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अध्याय ग्यारह: परमाणु से समय की गणना

3.11मैत्रेय उवाचचरम: सद्विशेषाणामनेकोसंयुतः सदा ।

परमाणु: स विज्ञेयोनृणामैक्यभ्रमो यत: ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; चरम:--चरम; सत्‌-- प्रभाव; विशेषाणाम्‌ू--लक्षण; अनेकः--असंख्य; असंयुतः--अमिश्रित;सदा--सदैव; परम-अणु:--परमाणु; सः--वह; विज्ञेयः--जानने योग्य; नृणाम्‌ू-- मनुष्यों का; ऐक्च--एकत्व; भ्रम: -- भ्रमित;यतः--जिससे |

भौतिक अभिव्यक्ति का अनन्तिम कण जो कि अविभाज्य है और शरीर रूप में निरुपित नहींहुआ हो, परमाणु कहलाता है।

यह सदैव अविभाज्य सत्ता के रूप में विद्यमान रहता है यहाँ तककि समस्त स्वरूपों के विलीनीकरण (लय ) के बाद भी।

भौतिक देह ऐसे परमाणुओं कासंयोजन ही तो है, किन्तु सामान्य मनुष्य इसे गलत ढ़ग से समझता है।

सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत्‌ ।

कैवल्यं परममहानविशेषो निरन्तर: ॥

२॥

सतः--प्रभावशाली अभिव्यक्ति का; एब--निश्चय ही; पद-अर्थस्य--भौतिक वस्तुओं का; स्वरूप-अवस्थितस्य--प्रलय कालतक एक ही रूप में रहने वाला; यत्‌--जो; कैवल्यम्‌--एकत्व; परम--परम; महानू-- असीमित; अविशेष:--स्वरूप;निरन्तर: --शाश्वत रीति से।

परमाणु अभिव्यक्त ब्रह्मण्ड की चरम अवस्था है।

जब वे विभिन्न शरीरों का निर्माण कियेबिना अपने ही रूपों में रहते हैं, तो वे असीमित एकत्व ( कैवल्य ) कहलाते हैं।

निश्चय हीभौतिक रूपों में विभिन्न शरीर हैं, किन्तु परमाणु स्वयं में पूर्ण अभिव्यक्ति का निर्माण करते हैं।

एवं कालोप्यनुमितः सौधक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम ।

संस्थानभुक्त्या भगवानव्यक्तो व्यक्तभुग्विभु: ॥

३॥

एवम्‌--इस प्रकार; काल:--समय; अपि-- भी; अनुमितः--मापा हुआ; सौक्ष्म्ये--सूक्ष्म में; स्थौल्ये--स्थूल रूप में; च-- भी;सत्तम--हे सर्वश्रेष्ठ; संस्थान--परमाणुओं का संयोग; भुक्त्या--गति द्वारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; अव्यक्त: --अप्रकट; व्यक्त-भुक्‌--समस्त भौतिक गति को नियंत्रित करने वाला; विभुः--महान्‌ बलवान्‌।

काल को शरीरों के पारमाणविक संयोग की गतिशीलता के द्वारा मापा जा सकता है।

कालउन सर्वशक्तिमान भगवान्‌ हरि की शक्ति है, जो समस्त भौतिक गति का नियंत्रण करते हैं यद्यपिवे भौतिक जगत में दृष्टिगोचर नहीं हैं।

स काल: परमाणुर्वे यो भुड़े परमाणुताम्‌ ।

सतोविशेषभुग्यस्तु स काल: परमो महान्‌ ॥

४॥

सः--वह; काल:--नित्यकाल; परम-अणु:--पारमाणविक; बै--निश्चय ही; य:--जो; भुड़े --गुजरता है; परम-अणुताम्‌--एक परमाणु का अवकाश; सतः --सम्पूर्ण समुच्चय; अविशेष-भुक्‌--अद्वैत प्रदर्शन से गुजरने वाला; यः तु--जो; सः--वह;काल:--काल; परम: --परम; महान्‌--महान्‌ |

परमाणु काल का मापन परमाणु के अवकाश विशेष को तय कर पाने के अनुसार कियाजाता है।

वह काल जो परमाणुओं के अव्यक्त समुच्चय को प्रच्छन्न करता है महाकाल कहलाताहै।

अणुट्दों परमाणू स्यात््॒रसरेणुस्त्रयः स्मृतः ।

जालार्करशए्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात्‌ ॥

५॥

अणु:--द्विगुण परमाणु; द्वौ--दो; परम-अणु--परमाणु; स्थात्‌--बनते हैं; त्रसरेणु;:--षट्‌ परमाणु; त्रय:--तीन; स्मृतः --विचार किया हुआ; जाल-अर्क--खिड़की के पर्दे के छेदों से होकर धूप को; रश्मि--किरणों द्वारा; अवग॒त:--जाना जा सकताहै; खम्‌ एब--आकाश की ओर; अनुपतन्‌ अगात्‌--ऊपर जाते हुए

स्थूल काल की गणना इस प्रकार की जाती है: दो परमाणु मिलकर एक द्विगुण परमाणु( अणु ) बनाते हैं और तीन द्विगुण परमाणु ( अणु ) एक षट्‌ परमाणु बनाते हैं।

यह षट्परमाणुउस सूर्य प्रकाश में दृष्टिगोचर होता है, जो खिड़की के परदे के छेदों से होकर प्रवेश करता है।

