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अध्याय आठ: राजा परीक्षित के प्रश्न

2.8राजोवाचब्रह्मणा चोदितो ब्रह्मन्‌ गुणाख्यानेगुणस्थ च ।

यस्मै यस्मै यथाप्राह नारदो देव-दर्शनः ॥

१॥

राजा--राजा ने; उबाच--कहा; ब्रह्मणा-- ब्रह्माजी द्वारा; चोदित:--आदेशित होकर; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण ( शुकदेवगोस्वामी ); गुण-आख्याने--दिव्य गुणों के वर्णन में; अगुणस्थ--गुणरहित भगवान्‌ का; च--तथा; यस्मै यस्मै--तथाजिनको; यथा--जितना; प्राह--बतलाया; नारद:--नारद मुनि ने; देव-दर्शन:--वह, जिसका श्रोता देवता के समान उत्तम है।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा कि नारद मुनि ने, जिनके श्रोता श्रीब्रह्मा द्वाराउपदेशित भाग्यशाली श्रोता हैं, किस प्रकार निर्गुण भगवान्‌ के दिव्य गुणों का वर्णन किया औरवे किन-किन के समक्ष बोले ?

एतद्‌ वेदितुमिच्छामि तत्त्वं तत्त्त-विदां बर ।

हरेरद्भुत-वीर्यस्थ कथा लोक-सुमड्रला: ॥

२॥

एतत्‌--यह; वेदितुम्‌--जानने के लिए; इच्छामि--इच्छा करता हूँ; तत्त्वम्‌--सच्चाई; तत्त्व-विदामू--तत्त्वविदों का; वर--हेश्रेष्ठ; हरेः-- भगवान्‌ का; अद्भुत-वीर्यस्थ--अद्भुत शक्तिसम्पन्न की; कथा:--कथा; लोक--समस्त लोकों के लिए; सु-मड़ुला:--शुभ, कल्याणकर।

राजा ने कहा: मैं जानने का इच्छुक हूँ।

अद्भुत शक्तियों से सम्पन्न भगवान्‌ से सम्बन्धितकथाएँ निश्चय ही समस्त लोकों के प्राणियों के लिए शुभ हैं।

कथयस्व महाभाग यथाहमखिलात्मनि ।

कृष्णे निवेश्य नि:सड़ं मनस्त्यक्ष्ये कलेवरम्‌ ॥

३॥

कथयस्व--कृपया आगे कहें; महाभाग--हे परमभाग्यशाली; यथा--जिस प्रकार; अहम्‌--मैं; अखिल-आत्मनि--परमात्माको; कृष्णे-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण को; निवेश्य--स्थापित करके; निःसड़म्‌-- भौतिक गुणों से मुक्त होकर; मन: --मन; त्यक्ष्ये --परित्याग कर सकूँ; कलेवरम्‌--शरीर |

हे परम भाग्यशाली शुकदेव गोस्वामी, आप मुझे कृपा करके श्रीमद्भागवत सुनाते रहेंजिससे मैं अपना मन परमात्मा, भगवान्‌ श्रीकृष्ण में स्थिर कर सकूँ और इस प्रकार भौतिक गुणोंसे सर्वथा मुक्त होकर अपना यह शरीर त्याग सकूँ।

श्रुण्वत: श्रद्धया नित्यं गुणतश्च स्व-चेष्टितम्‌ ।

कालेन नातिदीर्घेण भगवान्‌ विशते हृदि ॥

४॥

श्रुण्वतः--सुनने वालों का; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; नित्यम्‌ू--नियमित रूप से सदैव; गृणत:-- ग्रहण करते हुए; च-- भी; स्व-चेष्टितम्‌ू--अपने प्रयास से गम्भीरतापूर्वक; कालेन--अवधि; न--नहीं; अति-दीर्घेण --अत्यन्त दीर्घकाल; भगवान्‌ --श्रीभगवान्‌; विशते-- प्रकट होते हैं; हदि--हृदय में

