← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची

अध्याय दो: हृदय में भगवान

2.2श्री -शुक उवाचएवं पुरा धारणयात्म-योनि-नष्टां स्मृति प्रत्यवरूध्य तुष्ठात्‌।

तथा ससर्जेदममोघ-दृष्टि-्थाप्ययात्‌ प्राग्‌ व्यवसाय-बुद्द्धि: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; पुरा--विश्व के प्राकट्य के पूर्व; धारणया--ऐसी धारणाद्वारा; आत्म-योनि:--ब्रह्मा जी की; नष्टाम्‌--विनष्ट; स्मृतिम्‌--स्मृति, याददाइत; प्रत्यवरुध्य--पुनः चेतना प्राप्त करके; तुष्टात्‌--भगवान्‌ को प्रसन्न करने के कारण; तथा--तत्पश्चात्‌; ससर्ज--सृजन किया; इृदम्‌--यह भौतिक जगत; अमोघ-दृष्टि:--जिसेस्पष्ट दृष्टि प्राप्त है; यथा--जिस प्रकार; अप्ययात्‌--निर्मित किया; प्राकु--पहले की तरह; व्यवसाय--सुनिश्चित; बुद्दधि:--बुद्धि)

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस ब्रह्माण्ड के प्राकट्य के पूर्व, ब्रह्माजी ने विराट रूप केध्यान द्वारा भगवान्‌ को प्रसन्न करके विलुप्त हो चुकी अपनी चेतना प्राप्त की।

इस तरह वे सृष्टिका पूर्ववत्‌ पुनर्निर्माण कर सके।

शाब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्‍्थायन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थे: ।

परिश्रमंस्तत्र न विन्दतेर्थान्‌मायामये वासनया शयान: ॥

२॥

शाब्दस्य--वैदिक ध्वनि का; हि--निश्चय ही; ब्रह्मण:--वेदों का; एब:--ये; पन्‍्था:--मार्ग; यत्‌--जो है; नामभि:--विभिन्ननामों से; ध्यायति--ध्यान करता है; धीः --बुद्धि; अपार्थ:--व्यर्थ के विचारों से; परिभ्रमन्‌--घूमते हुए; तत्र--वहाँ; न--कभीनहीं; विन्दते-- भोग करता है; अर्थान्‌ू--वास्तविकताओं को; माया-मये--मोहमयी वस्तुओं में; वासनया--विभिन्न इच्छाओं से;शयानः--मानो निद्रा में स्वप्न देख रहा हो |

वैदिक ध्वनियों (वेदवाणी ) को प्रस्तुत करने की विधि इतनी मोहनेवाली है कि यहव्यक्तियों की बुद्धि को स्वर्ग जैसी व्यर्थ की वस्तुओं की ओर ले जाती है।

बद्धजीव ऐसीस्वर्गिक मायामयी वासनाओं के स्वप्नों में मंडराते रहते हैं, लेकिन उन्हें ऐसे स्थानों में सच्चे सुखकी प्राप्ति नहीं हो पाती।

अतः कविर्नामसु यावदर्थ:स्यादप्रमत्तो व्यवसाय-बुद्धिः ।

सिद्धेउन्यथार्थे न यतेत तत्रपरिश्रमं तत्र समीक्षमाण: ॥

३॥

अतः--इस कारण; कवि: --प्रबुद्ध व्यक्ति; नामसु--केवल नाम के लिए; यावत्‌--न्यूनतम; अर्थ:-- आवश्यकता; स्यात्‌--होए; अप्रमत्त:--उनके पीछे पागल हुए बिना; व्यवसाय-बुद्धि: --बुद्धिपूर्वक स्थित; सिद्धे--सफलता के लिए; अन्यथा--अन्यथा; अर्थे--के हित में; न--कभी नहीं; यतेत-- प्रयास करे; तत्र--वहाँ; परिश्रमम्‌--कठोर श्रम; तत्र--वहाँ;समीक्षमाण: --व्यावहारिक दृष्टि से देखनेवाला |

अतएव प्रबुद्ध व्यक्ति को उपाधियों वाले इस जगत में रहते हुए जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए प्रयतल करना चाहिए।

उसे बुद्ध्विमत्तापूर्वक स्थिर रहना चाहिए।

औरअवांछित वस्तुओं के लिए कभी कोई प्रयत्न नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह इससे व्यावहारिकरूप में यह अनुभव करने में सक्षम होता है कि ऐसे सारे प्रयास कठोर श्रम के अतिरिक्त औरकुछ नहीं होते।

सत्यां क्षितौ कि कशिपो: प्रयासै-बाहौ स्वसिद्धे ह्ुपबईणै: किम्‌ ।

सत्यञ्जलौ कि पुरुधान्न-पात्र्यादिग्वल्कलादौ सति कि दुकूलै: ॥

४॥

सत्याम्‌--अधिकार में करके; क्षितौ--पृथ्वी का खंड; किमू--क्या आवश्यकता है; कशिपो:--खाट तथा गद्दों की; प्रयासैः --प्रयास करने से; बाहौ--बाँह के; स्व-सिद्धे--आत्म-निर्भर होने के लिए; हि--निश्चय ही; उपबर्हणैः--गद्दा तथा तकिया से;किम्‌--क्या लाभ है; सति--उपस्थित होकर; अद्खलौ--हथेली में; किम्‌--क्या लाभ है; पुरुधा--व्यंजन, किसमें; अन्न--खाद्यपदार्थों के; पात्या--बर्तनों से; दिकु--खुला स्थान; वल्कल-आदौ--वृक्षों की छाल; सति--होने से; किम्‌--क्या लाभ है;दुकूलैः--वस्त्रों से।

जब लेटने के लिए विपुल भूखंड पड़े हैं, तो चारपाइयों तथा गद्दों की क्या आवश्यकता है?जब मनुष्य अपनी बाँह का उपयोग कर सकता है, तो फिर तकिये की क्या आवश्यकता है ? जबमनुष्य अपनी हथेलियों का उपयोग कर सकता है, तो तरह-तरह के बर्तनों की क्या आवश्यकताहै? जब पर्याप्त ओढ़न अथवा वृक्ष की छाल उपलब्ध हो, तो फिर वस्त्र की क्या आवश्यकताहै?