यह आसानी से देखा जा सकता है कि षट्परमाणु आकाश की ओर ऊपर जाता है।

त्रसरेणुत्रिकं भुड् यः काल: स त्रुटि: स्मृतः ।

शतभागस्तु वेधः स्यात्तैस्त्रिभिस्तु लव: स्मृतः ॥

६॥

त्रसरेणु-त्रिकम्‌ू--तीन षट्‌ परमाणुओं का संयोग; भुड्ढे --जब वे संयुक्त होते हैं; य:--जो; काल:--काल की अवधि; सः--बह; त्रुटिः--त्रुटि; स्मृत:--कहलाती है; शत-भाग:--एक सौ त्रुटियाँ; तु--लेकिन; वेध: --वेध नाम से; स्थातू--यदि ऐसाहोता है; तैः--उनके द्वारा; त्रिभि:--तीन गुना; तु--लेकिन; लवः--लव; स्मृतः--ऐसा कहलाता है।

तीन त्रसरेणुओं के समुच्चयन में जितना समय लगता है, वह त्रुटि कहलाता है और एक सौत्रुटियों का एक वेध होता है।

तीन वेध मिलकर एक लव बनाते हैं।

निमेषस्त्रिलवो ज्ञेय आम्नातस्ते त्रय: क्षण: ।

क्षणान्पञ्ञ विदुः काष्ठां लघु ता दश पञ्ञ च ॥

७॥

निमेष:--निमेष नामक काल की अवधि; त्रि-लवः--तीन लवों की अवधि; ज्ञेय:--जानी जानी चाहिए; आम्नात:--ऐसाकहलाते हैं; ते--वे; त्रय:--तीन; क्षण:--क्षण; क्षणान्‌ू--ऐसे क्षण; पञ्च--पाँच; विदु:--समझना चाहिए; काष्ठाम्‌ू-काष्टानामक कालावधि; लघु--लघु नामक कालावधि; ता:--वे; दश पञ्ञ--पन्द्रह;।

च--भी |

तीन लवों की कालावधि एक निमेष के तुल्य है, तीन निमेष मिलकर एक क्षण बनाते हैं,पाँच क्षण मिलकर एक काष्ठा और पन्द्रह काष्ठा मिलकर एक लघु बनाते हैं।

लघूनि बै समाम्नाता दश पञ्ञ च नाडिका ।

तेद्ठे मुहूर्त: प्रहरः षड्याम: सप्त वा नृणाम्‌ ॥

८॥

लघूनि--ऐसे लघु ( प्रत्येक दो मिनट का ); वै--सही सही; समाम्नाता--कहलाता है; दश पश्च--पन्द्रह; च-- भी; नाडिका--एक नाडिका; ते--उनमें से; द्वे--दो; मुहूर्त:-- क्षण; प्रहरः--तीन घंटे; घट्‌--छ: ; याम:--दिन या रात का चौथाई भाग;सप्त--सात; वा--अथवा; नृणाम्‌--मनुष्य की गणना का

पन्द्रह लघु मिलकर एक नाडिका बनाते हैं जिसे दण्ड भी कहा जाता है।

दो दण्ड से एकमुहूर्त बनता है।

और मानवीय गणना के अनुसार छः: या सात दण्ड मिलकर दिन या रात काचतुर्थाश बनाते हैं।

द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्मिश्चतुरडुलैः ।

स्वर्णमाषै: कृतच्छिद्रं यावत्प्रस्थजलप्लुतम्‌ ॥

९॥

द्वादश-अर्ध--छह; पल-- भार की माप का; उन्मानम्‌--मापक पात्र, मापना; चतुर्भि:--चार के भार के बराबर; चतुः-अड्'ुलैः --चार अंगुल माप का; स्वर्ण--सोने के; माषैः-- भार का; कृत-छिद्रमू--छेद बनाकर; यावत्‌--जितना; प्रस्थ--एकप्रस्थ के जितना; जल-प्लुतमू--जल से भरा।

एक नाडिका या दण्ड के मापने का पात्र छ: पल भार ( १४ औंस ) वाले ताम्र पात्र से तैयारकिया जा सकता है, जिसमें चार माषा भार वाले तथा चार अंगुल लम्बे सोने की सलाई से एकछेद बनाया जाता है।

जब इस पात्र को जल में रखा जाता है, तो इस पात्र को लबालब भरने मेंजो समय लगता है, वह एक दण्ड कहलाता है।

यामाश्चत्वारश्नत्वारो मर्त्यानामहनी उभे ।

पक्ष: पञ्जदशाहानि शुक्ल: कृष्णश्च मानद ॥

१०॥

यामा:--तीन घंटे; चत्वार: --चार; चत्वार: --तथा चार; मर्त्यानामू--मनुष्यों के; अहनी--दिन की अवधि; उभे--रात तथा दिनदोनों; पक्ष:--पखवाड़ा; पञ्च-दश--पन्द्रह; अहानि--दिन; शुक्ल:--उजाला; कृष्ण:-- अँधेरा; च-- भी; मानद--मापा हुआ।

यह भी गणना की गई है कि मनुष्य के दिन में चार प्रहर या याम होते हैं और रात में भी चारप्रहर होते हैं।

इसी तरह पन्द्रह दिन तथा पन्द्रह रातें पखवाड़ा कहलाती हैं और एक मास में दो'पखवाड़े ( पक्ष ) उजाला ( शुक्ल ) तथा अँधियारा ( कृष्ण ) होते हैं।

