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अध्याय एक: विदुर के प्रश्न

3.1श्रीशुक उबाचएवमेतत्पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान्किल ।

क्षत्रा वन॑ प्रविष्टेन त्यक्त्वा स्वगृहमृद्द्धिमत्‌ ॥ १॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; एतत्‌--यह; पुरा--पूर्व काल में; पृष्ठ: --पूछने पर;मैत्रेय: --मैत्रेय ऋषि ने कहा; भगवान्‌--अनुग्रहकारी; किल--निश्चय ही; क्षत्रा--विदुर द्वारा; बनम्‌ू--जंगल में; प्रविष्टन--प्रविष्ट हुए; त्यक्त्वा--त्याग कर; स्व-गृहम्‌--अपना घर; ऋद्धिमत्‌--समृद्ध

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपना समृद्ध घर त्याग कर जंगल में प्रवेश करके महान्‌ भक्तराजा विदुर ने अनुग्रहकारी मैत्रेय ऋषि से यह प्रश्न पूछा।

"

यद्वा अयं मन्त्रकृद्दो भगवानखिलेश्वर: ।

पौरवेन्द्रगृहं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम्‌ ॥

२॥

यत्‌--जो घर; बै--और क्या कहा जा सकता है; अयमू-- श्रीकृष्ण; मन्त्र-कृतू--मंत्री; व: --तुम लोग; भगवान्‌-- भगवान्‌;अखिल-ईश्वर:--सबके स्वामी; पौरवेन्द्र--दुर्योधन के; गृहम्‌ू--घर को; हित्वा--त्याग कर; प्रविवेश--प्रविष्ट हुए;आत्मसात्‌--अपना ही; कृतम्‌--स्वीकार किया हुआ।

पाण्डवों के रिहायशी मकान के विषय में और क्‍या कहा जा सकता है? सबों के स्वामीश्रीकृष्ण तुम लोगों के मंत्री बने।

वे उस घर में इस तरह प्रवेश करते थे मानो वह उन्हीं का अपनाघर हो और वे दुर्योधन के घर की ओर कोई ध्यान ही नहीं देते थे।

"

राजोबाचकुत्र क्षत्तुर्भगवता मैत्रेयेणास सड्रमः ।

कदा वा सह संवाद एतद्ठर्णय नः प्रभो ॥

३॥

राजा उवाच--राजा ने कहा; कुत्र--कहाँ; क्षत्तु:--विदुर के साथ; भगवता--तथा अनुग्रहकारी; मैत्रेयेण--मैत्रेय के साथ;आस-हुईं थी; सड़्म:--मिलन, भेंट; कदा--कब; वा--भी; सह--साथ; संवाद: --विचार-विमर्श; एतत्‌--यह; वर्णय--वर्णन कीजिये; न:ः--मुझसे; प्रभो-हे प्रभु

राजा ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा : सन्त विदुर तथा अनुग्रहकारी मैत्रेय मुनि के बीच कहाँऔर कब यह भेंट हुई तथा विचार-विमर्श हुआ ? हे प्रभु, कृपा करके यह कहकर मुझे कृतकृत्यकरें।

"

न हाल्पार्थोदयस्तस्य विदुरस्यामलात्मन: ।

तस्मिन्वरीयसि प्रश्न: साधुवादोपबूंहितः ॥

४॥

न--कभी नहीं; हि--निश्चय ही; अल्प-अर्थ--लघु ( महत्त्वहीन ) कार्य; उदय: --उठाया; तस्थ--उसका; विदुरस्य--विदुर का;अमल-आत्मन:--सन्‍्त पुरुष का; तस्मिन्‌ू--उसमें; वरीयसि-- अत्यन्त सार्थक; प्रश्न:-- प्रश्न; साधु-वाद--सन्‍्तों तथा ऋषियोंद्वारा अनुमोदित वस्तुएँ; उपबृंहित:--से पूर्ण |

सन्त विदुर भगवान्‌ के महान्‌ एवं शुद्ध भक्त थे, अतएव कृपालु ऋषि मैत्रेय से पूछे गयेउनके प्रश्न अत्यन्त सार्थक, उच्चस्तरीय तथा विद्वन्मण्डली द्वारा अनुमोदित रहे होंगे।

"

सूत उबाचस एवमृषिवर्यो यं पृष्टो राज्ञा परीक्षिता ।

प्रत्याह तं सुबहुवित्प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥

५॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; सः--वह; एवम्‌--इस प्रकार; ऋषि-वर्य: --महान्‌ ऋषि; अयम्‌--शुककदेवगोस्वामी; पृष्ट:--पूछे जाने पर; राज्ञा--राजा; परीक्षिता--महाराज परीक्षित द्वारा; प्रति--से; आह--कहा; तम्‌--उस राजा को;सु-बहु-वित्‌--अत्यन्त अनुभवी; प्रीत-आत्मा--पूर्ण तुष्ट; श्रूयताम्‌--कृपया सुनें; इति--इस प्रकार

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : महर्षि शुकदेव गोस्वामी अत्यन्त अनुभवी थे और राजा से प्रसन्नथे।

अतः राजा द्वारा प्रश्न किये जाने पर उन्होंने उससे कहा; कृपया इस विषय को ध्यान पूर्वक सुनें ।

श्रीशुक उबाचयदा तु राजा स्वसुतानसाधून्‌पुष्णन्न धर्मेण विनष्टदृष्टि: ।

क्रातुर्यविष्ठस्थ सुतान्विबन्धून्‌प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥

६॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; यदा--जब; तु--लेकिन; राजा--राजा धृतराष्ट्र; स्व-सुतान्‌--अपने पुत्रों को;असाधून्‌--बेईमान; पुष्णन्‌--पोषण करते हुए; न--कभी नहीं; धर्मेण--उचित मार्ग पर; विनष्ट-दृष्टि:--जिसकी अन्तःदृष्टि खोचुकी है; भ्रातु:--अपने भाई के; यविष्ठस्थ--छोटे, सुतान्‌; सुतान्‌--पुत्रों को; विबन्धूनू-- अनाथ; प्रवेश्य--प्रवेश करा कर;लाक्षा--लाख के; भवने--घर में; ददाह-- आग लगा दी

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : राजा धृतराष्ट्र अपने बेईमान पुत्रों का पालन-पोषण करनेकी अपवित्र इच्छाओं के वश में होकर अन्तर्दृष्टि खो चुका था और उसने अपने पितृविहीनभतीजों, पाण्डवों को जला डालने के लिए लाक्षागृह में आग लगा दी।

यदा सभायां कुरुदेवदेव्या:केशाभिमर्श सुतकर्म गह्म॑म्‌ ।

न वारयामास नृपः स्नुषाया:स्वास्ैहरन्त्या: कुचकुड्डू मानि ॥

७॥

यदा--जब; सभायाम्‌--सभा में; कुरू-देव-देव्या:--देवतुल्य युधिष्ठिर की पती द्रौपदी का; केश-अभिमर्शम्‌--उसके बालपकड़ने के अपमान; सुत-कर्म--अपने पुत्र द्वारा किया गया कार्य; गहाम्‌--निन्दनीय; न--नहीं; वारयाम्‌ आस--मना किया;नृप:--राजा; स्नुषाया: --अपनी पुत्रबधू के; स्वास्त्री:--उसके अश्रुओं से; हरन्त्या:-- धोती हुई; कुच-कुट्डु मानि--अपनेवक्षस्थल के कुंकुम को |