चीराणि कि पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षांनैवाडप्रिपा: पर-भूतः सरितोप्यशुष्यन्‌ ।

रुद्धा गुहा: किमजितोवति नोपसन्नान्‌कस्माद्‌ भजन्ति कवयो धन-दुर्मदान्धान्‌ ॥

५॥

चीराणि--फटे-पुराने कपड़े; किम्‌--क्या; पथि--मार्ग में; न--नहीं; सन्ति-- हैं; दिशन्ति--दान देते हैं; भिक्षाम्‌--भिक्षा;न--नहीं; एव-- भी; अड्प्रिपा:--वृक्ष; पर-भूत:ः--अन्यों का पालन करने वाली; सरित:--नदियाँ; अपि-- भी; अशुष्यन्‌ --सूख गई हैं; रुद्धा:--बन्द; गुहा:--गुफाएँ; किम्‌--क्या; अजित:-- भगवान्‌; अवति--सुरक्षा प्रदान करता है; न--नहीं;उपसन्नानू--शरणागतों को; कस्मात्‌--तब, किसलिए; भजन्ति--चापलूसी करते हैं; कवयः--विद्वान; धन--सम्पत्ति; दुर्मद-अन्धान्‌ू--अत्यन्त मतवालों को |

क्या सड़कों पर चिथड़े नहीं पड़े हैं? क्या दूसरों का पालन करनेवाले वृक्ष अब दान मेंभिक्षा नहीं देते ? क्या सूख जाने पर नदियाँ अब प्यासे को जल प्रदान नहीं करतीं ? क्या अबपर्वतों की गुफाएँ बन्द हो चुकी हैं? या सर्व-शक्तिमान भगवान्‌ पूर्ण शरणागत आत्माओं कीरक्षा नहीं करते ? तो फिर विद्वान मुनिजन उनकी चापलूसी क्‍यों करते हैं, जो अपनी गाढ़ी कमाईकी सम्पत्ति के कारण प्रमत्त हो गये हैं ?

एवं स्व-चित्ते स्वत एवं सिद्धआत्मा प्रियोर्थों भगवाननन्तः ।

त॑ निर्वृतोी नियतार्थों भजेतसंसार-हेतूपरमश्न यत्र ॥

६॥

एवम्‌--इस प्रकार; स्व-चित्ते--अपने हृदय में; स्वतः--उनकी सर्वशक्तिमत्ता से; एब--निश्चय ही; सिद्धः--पूरी तरह प्रस्तुत;आत्मा--परमात्मा; प्रिय: --अत्यन्त प्रिय; अर्थ: --वस्तु; भगवान्‌-- भगवान्‌; अनन्तः--नित्य असीम, अनन्त; तमू--उसको; निर्वृतः--संसार से विरक्त होकर; नियत--स्थायी; अर्थ: --परम लाभ; भजेत--पूजा करे; संसार-हेतु--संसार की बद्ध अवस्थाका कारण; उपरमः--समाप्ति; च--निश्चय ही; यत्र-- जिसमें |

मनुष्य को इस प्रकार स्थिर होकर, उनकी ( भगवान की ) सर्वशक्तिमत्ता के कारण अपनेहृदय में स्थित परमात्मा की सेवा करनी चाहिए।

चूँकि वे सर्वशक्तिमान, भगवान्‌ नित्य एवंअसीम हैं, अतएवं वे जीवन के चरम लक्ष्य हैं और उनकी पूजा करके मनुष्य बद्ध जीवन केकारण को दूर कर सकता है।

कस्तां त्वनाहत्य परानुचिन्ता-मृते पशूनसतीं नाम कुर्यात्‌ ।

पश्यञ्जनं पतितं वैतरण्यांस्व-कर्मजान्‌ परितापाझुषाणम्‌ ॥

७॥

कः--और कौन; ताम्‌ू--उसको; तु--लेकिन; अनाहत्य--उपेक्षा करके; पर-अनुचिन्ताम्‌--दिव्य विचार; ऋते--बिना;पशून्‌-- भौतिकतावादी; असतीम्‌--क्षण-भंगुर; नाम--नाम को; कुर्यात्‌ू--स्वीकार करेगा; पश्यन्‌--निश्चित रूप से देखते हुए;जनम्‌--जनता, सामान्यजन; पतितम्‌--पतित; बैतरण्याम्‌--दुखों की नदी वैतरणी में; स्व-कर्म-जान्‌--अपने कर्मों से उत्पन्न;परितापान्‌ू--दुखों को; जुषाणम्‌--आक्रान्त ।

निपट भौतिकतावादी के अतिरिक्त कौन ऐसा होगा जो यह देखकर कि जन-सामान्य अपनेकर्मों से मिलने वाले फलों के कारण क्लेशों की नदी में गिरे हुए हैं, ऐसे विचार की उपेक्षा करेऔर केवल क्षणभंगुर नामों को ग्रहण करे ?

केचित्‌ स्व-देहान्तईदयावकाशेप्रादेश-मात्र पुरुष वसन्‍्तम्‌ ।

चतुर्भुजं कञ्ल-रथाड्र--शट्डु--गदा-धरं धारणया स्मरन्ति ॥

८॥

केचित्‌--अन्य लोग; स्व-देह-अन्त:--अपने शरीर के भीतर; हृदय-अवकाशे --हृदय-प्रदेश में; प्रादेश-मात्रमू--एक बित्ता( लगभग आठ इंच ); पुरुषम्‌-- भगवान्‌ को; वसन्तम्‌--वास करते हुए; चतु:-भुजम्‌--चार हाथों वाले; कञ्ल-- कमल; रथ-अड़--रथ का चक्र ( पहिया ); शट्बडु--शंख; गदा-धरम्‌--तथा हाथ में गदा लिए; धारणया--इस प्रकार की धारणा से;स्मरन्ति--उनका स्मरण करते हैं।

अन्य लोग शरीर के हृदय प्रदेश में वास करनेवाले एवं केवल एक बित्ता परिमाण के, चारहाथोंवाले तथा उनमें से प्रत्येक में क्रमश: कमल, रथ का चक्र, शंख तथा गदा धारण किये हुएभगवान्‌ का ध्यान करते हैं।

प्रसन्न-वक्त्र॑ नलिनायतेक्षणंकदम्ब-किल्लल्क-पिशड़-वाससम्‌ ।

लसन्महा-रत्न-हिरण्मयाडुदंस्फुरन्महा-रत्तन-किरीट-कुण्डलम्‌ ॥

९॥

प्रसन्न--प्रसन्नता सूचित करता; वक्‍्त्रमू--मुख; नलिन-आयत--कमल की पंखड़ियों के समान फैली; ईक्षणम्‌-- आँखें;कदम्ब--कदम्ब पुष्प; किल्लल्क--केसर; पिशड्र--पीला; वाससम्‌--वस्त्र; लसत्‌ू--लटकता हुआ; महा-रत्त--बहुमूल्य रत्न;हिरण्मय--स्वर्ण निर्मित; अड्भदम्‌--आभूषण; स्फुरतू--चमकता; महा-रत्त--मूल्यवान रल; किरीट--मुकुट; कुण्डलम्‌--कान के कुण्डल।

