← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची
अध्याय सात: विशिष्ट कार्यों के साथ अनुसूचित अवतार
2.7ब्रह्मेवाचयत्रोद्यतः क्षिति-तलोद्धरणाय बिश्रत्क्रौडीं तनुं सकल-यज्ञ-मयीमनन्तः ।
अन्तर्महार्णव उपागतमादि-दैत्यंत॑ दंष्टयाद्रिमिव वज़ञ-धरो ददार ॥
१॥
ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; यत्र--उस समय ( जब ); उद्यत:ः--तत्पर; क्षिति-तल--पृथ्वीलोक के; उद्धरणाय--उठाने केलिए; बिभ्रतू-- धारण किया; क्रौडीम्--लीलाएँ; तनुमू--रूप; सकल--समग्र; यज्ञ-मयीम्--यज्ञों से युक्त; अनन्त:-- असीम;अन्तर्--ब्रह्मण्ड के भीतर; महा-अर्णवे--विशाल गर्भ सागर में; उपागतमू--पहुँचकर; आदि--प्रथम; दैत्यम्--असुर को;तम्--उस; दंष्टया--दाढ़ से; अद्विमू--उड़ते पर्वत; इब--सहश; बज्-धर:--वज़ों को धारण करने वाला; ददार--छेद दिया।
ब्रह्माजी ने कहा : जब अनन्त शक्तिशाली भगवान् ने लीला के रूप में ब्रह्माण्ड के गर्भोदकनामक महासागर में डूबी हुई पृथ्वी को ऊपर उठाने के लिए वराह का रूप धारण किया, तोसबसे पहले एक असुर ( हिरण्याक्ष ) प्रकट हुआ।
भगवान् ने उसे अपने अगले दाँत से विदीर्णकर दिया।
जातो रुचेरजनयत् सुयमान् सुयज्ञआकृति-सूनुरमरानथ दक्षिणायाम् ।
लोक-त्रयस्य महतीमहरद् यदार्तिस्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्त: ॥
२॥
जातः--उत्पन्न हुआ; रुचे:--प्रजापति की पत्नी के; अजनयतू्--जन्म हुआ; सुयमान्--सुयम इत्यादि; सुयज्ञ:--सुयज्ञ;आकूति-सूनु:--आकूति का पुत्र; अमरानू--देवता; अथ--इस प्रकार; दक्षिणायाम्--दक्षिणा नामक पत्नी से; लोक--लोक;त्रयस्य--तीनों का; महतीम्--अति विशाल; अहरत्--कम किया; यत्--वे सब; आर्तिम्--क्लेश; स्वायम्भुवेन--स्वायं भुवमनु द्वारा; मनुना--मनुष्यों के पिता द्वारा; हरिः--हरि; इति--इस प्रकार; अनूक्त:--नाम रखा।
सर्वप्रथम प्रजापति की पत्नी आकूति के गर्भ से सुयज्ञ उत्पन्न हुआ; फिर सुयज्ञ ने अपनी पत्नीदक्षिणा से सुयम इत्यादि देवताओं को उत्पन्न किया।
सुयज्ञ ने इन्द्रदेव के रूप में तीनों लोकों केमहान् क्लेश कम कर दिए थे, फलतः मानवमात्र के परम पिता स्वायंभुव मनु ने उसे हरि नाम सेपुकारा।
जज्ञे च कर्दम-गृहे द्विज देवहूत्यांस्त्रीभि: सम॑ नवभिरात्म-गतिं स्व-मात्रे ।
ऊचे ययात्म-शमलं गुण-सड़-पड़ू-मस्मिन् विधूय कपिलस्य गति प्रपेदे ॥
३॥
जज्ञे--जन्म लिया; च--भी; कर्दम--कर्दम नामक प्रजापति के; गृहे--घर में; द्विज--हे ब्राह्मण; देवहूत्याम्--देवहूति के गर्भमें; स्रीभि: --स्त्रियों द्वारा; समम्--के साथ में; नवभि:--नौ; आत्म-गतिम्--आत्मबोध; स्व-मात्रे-- अपनी माता से; ऊचे--कहा; यया--जिससे; आत्म-शमलमू--आत्मा का आवरण; गुण-सड्र--गुणों के साथ; पड्ढडम्--कीचड़; अस्मिन्ू--इस जीवनमें; विधूय-- धुल कर; कपिलस्य-- भगवान् कपिल की; गतिम्--मुक्ति; प्रपेदे--प्राप्त किया ।
इसके पश्चात् भगवान् कपिल रूप में अवतरित हुए और प्रजापति ब्राह्मण कर्दम तथा उनकीपतली देवहूति के पुत्र रूप में अन्य नौ स्त्रियों ( बहनों ) के साथ जन्म लिया।
उन्होंने अपनी माता को आत्म-साक्षात्कार के विषय में शिक्षा दी, जिससे वे उसी जीवन काल में सांसारिक गुणरूपी कीचड़ से विमल हो गईं और उन्होंने मुक्ति प्राप्तकी जो कपिल का मार्ग है।
अत्रेरपत्यमभिकाडक्षत आह तुष्टोदत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्त: ।
यत्पाद-पड्डज-पराग-पवित्र-देहायोगर्टिद्रमापुरुभयीं यदु-हैहयाद्या: ॥
४॥
अत्रेः --अत्रि मुनि की; अपत्यमू--सन्तान; अभिकाड्क्षत:ः -- आकांक्षा करते हुए; आह--यह कहा; तुष्ट: --प्रसन्न; दत्त:--दियागया; मया--मेरे द्वारा; अहम्ू--अपने आपको; इति--इस प्रकार; यत्--क्योंकि; भगवान्ू-- श्रीभगवान्; सः --वह; दत्त: --दत्तात्रेय; यत्-पाद--जिसके पाँव; पड्डुज--कमल; पराग--धूलि; पवित्र--पवित्र; देहा:--शरीर; योग--योग की; ऋद्धिम्--ऐश्वर्य; आपु:--प्राप्त किया; उभयीम्--दोनों लोकों के लिए; यदु--यदुबंश के पिता; हैहय-आद्या:--राजा हैहय इत्यादि।
अत्रि मुनि ने भगवान् से सन््तान के लिए प्रार्थना की और उन्होंने प्रसन्न होकर स्वयं ही अन्रिके पुत्र दत्तात्रेय ( दत्त, अत्रि का पुत्र ) के रूप में अवतार ग्रहण करने का वचन दिया।
औरभगवान् के चरणकमलों की कृपा से अनेक यदु, हैहय इत्यादि पवित्र हुए और उन्होंने भौतिकतथा आध्यात्मिक दोनों ही वर प्राप्त किये।
तप्तं तपो विविध-लोक-सिसृक्षया मेआदी सनात् स्व-तपस: स चतु:-सनोभूत् ।
प्राक्कल्प-सम्प्लव-विनष्टमिहात्म-तत्त्वंसम्यग् जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥
५॥
तप्तम्--तपस्या करके; तप: --तपस्या; विविध-लोक--विभिन्न लोक; सिसृक्षया--सृष्टि करने की इच्छा से; मे--मेरा;आदौ--सर्वप्रथम; सनात्-- श्री भगवान् से; स्व-तपसः --अपनी तपस्या के बल से; सः--वह ( भगवान् ); चतु:ः-सन:--चारोंकुमार जिनके नाम हैं, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन तथा सनातन; अभूत्--प्रकट हुए; प्राकू--पूर्व; कल्प--सृष्टि; सम्प्लव--बाढ़ में; विनष्टम्--नष्ट; इह--इस संसार में; आत्म--आत्मा; तत्त्वमू--सत्य; सम्यक् -- पूर्णतः; जगाद-- प्रकट हुआ; मुनयः--मुनिगण; यत्--जिन्होंने; अचक्षत--स्पष्ट देखा; आत्मन्--आत्मा ।
विभिन्न लोकों की उत्पत्ति करने के लिए मुझे तपस्या करनी पड़ी और तब भगवान् ने मुझसेप्रसन्न होकर चारों कुमारों ( सनक, सनत्कुमार, सनन्दन तथा सनातन ) के रूप में अवतार लिया।
पिछली सृष्टि में आध्यात्मिक सत्य ( आत्मज्ञान ) का विनाश हो चुका था, किन्तु इन चारों कुमारोंने इतने स्पष्ट ढंग से उसकी व्याख्या की कि मुनियों को तुरन्त सत्य का साक्षात्कार हो गया।
धर्मस्य दक्ष-दुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यानारायणो नर इति स्व-तपः-प्रभाव: ।
इृष्ठात्मनो भगवतो नियमावलोप॑देव्यस्त्वनड्र-पृतना घटितुं न शेकु: ॥
६॥
धर्मस्य--धर्म की; दक्ष--दक्ष प्रजापति; दुहितरि--पुत्री से; अजनिष्ट--जन्म लिया; मूर्त्याम्--मूर्ति नाम की; नारायण: --नारायण; नर:--नर; इति--इस प्रकार; स्व-तप:--अपनी तपस्या की; प्रभाव:--शक्ति; दृष्टा--देखकर; आत्मन:--अपना;भगवतः -- श्रीभगवान् का; नियम-अवलोपम्--ब्रत को भंग करके; देव्य:--नैसर्गिक सुन्दरियाँ; तु--लेकिन; अनड्भ-पृतना:--कामदेव के सखा; घटितुम्--होने के लिए; न--कभी नहीं; शेकुः--सम्भव हो सका
उन्होंने अपनी तपस्या की विधि प्रदर्शित करने के लिए धर्म की पत्नी तथा दक्ष की पुत्री मूर्तिके गर्भ से नर तथा नारायण युगल-रूपों में जन्म लिया।
कामदेव की सखियाँ, स्वर्ग कीसुन्दरियाँ, उनका ब्रत भंग करने आईं, किन्तु वे असफल रहीं, क्योंकि उन्हें भगवान् के शरीर सेअपने समान अनेक सुन्दरियाँ उत्पन्न होती दिखाई पड़ीं।
काम दहन्ति कृतिनो ननु रोष-दृष्टयारोषं दहन्तमुत ते न दहन्त्यसह्मम् ।
सोयं यदन्तरमलं प्रविशन् बिभेतिकाम: कर्थ नु पुनरस्य मन: श्रयेत ॥
७॥
'कामम्--वासना; दहन्ति--दण्ड देते हैं; कृतिन:--बड़े-बड़े अग्रणी; ननु--लेकिन; रोष-हृष्य्या--क्रोधपूर्ण चितवन से;रोषम्-क्रोध; दहन्तम्-- अभिभूत; उत--यद्यपि; ते--वे; न--नहीं; दहन्ति--वश में करते हैं; असहाम्--दुःसह; सः--वह;अयम्--उसको; यत्-- क्योंकि; अन्तरम्ू-- भीतर; अलमू--फिर भी; प्रविशन्-- भीतर जाकर; बिभेति-- भयभीत होता है;काम:--वासना से; कथम्-कैसे; नु--वस्तुतः; पुनः--फिर; अस्य--उसका; मनः--मन; श्रयेत--शरण ग्रहण करता है।
शिव जैसे महापुरुष अपनी रोषपूर्ण चितवन से वासना ( काम ) को जीतकर उसे दण्डित तोकर सकते हैं, किन्तु वे स्वयं अपने क्रोध के अत्यधिक प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकते।
ऐसा क्रोधकभी भी उनके ( भगवान् के ) हृदय में प्रवेश नहीं पाता, क्योंकि वे इससे ऊपर हैं।
तो फिर भलाउनके मन में वासना को आश्रय कैसे प्राप्त हो सकता है?