जो लोग नियमित रूप से श्रीमद्भागवत सुनते हैं और इसे अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक ग्रहणकरते हैं, उनके हृदय में अल्प समय में ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं।

प्रविष्ट: कर्ण-रन्श्रेण स्वानां भाव-सरोरुहम्‌ ।

धुनोति शमलं कृष्ण: सलिलस्य यथा शरत्‌ ॥

५॥

प्रविष्ट:--इस प्रकार प्रवेश करके ; कर्ण-रन्श्रेण --कान के छिठ्रों से; स्वानामू--अपनी मुक्त स्थिति के अनुसार; भाव--स्वाभाविक सम्बन्ध; सर:-रुहमू--कमल का फूल; धुनोति--निर्मल करता है; शमलम्‌--काम, क्रोध ईर्ष्या तथा गर्व जैसे गुणको; कृष्ण: --भगवान्‌ श्रीकृष्ण; सलिलस्थ--जलाशय का; यथा--जिस प्रकार; शरत्‌--शरद ऋतु।

परमात्मा रूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण का शब्दावतार ( अर्थात्‌ श्रीमद्भागवत ) स्वरूप-सिद्धभक्त के हृदय में प्रवेश करता है, उसके भावात्मक सम्बन्ध रूपी कमल-पुष्प पर आसीन होजाता है और इस प्रकार काम, क्रोध तथा लोभ जैसी भौतिक संगति की धूल को धो ड़ालता है।

इस प्रकार यह गँदले जल के तालाबों में शरद ऋतु की वर्षा के समान कार्य करता है।

धौतात्मा पुरुष: कृष्ण-पाद-मूलं न मुझ्नति ।

मुक्त -सर्व-परिक्लेश: पान्थ: स्व-शरणं यथा ॥

६॥

धौत-आत्मा--जिनके हृदय विमल हो चुके हैं; पुरुष:--जीव; कृष्ण-- श्रीभगवान्‌ के ; पाद-मूलम्‌--चरणकमल की शरण;न--नहीं; मुझ्नति--छोड़ता है; मुक्त--मुक्त; सर्व--समस्त; परिक्लेश:--जीवन के समस्त क्लेशों का; पान्थ:--पथिक; स्व-शरणम्‌--अपने धाम में; यथा--जिस प्रकार।

भगवान्‌ का शुद्ध भक्त, जिस का हृदय एक बार भक्ति के द्वारा स्वच्छ हो चुका होता है, वहश्रीकृष्ण के चरणकमलों का कभी भी परित्याग नहीं करता, क्योंकि उसे भगवान्‌ वैसी ही परमतुष्टि देते हैं, जैसी कि कष्टकारी यात्रा के पश्चात्‌ पथिक को अपने घर में प्राप्त होती है।

यदधातु-मतो ब्रह्मन्‌ देहारम्भोस्य धातुभि: ।

यहच्छया हेतुना वा भवन्तो जानते यथा ॥

७॥

यत्‌--क्योंकि; अधातु-मतः-- भौतिक रूप से निर्मित न होते हुए; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण; देह-- भौतिक शरीर; आरम्भ: --शुभारम्भ; अस्य--जीव का; धातुभि:--पदार्थ से; यहच्छया--अकारण, आकस्मिक; हेतुना--किसी कारण से; वा--अथवा;भवन्त:--आप; जानते--जैसा जानते हों; यथा--उसी रूप में मुझे बताएँ।

हे विद्वान ब्राह्मण, दिव्य आत्मा भौतिक देह से पृथक्‌ है।

तो फिर क्‍या उसे ( आत्मा को )किसी कारणवश या अकस्मात्‌ ही देह की प्राप्ति होती है? आपको यह ज्ञात है, अतः कृपाकरके मुझे समझाइये।