उनका मुख उनकी प्रसन्नता को व्यक्त करता है।

उनकी आँखें कमल की पंखड़ियों के समानहैं और उनका वस्त्र कदम्ब पुष्प के केसर के समान पीले रंग का तथा बहुमूल्य रत्नों से जटित है।

उनके सारे आभूषण स्वर्ण से निर्मित तथा रत्नों से जटित हैं।

वे चमकीला मुकुट तथा कुण्डलधारण किये हुए हैं।

उन्निद्र-हत्पड्डुज-कर्णिकालयेयोगेश्वरास्थापित-पाद-पल्लवम्‌ ।

श्री-लक्षणं कौस्तुभ-रत्त-कन्धर-मम्लान-लक्ष्म्या वन-मालयाचितम्‌ ॥

१०॥

उन्निद्र--खिले हुए; हत्‌ू--हृदय; पड्डूज--कमल का फूल; कर्णिका-आलये--पुष्पगुच्छ की सतह पर; योग-ईश्वर--महान्‌योगी; आस्थापित--रखा हुआ; पाद-पल्‍लवम्‌--चरणकमल; श्री--लक्ष्मी या सुन्दर बछड़ा; लक्षणम्‌--इस प्रकार के चिह्न सेयुक्त; कौस्तुभ--कौस्तुभि मणि; रत्न--अन्य रल; कन्धरम्‌--कन्धे पर; अम्लान--ताजा; लक्ष्म्या--सौन्दर्य; वन-मालया--पुष्पहार से; आचितम्‌--फैला हुआ।

उनके चरण-कमल महान्‌ योगियों के कमल-सहृश हृदयों के गुच्छों के ऊपर रखे हैं।

उनकेवक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि है, जिसमें सुन्दर बछड़ा अंकित है और उनके कंधों पर अनेक रत्नहैं।

उनका पूर्ण स्कंध-प्रदेश ताजे फूलों की माला से सज्जित है।

विभूषितं मेखलयाडुलीयकै -महा-धनेर्नूपुर-कड्डूणादिभि: ।

स्निग्धामलाकुश्चित-नील-कुन्तलै-विरोचमानानन-हास-पेशलम्‌ ॥

११॥

विभूषितम्‌--सुसज्जित; मेखलया--करधनी से; अड्डुलीयकै: --अँगूठियों से; महा-धनैः--अत्यन्त मूल्यवान; नूपुर--पायल;'कड्ढूण-आदिभि: --कंकण आदि से; स्निग्ध--चिकना; अमल--निष्कलंक; आकुश्धित--घुँघराले; नील--नीले रंग के ;कुन्तलै:ः--बालों से; विरोचमान--अत्यन्त सुहावना; आनन--मुख; हास--मुस्कान; पेशलम्‌--सुन्दर |

उनकी कमर अलंकृत करधनी से सुशोभित है और उनकी अंगुलियों में बहुमूल्य रत्नों सेजटित अँगूठियाँ हैं।

उनके नूपुर, उनके कंकण, उनके घुँघराले नीले रंग के चिकने बाल तथा उनका सुन्दर मुस्कान-युक्त मुख--ये सभी अत्यन्त लुभावने हैं।

अदीन-लीला-हसितेक्षणोल्लसद्‌-भ्रू-भड़-संसूचित- भूर्य नुग्रहम्‌ ।

ईक्षेत चिन्तामयमेनमी श्वरंयावन्मनो धारणयावतिष्ठते ॥

१२॥

अदीन--अत्यन्त उदार, दैन्यरहित; लीला--लीलाएँ; हसित--हास; ईक्षण--चितवन से; उललसत्‌--चमकता; भ्रू-भड़-- भौहोंका बाँकपन; संसूचित--सूचित; भूरि--विशाल; अनुग्रहम्‌--वर, कृपा; ईक्षेत--एकाग्र करे; चिन्तामयम्‌--दिव्य; एनम्‌ू--इसविशेष; ईश्वरम्‌--परमे श्रर को; यावत्‌-- जब तक; मन:--मन; धारणया--ध्यान से; अवतिष्ठते--स्थिर किया जा सकता है।

भगवान्‌ की भव्य लीलाएँ तथा उनके हास्यमय मुख की उललासमयी चितवन उनके व्यापकवरदानों के संकेत हैं।

अतएव मनुष्य को चाहिए कि जब तक ध्यान द्वारा उसका मन भगवान्‌ परस्थिर रखा जा सके, तब तक मन को उनके इसी दिव्य रूप में एकाग्र करे।

एकैकशोड्नि धियानुभावयेत्‌पादादि यावद्धसितं गदाभूत: ।

जितं जित॑ं स्थानमपोह्य धारयेत्‌पर पर शुद्धयति धीर्यथा यथा ॥

१३॥

एक-एकश:--एक-एक करके, या एक के पश्चात्‌ दूसरा; अज्भनि--अंगों को; धिया-- ध्यान से; अनुभावयेत्‌ -- ध्यान करे;पाद-आदि--पाँव इत्यादि; यावत्‌--जब तक; हसितम्‌--मुसकान; गदा- भूत: -- भगवान्‌; जितम्‌ जितम्‌-- धीरे-धीरे मन कोनियन्त्रित करते हुए; स्थानम्‌ू--स्थान को; अपोह्म --छोड़ कर; धारयेत्‌-- ध्यान करे; परम्‌ परम्‌--उच्चा से उच्चतर; शुद्धगति--शुद्ध होती है; धीः--बुद्द्धि; यथा यथा--जितनी |

ध्यान की प्रक्रिया भगवान्‌ के चरण-कमलों से प्रारंभ करते हुए उसे उनके हँसते मुखमंडलतक ले आये।

इस तरह पहले ध्यान को चरण-कमलों पर एकाग्र करे, फिर पिंडलियों पर, तबजाँघों पर और क्रमश : ऊपर की ओर उठता जाये।

मन जितना ही एक-एक करके भगवान्‌ केविभिन्न अंगों पर स्थिर होगा, बुद्धि उतनी ही अधिक परिष्कृत होगी।

यावन्न जायेत परावरेस्मिन्‌विश्वेश्वरे द्रष्टरे भक्ति-योग: ।

तावत्‌ स्थवीय: पुरुषस्य रूप॑क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥

१४॥

यावत्‌--जब तक; न--नहीं; जायेत--विकसित होता है; पर--दिव्य; अवरे--संसारी; अस्मिन्‌ू--इस रूप में; विश्व-ई श्रे --समस्त जगतों के स्वामी; द्रष्टरे--देखनेवाले को; भक्ति-योग: -- भक्तिमयी सेवा, भक्ति; तावत्‌--तब तक; स्थवीय: --स्थूलभौतिकतावादी; पुरुषस्य--विराट पुरुष का; रूपम्‌ू--विश्वरूप; क्रिया-अवसाने--अपने कर्तव्यों के पूरा होने पर; प्रयतः--सावधानीपूर्वक; स्मरेत--स्मरण करे।

जब तक स्थूल भौतिकतावादी व्यक्ति दिव्य तथा भौतिक दोनों ही जगतों के द्रष्टा परमेश्वरकी प्रेमाभक्ति विकसित न कर ले, तब तक उसे अपने कर्तव्यों को पूरा कर लेने के बाद भगवान्‌के विराट रूप का स्मरण या ध्यान करना चाहिए।

स्थिरं सुखं चासनमास्थितो यति-दा जिहासुरिममड् लोकम्‌ ।

काले च देशे च मनो न सज्येत्‌प्राणान्‌ नियच्छेन्‍्मनसा जितासु: ॥

१५॥

स्थिरम्‌--स्थिर; सुखम्‌--आरामदेह; च-- भी; आसनम्‌--बैठने का आसन; आस्थित:--स्थित होकर; यतिः--साधु ; यदा--जब भी; जिहासु:--त्यागना चाहता है; इमम्‌--इसे; अड्ग--हे राजा; लोकम्‌--शरीर को; काले--समय में; च--तथा; देशे--उचित स्थान में; च-- भी; मनः--मन; न--नहीं; सज्जयेत्‌--उद्ठिग्न न हो; प्राणान्‌--प्राणों को; नियच्छेत्‌--वश में करे;मनसा--मन से; जित-असु:--प्राणवायु को जीतकर।

हे राजनू, जब भी योगी इस मानव लोक को छोड़ने की इच्छा करे तो वह उचित काल यास्थान की तनिक भी इच्छा न करते हुए, सुविधापूर्वक अविचल भाव से आसन लगा ले औरप्राणवायु को नियमित करके मन द्वारा अपनी इन्द्रियों को वश में करे।

मन: स्व-बुद्धयामलया नियम्यक्षेत्र-ज्ञ एतां निनयेत्‌ तमात्मनि ।

आत्मानमात्मन्यवरु ध्य धीरोलब्धोपशान्तिर्विर्मेत कृत्यातू ॥

१६॥

मनः--मन को; स्व-बुद्धया--अपनी बुद्धि से; अमलया--विशुद्ध; नियम्य--नियमित करके ; क्षेत्र-ज्ञे-- जीव को; एतामू--येसब; निनयेत्‌--विलीन करे; तम्‌--उसको; आत्मनि--आत्मा में; आत्मानम्‌--आत्मा को; आत्मनि--परम आत्मा में;अवसरुध्य--बँधकर; धीर:ः--पूर्ण रूप से तुष्ट; लब्ध-उपशान्ति:--जिसने पूर्ण आनन्द प्राप्त कर लिया है; विरमेत--विराम लेताहै; कृत्यातू--अन्य कृत्यों से |

तत्पश्चात्‌ योगी को चाहिए कि वह अपनी विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अपने मन को जीवात्मा मेंतदाकार करे और फिर जीवात्मा को परम आत्मा में विलीन कर दे।

ऐसा करने के बाद, पूर्णतयातुष्ट जीव, तुष्टि की चरमावस्था को प्राप्त होता है, जिससे वह अन्य सारे कार्यकलाप बन्द करदेता है।

न यत्र कालोनिमिषां परः प्रभु:कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे ।

न यत्र सत्त्वं न रजस्तमश्नन वै विकारो न महान्‌ प्रधानम्‌ ॥

१७॥

न--नहीं; यत्र--जहाँ; काल:--विनाशकारी काल; अनिमिषाम्‌--देवताओं का; परः-- श्रेष्ठ; प्रभु:ः--नियन्ता; कुत:--कहाँ है;नु--निश्चय ही; देवा: --देवता; जगताम्‌--संसारी प्राणी; ये--जो; ईशिरे--नियम; न--नहीं; यत्र--जहाँ; सत्त्वमू--संसारीअच्छाई, सतोगुण; न--न तो; रज:--संसारी काम; तमः--संसारी अज्ञान, तमोगुण; च--भी; न--न तो; बै--निश्चय ही;विकार:--रूपान्तर; न--न तो; महान्‌-- भौतिक कारणार्णव; प्रधानम्‌-- भौतिक प्रकृति |

उस लब्धोपशान्ति की दिव्य अवस्था में विनाशकारी काल की श्रेष्ठता नहीं रह पाती, जो उनदेवी-देवताओं का भी नियामक है, जिन्हें संसारी प्राणियों के ऊपर शासन करने की शक्ति प्राप्तहै।

( तो फिर स्वयं देवताओं के विषय में क्या कहा जाये ? )।

इस अवस्था में न तो सतोगुण,रजोगुण या तमोगुण रहते हैं, न ही मिथ्या अहंकार, भौतिक कारणार्णव अथवा न भौतिकप्रकृति ही रह पाती है।

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद्‌यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षव: ।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्य-सौहदाहृदोपगुझ्ाई -पदं पदे पदे ॥

१८॥

'परमू--परम; पदम्‌--पद; वैष्णवम्‌-- भगवान्‌ के साथ; आमनन्ति--वे जानते हैं; तत्‌--वह; यत्‌--जो; न इति--यह नहीं; नइति--यह नहीं; इति--इस प्रकार; अतत्‌--ईश्वर-विहीन; उत्सिसृक्षवः --जो बचना चाहते हैं; विसृज्य--पूर्ण रूप से त्याग कर;दौरात्म्यमू--जटिलताएँ; अनन्य-- पूर्णतया; सौहृदा:--उत्तम अभिलाषा से; हृदा उपगुह्य --हृदय में धारण करके; अर्ह--एकमात्रपूज्य; पदम्‌--चरणकमल; पदे पदे--क्षण-क्षण में |

योगीजन ईश्वर-विहीन प्रत्येक वस्तु से बचना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें उस परम स्थिति कापता है, जिसमें प्रत्येक वस्तु भगवान्‌ विष्णु से सम्बन्धित है।

