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अध्याय पंद्रह: परमेश्वर के राज्य का विवरण

3.15मैत्रेय उवाचप्राजापत्यं तु तत्तेज: परतेजोहनं दिति: ।

दधार वर्षाणि शतंशट्डमाना सुरार्दनात्‌ ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; प्राजापत्यम्‌--महान्‌ प्रजापति का; तु--लेकिन; तत्‌ तेज:--उसका बलशाली वीर्य; पर-तेज:--अन्यों का पराक्रम; हनम्‌--कष्ट देने वाला; दितिः--दिति ( कश्यप पत्नी ) ने; दधार-- धारण किया; वर्षाणि--वर्षोतक; शतम्‌--एक सौ; शट्भमाना--शंकालु; सुर-अर्दनातू--देवताओं को उद्विग्न करने वाले |

श्री मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, महर्षि कश्यप की पत्नी दिति यह समझ गई कि उसके गर्भ मेंस्थित पुत्र देवताओं के विक्षोभ के कारण बनेंगे।

अत: वह कश्यप मुनि के तेजवान वीर्य कोएक सौ वर्षो तक निरन्तर धारण किये रही, क्योंकि यह अन्यों को कष्ट देने वाला था।

लोके तेनाहतालोके लोकपाला हतौजस: ।

न्यवेदयन्विश्वसूजे ध्वान्तव्यतिकरं दिशाम्‌ ॥

२॥

लोके--इस ब्रह्माण्ड में; तेन--दिति के गर्भधारण के बल पर; आहत--विहीन होकर; आलोके -- प्रकाश; लोक-पाला: --विभिन्न लोकों के देवता; हत-ओजस:--जिसका तेज मन्द हो चुका था; न्यवेदयन्‌--पूछा; विश्व-सृजे--ब्रह्मा से; ध्वान्त-व्यतिकरम्‌--अंधकार का विस्तार; दिशाम्‌--सारी दिशाओं में |

दिति के गर्भधारण करने से सारे लोकों में सूर्य तथा चन्द्रमा का प्रकाश मंद हो गया औरविभिन्न लोकों के देवताओं ने उस बल से विचलित होकर ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा ब्रह्म से पूछा,'सारी दिशाओं में अंधकार का यह विस्तार कैसा ?!'" देवा ऊचु:तम एतद्विभो वेत्थ संविग्ना यद्वयं भूशम्‌ ।

न हाव्यक्ते भगवतः कालेनास्पृष्टवर्त्मन: ॥

३॥

देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; तम:--अंधकार; एतत्‌--यह; विभो--हे महान्‌; वेत्थ--तुम जानो; संविग्ना:--अत्यन्तचिन्तित; यत्‌--क्योंकि; वयम्‌--हम; भूशम्‌--अत्यधिक; न--नहीं; हि-- क्योंकि; अव्यक्तम्‌--अप्रकट; भगवत:--आपका( भगवान्‌ का ); कालेन--काल द्वारा; अस्पृष्ट-- अछूता; वर्त्मन: --जिसका मार्ग

भाग्यवान्‌ देवताओं ने कहा : हे महान्‌, जरा इस अंधकार को तो देखो, जिसे आप अच्छीतरह जानते हैं और जिससे हमें चिन्ता हो रही है।

चूँकि काल का प्रभाव आपको छू नहीं सकता,अतएव आपके समक्ष कुछ भी अप्रकट नहीं है।

देवदेव जगद्धातलॉकनाथशिखामणे ।

परेषामपरेषां त्वं भूतानामसि भाववित्‌ ॥

४॥

देव-देव--हे देवताओं के स्वामी; जगतू-धात:ः--ब्रह्मण्ड को धारण करने वाले; लोकनाथ-शिखामणे--हे अन्य लोकों केसमस्त देवताओं के शिरो-मणि; परेषाम्‌--आध्यात्मिक जगत का; अपरेषाम्‌-- भौतिक जगत का; त्वम्‌--तुम; भूतानामू--सारेजीवों के; असि--हो; भाव-वित्‌--मनोभावों को जानने वाले

है देवताओं के देव, हे ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले, हे अन्यलोकों के समस्त देवताओं केशिरोमणि, आप आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों ही जगतों में सारे जीवों के मनोभावों को जानतेहैं।

नमो विज्ञानवीर्याय माययेदमुपेयुषे ।

गृहीतगुणभेदाय नमस्तेउव्यक्तयोनये ॥

५॥

नमः--सादर नमस्कार; विज्ञान-वीर्याय--हे बल तथा वैज्ञानिक ज्ञान के आदि स्त्रोत; मायया--बहिरंगा शक्ति द्वारा; इदम्‌--ब्रह्मा का यह शरीर; उपेयुषे-- प्राप्त करके ; गृहीत-- स्वीकार करते हुए; गुण-भेदाय--विभेदित रजोगुण; नम: ते--आपकोनमस्कार करते हुए; अव्यक्त--अप्रकट; योनये--स्त्रोत |

हे बल तथा विज्ञानमय ज्ञान के आदि स्रोत, आपको नमस्कार है।

आपने भगवान्‌ से पृथक्ृतरजोगुण स्वीकार किया है।

आप बहिरंगा शक्ति की सहायता से अप्रकट स्त्रोत से उत्पन्न हैं।

आपको नमस्कार।

ये त्वानन्येन भावेन भावयन्त्यात्मभावनम्‌ ।

आत्मनि प्रोतभुवनं परं सदसदात्मकम्‌ ॥

६॥

ये--वे जो; त्वा--तुम पर; अनन्येन--विचलित हुए बिना; भावेन--भक्तिपूर्वक; भावयन्ति-- ध्यान करते हैं; आत्म-भावनम्‌--जो सारे जीवों को उत्पन्न करता है; आत्मनि--अपने भीतर; प्रोत--जुड़ा हुआ; भुवनम्‌--सारे लोक; परम्‌ू--परम; सत्‌--प्रभाव; असत्‌--कारण; आत्मकम्‌--जनक ।

हे प्रभु, ये सारे लोक आपके भीतर विद्यमान हैं और सारे जीव आपसे उत्पन्न हुए हैं।

अतएवआप इस ब्रह्माण्ड के कारण हैं और जो भी अनन्य भाव से आपका ध्यान करता है, वहभक्तियोग प्राप्त करता है।

तेषां सुपक्वयोगानां जितश्वासेन्द्रियात्मनाम्‌ ।

लब्धयुष्मत्प्रसादानां न कुतश्चित्पपाभव: ॥

७॥

तेषाम्‌--उनका; सु-पक्‍्व-योगानाम्‌-- जो प्रौढ़ योगी हैं; जित--संयमित; श्रास--साँस; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आत्मनामू--मन;लब्ध--प्राप्त किया हुआ; युष्मत्‌--आपकी ;; प्रसादानामू--कृपा; न--नहीं; कुतश्चित्‌--कहीं भी; पराभव:--हार।

जो लोग श्वास प्रक्रिया को साध कर मन तथा इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं और इस प्रकारजो अनुभवी प्रौढ़ योगी हो जाते हैं उनकी इस जगत में पराजय नहीं होती।

ऐसा इसलिए है,क्योंकि योग में ऐसी सिद्धि के कारण, उन्होंने आपकी कृपा प्राप्त कर ली है।

यस्य वाचा प्रजा: सर्वा गावस्तन्त्येव यन्त्रिता: ।

हरन्ति बलिमायत्तास्तस्मै मुख्याय ते नमः ॥

८॥

यस्य--जिसका; वाचा--वैदिक निर्देशों द्वारा; प्रजा:--जीव; सर्वा:--सारे; गाव:--बैल; तन्त्या--रस्सी से; इब--सहश;यन्त्रिता:--निर्देशित हैं; हरन्ति-- भेंट करते हैं, लेते हैं; बलिम्‌-- भेंट, पूजा-सामग्री; आयत्ता:--नियंत्रण के अन्तर्गत; तस्मै--उसको; मुख्याय--मुख्य पुरुष को; ते--तुमको; नम:--सादर नमस्कार |

ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सारे जीव वैदिक आदेशों से उसी प्रकार संचालित होते हैं जिस तरहएक बैल अपनी नाक से बँधी रस्सी ( नथुनी ) से संचालित होता है।

वैदिक ग्रंथों में निर्दिष्टनियमों का उल्लंघन कोई नहीं कर सकता।

उस प्रधान पुरुष को हम सादर नमस्कार करते हैं,जिसने हमें वेद दिये हैं।

स त्वं विधत्स्व शं भूमंस्तमसा लुप्तकर्मणाम्‌ ।

अदश्नदयया दृष्ठय्या आपन्नानईसीक्षितुम्‌ ॥

९॥

सः--वह; त्वमू--तुम; विधत्स्व--सम्पन्न करो; शम्‌--सौभाग्य; भूमन्‌--हे परमेश्वर; तमसा--अंधकार द्वारा; लुप्त--निलम्बित; कर्मणाम्‌--नियमित कार्यों का; अदभ्न--उदार, बिना भेदभाव के; दयया--दया के द्वारा; दृष्या-- आपकी दृष्टिद्वारा; आपन्नानू--हम शरणागत; अर्हसि--समर्थ हैं; ईक्षितुम्‌--देख पाने के लिए।