आसीद्‌ यदुदरात्‌ पद्यं लोक-संस्थान-लक्षणम्‌ ।

यावानयं वै पुरुष इयत्तावयवै: पृथक्‌ ।

तावानसाविति प्रोक्त: संस्थाववववानिव ॥

८॥

आसीतू--जिस प्रकार निकला; यत्‌-उदरात्‌--जिसके उदरसे; पढाम्‌--कमल का फूल; लोक--संसार; संस्थान--स्थिति;लक्षणम्‌--लक्षण; यावान्‌ू--जैसा था; अयम्‌ू--यह; बै--निश्चय ही; पुरुष: -- श्रीभगवान्‌; इयत्ता--माप; अवयवै:--अवयवोंसे; पृथक्‌--भिन्न; तावानू--वैसा; असौ--वह; इति प्रोक्त:--ऐसा कहा जाता है; संस्था--स्थिति; अवयववान्‌--अवयव सेयुक्त; इब--सहृश ।

यदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌, जिनके उदर से कमलनाल बाहर निकला है, अपने माप केअनुसार विराट शरीर धारण कर सकते हैं, तो फिर भगवान्‌ के शरीर तथा सामान्य जीवात्माओंके शरीर में कौन-सा विशेष अन्तर है ?

अज: सृजति भूतानि भूतात्मा यदनुग्रहात्‌ ।

दहशे येन तद्ूप॑ नाभि-पदा-समुद्धवः ॥

९॥

अजः--किसी भौतिक साधन के बिना जन्म लेने वाला; सृजति--सृष्टि करता है; भूतानि--जीवों को; भूत-आत्मा--पदार्थ सेबने शरीर वाले; यत्‌--जिसकी;; अनुग्रहात्‌--कृपा से; दहशे--देख सके; येन--जिसके द्वारा; तत्‌-रूपमू--उसके शरीर कास्वरूप; नाभि--नाभि से; पद्य--कमल का फूल; समुद्धवः--उत्पन्न |

ब्रह्मजी जो किसी भौतिक स्त्रोत से नहीं, अपितु भगवान्‌ की नाभि से प्रकट होने वालेकमल के फूल से उत्पन्न हुए है, वे उन सबके सत्रष्टा हैं, जो इस संसार में जन्म लेते हैं।

निस्सन्देहभगवत्कृपा से ही ब्रह्माजी भगवान्‌ के स्वरूप को देख सके।

स चापि यत्र पुरुषो विश्व-स्थित्युद्धवाप्यय: ।

मुक्त्वात्म-मायां मायेश: शेते सर्व-गुहाशय: ॥

१०॥

सः--वह; च-- भी; अपि--जैसाकि वह है; यत्र--जहाँ; पुरुष:-- भगवान्‌; विश्व--संसार; स्थिति--पालन; उद्धव--सृष्टि;अप्यय: --संहार; मुक्त्वा--बिना स्पर्श किये; आत्म-मायाम्‌--अपनी शक्ति; माया-ईश:--समस्त शक्तियों का स्वामी; शेते--शयन करता है; सर्व-गुहा-शयः--प्रत्येक हृदय में स्थित रहने वाला।

कृपया उन भगवान्‌ के विषय में भी बताएँ जो प्रत्येक हृदय में परमात्मा और समस्त शक्तियों के स्वामी के रूप में स्थित हैं, किन्तु जिनकी बहिरंगा शक्ति उनका स्पर्श तक नहीं कर पाती।

पुरुषावयवैलॉका: सपाला: पूर्व-कल्पिता: ।

लोकैरमुष्यावयवा: स-पालैरिति शुश्रुम ॥

११॥

पुरुष--विराट पुरुष; अवयवै:--शरीर के विभिन्न भागों से; लोकाः--समस्त लोक; स-पाला:--अपने-अपने पालकों सहित;पूर्व--पहले; कल्पिता:--विवेचित; लोकै: --विभिन्न लोकों द्वारा; अमुष्य--उसके ; अवयवा: --शरीर के विभिन्न अंग; स-पालै:--पालकों सहित; इति--इस प्रकार; शुश्रुम--मैंने सुना है।

