← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची

अध्याय एक: ईश्वर प्राप्ति में पहला कदम

2.1श्री -शुक उवाचवरीयानेष ते प्रश्न: कृतो लोक-हितं नृप ।'आत्मवित्सम्मत:पुंसांश्रोतव्यादिषु यः पर: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; वरीयान्‌--महिमायुक्त; एष:--यह; ते--तुम्हारा; प्रश्न:--प्रश्न, सवाल;कृत:ः--तुम्हारे द्वारा किया गया; लोक-हितम्‌--सभी मनुष्यों के लिए लाभप्रद; नृप--हे राजा; आत्मवित्‌--अध्यात्मवादी,योगी; सम्मतः--स्वीकृत; पुंसामू--सभी पुरुषों का; श्रोतव्य-आदिषु--सभी प्रकार के श्रवण में; यः--जो है; पर:--परम,सर्वश्रेष् ठ

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, आपका प्रश्न महिमामय है, क्योंकि यह समस्तप्रकार के लोगों के लिए बहुत लाभप्रद है। इस प्रश्न का उत्तर श्रवण करने का प्रमुख विषय है और समस्त अध्यात्मवादियों ने इसको स्वीकार किया है।

श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्त्रशः ।अपश्यतामात्म-तत्त्वं गृहेषु गृह-मेधिनाम्‌ ॥

२॥

श्रोतव्य-आदीनि-- श्रवण योग्य विषयों में; राजेन्द्र--हे सप्राट; नृणामू--मानव समाज का; सन्ति--हैं; सहस्त्रश:--सैकड़ों तथाहजारों; अपश्यताम्‌--अंधे का; आत्म-तत्त्वम्‌--आत्म-ज्ञान, परम सत्य; गृहेषु--घर में; गृह-मेधिनाम्‌-- भौतिकता में फँसेव्यक्तियों का

है सप्राट, भौतिकता में उलझे उन व्यक्तियों के पास जो परम सत्य विषयक ज्ञान के प्रतिअंधे हैं, मानव समाज में सुनने के लिए अनेक विषय होते हैं।

निद्रया हियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः ।दिवा चार्थहया राजन्‌ कुटुम्ब-भरणेन वा ॥

३॥

निद्रया--सो करके; हियते--नष्ट करते हैं; नक्तम्‌--रात्रि; व्यवायेन--मैथुन में; च-- भी; वा--या तो; वबः--जीवन-अवधि,आयु; दिवा--दिन; च-- भी; अर्थ--आर्थिक; ईहया--विकास; राजन्‌--हे राजा; कुटुम्ब--पारिवारिक सदस्यों के; भरणेन--पालन करने में; वा--अथवा।।

ऐसे ईर्ष्यालु गृहस्थ ( गृहमेधी ) का जीवन रात्रि में या तो सोने या मैथुन में रत रहने तथा दिनमें धन कमाने या परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण में बीतता है।

देहापत्य-कलत्रादिष्वात्म-सैन्येष्वसत्स्वपि ।

तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥

४॥

देह--शरीर; अपत्य--बच्चे; कलत्र--पती; आदिषु--तथा अन्य सारे सम्बन्धों में; आत्म--निजी; सैन्येषु--सिपाहियों में;असत्सु--पतनशील; अपि--के बावजूद; तेषाम्‌--उन सबों का; प्रमत्त:--अत्यधिक आसक्त; निधनम्‌--विनाश; पश्यन्‌--अनुभव करके; अपि--यद्यपि; न--नहीं; पश्यति--देखते हैं |

आत्मतत्त्व से विहीन व्यक्ति जीवन की समस्याओं के विषय में जिज्ञासा नहीं करते, क्योंकिवे शरीर, बच्चे तथा पत्नी रूपी विनाशोन्मुख सैनिकों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं।

पर्याप्तअनुभवी होने के बावजूद भी वे अपने अवश्यंभावी मृत्यु को नहीं देख पाते।

तस्माद्धारत सर्वात्मा भगवानी श्वरो हरिः ।

श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्व स्मर्तव्यश्रेच्छताभयम्‌ ॥

५॥

तस्मात्‌ू--अतएव; भारत--हे भरतवंशी; सर्वात्मा--परमात्मा; भगवान्‌-- भगवान्‌; ईश्वर: --नियामक; हरि: -- भगवान्‌, जो सारेकष्टों को हरनेवाले हैं; श्रोतव्य:-- श्रवणीय है; कीर्तितव्य:--महिमागायन के योग्य; च-- भी; स्मर्तव्य:--स्मरणीय; च--तथा;इच्छता--इच्छा करनेवाले की; अभयम्‌--स्वतन्त्रता |

