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अध्याय तीन: शुद्ध भक्ति सेवा: हृदय में परिवर्तन
2.3श्री -शुक उवाचएवमेतन्निगदितं पृष्ठवान् यदभवान् मम ।
नृणां यन्प्रियमाणानां मनुष्येषु मनीषिणाम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह; एतत्--यह सब; निगदितम्--उत्तरित; पृष्टवान्--तुम्हारेपूछे जाने पर; यत्--जो; भवान्--आपने; मम--मुझसे; नृणाम्--मानव का; यत्--जो; प्रियमाणानाम्--मरणासन्न;मनुष्येषु--मनुष्यों में; मनीषिणाम्--बुद्धिमान मनुष्यों के ।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज परीक्षित, आपने मुझसे मरणासतन्न बुद्धिमानमनुष्य के कर्तव्य के विषय में जिस प्रकार जिज्ञासा की, उसी प्रकार मैंने आपको उत्तर दिया है।
ब्रह्म-वर्चस-कामस्तु यजेत ब्रह्मण: पतिम् ।
इन्द्रमिन्द्रिय-कामस्तु प्रजा-काम: प्रजापतीन् ॥
२॥
देवीं मायां तु श्री-कामस्तेजस्कामो विभावसुम् ।
वसु-कामो वबसून् रुद्रान् वीर्य-कामोथ वीर्यवान् ॥
३॥
अन्नाद्य-कामस्त्वदितिं स्वर्ग -कामोदितेः सुतान् ।
विश्वान्देवान् राज्य-काम: साध्यान्संसाधको विशाम् ॥
४॥
आयुष्कामोश्चिनौ देवौ पुष्टि-काम इलां यजेत् ।
प्रतिष्ठा-काम: पुरुषो रोदसी लोक-मातरौ ॥
५॥
रूपाभिकामो गन्धर्वान् स्त्री-कामोप्सर उर्वशीम् ।
आधिपत्य-काम: सर्वेषां यजेत परमेष्ठटिनम् ॥
६॥
यज्ञ यजेदू यशस्काम: कोश-काम: प्रचेतसम् ।
विद्या-कामस्तु गिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम् ॥
७॥
ब्रह्म--परम; वर्चस--तेज; काम: तु--जो उनकी कामना करता है; यजेत--पूजें; ब्रह्मण:--वेदों के; पतिम्--स्वामी को;इन्द्रमू--स्वर्ग के राजा को; इन्द्रिय-कामः तु--लेकिन जो प्रबल इन्द्रिय का इच्छुक है; प्रजा-काम:--सन्तान चाहनेवाला;प्रजापतीन्--प्रजापतियों को; देवीम्--देवी को; मायाम्--संसार की स्वामिनी को; तु-- भी; श्री-काम: --सौन्दर्य की कामना'करनेवाला; तेज:--शक्ति; काम: --चाहनेवाला; विभावसुम्--अग्निदेव को; वसु-काम: --सम्पत्ति चाहनेवाला; वसूनू--बसुओं को; रुद्रानू--शिवजी के रुद्र अंशों को; वीर्य-काम:--बलिष्ठ बनने का इच्छुक; अथ--इसीलिए; वीर्यवान्--अत्यन्तशक्तिशाली; अन्न-अद्य--अनाज की; काम:--कामना करनेवाला; तु--लेकिन; अदितिम्--देवताओं की माता अदिति को;स्वर्ग--स्वर्ग की; काम:--अभिलाषा करनेवाला; अदिते: सुतान्ू--अदिति के पुत्रों को; विश्वानू--विश्वदेव को; देवानू--देवताओं को; राज्य-काम:--राज्य की लालसा रखनेवाले; साध्यान्ू--साध्यदेवों को; संसाधक:--इच्छा पूरी करनेवाला;विशामू--वणिक वर्ग की; आयु:-काम:--दीर्घायु चाहनेवाला; अश्विनौ--अश्विनीकुमार नामक; देवौ--दोनों देवताओं को;पुष्टि-काम:--सुगठित शरीर