(इस ) राजा ने अपने पुत्र दुःशासन द्वारा देवतुल्य राजा युधिष्टिर की पत्नी द्रौपदी के बालखींचने के निन्दनीय कार्य के लिए मना नहीं किया, यद्यपि उसके अश्रुओं से उसके वक्षस्थल काकुंकुम तक धुल गया था।

झूते त्वधर्मेण जितस्य साधो:सत्यावलम्बस्य वनं गतस्य ।

न याचतोडदात्समयेन दायंतमोजुषाणो यदजातशत्रो; ॥

८॥

झूते--जुआ खेलकर; तु-- लेकिन; अधर्मेण--कुचाल से; जितस्थ--पराजित; साधो:--सन्‍्त पुरुष का; सत्य-अवलम्बस्य--जिसने सत्य को शरण बना लिया है; वनम्‌ू--जंगल; गतस्य-- जाने वाले का; न--कभी नहीं; याचत:--माँगे जाने पर;अदातू-दिया; समयेन--समय आने पर; दायम्‌ू--उचित भाग; तम:ः-जुषाण: --मोह से अभिभूत; यत्‌--जितना; अजात-शत्रो:--जिसके कोई शत्रु न हो, उसका।

युथ्ष्टिर, जो कि अजातशत्रु हैं, जुए में छलपूर्वक हरा दिये गये।

किन्तु सत्य का ब्रत लेने केकारण वे जंगल चले गये।

समय पूरा होने पर जब वे वापस आये और जब उन्होंने साम्राज्य काअपना उचित भाग वापस करने की याचना की तो मोहग्रस्त धृतराष्ट्र ने देने से इनकार कर दिया।

यदा च पार्थप्रहितः सभायांजगदगुरुर्यानि जगाद कृष्ण: ।

न तानि पुंसाममृतायनानिराजोरु मेने क्षतपुण्यलेश: ॥

९॥

यदा--जब; च-- भी; पार्थ-प्रहित: --अर्जुन द्वारा सलाह दिये जाने पर; सभायाम्‌--सभा में; जगत्‌-गुरु:--संसार के गुरु को;यानि--उन; जगाद--गया; कृष्ण: -- भगवान्‌ कृष्ण; न--कभी नहीं; तानि--शब्दों को; पुंसामू--सभी विवेकवान व्यक्तियोंके; अमृत-अयनानि--अमृत तुल्य; राजा--राजा ( धृतराष्ट्र या दुर्योधन ); उरुू--अत्यन्त महत्त्वपूर्ण; मेने--विचार किया; क्षत--क्षीण; पुण्य-लेश:--पुण्यकर्मों का अंश

अर्जुन ने श्रीकृष्ण को जगदगुरु के रूप में ( धृतराष्ट्र की ) सभा में भेजा था और यद्यपिउनके शब्द कुछेक व्यक्तियों ( यथा भीष्म ) द्वारा शुद्ध अमृत के रूप में सुने गये थे, किन्तु जोलोग पूर्वजन्म के पुण्यकर्मो के लेशमात्र से भी वंचित थे उन्हें वे वैसे नहीं लगे।

राजा ( धृतराष्ट्रया दुर्योधन ) ने कृष्ण के शब्दों को गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया।

यदोपहूतो भवन प्रविष्टोमन्त्राय पृष्टः किल पूर्वजेन ।

अथाह तन्मन्त्रदहशां वरीयान्‌यन्मन्त्रिणो वैदुरिकं वदन्ति ॥

१०॥

यदा--जब; उपहूत: --बुलाया गया; भवनम्‌--राजमहल में; प्रविष्ट:--प्रवेश किया; मन्त्राय--मंत्रणा के लिए; पृष्ट:--पूछे जानेपर; किल--निस्सन्देह; पूर्वजेन--बड़े भाई द्वारा; अथ--इस प्रकार; आह--कहा; तत्‌--वह; मन्त्र--उपदेश; दृशाम्‌--उपयुक्त;वरीयानू-- श्रेष्ठठम; यत्‌--जो; मन्त्रिण:--राज्य के मंत्री अथवा पटु राजनीतिज्ञ; बैदुरिकम्‌--विदुर द्वारा उपदेश; वदन्ति--कहतेहैं।

जब विदुर अपने ज्येष्ठ भ्राता ( धृतराष्ट्र ) द्वारा मंत्रणा के लिए बुलाये गये तो वे राजमहल मेंप्रविष्ट हुए और उन्होंने ऐसे उपदेश दिये जो उपयुक्त थे।

उनका उपदेश सर्वविदित है और राज्य केदक्ष मन्त्रियों द्वारा अनुमोदित है।

अजाततपत्रो: प्रतियच्छ दाय॑ तितिक्षतो दुर्विषह्ं तवाग: ।

सहानुजो यत्र वृकोदराहिःश्रसन्रुषा यत्त्वमलं बिभेषि ॥

११॥

अजात-शत्रो:--युधिष्ठिर का, जिसका कोई शत्रु नहीं है; प्रतियच्छ--लौटा दो; दायम्‌ू--उचित भाग; तितिक्षत:--सहिष्णु का;दुर्विषमम्‌--असहा; तव--तुम्हारा; आग: --अपराध; सह--सहित; अनुज: --छोटे भाइयों; यत्र--जिसमें; वृकोदर-- भीम;अहिः--बदला लेने वाला सर्प; श्रसन्‌--उच्छास भरा; रुषा--क्रोध में; यत्‌--जिससे; त्वम्‌ू--तुम; अलम्‌ू--निश्चय ही;बिभेषि--डरते हो |

[विदुर ने कहा तुम्हें चाहिए कि युधिष्ठिर को उसका न्‍्यायोचित भाग लौटा दो, क्योंकिउसका कोई शत्रु नहीं है और वह तुम्हारे अपराधों के कारण अकथनीय कष्ट सहन करता रहा है।

वह अपने छोटे भाइयों सहित प्रतीक्षारत है जिनमें से प्रतिशोध की भावना से पूर्ण भीम सर्प कीतरह उच्छास ले रहा है।

तुम निश्चय ही उससे भयभीत हो।

पार्थास्तु देवो भगवान्मुकुन्दोगृहीतवान्सक्षितिदेवदेव: ।

आस्ते स्वपुर्या यदुदेवदेवोविनिर्जिताशेषनूदेवदेव: ॥

१२॥

पार्थानू-पृथा ( कुन्ति ) के पुत्रों को; तु--लेकिन; देव:--प्रभु; भगवान्‌-- भगवान्‌ मुकुन्दः --मुक्तिदाता श्रीकृष्ण ने;गृहीतवान्‌--ग्रहण कर लिया है; स--सहित; क्षिति-देव-देव:--ब्राह्मण तथा देवता; आस्ते--उपस्थित है; स्व-पुर्यामू-- अपनेपरिवार सहित; यदु-देव-देव: --यदुवंश के राजकुल द्वारा पूजित; विनिर्जित--जीते हुए; अशेष---असीम; नृदेव--राजा;देवः--स्वामी।

भगवान्‌ कृष्ण ने पृथा के पुत्रों को अपना परिजन मान लिया है और संसार के सारे राजाश्रीकृष्ण के साथ हैं।

वे अपने घर में अपने समस्त पारिवारिक जनों, यदुकुल के राजाओं तथाराजकुमारों के साथ, जिन्होंने असंख्य शासकों को जीत लिया है, उपस्थित हैं और वे उन सबों केस्वामी हैं।