विद्धः सपत्युदित-पत्रिभिरन्ति राज्ञोबालोपि सन्नुपगतस्तपसे वनानि ।
तस्मा अदाद् श्रुव-गतिं गृणते प्रसन्नोदिव्या: स्तुबन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥
८॥
विद्ध:--बिंध कर; सपत्नि--सौतेली माता; उदित--कहे गये; पत्रिभिः--तीखे वचनों से; अन्ति--समक्ष; राज्ञ:--राजा के;बाल:--बालक; अपि--यद्यपि; सन्--ऐसा होते हुए; उपगत: --ग्रहण कर लिया; तपसे--कठोर तपस्या; वनानि--वन में;तस्मै--अतः; अदातू--पुरस्कार रूप में दिया; श्रुव-गतिम्ू-- ध्रुवलोक का मार्ग; गृणते-- प्रार्थना किये जाने पर; प्रसन्न:ः--प्रसन्नहोकर; दिव्या: --उच्चलोक के वासी; स्तुवन्ति--प्रार्थना करते हैं; मुन॒यः--बड़े-बड़े साधु; यत्--जिससे; उपरि--ऊपर;अधस्तात्ू--नीचे
राजा की उपस्थिति में सौतली माता के कटु बचनों से अपमानित होकर राजकुमार श्रुव,बालक होते हुए भी, वन में कठिन तपस्या करने लगे और भगवान् ने उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्हें धुवलोक प्रदान किया जिसकी पूजा ऊपर तथा नीचे के लोकों के सभी मुनि करतेहैं।
यद्वेनमुत्पथ-गतं द्विज-वाक्य-वज्ञ--निष्प्लुष्ट-पौरुष-भगं निरये पतन्तम् ।
त्रात्वार्थितो जगति पुत्र-पदं च लेभेदुग्धा बसूनि वसुधा सकलानि येन ॥
९॥
यत्--जब; वेनम्--राजा बेन को; उत्पथ-गतम्--पथशभ्रष्ट; द्विज--ब्राह्मणों के; वाक्य--शाप के वचन; वज्ञ--वज्;निष्प्लुप्ट-- भस्म किया जाकर; पौरुष--महान् कार्य; भगम्--ऐश्वर्य; निरये--नरक में; पतन्तम्--गिरते हुए; त्रात्वा--उद्धारकरके; अर्थित:--प्रार्थित; जगति--संसार में; पुत्र-पदम्--पुत्र का स्थान; च-- भी; लेभे--प्राप्त किया; दुग्धा--दोहन किया;वसूनि--उपज; वसुधा-- पृथ्वी; सकलानि--सभी प्रकार की; येन--जिसके द्वारा।
महाराज वेन कुमार्गगामी हो गया, अत: ब्राह्मणों ने वज़शाप से उसे दण्डित किया।
इसप्रकार राजा वेन अपने सत्कर्मों तथा ऐश्वर्य के सहित भस्म हो गया और नरक के पथ पर जानेलगा।
किन्तु भगवान् ने, अपनी अहैतुकी कृपा से, उसके पुत्र पृथु के रूप में जन्म लेकर शापितराजा वेन को नरक से उबारा और पृथ्वी का दोहन करके उससे सभी प्रकार की उपजें प्राप्त कीं।
नाभेरसावृषभ आस सुदेवि-सूनु-यों वै चचार सम-हग् जड-योग-चर्याम् ।
यत् पारमहंस्यमृषय: पदमामनन्तिस्वस्थ: प्रशान्त-करणः परिमुक्त-सड्भ: ॥
१०॥
नाभे: --महाराज नाभि के द्वारा; असौ--श्री भगवान्; ऋषभ:--ऋषभ; आस--हुआ; सुदेवि--सुदेवी का; सूनु:--पुत्र; यः--जिसने; वै--निश्चय ही; चचार--सम्पन्न किया; सम-हक्ू--समदर्शी; जड-- भौतिक; योग-चर्याम्--योग अभ्यास; यत्--जो;पारमहंस्यम्--सिद्धि की परम अवस्था; ऋषय:--ऋषिगण; पदम्--पद; आमनन्ति-- स्वीकार करते हैं; स्वस्थ:--अपने मेंस्थित; प्रशान्त--स्थिर; करण: --इन्द्रियाँ; परिमुक्त--पूर्णतया मुक्त; सड्र:--भौतिक कल्मष।
राजा नाभि की पत्नी सुदेवी के पुत्र के रूप में भगवान् प्रकट हुए और ऋषभ-देव कहलाये।
अपने मन को समदर्शी बनाने के लिए उन्होंने जड़-योग साधना की।
इस अवस्था को मुक्ति कासर्वोच्च सिद्ध पद भी माना जाता है, जिसमें मनुष्य अपने में ही स्थित रहकर पूर्ण रूप से सन्तुष्टरहता है।
सत्रे ममास भगवान् हय-शीरषाथोसाक्षात् स यज्ञ-पुरुषस्तपनीय-वर्ण: ।
छन्दोमयो मखमयोखिल-देवतात्मावाचो बभूवुरुशती: श्रसतोस्य नस्त: ॥
११॥
सत्रे--यज्ञोत्सव में; मम--मेरे; आस--प्रकट हुए; भगवान् -- श्रीभगवान्; हय-शीरषा--घोड़े का सिर धारण करके; अथ--इसप्रकार; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; सः--वह; यज्ञ-पुरुष:--ऐसा पुरुष जो यज्ञ सम्पन्न करने से प्रसन्न होता है; तपनीय--सुनहले;वर्ण:--रंग; छन्दः-मयः--साक्षात् वैदिक स्तोत्र; मख-मय:--साक्षात् यज्ञ; अखिल--जो कुछ सम्भव है, वह सब; देवता-आत्मा--देवताओं की आत्मा; वाच:--वाणी; बभूवु:--सुने जाते हैं; उशती:--कानों को अत्यन्त मधुर लगने वाले; श्वसत:--साँस लेते हुए; अस्य--इसके ; नस्त:--नथुनों से ।
मेरे ( ब्रह्मा ) द्वारा सम्पन्न यज्ञ में भगवान् हयग्रीव अवतार के रूप में प्रकट हुए।
वे साक्षात्यज्ञ हैं और उनके शरीर का रंग सुनहला है।
वे साक्षात् वेद भी हैं और समस्त देवताओं के परमात्मा हैं।
जब उन्होंने श्रास ली, तो उनके नथुनों से समस्त मधुरवैदिक स्तोत्रों की ध्वनियाँप्रकट हुईं।
मत्स्यो युगान्त-समये मनुनोपलब्ध:क्षोणीमयो निखिल-जीव-निकाय-केतः ।
विस्त्रंसितानुरु-भये सलिले मुखान्मेआदाय तत्र विजहार ह वेद-मार्गानू ॥
१२॥
मत्स्य:--मत्स्यावतार; युग-अन्त--कल्प के अन्त में; समये--का समय; मनुना-- भावी वैवस्वत मनु द्वारा; उपलब्ध:--हृश्य;क्षोणीमय:--पृथ्वी तक; निखिल--समस्त; जीव--जीवात्माएँ; निकाय-केत:--आश्रय; विस्नंसितान्ू--से उद्भूत; उरू--महान; भये-- भय से; सलिले--जल में; मुखात्--मुख से; मे--मेरा; आदाय--लाकर; तत्र-- वहाँ; विजहार--उपभोग किया;ह--निश्चय ही; वेद-मार्गानू--समस्त वेदों का
कल्प के अन्त में भावी वैवस्वत मनु, सत्यव्रत, देखेंगे कि मत्स्य अवतार के रूप मेंश्रीभगवान् पृथ्वी पर्यन्त सभी प्रकार की जीवात्माओं के आश्रय हैं।
तब कल्प के अन्त में, जलमें मेरे भय से, सभी वेद मेरे ( ब्रह्मा ) मुँह से निकलते हैं तथा भगवान् उस प्रवाह जल का राशिआनन्द उठाते हुए वेदों की रक्षा करते हैं।
क्षीरोदधावमर-दानव-यूथपाना-मुन्मथ्नताममृत-लब्धय आदि-देवः ।
पृष्ठेन कच्छप-वपुर्विदधार गोत्रनिद्राक्षणोद्वि-परिवर्त-कषघाण-कण्डू: ॥
१३॥
क्षीर--दूध; उदधौ--समुद्र में; अमर--देवता; दानव-- असुर; यूथ-पानाम्ू--दोनों दलों के नायकों का; उन्मथ्नतामू--मन्थनकरते हुए; अमृत--अमृत; लब्धय--प्राप्त करने हेतु; आदि-देव: --आदि परमे श्वर; पृष्ठेन--पीठ से; कच्छप--कछुवे का;वपु:--शरीर; विदधार-- धारण किया; गोत्रम्--मन्दर पर्वत; निद्राक्षण: --निद्रा में; अद्वि-परिवर्त--पर्वत के घूमने से;कषाण--रगड़ से; कण्डू:--खुजली
तब आदि भगवान् मथानी की तरह उपयोग में लाऐ जा रहे मन्दराचल पर्वत के लिए घुरी( आश्रय स्थल ) के रूप में कच्छप रूप में अवतरित हुए।
देवता तथा असुर अमृत निकालने केउद्देश्य से मन्दराचल को मथानी बनाकर क्षीर सागर का मंथन कर रहे थे।
यह पर्वत आगे-पीछेघूम रहा था जिससे भगवान् कच्छप की पीठ पर रगड़ पड़ रही थी,तब वे अघजगी निद्रा में थेऔर खुजलाहट का अनुभव कर रहे थे, उनकी पीठ रगड़ी जाने लगी।
त्रै-पिष्टपोरू-भय-हा स नृसिंह-रूपंकृत्वा भ्रमदश्वुकुटि-दंघ्र-कराल-वक्त्रम् ।
दैत्येन्द्रमाशु गदयाभिपतन्तमारा-दूरौ निपात्य विददार नखैः स्फुरन्तम् ॥
१४॥
त्रै-पिष्टप--देवता; उरु-भय-हा--महान् भय को मिटाने वाला; सः--उसने ( श्रीभगवान् ने ); नूसिंह-रूपम्--नूसिंह अवतार;कृत्वा--करके; भ्रमत्-घूमती हुई; भ्रु-कुटि--भौंहे; दंष्ट--दाँत; कराल--अत्यन्त भयानक; वक्त्रमू-- मुँह; दैत्य-इन्द्रमू--असुरों के राजा को; आशु--तुरन््त; गदया--गदा से; अभिपतन्तम्--गिरते हुए; आरातू--पास ही; ऊरौ--जाँघों पर; निपात्य--रखकर; विददार--विदीर्ण कर दिया; नखै:ः--नाखूनों से; स्फुरन्तम्ू--ललकारते हुए।
श्रीभगवान् ने देवताओं के अदम्य भय को मिटाने के लिए नृसिंह-देव का अवतार ग्रहणकिया।