हे विद्वान ब्राह्मण, इसके पूर्व व्याख्या की गई थी कि ब्रह्माण्ड के समस्त लोक अपने-अपनेलोकपालकों सहित विराट पुरुष के विराट शरीर के विभिन्न अंगों में ही स्थित हैं।

मैंने भी यहसुना है कि विभिन्न लोकमंडल विराट पुरुष के विराट शरीर में स्थित माने जाते हैं।

किन्तु उनकीवास्तविक स्थिति क्‍या है ? कृपा करके मुझे समझाइये।

यावान्‌ कल्पोविकल्पो वा यथा कालोनुमीयते ।

भूत-भव्य-भवच्छब्द आयुर्मानं च यत्‌ सत: ॥

१२॥

यावान्‌--जिस रूप में; कल्प:--सृष्टि तथा प्रलय के बीच की अवधि; विकल्प:--गौण सृष्टि तथा प्रलय; वा--अथवा; यथा--और भी; काल:--समय; अनुमीयते--मापा जाता है; भूत--विगत; भव्य-- भविष्य; भवत्‌--वर्तमान; शब्द: --शब्द; आयु:--जीवन अवधि, उप्र; मानम्‌--माप; च-- भी; यत्‌--जो; सतः--समस्त लोकों के जीवों का।

कृपा करके सृष्टि तथा प्रलय के मध्य की अवधि (कल्प ) तथा अन्य गौण सृष्टियों(विकल्प ) एवं भूत, वर्तमान तथा भविष्य शब्द से सूचित होने वाले काल के विषय में भी मुझेबताएँ।

साथ ही, ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों के विभिन्न जीवों यथा देवों, मनुष्यों इत्यादि कीआयु की अवधि के विषय में भी मुझे बताएँ।

कालस्यानुगतिर्या तु लक्ष्यतेण्वी बृहत्यपि ।

यावत्यः कर्म-गतयो याहशीद्वधिज-सत्तम ॥

१३॥

कालस्य--शाश्रवत काल का; अनुगति:--प्रारम्भ; या तु--वे जिस रूप में; लक्ष्यते--अनुभव किये जाते हैं; अण्बी--लघु;बृहती--विशाल; अपि-- भी; यावत्य:--जब तक; कर्म-गतय: --कर्म के अनुसार; याहशी:--जिस प्रकार की; द्विज-सत्तम--हे ब्राह्मणों में शुद्धतम |

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, कृपा करके मुझे काल की लघु तथा दीर्घ अवधियों एवं कर्म की प्रक्रिया केक्रम में काल के शुभारम्भ के विषय में भी बतलाएँ।

यस्मिन्‌ कर्म-समावायो यथा येनोपगृह्मते ।

गुणानां गुणिनां चैव परिणाममभीपष्सताम्‌ ॥

१४॥

यस्मिनू--जिसमें; कर्म--कर्म; समावाय:--संग्रह; यथा--जहाँ तक; येन-- जिससे; उपगृह्मते--ग्रहण करता है; गुणानाम्‌--विभिन्न गुणों का; गुणिनाम्‌ू--जीवों का; च--भी; एव--निश्चय ही; परिणामम्‌--बची हुई, शेष; अभीप्सताम्‌--आकांक्षाओंका

इसके आगे आप कृपा करके बताएँ कि किस प्रकार भौतिक प्रकृति के विभिन्न गुणों सेउत्पन्न फलों का आनुपातिक संचय इच्छा करनेवाले जीव पर अपना प्रभाव दिखाते हुए उसेविभिन्न योनियों में--देवताओं से लेकर अत्यन्त क्षुद्र प्राणियों तक को--ऊपर उठाता या नीचेगिराता है।