स एष दोष: पुरुषद्विडास्तेगृहान्प्रविष्टो यमपत्यमत्या ।

पुष्णासि कृष्णाद्विमुखो गतश्रीस्‌त्यजाश्रशैवं कुलकौशलाय ॥

१३॥

सः--वह; एष:--यह; दोष: --साक्षात्‌ अपराध; पुरुष-द्विट्‌ू-- श्रीकृष्ण का ईर्ष्यालु; आस्ते--विद्यमान है; गृहान्‌--घर में;प्रविष्ट: --प्रवेश किया हुआ; यम्‌--जिसको; अपत्य-मत्या--अपना पुत्र सोचकर; पुष्णासि--पालन कर रहे हो; कृष्णात्‌--कृष्ण से; विमुख:--विरुद्ध; गत-श्री:-- प्रत्येक शुभ वस्तु से विहीन; त्यज--त्याग दो; आशु--यथाशीघ्र; अशैवम्‌-- अशुभ;कुल--परिवार; कौशलाय-के हेतु

तुम साक्षात्‌ अपराध रूप दुर्योधन का पालन-पोषण अपने अच्युत पुत्र के रूप में कर रहे हो,किन्तु वह भगवान्‌ कृष्ण से ईर्ष्या करता है।

चूँकि तुम इस तरह से कृष्ण के अभक्त का पालनकर रहे हो, अतएवं तुम समस्त शुभ गुणों से विहीन हो।

तुम यथाशीघ्र इस दुर्भाग्य से छुटकारापा लो और सारे परिवार का कल्याण करो।

इत्यूचिवांस्तत्र सुयोधनेनप्रवृद्धकोपस्फुरिताधरेण ।

असत्कृतः सत्स्पृहणीयशीलःक्षत्ता सकर्णानुगसौबलेन ॥

१४॥

इति--इस प्रकार; ऊचिवान्‌--कहते हुए; तत्र--वहाँ; सुयोधनेन--दुर्योधन द्वारा; प्रवृद्ध--फूला हुआ; कोप--क्रो ध से;स्फुरित--फड़कते हुए; अधरेण--होठों से; असत्‌-कृत:--अपमानित; सत्‌--सम्मानित; स्पृहणीय-शील:--वांछित गुण;क्षत्ता--विदुर; स--सहित; कर्ण--कर्ण; अनुज--छोटे भाइयों; सौबलेन--शकुनि सहित |

विदुर जिनके चरित्र का सभी सम्मानित व्यक्ति आदर करते थे, जब इस तरह बोल रहे थे तोदुर्योधन द्वारा उनको अपमानित किया गया।

दर्योधन क्रोध के मारे फूला हुआ था और उसकेहोंठ फड़क रहे थे।

दुर्योधन कर्ण, अपने छोटे भाइयों तथा अपने मामा शकुनी के साथ था।

'क एनमत्रोपजुहाव जिहांदास्या: सुतं यद्वलिनैव पुष्ट: ।

तस्मिन्प्रतीप: परकृत्य आस्तेनिर्वास्यतामाशु पुराच्छुसान: ॥

१५॥

कः--कौन; एनम्‌--यह; अत्र--यहाँ; उपजुहाव--बुलाया; जिह्मम्‌--कुटिल; दास्या:--रखैल के; सुतम्‌--पुत्र को; यत्‌--जिसके; बलिना--भरण से; एव--निश्चय ही; पुष्ट:--बड़ा हुआ; तस्मिन्‌--उसको; प्रतीप:--शत्रुता; परकृत्य--शत्रु का हित;आस्ते--स्थित है; निर्वास्थताम्‌ू--बाहर निकालो; आशु--तुरन्त; पुरातू--महल से; श्रसान:--उसकी केवल साँस चलने दो।

इस रखैल के पुत्र को यहाँ आने के लिए किसने कहा है ? यह इतना कुटिल है कि जिनकेबल पर यह बड़ा हुआ है उन्हीं के विरुद्ध शत्रु-हित में गुप्तचरी करता है।

इसे तुरन्त इस महल सेनिकाल बाहर करो और इसकी केवल साँस भर चलने दो।

स्वयं धनुर्द्धारि निधाय मायांभ्रातुः पुरो मर्मसु ताडितोपि ।

स इत्थमत्युल्बणकर्णबाणै-गतव्यथोयादुरु मानयान: ॥

१६॥

स्वयम्‌--स्वयं; धनु: द्वारि--दरवाजे पर धनुष; निधाय--रखकर; मायाम्‌--माया, बाहरी प्रकृति को; भ्रातु:--भाई के; पुर: --राजमहल से; मर्मसु--अपने हृदय में; ताडित:--दुखी होकर; अपि-- भी; स:ः--वह ( विदुर ); इत्थम्‌--इस तरह; अति-उल्बण--अत्यंत कठोरता से; कर्ण--कान; बाणै:--तीरों से; गत-व्यथ:--दुखी हुए बिना; अयात्‌--उत्तेजित हुआ; उरू--अत्यधिक; मान-यान: --इस प्रकार विचारते हुए

इस तरह अपने कानों से होकर वाणों द्वारा बेधे गये और अपने हृदय के भीतर मर्माहत विदुरने अपना धनुष दरवाजे पर रख दिया और अपने भाई के महल को छोड़ दिया।

उन्हें कोई खेदनहीं था, क्‍योंकि वे माया के कार्यों को सर्वोपरि मानते थे।

स निर्गतः कौरवपुण्यलब्धोगजाह्नयात्तीर्थथदः पदानि ।

अन्वाक्रमत्पुण्यचिकीर्षयोव्याम्‌अधिष्ठितो यानि सहस्त्रमूर्ति: ॥

१७॥

सः--वह ( विदुर ); निर्गतः--छोड़ने के बाद; कौरव--कुरु वंश; पुण्य--पुण्य; लब्ध:--प्राप्त किया हुआ; गज-आह्॒यात्‌ --हस्तिनापुर से; तीर्थ-पद:ः-- भगवान्‌ की; पदानि--तीर्थयात्राओं की; अन्वाक्रमत्‌--शरण ली; पुण्य--पुण्य; चिकीर्षया--ऐसीइच्छा करते हुए; उर्व्यामू--उच्चकोटि की; अधिष्ठित:--स्थित; यानि--वे सभी; सहस्त्र--हजारों; मूर्ति: --स्वरूप |

अपने पुण्य के द्वारा विदुर ने पुण्यात्मा कौरवों के सारे लाभ प्राप्त किये।

उन्होंने हस्तिनापुरछोड़ने के बाद अनेक तीर्थस्थानों की शरण ग्रहण की जो कि भगवान्‌ के चरणकमल हैं।

उच्चकोटि का पवित्र जीवन पाने की इच्छा से उन्होंने उन पवित्र स्थानों की यात्रा की जहाँ भगवान्‌ के हजारों दिव्य रूप स्थित हैं।

सामान्य जनों को अपने पापों से निवारण करने की सुविधा प्राप्त हो तथा संसार में धर्म की स्थापना कीजा सके।

पुरेषु पुण्योपवनाद्रिकुझे-घ्वपड्डतोयेषु सरित्सरःसु ।

अनन्तलिड्डैः समलड्ड तेषुअचार तीर्थायतनेष्वनन्य: ॥

१८॥

पुरेषु--अयोध्या, द्वारका तथा मथुरा जैसे स्थानों में; पुण्य--पुण्य; उप-बन--वायु; अद्वि--पर्वत; कुझ्लेषु--बगीचों में;अपड्डू--पापरहित; तोयेषु--जल में; सरित्‌--नदी; सरःसु--झीलों में; अनन्त-लिड्रैः--अनन्त के रूपों; समलड्डू तेषु--इस तरहसे अलंकृत किये गये; चचार--सम्पन्न किया; तीर्थ--तीर्थस्थान; आयतनेषु--पवित्र भूमि; अनन्य:--एकमात्र या केवल कृष्णका दर्शन करना

