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अध्याय अठारह: भगवान सूअर और राक्षस हिरण्यक्ष के बीच लड़ाई
3.18मैत्रेय उवाचतदेवमाकर्ण्य जलेशभाषितंमहामनास्तद्विगणय्य दुर्मदः ।
हरेर्विंदित्वा गतिमड़ नारदाद्रसातलं निर्विविशे त्वरान्वित: ॥
१॥
मैत्रेय:--परम संत मैत्रेय ने; उवाच--कहा; तत्--वह; एवम्--इस प्रकार; आकर्ण्य--सुनकर; जल-ईश--जल कास्वामी, वरुण का; भाषितम्--शब्द; महा-मना: --घमंडी; तत्--वे शब्द; विगणय्य--उपेक्षा करके; दुर्मदः --अहंकारी; हरे: --पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; विदित्वा--पता लगाकर; गतिम्--पता; अड़--हे विदुर; नारदातू--नारद से; रसातलम्--समुद्र के नीचे; निर्विविशे -- प्रवेश किया; त्वरा-अन्वित:--अत्यन्त वेग से |
मैत्रेय ने आगे कहा-उस घंमडी तथा अभिमानी दैत्य ने वरुण के शब्दों की तनिकभी परवाह नहीं की।
हे विदुर, उसे नारद से श्रीभगवान् के बारे में पता लगा और वहअत्यन्त वेग से समुद्र की गहराइयों में पहुँच गया।
ददर्श तत्राभिजितं धराधरंप्रोन्नीयमानावनिमग्रदंप्टया ।
मुष्णन्तमक्ष्णा स्वरुचोरुणश्रियाजहास चाहो वनगोचरो मृग: ॥
२॥
ददर्श--देखा; तत्र--वहाँ; अभिजितम्--विजयी; धरा--पृथ्वी; धरम्-- धारण किये हुए; प्रोन्नीयमान--ऊपर उठाईजाकर; अवनिम्--पृथ्वी को; अग्र-दंष्रया-- अपनी दाढ़ों की नोक से; मुष्णन्तम्--जो घटा रहा था; अक्षणा--अपनी आँखों से; स्व-रुच:--हिरण्याक्ष का आत्मतेज; अरुण--लाल लाल; श्रिया--चमकीला; जहास--हँसा; च--तथा;अहो--ओह; वन-गोचर:--उभयचर; मृग:--पशु |
वहाँ उसने सर्वशक्तिमान श्रीभगवान् को उनके वराह रूप में, अपनी दाढ़ों केअग्रभाग पर पृथ्वी को ऊपर की ओर धारण किये तथा अपनी लाल लाल आँखों सेउसके समस्त तेज को हरते हुए देखा।
इस पर वह असुर हँस पड़ा और बोला, 'ओह!कैसा उभयचर पशु है ?
आहैनमेह्ज्ञ महीं विमुझ्ञ नोरसौकसां विश्वसृजेयमर्पिता ।
न स्वस्ति यास्यस्यनया ममेक्षतःसुराधमासादितसूकराकृते ॥
३॥
आह-हिरण्याक्ष ने कहा; एनम्ू-- भगवान् से; एहि--आओ और लड़ो; अज्ञ--ओरे मूर्ख; महीम्--पृथ्वी को;विमुशज्न--छोड़ दो; नः--हमारे लिए; रसा-ओकसामू--निम्न लोकों के वासियों का; विश्व-सृजा--ब्रह्माण्ड की सृष्टिकरने वाले के द्वारा; इयम्--यह पृथ्वी; अर्पिता--अर्पित; न--नहीं; स्वस्ति--कल्याण; यास्यसि--तुम जाओगे;अनया--इसके साथ; मम ईक्षत:--मेरे देखते देखते; सुर-अधम--हे देवताओं में नीच; आसादित--लेकर; सूकर-आकृते--वराह का रूप ।
असुर ने भगवान् को सम्बोधित करते हुए कहा--सूकर का रूप धारण किये हुए हेदेवश्रेष्ठ, थोड़ा सुनिये तो।
यह पृथ्वी हम अधोलोक के वासियों को सौंपी जा चुकी है,अतः तुम इसे मेरी उपस्थिति में मुझसे बचकर नहीं ले जा सकते।