चाहनेवाला; इलाम्--पृथ्वी को; यजेत्--पूजे; प्रतिष्ठा-काम:--यश या पद में स्थिरताचाहनेवाला; पुरुष:--ऐसे व्यक्ति; रोदसी--अन्तरिक्ष; लोक-मातरौ--तथा पृथ्वी को; रूप--सौन्दर्य; अभिकाम:--निश्चित रूपसे कामना करनेवाला; गन्धर्वानू--गन्धर्वों को, जो गंधर्व लोक के रहनेवाले हैं तथा गायन में अत्यन्त पटु होते हैं; स्त्री-काम: --अच्छी पली चाहनेवाला; अप्सर: उर्वशीम्--स्वर्गलोक की अप्सराओं को; आधिपत्य-काम:--दूसरों पर शासन चलाने की इच्छा रखनेवाला; सर्वेषाम्--सबों की; यजेत--पूजा करे; परमेष्ठटिनम्--ब्रह्माण्ड के प्रमुख ब्रह्मा को; यज्ञम्-- भगवान् को;यजेत्--पूजे; यशः-काम: -- प्रसिद्ध होने का इच्छुक; कोश-काम:--अच्छी बैंक-बचत का इच्छुक; प्रचेतसम्--स्वर्ग केकोषाध्यक्ष वरुण को; विद्या-कामः तु--लेकिन जो विद्या का इच्छुक हो; गिरिशम्--हिमालय के स्वामी शिवजी को; दाम्पत्य-अर्थ:--तथा दाम्पत्य प्रेम के लिए; उमाम् सतीमू--शिवजी की सती पत्नी को, जो उमा के नाम से विख्यात हैं।
जो व्यक्ति निर्विशेष ब्रह्मज्योति तेज में लीन होने की कामना करता है, उसे वेदों के स्वामी( भगवान् ब्रह्मा या विद्वान पुरोहित बृहस्पति ) की पूजा करनी चाहिए; जो प्रबल कामवासना काइच्छुक हो, उसे स्वर्ग के राजा इन्द्र की और जो अच्छी सनन््तान का इच्छुक हो, उसे प्रजापतियोंकी पूजा करनी चाहिए।
जो सौभाग्य का आकांक्षी हो, उसे भौतिक जगत की अधीक्षिकादुर्गादेवी की पूजा करनी चाहिए।
जो अत्यन्त शक्तिशाली बनना चाहे, उसे अग्नि की और जोकेवल धन की इच्छा करता हो, उसे वसुओं की पूजा करनी चाहिए।
यदि कोई महान् वीर बननाचाहता है, तो उसे शिवजी के रुद्रावतारों की पूजा करनी चाहिए।
जो प्रचुर अन्न की राशि चाहताहो, उसे अदिति की पूजा करनी चाहिए।
जो स्वर्ग-लोक की कामना करे, उसे अदिति के पुत्रोंकी पूजा करनी चाहिए।
जो व्यक्ति सांसारिक राज्य चाहता हो, उसे विश्वदेव की और जो जनतामें लोकप्रियता का इच्छुक हो, उसे साध्यदेव की पूजा करनी चाहिए।
जो दीर्घायु की कामनाकरता हो, उसे अश्विनीकुमारों की और जो पुष्ट शरीर चाहे, उसे पृथ्वी की पूजा करनी चाहिए।
जो अपनी नौकरी ( पद ) के स्थायित्व की कामना करता हो, उसे क्षितिज तथा पृथ्वी दोनों कीसम्मिलित पूजा करनी चाहिए।
जो सुन्दर बनना चाहता हो, उसे गन्धर्व-लोक के निवासियों कीऔर जो सुन्दर पत्नी चाहता हो, उसे अप्सराओं तथा स्वर्ग की उर्वशी अप्सराओं की पूजा करनीचाहिए।
जो अन्यों पर शासन करना चाहता हो, उसे ब्रह्माण्ड के प्रमुख भगवान् ब्रह्माजी की पूजाकरनी चाहिए।
जो स्थायी कीर्ति का इच्छुक हो, उसे भगवान् की तथा जो अच्छी बैंक-बचतचाहता हो, उसे वरुणदेव की पूजा करनी चाहिए।