भू-पाताल-ककुब्व्योम-ग्रह-नक्षत्र-भूभूताम्‌ ।

सरित्समुद्र-द्वीपानां सम्भवश्लेतदोकसाम्‌ ॥

१५॥

भू-पाताल-- भूमि के नीचे; ककुप्‌--स्वर्ग की चारों दिशाएँ; व्योम--आकाश; ग्रह--लोक, ग्रह; नक्षत्र--तारे; भूभृताम्‌--पर्वतों का; सरित्‌ू--नदी; समुद्र--समुद्र; द्वीपानाम्‌--ट्वीपों की; सम्भव:--उत्पत्ति; च-- भी; एतत्‌--उनके; ओकसाम्‌--निवासियों का।

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, कृपा करके यह भी बताएँ कि ब्रह्माण्ड भर के गोलकों, स्वर्ग की चारोंदिशाओं, आकाश, ग्रहों, नक्षत्रों, पर्वतों, नदियों, समुद्रों तथा द्वीपों एवं इन सबके विविध प्रकारके निवासियों की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ?

प्रमाणमण्ड-कोशस्य बाह्या भ्यन्तर-भेदतः ।

महतां चानुचरितं वर्णाश्रम-विनिश्चयः ॥

१६॥

प्रमाणम्‌--विस्तार तथा माप; अण्ड-कोशस्य--ब्रह्मण्ड का; बाह्य --बाहरी अवकाश; अभ्यन्तर--आन्तरिक अवकाश;भेदतः--के विभाग में; महताम्‌--महापुरुषों का; च-- भी; अनुचरितम्‌--चरित्र तथा कार्य ; वर्ण--जातियाँ; आश्रम--जीवनके चार आश्रम; विनिश्चय: --विशेष रूप से वर्णन करें।

साथ ही कृपा करके ब्रह्माण्ड के बाहरी तथा भीतरी विशिष्ट विभागों, महापुरुषों के चरित्रतथा कार्यों और विभिन्न वर्णों एवं जीवन के चारों आश्रमों के वर्णीकरण का भी वर्णन करें।

युगानि युग-मानं च धर्मो यश्व युगे युगे।

अवतारानुचरितं यदाश्चर्यतमं हरे: ॥

१७॥

युगानि--विभिन्न युग; युग-मानम्‌-- प्रत्येक युग की अवधि; च--भी; धर्म:--विशिष्ट कार्य; यः च--तथा जो; युगे युगे--प्रत्येक युग में; अवतार--अवतार; अनुचरितम्‌--तथा अवतार के कार्य; यत्‌--जो; आश्चर्यतमम्‌--सर्वाधिक अद्भुत कार्य;हरेः--परमे श्वर का ।

कृपा करके सृष्टि के विभिन्न युगों तथा उन सबकी अवधियों का वर्णन कीजिये।

मुझेविभिन्न यूगों में भगवान्‌ के विभिन्न अवतारों के कार्य-कलापों के विषय में भी बताइये।

नृणां साधारणो धर्म: सविशेषश्च याहशः ।

श्रेणीनां राजर्षीणां च धर्म: कृच्छेषु जीवताम्‌ ॥

१८ ॥

नृणाम्‌--मानव समाज का; साधारण: --सामान्य; धर्म:--धार्मिक सम्पर्क-सूत्र; स-विशेष:ः --विशिष्ट; च-- भी; याहश:--वेजिस प्रकार से हैं; श्रेणीनामू--तीन वर्णो के; राजर्षीणाम्‌--राजर्षि का; च-- भी; धर्म:--धर्म; कृच्छेषु --दुखी अवस्था( विपत्ति ) में; जीवताम्‌--जीवों का |

कृपा करके यह भी बताइये कि मानव समाज के सामान्य धार्मिक सम्पर्क सूत्र क्या हों, धर्ममें उनके विशिष्ट कर्तव्य क्या हों, सामाजिक व्यवस्था तथा प्रशासकीय राजकीय व्यवस्था कावर्गीकरण तथा विपत्तिग्रस्त मनुष्य का धर्म क्‍या हो ?