तयोः समुच्चयो मास: पितृणां तदहर्निशम्‌ ।

द्वै तावृतु: षडयन॑ दक्षिणं चोत्तरं दिवि ॥

११॥

तयो:--उनके ; समुच्चय: --योग; मास:--महीना; पितृणाम्‌--पित-लोकों का; तत्‌--वह ( मास ); अहः-निशम्‌--दिन तथारात; द्वौ--दोनों; तौ--महीने; ऋतु: --ऋतु; घट्‌ू--छ:; अयनम्‌--छह महीनों में सूर्य की गति; दक्षिणम्‌--दक्षिणी; च-- भी;उत्तरमू--उत्तरी; दिवि--स्वर्ग में |

दो पक्षों को मिलाकरएक मास होता है और यह अवधि पित-लोकों का पूरा एक दिन तथारात है।

ऐसे दो मास मिलकर एक ऋतु बनाते हैं और छह मास मिलकर दक्षिण से उत्तर तक सूर्यकी पूर्ण गति को बनाते हैं।

अयने चाहनी प्राह॒र्वत्सरो द्वादश स्मृतः ।

संवत्सरशतं नृणां परमायुर्निरूपितम्‌ ॥

१२॥

अयने--सूर्य की गति ( छह मास की ) में; च--तथा; अहनी--देवताओं का दिन; प्राहु:--कहा जाता है; वत्सर:--एक पंचांगवर्ष; द्वादश--बारह मास; स्मृतः--ऐसा कहलाता है; संवत्सर-शतम्‌--एक सौ वर्ष; नृणाम्‌--मनुष्यों की; परम-आयु:--जीवनकी अवधि, उप्र; निरूपितम्‌--अनुमानित की जाती है।

दो सौर गतियों से देवताओं का एक दिन तथा एक रात बनते हैं और दिन-रात का यहसंयोग मनुष्य के एक पूर्ण पंचांग वर्ष के तुल्य है।

मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष की है।

ग्रहर्क्षताराचक्रस्थ: परमाण्वादिना जगतू ।

संवत्सरावसानेन पर्येत्यनिमिषो विभु: ॥

१३॥

ग्रह--प्रभावशील ग्रह यथा चन्द्रमा; ऋक्ष--अश्विनी जैसे तारे; तारा--तारा; चक्र-स्थ:--कक्ष्या में; परम-अणु-आदिना--'परमाणुओं सहित; जगत्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; संवत्सर-अवसानेन--एक वर्ष के अन्त होने पर; पर्येति-- अपनी कक्ष्या पूरी करताहै; अनिमिष: --नित्य काल; विभुः--सर्वशक्तिमान ।

सारे ब्रह्माण्ड के प्रभावशाली नक्षत्र, ग्रह, तारे तथा परमाणु पर ब्रह्म के प्रतिनिधि दिव्यकाल के निर्देशानुसार अपनी अपनी कक्ष्याओं में चक्कर लगाते हैं।

संवत्सर: परिवत्सर इडावत्सर एव च ।

अनुव॒त्सरो वत्सरश्न विदुरैवं प्रभाष्यते ॥

१४॥

संवत्सर:--सूर्य की कक्ष्या; परिवत्सरः--बृहस्पति की प्रदक्षिणा; इडा-वत्सर:--नक्षत्रों की कक्ष्या; एव--जैसे हैं; च-- भी;अनुवत्सर: --चन्द्रमा की कश्ष्या; वत्सरः--एक पंचांग वर्ष; च-- भी; विदुर--हे विदुर; एवम्‌--इस प्रकार; प्रभाष्यते--ऐसाउनके बारे में कहा जाता है।

सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा आकाश के तारों के पाँच भिन्न-भिन्न नाम हैं और उनमें से प्रत्येकका अपना संवत्सर है।

यः सृज्यशक्तिमुरु धोच्छुसयन्स्वशक्त्यापुंसोभ्रमाय दिवि धावति भूतभेद: ।

कालाख्यया गुणमयं क्रतुभिर्वितन्वंस्‌तस्मै बलि हरत वत्सरपदश्लकाय ॥

१५॥

यः--जो; सृज्य--सृष्टि के; शक्तिमू--बीज; उरुधा--विभिन्न प्रकारों से; उच्छुसयन्‌--शक्ति देते हुए; स्व-शक्त्या--अपनीशक्ति से; पुंसः--जीव का; अभ्रमाय--अंधकार दूर करने के लिए; दिवि--दिन के समय; धावति--चलता है; भूत-भेदः--अन्य समस्त भौतिक रूप से पृथक; काल-आख्यया--नित्यकाल के नाम से; गुण-मयम्‌-- भौतिक परिणाम; क्रतुभि:--भेंटोंके द्वारा; वितन्वन्‌--विस्तार देते हुए; तस्मै--उसको ; बलिमू--उपहार की वस्तुएँ; हरत--अर्पित करे; वत्सर-पञ्णञकाय--हरपाँच वर्ष की भेंट

हे विदुर, सूर्य अपनी असीम उष्मा तथा प्रकाश से सारे जीवों को जीवन देता है।

वह सारेजीवों की आयु को इसलिए कम करता है कि उन्हें भौतिक अनुरक्ति के मोह से छुड़ाया जासके।