और यदि कोई अच्छा वैवाहिक सम्बन्धचाहता है, तो उसे शिवजी की पत्नी, सती देवी उमा, की पूजा करनी चाहिए।
धर्मार्थ उत्तम-श्लोकं तन््तु: तन्वन् पितृन् यजेत् ।
रक्षा-कामः पुण्य-जनानोजस्कामो मरुदगणान् ॥
८ ॥
धर्म-अर्थ:--आध्यात्मिक विकास के लिए; उत्तम-शलोकम्--परमेश्वर या उनके प्रति आसक्त व्यक्तियों को; तन्तु:ः--सन्तान केलिए; तन्वन्--तथा उनकी सुरक्षा के लिए; पितृनू--पितृलोक के वासियों को; यजेत्--पूजे; रक्षा-काम:--सुरक्षा चाहनेवाला;पुण्य-जनानू्--पवित्र व्यक्तियों को; ओज:-काम:--शक्ति चाहनेवाला; मरुतू-गणान्--देवताओं को ।
ज्ञान के आध्यात्मिक विकास के लिए मनुष्य को चाहिए कि भगवान् विष्णु या उनके भक्तकी पूजा करे और वंश की रक्षा के लिए तथा कुल की उन्नति के लिए उसे विभिन्न देवताओं कीपूजा करनी चाहिए।
राज्य-कामो मनून् देवान् निर्क्रतिं त्वभिचरन् यजेत् ।
काम-कामो यजेत् सोममकाम:ः पुरुषं परम् ॥
९॥
राज्य-काम:--राज्य की इच्छा करनेवाला; मनून्--ईश्वर के अर्धअवतार मनुओं को; देवान्--देवताओं को; निर्क्रतिम्--असुरोंको; तु--लेकिन; अभिचरनू--शत्रु पर विजय पाने की इच्छा रखते हुए; यजेत्--पूजे; काम-काम: --इन्द्रिय तृप्ति का इच्छुक;यजेत्--पूजा करे; सोमम्--चन्द्र देवता की; अकाम:--निष्काम; पुरुषम्-परमेश्वर की; परम्--परमजो व्यक्ति राज्य-सत्ता पाने का इच्छुक हो, उसे मनुओं की पूजा करनी चाहिए।
जो व्यक्तिशत्रुओं पर विजय पाने का इच्छुक हो, उसे असुरों की और जो इन्द्रियतृप्ति चाहता हो, उसे चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए।
किन्तु जो किसी प्रकार के भोग की इच्छा नहीं करता, उसे पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करनी चाहिए।
अकाम: सर्व-कामो वा मोक्ष-काम उदार-धीः ।
तीब्रेण भक्ति-योगेन यजेत पुरुषं परम् ॥
१०॥
अकामः--जिसने भौतिक इच्छाओं को पार कर लिया है; सर्व-काम:ः--जिसमें समग्र भौतिक इच्छाएँ हैं; वा--अथवा; मोक्ष-'कामः--मुक्ति की इच्छा रखनेवाला; उदार-धी:--व्यापक बुद्धि वाला; तीव्रेण--तीव्र शक्ति के साथ; भक्ति-योगेन--भगवद्भक्ति द्वारा; यजेत--पूजे; पुरुषम्-- भगवान् को; परमू--परम पूर्ण ।
जिस व्यक्ति की बुद्धि व्यापक है, वह चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा मुक्ति का इच्छुकहो, उसे चाहिए कि सभी प्रकार से परमपूर्ण भगवान् की पूजा करे।
एतावानेव यजतामिह नि: श्रेयसोदय: ।
भगवत्यचलो भावो यद् भागवत-सड्भतः ॥
११॥
एतावान्--ये भिन्न पूजक; एव--निश्चय ही; यजताम्-- पूजा करते हुए; इह--इस जीवन में; नि:श्रेयस--सर्वोच्च वर; उदय: --विकास; भगवति--परमेश्वर पर; अचल:--निश्चल; भाव: --आकर्षण; यत्--जो; भागवत-- भगवान् के शुद्ध भक्त की;सड्डतः--संगति से ।