तत्त्वानां परिसड्ख्यानं लक्षणं हेतु-लक्षणम्‌ ।

पुरुषाराधन-विधियोंगस्याध्यात्मिकस्थ च ॥

१९॥

तत्त्वानामू--सृष्टि को निर्मित करने वाले तत्त्वों की; परिसड्ख्यानम्‌-संख्या का; लक्षणम्‌--लक्षण; हेतु-लक्षणम्‌--कारणों केलक्षण; पुरुष-- भगवान्‌ के; आराधन-- भक्ति का; विधि: --विधि-विधान; योगस्य--योग पद्धति का; अध्यात्मिकस्य-- भक्तितक पहुँचाने वाली आध्यात्मिक विधियाँ; च--भी |

कृपा करके सृष्टि के तत्त्वमूलक सिद्धान्तों, इन सिद्धान्तों की संख्या, इनके कारणों तथाइनके विकास और इनके साथ-साथ भक्ति की विधि तथा योगशक्तियों की विधि के विषय मेंभी बताइये।

योगेश्वरैश्वर्य-गतिलिड्-भड़स्तु योगिनाम्‌ ।

वेदोपवेद-धर्माणामितिहास-पुराणयो: ॥

२०॥

योग-ईश्वर--योग शक्तियों के स्वामी का; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य; गति:--प्रगति; लिड्--सूक्ष्म शरीर; भड़:--विरक्ति; तु--लेकिन;योगिनाम्‌ू--योगियों का; वेद--दिव्य ज्ञान; उपवेद--वेदों का अप्रत्यक्ष ज्ञान; धर्माणाम्‌--धर्मशास्त्रों का; इतिहास--इतिहास;पुराणयो:--पुराणों का।

महान्‌ योगियों के ऐश्वर्य क्या हैं और उनकी परम गति क्या है? पूर्ण योगी किस प्रकार सूक्ष्मशरीर से विरक्त होता है? इतिहास की शाखाओं तथा पूरक पुराणों समेत वैदिक साहित्य कामूलभूत ज्ञान क्या है?

सम्प्लवः सर्व-भूतानां विक्रम: प्रतिसड्क्रम: ।

इष्टा-पूर्तस्य काम्यानां त्रि-वर्गस्थ च यो विधि: ॥

२१॥

सम्प्लव:--पूर्ण विनाश, सम्यक साधन; सर्व-भूतानाम्‌--समस्त जीवों का; विक्रम:--विशिष्ट शक्ति या स्थिति;प्रतिसड्क्रम:--चरम विनाश; इष्टा--वैदिक अनुष्ठानों का सम्पन्न किया जाना; पूर्तस्य-- धर्म के पवित्र कार्य; काम्यानामू--आर्थिक विकास के हेतु अनुष्ठान; त्रि-वर्गस्थ--धर्म, अर्थ तथा काम ये तीन साधन; च-- भी; यः--जो भी; विधि: --विधियाँ |

कृपा करके मुझे बताइये कि जीवों की उत्पत्ति, पालन और उनका संहार किस प्रकार होताहै? भगवान्‌ की भक्तिमय सेवा करने से जो लाभ तथा हानियाँ होती हैं, उन्हें भी समझाइये।

वैदिक अनुष्ठान तथा उपवैदिक धार्मिक कृत्यों के आदेश क्‍या हैं? धर्म, अर्थ तथा काम केसाधनों की विधियाँ क्‍या हैं?

यो वानुशायिनां सर्ग: पाषण्डस्य च सम्भव: ।

आत्मनो बन्ध-मोक्षौ च व्यवस्थानं स्व-रूपत: ॥

२२॥

यः--जो सब; वा--अथवा; अनुशायिनाम्‌-- भगवान्‌ के शरीर में समाहित; सर्ग:--सृष्टि; पाषण्डस्थय--पाखंडियों का; च--तथा; सम्भव:--प्राकट्यू; आत्मन:--जीवों का; बन्ध--बद्ध; मोक्षौ--मुक्त हुए; च-- भी; व्यवस्थानम्‌--स्थित हुए; स्व-रूपतः--मुक्त अवस्था में

कृपया यह भी समझाएँ कि भगवान्‌ के शरीर में समाहित जीव किस प्रकार उत्पन्न होते हैंऔर पाखंडीजन किस तरह इस संसार में प्रकट होते हैं? यह भी बताएँ कि किस प्रकार अबद्धजीवात्माएँ विद्यमान रहती हैं ?