हे भरतवंशी, जो समस्त कष्टों से मुक्त होने का इच्छुक है उसे उन भगवान्‌ का श्रवण,महिमा-गायन तथा स्मरण करना चाहिए जो परमात्मा, नियंता तथा समस्त कष्टों से रक्षा करनेवाले हैं।

एतावान्‌ साड्ख्य-योगाभ्यां स्व-धर्म-परिनिष्ठया ।

जन्म-लाभ: पर: पुंसामन्ते नारायण-स्मृति: ॥

६॥

एतावान्‌--ये सब; साड्ख्य--पदार्थ तथा आत्मा विषयक पूर्ण ज्ञान; योगाभ्याम्‌--योगशक्ति के ज्ञान से; स्व-धर्म--विशिष्टवृत्तिपरक कर्तव्य; परिनिष्ठया--पूर्ण अनुभूति के द्वारा; जन्म--जन्म; लाभ:--लाभ; पर: --परम; पुंसामू-- पुरुष का; अन्ते--अन्त में; नारायण-- भगवान्‌ की; स्मृति:--स्मृति, याद |

पदार्थ तथा आत्मा के पूर्ण ज्ञान से, योगशक्ति से या स्वधर्म का भलीभाँति पालन करने सेमानव जीवन की जो सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, वह है जीवन के अन्त में भगवान्‌का स्मरण करना।

प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधि-षेधत: ।

नैर्गुण्य-स्था रमन्ते सम गुणानुकथने हरे: ॥

७॥

प्रायेण--मुख्यतया; मुनयः --सारे मुनि; राजन्‌--हे राजा; निवृत्ता:--ऊपर उठे हुए, निवृत्त; विधि--विधि-विधान; षेधत: --प्रतिबन्धों से; नैर्गुण्य-स्था:-- आध्यात्मिक रूप से स्थित; रमन्ते--आनन्द लेते हैं; स्म--प्रकट रूप से; गुण-अनुकथने--महिमाका वर्णन करते हुए; हरेः-- भगवान्‌ की

हे राजा परीक्षित, मुख्यतया सर्वोच्च अध्यात्मवादी, जो विधि-विधानों एवं प्रतिबन्धों से ऊपरहैं, भगवान्‌ का गुणगान करने में आनन्द का अनुभव करते हैं।

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्म -सम्मितम्‌ ।

अधीततवान्‌ द्वापरादौ पितुद्वैँपायनादहम्‌ ॥

८ ॥

इदम्‌--यह; भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत; नाम--नाम वाला; पुराणम्‌--वैदिक अनुपूरक, पुराण; ब्रह्म-सम्मितम्‌--वेदों के सारस्वरूप स्वीकृत; अधीतवान्‌--अध्ययन किया; द्वापर-आदौ--द्वापर युग के अन्त में; पितु:--अपने पिता से; द्वैघणायनात्‌--द्वैषायन व्यासदेव से;

अहम्‌--मैंने स्वयं द्वापर युग के अन्त में अपने पिता श्रील द्वैपायन व्यासदेव से मैंने श्रीमद्भागवत नाम के इसमहान्‌ वैदिक साहित्य के अनुपूरक ग्रंथ का अध्ययन किया, जो समस्त वेदों के तुल्य है।

परिनिष्ठितोपि नैर्गुण्य उत्तम-शलोक-लीलया ।

गृहीत-चेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान्‌ ॥

९॥

परिनिष्ठित:--पूर्णतया अनुभूत; अपि-- भी; नैर्गुण्ये-- अध्यात्म में; उत्तम--प्रबुद्ध; एलोक--श्लोक; लीलया--लीलाओं केद्वारा; गृहीत--आकृष्ट; चेता:--ध्यान; राजर्षे--हे राजर्षि; आख्यानम्‌--वर्णन, चित्रण; यत्‌--जो; अधीतवान्‌--मैंने अध्ययनकिया है।

हे राजर्षि, मैं दृढ़तापूर्वक अध्यात्म में पूर्ण रूप से स्थित था तथापि मैं उन भगवान्‌ कीलीलाओं के वर्णन के प्रति आकृष्ट हुआ, जिनका वर्णन उत्तम एलोकों द्वारा किया जाता है।