अतएवं वह शुद्ध भक्त, जो किभगवान्‌ से पूर्ण ऐक्य रखता है, जटिलताएँ उत्पन्न नहीं करता, अपितु भगवान्‌ के चरण-कमलों को हृदय में धारण करके उनकी प्रत्येक क्षण पूजा करता है।

इत्थं मुनिस्तूपरमेद्‌ व्यवस्थितोविज्ञान-हग्वीर्य-सुरन्धिताशय: ।

स्व-पार्ण्गिनापीड्य गुदं ततोनिलंस्थानेषु षट्सून्नमयेज्जित-क्लम: ॥

१९॥

इत्थम्‌ू--इस प्रकार ब्रह्म-साक्षात्कार से; मुनि:ः--दार्शनिक; तु--लेकिन; उपरमेत्‌-- अलग हो ले; व्यवस्थित:-- भली भाँतिस्थित; विज्ञान-हक्‌--वैज्ञानिक दृष्टि से; वीर्य--बल; सु-रन्धित-- भलीभाँति नियमित; आशय: --जीवन-उद्देश्य; स्व-पार्ण्णिना-- अपनी एड़ी से; आपीड्य--रोककर; गुदम्‌--वायुद्वार को; ततः--तत्पश्चात्‌; अनिलम्‌--प्राणवायु को; स्थानेषु--स्थानों में; घट्सु--छः मुख्य; उन्नमयेत्‌--ऊपर उठाये; जित-क्लम:-- भौतिक इच्छाओं को दमित करके |

वैज्ञानिक ज्ञान के बल पर मनुष्य को परम अनुभूति में पूर्ण रूप से स्थिर हो जाना चाहिएऔर इस तरह समस्त भौतिक इच्छाओं को शमन करने में समर्थ हो जाना चाहिए।

मनुष्य कोवायु-द्वार ( गुदा ) को पाँव की एड़ी से बन्द करके तथा प्राणवायु को एक-एक करके क्रमशःछः प्रमुख स्थानों ( चक्रों ) में एक-एक करके ऊपर ले जाना चाहिए और तब भौतिक शरीर कात्याग कर देना चाहिए।

नाभ्यां स्थितं हद्मधिरोप्य तस्मा-दुदान-गत्योरसि त॑ नयेन्मुनिः ।

ततोनुसन्धाय धिया मनस्वीस्व-तालु-मूलं शनकैर्नयेत ॥

२०॥

नाभ्यामू--नाभि में; स्थितम्‌--स्थित; हृदि--हृदय में; अधिरोप्प--रखकर; तस्मात्‌--वहाँ से; उदान--उदान, ऊपर उठाते हुए;गत्य--वेग से; उरसि--छाती पर; तम्‌ू--तत्पश्चात्‌; नयेत्‌--ले जाय; मुनि: --ध्यानवान भक्त; तत:--उनको; अनुसन्धाय--खोज करने के लिए; धिया--बुद्ध्ि से; मनस्वी--ध्यानशील; स्व-तालु-मूलम्‌--तालू के निचले भाग में; शनकै: -- धीरे-धीरे;नयेत--ले जाये।

ध्यानमग्न भक्त को चाहिए कि वह प्राणवायु को धीरे-धीरे नाभि से हृदय में, हृदय से छातीमें और वहाँ से तालु के निचले भाग तक ले जाये।

उसे बुद्धि से समुचित स्थानों को ढूँढनिकालना चाहिए।

तस्माद्‌ भ्रुवोरन्तरमुन्नयेतनिरुद्ध-सप्तायतनोनपेक्ष: ।

स्थित्वा मुहूर्तार्धभकुण्ठ -दृष्टि-निर्भिद्य मूर्धन्‌ विसृजेत्परं गत: ॥

२१॥

तस्मात्‌ू--वहाँ से; भ्रुवो:--भौहों के; अन्तरम्‌--बीच में; उन्नयेत--ले जाना चाहिए; निरुद्ध--रोककर; सप्त--सात;आयतनः--प्राणवायु के बहिर्द्धार; अनपेक्ष:--समस्त भौतिक भोग से स्वतन्त्र; स्थित्वा--रखकर; मुहूर्त-- क्षण भर; अर्धम्‌--आधा; अकुण्ठ-- भगवान्‌ के धाम वापस; दृष्टिः--जिसका ध्येय है; निर्भिद्य-- भेदकर; मूर्थन्‌--ब्रह्मरन्ध्; विसृजेत्‌ू-- अपनाशरीर त्याग दे; परमू--परमे श्वर; गत:--गया हुआ।

तत्पश्चातु, भक्तियोगी को अपनी प्राणवायु दोनों भौहों के मध्य लाना चाहिए और तबप्राणवायु के सातों बहिर्द्धारों को बन्द करके, उसे भगवद्धाम वापस जाने को अपना लक्ष्य बनानाचाहिए।

यदि वह भौतिक भोग की सारी इच्छाओं से मुक्त है, तब उसे ब्रह्मरन्ध्व तक पहुँचना यदि प्रयास्यन्‌ नृप पारमेष्ठ्यवैहायसानामुत यद्‌ विहारम्‌ ।

अष्टाधिपत्यं गुण-सन्निवायेसहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्व ॥

२२॥

यदि--यदि; प्रयास्थनू--इच्छा करने पर; नृप--हे राजा; पारमेष्ठयम्‌-- भौतिक जगत का अधिष्ठाता लोक; वैहायसानाम्‌--वैहायस नामक जीवों का; उत--कहा जाता है; यत्‌--जो है; विहारम्‌-- भोग का स्थान; अष्ट-आधिपत्यम्‌--अष्ट्सिद्धियों कास्वामी; गुण-सन्निवाये--त्रिगुणात्मक जगत में; सह--साथ; एब--निश्चय ही; गच्छेत्‌--जाना चाहिए; मनसा--मन से;इन्द्रिये: --तथा इन्द्रियों से; च-- भीतथापि

हे राजन, यदि योगी में अत्यधिक भौतिक भोगों की, यथा सर्वोच्चलोक ब्रह्मलोकजाने की, या अष्ट-सिद्धियाँ प्राप्त करने की, अथवा वैहायसों के साथ बाह्य अन्तरिक्ष में यात्राकरने, या लाखों लोकों में से किसी एक में स्थान प्राप्त करने की इच्छा बनी रहती है, तो उसेभौतिकता में ढले मन तथा इन्द्रियों को अपने साथ-साथ ले जाना होता है।

योगेश्वराणां गतिमाहुरन्त-ब॑हिस्त्रि-लोक्या: पवनान्तरात्मनाम्‌ ।

न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्तिविद्या-तपो-योग-समाधि-भाजाम्‌ ॥