त्वं नः सपत्नैरभवाय कि भूृतोयो मायया हन्त्यसुरान्परोक्षजित् ।
त्वां योगमायाबलमल्पपौरुषंसंस्थाप्य मूढ प्रमृजे सुहच्छुच: ॥
४॥
त्वमू--तुम; नः--हम सबके; सपत्नैः:--हमारे शत्रुओं के द्वारा; अभवाय--मारने के लिए; किम्ू--क्या ऐसा ही है;भृतः--पालित; यः--जो; मायया--छल से; हन्ति--मारता है; असुरान्--असुर को; परोक्ष-जित्ू--अदृश्य रहकरजीतने वाला; त्वाम्--तुमको; योगमाया-बलम्--जिसकी शक्ति मोहक शक्ति है; अल्प-पौरुषम्--कम शक्ति वाला;संस्थाप्य--मारकर; मूढ--मूर्ख ; प्रमुजे--दूर कर दूँगा; सुहत्-शुचः--अपने बन्धुओं का शोक |
अरे धूर्त, हमारे शत्रुओं ने हमारे वध के लिए तुम्हें पाला है और तुमने अदृश्य रहकरकुछ असुरों को मार दिया है।
ओरे मूर्ख! तुम्हारी शक्ति केवल योगमाया है, अतः आज मैंतुम्हें मारकर अपने बन्धुओं का शोक दूर कर दूँगा।
त्वयि संस्थिते गदया शीर्णशीर्ष-ण्यस्मद्भुजच्युतया ये च तुभ्यम् ।
बलिं हरन्त्यूषयो ये च देवा:स्वयं सर्वे न भविष्यन्त्यमूला: ॥
५॥
त्वयि--जब तुम; संस्थिते--मारे जाओगे; गदया--गदा से; शीर्ण--छिन्न भिन्न; शीर्षणि-- सिर; अस्मत्-भुज--मेरेहाथ से; च्युतया--छूटी हुई; ये--जो; च--तथा; तुभ्यम्ू--तुमको; बलिम्--भेंट; हरन्ति-- प्रदान करते हैं;ऋषय:--ऋषिगण; ये-- जो; च--तथा; देवा: --देवता; स्वयम्--अपने आप; सर्वे--सभी; न--नहीं; भविष्यन्ति--होंगे; अमूला:--बिना जड़ के, निराधार।
असुर ने आगे कहा--जब मेरी भुजाओं से फेंकी गई गदा द्वारा तुम्हारा सिर फटजाएगा और तुम मर जाओगे तो वे देवता तथा ऋषि जो तुम्हें भक्तिवश नमस्कार करतेतथा भेंट चढ़ाते हैं, स्वतः मृत हो जाएँगे जिस प्रकार बिना जड़ के वृश्ष नष्ट हो जाते हैं।
स तुद्यमानोरिदुरुक्ततोमरै-दष्टाग्रगां गामुपलक्ष्य भीताम् ।
तोदं मृषन्निरगादम्बुमध्याद्ग्राहहतः सकरेणुर्यथेभ: ॥
६॥
सः--वह; तुद्यमान:--सताया जाकर; अरि--शत्रु का; दुरुक्त-दुर्वचनों से; तोमरै:--आयुधों से; दंघ्ट-अग्र--अपनीदाढ़ों के अग्र भाग पर; गाम्--स्थित; गाम्--पृथ्वी को; उपलक्ष्य--देखकर; भीताम्-- भयभीत; तोदम्--पीड़ा;मृषन्--सहते हुए; निरगातू--बाहर निकल आया; अम्बु-मध्यात्--जल के भीतर से; ग्राह--घड़ियाल से; आहत: --आक्रमण किया गया; स-करेणु: --हथिनी सहित; यथा--जिस प्रकार; इभ: --हा थी |
यद्यपि भगवान् असुर के तीर सहृश बेधने वाले दुर्वचनों से अत्यन्त पीड़ित हुए थे,किन्तु उन्होंने इस पीड़ा को सह लिया।
वे अपनी दाढ़ों के अग्रभाग पर स्थित पृथ्वी कोभयभीत देखकर जल में से निकलकर उसी प्रकार बाहर आ गये जिस प्रकार घड़ियालद्वारा आक्रमण किये जाने पर हाथी अपनी सहचरी हथिनी के साथ बाहर आ जाता है।
त॑ निःसरन्तं सलिलादनुद्गुतोहिरण्यकेशो द्विरदं यथा झष: ।