अनेक देवताओं की पूजा करनेवाले विविध प्रकार के लोग, भगवान् के शुद्ध भक्त कीसंगति से ही सर्वोच्च सिद्धिदायक वर प्राप्त कर सकते हैं, जो भगवान् पर अविचल आकर्षण केरूप में होता है।
ज्ञानं यदाप्रतिनिवृत्त-गुणोर्मि-चक्र-मात्म-प्रसाद उत यत्र गुणेष्वसड्रः ।
कैवल्य-सम्मत-पथस्त्वथ भक्ति-योग:को निर्वृतो हरि-कथासु रतिं न कुर्यात् ॥
१२॥
ज्ञामम्ू-ज्ञान; यत्ू--जो; आ--की सीमा तक; प्रतिनिवृत्त--पूर्णतया निवृत्त; गुण-ऊर्मि-- भौतिक गुणों की तरंगें; चक्रम्--भँवर; आत्म-प्रसाद: --आत्म-संतोष; उत--और भी; यत्र--जहाँ; गुणेषु-- प्रकृति के गुणों में; असड़ः--अनासक्ति; कैवल्य--दिव्य; सम्मत--स्वीकृत; पथ: --पथ, रास्ता; तु--लेकिन; अथ--अतएव; भक्ति-योग: -- भक्ति; क: --कौन; निर्वृत:--लीन;हरि-कथासु-- भगवान् की दिव्य कथाओं में; रतिमू--आकर्षण; न--नहीं; कुर्यात्ू-करेंगे।
भगवान् हरि विषयक दिव्य ज्ञान वह ज्ञान है, जिससे भौतिक गुणों की तरंगें तथा भंवरें पूरीतरह थम जाती हैं।
ऐसा ज्ञान भौतिक आसक्ति से रहित होने के कारण आत्मतुष्टि प्रदानकरनेवाला है और दिव्य होने के कारण महापुरुषों द्वारा मान्य है।
तो भला ऐसा कौन है, जोइससे आकृष्ट नहीं होगा ?
शौनक उवाचइत्यभिव्याहतं राजा निशम्य भरतर्षभः ।
किमन्यत्पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृषिं कविम् ॥
१३॥
शौनक: उबाच--शौनक ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिव्याहतम्--जो कुछ कहा गया; राजा--राजा ने; निशम्य--सुनकर;भरत-ऋषभ: --महाराज परीक्षित; किमू--क््या; अन्यत्-- अधिक ; पृष्टवान्--पूछा; भूयः--पुनः; वैयासकिम्--व्यास के पुत्रसे; ऋषिम्--दक्ष; कविम्--काव्यमय।
शौनक ने कहा : व्यास-पुत्र श्रील शुकेदव गोस्वामी अत्यन्त विद्वान ऋषि थे और बातों कोकाव्यमय ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम थे।
अतएवं जो कुछ उन्होंने कहा, उसे सुनने के बादमहाराज परीक्षित ने उनसे और क्या पूछा ?
एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोहसि भाषितुम् ।
कथा हरि-कथोदर्का: सतां स्यु: सदसि श्रुवम् ॥
१४॥
एतत्--यह; शुश्रूषताम्--सुनने के लिए उत्सुक रहनेवालों का; विद्वनू--हे विद्वान; सूत--सूत गोस्वामी; न:--हम सबों को;अर्हसि--आप कर सकते हैं; भाषितुम्--समझाने के लिए; कथा:--कथाएँ; हरि-कथा-उदर्का:--भगवत्कथा में प्रतिफलितहो; सताम्-भक्तों का; स्यु:--हों; सदसि--सभा में; श्रुवम्--निश्चय ही |
हे विद्वान सूत गोस्वामी, आप हम सबों को ऐसी कथाएँ समझाते रहें, क्योंकि हम सुनने कोउत्सुक हैं।
इसके अतिरिक्त, ऐसी कथाएँ, जिनसे भगवान् हरि के विषय में विचार-विमर्श होसके, भक्तों की सभा में अवश्य ही कही-सुनी जाँय।