वे एकमात्र कृष्ण का चिन्तन करते हुए अकेले ही विविध पवित्र स्थानों यथा अयोध्या,द्वारका तथा मथुरा से होते हुए यात्रा करने निकल पढ़े।

उन्होंने ऐसे स्थानों की यात्रा की जहाँ कीवायु, पर्वत, बगीचे, नदियाँ तथा झीलें शुद्ध तथा निष्पाप थीं और जहाँ अनन्त के विग्रह मन्दिरोंकी शोभा बढ़ाते हैं।

इस तरह उन्होंने तीर्थयात्रा की प्रगति सम्पन्न की।

गां पर्यटन्मेध्यविविक्तवृत्ति:सदाप्लुतोध: शयनोवधूत: ।

अलक्षितः स्वैरवधूतवेषोब्रतानि चेरे हरितोषणानि ॥

१९॥

गाम्‌--पृथ्वी पर; पर्यटन्‌ू-- भ्रमण करते; मेध्य--शुद्ध; विविक्त-वृत्तिः--जीने के लिए स्वतंत्र पेशा; सदा--सदैव; आप्लुत:--पवित्र किया गया; अध:--पृथ्वी पर; शयन:--लेटे हुए; अवधूत:--( बाल, नाखून इत्यादि ) बिना सँवारे या कटे );अलक्षित:--किसी के द्वारा बिना देखे हुए; स्वै:--अकेले; अवधूत-वेष:--साधू की तरह वेश धारण किये; ब्रतानि--ब्रत;चेरे--सम्पन्न किया; हरि-तोषणानि-- भगवान्‌ को प्रसन्न करने वाले।

इस तरह पृथ्वी का भ्रमण करते हुए उन्होंने भगवान्‌ हरि को प्रसन्न करने के लिए कृतकार्यकिये।

उनकी वृत्ति शुद्ध एवं स्वतंत्र थी।

वे पवित्र स्थानों में स्नान करके निरन्तर शुद्ध होते रहे,यद्यपि वे अवधूत वेश में थे--न तो उनके बाल सँवरे हुए थे न ही लेटने के लिए उनके पासबिस्तर था।

इस तरह वे अपने तमाम परिजनों से अलक्षित रहे।

इत्थं ब्रजन्भारतमेव वर्षकालेन यावद्गतवान्प्रभासम्‌ ।

तावच्छशास क्षितिमेक चक्रा-मेकातपत्रामजितेन पार्थ: ॥

२०॥

इत्थम्‌--इस तरह से; ब्रजन्‌--विचरण करते हुए; भारतम्‌-- भारत; एब--केवल ; वर्षम्‌-- भूखण्ड; कालेन--यथासमय;यावत्‌--जब; गतवान्‌--गया; प्रभासम्‌ू--प्रभास तीर्थस्थान; तावत्‌--तब; शशास--शासन किया; क्षितिमू--पृथ्वी पर; एक-चक्राम्‌--एक सैन्य बल से; एक--एक; आतपत्राम्‌-- ध्वजा; अजितेन-- अजित कृष्ण की कृपा से; पार्थ:--महाराजयुधिष्ठिर।

इस तरह जब वे भारतवर्ष की भूमि में समस्त तीर्थस्थलों का भ्रमण कर रहे थे तो वे प्रभासक्षेत्र गये।

उस समय महाराज युधिष्ठिर सम्राट थे और वे सारे जगत को एक सैन्य शक्ति तथा एकध्वजा के अन्तर्गत किये हुए थे।

तत्राथ शुश्राव सुहद्दिनष्टिंवनं यथा वेणुजवहिसंश्रयम्‌ ।

संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्‌सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम्‌ ॥

२१॥

तत्र--वहाँ; अथ--तत्पश्चात्‌; शुश्राव--सुना; सुहत्‌--प्रियजन; विनष्टिमू--मृत; वनम्‌ू--जंगल; यथा--जिस तरह; वेणुज-वहि--बाँस के कारण लगी अग्नि; संश्रयम्‌--एक दूसरे से घर्षण; संस्पर्थया--उग्र कामेच्छा द्वारा; दग्धम्‌--जला हुआ; अथ--इस प्रकार; अनुशोचन्‌--सोचते हुए; सरस्वतीम्‌ू--सरस्वती नदी को; प्रत्यक्‌ु-पश्चिम की ओर; इयाय--गया; तृष्णीम्‌--मौनहोकर।

प्रभास तीर्थ स्थान में उन्हें पता चला कि उनके सारे सम्बन्धी उग्र आवेश के कारण उसी तरहमारे जा चुके हैं जिस तरह बाँसों के घर्षण से उत्पन्न अग्नि सारे जंगल को जला देती है।

इसकेबाद वे पश्चिम की ओर बढ़ते गये जहाँ सरस्वती नदी बहती है।

तस्यां त्रितस्योशनसो मनोश्वपृथोरथाग्नेरसितस्य वायो: ।

तीर्थ सुदासस्य गवां गुहस्ययच्छाद्धदेवस्थ स आसिषेवे ॥

२२॥

तस्याम्‌--सरस्वती नदी के किनारे; त्रितस्थ--त्रित नामक तीर्थस्थल; उशनस:--उशना नामक तीर्थस्थल; मनो: च--मनु नामकतीर्थस्थल भी; पृथोः--पृथु के; अथ--तत्पश्चात्‌; अग्ने:-- अग्नि के; असितस्य--असित के; वायो: --वायु के ; तीर्थम्‌--तीर्थस्थान; सुदासस्य--सुदास नाम का; गवामू--गो नामक; गुहस्य--तथा गुह का; यत्‌--तत्पश्चात्‌; भ्राद्धदेवस्य-- श्राद्धदेवका; सः--विदुर ने; आसिषेवे--ठीक से देखा और कर्मकाण्ड किया।

सरस्वती नदी के तट पर ग्यारह तीर्थस्थल थे जिनके नाम हैं (१)बत्रित (२) उशना(३) मनु (४) पृथु (५) अग्नि (६) असित (७) वायु ( ८ ) सुदास ( ९ ) गो ( १० ) गुह तथा(११) श्राद्धदेव।

विदुर इन सबों में गये और ठीक से कर्मकाण्ड किये।

अन्यानि चेह द्विजदेवदेवै:कृतानि नानायतनानि विष्णो: ।

प्रत्यड्गमुख्याद्वितमन्दिराणियहर्शनात्कृष्णमनुस्मरन्ति ॥

२३॥

अन्यानि--अन्य; च--तथा; इह--यहाँ; द्विज-देव--महर्षियों द्वारा; देवै:--तथा देवताओं द्वारा; कृतानि-- स्थापित; नाना--विविध; आयतनानि--विविध रूप; विष्णो:-- भगवान्‌ के; प्रति--प्रत्येक; अड्ड--अंग; मुख्य--प्रमुख; अद्धित--चिन्हित;मन्दिराणि--मन्दिर; यत्‌--जिनके ; दर्शनात्‌--दूर से देखने से; कृष्णमम्‌--आदि भगवान्‌ को; अनुस्मरन्ति--निरन्तर स्मरणकराते हैं।

वहाँ महर्षियों तथा देवताओं द्वारा स्थापित किये गये पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णु केविविध रूपों से युक्त अनेक अन्य मन्दिर भी थे।

ये मन्दिर भगवान्‌ के प्रमुख प्रतीकों से अंकितथे और आदि भगवान्‌ श्रीकृष्ण का सदैव स्मरण कराने वाले थे।