२३॥

योग-ईश्वराणाम्‌--महान्‌ सन्‍्तों तथा भक्तों का; गतिम्‌ू--गन्तव्य; आहुः--कहा जाता है; अन्तः-- भीतर; बहि:--बाहर; त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों का; पवन-अन्त:ः--वायु के भीतर; आत्मनाम्‌--सूक्ष्म शरीर का; न--कभी नहीं; कर्मभि: --सकामकर्मों के द्वारा; तामू--उस; गतिमू--चालक को; आप्नुवन्ति--प्राप्त करते हैं; विद्या-- भक्ति; तप:--तपस्या; योग--योग-शक्ति; समाधि--ज्ञान; भाजामू--पात्रों को |

योगियों का सम्बन्ध आध्यात्मिक शरीर के होता है।

फलस्वरूप अपनी भक्ति, तपस्या,योगशक्ति तथा दिव्य ज्ञान के बल पर वे भौतिक जगत के भीतर तथा बाहर अबाघ रुप सेविचरण कर सकते हैं।

किन्तु सकाम-कर्मी या निपट भौतिकतावादी इस तरह मुक्त भाव सेकभी विचरण नहीं कर सकते।

वैश्वानरं याति विहायसा गतःसुषुम्णया ब्रह्म-पथेन शोचिषा ।

विधूत-कल्कोथ हरेरुदस्तात्‌प्रयाति चक्र नृप शैशुमारम्‌ ॥

२४॥

वैश्वानरम्-- अग्निदेव; याति--जाता है; विहायसा--आकाश मार्ग ( आकाश-गंगा ) से; गत:ः--पार करके; सुषुम्णया--सुषुण्णा द्वारा; ब्रह्य--ब्रहालोक ; पथेन--पथ से; शोचिषा--प्रकाशमान; विधूत-- धुला हुआ; कल्क:-- धूल, मल; अथ--तत्पश्चात्‌; हरेः--हरि के; उदस्तात्‌--ऊपर; प्रयाति--पहुँचता है; चक्रम्‌--चक्र; नृप--हे राजा; शैशुमारम्‌--शिशुमार नामक |

हे राजन, जब योगी सर्वोच्चलोक ब्रह्मलोक पहुँचने के लिए प्रकाशमान सुषुम्णा द्वाराआकाश-गंगा के ऊपर से गुजरता है, तो वह सर्वप्रथम अग्निदेव के लोक वैजश्वानर जाता है, जहाँवह सारे कल्मषों से परि-शुद्ध हो जाता है।

तब वह भगवान्‌ से तादात्म के लिए उससे भी ऊपरशिशुमार चक्र को जाता है।

तद्‌ विश्व-नाभि त्वतिवर्त्य विष्णो-रणीयसा विरजेनात्मनैक: ।

नमस्कृतं ब्रह्म-विदामुपैतिकल्पायुषो यद्‌ विबुधा रमन्ते ॥

२५॥

तत्‌--उस; विश्व-नाभिम्‌--विराट पुरुष की नाभि को; तु--लेकिन; अतिवर्त्य--पार कर; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु की;अणीयसा--योग-सिद्धि के कारण; विरजेन--शुद्ध की गई; आत्मना--जीव द्वारा; एक: --अकेला; नमस्कृतम्‌-- पूज्य; ब्रह्म-विदाम्‌--अध्यात्म-पद पर स्थित रहनेवालों का; उपैति--पहुँचता है; कल्प-आयुष:--४, ३००, ०००, ००० सौर वर्ष; यत्‌--जहाँपर; विबुधा:--स्वरूपसिद्ध व्यक्ति; रमन्ते-- भोग करते हैंयह शिशुमार चक्र संपूर्ण ब्रह्माण्ड के घूमने की कीली है और यह विष्णु ( गर्भोदकशायीविष्णु ) की नाभि कहलाती है।

केवल योगी ही इस शिशुमार चक्र को पार करता है और ऐसे अथो अनन्तस्य मुखानलेनदन्दह्ममानं स निरीक्ष्य विश्वम्‌ ।

निर्याति सिद्धेश्वर-युष्ट-धिष्ण्यंयद्‌ द्वै-परार्ध्य तदु पारमेछ्यम्‌ ॥

२६॥

अथो--तत्पश्चात्‌; अनन्तस्य--ईश्वर के विश्राम करनेवाले अवतार अनन्त के; मुख-अनलेन--मुख से निकलनेवाली अग्नि से;दन्दह्ममानम्‌-- भस्मी भूत करते हुए; सः--वह; निरीक्ष्य--देखकर; विश्वम्‌-- ब्रह्माण्ड को; निर्याति--बाहर जाता है; सिद्धेश्वर-युष्ट-धिष्ण्यम्‌ू--शुद्धात्मा द्वारा प्रयुक्त वायुयान; यत्‌--स्थान; द्वै-परार्ध्यमू-- १५,४८०, ०००,०००,००० सौर वर्ष; तत्‌--वह;उ-महान्‌; पारमेछ्यम्‌--सत्यलोक जहाँ ब्रह्मा निवास करते हैं संपूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तिम संहार के समय ( ब्रह्मा के जीवन के अन्त में ), अनन्त के मुख से( ब्रह्माण्ड के नीचे से ) अग्नि की ज्वाला फूट निकलती है।

योगी ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों कोभस्म होकर क्षार होते हुए देखता है और वह शुद्धात्माओं द्वारा प्रयुक्त होनेवाले वायुयानों के द्वारासत्यलोक के लिए प्रस्थान करता है।

सत्यलोक में जीवन की अवधि दो परार्ध अर्थात्‌१०५४८०,०००,०००,००० सौर वर्ष आँकी जाती है।

न यत्र शोको न जरा न मृत्यु-नार्तिर्न चोद्वेग ऋते कुतश्चित्‌ ।

यच्चित्ततोद: कृपयानिदं-विदांदुरन्त-दुःख-प्रभवानुदर्शनात्‌ ॥

२७॥

न--कभी नहीं; यत्र--जहाँ है; शोक:--शोक; न--न तो; जरा--बुढ़ापा; न--न तो; मृत्यु:--मृत्यु; न--न तो; अर्ति:-- पीड़ा;न--न तो; च-- भी; उद्देग:--चिन्ताएँ; ऋते--के अतिरिक्त, बिना; कुतश्चित्‌ू--कभी-कभी; यत्‌--के कारण; चित्‌-- चेतना;ततः--तत्पश्चात्‌; अदः--दया; कृपया--हार्दिक दया से; अनू-इदम्‌-विदाम्‌-- भक्तियोग के अनभिज्ञों का; दुरन्‍्त--दुल॑ध्य;दुःख--कष्ट; प्रभवब--बारम्बार जन्म तथा मृत्यु; अनुदर्शनात्‌ू--क्रमिक अनुभव से |