यथात्म-तन्त्रो भगवान्‌ विक्रीडत्यात्म-मायया ।

विसूज्य वा यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्‌ विभु: ॥

२३॥

यथा--जिस तरह; आत्म-तनन्‍्त्र:--स्वतन्त्र; भगवान्‌-- श्रीभगवान्‌; विक्रीडति--लीला करते हैं; आत्म-मायया-- अपनी अन्तरंगाशक्ति से; विसृज्य--त्याग कर; वा-- भी; यथा--वे जिस प्रकार चाहते हैं; मायाम्‌--बहिरंगा शक्ति; उदास्ते--रहता है;साक्षिवत्‌--साक्षी की तरह; विभु:--सर्वशक्तिमान ।

स्वतन्त्र भगवान्‌ अपनी अन्तरंगा शक्ति से अपनी लीलाओं का आस्वादन करते हैं और प्रलयके समय वे इन्हें बहिरंगा शक्ति को प्रदान कर देते हैं और स्वयं साक्षी रूप में बने रहते हैं।

सर्वमेतच्च भगवन्‌ पृच्छतो मेउनुपूर्वश: ।

तत्त्वतो ईस्युदाहर्तु प्रपन्नाय महा-मुने ॥

२४॥

सर्वम्‌--ये सब; एतत्‌-- प्रश्न; च--न पूछ सकने के कारण भी; भगवनू्‌--हे ऋषि; पृच्छतः--जिज्ञासु का; मे--मैं स्वयं;अनुपूर्वश:--प्रारम्भ से; तत्त्वतः--सत्य के अनुसार; अहसि--कृपा करके बताएँ; उदाहर्तुमू--जैसे आप बताएँगे; प्रपन्नाय--घिरा हुआ; महा-मुने--हे ऋषि!।

हे भगवान्‌ के प्रतिनिधिस्वरूप महर्षि, आप मेरी उन समस्त जिज्ञासाओं को जिनके विषय मेंमैंने आपसे प्रश्न किये हैं तथा उनके विषय में भी जिन्हें मैं जिज्ञासा करने के प्रारंभ से प्रस्तुत नहींकर सका, उनके बारे में कृपाकरके जिज्ञासा शान्त कीजिये।

चूँकि मैं आपकी शरण में आया हूँ,अतः मुझे इस सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान प्रदान करें।

अत्र प्रमाणं हि भवान्‌ परमेष्ठी यथात्म-भू: ।

आपरे चानुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्व-जैः कृतम्‌ ॥

२५॥

अत्र--इस विषय में ; प्रमाणम्‌--प्रमाण; हि--निश्चय ही; भवान्‌--आप; परमेष्ठी --ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड का स्त्रष्टा यथा--जिसप्रकार; आत्म-भू:ः--सीधे भगवान्‌ से उत्पन्न; अपरे-- अन्य लोग; च--केवल; अनुतिष्ठन्ति--केवल अनुकरण करने के लिए;पूर्वेषाम्‌--प्रथानुसार; पूर्व-जैः--पूर्ववर्ती दार्शनिक द्वारा सुझाया ज्ञान; कृतम्‌--किया हुआ।

हे महर्षि, आप आदि प्राणी ब्रह्मा के तुल्य हैं।

अन्य लोग केवल प्रथा का पालन करते हैंजिस प्रकार पूर्ववर्ती दार्शनिक चिन्तक किया करते हैं।