वह स्वर्गलोक तक ऊपर जाने के मार्ग को लम्बा ( प्रशस्त ) बनाता है।

इस तरह वहआकाश में बड़े वेग से गतिशील है, अतएव हर एक को चाहिए कि प्रत्येक पाँच वर्ष में एकबार पूजा की समस्त सामग्री के साथ उसको नमस्कार करे।

विदुर उवाचपितृदेवमनुष्याणामायु: परमिदं स्मृतम्‌ ।

परेषां गतिमाचक्ष्व ये स्यु: कल्पाह्वहिर्विद: ॥

१६॥

विदुरः उबाच--विदुर ने कहा; पितृ-पितृलोक; देव--स्वर्गलोक; मनुष्याणाम्‌--तथा मनुष्यों की; आयु:--आयु; परम्‌--अन्तिम; इृदमू--उनकी अपनी माप में; स्मृतम्‌ू--परिगणित; परेषाम्‌-- श्रेष्ठ जीवों की; गतिम्‌ू--आयु; आचक्ष्व--कृपया गणनाकरें; ये--वे जो; स्यु:ः--हैं; कल्पातू--कल्प से; बहिः--बाहर; विद:ः--अत्यन्त विद्वान

विदुर ने कहा : मैं पितृलोकों, स्वर्गलोकों तथा मनुष्यों के लोक के निवासियों की आयु कोसमझ पाया हूँ।

कृपया अब मुझे उन महान्‌ विद्वान जीवों की जीवन अवधि के विषय में बतायेंजो कल्प की परिधि के परे हैं।

भगवान्वेद कालस्य गतिं भगवतो ननु ।

विश्व॑ विचक्षते धीरा योगराद्धेन चक्षुषा ॥

१७॥

भगवानू--हे आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली; वेद--आप जानते हैं; कालस्य--नित्य काल की; गतिमू--चालें; भगवत:--भगवान्‌ के; ननु--निश्चय ही; विश्वम्‌--पूरा ब्रह्माण्ड; विचक्षते--देखते हैं; धीरा:--स्वरूपसिद्ध व्यक्ति; योग-राद्धेन--योगइृष्टि के बल पर; चक्षुषा--आँखों द्वाराहै

आध्यात्मिक रूप से शक्तिशालीआप उस नित्य काल की गतियों को समझ सकते हैं,जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का नियंत्रक स्वरूप है।

चूँकि आप स्वरूपसिद्ध व्यक्ति हैं, अत: आपयोग दृष्टि की शक्ति से हर वस्तु देख सकते हैं।

मैत्रेय उवाचकृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्वेति चतुर्युगम्‌ ।

दिव्यैद्ठांद(शभिर्वर्ष: सावधान निरूपितम्‌ ॥

१८ ॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; कृतम्‌--सत्ययुग; त्रेता--त्रेतायुग; द्वापरम्‌--द्वापरयुग; च-- भी; कलि:-- कलियुग; च--तथा;इति--इस प्रकार; चतुः-युगम्‌--चारों युग; दिव्यैः--देवताओं के ; द्वादशभि:--बारह; वर्ष: --हजारों वर्ष; स-अवधानम्‌--लगभग; निरूपितम्‌--निश्चित किया गया।

मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, चारों युग सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि युग कहलाते हैं।

इन सबोंके कुल वर्षों का योग देवताओं के बारह हजार वर्षों के बराबर है।

चत्वारि त्रीणि द्वे चैक कृतादिषु यथाक्रमम्‌ ।

सड्ख्यातानि सहस्त्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥

१९॥

चत्वारि--चार; त्रीणि--तीन; द्वे--दो; च-- भी; एकम्‌--एक; कृत-आदिषु--सत्य युग में; यथा-क्रमम्‌--बाद में अन्य;सड़्ख्यातानि--संख्या वाले; सहस्त्राणि --हजारों; द्वि-गुणानि--दुगुना; शतानि--सौ; च--भी

सत्य युग की अवधि देवताओं के ४,८०० वर्ष के तुल्य है; त्रेतायुग की अवधि ३,६०० दैवीवर्षो के तुल्य, द्वापर युग की २,४०० वर्ष तथा कलियुग की अवधि १,२०० दैवी वर्षो के तुल्यहै।

सन्ध्यासन्ध्यांशयोरन्तर्य: काल: शतसड्ख्ययो: ।

तमेवाहुर्युगं तज्ज्ञा यत्र धर्मों विधीयते ॥

२०॥

सन्ध्या--पहले का बीच का काल; सन्ध्या-अंशयो:-- तथा बाद का बीच का काल; अन्त:ः-- भीतर; य:--जो; काल: -- समयकी अवधि; शत-सड्ख्ययो: --सैकड़ों वर्ष; तम्‌ एब--वह अवधि; आहुः--कहते हैं; युगम्‌--युग; तत्‌-ज्ञाः--दक्ष ज्योतिर्विद;यत्र--जिसमें; धर्म:--धर्म; विधीयते--सम्पन्न किया जाता है।

प्रत्येक युग के पहले तथा बाद के सन्धिकाल, जो कि कुछ सौ वर्षो के होते हैं, जैसा किपहले उल्लेख किया जा चुका है, दक्ष ज्योतिर्विदों के अनुसार युग-सन्ध्या या दो युगों के सन्धिकाल कहलाते हैं।