उन्होंने असुरों के उस राजा ( हिरण्यकशिपु ) को अपनी जाँघों में रखकर अपने नाखूनों सेविदीर्ण कर डाला, जो हाथ में गदा लेकर भगवान् को ललकार रहा था।
उस समय उनकी भौहेंक्रोध से फड़क रही थीं और दाँतों के कारण उनका मुख भयावना लग रहा था।
अन्तः-सरस्युरु-बलेन पदे गृहीतोग्राहेण यूथ-पतिरम्बुज-हस्त आर्त: ।
आहेदमादि-पुरुषाखिल-लोक-नाथतीर्थ-श्रव: श्रवण-मड्गल-नामधेय ॥
१५॥
अन्तः-सरसि--नदी के भीतर; उरु-बलेन-- श्रेष्ठ शक्ति से; पदे--पाँव; गृहीत:--पकड़ा गया; ग्राहेण --मगर द्वारा; यूथ-पति:--हाथियों के नायक का; अम्बुज-हस्त:--हाथ में कमल का पुष्प लेकर; आर्त:--अत्यधिक पीड़ित; आह--सम्बोधनकिया; इृदम्--इस प्रकार; आदि-पुरुष--आदि भोक्ता; अखिल-लोक-नाथ--ब्रह्माण्ड के स्वामी; तीर्थ-श्रव:--तीर्थस्थल कीभाँति विख्यात; श्रवण-मड़ल--जिसके नाम के सुनने मात्र से सारा कल्याण हो; नाम-धेय--जिसका पवित्र नाम जप के योग्यहै
अत्यन्त बलशाली मगर के द्वारा नदी के भीतर पाँव पकड़ लिये जाने से हाथियों का नायकअत्यन्त पीड़ित था, उसने अपनी सूँड़ में कमल का फूल लेकर भगवान् को इस प्रकार सम्बोधितकिया, 'हे आदि भोक्ता, ब्रह्माण्ड के स्वामी, हे उद्धारक, हे तीर्थ के समान विख्यात, आपकेपवित्र नाम जो जपे जाने के योग्य है, उनके श्रवण मात्र से ही सभी लोग पवित्र हो जाते हैं।
' श्रुत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेय -श्रक्रायुध: पतगराज-भुजाधिरूढ: ।
चक्रेण नक्र-वदनं विनिपाट्य तस्मा-डइस्ते प्रगृह्ठा भगवान् कृपयोजहार ॥
१६॥
श्रुत्वा--सुनकर; हरि:-- श्री भगवान् ने; तमू--उसको; अरण-अर्धिनम्-- सहायता चाहने वाला; अप्रमेय:--अनन्त शक्तिशालीभगवान्; चक्र--चक्र; आयुध:--अपने अस्त्र से सज्जित; पतग-राज--पक्षियों के राजा ( गरुड़ ) के; भुज-अधिरूढ: --पंखोंपर आसीन; चक्रेण--चक्र से; नक्र-वदनम्--मगर के मुख को; विनिपाट्य--दो खंड करके; तस्मात्--मगर के मुख से;हस्ते--हाथ में; प्रगृह्य--सूँड़ पकड़ कर; भगवान्ू-- श्रीभगवान् ने; कृपया--अहैतुकी कृपा से; उजहार--उद्धार किया।
हाथी की पुकार सुनकर श्रीभगवान् को लगा कि उसे उनकी अविलम्ब सहायता कीआवश्यकता है, क्योंकि वह घोर संकट में था।
तब पक्षिराज गरुड़ के पंखों पर आसीन होकरभगवान् अपने आयुध चक्र से सज्जित होकर वहाँ पर तुरन्त प्रकट हुए।
उन्होंने हाथी की रक्षाकरने के लिए अपने चक्र से मगर के मुँह के खण्ड-खण्ड कर दिये और हाथी के सूँड़से पकड़कर उसे बाहर निकाल दिया।
ज्यायान् गुणैरवरजोप्यदितेः सुतानांलोकान् विचक्रम इमान् यदथाधियज्ञ: ।
क्ष्मां वामनेन जगूहे त्रिपद-च्छलेनयाच्ञामृते पथि चरन् प्रभुभिर्न चाल्य: ॥
१७॥
ज्यायान्ू--सबसे बड़ा; गुणैः --गुणों में; अवरज:--दिव्य; अपि--यद्यपि वह ऐसा है; अदितेः--अदिति के; सुतानामू--सभीपुत्रों का (जो आदित्य कहे जाते हैं ); लोकान्ू--सभी लोक; विचक्रमे--बढ़कर; इमान्--इस ब्रह्माण्ड में; यत्--जो; अथ--अतः; अधियज्ञ:-- श्री भगवान्; क्ष्मम्--समस्त पृथ्वी; वामनेन--वामन अवतार से; जगूहे--स्वीकार किया; त्रिपद--तीन पग;छलेन--छल से; याच्ञाम्ू--भिक्षा; ऋते--बिना; पथि चरन्--सत्य मार्ग पर चलते हुए; प्रभुभि:-- अधिकारियों द्वारा; न--कभी नहीं; चाल्य: --से रहित होना, च्युत |
भगवान् समस्त भौतिक गुणों से परे होते हुए भी अदिति के पुत्रों ( आदित्यों ) के गुणों सेकहीं बढ़ कर थे।
वे अदिति के सबसे कनिष्ठ पुत्र के रूप में प्रकट हुए।
और क्योंकि उन्होंनेब्रह्माण्ड के समस्त ग्रहों को पार किया, अतः वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
उन्होंने तीन पग भूमिमाँगने के बहाने से बलि महाराज की सारी भूमि ले ली।
उन्होंने याचना इसीलिए की क्योंकिबिना याचना के, सन्मार्ग पर चलने वाले से कोई उसकी अधिकृत सम्पत्ति नहीं ले सकता।
नार्थों बलेरयमुरुक्रम-पाद-शौच-माप: शिखा-धृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
यो बै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्य-दात्मानमड़ मनसा हरयेउभिमेने ॥
१८॥
न--कभी नहीं; अर्थ: --की तुलना में किसी महत्त्व का; बलेः--शक्ति का; अयम्--यह; उरुक्रम-पाद-शौचमू-- श्रीभगवान्के पादप्रक्षालन से प्राप्त; आप:--जल; शिखा-धृतवत:--सिर के ऊपर धारण करने वाले का; विबुध-अधिपत्यम्ू--देवों केसाप्राज्य के ऊपर प्रमुखता; यः--जो; बै--निश्चय ही; प्रतिश्रुतम्--दिया गया वचन; ऋते न--उसके अतिरिक्त; चिकीर्षत्--प्रयास किया गया; अन्यत्--अन्य कुछ; आत्मानम्--अपना शरीर भी; अड़--हे नारद; मनसा--मन से; हरये--हरि के प्रति;अभिमेने--समर्पित
अपने सिर पर भगवान् के कमल-पाद प्रक्षालित जल को धारण करने वाले बलि महाराज नेअपने गुरु द्वारा मना किये जाने पर भी अपने वचन के अतिरिक्त मन में अन्य कुछ धारण नहींकिया।
राजा ने भगवान् के तीसरे पग को पूरा करने के लिए अपना शरीर समर्पित कर दिया।
ऐसे महापुरुष के लिए अपने बाहुबल से जीते गये स्वर्ग के साम्राज्य का भी कोई महत्व नहीं था।
तुभ्यं च नारद भूशं भगवान् विवृद्ध-भावेन साधुपरितुष्ट उबाच योगम् ।
ज्ञानं च भागवतमात्म-सतत्त्व-दीपंयद्वासुदेव-शरणा विदुरझसव ॥
१९॥
तुभ्यमू--तुमको; च-- भी; नारद--हे नारद; भृशम्--अत्यन्त सुन्दर ढंग से; भगवान्-- श्रीभगवान्; विवृद्ध--विकसित;भावेन--दिव्य प्रेम से; साधु--साधु रूप आप; परितुष्ट:--भली-भाँति संतुष्ट; उवाच--कहा; योगम्--सेवा; ज्ञानमू--ज्ञान;च--भी; भागवतम्-- भगवान् तथा उनकी भक्ति का विज्ञान; आत्म--स्व; स-तत्त्व--समस्त विवरणों सहित; दीपम्-- अंधकारमें प्रकाश की भाँति; यत्--जो; वासुदेव-शरणा: -- भगवान् वासुदेव के शरणागत; विदु:--उन््हें जानते हैं; अज्लसा-- भली-भाँति; एव--उसी रूप में
हे नारद, तुम्हें श्रीभगवान् ने अपने हंसावतार में ईश्वर के विज्ञान तथा दिव्य प्रेमभाव केविषय में शिक्षा दी थी।
वे तुम्हारी अगाध भक्ति से अत्यधिक प्रसन्न हुए थे।
उन्होंने तुम्हें भक्ति कापूरा विज्ञान भी अत्यन्त सुबोध ढंग से समझाया था, जिसे केवल भगवान् बासुदेव के प्रति पूर्णसमर्पित व्यक्ति ही समझ सकते हैं।
चक्र च दिश्ष्वविहतं दशसु स्व-तेजोमन्वन्तरेषु मनु-वंश-धरो बिभर्ति ।
दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात् स्व-कीर्तिसत्ये त्रि-पृष्ठ उशतीं प्रथयंश्चरित्रे: ॥
२०॥
अक्रमू-- भगवान् का सुदर्शन चक्र; च--भी; दिक्षु--समस्त दिशाओं में; अविहतम्--किसी रोकटोक के बिना; दशसु--दसोंदिशाएँ; स्व-तेज:--व्यक्तिगत पराक्रम; मन्वन्तरेषु--मनु के विभिन्न अवतारों में; मनु-वंश-धरः--मनु-वंश के वंशज रूप में;बिभर्ति--शासन करता है; दुष्टेषु--दुष्टों पर; राजसु--उस प्रकार के राजाओं पर; दमम्--उत्पीड़न; व्यदधात्ू-- सम्पन्न किया;स्व-कीर्तिमू--अपना यज्ञ; सत्ये--सत्यलोक में; त्रि-पृष्ठे--तीनों लोकों में; उशतीम्--महिमामय; प्रथयन्--स्थापित; चरित्रै: --गुणों द्वारा)।
भगवान् ने मनु-अवतार लिया और वे मनुवंश के वंशज बन गये।
उन्होंने अपने शक्तिशालीसुदर्शन चक्र से दुष्ट राजाओं का दमन करके उन पर शासन किया।
समस्त परिस्थितियों मेंअबाध रहते हुए, उनका शासन तीनों लोकों तथा ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च सत्यलोक तक फैला थाऔर उनकी महिमामयी कीर्ति से मंडित था।