न मेडसवः परायन्ति ब्रह्मच्ननशशनादमी ।

पिबतो<च युत-पीयूषम्‌ तद्‌ वाक्याब्धि-विनि:सृतम्‌ ॥

२६॥

न--कभी नहीं; मे--मेरा; असवः--प्राण; परायन्ति--निकल सकता है; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण; अनशनात्‌ अमी--अनशन( उपवास ) के कारण; पिबतः--पीने के कारण; अच्युत--न गिरने वाले; पीयूषम्‌--अमृत; तत्‌--तुम्हारे; वाक्य-अब्धि--वाणी रूपी सिन्धु से; विनिःसृतम्‌ू--निकलने वाला।

हे विद्वान ब्राह्मण, अच्युत भगवान्‌ की कथा के अमृत का, जो आपकी वाणी रूपी समुद्र सेबह रहा है, मेरे द्वारा पान करने से मुझे उपवास रखने के कारण किसी प्रकार की कमजोरी नहींलग रही।

सूत उवाचस उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पते: ।

ब्रह्मरातो भूशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥

२७॥

सूतः उबाच-- श्रील सूत गोस्वामी ने कहा; सः--वह ( शुकदेव गोस्वामी ); उपामन्त्रित:--इस प्रकार पूछे जाने पर; राज्ञा--राजाद्वारा; कथायामू--कथाओं में; इति--इस प्रकार; सत्‌-पते:--सर्वोच्च सत्य की; ब्रह्म-रात:--शुकदेव गोस्वामी; भूशम्‌--अत्यधिक; प्रीत:-- प्रसन्न; विष्णु-रातेन--महाराज परीक्षित द्वारा; संसदि--सभा में

सूत गोस्वामी ने कहा--महाराज पररीक्षित द्वारा भक्तों से संबंधित भगवान्‌ श्रीकृष्ण कीकथाएँ कहने के लिए आमन्त्रित किये जाने पर शुकदेव गोस्वामी अत्यधिक प्रसन्न हुए।

प्राह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्म-सम्मितम्‌ ।

ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्त ब्रह्य-कल्प उपागते ॥

२८॥

प्राह--कहा; भागवतम्‌--तत्त्वज्ञान; नाम--नामक; पुराणम्‌--उपवेद; ब्रह्म-सम्मितम्‌--वेदों के अनुकरण में; ब्रह्मणे --ब्रह्माजीसे; भगवत्‌-प्रोक्तम्‌-- भगवान्‌ द्वारा कही गईं; ब्रह्म-कल्पे--उस युग में जिसमें सर्वप्रथम ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई; उपागते--प्रारम्भमें ही |

उन्होंने महाराज परीक्षित के प्रश्नों का उत्तर देना यह कहकर प्रारम्भ किया कि इस तत्त्वज्ञान को सर्वप्रथम स्वयं भगवान्‌ ने ब्रह्म से उनके जन्म के समय कहा।

श्रीमद्भागवत उपवेद हैऔर वेदों का ही अनुकरण करता है।

यद्‌ यत्‌ परीक्षिदृषभ: पाण्डूनामनुपृच्छति ।

आनुपूर्व्येण तत्सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥

२९॥

यत्‌ यत्‌--जो जो; परीक्षित्‌--राजा; ऋषभ:-- श्रेष्ठ; पाण्डूनामू--पाण्डुवंश में; अनुपृच्छति--पूछते जाते; आनुपूर्व्येण --- आदिसे अन्त तक; तत्‌--वह सब; सर्वम्‌--पूर्णत:; आख्यातुम्‌--वर्णन करने के लिए; उपचक्रमे--अपने आपको तैयार किया।

उन्होंने अपने आपको राजा परीक्षित द्वारा जो कुछ पूछा गया था उसका उत्तर देने के लिएतैयार किया।

महाराज परीक्षित पाण्डुवंश में सर्वश्रेष्ठ थे, अत: वे उचित व्यक्ति से उचित प्रश्नपूछने में समर्थ हुए।

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