इन अवधियों में सभी प्रकार के धार्मिक कार्य सम्पन्न किये जाते हैं।

धर्मश्चतुष्पान्मनुजान्कृते समनुवर्तते ।

स एवान्येष्वधर्मेण व्येति पादेन वर्धता ॥

२१॥

धर्म:--धर्म; चतु:-पात्‌--पूंरे चार विस्तार ( पाद ); मनुजान्‌ू--मानव जाति; कृते--सत्ययुग में; समनुवर्तते--ठीक से पालित;सः--वह; एव--निश्चय ही; अन्येषु--अन्यों में; अधर्मेण--अधर्म के प्रभाव से; व्येति--पतन को प्राप्त हुआ; पादेन--एकअंश से; वर्धता--धीरे धीरे वृद्धि करता हुआ।

हे विदुर, सत्ययुग में मानव जाति ने उचित तथा पूर्णरूप से धर्म के सिद्धान्तों का पालनकिया, किन्तु अन्य युगों में ज्यों ज्यों अधर्म प्रवेश पाता गया त्यों त्यों धर्म क्रमशः एक एक अंशघटता गया।

त्रिलोक्या युगसाहस्त्रं बहिरातब्रह्मणो दिनम्‌ ।

तावत्येव निशा तात यन्निमीलति विश्वसृक्‌ ॥

२२॥

त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों के; युग--चार युग; साहस्त्रमू--एक हजार; बहि:--बाहर; आब्रह्मण: --ब्रह्मलोक तक; दिनम्‌--दिन है; तावती--वैसा ही ( काल ); एव--निश्चय ही; निशा--रात है; तात--हे प्रिय; यत्‌--क्योंकि; निमीलति--सोने चलाजाता है; विश्व-सूक्‌ -- ब्रह्मा |

तीन लोकों ( स्वर्ग, मर्त्य तथा पाताल ) के बाहर चार युगों को एक हजार से गुणा करने सेब्रह्मा के लोक का एक दिन होता है।

ऐसी ही अवधि ब्रह्मा की रात होती है, जिसमें ब्रह्माण्ड कास्त्रष्टा सो जाता है।

निशावसान आरब्धो लोककल्पोऊनुवर्तते ।

यावहिनं भगवतो मनून्भुझलंश्चतुर्दश ॥

२३॥

निशा--रात; अवसाने--समाप्ति; आरब्ध: --प्रारम्भ करते हुए; लोक-कल्प:--तीन लोकों की फिर से उत्पत्ति; अनुवर्तते--पीछे पीछे आती है; यावत्‌--जब तक; दिनमू--दिन का समय; भगवतः -- भगवान्‌ ( ब्रह्मा ) का; मनून्‌ू--मनुओं; भुञ्ञनू--विद्यमान रहते हुए; चतुः:-दश--चौदह

ब्रह्मा की रात्रि के अन्त होने पर ब्रह्म के दिन के समय तीनों लोकों का पुनः सूजन प्रारम्भहोता है और वे एक के बाद एक लगातार चौदह मनुओं के जीवन काल तक विद्यमान रहते हैं।

स्वं स्वं काल॑ मनुर्भुड़े साधिकां होकसप्ततिम्‌ ॥

२४॥

स्वमू--अपना; स्वम्‌ू--तदनुसार; कालम्‌ू--जीवन की अवधि, आयु; मनु:--मनु; भुड्ढे --भोग करता है; स-अधिकाम्‌--कीअपेक्षा कुछ अधिक; हि--निश्चय ही; एक-सप्ततिम्‌--इकहत्तर।

प्रत्येक मनु चतुर्युगों के इकहत्तर से कुछ अधिक समूहों का जीवन भोग करता है।

मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वृंश्या ऋषय: सुरा: ।

भवन्ति चैव युगपत्सुरेशाश्वानु ये च तानू ॥

२५॥

मनु-अन्तरेषु--प्रत्येक मनु के अवसान के बाद; मनव:--अन्य मनु; ततू-बंश्या: --तथा उनके वंशज; ऋषय:--सात विख्यातऋषि; सुराः-- भगवान्‌ के भक्त; भवन्ति--उन्नति करते हैं; च एब--वे सभी भी; युगपत्‌--एक साथ; सुर-ईशा:--इन्द्र जैसेदेवता; च--तथा; अनु-- अनुयायी; ये--समस्त; च-- भी; तानू--उनको |

प्रत्येक मनु के अवसान के बाद क्रम से अगला मनु अपने वंशजों के साथ आता है, जोविभिन्न लोकों पर शासन करते हैं।

किन्तु सात विख्यात ऋषि तथा इन्द्र जैसे देवता एवं गन्धर्वजैसे उनके अनुयायी मनु के साथ साथ प्रकट होते हैं।

एष दैनन्दिनः सर्गो ब्राह्मस्त्रैलोक्यवर्तन: ।

तिर्यडनृपितृदेवानां सम्भवो यत्र कर्मभि: ॥

२६॥

एष:--ये सारी सृष्टियाँ; दैनम्‌-दिन:ः--प्रतिदिन; सर्ग:--सृष्टि; ब्राह्मः--ब्रह्मा के दिनों के रूप में; त्रैलोक्य-वर्तन:ः--तीनों लोकोंका चक्कर; तिर्यक्‌ू--मनुष्येतर पशु; नू--मनुष्य; पितृ--पितृलोक के; देवानामू--देवताओं के; सम्भव:--प्राकट्य; यत्र--जिसमें; कर्मभि:--सकाम कर्मो के चक्र में |