देवताओं ने ब्रह्म की स्तुति की: कृपया हम पर कृपादृष्टि रखें, क्योंकि हम कष्टप्रद स्थितिको प्राप्त हो चुके हैं; अंधकार के कारण हमारा सारा काम रुक गया है।

एघ देव दितेर्गर्भ ओज: काश्यपमर्पितम्‌ ।

दिशस्तिमिरयन्सर्वा वर्धतेडग्निरिविधसि ॥

१०॥

एष:--यह; देव--हे प्रभु; दितेः--दिति का; गर्भ:--गर्भ; ओज:--वीर्य; काश्यपमू--कश्यप का; अर्पितम्‌--स्थापित कियागया; दिशः--दिशाएँ; तिमिरयन्‌--पूर्ण अंधकार उत्पन्न करते हुए; सर्वा:--सारे; वर्धते--बढ़ाता है; अग्नि:--आग; इब--सहश; एधसि--ईंधन

जिस तरह ईंधन अग्नि को वर्धित करता है उसी तरह दिति के गर्भ में कश्यप के वीर्य सेउत्पन्न भ्रूण ने सारे ब्रह्माण्ड में पूर्ण अंधकार उत्पन्न कर दिया है।

मैत्रेय उवाचस प्रहस्य महाबाहो भगवान्शब्दगोचरः ।

प्रत्याचष्टात्म भूर्देवान्प्रीणन्रुच्चिरया गिरा ॥

११॥

मैत्रेय: उबाच--मैत्रेय ने कहा; सः--वह; प्रहस्य--हँसते हुए; महा-बाहो--हे शक्तिशाली भुजाओं वाले ( विदुर ); भगवान्‌--समस्त ऐ श्वर्यों के स्वामी; शब्द-गोचर: --दिव्य ध्वनि के द्वारा समझा जाने वाला; प्रत्याचष्ट--उत्तर दिया; आत्म-भू:--ब्रह्मा ने;देवान्‌ू-देवताओं को; प्रीणन्‌--तुष्ट करते हुए; रुचिरया--मधुर; गिरा--शब्दों से

श्रीमैत्रेय ने कहा : इस तरह दिव्य ध्वनि से समझे जाने वाले ब्रह्मा ने देवताओं की स्तुतियोंसे प्रसन्न होकर उन्हें तुष्ट करने का प्रयास किया।

ब्रह्मोवाचमानसा मे सुता युष्मत्पूर्वजा: सनकादय: ।

चेरुविहायसा लोकाल्लोकेषु विगतस्पूहा: ॥

१२॥

ब्रह्मा उवाच--ब्रह्मा ने कहा; मानसा: --मन से उत्पन्न; मे--मेरे; सुता:--पुत्र; युष्मत्‌--तुम्हारी अपेक्षा; पूर्व-जा:--पहले उत्पन्न;सनक-आदय: --सनक इत्यादि ने; चेरु:--यात्रा की; विहायसा--अन्तरिक्ष में यान द्वारा या आकाश में उड़कर; लोकान्‌ू--भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों तक; लोकेषु--लोगों के बीच; विगत-स्पृहा:--किसी इच्छा से रहित |

ब्रह्माजी ने कहा : मेरे मन से उत्पन्न चार पुत्र सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार तुम्हारेपूर्वज हैं।

कभी कभी वे बिना किसी विशेष इच्छा के भौतिक तथा आध्यात्मिक आकाशों सेहोकर यात्रा करते हैं।

तएकदा भगवतो वैकुण्ठस्थामलात्मन: ययुर्वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनमस्कृतम्‌ ॥

१३॥

ते--वे; एकदा--एक बार; भगवतः--भगवान्‌ के; वैकुण्ठस्थ-- भगवान्‌ विष्णु का; अमल-आत्मन: --समस्त भौतिक कल्मषसे मुक्त हुए; ययुः:--प्रविष्ट हुए; बैकुण्ठ-निलयम्‌--वैकुण्ठ नामक धाम; सर्व-लोक--समस्त भौतिक लोकों के निवासियों केद्वारा; नमस्कृतम्‌-- पूजित |

इस तरह सारे ब्रह्माण्डों का भ्रमण करने के बाद वे आध्यात्मिक आकाश में भी प्रविष्ट हुए,क्योंकि वे समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त थे।

आध्यात्मिक आकाश में अनेक आध्यात्मिक लोकहैं, जो वैकुण्ठ कहलाते हैं, जो पुरुषोत्तम भगवान्‌ तथा उनके शुद्धभक्तों के निवास-स्थान हैं और समस्त भौतिक लोकों के निवासियों द्वारा पूजे जाते हैं।

वसन्ति यत्र पुरुषा: सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः ।

येडनिमित्तनिमित्तेन धर्मेणाराधयन्हरिम्‌ ॥

१४॥

वसन्ति--निवास करते हैं; यत्र--जहाँ; पुरुषा:--व्यक्ति; सर्वे--सारे; वैकुण्ठ-मूर्तयः --भगवान्‌ विष्णु की ही तरह चारभुजाओं वाले; ये--वे वैकुण्ठ पुरुष; अनिमित्त--इन्द्रियतृप्ति की इच्छा से रहित; निमित्तेन--उत्पन्न; धर्मेण-- भक्ति द्वारा;आराधयनू--निरन्तर पूजा करते हुए; हरिम्‌ू-- भगवान्‌ की |

वैकुण्ठ लोकों में सारे निवासी पुरुषोत्तम भगवान्‌ के समान आकृतिवाले होते हैं।

वे सभीइन्द्रिय-तृप्ति की इच्छाओं से रहित होकर भगवान्‌ की भक्ति में लगे रहते हैं।

यत्र चाद्यः पुमानास्ते भगवान्शब्दगोचर: ।

सत्त्वं विष्टभ्य विरजं स्वानां नो मृडयन्वृष: ॥

१५॥

यत्र--वैकुण्ठ लोकों में; च--तथा; आद्यः--आदि; पुमान्‌ू--पुरुष; आस्ते--है; भगवान्‌-- भगवान्‌; शब्द-गोचर: -- वैदिकवाड्मय के माध्यम से समझा गया; सत्त्वम्‌--सतोगुण; विष्टभ्य--स्वीकार करते; विरजम्‌--अकलुषित, निर्मल; स्वानाम्‌--अपने संगियों का; न:--हमको; मृडयन्‌ू--सुख को बढ़ाते हुए; वृष:--साक्षात्‌ धर्म ॥

वैकुण्ठलोकों में भगवान्‌ रहते हैं, जो आदि पुरुष हैं और जिन्हें वैदिक वाड्मय के माध्यमसे समझा जा सकता है।

वे कल्मषरहित सतोगुण से ओतप्रोत हैं, जिसमें रजो या तमो गुणों केलिए कोई स्थान नहीं है।

वे भक्तों की धार्मिक प्रगति में योगदान करते हैं।

यत्र नैःश्रेयसं नाम वन॑ कामदुषैर्द्ुमै: ।

सर्वर्तुश्रीभिर्विभ्राजत्कैवल्यमिव मूर्तिमत्‌ ॥

१६॥

यत्र--वैकुण्ठलोकों में; नै: श्रेयसम्‌--शुभ; नाम--नामक; वनम्‌-- जंगल; काम-दुघैः --इच्छा पूरी करने वाले; द्रुमैः --वृक्षोंसमेत; सर्व--समस्त; ऋतु--ऋतुएँ; श्रीभि:--फूलों -फलों से; विध्राजत्‌ू--शो भायमान; कैवल्यम्‌-- आध्यात्मिक; इव--सहृश;मूर्तिमत्‌--साकार।

उन बैकुण्ठ लोकों में अनेक वन हैं, जो अत्यन्त शुभ हैं।

उन वनों के वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, जोसभी ऋतुओं में फूलों तथा फलों से लदे रहते हैं, क्योंकि वैकुण्ठलोकों में हर वस्तु आध्यात्मिकतथा साकार होती है।

वैमानिकाः सललनाश्चरितानि शश्वद्‌गायन्ति यत्र शमलक्षपणानि भर्तु: ।

अन्तर्जलेनुविकसन्मधुमाधवीनांगन्धेन खण्डितधियोप्यनिलं क्षिपन्त: ॥

१७॥

वैमानिका:--अपने विमानों में उड़ते हुए; स-ललना:ः--अपनी अपनी पत्नियों समेत; चरितानि--कार्यकलाप; शश्वत्‌--नित्यरूप से; गायन्ति--गाते हैं; यत्र--जिन वैकुण्ठलोकों में; शमल--समस्त अशुभ गुणों से; क्षपणानि--विहीन; भर्तुः--परमे श्वर का; अन्तः-जले--जल के बीच में; अनुविकसत्‌--खिलते हुए; मधु--सुगन्धित, शहद से पूर्ण; माधवीनाम्‌--माधवी फूलोंकी; गन्धेन--सुगन्ध से; खण्डित--विचलित; धिय:--मन; अपि--यद्यपि; अनिलम्‌--मन्द पवन; क्षिपन्त:--उपहास करतेहुए।

वैकुण्ठलोकों के निवासी अपने विमानों में अपनी पत्नियों तथा प्रेयसियों के साथ उड़ानेंभरते हैं और भगवान्‌ के चरित्र तथा उन कार्यों का शाश्वत गुणगान करते हैं, जो समस्त अशुभगुणों से सदैव विहीन होते हैं।