करालदंष्टो शनिनिस्वनोब्रवीद्गतहियां किं त्वसतां विगर्हितम् ॥
७॥
तम्--उसको; निःसरन्तम्--बाहर निकलते हुए; सलिलातू--जल से; अनुद्गुतः--पीछा किया गया; हिरण्य-केश:--सुनहले बालों वाला; द्विरदम्--हाथी; यथा--जिस प्रकार; झष:--मकर, घड़ियाल; कराल-दंष्ट:--अत्यन्त भयावनेदाँतों वाला; अशनि-निस्वन:--बिजली के समान कड़कते हुए; अब्रवीत्--बोला; गत-हियाम्--निर्लज; किम्--क्या; तु--निस्सन्देह; असताम्--दुष्टों के लिए; विगर्हितम्--निन्दनीय |
सुनहले बालों तथा भयावने दाँतों वाले उस असुर ने जल से निकलते हुए भगवान्का उसी प्रकार पीछा किया जिस प्रकार कोई घड़ियाल हाथी का पीछा कर रहा हो।
उसने बिजली के समान कड़क कर कहा, 'क्या तुम अपने ललकारने वाले प्रतिद्वन्द्दी केसमक्ष इस प्रकार भागते हुए लज्जित नहीं हुए हो ?'! निर्लज्ज प्राणियों के लिए कुछ भीनिन्दनीय नहीं है।
स गामुद॒स्तात्सलिलस्य गोचरेविन्यस्य तस्यामदधात्स्वसत्त्वम् ।
अभिष्ठृतो विश्वसृजा प्रसूने-रापूर्यमाणो विबुधे: पश्यतोउरे: ॥
८॥
सः--वह ( भगवान् ); गाम्--पृथ्वी को; उदस्तातू--सतह पर; सलिलस्य--जल की; गोचरे-- अपनी दृष्टि केअन्तर्गत; विन्यस्थ--रखकर; तस्याम्-पृथ्वी को; अदधात्--सञ्ञार किया; स्व--अपना, निज; सत्त्वम्--अस्तित्व;अभिष्ठृत:-- प्रशंसा की; विश्व-सृजा--ब्रह्मा ( ब्रह्माण्ड के सृष्टा ) द्वारा; प्रसूने: --फूलों से; आपूर्यमाण: --प्रसन्नहोकर; विबुधेः--देवताओं द्वारा; पश्यतः --देखते हुए; अरेः--शत्रु के
भगवान् ने पृथ्वी को लाकर जल की सतह पर अपनी दृष्टि के सामने रख छोड़ा औरअपनी निजी शक्ति को उसमें स्थानान्तरित कर दिया जिससे वह जल पर तैरती रहे।
शत्रुके देखते-देखते, ब्रह्माण्ड के सत्रष्टा ब्रद्माजी ने उनकी स्तुति की और अन्य देवताओं नेउन पर फूलों की वर्षा की।
परानुषक्त तपनीयोपकल्पंमहागदं काझ्जनचित्रदंशम् ।
मर्माण्यभीष्षणं प्रतुदन्तं दुरुक्तै:प्रचण्डमन्यु: प्रहसंस्तं बभाषे ॥
९॥
परा--पीछे से; अनुषक्तम्--पीछा करते हुए; तपनीय-उपकल्पम्-- प्रचुर स्वर्ण आभूषण धारण किये हुए; महा-गदम्--भारी गदा सहित; काझ्जन--स्वर्णिम; चित्र--सुन्दर; दंशम्--कवच; मर्माणि--अन्तस्तल; अभीक्षणम् --लगातार; प्रतुदन््तम्--बेधकर; दुरुक्तै:--दुर्वचनों से; प्रचण्ड--उग्र; मन्यु:--क्रोध; प्रहसन्--हँसते हुए; तम्--उससे;बभाषे--कहा।
शरीर में प्रचुर आभूषण, कंकण तथा सुन्दर स्वर्णिय कवच धारण किये हुए वहअसुर एक बड़ी सी गदा लिए भगवान् का पीछा कर रहा था।
भगवान् ने उसके भेदनेवाले दुर्बचचनों को तो सहन कर लिया, किन्तु प्रत्युत्तर में उन्होंने अपना प्रचण्ड क्रोध व्यक्तकिया।
श्रीभगवानुवाचसत्यं बयं भो वनगोचरा मृगायुष्मद्विधान्मृगये ग्रामसिंहान् ।
न मृत्युपाशै: प्रतिमुक्तस्थ वीराविकत्थनं तव गृहन्त्यभद्र ॥