ब्रह्म के दिन के समय सृष्टि में तीनों लोक--स्वर्ग, मर्त्प तथा पाताल लोक--चक्कर लगाते हैंतथा मनुष्येतर पशु, मनुष्य, देवता तथा पितृगण समेत सारे निवासी अपने अपने सकाम कर्मों केअनुसार प्रकट तथा अप्रकट होते रहते हैं।

मन्वन्तरेषु भगवान्बिश्रत्सत्त्वं स्वमूर्तिभि: ।

मन्वादिभिरिदं विश्वमवत्युदितपौरुष: ॥

२७॥

मनु-अन्तरेषु-- प्रत्येक मनु-परिवर्तन में; भगवान्‌-- भगवान्‌; बिभ्रतू-- प्रकट करते हुए; सत्त्वम्‌--अपनी अन्तरंगा शक्ति; स्व-मूर्तिभिः--अपने विभिन्न अवतारों द्वारा; मनु-आदिभि:--मनुओं के रूप में; इदम्‌--यह; विश्वम्‌-ब्रह्माण्ड; अवति--पालनकरता है; उदित--खोजी; पौरुष:--दैवशक्तियाँ |

प्रत्येक मनु के बदलने के साथ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ विभिन्न अवतारों के रूप में यथा मनुइत्यादि के रूप में अपनी अन्तरंगा शक्ति प्रकट करते हुए अवतीर्ण होते हैं।

इस तरह प्राप्त हुईशक्ति से वे ब्रह्माण्ड का पालन करते हैं।

तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रम: ।

कालेनानुगताशेष आस्ते तृष्णीं दिनात्यये ॥

२८॥

तमः--तमोगुण या रात का अंधकार; मात्रामू--नगण्य अंशमात्र; उपादाय--स्वीकार करके; प्रतिसंरुद्ध-विक्रम: --अभिव्यक्तिकी सारी शक्ति को रोक करके; कालेन--नित्य काल के द्वारा; अनुगत--विलीन; अशेष: --असंख्य जीव; आस्ते--रहता है;तृष्णीम्‌ू--मौन; दिन-अत्यये--दिन का अन्त होने पर।

दिन का अन्त होने पर तमोगुण के नगण्य अंश के अन्तर्गत ब्रह्माण्ड की शक्तिशालीअभिव्यक्ति रात के आँधेरे में लीन हो जाती है।

नित्यकाल के प्रभाव से असंख्य जीव उस प्रलय मेंलीन रहते हैं और हर वस्तु मौन रहती है।

तमेवान्वषि धीयन्ते लोका भूरादयस्त्रय: ।

निशायामनुवृत्तायां निर्मुक्तशशिभास्करम्‌ ॥

२९॥

तम्‌--वह; एव--निश्चय ही; अनु--पीछे; अपि धीयन्ते--दृष्टि से लुप्त हो जाते हैं; लोका:--लोक; भू:-आदय:--तीनों लोक,भू:, भुवः तथा स्व: ; त्रय:--तीन; निशायाम्‌--रात में; अनुवृत्तायाम्‌--सामान्य; निर्मुक्त--बिना चमक दमक के; शशि--चन्द्रमा; भास्करम्‌ू--सूर्य |

जब ब्रह्मा की रात शुरू होती है, तो तीनों लोक दृष्टिगोचर नहीं होते और सूर्य तथा चन्द्रमातेज विहीन हो जाते हैं जिस तरह कि सामान्य रात के समय होता है।

त्रिलोक्यां दहामानायां शक्त्या सड्डूर्षणाग्निना ।

यान्त्यूष्मणा महलोंकाज्जनं भृग्वादयोउर्दिता: ॥

३०॥

त्रि-लोक्याम्‌--जब तीनों लोको के मंडल; दह्ममानायाम्‌--प्रज्वलित; शक्त्या--शक्ति के द्वारा; सड्डर्षण--संकर्षण के मुखसे; अग्निना--आग से; यान्ति--जाते हैं; ऊष्मणा--ताप से तपे हुए; महः-लोकात्‌ू--महलोंक से; जनमू--जनलोक; भृगु--भूगु मुनि; आदय: --इत्यादि; अर्दिता:--पीड़ित |

संकर्षण के मुख से निकलने वाली अग्नि के कारण प्रलय होता है और इस तरह भृगुइत्यादि महर्षि तथा महलॉक के अन्य निवासी उस प्रज्वलित अग्नि की उष्मा से, जो नीचे केतीनों लोकों में लगी रहती है, व्याकूुल होकर जनलोक को चले जाते हैं।

तावत्रिभुवनं सद्य: कल्पान्तैधितसिन्धव: ।

प्लावयन्त्युत्कतटाटोपचण्डवातेरितोर्मय: ॥

३१॥

तावतू--तब; त्रि-भुवनम्‌--तीनों लोक; सद्यः--उसके तुरन्त बाद; कल्प-अन्त--प्रलय के प्रारम्भ में; एधित--उमड़ कर;सिन्धव:--सारे समुद्र; प्लावयन्ति--बाढ़ से जलमग्न हो जाते हैं; उत्तट-- भीषण; आटोप--क्षोभ; चण्ड-- अंधड़; वात--हवाओं द्वारा; ईरित--बहाई गईं; ऊर्मय: --लहरें।

प्रलय के प्रारम्भ में सारे समुद्र उमड़ आते हैं और भीषण हवाएँ उग्र रूप से चलती हैं।