भगवान्‌ के यश का गान करते समय वे सुगन्धित तथा मधु से भरेहुए पुष्पित माधवी फूलों की उपस्थिति तक का उपहास करते हैं।

पारावतान्यभूतसारसचक्रवाक -दात्यूहहंसशुकतित्तिरिबर्हिणां यः ।

कोलाहलो विरमतेचिरमात्रमुच्चै -भ्रृड्राधिपे हरिकथामिव गायमाने ॥

१८॥

पारावत--कबूतर; अन्यभूत--कोयल; सारस--सारस; चक्रवाक--चकई चकदवा; दात्यूह--चातक; हंस--हंस; शुक --तोता; तित्तिरि--तीतर; ब्हिणाम्‌--मोर का; यः--जो; कोलाहल:--कोलाहल; विरमते--रुकता है; अचिर-मात्रम्‌ू-- अस्थायीरूप से; उच्चै:--तेज स्वर से; भूड़-अधिपे--भौरे का राजा; हरि-कथाम्‌-- भगवान्‌ की महिमा; इब--सहृश; गायमाने--गायेजाते समय

जब भौंरों का राजा भगवान्‌ की महिमा का गायन करते हुए उच्च स्वर से गुनगुनाता है, तो कबूतर, कोयल, सारस, चक्रवाक, हंस, तोता, तीतर तथा मोर का शोर अस्थायी रूप से बन्दपड़ जाता है।

ऐसे दिव्य पक्षी केवल भगवान्‌ की महिमा सुनने के लिए अपना गाना बन्द कर देते हैं।

मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकार्ण-पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाता: ।

गन्धेचिंते तुलसिकाभरणेन तस्यायस्मिस्तप: सुमनसो बहु मानयन्ति ॥

१९॥

मन्दार-मन्दार; कुन्द--कुन्द; कुरब--कुरबक; उत्पल--उत्पल; चम्पक--चम्पक; अर्ण--अर्ण फूल; पुन्नाग--पुन्नाग;नाग--नागकेशर; बकुल--बकुल; अम्बुज--कुमुदिनी; पारिजाता: --पारिजात; गन्धे--सुगन्ध; अर्चिते--पूजित होकर;तुलसिका--तुलसी; आभरणेन--माला से; तस्या: --उसकी; यस्मिन्‌--जिस वैकुण्ठ में; तपः--तपस्या; सु-मनस:--अच्छे मनवाले, वैकुण्ठ मन वाले; बहु--अत्यधिक; मानयन्ति--गुणगान करते हैं।

यद्यपि मन्दार, कुन्द, कुरबक, उत्पल, चम्पक, अर्ण, पुन्नाग, नागकेशर, बकुल, कुमुदिनीतथा पारिजात जैसे फूलने वाले पौधे दिव्य सुगन्ध से पूरित हैं फिर भी वे तुलसी द्वारा की गईतपस्या से सचेत हैं, क्योंकि भगवान्‌ तुलसी को विशेष वरीयता प्रदान करते हैं और स्वयं तुलसीकी पत्तियों की माला पहनते हैं।

अल न गवाह ; ल॑ हरिपदानतिमात्रहृष्टेः।

येषां बृहत्कटितटा: स्मितशोभिमुख्य:कृष्णात्मनां नरज आदधुरुत्स्मयाद्यैः ॥

२०॥

यत्‌--वह वैकुण्ठधाम; सह्लु लम्‌--से पूरित; हरि-पद-- भगवान्‌ हरि के दोनों चरण कमलों पर; आनति--नमस्कार द्वारा;मात्र--केवल; दृष्टे:--प्राप्त किये जाते हैं; बैदूर्य--वैदूर्य मणि; मारकत--मरकत; हेम--स्वर्ण; मयै:--से निर्मित; विमानै:--विमानों से; येषाम्‌--उन यात्रियों का; बृहत्‌ू--विशाल; कटि-तटा:ः--कूल्हे; स्मित--हँसते हुए; शोभि--सुन्दर; मुख्य: --मुख-मण्डल; कृष्ण--कृष्ण में; आत्मनामू--जिनके मन लीन हैं; न--नहीं; रज:--यौन इच्छा; आदधु: --उत्तेजित करती है; उत्स्मय-आहद्यैः--घनिष्ठ मित्रवत्‌ व्यवहार, हँसी मजाक द्वारा।

वैकुण्ठनिवासी वबैदूर्य, मरकत तथा स्वर्ण के बने हुए अपने अपने विमानों में यात्रा करते हैं।

यद्यपि वे विशाल नितम्बों तथा सुन्दर हँसीले मुखों वाली अपनी-अपनी प्रेयसियों के साथ सटेरहते हैं, किन्तु वे उनके हँसी मजाक तथा उनके सुन्दर मोहकता से कामोत्तेजित नहीं होते।

श्री रूपिणी क्वणयती चरणारविन्दंलीलाम्बुजेन हरिसदानि मुक्तदोषा ।

संलक्ष्यते स्फटिककुड्य उपेतहेम्निसम्मार्जतीव यदनुग्रहणेउन्ययत्त: ॥

२१॥

श्री--लक्ष्मीजी; रूपिणी --सुन्दर रूप धारण करने वाली; क्वणयती--शब्द करती; चरण-अरविन्दम्‌ू--चरणकमल; लीला-अम्बुजेन--कमल के फूल के साथ क्रीड़ा करती; हरि-सद्यनि-- भगवान्‌ के घर में; मुक्त-दोषा--समस्त दोषों से मुक्त हुई;संलक्ष्यते--दृष्टिगोचर होती है; स्फटिक--संगमरमर; कुड्ये--दीवालों में; उपेत--मिली-जुली; हेम्नि--स्वर्ण ; सम्मार्जती इब--बुहारने वाली की तरह लगने वाली; यत्‌-अनुग्रहणे--उसकी कृपा पाने के लिए; अन्य--दूसरे; यलः--अत्यधिक सतर्क ।

वैकुण्ठलोकों की महिलाएँ इतनी सुन्दर हैं कि जैसे देवी लक्ष्मी स्वयं है।

ऐसी दिव्यसुन्दरियाँ जिनके हाथ कमलों के साथ क्रौड़ा करते हैं तथा पाँवों के नुपूर झंकार करते हैं कभीकभी उन संगमरमर की दीवालों को जो थोड़ी थोड़ी दूरी पर सुनहले किनारों से अलंकृत हैं,इसलिए बुहारती देखी जाती है कि उन्हें भगवान्‌ की कृपा प्राप्त हो सके ।

वापीषु विद्युमतटास्वमलामृताप्सुप्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम्‌ ।

अभ्यर्चती स्वलकमुन्नसमीक्ष्य वक्त्र-मुच्छेषितं भगवतेत्यमताड़ यच्छी: ॥

२२॥

वापीषु--तालाबों में; विद्युम--मूँगे के बने; तटासु--किनारे; अमल--पारदर्शी; अमृत-- अमृत जैसे; अप्सु--जल; प्रेष्या-अन्विता--दासियों से घिरी; निज-वने--अपने बगीचे में; तुलसीभि:--तुलसी से; ईशम्‌-- परमेश्वर को; अभ्यर्चती--पूजाकरती हैं; सु-अलकम्‌--तिलक से विभूषित मुखवाली; उन्नसम्‌--उठी नाक; ईक्ष्य--देखकर; वक्त्रमू--मुख; उच्छेषितम्‌--चुम्बित होकर; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; इति--इस प्रकार; अमत--सोचा; अड़--हे देवताओ; यत्ू-श्री:--जिसकी सुन्दरता |

लक्ष्मियाँ अपने उद्यानों में दिव्य जलाशयों के मूँगे से जड़े किनारों पर तुलसीदल अर्पितकरके भगवान्‌ की पूजा करती हैं।

भगवान्‌ की पूजा करते समय वे उभरे हुए नाकों से युक्तअपने अपने सुन्दर मुखों के प्रतिबिम्ब को जल में देख सकती हैं और ऐसा प्रतीत होता है मानोभगवान्‌ द्वारा मुख चुम्बित होने से वे और भी अधिक सुन्दर बन गई हैं।

यन्न ब्रजन्त्यधभिदो रचनानुवादा-च्छुण्वन्ति येडन्यविषया: कुकथा मतिघ्नी: ।

यास्तु श्रुता हतभगै्नृभिरात्तसारा-स्तांस्तान्क्षिपन्त्यशरणेषु तमःसु हन्‍्त ॥

२३॥

यतू--वैकुण्ठ; न--कभी नहीं; ब्रजन्ति--पहुँचते हैं; अध-भिदः--सभी प्रकार के पापों के विनाशक; रचना--सृष्टि का;अनुवादात्‌--कथन की अपेक्षा; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; ये--जो; अन्य--दूसरों; विषया:--विषय; कु-कथा:--बुरे शब्द; मति-घ्नीः--बुद्धि को मारने वाली; या:--जो; तु--लेकिन; श्रुता:--सुना जाता है; हत-भगैः -- अभागे; नृभि: --मनुष्यों द्वारा;आत्त--छीना हुआ; सारा:--जीवन मूल्य; तान्‌ तानू--ऐसे व्यक्ति; क्षिपन्ति--फेंके जाते हैं; अशरणेषु--समस्त आश्रय सेविहीन; तमःसु--संसार के सबसे अँधेरे भाग में; हन्त--हाय |