स वे भागवतो राजा पाण्डवेयो महा-रथः ।
बाल-क्रीडनकै: क्रीडन् कृष्ण-क्रीडां य आददे ॥
१५॥
सः--वह; वै--निश्चय ही; भागवत:--भगवान् के महान् भक्त; राजा--महाराज परीक्षित; पाण्डवेय:--पाण्डवों का पौत्र; महा-रथः--महान् योद्धा; बाल--बाल्यावस्था में ही; क्रीडनकै: --खिलौनों के साथ; क्रीडन्--खेलते हुए; कृष्ण-- भगवान् कृष्णके; क्रीडामू--कार्य-कलापों को; यः--जिसने; आददे--स्वीकार किया।
पाण्डवों के पौत्र महाराज परीक्षित अपने बाल्यकाल से भगवान् के महान् भक्त थे।
वेखिलौनों से खेलते समय भी अपने कुलदेव की पूजा का अनुकरण करते हुए भगवान् कृष्ण कीपूजा किया करते थे।
वैयासकिश्व भगवान् वासुदेव-परायण: ।
उरुगाय-गुणोदाराः सतां स्युर्हि समागमे ॥
१६॥
वैयासकि:--व्यासदेव के पुत्र; च-- भी; भगवान्--दिव्य ज्ञान से पूर्ण; वासुदेव-- भगवान् कृष्ण पर; परायण: --अनुरक्त;उरुगाय-महान् दार्शनिकों द्वारा महिमान्वित भगवान् कृष्ण का; गुण-उदारा:--महान् गुण; सताम्-भक्तों का; स्यु;--अवश्यहुआ; हि--निश्चय ही; समागमे--उपस्थिति से ।
व्यासपुत्र शुकदेव गोस्वामी दिव्य ज्ञान से पूर्ण भी थे और वसुदेव-पुत्र भगवान् श्रीकृष्ण केमहान् भक्त भी थे।
अतएवं भगवान् कृष्ण-विषयक चर्चाएँ अवश्य चलती रही होंगी, क्योंकिबड़े-बड़े दार्शनिकों द्वारा तथा महान् भक्तों की सभा में कृष्ण के गुणों का बखान होता ही रहताहै।
आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ ।
तस्यतें यत्क्षणो नीत उत्तम-शएलोक-वार्तया ॥
१७॥
आयु:--उप्र; हरति--घटाता है; बै--निश्चय ही; पुंसामू--लोगों की; उद्यनू--उदय होते; अस्तम्--अस्त होते; च-- भी; यन्ू--चलते हुए; असौ--सूर्य; तस्य-- भगवान् की महिमा का गायन करनेवाले का; ऋते--सिवाय; यत्-- जिससे; क्षण: --समय;नीतः--उपयोग किया हुआ; उत्तम-श्लोक--सर्वोत्तम भगवान् की; वार्तया--वार्ताओं में |
उदय तथा अस्त होते हुए सूर्य सबों की आयु को क्षीण करता है, किन्तु जो सर्वोत्तम भगवान्की कथाओं की चर्चा चलाने में अपने समय का सदुपयोग करता हैं, उसकी आयु क्षीण नहीं होती।
तरव: कि न जीवन्ति भस्त्रा: किं न श्वसन्त्युत ।
न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामे पशवोपरे ॥
१८॥
तरवः--वृक्ष; किमू-- क्या; न--नहीं; जीवन्ति--जीवित रहते हैं; भस्त्रा:--धौंकनी; किमू-- क्या; न--नहीं; श्रसन्ति--साँसलेते हैं; उत-- भी; न--नहीं; खादन्ति--खाते हैं; न--नहीं; मेहन्ति--वीर्य स्खलित करते हैं; किम्-- क्या; ग्रामे--स्थान में;'पशव:--पशु-तुल्य जीव; अपरे--अन्यक्या वृक्ष जीते नहीं हैं? क्या लुहार की धौंकनी साँस नहीं लेती? हमारे चारों ओर क्या'पशुगण भोजन नहीं करते ? या वीर्यपात नहीं करते ?