१०॥
श्री-भगवान् उबाच-- श्रीभगवान् ने कहा; सत्यम्--निस्सन्देह; वयम्--हम; भो:--ओरे; वन-गोचरा: -- जंगल में वासकरने वाले; मृगा: -- प्राणी; युष्मत् -विधान्-- तुम्हारे जैसों को; मृगये--मारने के लिए खोज रहा हूँ; ग्राम-सिंहानू--कुत्ते; न--नहीं; मृत्यु-पाशैः --मृत्यु के फन्दे से; प्रतिमुक्तस्य--बद्धजीवों का; बीरा:--वीर पुरुष; विकत्थनम्--आत्मए्लाघा; तब--तुम्हारा; गृह्वन्ति-- ध्यान देते हैं; अभद्र--ओरे दुष्ट |
भगवान् ने कहा--सचमुच हम जंगल के प्राणी हैं और तुम जैसे ही शिकारी कुत्तोंका हम पीछा कर रहे हैं।
जो मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो चुका है, वह तुम्हारी आत्मश्लाघासे नहीं डरता, क्योंकि तुम मृत्यु-बन्धन के नियमों से बँधे हुए हो।
एते वयं न्यासहरा रसौकसांगतहियो गदया द्रावितास्ते ।
तिष्ठामहेथापि कथश्ञिदाजौस्थेयं क्व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम् ॥
११॥
एते--अपने आप; वयम्--हम; न््यास-- धरोहर का; हरा:--चोर; रसा-ओकसाम्--रसातल के वासियों का; गत-हियः--निर्लजज; गदया--गदा से; द्राविता:--पीछा किया जाकर; ते--तुम्हारा; तिष्ठामहे--हम बैठे रहेंगे; अथअपि--तो भी; कथज्चलित्--कुछ-कुछ; आजौ--युद्धभूमि में; स्थेयम्--हम ठहर सकें; क्ब--कहाँ; याम:--हम जासकते हैं; बलिना--शक्तिशाली शत्रु से; उत्पाद्य-उत्पन्न करके; वैरम्--शत्रुता
निस्सन्देह मैंने रसातलवासियों की धरोहर चुरा ली है और सारी शर्म खो दी है।
यद्यपि तुम्हारी शक्तिशाली गदा से मुझे कष्ट हो रहा है, किन्तु मैं जल में कुछ काल तकऔर रहूँगा क्योंकि तुम जैसे पराक्रमी शत्रु से शत्रुता ठान कर अन्यत्र जाने के लिए मेरेपास कोई ठौर भी नहीं है।
त्वं पद्रथानां किल यूथपाधिपोघटस्व नो<स्वस्तय आश्वनूहः ।
संस्थाप्य चास्मान्प्रमृजा श्रु स्वकानांयः स्वां प्रतिज्ञां नातिपिपर्त्सस भ्य: ॥
१२॥
त्वमू--तुम; पद्ू-रथानामू--पैदल सैनिकों का; किल--निस्सन्देह; यूथप--नायकों का; अधिप:--सरकार;घटस्व--प्रयत्त करो; न:--हमारा; अस्वस्तये--हार के लिए; आशु--शाधघ्रतापूर्वक; अनूह:--बिना विचार किए;संस्थाप्प--मार कर; च--तथा; अस्मान्ू--हमको; प्रमूज--पोछ डालो; अश्रु-- आँसू; स्वकानाम्-- अपने सम्बन्धियोंका; यः--वह जो; स्वाम्ू--अपना, निज; प्रतिज्ञाम्ू-प्रतिज्ञा किये हुए वचन; न--नहीं; अतिपिपर्ति-- पूरा करते हैं;असभ्य:--सभा के अयोग्य
तुम पैदल सेना के नायक की तरह हो अतः तुम शीघ्र ही हमें हराने का प्रयत्न करो।
तुम अपनी बकवास बन्द कर दो और हमारा वध करके अपने सम्बन्धियों की चिन्ताओंको मिटा दो।
कोई भले ही गर्वित हो, किन्तु यदि वह जो अपने दिये गये बचनों( प्रतिज्ञा ) को पूरा नहीं कर पाता, सभा में आसन प्राप्त करने का पात्र नहीं है।