यह अतीव शोचनीय है कि अभागे लोग बैकुण्ठलोकों के विषय में चर्चा नहीं करते, अपितुऐसे विषयों में लगे रहते हैं, जो सुनने के लायक नहीं होते तथा मनुष्य की बुद्धि को संभ्रमितकरते हैं।

जो लोग वैकुण्ठ के प्रसंगों का त्याग करते हैं, तथा भौतिक जगत की बातें चलाते हैं,वे अज्ञान के गहनतम अंधकार में फेंक दिये जाते हैं।

येभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्नाज्ञानं च तत्त्वविषयं सहधर्म यत्र ।

नाराधनं भगवतो वितरन्त्यमुष्यसम्मोहिता विततया बत मायया ते ॥

२४॥

ये--वे व्यक्ति; अभ्यर्थितामू--वांछित; अपि--निश्चय ही; च--तथा; न: --हमारे ( ब्रह्म तथा अन्य देवताओं ) द्वारा; नू-गतिमू--मनुष्य योनि; प्रपन्ना:--प्राप्त किया है; ज्ञाममू--ज्ञान; च--तथा; तत्त्व-विषयम्‌--परब्रह्म का विषय; सह-धर्मम्‌--धार्मिक सिद्धान्तों सहित; यत्र--जहाँ; न--नहीं; आराधनम्‌ू--पूजा; भगवतः-- भगवान्‌ की; वितरन्ति--सम्पन्न करते हैं;अमुष्य--परमेश्वर का; सम्मोहिता:--मोहग्रस्त; विततया--सर्वव्यापी; बत--हाय; मायया--माया के प्रभाव से; ते--वे |

ब्रह्माजी ने कहा : हे प्रिय देवताओ, मनुष्य जीवन इतना महत्वपूर्ण है कि हमें भी ऐसे जीवनको पाने की इच्छा होती है, क्योंकि मनुष्य रूप में पूर्ण धार्मिक सत्य तथा ज्ञान प्राप्त किया जासकता है।

यदि इस मनुष्य जीवन में कोई व्यक्ति भगवान्‌ तथा उनके धाम को नहीं समझ पातातो यह समझना होगा कि वह बाह्य प्रकृति के प्रभाव से अत्यधिक ग्रस्त है।

यच्च ब्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्यादूरे यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीला: ।

भर्तुर्मिथ: सुयशसः कथनानुराग-वैक्लव्यबाष्पकलया पुलकीकृताड्ाः ॥

२५॥

यतू--वैकुण्ठ; च--तथा; ब्रजन्ति--जाते हैं; अनिमिषाम्‌--देवताओं का; ऋषभ--मुखिया; अनुवृत्त्या--चरणचिद्नों काअनुसरण करके; दूरे--दूर रहते हुए; यमा:--विधि-विधान; हि--निश्चय ही; उपरि--ऊपर; न:ः--हमको; स्पृहणीय--वांछनीय;शीला:--सद्‌गुण; भर्तुः--भगवान्‌ के; मिथ:--एक दूसरे के लिए; सुयशसः --ख्याति; कथन--विचार विमर्श या वार्ताओंद्वारा; अनुराग--आकर्षण; वैक्लव्य-- भाव, आनन्द; बाष्प-कलया--आँखों में अश्रु; पुलकी-कृत--काँपते हुए; अड्भा:--शरीर

आनन्दभाव में जिन व्यक्तियों के शारीरिक लक्षण परिवर्तित होते हैं और जो भगवान्‌ कीमहिमा का श्रवण करने पर गहरी-गहरी साँस लेने लगते हैं तथा प्रस्वेदित हो उठते हैं, वेभगवद्धाम को जाते हैं भले ही वे ध्यान तथा अन्य अनुष्ठानों की तनिक भी परवाह न करते हों।

भगवद्धाम भौतिक ब्रह्माण्डों के ऊपर है और ब्रह्मा तथा अन्य देवतागण तक इसकी इच्छा करतेहैं।

तद्विश्वगुर्वधिकृतं भुवनैकवन्द्॑दिव्यं विचित्रविबुधाछयविमानशोचि: ।

आपुः परां मुदमपूर्वमुपेत्य योग-मायाबलेन मुनयस्तदथो विकुण्ठम्‌ ॥

२६॥

तत्‌--तब; विश्व-गुरु--ब्रह्माण्ड के गुरु अर्थात्‌ परमेश्वर द्वारा; अधिकृतम्‌--अधिकृत; भुवन--लोकों का; एक--एकमात्र;वन्द्यमू--पूजा जाने योग्य; दिव्यम्‌--आध्यात्मिक; विचित्र--अत्यधिक अलंकृत; विबुध-अछय--भक्तों का ( जो दिद्ठानों मेंसर्वश्रेष्ठ हैं )) विमान--वायुयानों का; शोचि:--प्रकाशित; आपु: --प्राप्त किया; पराम्‌--सर्वोच्च; मुदम्‌--सुख; अपूर्वम्‌--अभूतपूर्व; उपेत्य--प्राप्त करके ; योग-माया-- आध्यात्मिक शक्ति द्वारा; बलेन--प्रभाव द्वारा; मुन॒यः--मुनिगण; तत्‌--वैकुण्ठ;अथो--वह; विकुण्ठम्‌--विष्णु।

इस तरह सनक, सनातन, सनन्दन तथा सनत्कुमार नामक महर्षियों ने अपने योग बल से आध्यात्मिक जगत के उपर्युक्त वैकुण्ठ में पहुँच कर अभूतपूर्व सुख का अनुभव किया।

उन्होंनेपाया कि आध्यात्मिक आकाश अत्यधिक अलंकृत विमानों से, जो बैकुण्ठ के सर्वश्रेष्ठ भक्तोंद्वारा चालित थे, प्रकाशमान था और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा अधिशासित था।

तस्मिन्नतीत्य मुनयः षडसज्जमाना:कक्षा: समानवयसावथ सप्तमायाम्‌ ।

देवावचक्षत गृहीतगदौ परार्ध्य-केयूरकुण्डलकिरीटविटड्डूवेषौ ॥

२७॥

तस्मिन्‌--उस वैकुण्ठ में; अतीत्य--पार कर लेने पर; मुनयः--मुनियों ने; घट्‌ू--छह; असज्ज माना:--बिना आकृष्ट हुए;कक्षा:--द्वार; समान--बराबर; वयसौ-- आयु; अथ--तत्पश्चात्‌; सप्तमायाम्‌--सातवें द्वार पर; देवौ--वैकुण्ठ के दो द्वारपालों;अचक्षत--देखा; गृहीत--लिये हुए; गदौ--गदाएँ; पर-अर्ध्य--सर्वाधिक मूल्यवान; केयूर--बाजूबन्द; कुण्डल--कान केआभूषण; किरीट--मुकुट; विटड्ढू--सुन्दर; वेषौ--वस्त्र |

भगवान्‌ के आवास वैकुण्ठपुरी के छः द्वारों को पार करने के बाद और सजावट से तनिकभी आश्चर्यचकित हुए बिना, उन्होंने सातवें द्वार पर एक ही आयु के दो चमचमाते प्राणियों कोदेखा जो गदाएँ लिए हुए थे और अत्यन्त मूल्यवान आभूषणों, कुण्डलों, हीरों, मुकुटों, वस्त्रोंइत्यादि से अलंकृत थे।

मत्तद्विरफिवनमालिकया निवीतौविन्यस्तयासितचतुष्टयबाहुमध्ये ।

वकत्रं भ्रुवा कुटिलया स्फुटनिर्गमाभ्यांरक्तेक्षणेन च मनाग्रभसं दधानौ ॥

२८॥

मत्त--उन्मत्त; द्वि-रेफ-- भौरे; बन-मालिकया--ताजे फूलों की माला से; निवीतौ--गर्दन पर लटकते; विन्यस्तवा--चारों ओररखे हुए; असित--नीला; चतुष्टय--चार; बाहु--हाथ; मध्ये--बीच में; वक्त्रमू--मुखमण्डल; भ्रुवा--भौहों से; कुटिलया--टेढ़ी; स्फुट--हुँकारते हुए; निर्गमाभ्याम्‌-- श्वास; रक्त--लालाभ; ईक्षणेन-- आँखों से; च--तथा; मनाक्‌ू--कुछ कुछ;रभसम्‌--चंचल, क्षुब्ध; दधानौ--दृष्टि फेरी |

दोनों द्वारपाल ताजे फूलों की माला पहने थे, जो मदोन्मत्त भौंरों को आकृष्ट कर रही थींऔर उनके गले के चारों ओर तथा उनकी चार नीली बाहों के बीच में पड़ी हुई थीं।

अपनीकुटिल भौहों, अतृप्त नथनों तथा लाल लाल आँखों से वे कुछ कुछ श्षुब्ध प्रतीत हो रहे थे।