ततस्त्वति्रज्य सुराष्ट्रमृद्धंसौवीरमस्सान्कुरुजाडूलांश्व ।

कालेन तावद्यमुनामुपेत्यतत्रोद्धवं भागवतं ददर्श ॥

२४॥

ततः--वहाँ से; तु--लेकिन; अतित्रज्य--पार करके; सुराष्ट्रमू--सूरत का राज्य; ऋद्धम्‌--अत्यन्त धनवान; सौवीर--सौवीर,साम्राज्य; मत्स्यानू--मस्स्य साम्राज्य; कुरुजाडुलान्‌--दिल्ली प्रान्त तक फैला पश्चिमी भारत का साम्राज्य; च-- भी; कालेन--यथासमय; तावत्‌--ज्योंही; यमुनाम्‌ू--यमुना नदी के किनारे; उपेत्य--पहुँच कर; तत्र--वहाँ; उद्धवम्‌--यदुओं में प्रमुख, उद्धवको; भागवतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण के भक्त; ददर्श--देखा |

तत्पश्चात्‌ वे अत्यन्त धनवान प्रान्तों यथा सूरत, सौवीर और मत्स्य से होकर तथा कुरुजांगलनाम से विख्यात पश्चिमी भारत से होकर गुजरे।

अन्त में वे यमुना के तट पर पहुँचे जहाँ उनकी" भेंट कृष्ण के महान्‌ भक्त उद्धव से हुई।

स वासुदेवानुचरं प्रशान्तंबृहस्पतेः प्राक्तनयं प्रतीतम्‌ ।

आलिड्ग्य गाढं प्रणयेन भद्रं स्वानामपृच्छद्धगवत्प्रजानामू ॥

२५॥

सः--वह, विदुर; वासुदेव--कृष्ण का; अनुचरम्‌--नित्य संगी; प्रशान्तम्‌--अत्यन्त शान्त एवं सौम्य; बृहस्पतेः--देवताओं केविद्वान गुरु बृहस्पति का; प्राक्‌ू-पूर्वकाल में; तनयम्‌--पुत्र या शिष्य; प्रतीतम्‌--स्वीकार किया; आलिड्ग्य--आलिगंनकरके; गाढमू--गहराई से; प्रणयेन--प्रेम में; भद्रमू--शुभ; स्वानाम्‌--निजी; अपृच्छत्‌ू--पूछा; भगवत्‌-- भगवान्‌ के;प्रजानामू--परिवार का।

तत्पश्चात्‌ अत्यधिक प्रेम तथा अनुभूति के कारण विदुर ने भगवान्‌ कृष्ण के नित्य संगी तथाबृहस्पति के पूर्व महान्‌ शिष्य उद्धव का आलिंगन किया।

तत्पश्चात्‌ विदुर ने भगवान्‌ कृष्ण केपरिवार का समाचार पूछा।

कच्चित्पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-पाद्मनुवृत्त्येह किलावतीर्णों ।

आसात उर्व्या: कुशलं विधायकृतक्षणौ कुशल शूरगेहे ॥

२६॥

कच्चित्‌ू--क्या; पुराणौ--आदि; पुरुषौ--दो भगवान्‌ ( कृष्ण तथा बलराम ); स्वनाभ्य--ब्रह्मा; पाद्म-अनुवृत्त्या--कमल सेउत्पन्न होने वाले के अनुरोध पर; इह--यहाँ; किल--निश्चय ही; अवतीर्णों--अवतरित; आसाते-- हैं; उर्व्या:--जगत में;कुशलम्‌--कुशल-क्षेम; विधाय--ऐसा करने के लिए; कृत-क्षणौ--हर एक की सम्पन्नता के उन्नायक; कुशलम्‌--सर्वमंगल;शूर-गेहे --शूरसेन के घर में |

कृपया मुझे बतलाएँ कि ( भगवान्‌ की नाभि से निकले कमल से उत्पन्न ) ब्रह्मा केअनुरोध पर अवतरित होने वाले दोनों आदि भगवान्‌, जिन्होंने हर व्यक्ति को ऊपर उठा कर सम्पन्नता में वृद्धि की है, शूरसेन के घर में ठीक से तो रह रहे हैं ?कच्चित्कुरूणां परमः सुहन्नोभाम:ः स आस्ते सुखमड़ शौरिः ।

कच्चित्कुरूणां परम: सुहतन्नो भाम: स आस्ते सुखमड़ शौरि: ।

यो वै स्वसृणां पितृवद्ददातिवरान्वदान्यो वरतर्पणेन ॥

२७॥

कच्चित्‌--क्या; कुरूणाम्‌--कुरूओं के; परम:--सबसे बड़े; सुहत्‌--शुभचिन्तक; न:--हमारा; भाम:--बहनोई; सः--वह;आस्ते--है; सुखम्‌--सुखी; अड्ड--हे उद्धव; शौरि:--वसुदेव; यः--जो; बै--निस्सन्देह; स्वसृणाम्‌--बहनों का; पितृ-वत्‌--पिता के समान; ददाति--देता है; वरानू-- इच्छित वस्तुएँ; वदान्य:--अत्यन्त उदार; वर--स्त्री; तर्पणेन--प्रसन्न करके

कृपया मुझे बताएँ कि कुरुओं के सबसे अच्छे मित्र हमारे बहनोई वसुदेव कुशलतापूर्वकतो हैं? वे अत्यन्त दयालु हैं।

वे अपनी बहनों के प्रति पिता के तुल्य हैं और अपनी पत्नियों केप्रति सदैव हँसमुख रहते हैं।

कच्चिद्वरूथाधिपतिर्यदूनांप्रद्यम्म आस्ते सुखमड़ वीर: ।

यं रुक्मिणी भगवतोभिलेभेआशध्य विप्रान्स्मरमादिसगें ॥

२८ ॥

'कच्चित्‌ू-- क्या; वरूथ--सेना का; अधिपति:--नायक; यदूनाम्‌ू--यदुओं का; प्रद्यम्न:--कृष्ण का पुत्र प्रद्मुम्न; आस्ते--है;सुखम्‌--सुखी; अड्ग--हे उद्धव; बवीर:--महान्‌ योद्धा; यम्‌--जिसको; रुक्मिणी--कृष्ण की पत्नी, रुक्मिणी ने; भगवतः--भगवान्‌ से; अभिलेभे--पुरस्कारस्वरूप प्राप्त किया; आराध्य--प्रसन्न करके ; विप्रानू--ब्राह्मणों को; स्मरम्‌--कामदेव; आदि-सर्गे--अपने पूर्व जन्म में |

हे उद्धव, मुझे बताओ कि यदुओं का सेनानायक प्रद्युम्न, जो पूर्वजन्म में कामदेव था, कैसाहै? रुक्मिणी ने ब्राह्मणों को प्रसन्न करके उनकी कृपा से भगवान्‌ कृष्ण से अपने पुत्र रुपमें उसेउत्पन्न किया था।

कच्चित्सुखं सात्वतवृष्णिभोज-दाशाईकाणामधिप: स आस्ते ।

यमशभ्यषिश्जञच्छतपत्रनेत्रोनृपासनाशां परिहत्य दूरातू ॥

२९॥

'कच्चित्‌-- क्या; सुखम्‌--सब कुशल मंगल है; सात्वत--सात्वत जाति; वृष्णि--वृष्णि वंश; भोज-- भोज वंश;दाशाहकाणाम्‌--दाशाई जाति; अधिप:--राजा उग्रसेन; सः--वह; आस्ते-- है; यमू--जिसको; अभ्यषिज्ञत्‌-- प्रतिष्ठित; शत-पत्र-नेत्र:-- श्रीकृष्ण ने; नृूप-आसन-आशाम्‌--राजसिंहासन की आशा; परिहत्य--त्याग कर; दूरातू-दूरस्थान पर |