धन्वन्तरिश्व॒ भगवान् स्वयमेव कीर्ति-नॉम्ना नृणां पुरु-रुजां रुज आशु हन्ति ।
यज्ञे च भागममृतायुरवावरुन्धआयुष्य-वेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥
२१॥
धन्वन्तरि:ः--धन्वन्तरि नामक अवतार; च--तथा; भगवानू-- श्री भगवान्; स्वयम् एव--स्वतः ; कीर्ति:--साक्षात् कीर्ति;नाम्ना--नाम से; नृणाम् पुरु-रुजाम्--रुग्ण जीवात्माओं के; रुज:--रोग; आशु--तुरन््त; हन्ति--अच्छा करता है; यज्ञे--यज्ञमें; च-- भी; भागम्-- भाग, हिस्सा; अमृत-- अमृत; आयु:--उप्र; अव--से; अवरुन्धे--प्राप्त करता है; आयुष्य-- जीवनकाल का; वेदम्--ज्ञान; अनुशास्ति--निर्देश करता है; अवतीर्य--अवतार लेकर; लोके--ब्रह्माण्ड में ।
अपने धन्वन्तरि अवतार में भगवान् अपने साक्षात् यश के द्वारा निरन्तर रुग्ण रहने वालीजीवात्माओं के रोगों का तुरन्त उपचार कर देते हैं और उनके कारण ही सभी देवता दीर्घायु प्राप्तकरते हैं।
इस प्रकार भगवान् सदा के लिए महिमामण्डित हो जाते हैं।
उन्होंने यज्ञों में से भी एकअंश निकाल लिया और उन्होंने ही विश्व में ओषधि विज्ञान ( आयुर्वेद ) का प्रवर्तन किया।
क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभूृतं महात्माब्रह्म-ध्रुगुज्झित-पथ्थ नरकार्ति-लिप्सु ।
उद्धन्वसाववनिकण्टकमुग्र-वीर्य-स्त्रि:-सप्त-कृत्व उरुधार-परश्रधेन ॥
२२॥
क्षत्रमू--राजवंश; क्षयाय--घटाने के लिए; विधिना--दैववश; उपभृतम्--बढ़े हुए; महात्मा--परम साधु परशुराम के रूप मेंभगवान्; ब्रह्म-ध्ुकु--ब्रह्मा का परम सत्य; उज्झित-पथम्--जिन्होंने परम सत्य मार्ग को त्याग दिया है; नरक-आर्ति-लिप्सु--नरक की यातना के इच्छुक; उद्धन्ति--बाध्य करते हैं; असौ--वे सब; अवनिकण्टकम्--संसार के काँटे; उग्र-वीर्य:--महापराक्रमी ; त्रिः-सप्त--इक्कीस बार; कृत्व:--सम्पन्न; उरुधार--अत्यन्त तीक्षणफ; परश्रधेन--विशाल फरसे से ।
जब शासक वर्ग जो क्षत्रिय नाम से जाने जाते थे, परम सत्य के पथ से भ्रष्ट हो गये औरनरक भोगने के इच्छुक हो उठे, तो भगवान् ने परशुराम मुनि का अवतार लेकर उन अवांछितराजाओं का उच्छेद किया जो पृथ्वी के लिए कंटक बने हुए थे।
इस तरह उन्होंने अपने तीक्ष्ण'फरसे के द्वारा क्षत्रियों का इक्कीस बार उच्छेदन किया।
अस्मत्प्रसाद-सुमुखः: कलया कलेशइश्ष्वाकु-वंश अवतीर्य गुरोर्निंदेशे ।
तिष्ठन् वनं स-दयितानुज आविवेशयस्मिन् विरुध्य दश-कन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥
२३॥
अस्मत्ू--हम सब पर, ब्रह्मा से लेकर क्षुद्र चीटीं तक; प्रसाद--अहैतुकी कृपा; सुमुख:--अत्यन्त उन्मुख; कलया--अपने अंशोंसहित; कलेश:--समस्त शक्तियों के स्वामी; इक््वाकु--महाराज इशक्ष्वाकु जो सूर्यवंशी थे; वंशे--कुल में; अवतीर्य--जन्मलेकर; गुरो:--पिता अथवा गुरु की; निदेशे--आज्ञा से; तिष्ठन्--स्थित होकर; वनम्--वन में; स-दयिता-अनुज: -- अपनीपत्नी तथा अनुज सहित; आविवेश --प्रवेश किया; यस्मिन्ू--जिसको; विरुध्य--विरोध करके; दश-कन्धर:--दस सिरों वाले,रावण ने; आर्तिम्ू-महान् कष्ट; आर्च्छत्- प्राप्त किया।
इस ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों पर अहैतुकी कृपा के कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनेअंशों सहित महाराज इक्ष्वाकु के कुल में अपनी अन्तरंगा शक्ति, सीताजी, के स्वामी के रूप मेंप्रकट हुए।
वे अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा से वन गये और अपनी पत्नी तथा छोटे भाईके साथ कई वर्षो तक वहाँ रहे।
अत्यन्त शक्तिशाली दस सिरों वाले रावण ने उनके प्रति कईवर्षों तक अपराध किया और जिससे अन्ततः वह विनष्ट हो गया।
यस्मा अदादुदधिरूढ-भयाडु-वेपोमार्ग सपद्यरि-पुरं हरवद् दिधक्षो: ।
दूरे सुहन्मधित-रोष-सुशोण-दृष्टयातातप्यमान-मकरोरग-नक्र-चक्र: ॥
२४॥
यस्मै--जिसको; अदातू-- प्रदान किया; उदधि:--हिन्द महासागर ने; ऊढ-भय-- भयभीत; अड्भ-वेप:--काँपते हुए शरीर से;मार्गभमू-मार्ग; सपदि--तुरन्त; अरि-पुरम्--शत्रु की नगरी; हर-वत्--हर ( महादेव ) के समान; दिधक्षो:-- भस्म करने के लिएउद्यत; दूरे--दूरी पर; सु-हत्--घनिष्ठ मित्र; मधित--पीड़ित; रोष--क्रोध में; सु-शोण--लाल-लाल; दृष्टया--ऐसी दृष्टि से;तातप्यमान--ज्वलित; मकर--मगरमच्छ; उरग--साँप; नक्र--घड़ियाल; चक्र:--वृत्त, गोला ।
दूरस्थ अपनी घनिष्ठ संगिनी ( सीता ) के वियोग से दुखी श्रीरामचन्द्र ने अपने शत्रु रावण कीनगरी पर हर ( शिव जो स्वर्ग के राज्य को भस्म कर देना चाहते थे ) के जैसे ज्वलित लाल-लालनेत्रों से दृष्टि डाली।
अपार समुद्र ने उन्हें भय से काँपते हुए मार्ग दे दिया, क्योंकि उसके परिवारके सभी जलचर सदस्य यथा मगरमच्छ, सर्प तथा घड़ियाल भगवान् के रक्त नेत्रों की क्रोधाग्निसे जले जा रहे थे।
वक्ष:-स्थल-स्पर्श-रुग्न-महेन्द्र-वाह--दन्तैर्विडम्बित-ककुब्जुष ऊढ-हासम् ।
सद्योसुभि:ः सह विनेष्यति दार-हर्तु-विंस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरतोउधिसैन्ये ॥
२५॥
वक्ष:-स्थल--छाती; स्पर्श--छूने से; रुग्गन--खंडित; महा-इन्द्र--स्वर्ग के राजा के; वाह--वाहन की; दन्तैः--सूँड़ से;विडम्बित-- प्रकाशित; ककुप्-जुष:--सभी दिशाएँ; ऊढ-हासम्-- अट्टहास; सद्यः--तुरन्त; असुभिः-- प्राण; सह--सहित;विनेष्यति--मार डाला गया; दार-हर्तु:--स्त्री को चुराने वाला; विस्फूर्जितै:--सिहरन उत्पन्न करने वाले; धनुष:--धनुष के द्वारा;उच्चरतः--तेजी से विचरण करते हुए; अधिसैन्ये--दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच ।
जब रावण युद्ध कर रहा था, तो उसकी छाती से टकराकर स्वर्ग के राजा इन्द्र के हाथी कीसूँड़ खण्ड-खण्ड हो गई और ये खण्ड बिखरकर चारों दिशाओं को चकाचौंध करने लगे।
अतःरावण को अपने शौर्य पर गर्व होने लगा और वह अपने को समस्त दिशाओं का विजेता समझकर सैनिकों के बीच इतराने लगा।
किन्तु भगवान् श्री रामचन्द्र द्वारा अपने धनुष पर टंकार करनेपर उसकी वह प्रसन्नता की हँसी उसकी प्राणवायु के साथ ही सहसा बन्द हो गई।
भूमे: सुरेतर-वरूथ-विमर्दिताया:क्लेश-व्ययाय कलया सित-कृष्ण-केश: ।
जात: करिष्यति जनानुपलक्ष्य-मार्ग:कर्माणि चात्म-महिमोपनिबन्धनानि ॥
२६॥
भूमेः--सारे संसार का; सुर-इतर--देवताओं के अतिरिक्त अन्य; वरूथ--सैनिक; विमर्दिताया: -- भार से पीड़ित; क्लेश--कष्ट; व्ययाय--कम करने के लिए; कलया--अपने अंश समेत; सित-कृष्ण--न केवल सुन्दर किन्तु कृष्ण भी; केश:--केशोंसे युक्त; जात:-- प्रकट होकर; करिष्यति--करेगा; जन--सामान्य लोग; अनुपलक्ष्य--कम दिखने वाला; मार्ग: --पथ;कर्माणि--कार्य; च-- भी; आत्म-महिमा--स्वयं भगवान् की महिमा के; उपनिबन्धनानि--प्रसंग में
जब पृथ्वी पर, ईश्वर में श्रद्धा न रखने वाले, परस्पर लड़ने वाले राजाओं का भार बढ़ जाताहै, तो भगवान् संसार का कष्ट कम करने के लिए अपने अंश समेत अवतरित होते हैं।
वे सुन्दरकाले-काले केशों से युक्त अपने आदि रूप में आते हैं और अपनी दिव्य महिमा के विस्तार केलिए ही अलौकिक कार्य करते हैं।
कोई उनकी महानता का अनुमान नहीं लगा सकता।
तोकेन जीव-हरणं यदुलूकि-काया-स्त्रै-मासिकस्थ च पदा शकटोउपवृत्त: ।