द्वार्येतयोर्निविविशुर्मिषतोरपृष्टापूर्वा यथा पुरटवज्ञकपाटिका या: ।

सर्वत्र तेशविषमया मुनय: स्वदृष्टयाये सञ्जरन्त्यविहता विगताभिशड्भा: ॥

२९॥

द्वारि--द्वार पर; एतयो: --दोनों द्वारपाल; निविविशु:--प्रवेश किया; मिषतो:--देखते देखते; अपृष्ठा --बिना पूछे; पूर्वा:--पहलेकी तरह; यथा--जिस तरह; पुरट--स्वर्ण ; वज्ञ--तथा हीरों से बना; कपाटिका:--दरवाजे; या:--जो; सर्वत्र--सभी जगह;ते--वे; अविष-मया--बिना भेदभाव के; मुनय:--मुनिगण; स्व-दृष्टया--स्वेच्छा से; ये--जो; सञ्जलरन्ति--विचरण करते हैं;अविहता:--बिना रोक टोक के; विगत--बिना; अभिश्ढा:--सन्देह।

सनक इत्यादि मुनियों ने सभी जगहों के दरवाजों को खोला।

उन्हें अपने पराये का कोईविचार नहीं था।

उन्होंने खुले मन से स्वेच्छा से उसी तरह साततें द्वार में प्रवेश किया जिस तरह वेअन्य छह दरवाजों से होकर आये थे, जो सोने तथा हीरों से बने हुए थे।

तान्वीक्ष्य वातरशनां श्वतुरः कुमारान्‌वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्‌ ।

वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौतेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ ॥

३०॥

तानू--उनको; वीक्ष्य--देखकर; वात-रशनान्‌--नग्न; चतुर: --चार; कुमारानू--बालकों को; वृद्धान्‌ू--काफी आयु वाले;दश-अर्ध--पांच वर्ष; वबस:--आयु के लगने वाले; विदित--अनुभव कर चुके थे; आत्म-तत्त्वानू--आत्मा के सत्य को;वेत्रेण-- अपने डंडों से; च-- भी; अस्खलयताम्‌--मना किया; अ-तत्‌ -अर्हणान्‌--उनसे ऐसी आशा न करते हुए; तौ--वे दोनोंद्वारपाल; तेज:--यश; विहस्य--शिष्टाचार की परवाह न करके; भगवत्-प्रतिकूल-शीलौ-- भगवान्‌ को नाराज करने वालेस्वभाव वाले।

चारों बालक मुनि, जिनके पास अपने शरीरों को ढकने के लिए वायुमण्डल के अतिरिक्तकुछ नहीं था, पाँच वर्ष की आयु के लग रहे थे यद्यपि वे समस्त जीवों में सबसे वृद्ध थे औरउन्होंने आत्मा के सत्य की अनुभूति प्राप्त कर ली थी।

किन्तु जब द्वारपालों ने, जिनके स्वभावभगवान्‌ को तनिक भी रुचिकर न थे, इन मुनियों को देखा तो उन्होंने उनके यश का उपहासकरते हुए अपने डंडों से उनका रास्ता रोक दिया, यद्यपि ये मुनि उनके हाथों ऐसा बर्ताव पाने केयोग्य न थे।

ताभ्यां मिषत्स्वनिमिषेषु निषिध्यमाना:स्व्हनत्तमा ह्ापि हरे: प्रतिहारपा भ्याम्‌ ।

ऊचु: सुहृत्तमदिदृक्षितभड़ ईष-त्कामानुजेन सहसा त उपप्लुताक्षा: ॥

३१॥

ताभ्याम्‌--उन दोनों द्वारपालों द्वारा; मिषत्सु--इधर उधर देखते हुए; अनिमिषेषु--वैकुण्ठ में रहने वाले देवताओं;निषिध्यमाना:--मना किये जाने पर; सु-अर्त्तमा: --सर्वोपयुक्त व्यक्तियों द्वारा; हि अपि--यद्यपि; हरेः-- भगवान्‌ हरि का;प्रतिहार-पाभ्याम्‌--दो द्वारपालों द्वारा; ऊचु:--कहा; सुहृत्‌-तम--अत्यधिक प्रिय; दिदृक्षित--देखने की उत्सुकता; भड्ढे--अवरोध; ईषत्‌ू-- कुछ कुछ; काम-अनुजेन--काम के छोटे भाई ( क्रोध ) द्वारा; सहसा--अचानक; ते--वे ऋषि; उपप्लुत--विश्षुब्ध; अक्षा:--आँखें

इस तरह सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति होते हुए भी जब चारों कुमार अन्य देवताओं के देखतेदेखते श्री हरि के दो प्रमुख द्वारपालों द्वारा प्रवेश करने से रोक दिये गये तो अपने सर्वाधिक प्रियस्वामी श्रीहरि को देखने की परम उत्सुकता के कारण उनके नेत्र क्रोधवश सहसा लाल हो गये।

मुनय ऊचु:को वामिहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-स्तद्धर्मिणां निवसतां विषम: स्वभाव: ।

तस्मिन्प्रशान्तपुरुषे गतविग्रहे वांको वात्मवत्कुहकयो: परिशड्डूनीय: ॥

३२॥

मुनयः--मुनियों ने; ऊचु;--कहा; कः--कौन; वाम्‌--तुम दोनों; इह--वैकुण्ठ में; एत्य--प्राप्त करके; भगवत्‌-- भगवान्‌ को;परिचर्यया--सेवा द्वारा; उच्चै:--विगत पुण्यकर्मो के द्वारा उन्नति करके; तत्‌-धर्मिणाम्‌-- भक्तों के; निवसताम्‌--वैकुण्ठ में रहतेहुए; विषम:--विरोधी; स्वभाव: --मनो वृत्ति; तस्मिनू-- भगवान्‌ में; प्रशान्त-पुरुषे--निश्चिन्त, चिन्तारहित; गत-विग्रहे--शत्रुविहीन; वाम्‌ू--तुम दोनों का; कः--कौन; वा--अथवा; आत्म-वत्‌-- अपने समान; कुहकयो:--द्वैतभाव रखने वाले;परिशड्भूनीय:--विश्वासपात्र न होना।

मुनियों ने कहा : ये दोनों व्यक्ति कौन हैं जिन्होंने ऐसी विरोधात्मक मनोवृत्ति विकसित कररखी है।

ये भगवान्‌ की सेवा करने के उच्चतम पद पर नियुक्त हैं और इनसे यह उम्मीद की जातीहै कि इन्होंने भगवान्‌ जैसे ही गुण विकसित कर रखे होंगे? ये दोनों व्यक्ति वैकुण्ठ में किस तरहरह रहे हैं? इस भगवद्धाम में किसी शत्रु के आने की सम्भावना कहाँ है ? पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌का कोई शत्रु नहीं है।

भला उनका कौन ईर्ष्यालु हो सकता है ? शायद ये दोनों व्यक्ति कपटी हैं,अतएव अपनी ही तरह होने की अन्यों पर शंका करते हैं।

न हान्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीरा: ।

पश्यन्ति यत्र युवयो: सुरलिड्रिनो: किव्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोस्य ॥

३३॥

न--नहीं; हि-- क्योंकि; अन्तरम्‌- भेद, अन्तर; भगवति-- भगवान्‌ में; हह--यहाँ; समस्त-कुक्षौ --हर वस्तु उदर के भीतर है;आत्मानम्‌ू--जीव; आत्मनि--परमात्मा में; नभ: --वायु की अल्प मात्रा; नभसि--सम्पूर्ण वायु के भीतर; इब--सहश; धीरा:--विद्वान; पश्यन्ति--देखते हैं; यत्र--जिसमें; युवयो:--तुम दोनों का; सुर-लिड्डिनो:--वैकुण्ठ वासियों की तरह वेश बनाएँ;किम्‌--कैसे; व्युत्पादितमू--विकसित, जागृत; हि--निश्चय ही; उदर-भेदि--शरीर तथा आत्मा में अन्तर; भयम्‌--डर; यत:--जहाँ से; अस्य--परमे श्वर का ।

वैकुण्ठलोक में वहाँ के निवासियों तथा भगवान्‌ में उसी तरह पूर्ण सामझझजस्य है, जिस तरहअन्तरिक्ष में वृहत्‌ तथा लघु आकाशों में पूर्ण सामझस्य रहता है।

तो इस सामञझस्य के क्षेत्र मेंभय का बीज क्‍यों है? ये दोनों व्यक्ति वैकुण्ठवासियों की तरह वेश धारण किये हैं, किन्तुउनका यह असामञझस्य कहाँ से उत्पन्न हुआ ?