हे मित्र, ( मुझे बताओ ) कया सात्वतों, वृष्णियों, भोजों तथा दाशाहों के राजा उग्रसेन अब कुशल-मंगल तो हैं? वे अपने राजसिंहासन की सारी आशाएँ त्यागकर अपने साम्राज्य से दूरचले गये थे, किन्तु भगवान्‌ कृष्ण ने पुनः उन्हें प्रतिष्ठित किया।

कच्चिद्धरेः सौम्य सुतः सदक्षआस्तेग्रणी रथिनां साधु साम्ब: ।

असूत यं जाम्बवती ब्रताढ्यादेवं गुहं योउम्बिकया धृतोग्रे ॥

३०॥

'कच्चित्‌--क्या; हरेः-- भगवान्‌ का; सौम्य--हे गम्भीर; सुत:--पुत्र; सहक्ष:--समान; आस्ते--ठीक से रह रहा है; अग्रणी: --अग्रगण्य; रथिनामू--योद्धाओं के; साधु--अच्छे आचरण वाला; साम्ब:--साम्ब; असूत--जन्म दिया; यम्‌--जिसको;जाम्बवती--कृष्ण की पत्नी जाम्बवती ने; ब्रताढ्या--्रतों से सम्पन्न; देवम्‌-देवता; गुहम्‌--कार्तिकेय नामक; यः--जिसको;अम्बिकया--शिव की पत्नी से; धृतः--उत्पन्न; अग्रे--पूर्व जन्म में |

हे भद्रपुरुष, साम्ब ठीक से तो है? वह भगवान्‌ के पुत्र सहृश ही है।

पूर्वजन्म में वह शिवकी पत्नी के गर्भ से कार्तिकिय के रूप में जन्मा था और अब वही कृष्ण की अत्यन्तसौभाग्यशालिनी पली जाम्बवती के गर्भ से उत्पन्न हुआ है।

क्षेमं स कच्चिद्युयुधान आस्तेयः फाल्गुनाल्‍लब्धधनूरहस्यः ।

लेभेञ्जसाधोक्षजसेवयैवगतिं तदीयां यतिभिर्दुरापाम्‌ ॥

३१॥

क्षेमम्‌--सर्वमंगल; सः--वह; कच्चित्‌--क्या; युयुधान: --सात्यकि; आस्ते--है; यः--जिसने; फाल्गुनात्‌ू-- अर्जुन से;लब्ध--प्राप्त किया है; धनु:-रहस्यः--सैन्यकला के भेदों का जानकार; लेभे--प्राप्त किया है; अज्ञसा-- भलीभाँति;अधोक्षज--ब्रह्म का; सेवया--सेवा से; एव--निश्चय ही; गतिम्‌--गन्तव्य; तदीयाम्‌--दिव्य; यतिभि:--बड़े-बड़े संन्यासियोंद्वारा; दुरापाम-- प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन

हे उद्धव, क्‍या युयुधान कुशल से? उसने अर्जुन से सैन्य कला की जटिलताएँ सीखीं औरउस दिव्य गन्तव्य को प्राप्त किया जिस तक बड़े-बड़े संन्‍यासी भी बहुत कठिनाई से पहुँच पातेहैं।

कच्चिद्दुध: स्वस्त्यनमीव आस्ते श्रफल्कपुत्रो भगवत्प्रपन्न: ।

यः कृष्णपादाड्डधितमार्गपांसु-घ्वचेष्टत प्रेमविभिन्नधेर्य: ॥

३२॥

कच्चित्‌-- क्या; बुध: --अत्यन्त विद्वान; स्वस्ति--ठीक से; अनमीव:--त्रुटिरहित; आस्ते--है; श्रफल्क-पुत्र:-- ध्रफल्क कापुत्र अक्रूर; भगवत्‌-- भगवान्‌ के; प्रपन्न:--शरणागत; य:--वह जो; कृष्ण-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण; पाद-अद्धित--चरण चिह्ढों सेशोभित; मार्ग--रास्ता; पांसुषु-- धूल में; अचेष्टत--प्रकट किया; प्रेम-विभिन्न--दिव्य प्रेम में निमग्न; धैर्य:--मानसिकसंतुलन

कृपया मुझे बताएँ कि श्रफल्क पुत्र अक्रूर ठीक से तो है? वह भगवान्‌ का शरणागत एकदोषरहित आत्मा है।

उसने एक बार दिव्य प्रेम-भाव में अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया थाऔर उस मार्ग की धूल में गिर पड़ा था जिसमें भगवान्‌ कृष्ण के पदचिन्ह अंकित थे।

कच्चिच्छिवं देवक भोजपुत्र्याविष्णुप्रजाया इव देवमातु: ।

या वै स्वगर्भेण दधार देवंज्रयी यथा यज्ञवितानमर्थम्‌ ॥

३३॥

कच्चित्‌ू--क्या; शिवम्‌--ठीकठाक; देवक-भोज-पुत्रया:--राजा देवक भोज की पुत्री का; विष्णु-प्रजाया:-- भगवान्‌ को जन्मदेने वाली; इब--सहृश; देव-मातुः--देवताओं की माता ( अदिति ) का; या--जो; बै--निस्सन्देह; स्व-गर्भेण-- अपने गर्भ से;दधार-- धारण किया; देवम्‌-- भगवान्‌ को; त्रयी--वेद; यथा--जितना कि; यज्ञ-वितानम्‌--यज्ञ के प्रसार का; अर्थम्‌--उद्देश्य |

जिस तरह सारे वेद याज्ञिक कार्यो के आगार हैं उसी तरह राजा देवक-भोज की पुत्री ने देवताओं की माता के ही सदृश भगवान्‌ को अपने गर्भ में धारण किया।

क्‍या वह ( देवकी )कुशल से है?

अपिस्विदास्ते भगवान्सुखं वोयः सात्वतां कामदुघोनिरुद्धः ।

यमामनन्ति सम हि शब्दयोनिंमनोमयं सत्त्वतुरीयतत्त्वम्‌ ॥

३४॥

अपि--भी; स्वित्‌ू-- क्या; आस्ते-- है; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; सुखम्‌-- समस्त सुख; व: --तुम्हारा; य:--जो; सात्वतामू-भक्तोंकी; काम-दुघ:--समस्त इच्छाओं का स्रोत; अनिरुद्ध:--स्वांश अनिरुद्ध; यम्‌ू--जिसको; आमनन्ति--स्वीकार करते हैं;स्म--प्राचीन काल से; हि--निश्चय ही; शब्द-योनिम्‌--ऋग्वेवेद का कारण; मनः-मयम्‌--मन का स्त्रष्टा; सत्तत--दिव्य;तुरीय--चौथा विस्तार; तत्त्वमू--तत्व, सिद्धान्त |

क्या मैं पूछ सकता हूँ कि अनिरुद्ध कुशलतापूर्वक है? वह शुद्ध भक्तों की समस्त इच्छाओंकी पूर्ति करने वाला है और प्राचीन काल से ऋग्वेद का कारण, मन का स्त्रष्टा तथा विष्णु काचौथा स्वांश माना जाता रहा है।

अपिस्विदन्ये च निजात्मदैव-श़मनन्यदृत्त्या समनुव्रता ये।

हृदीकसत्यात्मजचारुदेष्णगदादय: स्वस्ति चरन्ति सौम्य ॥

३५॥

अपि-भी; स्वित्‌-- क्या; अन्ये-- अन्य; च--तथा; निज-आत्म--अपने ही; दैवम्‌-- श्रीकृष्ण; अनन्य--पूर्णरूपेण; वृत्त्या--श्रद्धा; समनुब्रता:--अनुयायीगण; ये-- वे जो; हदीक--हृदीक; सत्य-आत्मज--सत्यभामा का पुत्र; चारुदेष्ण--चारुदेष्ण;गद--गद; आदय:--इत्यादि; स्वस्ति--कुशलतापूर्वक; चरन्ति--समय बताते हैं; सौम्य--हे भद्गःपुरुष |

हे भद्र पुरुष, अन्य लोग, यथा हदीक, चारुदेष्ण, गद तथा सत्यभामा का पुत्र जो श्रीकृष्णको अपनी आत्मा के रूप में मानते हैं और बिना किसी विचलन के उनके मार्ग का अनुसरणकरते हैं-ठीक से तो हैं ?