मैत्रेय उवाचसोधिक्षिप्तो भगवता प्रलब्धश्न रुषा भूशम् ।
आजहारोल्बणं क्रोधं क्रीड्यमानोहिराडिव ॥
१३॥
मैत्रेय:--परम ऋषि मैत्रेय ने; उवाच--कहा; सः--असुर ने; अधिक्षिप्त:--अपमानित होकर; भगवता-- भगवान्द्वारा; प्रलब्ध:--उपहास किया; च--तथा; रुषा--कुद्ध; भूशम्-- अत्यधिक; आजहार--जुटाया; उल्बणम्--अधिक; क्रोधम्ू--क्रोध, गुस्सा; क्रीड्यमान:--खेला जाकर; अहि-राट्ू--विशाल विषधर ( सर्प ); इब--सहृश |
श्रीमैत्रेय ने कहा--जब श्रीभगवान् ने उस राक्षस को इस प्रकार ललकारा तो वहक्रुद्ध और क्षुब्ध हुआ और क्रोध से इस प्रकार काँपने लगा, जिस प्रकार छेड़ा गया हुआविषधर सर्प।
सृजन्नमर्षित: श्वासान्मन्युप्रचलितेन्द्रिय: ।
आसाद्य तरसा दैत्यो गदया न्यहनद्धरिम् ॥
१४॥
सृजन्--निकालते हुए; अमर्षित:--अत्यन्त क्रुद्ध; श्रासानू--साँसें; मन्यु--क्रो ध से; प्रचलित--विश्लुब्ध; इन्द्रिय:--जिसकी इन्द्रियाँ; आसाद्य--आक्रमण करके; तरसा--शीकघ्रता से; दैत्यः--असुर; गदया--गदा से; न््यहनत्--वारकिया; हरिम्ू-- भगवान् हरि पर।
क्रोध के मारे सारे अंगों को कँपाते तथा फुफकारता हुआ वह राक्षस तुरन्त भगवान्के ऊपर झपट पड़ा और उस ने अपनी शक्तिशाली गदा से उन पर प्रहार किया।
भगवांस्तु गदावेगं विसृष्टे रिपुणोरसि ।
अवज्जञयत्तिरश्नीनो योगारूढ इवान्तकम् ॥
१५॥
भगवानू-- भगवान्; तु--लेकिन; गदा-वेगम्--गदा के प्रहार को; विसृष्टम्--चलाया गया; रिपुणा--शत्रु द्वारा;उरसि--वक्षस्थल पर; अवज्ञयत्-- धोखा देते हुए; तिरश्लीन:--एक ओर; योग-आरूढ:--सिद्ध योगी; इब--सहृश;अन्तकम्- मृत्यु
किन्तु भगवान् ने एक ओर सरक कर शत्रु द्वारा अपने वक्षस्थल पर चलाई गई गदाके प्रखर प्रहार को उसी प्रकार झुठला दिया जिस प्रकार सिद्ध योगी मृत्यु को चकमा देदेता है।
पुनर्गदां स्वामादाय भ्रामयन्तमभीक्ष्णश: ।
अभ्यधावद्धरि: क्रुद्ध: संरम्भाइृष्टदच्छदम् ॥
१६॥
पुन:ः--फिर; गदाम्--गदा; स्वामू--अपना; आदाय--लेकर; भ्रामयन्तम्--घुमाता हुआ; अभीक्ष्णश: --बारम्बार;अभ्यधावत्--भेंट करने के लिए दौड़ा; हरिः-- श्रीभगवान्; क्रुद्ध:--नाराज; संरम्भात्--क्रोध में; दष्ट--काटताहुआ, चबाता हुआ; दच्छदम्-- अपना होठ।
तब श्री भगवान् अपना क्रोध प्रदर्शित करते हुए उस राक्षत की ओर झपटे जो क्रोधके कारण अपने होठ चबा रहा था।
उसने फिर से अपनी गदा उठाई और उसे बारम्बारघुमाने लगा।
ततश्न गदयारातिं दक्षिणस्यां भ्रुवि प्रभु: ।
आजल्ने स तु तां सौम्य गदया कोविदोहनत् ॥
१७॥
ततः--तब; च--तथा; गदया--अपनी गदा से; अरातिम्--शत्रु को; दक्षिणस्थाम्--दाई ओर; भ्रुवि--भौंह पर;प्रभु:-- भगवान् ने; आजघ्ने-- प्रहार किया; सः-- भगवान्; तु--लेकिन; तामू--गदा; सौम्य--हे भद्गर विदुर;गदया-- अपनी गदा से; कोविद: --कुशल; अहनत्--उसने अपने को बचा लिया।
