३२॥
मया--मेरे द्वारा; यथा--जिस रूप में; अनूक्तम्--कहा गया; अवादि--व्याख्या की गई; ते--तुमको; हरे: --श्रीभगवान् का; कृत-अवतारस्थ--जिसने अवतार लिया; सुमित्र--हे विदुर; चेष्टितम्ू--कार्यकलाप; यथा--जिसप्रकार; हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष; उदार--अत्यन्त विस्तृत; विक्रम:--शौर्य; महा-मृधे--महान् युद्ध में; क्रीडन-बत्--खिलौन की तरह; निराकृत:--मारा गया।
मैत्रेय ने आगे कहा-हे विदुर, मैंने तुम्हें कह सुनाया कि भगवान् किस प्रकार प्रथमशूकर के रूप में अवतरित हुए और अद्वितीय शौर्य वाले असुर को महान् युद्ध में मारडाला मानो वह कोई खिलौना रहा हो।
मैंने अपने पूर्ववर्ता गुरु से इसे जिस रूप में सुनाथा, वह तुम्हें सुना दिया।
सूत उबाचइति कौषारवाख्यातामा श्रुत्य भगवत्कथाम् ।
क्षत्तानन्दं पर लेभे महाभागवतो द्विज ॥
३३॥
सूत:--सूत गोस्वामी; उवाच--कहा; इति--इस प्रकार; कौषारब--मैत्रेय ( कुषारु के पुत्र ) से; आख्याताम्ू--कहागया; आश्रुत्य--सुनकर; भगवत्-कथाम्-- भगवान् विषयक आख्यान; क्षत्ता--विदुर ने; आनन्दम्-- आनन्द;परम्--दिव्य; लेभे--प्राप्त किया; महा-भागवत:--परम भक्त; द्विज--हे ब्राह्मण ( शौनक )
श्री सूत गोस्वामी ने आगे कहा--हे शौनक, मेरे प्रिय ब्राह्मण, भगवान् के परमभक्त, क्षत्ता (विदुर) को कौषारव ( मैत्रेय ) मुनि के आधिकारिक स्त्रोत से पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् की लीलाओं का वर्णन सुनकर दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ और वहअत्यन्त प्रसन्न हुआ।
अन्येषां पुण्यश्लोकानामुद्दामयशसां सताम् ।
उपश्रुत्य भवेन्मोद: श्रीवत्साड्डस्य कि पुनः ॥
३४॥
अन्येषाम्ू--दूसरों का; पुण्य-श्लोकानाम्--पवित्र यश का; उद्दाम-यशसाम्--जिनकी ख्याति सर्वत्र फैली है;सताम्-भक्तों का; उपश्रुत्य--सुन करके; भवेत्--उठ सकते हैं; मोद:--आनन्द; श्रीवत्स-अड्डस्य-- श्रीवत्स चिह्नधारण करने वाले भगवान् का; किम् पुन:--फिर क्या कहना
मनुष्य चाहें तो अमर यश वाले भक्तों के कार्यकलापों को सुनकर आनन्द उठासकते हैं, फिर श्रीवत्सधारी श्रीभगवान् की लीलाओं के श्रवण का कहना ही क्या!" यो गजेन्द्रं झषग्रस्तं ध्यायन्तं चरणाम्बुजम् ।
क्रोशन्तीनां करेणूनां कृच्छृतोडमोचयद्द्रूतम् ॥
३५॥
यः--जो; गज-इन्द्रमू--हाथियों के राजा को; झष--मकर, घड़ियाल द्वारा; ग्रस्तमू--आक्रमण किया गया;ध्यायन्तम्-- ध्यान करते हुए; चरण--पाँव; अम्बुजम्ू--कमल; क्रोशन्तीनाम्ू--विलाप करती हुईं; करेणूनाम्--हथिनियों को; कृच्छृतः --संकट से; अमोचयत्--उबारा; द्रुतम्-शीघ्र |
वह गजराज जिस पर मगरमच्छ ने आक्रमण कर दिया था और जिसने तब भगवान्के चरणकमलों का ध्यान किया, उसे भगवान ने तुरंत उबार किया।