तदहं तेडभिधास्यामि महा-पौरुषिको भवान्‌ ।

यस्य श्रदधतामाशु स्यान्मुकुन्दे मतिः सती ॥

१०॥

तत्‌--वह; अहम्‌--मैं; ते--तुमको; अभिधास्यामि--सुनाऊँगा; महा-पौरुषिक:-- भगवान्‌ कृष्ण का अत्यन्त निष्ठावान भक्त;भवान्‌--आप; यस्य--जिसका; श्रद्धधताम्‌-पूरी तरह सम्मान तथा ध्यान देनेवाले का; आशु--अत्यन्त शीघ्र; स्थातू-ऐसा हो;मुकुन्दे-- भगवान्‌ में, जो मोक्ष-दाता हैं; मति:-- श्रद्धा; सती--निश्चल |

मैं उसी श्रीमद्भागवत को आपको सुनाने जा रहा हूँ, क्योंकि आप भगवान्‌ कृष्ण केअत्यन्त निष्ठावान भक्त हैं।

जो व्यक्ति श्रीमद्भागवत को पूरे मनोयोग से तथा सम्मानपूर्वक सुनताहै, उसे मोक्षदायक परमेश्वर की अविचल श्रद्धा प्राप्त होती है।

एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतो - भयम्‌ ।

योगिनां नृप निर्णातं हरे्नामानुकीर्तनम्‌ ॥

११॥

एतत्‌--यह है; निर्विद्यमानानाम्‌ू--जो समस्त भौतिक इच्छाओं से पूरी तरह मुक्त हैं, उनका; इच्छताम्‌--जो समस्त प्रकार केभौतिक भोग के इच्छुक हैं, उनका; अकुतः-भयम्‌--समस्त सन्देहों तथा भय से मुक्त; योगिनाम्‌--आत्मतुष्टों का; नृप--हेराजा; निर्णीतम्‌--निश्चित सत्य; हरेः-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण का; नाम--पवित्र नाम; अनु--किसी के पीछे, सदैव; कीर्तनम्‌--कीर्तन

हे राजन, महापुरुषों का अनुगमन करके भगवान्‌ के पवित्र नाम का निरन्तर कीर्तन उनसमस्त लोगों के लिए सफलता का निःसंशय तथा निर्भीक मार्ग है, जो समस्त भौतिक इच्छाओंसे मुक्त हैं, अथवा जो समस्त भौतिक भोगों के इच्छुक हैं और उन लोगों के लिए भी, जो दिव्यज्ञान के कारण आत्मतुष्ट हैं।

कि प्रमत्तस्य बहुभिः परोक्षैर्हायनैरिह ।

वरं मुहूर्त विदितं घटते श्रेयसे यत: ॥

१२॥

किम्‌--क्या है; प्रमत्तस्य--मोहग्रस्त का; बहुभि: --बहुतों के द्वारा; परोक्षे:--अनुभव-विहीन; हायनै: --वर्षो तक; इह--इससंसार में; वरम्‌-- श्रेष्ठ; मुहूर्तमू--एक क्षण; विदितम्‌--चेतन; घटते--प्रयास कर सकता है; श्रेयसे--परमार्थ के मामले में;यत:--जिससे।

ऐसे दीर्घ जीवन से क्या लाभ, जिसे इस संसार में वर्षो तक अनुभवहीन बने रहकर गँवादिया जाये? इससे तो अच्छा है पूर्ण चेतना का एक क्षण, क्योंकि इससे उसके परम कल्याणका मार्ग प्रशस्त होता है।

खट्वाड़ो नाम राजर्षिज्ञात्वेयत्तामिहायुष: ।

मुहूर्तात्सर्वमुत्सृज्य गतवानभयं हरिम्‌ ॥

१३॥

खट्वाड्--राजा खट्वांग; नाम--नामक; राज-ऋषि:--ऋषितुल्य राजा; ज्ञात्वा--जानकर; इयत्ताम्‌-- अवधि; इह--इससंसार में; आयुष:-- अपने जीवन की; मुहूर्तात्‌--एक ही क्षण में; सर्वम्‌--सब कुछ; उत्सृज्य--छोड़कर; गतवान्‌--स्वीकारकिया; अभयम्‌--पूरी तरह सुरक्षित; हरिम्‌-- भगवान्‌ को |

राजर्षि खट्वांग को जब यह सूचना दी गई कि उनकी आयु का केवल एक क्षण ( मुहूर्त )शेष है, तो उन्होंने तुरतत अपने आपको समस्त भौतिक कार्यकलापों से मुक्त करके परम रक्षकभगवान्‌ की शरण ले ली।

तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधि: ।

उपकल्पय तत्सर्व॑ तावद्यत्साम्परायिकम्‌ ॥

१४॥

तब--तुम्हारा; अपि-- भी; एतहिं--अतएव; कौरव्य--हे कुरुवंशी; सप्ताहम्‌--सात दिन, हफ्ता; जीवित--आयु; अवधि: --सीमा; उपकल्पय--सम्पन्न करो; तत्‌--वे; सर्वम्‌--समस्त; तावत्‌--तब तक; यत्‌--जो है; साम्परायिकमू-- अगले जीवन केलिए अनुष्ठान।

हे महाराज परीक्षित, अब आपकी आयु के और सात दिन शेष हैं।

अतएवं इस अवधि मेंआप उन समस्त अनुष्ठानों को सम्पन्न कर सकते हैं, जो आपके अगले जीवन के परम कल्याणके लिए आवश्यक हैं।

अन्त-काले तु पुरुष आगते गत-साध्वस: ।

छिन्द्यादसड-शस्त्रेण स्पूहां देहेडउनु ये च तम्‌ ॥

१५॥

अन्त-काले--जीवन की अन्तिम अवस्था में; तु--लेकिन; पुरुष:--व्यक्ति; आगते--आ करके; गत-साध्वस:--मृत्यु के भयके बिना; छिन्द्यात्‌-काट दे; असड्र--अनासक्ति; शस्त्रेण --हथियार से; स्पृहाम्‌--सारी इच्छाओं को; देहे-- भौतिक शरीर से;अनु--से सम्बन्धित; ये--वे सब; च--तथा; तम्‌ू--उसको |

मनुष्य को चाहिए कि जीवन के अन्तकाल में मृत्यु से तनिक भी भयभीत न हो, अपितु वहभौतिक शरीर से तथा उससे सम्बन्धित सारी वस्तुओं एवं उसकी समस्त इच्छाओं से अपनीआसक्ति तोड़ ले।

स्थानान्तरित कर दिया जाय।

गृहात्‌ प्रत्नजितो धीर: पुण्य-तीर्थ-जलाप्लुतः ।

शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ॥

१६॥

गृहात्‌--अपने घर से; प्रत्नजित:--बाहर जाकर; धीर:--आत्मसंयमी; पुण्य--पतवित्र; तीर्थ--तीर्थ-स्थान; जल-आप्लुत:ः--पूरीतरह धोया हुआ; शुचौ--स्वच्छ किया; विविक्ते--एकान्त; आसीन:--बैठा हुआ; विधिवत्‌--नियमानुसार; कल्पित--सम्पन्नकरके; आसने--आसन पर।

मनुष्य को घर छोड़ करके आत्मसंयम का अभ्यास करना चाहिए।

उसे तीथर्थस्थानों मेंनियमित रूप से स्नान करना चाहिए और ठीक से शुद्ध होकर एकान्त स्थान में आसन जमाना चाहिए।

दिलाने में सहायक होगी।

अभ्यसेन्मनसा शुद्ध त्रिवृद्कह्माक्षरं परम्‌ ।

मनो यच्छेज्जित-श्वासो ब्रह्म-जीजमविस्मरन्‌ ॥

१७॥

अभ्यसेत्‌--अभ्यास करना चाहिए; मनसा--मन से; शुद्धम्‌--पतवित्र; त्रि-वृतू--तीन ( अक्षरों ) से निर्मित; ब्रह्म-अक्षरम्‌--दिव्यअक्षर; परम्‌ू--परम; मन:--मन; यच्छेत्‌ू--वश में करे; जित-श्रास:-- श्वास को नियमित करके; ब्रह्मय--परम; बीजम्‌--बीजको; अविस्मरन्‌--बिना भुलाये।

मनुष्य उपर्युक्त विधि से आसन जमा कर, मन को तीन दिव्य अक्षरों ( अ, उ, म्‌ ) का स्मरणकराये और श्रास-विधि को नियमित करके मन को वश्ञ में करे, जिससे वह दिव्य बीज को नहींभूले।

नियच्छेद्विषये भ्यो क्षान्मनसा बुदर्द्धि-सारथि: ।

मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥

१८॥

नियच्छेतू-- खींच ले; विषयेभ्य:--विषयों से; अक्षान्‌--इन्द्रियों को; मनसा--मन से; बुद्धि--बुद्धि; सारथि: -- हाँकनेवाला;मनः--मन; कर्मभि: --सकाम कर्म से; आक्षिप्तम्‌--लीन रहकर; शुभ-अर्थे-- भगवान्‌ के निमित्त; धारयेत्‌-- धारण करे;धिया--पूर्ण चेतना में |