तब भगवान् ने अपनी गदा से शत्रु की दाहिनी भौंह पर प्रहार किया, किन्तु वहअसुर युद्ध में कुशल था, इसलिए, हे भद्र विदुर, उसने अपनी गदा की चाल से अपनेआपको बचा लिया।
एवं गदाभ्यां गुर्वीभ्यां हर्यक्षो हरिरिव च ।
जिगीषया सुसंरब्धावन्योन्यमभिजष्नतु: ॥
१८॥
एवम्--इस प्रकार; गदाभ्याम्--अपनी गदाओं से; गुर्वी भ्यामू--विशाल; हर्यक्ष:--हर्यक्ष नामक असुर ( हिरण्याक्ष );हरिः-- भगवान् हरि; एबव--निश्चय ही; च--तथा; जिगीषया--विजय की लालसा से; सुसंरब्धौ--क्रुद्ध;अन्योन्यम्--परस्पर; अभिजष्नतु: --उन्होंने प्रहार किया |
इस प्रकार असुर हिरण्याक्ष तथा भगवान् हरि ने एक दूसरे को जीतने की इच्छा सेक्रुद्ध होकर अपनी अपनी विशाल गदाओं से एक-दूसरे पर प्रहार किया।
तयोः स्पृधोस्तिग्मगदाहताडुुयो:क्षतास्त्रवष्राणविवृद्धमन्य्वो: ।
विचित्रमार्गाश्चरतोर्जिंगीषयाव्यभादिलायामिव शुष्मिणोर्मुध: ॥
१९॥
तयो:--उन दोनों में; स्पृधो: --दोनों प्रतिस्पर्धा करने वाले; तिग्म--नुकीली; गदा--गदाओं से; आहत--घायल;अड्डयो:--उनके शरीर; क्षत-आस्त्रव--घावों से बहता रक्त; प्राण--गन्ध; विवृद्ध--बढ़ गई; मन्य्वो:--क्रो ध;विचित्र-- अनेक प्रकार के; मार्गानू--चालें; चरतो: --करते हुए; जिगीषया--जीतने की इच्छा से; व्यभात्ू--केसमान प्रतीत होता था; इलायाम्--गाय ( अथवा पृथ्वी ) के लिए; इब--सहृश; शुष्मिणो: --दो साँड़ों की; मृथः --मुठभेड़
दोनों योद्धाओं में तीखी स्पर्धा थी, दोनों के शरीरों पर एक दूसरे की नुकीलीगदाओं से चोटें लगी थीं और अपने-अपने शरीर से बहते हुए रक्त की गन्ध से वेअधिकाधिक क्रुद्ध हो चले थे।
जीतने की उत्कण्ठा से वे तरह-तरह की चालें चल रहे थेऔर उनकी यह मुठभेड़ बैसी ही प्रतीत होती थी जैसे किसी गाय के लिए दो बलवानसाँड़ लड़ रहे हों।
दैत्यस्य यज्ञावयवस्य माया-गृहीतवाराहतनोर्महात्मन: ।
कौरव्य मझ्ां द्विषतोर्विमर्दनदिदृक्षुरागाह्ृषिभिर्वृतः स्वराट् ॥
२०॥
दैत्यस्य--असुर का; यज्ञ-अवयवस्य-- श्री भगवान् का ( यज्ञ जिसके शरीर का एक अंग है ); माया--अपनी शक्तिसे; गृहीत-- धारण किया गया; वाराह--सूकर का; तनो: --जिसका रूप; महा-आत्मन: --परमे श्वर का; कौरव्य--हेविदुर ( कौरवों के वंशज ); मह्याम्ू--संसार के कल्याण हेतु; द्विषतो:--दोनों शत्रुओं का; विमर्दनम्ू-युद्ध;दिदक्षु:--देखने के लिए इच्छुक; आगात्--आये; ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; वृत:--साथ साथ आये हुए; स्वराट्--ब्रह्माहे कुरुवंशी
वाराह रूप में प्रकट श्री भगवान् तथा असुर के मध्य विश्व के निमित्तहोने वाले इस भयंकर युद्ध को संसार के हेतु देखने के लिए ब्रह्माण्ड के परम स्वतन्त्रदेवता ब्रह्म अपने अनुयायियों सहित आये।
आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसंकृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् ।
विलक्ष्य दैत्यं भगवान्सहस्त्रणी-ज॑गाद नारायणमादिसूकरम् ॥
२१॥
आसन्न-प्राप्त करके; शौण्डीरम्--शक्ति; अपेत--विहीन; साध्वसम्-- भय; कृत--करके ; प्रतीकारम्--विरोध;अहार्य--निर्विरोध होकर; विक्रमम्-शक्ति युक्त; विलक्ष्य--देखकर; दैत्यम्ू--असुर को; भगवान्-- पूज्य ब्रह्मा ने;सहस्त्र-नी:--हजारों ऋषियों के नायक; जगाद--सम्बोधित किया; नारायणम्-- भगवान् नारायण को; आदि--मूल;सूकरम्ू--सूकर रूप |
युद्धस्थल में पहुँचकर हजारों ऋषियों तथा योगियों के नायक ब्रह्माजी ने असुर कोदेखा, जिसने अभूतपूर्व शक्ति प्राप्त कर ली थी जिससे कोई भी उससे युद्ध नहीं करसकता था।
तब ब्रह्मा ने आदि सूकर रूप धारण करने वाले नारायण को सम्बोधितकिया।
एष ते देव देवानामड्प्रिमूलमुपेयुषाम् ।
विप्राणां सौरभेयीणां भूतानामप्यनागसाम् ॥
२२॥
आगम्स्कृद्धयकृदुष्कृदस्मद्राद्धवरो सुर: ।
अन्वेषन्नप्रतिरथो लोकानटति कण्टक: ॥
२३॥
ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; एष:--यह असुर; ते--आपका; देव--हे भगवान्; देवानामू--देवताओं का; अड्प्रि-मूलम्ू--आपके चरण; उपेयुषाम्--शरणागत; विप्राणाम्--ब्राह्मणों को; सौरभेयीणाम्--गायों को; भूतानाम्--सामान्य जीवात्माओं को; अपि-- भी; अनागसाम्--निर्दोष; आग: -कृत्-- अपराधी; भय-कृत्-- भय का कारण;दुष्कृतू-दोषी; अस्मत्--मुझसे; राद्ध-वरः --वरदान प्राप्त; असुर:ः--असुर; अन्वेषन्-ढँढ़ते हुए; अप्रतिरथ:--योग्यजोड़ न होने से; लोकान्ू--समूचे ब्रह्माण्ड में; अटति--घूमता है; कण्टक:ः--सबों के लिए काँटे के समान बनाहुआ।
ब्रह्माजी ने कहा--हे भगवन्, यह राक्षस, देवताओं, ब्राह्मणों, गौवों तथा आपकेचरणकमलों में समर्पित निष्कलुष व्यक्तियों के लिए निरन्तर चुभने वाला काँटा बनाहुआ है।
उन्हें अकारण सताते हुए यह भय का कारण बन गया है।
इन्हें अकारण सतातेहुए यह भय का कारण बन गया है।
मुझसे वरदान प्राप्त करने के कारण यह असुर बनाहै और समस्त भूमण्डल में अपनी जोड़ के योद्धा की तलाश में इस अशुभ कार्य के लिए घूमता रहता है।
मैनं मायाविनं हप्तं निरद्भु शमसत्तमम् ।
आक्रीड बालवद्देव यथाशीविषमुत्थितम् ॥
२४॥
मा--मत; एनम्--उसको; माया-विनम्ू--माया करने वाला; हप्तम्--हेकड़ीबाज; निरड्ठु शम्--आत्मनिर्भर; असत्ू-तमम्--अत्यन्त दुष्ट; आक्रीड--खेल करें; बाल-वत्--बच्चे के समान; देव--हे भगवान्; यथा--जिस प्रकार;आशीविषमू--सर्प; उत्थितम्--जगा हुआ