तद्ठाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तु:कर्तु प्रकृष्ठमिह धीमहि मन्दधी भ्याम्‌ ।

लोकानितो ब्रजतमन्तरभावदृष्टययापापीयसस्त्रय इमे रिपवोस्थ यत्र ॥

३४॥

तत्‌--इसलिए; वाम्‌--इन दोनों को; अमुष्य--उस; परमस्थ--परम का; विकुण्ठ- भर्तु:--वैकुण्ठ के स्वामी; कर्तुम्‌ू--प्रदानकरने के लिए; प्रकृष्टमू--लाभ; इह--इस अपराध के विषय में; धीमहि--हम विचार करें; मन्द-धीभ्याम्‌--मन्द बुद्धि वाले;लोकानू्‌-- भौतिक जगत को; इतः--इस स्थान ( बैकुण्ठ ) से; ब्रजतम्‌--चले जाओ; अन्तर-भाव-दद्विधा; दृष्या--देखने केकारण; पापीयस: --पापी; त्रयः--तीन; इमे--ये; रिपव: --शत्रु; अस्य--जीव के; यत्र--जहाँ

अतएव हम विचार करें कि इन दो संदूषित व्यक्तियों को किस तरह दण्ड दिया जाय।

जोदण्ड दिया जाय वह उपयुक्त हो क्योंकि इस तरह से अन्ततः उन्हें लाभ दिया जा सकता है।

चूँकिवे वैकुण्ठ जीवन के अस्तित्व में द्वैध पाते हैं, अत: वे संदूषित हैं और इन्हें इस स्थान से भौतिकजगत में भेज दिया जाना चाहिए जहाँ जीवों के तीन प्रकार के शत्रु होते हैं।

तेषामितीरितमुभाववधार्य घोरंतं ब्रह्मदण्डमनिवारणमस्त्रपूगै: ।

सद्यो हरेरनुचरावुरु बिभ्यतस्ततू-पादग्रहावपततामतिकातरेण ॥

३५॥

तेषाम्‌--चारों कुमारों के; इति--इस प्रकार; ईरितम्‌--उच्चरित; उभौ--दोनों द्वारपाल; अवधार्य --समझ करके; घोरम्‌--भयंकर; तम्‌ू--उस; ब्रह्म-दण्डम्‌--ब्राह्मण के शाप को; अनिवारणम्‌--जिसका निवारण न किया जा सके; अस्त्र-पूगैः--किसी प्रकार के हथियार द्वारा; सद्य;ः--तुरन्त; हरेः-- भगवान्‌ के; अनुचरौ -- भक्तगण; उरु-- अत्यधिक; बिभ्यतः -- भयभीत होउठे; तत्‌-पाद-ग्रहौ--उनके पाँव पकड़ कर; अपतताम्‌--गिर पड़े; अति-कातरेण--अत्यधिक चिन्ता में

जब वैकुण्ठलोक के द्वारपालों ने, जो कि सचमुच ही भगवद्भक्त थे, यह देखा कि वेब्राह्मणों द्वारा शापित होने वाले हैं, तो वे तुरन्त बहुत भयभीत हो उठे और अत्यधिक चिन्तावशब्राह्मणों के चरणों पर गिर पड़े, क्योंकि ब्राह्मण के शाप का निवारण किसी भी प्रकार केहथियार से नहीं किया जा सकता।

भूयादघोनि भगवद्धिरकारि दण्डोयो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम्‌ ।

मा वोनुतापकलया भगवत्स्मृतिध्नोमोहो भवेदिह तु नौ ब्रजतोरधोध: ॥

३६॥

भूयात्‌--ऐसा ही हो; अघोनि--पापी के लिए; भगवद्धि:--आपके द्वारा; अकारि--किया गया; दण्ड:--दण्ड; य:--जो;नौ--हमारे सम्बन्ध में; हरेत--नष्ट करे; सुर-हेलनम्‌--महान्‌ देवताओं की आज्ञा का उल्लंघन करते हुए; अपि--निश्चय ही;अशेषम्‌--असीम; मा--नहीं; वः--तुम्हारा; अनुताप--पछतावा; कलया--थोड़ा थोड़ा करके; भगवत्‌-- भगवान्‌ का; स्मृति-घन:--स्मरण शक्ति का विनाश करते हुए; मोह: --मोह; भवेत्‌--हो; इह-मूर्ख जीवयोनि में; तु--लेकिन; नौ--हम दोनों का;ब्रजतो:--जा रहे; अध: अध:--नीचे भौतिक जगत को

मुनियों द्वारा शापित होने के बाद द्वारपालों ने कहा : यह ठीक ही हुआ कि आपने हमें आपजैसे मुनियों का अनादर करने के लिए दण्ड दिया है।

किन्तु हमारी प्रार्थना है कि हमारे पछतावेपर आपकी दया के कारण हमें उस समय भगवान्‌ की विस्मृति का मोह न आए जब हम नीचे-नीचे जा रहे हों।

एवं तदैव भगवानरविन्दनाभ:स्वानां विबुध्य सदतिक्रममार्यहद्य:ः ।

तस्मिन्ययौ परमहंसमहामुनीना-मन्वेषणीयचरणौ चलयन्सह श्री: ॥

३७॥

एवम्‌--इस प्रकार; तदा एव--उसी क्षण; भगवान्‌-- भगवान्‌; अरविन्द-नाभ: --जिसकी नाभि से कमल निकला है;स्वानामू--अपने दासों के विषय में; विबुध्य--जानकर; सत्‌--मुनियों को; अतिक्रमम्‌--अपमान; आर्य--सदाचारियों की;हृद्यः--प्रसन्नता; तस्मिनू--वहाँ; ययौ--गये; परमहंस--परमहंस; महा-मुनीनाम्‌--महामुनियों द्वारा; अन्वेषणीय--जो खोजेजाने योग्य हैं; चरणौ--चरणकमल; चलयनू--विचरण करते हुए; सह- श्री:--लक्ष्मीजी सहित |

नाभि से उगे कमल के कारण पद्ानाभ कहलाने वाले तथा सदाचारियों की प्रसन्नता के रूपभगवान्‌ को उन सन्तों के प्रति अपने ही दासों के द्वारा किये गये अपमान का उसी क्षण पता चलगया।

वे अपनी प्रेयसी लक्ष्मी सहित उस स्थान पर उन चरणों से चलकर गये जिनकी खोजसंन्यासी तथा महामुनि करते हैं।

त॑ त्वागतं प्रतिहतौपयिक स्वपुम्भि-स्तेडचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिभाग्यम्‌ ।

हंसश्रियोर्व्यजनयो: शिववायुलोल-च्छुभ्रातपत्रशशिकेसरशीकराम्बुम्‌ ॥

३८॥

तम्‌--उन्‍हें; तु--लेकिन; आगतम्‌--आगे आए हुए; प्रतिहत--ले गया; औपयिकम्‌--साज-सामग्री; स्व-पुम्भि:--अपनेसंगियों द्वारा; ते--उन महामुनियों ( कुमारगण ) ने; अचक्षत--देखा; अक्ष-विषयम्‌-- अब देखने का विषय; स्व-समाधि-भाग्यम्‌-- भावमय समाधि द्वारा ही दृश्य; हंस-भ्रियो: -- श्वेत हंसों के समान सुन्दर; व्यजनयो:--चामर ( श्वेत बालों के गुच्छे );केशिव-वायु--अनुकलू वायु; लोलत्‌--हिलती हुई; शुभ्र-आतपत्र-- श्वेत छाता; शशि--चन््रमा; केसर--मोतियों; शीकर--बूँदें;अम्बुम्‌--जल की

सनक इत्यादि मुनियों ने देखा कि भगवान्‌ विष्णु जो भावमय समाधि में पहले उनके हृदयोंके ही भीतर दृष्टिगोचर होते थे अब वे साकार रूप में उनके नेत्रों के सामने दृष्टिगोचर हो रहे हैं।

जब वे छाता तथा चामर जैसी साज-सामग्री सहित अपने संगियों के साथ आगे आये तो श्वेतचामर के बालों के गुच्छे धीमे धीमे हिल रहे थे, मानो दो श्वेत हंस हों तथा अनुकूल हवा से छातेसे लटक रही मोतियों की झालरें भी हिल रही थीं मानो श्वेत पूर्णचन्द्रमा से अमृत की बूँदें टपकरही हों, अथवा हवा के झोंके से बर्फ पिघल रही हो।

कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधामस्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम्‌ ।

श्यामे पृथावुरसि शोभितया श्रिया स्व-श्वूडामणिं सुभगयन्तमिवात्मधिष्ण्यम्‌ ॥

३९॥

कृत्स्न-प्रसाद--हर एक को आशीर्वाद देते हुए; सु-मुखम्‌--शुभ मुखमण्डल; स्पृहणीय--वांछनीय; धाम--आश्रय; स्नेह--स्नेह; अवलोक--देखते हुए; कलया--अंश द्वारा; हदि--हृदय में; संस्पृशन्तम्‌--स्पर्श करते हुए; श्यामे--साँवले रंग वालेभगवान्‌ के प्रति; पृथौ--चौड़ी; उरसि--छाती पर; शोभितया--सुसज्जित होकर; थ्रिया--लक्ष्मी द्वारा; स्व:--स्वर्गलोक; चूडा-मणिम्‌--चोटी; सुभगयन्तम्‌--सौभाग्य का विस्तार करते हुए; इब--सहृश; आत्म-- भगवान्‌; धिष्ण्यम्‌-- धाम |

भगवान्‌ सारे आनन्द के आगार हैं।

उनकी शुभ उपस्थिति हर एक के आशीष के लिए हैऔर उनकी स्नेहमयी मुस्कान तथा चितवन हृदय के अन्तरतम को छू लेती है।

भगवान्‌ के सुन्दरशरीर का रंग श्यामल है और उनका चौ वक्षस्थल लक्ष्मीजी का विश्रामस्थल है, जो समस्तस्वर्गलोकों के शिखर रूपी सम्पूर्ण आध्यात्मिक जगत को महिमामंडित करने वाली हैं।

इस तरहऐसा प्रतीत हो रहा था मानो भगवान्‌ स्वयं ही आध्यात्मिक जगत के सौन्दर्य तथा सौभाग्य काविस्तार कर रहे हों।