यद् रिड्गभतान्तर-गतेन दिवि-स्पृशोर्वाउन्मूलन त्वितरथार्जुनयोर्न भाव्यम्ू ॥
२७॥
तोकेन--बालक द्वारा; जीव-हरणम्--जीव का वध; यत्--जो; उलूकि-काया: -- असुर का विशाल शरीर धारण कर लिया;त्रै-गमासिकस्थ--तीन मास का; च--भी; पदा--पैर से; शकटः अपवृत्त:--छकड़े को पलट दिया; यत्--जो; रिड्रता--घुटनेके बल चलते; अन्तर-गतेन--बीच में जाकर; दिवि--आकाश में ऊँचे; स्पृशो:--छूते हुए; वा--अथवा; उन्मूलनम्ू--जड़समेत उखाड़ लेना; तु--लेकिन; इतरथा--के अतिरिक्त अन्य; अर्जुनयो:--अर्जुन के दो वृक्षों का; न भाव्यमू--सम्भव न था।
भगवान् श्रीकृष्ण के परमेश्वर होने में कोई सन्देह नहीं है, अन्यथा जब वे अभी अपनी माताकी गोद में थे तो पूतना जैसी राक्षती का वध किस तरह कर सकते थे; तीन मास की आयु में हीअपने पाँव से छकड़े को कैसे पलट सकते थे और जब घुटने के बल चल रहे थे तभीगगनचुम्बी अर्जुन वृक्षों के जोड़े को समूल कैसे उखाड़ सकते थे ? ये सभी कार्य स्वयं भगवान्के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए असम्भव हैं।
यद् बै ब्रजे ब्रज-पशून् विषतोय-पीतान्पालांस्त्वजीवयदनुग्रह-दृष्टि-वृष्टयया ।
तच्छुद्धयेडति-विष-बीर्य-विलोल-जिह्-मुच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् हृदिन्याम् ॥
२८ ॥
यतू--जो; बै--निश्चय ही; ब्रजे--वृन्दावन में; ब्रज-पशून्--वहाँ के पशु; विष-तोय--विषाक्त जल; पीतान्ू--पीने वालों को;पालानू-ग्वालों को; तु--भी; अजीवयत्--जीवित किया; अनुग्रह-दृष्टि--कृपापूर्ण चितवन की; वृष्ठद्या--वृष्टि से; तत्--वह;शुद्धये--शुद्धि के लिए; अति--अत्यधिक; विष-वीर्य --अत्यधिक प्रभावशाली विष; विलोल--लपलपाती; जिहम्--जीभवाला; उच्चाटयिष्यत्--कठोर दण्ड देगा; उरगम्--सर्प को; विहरन्--विनोद में; हृदिन्याम्--नदी में ।
और जब ग्वालों तथा उनके पशुओं ने यमुना नदी का विषैला जल पी लिया और जबभगवान् ने ( अपने बचपन में ) अपनी कृपादृष्टि से ही उन्हें जीवित कर दिया।
तब यमुना नदी केजल को शुद्ध करने के लिए ही वे उसमें मानो खेल-खेल में कूद पड़े।
उन्होंने विषैले कालियनाग को दण्ड दिया जो अपनी लपलपाती जीभ से विष की लहरें निकाल रहा था।
भला परमेश्वरके अतिरिक्त ऐसा महान् कार्य करने में और कौन समर्थ है?तत् कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानंदावाग्निना शुच्चि-वने परिदह्ममाने ।
उन्नेष्यति ब्रजमतोवसितान्त-कालंनेत्रे पिधाप्य सबलोनधिगम्य-वीर्य: ॥
२९॥
तत्--उस; कर्म--कार्य; दिव्यमू--अलौकिक; इब--सहृश; यत्--जो; निशि--रात्रि में; निःशयानम्--चिन्तामुक्त सोते हुए;दाव-अग्निना--वन की अग्नि की लपट से; शुचि-वने--शुष्क वन में; परिदह्ममाने--आग लगाये जाने पर; उन्नेष्यति--उबारलेंगे; ब्रजमू--त्रज के समस्त वासी; अत:--अतः; अवसित--निश्चय ही; अन्त-कालम्--जीवन के अन्तिम क्षण; नेत्रे-- आँखोंमें; पिधाप्य--मात्र बन्द करके; स-बलः--बलदेव सहित; अनधिगम्य-- अगाध; वीर्य:--पराक्रम ।
कालिय नाग को दण्डित करने के दिन ही रात्रि के समय, जब ब्रजभूमि के समस्त वासीनिश्चिन्त होकर सो रहे थे तो सूखी पत्तियों के कारण जंगल में अग्नि धधक उठी और ऐसा लगामानो उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी है।
किन्तु आँखें बन्द करके बलराम जी के साथ भगवान् ने उन सबको बचा लिया।
ऐसे हैं भगवान् के अलौकिक कार्यकलाप! गृह्ीत यद् यदुपबन्धममुष्य माताशुल्बं सुतस्य न तु तत् तदमुष्य माति ।
यज्जृम्भतोस्य बदने भुवनानि गोपीसंवीक्ष्य शद्धित-मना: प्रतिबोधितासीत् ॥
३०॥
गृह्लीत--ग्रहण करके; यत् यत्--जो भी; उपबन्धम्--बाँधने की रस्सियाँ; अमुष्य--उसकी; माता--माता; शुल्बम्--रस्सी;सुतस्य--अपने पुत्र का; न--नहीं; तु--तो भी; तत् तत्--क्रमशः; अमुष्य--उसका; माति--पर्याप्त था; यत्--जो; जूृम्भत:--जम्हाई लेता; अस्य--उसके; वदने--मुख में; भुवनानि--समस्त लोक; गोपी--ग्वालिन, ग्वालबाला; संवीक्ष्य--अतः इसेदेखकर; शद्भित-मना:--सन्देहपूर्ण मन; प्रतिबोधिता--भिन्न प्रकार से आश्वस्त; आसीतू--था |
जब गोपी ( कृष्ण की धात्री माता यशोदा ) अपने पुत्र के दोनों हाथों को रस्सियों से बाँधनेका प्रयास कर रही थी तो उसने देखा कि रस्सी हमेशा छोटी पड़ जाती थी, अतः हार कर जबउसने प्रयास करना बन्द कर दिया, तब श्रीकृष्ण ने अपना मुँह खोल दिया तो माता यशोदा कोमुख के भीतर सारे ब्रह्माण्ड स्थित दिखे।
यह देख कर उसे सन्देह हुआ, किन्तु उसे अपने पुत्र कीयोग-शक्ति का पता भिन्न तरीके से लगा।
नन्दं च मोक्ष्यति भयाद् वरुणस्य पाशाद्गोपान् बिलेषु पिहितान् मय-सूनुना च ।
अह्न्यापृतं॑ निशि शयानमतिश्रमेणलोकं विकुण्ठमुपनेष्यति गोकुलं सम ॥
३१॥
नन्दम्--नन्द ( कृष्ण के धर्मपिता ) को; च--भी; मोक्ष्यति--बचाता है; भयात्-- भय से; वरुणस्य--जल के देव वरुण के;पाशात्--चंगुल से; गोपान्ू--ग्वालों को; बिलेषु--पर्वत गुफा में; पिहितान्--रखे गये; मय-सूनुना--मय के पुत्र द्वारा; च--भी; अह्लि आपृतम्--दिन के समय व्यस्तता वश; निशि--रात में; शयानम्ू--लेटे हुए; अतिश्रमेण--कठिन श्रम के कारण;लोकम्--लोक; विकुण्ठम्--वैकुण्ठ; उपनेष्यति-- प्रदान किया; गोकुलम्--सर्वोच्च लोक; स्म--निश्चय ही ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने पिता नन्द महाराज को वरुण के भय से बचाया और ग्वालबालोंको पर्वत की कन्दरा में से, जहाँ मय के पुत्र ने उन्हें बन्दी कर रखा था, मुक्त किया।
यही नहीं,भगवान् श्रीकृष्ण ने वृन्दावन के समस्त वासियों को, जो दिन भर काम में व्यस्त रहकर रात मेंथक कर निश्चिन्त सोते थे, परव्योम में सर्वोच्च लोक का भागी बना दिया।
ये सारे कार्य दिव्य हैंऔर उनके ईश्वरत्व को सिद्ध करने वाले हैं।
गोपैर्मखे प्रतिहते ब्रज-विप्लवायदेवेडभिवर्षति पशून् कृपया रिरक्षु: ।
धर्तोच्छिलीन्ध्रमिव सप्त-दिनानि सप्त-वर्षो महीध्रमनघैक-करे सलीलम् ॥
३२॥
गोपैः--ग्वालों के द्वारा; मखे--स्वर्ग के राजा को बलि प्रदान करने में ; प्रतिहते--बाधा डाले जाने पर; ब्रज-विप्लवाय--श्रीकृष्ण की लीलास्थली ब्रजभूमि को तहस-नहस करने के लिए; देवे--स्वर्ग के राजा द्वारा; अभिवर्षति--मूसलाधार वर्षाकरके; पशून्--पशू; कृपया--उन पर अहैतुकी कृपा द्वारा; रिरक्षु:--उन्हें बचाने की इच्छा की; धर्त-- धारण किया हुआ;उच्छिलीन्ध्रमू--छाते की भाँति उठा लिया; इब--सहश; सप्त-दिनानि--लगातार सात दिनों तक; सप्त-वर्ष:--यद्यपि वे सातवर्ष के थे; महीश्रम्--गोवर्द्धन पर्वत; अनघ--बिना थके; एक-करे--केवल एक हाथ में; सलीलम्ू--खेल-खेल में |
जब वृन्दावन के ग्वालों ने श्रीकृष्ण के आदेश से स्वर्ग के राजा इन्द्र को आहुति देना बन्दकर दिया तो लगातार सात दिनों तक मूसलाधार वर्षा होती रही और ऐसा लग रहा था मानो सारीब्रजभूमि बह जायेगी।
तब केवल सात वर्ष की आयु के श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों पर अपनीअहैतुकी कृपावश अपने एक हाथ से गोवर्द्धन पर्वत को उठा लिया।
ऐसा उन्होंने वर्षा से पशुओंकी रक्षा करने के लिए ही किया।
क्रीडन् वने निशि निशाकर-रश्मि-गौर्यारासोन्मुख: कल-पदायत-मूर्च्छितेन ।
उद्दीपित-स्मर-रुजां ब्रज-भूद्वधूनांहर्तुहरिष्यति शिरो धनदानुगस्यथ ॥