ब्रह्मजी ने आगे कहा-हहे भगवन्इस सर्पतुल्य असुर से खेल करने कीआवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सदेव मायावी करतब में दक्ष तथा हेकड़ी बाज है,साथ ही निरंकुश एवं अत्यधिक दुष्ट भी।
न यावदेष वर्धत स्वां वेलां प्राप्प दारुण: ।
स्वां देव मायामास्थाय तावजहाघमच्युत ॥
२५॥
न यावत्--इसके पूर्व कि; एष:--यह असुर; वर्धत--बढ़े; स्वाम्--स्वत:; वेलाम्--आसुरी वेला; प्राप्य--प्राप्तकरके; दारुण:-- भयंकर, दुर्जय; स्वाम्ू--निजी; देव--हे भगवान्; मायाम्--अन्तरंगा शक्ति; आस्थाय--प्रयोगकरके; तावत्--तुरन्त; जहि--मार डालें; अघम्--पापी; अच्युत--हे अच्युत या अमोघ |
ब्रह्माजी ने आगे कहा--हे भगवान्, आप अच्युत हैं।
कृपा करके इस पापी असुर कोइसके पूर्व कि आसुरी घड़ी आए और यह अपने अनुकूल दूसरा भयंकर शरीर धारण करसके, आप इसका वध कर दें।
निस्सन्देह आप इसे अपनी अन्तरंगा शक्ति से मार सकतेहैं।
एषा घोरतमा सन्ध्या लोकच्छम्बट्करी प्रभो ।
उपसर्पति सर्वात्मन्सुराणां जयमावह ॥
२६॥
एषा--यह; घोर-तमा--परम अँधेरी; सन्ध्या--सायंकाल; लोक--संसार; छम्बटू-करी--विनाशकारी; प्रभो--हेभगवान्; उपसर्पति--पास आती है; सर्व-आत्मन्ू--समस्त आत्माओं का आत्मा, परमात्मा; सुराणामू--देवताओं का;जयम्--विजय; आवह--लाएं |
हे भगवन्, संसार को आच्छादित करने वाली अत्यन्त अँधेरी सन्ध्या वेला निकट आरही है चूँकि आप सभी आत्माओं के आत्मा हैं, अतः आप इसका वध करके देवताओंको विजयी बनाएँ।
अधुनैषोभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिको हागात् ।
शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥
२७॥
अधुना--इस समय; एष: --यह; अभिजित् नाम--अभिजित कहलाने वाला; योग: --शुभ; मौहूर्तिक:--घड़ी; हि--निस्सन्देह; अगात्-- प्रायः बीत चुकी है; शिवाय--कल्याण के लिए; नः--हम सबों के; त्वमू--तुम ( आप );सुहृदाम्--अपने मित्रों का; आशु--तुरन््त; निस्तर--निपट लीजिये; दुस्तरम्-दुर्जय शत्रु॥
विजय के लिए सर्वाधिक उपयुक्त अभिजित नामक शुभ मुहूर्त (घड़ी ) का योग दोपहर से हो चुका है और अब बीतने ही वाला है, अतः अपने मित्रों के हित में आप इसदुर्जय शत्रु का अविलम्ब सफाया कर दें।
दिष्टद्या त्वां विहितं मृत्युमपमासादितः स्वयम् ।
विक्रम्यैनं मृथे हत्वा लोकानाधेहि शर्मणि ॥
२८ ॥
दिष्टायया--सौभाग्यवश; त्वामू-- तुमको; विहितम्--विहित; मृत्युमू--मृत्यु; अयम्--यह असुर; आसादितः--आया है;स्वयम्--स्वेच्छा से; विक्रम्य--अपना शौर्य प्रदर्शन करके; एनम्--उसको; मृधे--द्व्व में; हत्वा--मारकर;लोकान्--लोकों को; आधेहि--स्थापित करें; शर्मणि--शान्ति में |
सौभाग्य से यह असुर स्वेच्छा से आपके पास आया है और आपके द्वारा ही इसकीमृत्यु विहित है, अतः आप इसे अपने ढंग से युद्ध में मारिये और लोकों में शान्ति स्थापितकीजिये।