अपि स्वदोर्भ्या विजयाच्युताभ्यांधर्मेण धर्म: परिपाति सेतुम्‌ ।

दुर्योधनोउतप्यत यत्सभायांसाम्राज्यलक्ष्म्या विजयानुवृत्त्या ॥

३६॥

अपि- भी; स्व-दोर्भ्याम्‌-- अपनी भुजाएँ; विजय--अर्जुन; अच्युता-भ्याम्‌-- श्रीकृष्ण समेत; धर्मेण-- धर्म द्वारा; धर्म:--राजायुधिष्ठटि; परिपाति--पालनपोषण करता है; सेतुम्‌्-- धर्म का सम्मान; दुर्योधन: --दुर्योधन; अतप्यत--ईर्ष्या करता था; यत्‌--जिसका; सभायाम्‌--राज दरबार; साप्राज्य--राजसी; लक्ष्म्या--ऐश्वर्य; विजय-अनुवृत्त्या--अर्जुन की सेवा द्वारा

अब मैं पूछना चाहूँगा कि महाराज युधिष्टठिर धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार तथा धर्मपथ केप्रति सम्मान सहित राज्य का पालन-पोषण कर तो रहे हैं? पहले तो दुर्योधन ईर्ष्या से जलतारहता था, क्योंकि युथिष्ठिर कृष्ण तथा अर्जुन रूपी दो बाहुओं के द्वारा रक्षित रहते थे जैसे वेउनकी अपनी ही भुजाएँ हों।

किं वा कृताधेष्वघमत्यमर्षीभीमोहिवद्दीर्घतमं व्यमुझ्जत्‌ ।

यस्याड्प्रिपातं रणभूर्न सेहेमार्ग गदायाश्वरतो विचित्रम्‌ ॥

३७॥

किम्‌--क्या; वा--अथवा; कृत--सम्पन्न; अधेषु--पापियों के प्रति; अधम्‌ू--क्रुद्ध; अति-अमर्षी--अजेय; भीम: -- भीम;अहि-वत्‌-काले सर्प की भाँति; दीर्घ-तमम्‌--दीर्घ काल से; व्यमुञ्ञत्‌-विमुक्त किया; यस्य--जिसका; अड्ध्रि-पातम्‌--पदचाप; रण-भू:--युद्ध भूमि; न--नहीं; सेहे--सह सका; मार्गम्‌--मार्ग; गदाया: --गदाओं द्वारा; चरत:--चलाते हुए;विचित्रम्‌--विचित्र |

कृपया मुझे बताएँ क्‍या विषैले सर्प तुल्य एवं अजेय भीम ने पापियों पर अपनादीर्घकालीन क्रोध बाहर निकाल दिया है? गदा-चालन के उसके कौशल को रण-भूमि भीसहन नहीं कर सकती थी, जब वह उस पथ पर चल पड़ता था।

कच्चिद्यशोधा रथयूथपानांगाण्डीवधन्वोपरतारिरास्ते ।

अलक्षितो यच्छरकूटगूढोमायाकिरातो गिरिशस्तुतोष ॥

३८॥

कच्चित्‌--क्या; यश:-धा--विख्यात; रथ-यूथपानाम्‌--महान्‌ रथ्िियों के बीच; गाण्डीब--गाण्डीव; धन्व-- धनुष; उपरत-अरिः--जिसने शत्रुओं का विनाश कर दिया है; आस्ते--ठीक से है; अलक्षित:--बिना पहचाने हुए; यत्‌--जिसका; शर-कूट-गूढ:ः--बाणों से आच्छादित होकर; माया-किरात:--छद्ा शिकारी; गिरिश:ः --शिवजी; तुतोष--सन्तुष्ट हो गये थे

कृपया मुझे बताएँ कि अर्जुन, जिसके धनुष का नाम गाण्डीव है और जो अपने शत्रुओंका विनाश करने में रथ्िियों में सदैव विख्यात है, ठीक से तो है? एक बार उसने न पहचानेजानेवाले छद्य शिकारी के रूप में आये हुए शिवजी को बाणों की बौछार करके उन्हें तुष्ट किया" यमावुतस्वित्तनयौ पृथाया:पार्थवृतौ पक्ष्मभिरक्षिणीव ।

रेमात उद्दाय मृधे स्वरिक्थंपरात्सुपर्णाविव वज्िवक्त्रात्‌ ॥

३९॥

यमौ--जुड़वाँ ( नकुल तथा सहदेव ); उत्स्वित्‌--क्या; तनयौ--पुत्र; पृथाया: --पृथा के; पार्थै: --पृथा के पुत्रों द्वारा; वृतौ--संरक्षित; पक्ष्मभि:--पलकों द्वारा; अक्षिणी-- आँखों के; इब--सहृश; रेमाते-- असावधानीपूर्वक खेलते हुए; उद्याय--छीन कर;मृधे--युद्ध में; स्व-रिक्थम्‌--अपनी सम्पत्ति; परातू--शत्रु दुर्योधन से; सुपर्णौ--विष्णु का वाहन गरुड़; इब--सहश; बज्ि-वक्त्रात्‌ू-इन्द्र के मुख से।

क्या अपने भाइयों के संरक्षण में रह रहे जुड़वाँ भाई कुशल पूर्वक हैं? जिस तरह आँखपलक द्वारा सदैव सुरक्षित रहती है उसी तरह वे पृथा पुत्रों द्वारा संरक्षित हैं जिन्होंने अपने शत्रुदुर्योधन के हाथों से अपना न्यायसंगत साप्राज्य उसी तरह छीन लिया है, जिस तरह गरुड़ नेवजधारी इन्द्र के मुख से अमृत छीन लिया था।

अहो पृथापि धश्वियतेर्भकार्थेराजर्षिवर्येण विनापि तेन ।

यस्त्वेकवीरोधिरथो विजिग्येधनुद्वितीय: ककुभश्चतस्त्र: ॥

४०॥

अहो--ओह; पृथा--कुन्ती; अपि-- भी; प्चियते--अपना जीवन बिताती है; अर्भक-अर्थे--पितृविहीन बच्चों के निमित्त;राजर्षि--राजा पाए्डु; वर्येण --सर्वश्रेष्ठ; बिना अपि--बिना भी; तेन--उसके; यः--जो; तु--लेकिन; एक--अकेला; वीर: --योद्धा; अधिरथ:--सेनानायक; विजिग्ये--जीत सका; धनु:--धनुष; द्वितीय:--दूसरा; ककुभ:--दिशाएँ; चतस्त्र:--चारों |