श्र-विड्वराहोष्ट-खरैः संस्तुतः पुरुष: पशु: ।
न यत्कर्ण-पथोपेतो जातु नाम गदाग्रज: ॥
१९॥
श्व--कुत्ता; विटू-वराह--ग्रामीण शूकर, जो विष्ठा खाता है; उष्ट--ऊँट; खरैः--तथा गधों से; संस्तुतः--पूर्णतया प्रशंसित;पुरुष:--व्यक्ति; पशु:--पशु; न--कभी नहीं; यत्--उसका; कर्ण--कान; पथ--रास्ता; उपेत:--पहुँचा हुआ; जातु--किसीसमय; नाम--पवित्र नाम; गदाग्रज:--समस्त बुराइयों से उद्धार करनेवाले भगवान् कृष्ण ।
कुत्तों, सूकरों, ऊँटों तथा गधों जैसे पुरुष, उन पुरुषों की प्रशंसा करते हैं, जो समस्तबुराइयों से उद्धार करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं का कभी भी श्रवण नहींकरते।
बिले बतोरुक्रम-विक्रमान् येन श्रृण्वतः कर्ण-पुटे नरस्य ।
जिह्नासती दार्दुरिकेव सूतन चोपगायत्युरुगाय-गाथा: ॥
२०॥
बिले--साँपों के बिल; बत--सहश; उरुक़्रम--अद्भुत कार्य करनेवाले भगवान्; विक्रमानू--शौर्य ; ये--जो सब; न--कभीनहीं; श्रुण्वतः--सुनते हैं; कर्ण-पुटे--कर्ण-छिठद्रों में; नरस्थ--मनुष्य के; जिह्वा--जी भ; असती--व्यर्थ; दार्दुरिका--मेंढकोंके; इब--सहश; सूत--हे सूत गोस्वामी; न--कभी नहीं; च-- भी; उपगायति--तेजी से उच्चारण करती है; उरुगाय--गानेयोग्य; गाथा: --गीत ।
जिसने भगवान् के शौर्य तथा अदभुत कार्यो की कथाएँ नहीं सुनी हैं तथा जिसने भगवान् के विषय में गीतों को गाया या उच्चस्वर से उच्चारण नहीं किया है, उसके श्रवण-रंक्र मानो साँपके बिल हैं और जीभ मानो मेंढक की जीभ है।
भार: पर पट्ट-किरीट-जुष्ट-मप्युत्तमाड़ुं न नमेन्मुकुन्दम् ।
शावौ करौ नो कुरुते सपर्याहरेल॑सत्काञ्जनन-कड्ढूणौ वा ॥
२१॥
भार:--बहुत बड़ा बोझा; परम्-- भारी; पट्ट--रेशम; किरीट--पगड़ी; जुष्टम्--से सज्जित; अपि-- भी; उत्तम--उत्कृष्ट;अड्भमू--शरीर के अंग; न--कभी नहीं; नमेत्--झुकते हैं; मुकुन्दम्--उद्धार करनेवाले भगवान् कृष्ण को; शावौ--मृतकशरीर; करौ--दो हाथ; नो--नहीं; कुरुते--करते हैं; सपर्याम्-- पूजा; हरेः-- भगवान् की; लसत्--चमचमातेहुए; काझ्नन--सुनहरे; कड्जूणौ--दो कंगन; बा--यद्यपि ।
शरीर का ऊपरी भाग, भले ही रेशमी पगड़ी से सज्जित क्यों न हो, किन्तु यदि मुक्ति के दाताभगवान् के समक्ष झुकाया नहीं जाता तो वह केवल एक भारी बोझ के समान है।
इसी प्रकारचाहे हाथ चमचमाते कंकणों से अलंकृत हों, यदि भगवान् हरि की सेवा में नहीं लगे रहते, तो वेमृत पुरुष के हाथों के तुल्य हैं।
बहयिते ते नयने नराणांलिड्डानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये ।
पादौ नृणां तौ द्रुम-जन्म-भाजौक्षेत्राणि नानुत्रजतो हरेयौं ॥
२२॥
बहायिते--मोर पंखों की भाँति; ते--वे; नयने--आँखें; नराणाम्--मनुष्यों के; लिड्रानि--स्वरूप; विष्णो: -- भगवान् के; न--नहीं; निरीक्षतः--देखते हैं; ये--ऐसे सब; पादौ--पाँव; नृणाम्--मनुष्यों के; तौ--वे; द्रुम-जन्म--वृक्ष से उत्पन्न; भाजौ--उसके सह; क्षेत्राणि--पवित्र स्थल; न--नहीं; अनुब्रजत:--जाते हैं; हरेः-- भगवान् के ; यौ--जो ।