३३॥
क्रीडन्ू--खेलते हुए; बने--वृन्दावन के जंगल में; निशि--रात्रि में; निशाकर-- चन्द्रमा; रश्मि-गौर्याम्ू-- श्वेत चाँदनी का; रास-उन्मुख:--रास करने के लिए इच्छुक; कल-पदायत--मधुर गीतों; मूर्च्छितेन--तथा मूर्च्छना ( मधुर संगीत ) समेत; उद्दीपित--जागृत; स्मर-रूुजाम्-कामेच्छा; ब्रज-भूत्ू--ब्रजवासी; वधूनाम्--पत्नियों का; हर्तु:--हरण करने वाले का; हरिष्यति--काटलेंगे; शिर:ः--सिर; धनद-अनुगस्थ--कुबेर के अनुचर का।
जब भगवान् वृन्दावनवासियों की पत्नियों में अपने मधुर तथा सुरीले गीतों द्वारा कामोत्तेजनाजागृत करते हुए वृन्दावन में रासलीला में मग्न थे तो कुबेर के एक धनी अनुचर शंखचूड़ नामकराक्षस द्वारा गोपियों का हरण किये जाने पर भगवान् ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
ये च प्रलम्ब-खर-दर्दुर-केश्यरिष्ट--मल्लेभ-कंस-यवना: कपि-पौण्ड्काद्या: ।
अन्ये च शाल्व-कुज-बल्वल-दन्तवक्र--सप्तोक्ष-शम्बर-विदूरथ-रुक्मि-मुख्या: ॥
३४॥
ये वा मृधे समिति-शालिन आत्त-चापा:काम्बोज-मत्स्य-कुरु-सूझय-कैकयाद्या: ।
यास्यन्त्यदर्शनमलं बल-पार्थ-भीम--व्याजाह्येन हरिणा निलयं तदीयम् ॥
३५॥
ये--ये सब; च--पूर्णतः; प्रलम्ब--प्रलम्ब नामक असुर; खर--धेनुकासुर; दर्दुर--बकासुर; केशी --केशी नामक असुर;अरिप्ट--अरिष्टासुर; मलल्ल--कंस के दरबार का पहलवान; इभ--कुबलयापीड़; कंस--मथुरा का राजा तथा श्रीकृष्ण कामामा; यवना:--फारस तथा अन्य निकटवर्ती देशों के राजा; कपि--द्विविद; पौण्ड्क-आद्या:--पौण्ड्क इत्यादि; अन्ये-- अन्य;च--भी; शाल्व--राजा शाल्व; कुज--नरकासुर; बल्वल--राजा बल्वल; दन्तवक्र--मृत शिशुपाल का भाई, कृष्ण केप्रतिद्वन्द्दी; सप्तोक्ष--राजा सप्तोक्ष; शम्बर--राजा शम्बर; विदूरथ--राजा विदूरथ; रुक्मि-मुख्या:-- श्रीकृष्ण की प्रथम रानीरुक्मिणी का भाई; ये--ये सब; वा--अथवा; मृधे--युद्ध भूमि में; समिति-शालिन:--अत्यन्त शक्तिमान; आत्त-चापा:--धनुष-बाण से सज्जित; काम्बोज--काम्बोज का राजा; मत्स्य--द्वर्भग का राजा; कुरु-- धृतराष्ट्र के पुत्र; सृज्ञय--राजा सृझ्ञय;कैकय-आद्या:--केकय का राजा तथा अन्य; यास्यन्ति--प्राप्त करेंगे; अदर्शनम्--ब्रह्मज्योति से निर्विशेष मिलन; अलम्--क्याकहें, बस; बल--बलदेव, श्रीकृष्ण के अग्रज; पार्थ--अर्जुन; भीम--भीम, पाण्डवों में दूसरे; व्याज-आह्॒येन--छट्गा नामों से;हरिणा--हरि के द्वारा; निलयम्-- धाम; तदीयम्--उसका ।
प्रलम्ब, धेनुक, बक, केशी, अरिष्ट, चाणूर, मुष्टिक, कुबलयापीड़ हाथी, कंस, यवन,नरकासुर तथा पौण्ड्रक जैसे असुर, शाल्व, द्विविद वानर तथा बल्वल, दन्तवक्र, सातों साँड़,शम्बर, विदूरथ तथा रुक्मी जैसे सिपहसालार तथा काम्बोज, मत्स्य, कुरु, सूझ्ञय तथा केकयजैसे वीर योद्धा, साक्षात् हरि से अथवा बलदेव, अर्जुन, भीम आदि नामों की आड़ में स्वयंश्रीभगवान् से भीषण युद्ध करेंगे और इस प्रकार से मारे गये सभी असुर या तो निर्विशेषब्रह्मज्योति को प्राप्त होंगे या वैकुण्ठ लोक में स्थित भगवान् के धाम को प्राप्त होंगे।
कालेन मीलित-घधियामवमृश्य नृणांस्तोकायुषां स्व-निगमो बत दूर-पारः ।
आविर्ितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यांवबेद-द्रुमं विट-पशो विभजिष्यति सम ॥
३६॥
कालेन--समय के साथ; मीलित-धियाम्--कम बुद्धिमान मनुष्यों का; अवमृश्य--कठिनाई को ध्यान में रखते हुए; नृणाम्--मनुष्यों की; स्तोक-आयुषाम्--अल्पजीबी लोगों का; स्व-निगम:--अपने द्वारा संकलित वैदिक साहित्य; बत--ठीक-ठीक;दूर-पार:--अत्यन्त कठिन; आविर्हित:--के रूप में प्रकट होकर; तु--लेकिन; अनुयुगम्--युग के अनुसार; सः--वह( भगवान् ); हि--निश्चय ही; सत्यवत्याम्--सत्यवती के गर्भ में; वेद-द्रुमम्--वेदरूपी कल्पवृक्ष; विट-पश:--शाखाओं केविभाजन द्वारा; विभजिष्यति--बाँट देगा; स्म--मानो
सत्यवती के पुत्र ( व्यासदेव ) रूप में अवतार ग्रहण करके स्वयं भगवान् वैदिक साहित्य केसंग्रह को अल्पजीवी अल्पज्ञों के लिए कठिन समझकर वैदिक ज्ञानरूपी वृक्ष को युग विशेष कीपरिस्थितियों के अनुसार शाखाओं में विभाजित कर देंगे।
देव-द्विषां निगम-वर्त्मनि निष्ठितानांपूर्भिमयेन विहिताभिरदश्य-तूर्भि: ।
लोकान् घ्नतां मति-विमोहमतिप्रलोभंवेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम् ॥
३७॥
देव-द्विषामू-- भगवदभक्तों के प्रति ईर्ष्या रखने वालों का; निगम--चारों वेद; वर्त्मनि-- के पथ पर; निष्ठितानामू-- भलीभाँतिस्थिर हुओं का; पूर्मि:--प्रक्षेपास्त्रों ( राकेटों ) से; मयेन--परम विज्ञानी मय द्वारा; विहिताभि:--निर्मित; अदृश्य-तूर्भि:--आकाश में अलक्ष्य; लोकानू--विभिन्न लोक; घ्नताम्--संहार करने वालों का; मति-विमोहम्--मन का मोह; अतिप्रलोभम्--अत्यन्त आकर्षक; वेषम्--वेष, पहनावा; विधाय--ऐसा करके; बहु भाष्यते-- अत्यधिक बातें करेगा; औपधर्म्यम्--उपधर्म ।
जब नास्तिक लोग वैदिक विज्ञान में अत्यन्त दक्ष बनकर परम विज्ञानी मय के द्वारा निर्मितश्रेष्ठ प्रक्षेपास्त्रों में चढ़कर आकाश में अदृश्य उड़ते हुए विभिन्न लोकों के वासियों का संहारकरेंगे, तो बुद्ध रूप में अत्यन्त आकर्षक वेष धारण करके भगवान् उनके मस्तिष्कों को मोहलेंगे और उन्हें उपधर्मों का उपदेश देंगे।
यहालियेष्वपि सतां न हरे: कथा: स्युःपाषण्डिनो द्विज-जना वृषला नृदेवा: ।
स्वाहा स्वधा वषडिति सम गिरो न यत्रशास्ता भविष्यति कलेभ॑गवान् युगान्ते ॥
३८॥
यहि--जब ऐसा होता है; आलयेषु--घर में; अपि-- भी; सताम्--सभ्य व्यक्ति; न--नहीं; हरेः -- श्री भगवान् की; कथा: --कथा; स्युः--होगी; पाषण्डिन:--नास्तिक ; द्विज-जना:--अपने को उच्च जाति ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) वाला घोषितकरने वाले; वृषला:--निम्नवर्गीय शूद्र; नू-देवा:--राज्य के मन्त्री; स्वाहा--यज्ञ-स्तोत्र; स्वधा--यज्ञ की सामग्री; वषघट्--यज्ञबेदी; इति--ये सब; स्म--होंगे; गिर: --शब्द; न-- कभी नहीं; यत्र--कहीं भी; शास्ता--दण्ड देने वाला; भविष्यति--प्रकटहोगा; कले:--कलियुग का; भगवान्-- श्री भगवान्; युग-अन्ते--युग के अन्त में
तत्पश्चात् कलियुग के अन्त में, जब तथाकथित सनन््तों तथा द्विजों के घरों में भी ईश्वर कीकथा नहीं होगी और जब सरकार की शक्ति निम्न कुल में उत्पन्न शूद्रों अथवा उनसे भी निम्नलोगों में से चुने गये मन्त्रियों के हाथों में चली जाएगी और जब यज्ञ विधि के विषय में कुछ भी,यहाँ तक कि उच्चारण भी, ज्ञात नहीं रहेंगे तो उस समय भगवान् परम दण्डदाता के रूप मेंप्रकट होंगे।
सर्गे तपोहमृषयो नव ये प्रजेशा:स्थानेथ धर्म-मख-मन्वमरावनीशा: ।
अत्ते त्वधर्म-हर-मन्यु-वशासुराद्यामाया-विभूतय इमाः पुरु-शक्ति-भाजः ॥
३९॥
सर्गे--सृष्टि के प्रारम्भ में; तप:ः-- तपस्या; अहम्--मैं; ऋषय:--ऋषिगण; नव--नौ; ये प्रजेशा: --जो उत्पन्न करने वाले हैं;स्थाने--सृष्टि का पालन करते समय मध्य में; अथ--निश्चय ही; धर्म--धर्म; मख--भगवान् विष्णु; मनु--मनुष्यों के पिता;अमर--देवता जिन पर पालन का भार है; अवनीशा:--विभिन्न लोकों के राजा; अन्ते--अन्त में; तु--लेकिन; अधर्म--अधर्म ;हर--शिव; मन्यु-वश--क्रोध के वशीभूत; असुर-आद्या:--नास्तिक, भक्तों के शत्रु; माया--शक्ति; विभूतय:--शक्तिशालीप्रतिनिधि; इमा:--ये सब; पुरु-शक्ति-भाज:--परम शक्तिशाली भगवान् के ।