हे स्वामी, क्या पृथा अब भी जीवित है? वह अपने पितृविहीन बालकों के निमित्त हीजीवित रही अन्यथा राजा पाण्डु के बिना उसका जीवित रह पाना असम्भव था, जो कि महानतमसेनानायक थे और जिन्होंने अकेले ही अपने दूसरे धनुष के बल पर चारों दिशाएँ जीत ली थीं।

सौम्यानुशोचे तमधः:पतन्तंभ्रात्रे परेताय विदुद्रहे यः ।

निर्यापितो येन सुहृत्स्वपुर्याअहं स्वपुत्रान्समनुत्रतेन ॥

४१॥

सौम्य--हे भद्गपुरुष; अनुशोचे--शोक करता हूँ; तम्‌--उसको; अधः-पतन्तम्‌--नीचे गिरते हुए; भ्रात्रे--अपने भाई पर;परेताय-- मृत्यु; विदुद्रहे--विद्रोह किया; यः--जिसने; निर्यापित:--भगा दिया गया; येन--जिसके द्वारा; सुहत्‌ू--शुभैषी; स्व-पुर्या:--अपने ही घर से; अहमू--मैं; स्व-पुत्रान्‌ू--अपने पुत्रों समेत; समनु-व्रतेन--वैसी ही कार्यवाही को स्वीकार करते हुए।

हे भद्गपुरुष, मैं तो एकमात्र उस ( धृतराष्ट्र) के लिए शोक कर रहा हूँ जिसने अपने भाई कीमृत्यु के बाद उसके प्रति विद्रोह किया।

उसका निष्ठावान हितैषी होते हुए भी उसके द्वारा मैं अपनेघर से निकाल दिया गया, क्‍योंकि उसने भी अपने पुत्रों के द्वारा अपनाए गये मार्ग का हीअनुसरण किया था।

सोहहं हरेर्मत्यविडम्बनेन इशो नृणां चालयतो विधातु: ।

नान्योपलक्ष्य: पदवीं प्रसादा-च्यरामि पश्यन्गतविस्मयोउत्र ॥

४२॥

सः अहम्‌--इसलिए मैं; हरेः -- भगवान्‌ का; मर्त्य--इस मर्त्यलोक में; विडम्बनेन--बिना जाने-पहचाने; हृशः--देखने पर;नृणाम्‌ू--सामान्य लोगों के; चालयत:--मोहग्रस्त; विधातु:--इसे करने के लिए; न--नहीं; अन्य--दूसरा; उपलक्ष्य: --दूसरोंद्वारा देखा गया; पदवीम्‌--महिमा; प्रसादात्‌--कृपा से; चरामि--घूमता हूँ; पश्यन्‌--देखते हुए; गत-विस्मय:--बिना संशयके; अत्र--इस मामले में |

अन्यों द्वारा अलक्षित रहकर विश्वभर में भ्रमण करने के बाद मुझे इस पर कोई आश्चर्य नहींहो रहा।

भगवान्‌ के कार्यकलाप जो इस मर्त्यलोक के मनुष्य जैसे हैं, अन्यों को मोहित करनेवाले हैं, किन्तु भगवान्‌ की कृपा से मैं उनकी महानता को जानता हूँ, अतएव मैं सभी प्रकार सेसुखी हूँ।

नूनं नृपाणां त्रिमदोत्पथानांमहीं मुहुश्नालयतां चमूभि: ।

वधात्प्रपन्नार्तिजिहीर्षयेशो -उप्युपैक्षताघं भगवान्कुरूणाम्‌ ॥

४३॥

नूनम्‌--निस्सन्देह; नृपाणामू-राजाओं के; त्रि--तीन; मद-उत्पथानाम्‌-मिथ्या गर्व से बहके हुए; महीम्‌--पृथ्वी को; मुहुः--निरन्तर; चालयतामू्‌--श्षुब्ध करते; चमूभि:--सैनिकों की गति से; वधात्‌--हत्या के कार्य से; प्रपन्न--शरणागत; आर्ति-जिहीर्षय--पीड़ितों के दुख को दूर करने के लिए इच्छुक; ईशः--भगवान्‌ ने; अपि--के बावजूद; उपैक्षत--प्रतीक्षा की;अधघम्‌--अपराध; भगवान्‌-- भगवान्‌; कुरूणाम्‌-कुरुओं के |

( कृष्ण ) भगवान्‌ होते हुए भी तथा पीड़ितों के दुख को सदैव दूर करने की इच्छा रखते हुएभी, वे कुरुओं का वध करने से अपने को बचाते रहे, यद्यपि वे देख रहे थे कि उन लोगों ने सभीप्रकार के पाप किये हैं और यह भी देख रहे थे कि, अन्य राजा तीन प्रकार के मिथ्या गर्व के वशमें होकर अपनी प्रबल सैन्य गतिविधियों से पृथ्वी को निरन्तर श्षुब्ध कर रहे हैं।

अजस्य जन्मोत्पधनाशनायकर्माण्यकर्तुग्रहणाय पुंसाम्‌ ।

नन्वन्यथा कोहति देहयोगंपरो गुणानामुत कर्मतन्त्रमू ॥

४४॥

अजस्य--अजन्मा का; जन्म--प्राकट्य; उत्पथ-नाशनाय--दुष्टों का विनाश करने के लिए; कर्माणि--कार्य ; अकर्तु:ः--निठल्लेका; ग्रहणाय--ग्रहण करने के लिए; पुंसाम्‌--सारे व्यक्तियों का; ननु अन्यथा--नहीं तो; कः--कौन; अर्हति--योग्य होसकता है; देह-योगम्‌--शरीर का सम्पर्क; पर: --दिव्य; गुणानाम्‌--तीन गुणों का; उत--क्या कहा जा सकता है; कर्म-तन्ब्रमू--कार्य-कारण का नियम।

भगवान्‌ का प्राकट्य दुष्टों का संहार करने के लिए होता है।

उनके कार्य दिव्य होते हैं औरसमस्त व्यक्तियों के समझने के लिए ही किये जाते हैं।

अन्यथा, समस्त भौतिक गुणों से परे रहनेवाले भगवान्‌ का इस पृथ्वी में आने का क्‍या प्रयोजन हो सकता है ?

तस्य प्रपन्नाखिललोकपाना-मवस्थितानामनुशासने स्वे ।

अर्थाय जातस्य यदुष्वजस्यवार्ता सखे कीर्तय तीर्थकीर्ते: ॥

४५॥

तस्य--उसका; प्रपन्न--शरणागत; अखिल-लोक-पानाम्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सारे शासकों के; अवस्थितानाम्‌--स्थित;अनुशासने--नियंत्रण में; स्वे--अपने; अर्थाय--स्वार्थ हेतु; जातस्थ--उत्पन्न होने वाले का; यदुषु--यदु कुल में; अजस्य--अजन्मा की; वार्तामू-कथाएँ; सखे--हे मित्र; कीर्तय--कहो; तीर्थ-कीर्ते: --तीर्थस्थानों में जिन के यश का कीर्तन होता है,उन भगवान्‌ का।

अतएव हे मित्र, उन भगवान्‌ की महिमा का कीर्तन करो जो तीर्थस्थानों में महिमामंडितकिये जाने के निमित्त हैं।

वे अजन्मा हैं फिर भी ब्रह्माण्ड के सभी भागों के शरणागत शासकों पर अपनी अहैतुकी कृपा द्वारा वे प्रकट होते हैं।

उन्हीं के हितार्थ वे अपने शुद्ध भक्त यदुओं केपरिवार में प्रकट हुए।

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