जो आँखें भगवान् विष्णु की प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों ( उनके रूप, नाम, गुण आदि )को नहीं देखतीं, वे मोर पंख में अंकित आँखों के तुल्य हैं और जो पाँव तीर्थ-स्थानों की यात्रानहीं करते ( जहाँ भगवान् का स्मरण किया जाता है ) वे वृक्ष के तनों जैसे माने जाते हैं।
जीवज्छवो भागवताडूप्रि-रेणुंन जातु मर्त्योउभिलभेत यस्तु ।
श्री-विष्णु-पद्या मनुजस्तुलस्या:श्रसज्छवो यस्तु न वेद गन्धम् ॥
२३॥
जीवनू--जीवित रहते हुए; शव: --मृत शरीर; भागवत-अड्प्रि-रेणुम्--शुद्ध-भक्त के चरणों की धूलि; न--कभी नहीं;जातु--किसी भी समय; मर्त्य:--मरणशील, मर्त्य; अभिलभेत--विशेष रूप से प्राप्त; यः--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; श्री--ऐश्वर्य से; विष्णु-पद्या:--विष्णु के चरणकमलों का; मनु-ज:--मनु की संतान ( मनुष्य ); तुलस्या:--तुलसीदल; श्वसन्-- श्वासलेते हुए; शवः--फिर भी शव; यः--जो; तु--लेकिन; न वेद-- अनुभव नहीं किया; गन्धम्--सुगन्धि को ।
जिस व्यक्ति ने कभी भी भगवान् के शुद्धभक्त की चरण-धूलि अपने मस्तक पर धारण नहीं की, वह निश्चित रूप से शव है तथा जिस व्यक्ति ने भगवान् के चरणकमलों पर चढ़े तुलसीदलोंकी सुगगन्धि का अनुभव नहीं किया, वह श्वास लेते हुए भी मृत शरीर के तुल्य है।
तदश्म-सारं हृदयं बतेदंयद् गृह्ममाणैहरि-नाम-थेयै: ।
न विक्रियेताथ यदा विकारोनेत्रे जल॑ गात्र-रुहेषु हर्ष: ॥
२४॥
तत्--वह; अश्म-सारम्ू--फौलाद का बना; हृदयम्--हदय; बत इदम्--निश्चय ही यह; यत्--जो; गृह्ममाणैः --उच्चारण करनेपर भी; हरि-नाम-- भगवान् का पवित्र नाम; धेयैः--मन की एकाग्रता से; न--नहीं; विक्रियेत--बदले; अथ--इस तरह;यदा--जब; विकार: -- प्रतिक्रिया; नेत्रे--आँखों में; जलम्--अश्रु; गात्र-रुहेषु--छिद्रों पर; हर्ष: --उल्लास का प्रस्फुटन।
निश्चय ही वह हृदय फौलाद का बना है, जो एकाग्र होकर भगवान् के पवित्र नाम काउच्चारण करने पर भी नहीं बदलता; जब हर्ष होता है, तो आँखों में आँसू नहीं भर आते औरशरीर के रोम-रोम खड़े नहीं हो जाते।
अथाभिधेहाडु मनोनुकूलं प्रभाषसे भागवत-प्रधान: ।
यदाह वैयासकिरात्म-विद्या--विशारदो नृपतिं साधु पृष्ठ: ॥
२५॥
अथ--अतएव; अभिधेहि--कृपा करके बताएँ; अड्भ--हे सूत गोस्वामी; मनः--मन; अनुकूलम्--हमारी मनोवृत्ति के उपयुक्त;प्रभाषसे--आप कहें; भागवत-- परम भक्त; प्रधान:--प्रमुख; यत् आह--जो कुछ उसने कहा; वैयासकि:--शुकदेव गोस्वामीने; आत्म-विद्या--दिव्य ज्ञान में; विशारद: --पटु; नृपतिम्ू--राजा से; साधु--अत्युत्तम; पृष्ठ: --पूछे जाने पर।
हे सूतगोस्वामी, आपके वचन हमारे मनों को भानेवाले हैं।
अतएव कृपा करके आप हमें यहउसी तरह बतायें जिस तरह से दिव्य ज्ञान में अत्यन्त कुशल परम भक्त शुकदेव गोस्वामी नेमहाराज परीक्षित के पूछे जाने पर उनसे कहा।