सत्यलोक में न तो शोक है, न बुढ़ापा, न मृत्यु।

वहाँ किसी प्रकार की वेदना नहीं है,जिसके कारण किसी तरह की चिन्ता भी नहीं है।

हाँ, कभी-कभी चेतना के कारण उन लोगोंपर दया उमड़ती है, जो भक्तियोग से अवगत न होने से भौतिक जगत के दुर्लघ्य कष्टों को भोगरहे हैं।

ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय-स्तेनात्मनापोनल-मूर्तिरत्वरन्‌ ।

ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य कालेवाय्वात्मना खं बृहदात्म-लिड्रम्‌ू ॥

२८॥

ततः--तत्पश्चात्‌: विशेषम्‌--विशेषरूप से; प्रतिपद्य--प्राप्त करके; निर्भय:ः --बिना किसी सन्देह के; तेन--उससे; आत्मना--शुद्ध आत्मा; आप:--जल; अनल--अग्नि; मूर्ति:--रूप; अत्वरन्‌ू--पार करके; ज्योति:-मय:--तेजवान; वायुम्‌ू--वायुमण्डलमें; उपेत्य--पहुँचकर; काले--कालक्रम से; वायु--वायु; आत्मना--आत्मा से; खम्‌--आकाश में; बृहत्‌--विशाल; आत्म-लिड्डम--आत्मा का असली स्वरूप।

सत्यलोक पहुँचकर भक्त अपने सूक्ष्म शरीर से, अपने स्थूल शरीर जैसी सत्ता में निर्भयहोकर समाविष्ट हो जाता है और क्रमश: वह भूमि से जल, अग्नि, तेज तथा वायु की अवस्थाएँपार करता हुआ अन्त में स्वर्गीय आकाश में पहुँच पाता है।

घ्राणेन गन्ध॑ रसनेन वै रसंरूप॑ च दृष्टयया श्वसनं त्वचेव ।

श्रोत्रेण चोपेत्य नभो-गुणत्वंप्राणेन चाकूतिमुपैति योगी ॥

२९॥

प्राणेन--सूँघने से; गन्धम्‌--सुगन्ध; रसनेन--स्वाद से; वै--ठीक-ठीक ; रसम्‌--स्वाद; रूपमू-- स्वरूप; च-- भी; दृष्ठया--दृष्टि से; श्रसनम्‌ू--सम्पर्क; त्वचा--स्पर्श; एब--मानो; श्रोत्रेण--कान के कम्पन से; च--भी; उपेत्य--प्राप्त करके; नभः-गुणत्वमू--आकाश की पहचान; प्राणेन--इन्द्रियों से; च-- भी; आकूतिम्‌-- भौतिक कार्य-कलाप; उपैति--प्राप्त करता है;योगी-- भक्त।

इस प्रकार भक्त विभिन्न इन्द्रियों के सूक्ष्म विषयों को पार कर जाता है, यथा सूँघने सेसुगन्धि को, चखने से स्वाद को, स्वरूप देखने से दृष्टि को, सम्पर्क द्वारा स्पर्श को, आकाशीयपहचान से कान के कम्पनों को तथा भौतिक कार्य-कलापों से इन्द्रियों को।

स भूत-सूक्ष्मेन्द्रिय-सन्निकर्षमनोमयं देवमयं विकार्यम्‌ ।

संसाद्य गत्या सह तेन यातिविज्ञान-तत्त्वं गुण-सन्निरोधम्‌ ॥

३०॥

सः--वह ( भक्त ); भूत--स्थूल; सूक्ष्म--तथा सूक्ष्म; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; सन्निकर्षम्‌--उदासीनता का बिन्दु; मन:-मयम्‌--मानसिक स्तर; देव-मयम्‌--सतोगुण में; विकार्यमू--अहंकार; संसाद्य--पार करके; गत्या-- प्रगति से; सह--साथ-साथ;तेन--उनके; याति--जाता है; विज्ञान--पूर्ण ज्ञान; तत्त्म्‌ू--सत्य; गुण--गुण; सन्निरोधम्‌--पूर्ण रूप से अवरुद्ध।

इस तरह से भक्त स्थूल तथा सूक्ष्म आवरणों को पार करके अहंकार के स्तर में प्रवेश करताहै।

उस अवस्था में वह भौतिक गुणों ( रजो तथा तमो गुणों ) को इस उदासीन बिन्दु में विलीनकर देता है और इस तरह वह सतोगुणी अहंकार को प्राप्त होता है।

इसके पश्चात्‌ सारा अहंकारमहत्‌ तत्त्व में विलीन हो जाता है और वह श॒द्ध आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त होता है।

तेनात्मनात्मानमुपैति शान्त-मानन्दमानन्दमयोवसाने ।

एतां गतिं भागवतीं गतो यःसै पुनर्नेह विषज्जतेउड़ ॥

३१॥

तेन--उस शुद्ध; आत्मना--आत्मा द्वारा; आत्मानम्‌--परमात्मा को; उपैति--प्राप्त करता है; शान्तम्‌ू--शान्त; आनन्दम्‌--प्रसन्नता; आनन्द-मय:--स्वाभाविक रूप से ऐसा होने पर; अवसाने--सारे भौतिक कल्मष से रहित होकर; एताम्‌--ऐसा;गतिमू--गन्तव्य; भागवतीम्‌-- भक्तिमयी; गतः-८दवारा प्राप्त; यः--जो व्यक्ति; सः--वह; बै--निश्चय ही; पुन:--फिर; न--कभी नहीं; इह--इस जगत में; विषज्ते--आकृष्ट होता है; अड़--हे महाराज परीक्षित।

केवल विशुद्धात्मा ही भगवान्‌ की संगति की पूर्णता अपनी स्वाभाविक स्थिति में परि-पूर्णआनन्द तथा तुष्टि के साथ प्राप्त कर सकता है।

जो कोई भी ऐसी भक्तिमयी पूर्णता को पुनःजागृत करने में समर्थ होता है, वह इस भौतिक जगत के प्रति फिर से आकृष्ट नहीं होता औरइसमें लौटकर कभी नहीं आता।