धीरे-धीरे जब मन उत्तरोत्तर आध्यात्मिक हो जाय, तो उसे इन्द्रिय-कार्यों से खींच लिया जाय(विलग कर लिया जाय )।

इससे इन्द्रियाँ बुद्धि द्वारा वशीभूत हो जायेंगी।

इससे भौतिक कार्य-कलापों में लीन मन भी भगवान्‌ की सेवा में प्रवृत्त किया जा सकता है और पूर्ण दिव्य भाव मेंस्थिर हो सकता है।

तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।

मनो निर्विषयं युकत्वा ततः किज्ञन न स्मरेत्‌ ।

पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥

१९॥

तत्र--तत्पश्चात्‌; एक--एक-एक करके; अवयवम्‌--शरीर के अंगों को; ध्यायेत्‌-- ध्यान करे; अव्युच्छिन्नेन--पूर्णस्वरूप सेविचलित हुए बिना; चेतसा--मन से; मन:--मन; निर्विषयम्‌--विषयों से दूषित हुए बिना; युक्त्वा--जुड़ कर के; तत:--तत्पश्चात्‌; किजल्लन--कुछ भी; न--नहीं; स्मरेत्‌--सोचे; पदम्‌--व्यक्तित्व को; तत्‌ू--वह; परमम्‌--परम; विष्णो:--विष्णु का;मनः--मन; यत्र--जहाँ; प्रसीदति-- प्रसन्न होता है, रमता है।

तत्पश्चात्‌, श्रीविष्णु के पूर्ण शरीर की अव-धारणा को हटाये बिना, एक-एक करके विष्णुके अंगों का ध्यान करना चाहिए।

इस तरह मन समस्त इन्द्रिय-विषयों से मुक्त हो जाता है।

तबचिन्तन के लिए कोई अन्य वस्तु नहीं रह जानी चाहिए।

चूँकि भगवान्‌ विष्णु परम सत्य हैं,अतएव केवल उन्हीं में मन पूर्ण रूप से रम जाता है।

रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढ मन आत्मन: ।

यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम्‌ ॥

२०॥

रज:--रजोगुण; तमोभ्याम्‌--तथा तमोगुण के द्वारा; आक्षिप्तम्‌--उद्देलित; विमूढम्‌--मोहग्रस्त; मन: --मन; आत्मन:--अपना;यच्छेत्‌--सुधार ले; धारणया--( विष्णु की ) धारणा से; धीर:--शान्त; हन्ति--नष्ट करता है; या--वे सब; तत्‌-कृतम्‌--उनकेद्वारा की गई; मलम्‌--गंदी वस्तुओं को।

मनुष्य का मन सदैव रजोगुण द्वारा विचलित और तमोगुण द्वारा मोहग्रस्त होता रहता है।

किन्तु मनुष्य ऐसी धारणाओं को भगवान्‌ विष्णु के सम्बन्ध द्वारा ठीक कर सकता है और इसतरह उनसे उत्पन्न गंदी वस्तुओं को स्वच्छ करके शान्त यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्ति-लक्षण: ।

आशूु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्गमीक्षतः ॥

२१॥

यस्याम्‌--ऐसे सुनियोजित स्मरण से; सन्धार्यमाणायाम्‌-- और इस तरह के अभ्यास में स्थिर होकर; योगिन: --योगीजन; भक्ति-लक्षण:-- भक्तियोग का अभ्यास करके; आशु--शीघ्र; सम्पद्यते--सफलता प्राप्त करता है; योग:-- भक्तिमयी सेवा से सम्बन्ध;आश्रयमू--शरण के अन्तर्गत; भद्रमू--कल्याण; ईक्षतः--देखते हुएहे राजन, स्मरण की इस पद्धति से तथा भगवान्‌ के कल्याणप्रद साकार-स्वरूप का दर्शनकरने के अभ्यास में स्थिर होने से, मनुष्य भगवान्‌ के प्रत्यक्ष आश्रय के अन्तर्गत उनकी भक्तिको शाकघ्र ही प्राप्त कर सकता है।