सृष्टि के प्रारम्भ में तपस्या, मैं ( ब्रह्मा ) तथा जन्म देने वाले ऋषि प्रजापति रहते हैं; फिर सृष्टिके पालन के अवसर पर भगवान् विष्णु, नियामक देवता तथा विभिन्न लोकों के राजा रहते हैं।
किन्तु अन्त काल में अधर्म बचा रहता है और रहते हैं शिव तथा क्रोधी नास्तिक इत्यादि।
ये सबके सब परम शक्ति रूप भगवान् की शक्ति के विभिन्न प्रतिनिधियों के रूप में रहते हैं।
विष्णोर्नु वीर्य-गणनां कतमोहतीहयः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि ।
चस्कम्भ यः स्व-रहसास्खलता त्रि-पृष्ठंयस्मात् त्रि-साम्य-सदनादुरु-कम्पयानम् ॥
४०॥
विष्णो:-- भगवान् विष्णु का; नु--लेकिन; वीर्य--पराक्रम; गणनाम्--गिनती में; कतम:--ऐसा कौन है; अर्हति--इसे करनेमें सक्षम है; इहह--इस जगत में; यः--जो; पार्थिवानि-- परमाणु; अपि-- भी; कवि:--महान् विज्ञानी; विममे--गिन पाया होगा;रजांसि--कणों को; चस्कम्भ--पकड़ सके; यः--जो; स्व-रहसा-- अपने पैर से; अस्खलता--बिना रुके; त्रि-पृष्ठम्--उच्चतमअन्तरिक्ष; यस्मात्--जिससे; त्रि-साम्य--तीनों गुणों का सन्तुलन; सदनात्--उस स्थान तक; उरू-कम्पयानम्-- अत्यधिकविचलित।
भला ऐसा कौन है, जो विष्णु के पराक्रम का पूरी तरह से वर्णन कर सके ? यहाँ तक किवह विज्ञानी भी, जिसने ब्रह्माण्ड के समस्त कणों के परमाणुओं की गणना की होगी, वह भीऐसा नहीं कर सकता।
वे ही एकमात्र ऐसे हैं जिन्होंने त्रिविक्रम के रूप में जब अपने पाँव को बिना प्रयास के सर्वोच्च लोक, सत्यलोक, से भी आगे प्रकृति के तीनों गुणों की साम्यावस्थातक हिलाया था, तो सारा ब्रह्माण्ड हिलने लगा था।
नान्तं विदाम्यहममी मुनयोग्र-जास्तेमाया-बलस्य पुरुषस्य कुतोवरा ये ।
गायन् गुणान् दश-शतानन आदि-देवःशेषोधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥
४१॥
न--कभी नहीं; अन्तमू--अन्त, पार; विदामि--जानता हूँ; अहम्--मैं; अमी--तब ये सब; मुनयः --मुनिगण; अग्र-जा:--तुमसे पूर्व उत्पन्न; ते--तुम; माया-बलस्य--सर्वशक्तिमान का; पुरुषस्य--पुरुष ( भगवान् ) का; कुत:--अन्यों की क्या बात;अवराः--हमारे बाद उत्पन्न; ये--जो; गायन्--गीत के द्वारा; गुणानू--गुण; दश-शत-आननः:--एक सहतस्त्र मुखों वाला;आदि-देवः--भगवान् का प्रथम अवतार; शेष:--शेष नामक; अधुना--आज तक; अपि-- भी; समवस्यति--पा सकता है;न--नहीं; अस्य--उसका; पारमू--पार, अन्त ।
न तो मैं और न तुमसे पहले उत्पन्न हुए मुनिगण ही सर्वशक्तिमान भगवान् को भलीभाँतिजानते हैं।
अतः जो हमारे बाद उत्पन्न हुए हैं, वे उनके विषय में क्या जानेंगे? यहाँ तक किभगवान् के आदि-अवतार शेष भी, जो अपने एक सहस्त्र मुखों से भगवान् के गुणों का वर्णनकरते रहते हैं, ऐसे ज्ञान का अन्त नहीं पा सके हैं।
येषां स एब भगवान् दययेदनन्तःसर्वात्मनाश्नित-पदो यदि निर्व्यलीकम् ।
ते दुस्तरामतितरन्ति च देव-मायांनैषां ममाहमिति धीः श्व-श्रुगाल-भक्ष्ये ॥
४२॥
येषाम्--केवल उन्हीं पर; सः--भगवान्; एष:--यह; भगवान्-- श्रीभगवान्; दययेत्-- दया दिखाता है; अनन्तः--अनन्तशक्तियाँ; सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से, बिना हिचक के; आश्रित-पदः--शरणागत जीव; यदि--यदि इस प्रकार शरण मेंआता है; निर्व्यलीकम्--बिना बनावट के; ते--केवल वे; दुस्तराम्--दुर्लघ्य; अतितरन्ति--पार पा सकते हैं; च--तथा सामग्री;देव-मायाम्-- भगवान् की चतुर्दिक् शक्तियाँ; न--नहीं; एषाम्--उनका; मम--मेरा; अहम्--मैं; इति--इस प्रकार; धी:--चेतना; श्व--कुत्ते; श्रागाल--सियार; भक्ष्ये--भोजन के मामले में।
किन्तु यदि भगवान् की सेवा में निएछल भाव से आत्मसमर्पण करने से परमेश्वर की किसीपर विशेष कृपा होती है, तो वह माया के दुर्लध्य सागर को पार कर सकता है और भगवान् कोजान पाता है।
किन्तु जिसे अन्त में कुत्तों तथा सियारों का भोजन बनना है, ऐसे इस शरीर केप्रति जो आसक्त हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते।
वेदाहमड़ परमस्य हि योग-मायांयूयं भवश्च भगवानथ दैत्य-वर्य: ।
पती मनो: स च मनुश्न तदात्मजाश्वप्राचीनबर्हिऋभुरड्र उत श्रुवश्ष ॥
४३॥
इक्ष्वाकुरैल-मुचुकुन्द-विदेह-गाधि--रघ्वम्बरीष-सगरा गय-नाहुषाद्या: ।
मान्धात्रलर्क -शतधन्वनु-रन्तिदेवादेवब्रतो बलिरमूर्त्तरयों दिलीप: ॥
४४॥
सौभर्युतड्ड-शिबि-देवल-पिप्पलाद--सारस्वतोद्धव-पराशर- भूरिषेणा: ।
येन्ये विभीषण-हनूमदुपेन्द्रदत्त--पार्थाप्टिषिण-विदुर-श्रुतदेव-वर्या: ॥
४५॥
बेद--इसे जानो; अहम्--मैं; अड्भ--हे नारद; परमस्य--परमेश्वर की; हि--निश्चय ही; योग-मायाम्--शक्ति; यूयम्--तुम;भव:--शिव; च--तथा; भगवान्--परम देव; अथ-- भी; दैत्य-वर्य:--नास्तिक के कुल में उत्पन्न भगवद्भक्त, प्रह्मद महाराज;पतली--शतरूपा; मनो:--मनु की; सः--वह; च-- भी; मनु: --स्वायंभुव; च--तथा; तत्-आत्म-जा: च--तथा उनकी सन्तानेंयथा प्रियव्रत, उत्तानपाद, देवहूति इत्यादि; प्राचीनबर्हि:--प्राचीनबर्हिं; ऋभु:--ऋभु; अड्भ:--अंग; उत-- भी; ध्रुव: -- ध्रुव;च--तथा; इक्ष्वाकु:--इक्ष्वाकु; ऐल--ऐल; मुचुकुन्द--मुचुकुन्द; विदेह--महाराज जनक; गाधि--गाधि; रघु--रघु;अम्बरीष--अम्बरीष; सगरा:--सगर; गय--गय; नाहुष--नाहुष; आद्या:--इत्यादि; मान्धातृ--मान्धाता; अलर्क--अलर्क;शतधनु--शतधनु; अनु--अनु; रन्तिदेवा:--रन्तिदेव; देवब्नत: -- भीष्म; बलि:--बलि; अमूर्त्तरय: --अमूर्तरय; दिलीप: --दिलीप; सौभरि--सौ भरि; उतड्डू--उतंक; शिबि--शिबि; देवल--देवल; पिप्पलाद--पिप्पलाद; सारस्वत--सारस्वत; उद्धव--उद्धव; पराशर--पराशर; भूरिषेणा: -- भूरिषेण; ये--जो; अन्ये-- अन्य; विभीषण--विभीषण; हनूमत्--हनुमान; उपेन्द्र-दत्त--शुकदेव गोस्वामी; पार्थ--अर्जुन; आए्टिषिण-- आष्टिषेण; विदुर--विदुर; श्रुतदेव-- श्रुतदेव; वर्या:-- अग्रणी, श्रेष्ठ |
हे नारद, यद्यपि भगवान् की शक्तियाँ अज्ञेय तथा अपरिमेय हैं फिर भी शरणागत जीव होनेके नाते, हम समझ सकते हैं कि वे योगमाया की शक्तियों के द्वारा किस प्रकार कार्य करते हैं।
इसी प्रकार भगवान् की शक्तियाँ सर्वशक्तिमान शिव, नास्तिक कुल के महान् राजा प्रह्मादमहाराज, स्वायंभुव मनु, उनकी पत्नी शतरूपा, उनके पुत्र तथा पुत्रियाँ यथा प्रियव्रत, उत्तानपाद,आकूति, देवहूति तथा प्रसूति; प्राचीनबर्हि, ऋभु, वेन के पिता अंग, महाराज श्रुव, इक्ष्वाकु, ऐल,मुचुकुन्द, महाराज जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, नाहुष, मान्धाता, अलर्क, शतथनु,अनु, रन्तिदेव, भीष्म, बलि, अमूर्त्तर, दिलीप, सौभरि, उतड्ड, शिबि, देवल, पिप्पलाद,सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण, विभीषण, हनुमान, शुकदेव गोस्वामी, अर्जुन, आए;षिण,विदुर, श्रुतदेव इत्यादि को भी ज्ञात हैं।
ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देव-मायांस्त्री-शूद्र-हूण-शबरा अपि पाप-जीवा: ।
यद्यद्भुत-क्रम-परायण-शील-शिक्षा-स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुत-धारणा ये ॥
४६॥