एते सूती ते नूप वेद-गीतेत्वयाभिपृष्टे च सनातने च ।

ये वै पुरा ब्रह्मण आह तुष्टआराधितो भगवान्‌ वासुदेव: ॥

३२॥

एते--ये सब, जिनका वर्णन किया गया; सृती--मार्ग; ते--तुम तक; नृप--हे महाराज परीक्षित; वेद-गीते--वेदों केकथनानुसार; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अभिपृष्ट--ठीक से पूछे जाने पर; च-- भी; सनातने--नित्य सत्य के मामले में; च--सचमुच; ये--जो; बै--निश्चय ही; पुरा--पहले; ब्रह्मणे--ब्रह्मजी से; आह-- कहा; तुष्ट:--सन्तुष्ट होकर; आराधित:ः--पूजितहोकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; वासुदेव: -- भगवान्‌ कृष्ण ने |

हे महाराज परीक्षित, आप इतना जान लें कि मैंने आपकी समुचित जिज्ञासा के प्रति जो भीवर्णन किया है, वह वेदों के कथनानुसार है और वही नित्य सत्य है।

इसे साक्षात्‌ भगवान्‌ कृष्णने ब्रह्म से कहा था, क्योंकि वे ब्रह्मा द्वारा समुचित रुप से पूजे जाने पर उनसे प्रसन्न थे।

न ह्ातोउन्य: शिव: पन्था विशत: संसृताविह ।

वासुदेवे भगवति भक्ति-योगो यतो भवेत्‌ ॥

३३॥

न--कभी नहीं; हि--निश्चय ही; अत:--इसके परे; अन्य:--अन्य कुछ; शिव:--कल्याण प्रद; पन्था: --साधन; विशतः --भटकते हुए; संसृतौ-- भौतिक जगत में; इह--इस जीवन में; वासुदेवे--भगवान्‌ वासुदेव कृष्ण में; भगवति-- भगवान्‌; भक्ति-योग:--प्रत्यक्ष भक्ति; यत:--जहाँ; भवेत्‌--ऐसा हो |

जो लोग भौतिक विश्व में भटक रहे हैं, उनके लिए भगवान्‌ कृष्ण की प्रत्यक्ष भक्ति सेबढ़कर मोक्ष का कोई अधिक कल्याणकर साधन नहीं है।

भगवान्‌ ब्रह्म कार्ल्स्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया ।

तदध्यवस्यत्‌ कूट-स्थो रतिरात्मन्‌ यतो भवेत्‌ ॥

३४॥

भगवान्‌--महापुरुष ब्रह्माजी ने; ब्रह्म--वेद; कार्त्स्येन--संक्षिप्तीकरण द्वारा; त्रिः--तीन बार; अन्वीक्ष्य--परीक्षा करके;मनीषया--अ त्यन्त दिद्वत्तापूर्वक; तत्‌ू--वह; अध्यवस्यत्‌--निश्चित किया; कूट-स्थ:--मन की एकाग्रता से; रति:--आकर्षण;आत्मन्‌ ( आत्मनि )--भगवान्‌ श्रीकृष्ण में; यतः--जिसके द्वारा; भवेत्‌--ऐसा होता है

महापुरुष ब्रह्मा ने अत्यन्त मनोयोग से वेदों का तीन बार अध्ययन किया और उनकीभलीभाँति संवीक्षा कर लेने के बाद, वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण के प्रतिआकर्षण ( रति ) ही धर्म की सर्वोच्च सिद्धि है।

भगवान्‌ सर्व-भूतेषु लक्षितः स्वात्मना हरि: ।

हश्यैर्बुद्धयादिभिर्रष्ठा लक्षणरनुमापकै: ॥

३५॥

भगवानू्‌-- भगवान्‌; सर्व--समस्त; भूतेषु--सारे जीवों में; लक्षित:--देखे जाते हैं; स्व-आत्मना-- आत्मा सहित; हरिः--भगवान्‌; दृश्यै:--देखे जाने के द्वारा; बुद्धि-आदिभि:--बुद्धि के द्वारा; द्रष्ठा--देखने वाला; लक्षणै:--विभिन्न लक्षणों से;अनुमापकै:-- परिकल्पना द्वारा।

आत्मा के साथ भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रत्येक जीव में हैं।

यह तथ्य हमारे देखने से तथा बुद्धि सेसहायता लेने पर अनुभूत तथा परिकल्पित होता है।

तस्मात्‌ सर्वात्मना राजन्‌ हरिः सर्वत्र सर्वदा ।

श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्व स्मर्तव्यों भगवात्रूणाम्‌ ॥

३६॥

तस्मात्‌--अतएव; सर्व--सभी; आत्मना--आत्मा; राजन्‌--हे राजा; हरिः-- भगवान्‌; सर्वत्र--सभी जगह; सर्वदा--सदैव;श्रोतव्य: --सुना जाना चाहिए; कीर्तितव्य:--गुणगान किया जाना चाहिए; च-- भी; स्मर्तव्य:--स्मरण किया जाना चाहिए;भगवान्‌-- भगवान्‌; नृणाम्‌--मनुष्यों द्वारा।

हे राजनू, अतएव यह आवश्यक है कि प्रत्येक मनुष्य सर्वत्र तथा सदैव भगवान्‌ का श्रवणकरे, गुणगान करे तथा स्मरण करे।

पिबन्ति ये भगवत आत्मन: सतांकथामृतं श्रवण-पुटेषु सम्भूतम्‌ ।

पुनन्ति ते विषय-विदूषिताशयंब्रजन्ति तच्चरण-सरोरुहान्तिकम्‌ ॥

३७॥

पिबन्ति--पीते हैं; ये--जो; भगवतः--भगवान्‌ का; आत्मन:--अत्यन्त प्रिय; सताम्‌ू-- भक्तों के; कथा-अमृतम्‌ू--सन्देश-रूपीअमृत; श्रवण-पुटेषु--कान के छेदों के भीतर; सम्भृतम्‌--परिपूरित; पुनन्ति--पवित्र करते हैं; ते--उनके ; विषय-- भौतिकभोग; विदूषित-आशयम्‌--कलुषित जीवन लक्ष्य; ब्रजन्ति--वापस जाते हैं; तत्‌-- भगवान्‌ के; चरण--चरण; सरोरुह-अन्तिकमू--कमल के निकट

जो लोग भक्तों के अत्यन्त प्रिय भगवान्‌ कृष्ण की अमृत-तुल्य कथा को कर्णरूपी पात्रों सेभर-भर कर पीते हैं, वे भौतिक भोग के नाम से विख्यात दूषित जीवन-उद्देश्य को पवित्र करलेते हैं और इस प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर के चरणकमलों में भगवद्धाम को वापस जाते हैं।

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