पीतांशुके पृथुनितम्बिनि विस्फुरन्त्याकाउ्च्यालिभिविरुतया वनमालया च ।

बल्गुप्रकोष्ठवलयं विनतासुतांसेविन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जम्‌ ॥

४०॥

पीत-अंशुके -- पीले वस्त्र से ढका; पृथु-नितम्बिनि--अपने विशाल कूल्हों पर; विस्फुरन्त्या--चमचमाती; काउच्या--करधनीसे; अलिभि: -- भौरों द्वारा; विरुतया--गुंजार करती; वन-मालया--ताजे फूलों की माला से; च--तथा; वल्गु--सुन्दर;प्रकोष्ठ--कलाइयाँ; वलयम्‌--कंगन; विनता-सुत--विनता पुत्र गरुड़ के; अंसे--कन्धे पर; विन्यस्त--टिकाये; हस्तम्‌--एकहाथ; इतरेण--दूसरे हाथ से; धुनानम्‌ू--घुमाते हुए; अब्जम्‌ू--कमल का फूल।

वे करधनी से अलंकृत थे, जो उनके विशाल कूल्हों को आवृत्त किये हुए पीत वस्त्र परचमचमा रही थी।

वे ताजे फूलों की माला पहने थे, जो गुंजरित भौरों से लक्षित थी।

उनकी सुन्दरकलाइयों पर कंगन सुशोभित थे और वे अपना एक हाथ अपने वाहन गरुड़ के कन्धे पर रखे थेतथा दूसरे हाथ से कमल का फूल घुमा रहे थे।

विद्युत्क्षिपमकरकुण्डलमण्डनाई-गण्डस्थलोन्नसमुखं मणिमत्किरीटम्‌ ।

दोर्दण्डषण्डविवरे हरता परार्ध्य-हारेण कन्धरगतेन च कौस्तुभेन ॥

४१॥

विद्युतू-बिजली; क्षिपत्‌--प्रकाश करते; मकर--मगर के आकार के; कुण्डल--कान के आभूषण; मण्डन--अलंकरण;अर्ह--जैसाकि उचित है; गण्ड-स्थल--गाल; उन्नस--उठी नाक; मुखम्‌--मुखमण्डल; मणि-मत्‌--मणियों से जटित;किरीटम्‌--मुकुट; दोः-दण्ड--चार बलिष्ट भुजाएँ; षण्ड--समूह; विवरे--बीच में; हरता--मोहने वाला; पर-अर्ध्य--अत्यन्तमूल्यवान; हारेण--हार के द्वारा; कन्धर-गतेन--गर्दन को अलंकृत करते हुए; च--तथा; कौस्तुभेन--कौस्तुभ मणि द्वारा |

उनका मुखमण्डल गालों से सुस्पष्ट हो रहा था, जो उनके बिजली को मात करने वालेमकराकृत कुण्डलों की शोभा को बढ़ा रहे थे।

उनकी नाक उन्नत थी और उनका सिर रललजटित मुकुट से आवृत था।

उनकी बलिष्ठ भुजाओं के मध्य एक मोहक हार लटक रहा था और उनकीगर्दन कौस्तुभ मणि से विभूषित थी।

अतन्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिन्दिराया:स्वानां धिया विरचितं बहुसौष्ठवाढ्यम्‌ ।

महां भवस्य भवतां च भजन्तमड़ूंनेमुर्निरीक्ष्य न वितृप्तदशो मुदा कै: ॥

४२॥

अत्र--यहाँ, सौन्दर्य के मामले में; उपसूष्टमू--पराजित; इति--इस प्रकार; च--तथा; उत्स्मितम्‌ू--उसकी सुन्दरता का गर्व;इन्दिराया:--लक्ष्मीजी का; स्वानामू-- अपने भक्तों का; धिया--बुद्धि द्वारा; विरचितम्‌-- ध्यायित; बहु-सौष्ठव-आढ्यम्‌ --अत्यधिक सुंदर ढंग से अलंकृत किया गया; महाम्‌--मेरा; भवस्य--शिवजी का; भवताम्‌--तुम सबों का; च--तथा;भजन्तम्‌--पूजित; अड्डभम्‌-- श्रीविग्रह, स्वरूप; नेमु;--नमस्कार किया; निरीक्ष्य--देखकर; न--नहीं; वितृप्त--तृप्त; हशः --आँखें; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; कैः--उनके सिरों से

नारायण का अनुपम सौन्दर्य उनके भक्तों की बुद्धि द्वारा कई गुना वर्धित होने से इतनाआकर्षक था कि वह अतीव सुन्दरी लक्ष्मी देवी के गर्व को भी पराजित कर रहा था।

हेदेवताओ, इस तरह प्रकट हुए भगवान्‌ मेरे द्वारा, शिव जी द्वारा तथा तुम सबों के द्वारा पूजनीयहैं।

मुनियों ने उन्हें अतृप्त आँखों से आदर अर्पित किया और प्रसन्नतापूर्वक उनके चरणकमलों परअपना अपना सिर झुकाया।

'तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द-किझ्लल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु: ।

अन्तर्गत: स्वविवरेण चकार तेषांसड्झ्लो भमक्षरजुषामपि चित्ततन्वो: ॥

४३॥

तस्य--उसका; अरविन्द-नयनस्यथ--कमलनेत्र भगवान्‌ का; पद-अरविन्द--चरणकमलों का; किज्ञल्क-- अँगूठों समेत;मिश्र--मिश्रित; तुलसी--तुलसी दल; मकरन्द--सुगन्धि; वायु:--मन्द पवन; अन्त:ः-गत:-- भीतर प्रविष्ट हुए; स्व-विवरेण--अपने नथुनों से होकर; चकार--बना दिया; तेषाम्‌--कुमारों के; सड्क्षोभम्‌--परिवर्तन के लिए क्षोभ; अक्षर-जुषाम्‌--निर्विशेष ब्रह्म-साक्षात्कार के प्रति अनुरक्त; अपि--यद्यपि; चित्त-तन्वो: --मन तथा शरीर दोनों में |

जब भगवान्‌ के चरणकमलों के अँगूठों से तुलसीदल की सुगन्ध ले जाने वाली मन्द वायुउन मुनियों के नथुनों में प्रविष्ट हुई तो उन्हें शरीर तथा मन दोनों में परिवर्तन का अनुभव हुआयद्यपि वे निर्विशेष ब्रह्म ज्ञान के प्रति अनुरक्त थे।

ते वा अमुष्य वदनासितपदाकोश-मुद्वीक्ष्य सुन्दरतराधरकुन्दहासम्‌ ।

लब्धाशिष: पुनरवेक्ष्य तदीयमडप्रि-इन्द्दं नखारुणमणिश्रयणं निदध्यु: ॥

४४॥

ते--वे मुनि; वै--निश्चय ही; अमुष्य-- भगवान्‌ का; वदन--मुख; असित--नीला; पद्मय--कमल का; कोशम्‌-- भीतरी भाग;उद्दीक्षष--ऊपर देखकर; सुन्दर-तर--अधिक सुन्दर; अधर--होठ; कुन्द--चमेली का फूल; हासम्‌--हँसी; लब्ध--प्राप्तकिया; आशिष:--जीवन के लक्ष्य; पुन:--फिर; अवेक्ष्य--नीचे देखकर; तदीयम्‌ू--उसका; अड्प्रि-द्वन्द्मू--चरणकमलों कीजोड़ी; नख--नाखून; अरुण--लाल; मणि--पन्ना; श्रयणम्‌-- आश्रय; निदध्यु;--ध्यान किया।

उन्हें भगवान्‌ का सुन्दर मुख नीले कमल के भीतरी भाग जैसा प्रतीत हुआ और भगवान्‌ कीमुसकान खिले हुए चमेली के फूल सी प्रतीत हुईं।

मुनिगण भगवान्‌ का मुख देखकर पूर्णतयासन्तुष्ट थे और जब उन्होंने उनको अधिक देखना चाहा तो उन्होंने उनके चरणकमलों के नाखूनोंको देखा जो पन्ना जैसे थे।

इस तरह वे भगवान्‌ के शरीर को बारम्बार निहार रहे थे, अतः उन्होंनेअन्त में भगवान्‌ के साकार रूप का ध्यान किया।

पुंसां गतिं मृगयतामिह योगमार्गैं-धर्यानास्पदं बहुमतं नयनाभिरामम्‌ ।

पौंस्न॑ वपुर्दर्शयानमनन्यसिद्धै-रौत्पत्तिके: समगृणन्युतमष्टभोगै: ॥

४५॥

पुंसामू--उन पुरुषों की; गतिम्‌--मुक्ति; मृगयताम्‌--ढूँढ रहे; हह--इस जगत में; योग-मार्गैं:--अष्टांग योग विधि के द्वारा;ध्यान-आस्पदम्‌-- ध्यान का विषय; बहु--महान्‌ योगियों द्वारा; मतमू--संस्तुत; नयन--नेत्र; अभिरामम्‌--सुहावने; पौंस्नम्‌--मानव; वपु:--रूप; दर्शयानम्‌-- प्रदर्शित करते हुए; अनन्य--अन्यों द्वारा नहीं; सिद्धैः--सिद्ध; औत्पत्तिके:--शाश्वत उपस्थित;समगृणन्‌-- प्रशंसित; युतम्‌-- भगवान्‌, जो समन्वित है; अष्ट-भोगैः--आठ प्रकार की सिद्धियों से |