इसतरह समुद्र की लहरें भयावह बन जाती हैं और देखते ही देखते तीनों लोक जलमग्न हो जाते हैं।

अन्त: स तस्मिन्सलिल आस्तेनन्तासनो हरिः ।

योगनिद्रानिमीलाक्ष: स्तूयमानो जनालयै: ॥

३२॥

अन्तः--भीतर; सः--वह; तस्मिन्‌ू--उस; सलिले--जल में; आस्ते--है; अनन्त-- अनन्त के; आसन:--आसन पर; हरिः--भगवान्‌; योग--योग की; निद्रा--नींद; निमील-अक्ष:--बन्द आँखें; स्तूय-मान:--प्रकीर्तित; जन-आलयैः--जनलोक केनिवासियों द्वारा

परमेश्वर अर्थात्‌ भगवान्‌ हरि अपनी आँखें बन्द किए हुए अनन्त के आसन पर जल में लेटजाते हैं और जनलोक के निवासी हाथ जोड़ कर भगवान्‌ की महिमामयी स्तुतियाँ करते हैं।

एवंविधेरहोरात्रै: कालगत्योपलक्षितै: ।

अपक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयःशतम्‌ ॥

३३॥

एवम्‌--इस प्रकार; विधैः --विधि से; अह:--दिनों; रात्रै:--रात्रियों के द्वारा; काल-गत्या--काल की प्रगति; उपलक्षितैः --ऐसेलक्षणों द्वारा; अपक्षितम्‌--घटती हुई; इब--सहृश; अस्य--उसकी; अपि--यद्यपि; परम-आयु: -- आयु; वय: --वर्ष; शतम्‌--एक सौ

इस तरह ब्रह्माजी समेत प्रत्येक जीव के लिए आयु की अवधि के क्षय की विधि विद्यमानरहती है।

विभिन्न लोकों में काल के सन्दर्भ में हट किसी जीव की आयु केवल एक सौ वर्ष तकहोती है।

यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते ।

पूर्व: परार्धो उपक्रान्तो ह्ापरोडद्य प्रवर्तते ॥

३४॥

यतू--जो; अर्धम्‌--आधा; आयुष:--आयु का; तस्य--उसका; परार्धमू--एक परार्ध; अभिधीयते--कहलाता है; पूर्व:--पहलेवाला; पर-अर्ध:--आधी आयु; अपक्रान्तः--बीत जाने पर; हि--निश्चय ही; अपर:--बाद वाला; अद्य--इस युग में; प्रवर्तते --प्रारम्भ करेगा।

ब्रह्मा के जीवन के एक सौ वर्ष दो भागों में विभक्त हैं प्रथमार्थ तथा द्वितीयार्थ या परार्ध।

ब्रह्म के जीवन का प्रथमार्थ समाप्त हो चुका है और द्वितीयार्थ अब चल रहा है।

पूर्वस्यादौ परार्धस्य ब्राह्मो नाम महानभूत्‌ ।

कल्पो यत्राभवद्गह्मा शब्दब्रह्ेति यं विदु; ॥

३५॥

पूर्वस्य--प्रथमार्धथ के; आदौ--प्रारम्भ में; पर-अर्धस्य--द्वितीयार्थ का; ब्राह्मः--ब्राह्म-कल्प; नाम--नामक; महानू--महान्‌;अभूत्‌--प्रकट था; कल्प:--कल्प; यत्र--जहाँ; अभवत्‌-- प्रकट हुआ; ब्रह्मा --ब्रह्मा; शब्द-ब्रह्म इति--वेदों की ध्वनियाँ;यम्‌--जिसको; विदुः--वे जानते हैं।

ब्रह्मा के जीवन के प्रथमार्ध के प्रारम्भ में ब्राह्य-कल्प नामक कल्प था जिसमें ब्रह्माजी उत्पन्नहुए।

वेदों का जन्म ब्रह्मा के जन्म के साथ साथ हुआ।

तस्यैव चान्ते कल्पो भूद्यं पाद्ममभिचक्षते ।

यद्धरेनाभिसरस आसीललोकसरोरूहम्‌ ॥

३६॥

तस्य--ब्राह्म कल्प का; एब--निश्चय ही; च-- भी; अन्ते--के अन्त में; कल्प:--कल्प; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; यम्‌--जो;पाद्मम्‌--पाद्य; अभिचक्षते--कहलाता है; यत्‌--जिसमें; हरेः-- भगवान्‌ की; नाभि--नाभि में; सरसः--जलाशय से;आसीतू--था; लोक--ब्रह्माण्ड; सरोरूहम्‌ू--कमल।

प्रथम ब्राह्य-कल्प के बाद का कल्प पाद्य-कल्प कहलाता है, क्योंकि उस काल में विश्वरूपकमल का फूल भगवान्‌ हरि के नाभि रूपी जलाशय से प्रकट हुआ।

अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत ।

वाराह इति विख्यातो यत्रासीच्छूकरो हरि: ॥

३७॥

अयम्‌--यह; तु--लेकिन; कथित: --प्रसिद्ध; कल्प: --चालू कल्प; द्वितीयस्य--परार्थ का; अपि--निश्चय ही; भारत--हेभरतवंशी; वाराह:--वाराह; इति--इस प्रकार; विख्यात:--प्रसिद्ध है; यत्र--जिसमें; आसीत्‌-- प्रकट हुआ; शूकरः:--सूकरका रूप; हरिः-- भगवान्‌ |