उस समय उसकेसाथ की हथिनियाँ चिंघाड़ रही थीं, किन्तु भगवान् ने आसन्न संकट से उनको बचा लिया।
तं॑ सुखाराध्यमृजुभिरनन्यशरणैनूभिः ।
कृतज्ञः को न सेवेत दुराराध्यमसाधुभि: ॥
३६॥
तम्--उसको; सुख--सरलतापूर्वक ; आराध्यम्--पूजनीय; ऋजुभि:--सरल लोगों द्वारा; अनन्य-- अन्य कोई नहीं;शरणैः --शरणागत; नृभि:--मनुष्यों के द्वारा; कृत-ज्ञ:--उपकार मानने वाला; क:ः--क्या; न--नहीं; सेवेत--सेवाकरनी चाहिए; दुराराध्यम्--पूजा कर पाना दुष्कर; असाधुभि: --अभक्तों द्वारा
ऐसा कौन कृतज्ञ जीव होगा जो श्रीभगवान् जैसे परम स्वामी की प्रेमाभक्ति नहींकरना चाहेगा? वे विमल भक्तों पर, जो उन्हीं पर अपनी रक्षा के लिए आश्वित रहते हैं,सरलता से प्रसन्न हो जाते हैं, किन्तु किसी अनुचित व्यक्ति को उन्हें प्रसन्न कर पाने मेंकठिनाई होती है।
यो वै हिरण्याक्षवधं महाद्भुतंविक्रीडितं कारणसूकरात्मन: ।
श्रुणोति गायत्यनुमोदतेझ्जसा विमुच्यते ब्रह्मवधादपि द्विजा: ॥
३७॥
यः--जो; वै--निस्सन्देह; हिरण्याक्ष-वधम्--हिरण्याक्ष के वध का; महा-अद्भुतम्-- अत्यन्त विस्मयजनक;विक्रीडितम्--लीला; कारण--समुद्र से पृथ्वी के उद्धार जैसे कारणों के लिए; सूकर--सूकर रूप में प्रकट होकर;आत्मन:--श्रीभगवान् का; श्रूणोति--सुनता है; गायति--जप करता है; अनुमोदते--आनन्द लेता है; अज्ञसा--तुरन्त; विमुच्यते--मुक्त हो जाता है; ब्रह्म -वधात्--ब्रह्महत्या के पाप से; अपि--भी; द्विजा:--हे ब्राह्मणों
हे ब्राह्मणो, जगत के उद्धार हेतु आदि सूकर रूप में प्रकट होने वाले भगवान् द्वाराहिरण्याक्ष वध के इस अद्भुत आख्यान को जो कोई सुनता है, गाता है या इसमें रस लेताहै, वह ब्रह्महत्या जैसे पापमय कर्मो के फल से भी तुरन्त मुक्त हो जाता है।
एतन्महापुण्यमलं पवित्र धन्यं यशस्यं पदमायुराशिषाम् ।
प्राणेन्द्रियाणां युधि शौर्यवर्धनंनारायणोडन्ते गतिरड्ड श्रुण्वताम् ॥
३८ ॥
एतत्--यह आख्यान; महा-पुण्यम्-पुण्यप्रद; अलमू-- अत्यन्त; पवित्रमू--पवित्र; धनन््यम्ू-- धन देनेवाला;यशस्यम्--यश की प्राप्ति करने वाला; पदम्--पात्र, भाजन; आयु: --दीर्घजीविता का; आशिषाम्--कामनाओं का;प्राण--जीवनदाता अंगों का; इन्द्रियाणाम्-कर्मेन्द्रियों का; युधि--युद्धभूमि में; शौर्य--पराक्रम; वर्धनम्--बढ़ानेवाला; नारायण:--भगवान् नारायण; अन्ते--जीवन के अन्त में; गति:--शरण; अड्ग--हे शौनक; श्रृण्वतामू--श्रोताओं का।
यह परम पवित्र आख्यान ( चरित्र ) अद्वितीय यश, सम्पत्ति, ख्याति, आयुष्य तथामनवांछित फल देने वाला है।
युद्ध भूमि में यह मनुष्य के प्राणों तथा कर्मेन्द्रियों कीशक्ति वर्थित करने वाला है।
हे शौनक, जो अपने अन्तकाल में इसे सुनता है, वहभगवान् के परम धाम को जाता है।