ते--ऐसे पुरुष; बै--निस्सन्देह; विदन्ति--जानते हैं; अतितरन्ति--आगे निकल जाते हैं; च-- भी; देव-मायाम्-- भगवान् कीआच्छादन शक्ति; स्त्री--यथा स्त्री; शूद्र-- श्रमिक वर्ग के लोग; हूण--पर्वती लोग; शबरा:--साइबेरिया वासी या शूद्रों से भीनिम्न; अपि--यद्यपि; पाप-जीवा: --पापी जीव; यदि--बशर्ते कि; अद्भुत-क्रम--आश्चर्यजनक कार्य करने वाला; परायण--भक्त; शील--आचरण; शिक्षा: --के द्वारा प्रशिक्षित; तिर्यक्-जना:--वे भी जो मनुष्य नहीं हैं; अपि-- भी; किम्ू-- क्या; उ--कहा जाय; श्रुत-धारणा:--जिन्होंने भगवान् के विषय में सुनकर भगवान् का भाव ग्रहण किया है; ये--वे ।
पापी जीवन बिताने वाले समुदायों में से भी शरणागत लोग, जैसे स्त्री, शूद्र, हूण तथा शबर,यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी, तत्त्व ज्ञान के विषय में जान सकते हैं।
वे भगवान् के शुद्ध भक्तोंकी शरण में जाकर तथा भक्तिपथ पर उनके पदचिह्नों का अनुसरण कर माया के चंगुल से छूटजाते हैं।
शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोध-मात्रशुद्ध समं सदसतः परमात्म-तत्त्वम् ।
शब्दो न यत्र पुरु-कारकवान् क्रियार्थोमाया परैत्यभिमुखे च विलज्ञमाना ।
तद् वै पदं भगवतः परमस्य पुंसोब्रह्मेति यद्विदुरजस्त्र-सुखं विशोकम् ॥
४७॥
शश्वत्--नित्य; प्रशान्तम्-शान्त; अभयम्--निर्भय; प्रतिबोध-मात्रमू-- भौतिक चेतना के बिल्कुल विपरीत चेतना; शुद्धम्--शुद्ध, मलरहित; समम्-- भेद रहित; सत्-असत:--कारण तथा कार्य का; परमात्म-तत्त्वम्--आदि कारण का नियम; शब्द:--काल्पनिक ध्वनि; न--नहीं; यत्र--जहाँ; पुरु-कारकवान्--सकाम कर्म देने वाला; क्रिया-अर्थ:--यज्ञ के हेतु; माया--माया;'परैति-- भग जाती है; अभिमुखे--के समक्ष; च--भी; विलज्ममाना--लज्जित होकर; तत्--वह; बै--निश्चय ही; पदम्--परमअवस्था; भगवतः-- श्री भगवान् का; परमस्य--परम; पुंसः--पुरुष का; ब्रह्म--ब्रह्म; इति--इस प्रकार; यत्--जो; विदु:--विदित; अजस्त्र--असीम; सुखम्--सुख; विशोकम्--शोकरहित |
परब्रह्म के रूप में जिसकी अनुभूति की जाती है, वह शोकरहित असीम आनन्द से युक्त है।
यह निश्चय ही परमभोक्ता भगवान् की अनन्तिम अवस्था है।
वह शाश्वत रूप में सारे विघ्नों सेरहित तथा निर्भय है।
वह पदार्थ नहीं, अपितु परिपूर्ण चेतना है।
वह संदूषण मुक्त है, भेदरहित हैऔर समस्त कारणों तथा कार्यों का आदि कारण है, जिसमें सकाम कर्मो के लिए न तो यज्ञकरना होता है और न जिसके सामने माया ठहरती है।
सश्नूयड्ः नियम्य यतयो यम-कर्त-हेतिं ।
जह्यु: स्वराडिव निपान-खनित्रमिन्द्र: ॥
४८ ॥
सश्चूयक्--कृत्रिम कल्पना या चिन्तन; नियम्य--वश में करके; यतय:--योगीजन; यम-कर्त-हेतिमू--आध्यात्मिक अनुशीलनकी प्रक्रिया; जह्यु:--त्याग दी जाती है; स्वराट्--पूर्णतया स्वतन्त्र; इब--सहृश; निपान--कुँआ; खनित्रम्--खोदने का कष्ट;इन्द्र:--वर्षा का नियामक देवता।
ऐसी दिव्य अवस्था में ज्ञानियों तथा योगियों द्वारा न तो कृत्रिम रीति से मन को वश में करनेकी, न ही कल्पना या चिन्तन की आवश्यकता रहती है।
मनुष्य ऐसी विधियों को उसी प्रकार त्याग देता है, जिस प्रकार स्वर्ग का राजा इन्द्र क;ुँआ खोदने का कष्ट नहीं उठाता।
स श्रेयसामपि विभुर्भगवान् यतोस्यभाव-स्वभाव-विहितस्य सतः प्रसिद्धि: ।
देहे स्व-धातु-विगमेनुविशीर्यमाणेव्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेउज: ॥
४९॥
सः--वह; श्रेयसाम्--समस्त कल्याण; अपि-- भी; विभु:--स्वामी; भगवान्-- भगवान्; यत:-- क्योंकि; अस्य--जीवात्माका; भाव--गुण; स्व-भाव--अपना स्वभाव; विहितस्य--कार्य; सतः--समस्त उत्तम कार्य; प्रसिद्धिः--अन्तिम सफलता;देहे--शरीर के; स्व-धातु--निर्माणक तत्त्व; विगमे--नष्ट होने पर; अनु--बाद में; विशीर्यमाणे -- त्याग दिये जाने पर; व्योम--आकाश; इब--समान; तत्र--तत्पश्चात्; पुरुष:--जीवात्मा; न-- कभी नहीं; विशीर्यते--नष्ट होता है; अज:--अजन्मा
जो कुछ भी कल्याणकर है उसके परम स्वामी भगवान् हैं, क्योंकि जीवात्मा जो भी कर्मकरता है, चाहे वे भौतिक अथवा आध्यात्मिक अवस्था में किये जाँय, सबका फल देनेवाले भगवान् हैं।
इस प्रकार वह परम उपकारी है।
प्रत्येक जीवात्मा अजन्मा है, अतः इस भौतिकतत्त्वमय शरीर के विनष्ट होने के बाद भी, यह शरीर उसी प्रकार बना रहता है, जिस प्रकार शरीरके भीतर वायु रह जाती है।
सोडयं तेडभिहितस्तात भगवान् विश्व-भावन: ।
समासेन हरेर्नान््यदन्यस्मात् सदसच्च यत् ॥
५०॥
सः--वह; अयम्--वही; ते--तुमको; अभिहितः --मेरे द्वारा कहा गया; तात--हे पुत्र; भगवान्-- भगवान्; विश्व-भावन: --प्रकट ब्राह्मणों के स्त्रष्ठा; समासेन--संक्षेप में; हरे: --हरि अर्थात् भगवान् के बिना; न--कभी नहीं; अन्यत्--अन्य कोई वस्तु;अन्यस्मात्ू--कारणस्वरूप; सत्--प्रकट, गोचर; असत्--तात्त्विक; च--तथा; यत्--चाहे जो भी हो |
हे पुत्र, मैंने तुम्हें संक्षेप में प्रकट जगतों के स्त्रष्टा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विषय मेंबतलाया है।
गोचर तथा तात्विक अस्तित्व का कारण हरि के अतिरिक्त और कोई नहीं है।
इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् ।
सड्ग्रहोयं विभूतीनां त्वमेतद् विपुली कुरू ॥
५१॥
इदम्--यह; भागवतम्--तत्त्वज्ञान; नाम--नामक; यत्--जो; मे--मुझको; भगवता-- श्रीभगवान् से; उदितम्-- प्रकाशित;सड़्ग्रह:--संकलन; अयम्--उसकी; विभूतीनाम्ू--विभिन्न शक्तियों का; त्वमू--तुम; एतत्--यह तत्त्वज्ञान; विपुली--विस्तार;कुरु--करो |
हे नारद, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने ही मुझे यह श्रीमद्भागवत नामक तत्त्व-ज्ञान संक्षिप्तरूप में बतलाया था और यह उनकी विभिन्न शक्तियों का संग्रह है।
अब तुम स्वयं इस ज्ञान का विस्तार करो।
यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति ।
सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सड्डूल्प्य वर्णय ॥
५२॥
यथा--जिस प्रकार; हरौ--हरि में; भगवति-- भगवान् में; नृणाम्-मनुष्यों के लिए; भक्ति:--भक्ति; भविष्यति-- प्रकाशितहो; सर्व-आत्मनि--परम पूर्ण; अखिल-आधारे--सबके आश्रय को; इति--इस प्रकार; सड्जूल्प्य--ह॒ढ़ निश्चय द्वारा; वर्णय--वर्णन करो।
तुम इस भगवदज्ञान का संकल्पपूर्वक इस विधि से वर्णन करो जिससे कि सभी मनुष्य,प्रत्येक जीव के परमात्मा तथा समस्त शक्तियों के आधारस्वरूप भगवान् हरि के प्रति दिव्य भक्तिउत्पन्न कर सकें।
मायां वर्णयतोमुष्य ईश्वरस्थानुमोदतः ।
श्रुण्वतः श्रद्धया नित्यं माययात्मा न मुहाति ॥
५३॥
मायाम्ू-बहिरंगा शक्ति के व्यापार; वर्णयत:--वर्णन करते हुए; अमुष्य-- भगवान् के; ईश्वरस्थ-- श्री भगवान् के;अनुमोदत:--इस प्रकार प्रशंसित; श्रृण्वतः--इस प्रकार सुनते हुए; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; नित्यमू--नियमित रूप से; मायया--माया के द्वारा; आत्मा--जीवात्मा; न--कभी नहीं; मुहाति--मोहग्रस्त होता है
विभिन्न शक्तियों से सम्बंधित भगवान् के कार्यकलापों का वर्णन, उनकी प्रशंसा तथा उनकाश्रवण परमेश्वर की शिक्षाओं के अनुसार होना चाहिए।
यदि नियमित रूप से श्रद्धा तथासम्मानपूर्वक ऐसा किया जाता है, तो मनुष्य निश्चित रूप से भगवान् की माया से उबर जाता है।