है भरतवंशी, ब्रह्मा के जीवन के द्वितीयार्थ में प्रथम कल्प वाराह कल्प भी कहलाता है,क्योंकि उस कल्प में भगवान्‌ सूकर अवतार के रूप में प्रकट हुए थे।

कालोयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते ।

अव्याकृतस्यानन्तस्य हानादेज॑गदात्मन: ॥

३८ ॥

काल:--नित्य काल; अयम्‌--यह ( ब्रह्म की आयु की अवधि से मापा गया ); द्वि-परार्ध-आख्य:--ब्रह्मा के जीवन के दो अर्धोंसे मापा हुआ; निमेष:--एक क्षण से भी कम; उपचर्यते--इस तरह मापा जाता है; अव्याकृतस्य--अपरिवर्तित रहता है, जो,उसका; अनन्तस्थ--असीम का; हि--निश्चय ही; अनादे:-- आदि-रहित का; जगत्‌-आत्मन: --ब्रह्मण्ड की आत्मा का।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, ब्रह्म के जीवन के दो भागों की अवधि भगवान्‌ के लिएएक निमेष ( एक सेकेंड से भी कम ) के बराबर परिगणित की जाती है।

भगवान्‌ अपरिवर्तनीयतथा असीम हैं और ब्रह्माण्ड के समस्त कारणों के कारण हैं।

कालोयं परमाण्वादिद्विपरार्धानत ईश्वर: ।

नैवेशितु प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम्‌ ॥

३९॥

\'काल:ः--नित्य काल; अयम्‌--यह; परम-अणु--परमाणु; आदि: -- प्रारम्भ से; द्वि-परार्ध--काल की दो परम अवधियाँ;अन्त:ः--अन्त तक; ईश्वरः --नियन्ता; न--कभी नहीं; एव--निश्चय ही; ईशितुम्‌्--नियंत्रित करने के लिए; प्रभु:--समर्थ;भूम्न:--ब्रह्मा का; ईश्वर: --नियन्ता; धाम-मानिनाम्‌--उनका जो देह में अभिमान रखने वाले हैं।

नित्य काल निश्चय ही परमाणु से लेकर ब्रह्म की आयु के परार्धों तक के विभिन्न आयामोंका नियन्ता है, किन्तु तो भी इसका नियंत्रण सर्वशक्तिमान ( भगवान ) द्वारा होता है।

कालकेवल उनका नियंत्रण कर सकता है, जो सत्यलोक या ब्रह्माण्ड के अन्य उच्चतर लोकों तक मेंदेह में अभिमान करने वाले हैं।

विकारैः सहितो युक्तविशेषादिभिरावृतः ।

आण्डकोशो बहिरयं पञ्ञाशत्कोटिविस्तृत: ॥

४०॥

विकारैः--तत्त्वों के रूपान्तर द्वारा; सहित:--सहित; युक्तै:--इस प्रकार से मिश्रित; विशेष-- अभिव्यक्तियाँ; आदिभि:--उनकेद्वारा; आवृतः--प्रच्छन्न; आण्ड-कोश:--ब्रह्माण्ड; बहिः--बाहर; अयम्‌--यह; पश्चाशत्‌--पचास; कोटि--करोड़;विस्तृत:--विस्तीर्ण |

यह दृश्य भौतिक जगत चार अरब मील के व्यास तक फैला हुआ है, जिसमें आठ भौतिकतत्त्वों का मिश्रण है, जो सोलह अन्य कोटियों में, भीतर-बाहर निम्नवत्‌ रूपान्तरित हैं।

\दशोत्तराधिकैयंत्र प्रविष्ट: परमाणुव॒त्‌ ।

लक्ष्यतेन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो हाण्डराशय: ॥

४१॥

दश-उत्तर-अधिकै: --दस गुनी अधिक मोटाई वाली; यत्र--जिसमें; प्रविष्ट:--प्रविष्ट; परम-अणु-वत्‌--परमाणुओं की तरह;लक्ष्यते--( ब्रह्माण्डों का भार ) प्रतीत होता है; अन्तः-गताः--एकसाथ रहते हैं; च--तथा; अन्ये-- अन्य में; कोटिश:--संपुंजित; हि--क्योंकि; अण्ड-राशय: --ब्रह्माण्डों के विशाल संयोग |

ब्रह्माण्डों को ढके रखने वाले तत्त्वों की परतें पिछले वाली से दस गुनी अधिक मोटी होतीहैं और सारे ब्रह्माण्ड एकसाथ संपुंजित होकर परमाणुओं के विशाल संयोग जैसे प्रतीत होते हैं।

तदाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम्‌ ।

विष्णोर्धाम परं साक्षात्पुरुषस्य महात्मनः ॥

४२॥

तत्‌--वह; आहुः--कहा जाता है; अक्षरम्‌--अच्युत; ब्रह्म--परम; सर्व-कारण--समस्त कारणों का; कारणम्‌ू--परम कारण;विष्णो: धाम--विष्णु का आध्यात्मिक निवास; परमू--परम; साक्षात्‌--निस्सन्देह; पुरुषस्य--पुरुष अवतार का; महात्मन:--महाविष्णु का।

इसलिए भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त कारणों के आदि कारण कहलाते हैं।

इस प्रकार विष्णुका आध्यात्मिक धाम निस्सन्देह शाश्वत है और यह समस्त अभिव्यक्तियों के उद्गम महाविष्णुका भी धाम है।

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