यही भगवान्‌ का वह रूप है, जिसका ध्यान योगविधि के अनुयायी करते हैं और ध्यान मेंयह योगियों को मनोहर लगता है।

यह काल्पनिक नहीं, अपितु वास्तविक है जैसा कि महान्‌योगियों ने सिद्ध किया है।

भगवान्‌ आठ प्रकार की सिद्ध्द्रियों से पूर्ण हैं, किन्तु अन्यों के लिए येपूर्णरूप में सम्भव नहीं हैं।

कुमारा ऊचु:योअन्तर्हितो हृदि गतोपि दुरात्मनां त्वंसोदैव नो नयनमूलमनन्त राद्धः ।

यहाँव कर्णविवरेण गुहां गतो नःपित्रानुवर्णितरहा भवदुद्धवेन ॥

४६॥

कुमारा: ऊचु:--कुमारों ने कहा; यः--जो; अन्तर्हित:--अव्यक्त; हृदि--हृदय में; गतः--आसीन है; अपि--यद्यपि;दुरात्मनाम्‌-- धूर्तों को; त्वमू--तुम; सः--वह; अद्य--आज; एव--निश्चय ही; न:--हमारा; नयन-मूलम्‌--आमने-सामने;अनन्त--हे अनन्त; राद्ध:--प्राप्त किया; यहिं-- जब; एव--निश्चय ही; कर्ण-विवरेण --कानों से होकर; गुहाम्‌--बुद्धि;गतः--प्राप्त किया है; नः--हमको; पित्रा--पिता के द्वारा; अनुवर्णित--वर्णन किये गये; रहा:--रहस्य; भवत््‌-उद्धवेन--आपके प्राकट्य से।

कुमारों ने कहा : हे प्रिय प्रभु, आप धूर्तों के समक्ष प्रकट नहीं होते यद्यपि आप हर एक केहृदय के भीतर आसीन रहते हैं।

किन्तु जहाँ तक हमारा सम्बन्ध है, हम आपको अपने समक्ष देखरहे हैं यद्यपि आप अनन्त हैं।

हमने आपके विषय में अपने पिता ब्रह्मा के द्वारा अपने कानों से जोकथन सुने हैं, वे अब आपके कृपापूर्ण प्राकट्य से वस्तुतः साकार हो गए हैं।

त॑ त्वां विदाम भगवन्परमात्मतत्त्वंसत्त्वेन सम्प्रति रतिं रचयन्तमेषाम्‌ ।

यत्तेडनुतापविदितैर्दढ भक्तियोगै-रुदग्रन्थयो हृदि विदुर्मुन॒यो विरागा: ॥

४७॥

तम्‌--उसको; त्वामू--तुमको; विदाम--हम जानते हैं; भगवन्‌--हे भगवान्‌; परम्‌ू-- परम; आत्म-तत्त्वम्‌-परब्रह्म; सत्त्वेन--आपके सतोगुणी रूप के द्वारा; सम्प्रति--अब; रतिम्‌--ईश प्रेम; रचयन्तम्‌--उत्पन्न करते हुए; एषाम्‌--उन सबों का; यत्‌--जो; ते--तुम्हारी; अनुताप--कृपा; विदितैः--समझ गया; हृढ--अविचल; भक्ति-योगै:--भक्ति द्वारा; उद्ग्रन्थय:--अनुरक्ति सेरहित, भौतिक बन्धन से मुक्त; हृदि--हृदय में; विदु;:--समझ गये; मुनयः--मुनिगण; विरागा: --भौतिक जीवन में रूचि न रखनेबाले।

हम जानते हैं कि आप परम सत्य अर्थात्‌ परमेश्वर हैं, जो अपने दिव्य रूप को अकलुषित( विशुद्ध ) सतोगुण में प्रकट करते हैं।

आपका यह दिव्य शाश्वत रूप आपकी कृपा से हीअविचल भक्ति के द्वारा उन मुनियों द्वारा समझा जाता है जिनके हृदय भक्तिमयी विधि से शुद्धकिये जा चुके हैं।

नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादकिम्वन्यदर्पितभयं श्रुव उन्नयैस्ते ।

येडड़ त्वदड्घ्रिशरणा भवतः कथाया:कीर्तन्यतीर्थथशस: कुशला रसज्ञा: ॥

४८॥

न--नहीं; आत्यन्तिकम्‌--मुक्ति; विगणयन्ति--परवाह करते हैं; अपि-- भी; ते--वे; प्रसादम्‌ू--वर; किम्‌ उ--क्या कहा जाय;अन्यत्‌-- अन्य भौतिक सुख; अर्पित--दिया गया; भयम्‌-- भय; भ्रुव:--भौंहों का; उन्नयै:ः--उठाने से; ते--तुम्हारे; ये--वेभक्त; अड़--हे भगवान्‌; त्वत्‌--तुम्हारे; अद्धघ्रि-- चरणकमल; शरणा: --शरण लिये हुए; भवतः--आपकी; कथाया: --कथाएँ; कीर्तन्य--कीर्तन के योग्य; तीर्थ--शुद्ध यशसः--यश; कुशला: --अत्यन्त पटु; रस-ज्ञाः:--रस के ज्ञाता।

वे व्यक्ति जो वस्तुओं को यथारूप में समझने में अत्यन्त पटु और सर्वाधिक बुद्धिमान हैंअपने को भगवान्‌ के शुभ कार्यो तथा उनकी लीलाओं की कथाओं को सुनने में लगाते हैं, जोकीर्तन तथा श्रवण के योग्य होती हैं।

ऐसे व्यक्ति सर्वोच्च भौतिक वर की, अर्थात्‌ मुक्ति की भीपरवाह नहीं करते, स्वर्गलोक के भौतिक सुख जैसे कम महत्वपूर्ण बरों के विषय में तो कुछकहना ही नहीं।

काम भव: स्ववृजिनैर्निरयेषु न: स्ता-च्वेतोइलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत ।

वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेड्प्रिशो भा:पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्श्र: ॥

४९॥

'कामम्‌--वांछित; भव:ः--जन्म; स्व-वृजिनै:--अपने ही पाप कर्मों से; निरयेषु--निम्न जन्मों में; नः--हमारा; स्तातू--ऐसा हीहो; चेत:--मन; अलि-वत्‌-- भौरे सहश; यदि--यदि; नु--हो सकता है; ते--तुम्हारे; पदयो:--चरणकमलों पर; रमेत--लगेरहते हैं; वाच:--शब्द; च--तथा; नः--हमारे; तुलसि-वत्‌-- तुलसी दल के समान; यदि--यदि; ते--तुम्हारे; अड्प्रि--चरणकमलों पर; शोभा: --सजाये गये; पूर्येत--पूरित हो जाते हैं; ते--तुम्हारे; गुण-गणै:--दिव्य गुणों के द्वारा; यदि--यदि;कर्ण-रन्ध्र:--कान के छेद |

हे प्रभु, हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि जब तक हमारे हृदय तथा मन आपके चरणकमलोंकी सेवा में लगे रहें, हमारे शब्द ( आपके कार्यों के कथन से ) सुन्दर बनते रहें जिस तरह आपकेचरणकमलों पर चढ़ाये गये तुलसीदल सुन्दर लगने लगते हैं तथा जब तक हमारे कान आपकेदिव्य गुणों के कीर्तन से सदैव पूरित होते रहें, तब तक आप जीवन की जिस किसी भी नारकीयस्थिति में हमें जन्म दे सकते हैं।

प्रादुश्चकर्थ यदिदं पुरुहूत रूप॑तेनेश निर्वृतिमवापुरलं दशो नः ।

तस्मा इदं भगवते नम इद्धिधेमयोअनात्मनां दुरूदयो भगवान्प्रतीत: ॥

५०॥

प्रादुश्षकर्थ--आपने प्रकट किया है; यत्‌--जो; इृदम्‌--यह; पुरुहूत--हे अतीव पूज्य; रूपम्‌--नित्यरूप; तेन--उस रूप से;ईश-हे प्रभु; निर्वृतिमू--सन्तोष; अवापु:--प्राप्त किया; अलम्‌--इतना अधिक; दृशः--दृष्टि; न:ः--हमारी; तस्मै--उस;इदम्‌--यह; भगवते-- भगवान्‌ को; नम:--नमस्कार; इत्‌--केवल; विधेम--अर्पित करें; यः--जो; अनात्मनाम्‌--अल्पज्ञोंको; दुरुदयः--देखे नहीं जा सकते; भगवान्‌--भगवान्‌; प्रतीत:--हमारे द्वारा देखे गए हैं।

अतः हे प्रभु, हम भगवान्‌ के रूप में आपके नित्य स्वरूप को सादर नमस्कार करते हैं जिसे आपने इतनी कृपा करके हमारे समक्ष प्रकट किया है।

आपका परम नित्य स्वरूप अभागे अल्पज्ञव्यक्तियों द्वारा नहीं देखा जा सकता, किन्तु हम इसे देखकर अपने मन में तथा दृष्टि में अत्यधिकतुष्ट हैं।

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