राजोवाचयथा सन्धार्यते ब्रह्मन्‌ धारणा यत्र सम्मता ।

याहशी वा हरेदाशु पुरुषस्थ मनो-मलम्‌ ॥

२२॥

राजा उवाच--सौभाग्यशाली राजा ने कहा; यथा--जिस तरह; सन्धार्यते-- धारणा बनाई जाती है; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;धारणा--धारणा; यत्र--जहाँ तथा जैसे; सम्मता--संक्षेप में; याह॒शी--जैसी; वा--अथवा; हरेतू--समूल नष्ट करता है;आशु--विलम्ब किये बिना; पुरुषस्य--व्यक्ति के; मन:--मन के; मलमू--मल को

सौभाग्यशाली राजा परीक्षित ने आगे पूछा : हे ब्राह्मण, कृपा करके विस्तार से यह बतायेंकि मन को कहाँ और कैसे लगाया जाये? और धारणा को किस तरह स्थिर किया जाय किमनुष्य के मन का सारा मैल हटाया जा सके ?

श्रीशुक उवाच जितासनो जित-श्वासो जित-सड् जितेन्द्रिय: ।

स्थूले भगवतो रूपे मन: सन्धारयेद्धिया ॥

२३॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; जित-आसन:--संयमित आसन; जित-श्वासः --संयमित श्वास-क्रिया; जित-सड्ड:--संयमित संगति; जित-इन्द्रियः--संयमित इन्द्रियाँ; स्थूले--स्थूल पदार्थ में; भगवत:-- भगवान्‌ के; रूपे--स्वरूप में;मनः--मन को; सन्धारयेत्‌--लगाए; धिया--बुद्धि से |

शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया : मनुष्य को चाहिए कि आसन को नियन्त्रित करे, यौगिकप्राणायाम द्वारा श्वास-क्रिया को नियमित करे और इस तरह मन तथा इन्द्रियों को वश में करे।

फिर ब॒द्धिपूर्वक मन को भगवान्‌ की स्थूल शक्तियों ( विराट रूप ) में लगाये।

विशेषस्तस्य देहोयं स्थविष्ठश्न स्थवीयसाम्‌ ।

यत्रेदं व्यज्यते विश्व भूतं भव्यं भवच्च सत्‌ ॥

२४॥

विशेष:--साकार; तस्य--उसका; देह:--शरीर; अयम्‌--यह; स्थविष्ठ:--स्थूल रूप से भौतिक; च--तथा; स्थवीयसाम्‌ --समस्त पदार्थ का; यत्र--जहाँ; इृदम्‌--ये सारे नियम; व्यज्यते-- अनुभव किया जाता है; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; भूतम्‌--विगत;भव्यमू-- भविष्य; भवत्‌--वर्तमान; च--तथा; सत्‌--फलीभूत, परिणामी ।

सम्पूर्ण व्यवहार-जगत की यह विराट अभिव्यक्ति परम सत्य का साक्षात्‌ शरीर है, जिसमेंब्रह्माण्ड के भूत, वर्तमान एवं भविष्य का अनुभव किया जाता है।

अण्ड-कोशे शरीरेउस्मिन्‌ सप्तावरण-संयुते ।

वैराजः पुरुषो योडसौ भगवान्‌ धारणाश्रय: ॥

२५॥

अण्ड-कोशे--ब्रह्मण्ड-रूपी खोल के भीतर; शरीरे--शरीर में; अस्मिन्‌ू--इस; सप्त--सात; आवरण---आवरण, खोले;संयुते--ऐसा करके; वैराज: --विराट स्वरूप; पुरुष:-- भगवान्‌ के स्वरूप; यः--जो; असौ--वह; भगवान्‌-- भगवान्‌;धारणा--धारणा का; आश्रय:--वस्तु, विषय |

भौतिक तत्त्वों के द्वारा सात प्रकार से प्रच्छन्न ब्रह्माणडीय खोल ( आवरण ) रूपी शरीर केभीतर भगवान्‌ का विराट ब्रह्माण्डीय स्वरूप विराट धारणा का विषय है।

पातालमेतस्य हि पाद-मूलं'पठन्ति पार्ण्णि-प्रपदे रसातलम्‌ ।

महातलं विश्व-सृजोथ गुल्फौतलातलं वे पुरुषस्य जड्डे ॥

२६॥

पातालमू्‌--ब्रह्मण्ड के अधोलोक; एतस्य--उनका; हि--निश्चय ही; पाद-मूलम्‌--पाँवों के तलवे; पठन्ति--वे अध्ययन करतेहैं; पार्ष्णि--एड़ियाँ; प्रपदे--पंजे; रसातलम्‌--रसातल नाम का लोक; महातलम्‌--महातल नामक लोक; विश्व-सृज: --ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा का; अथ--इस प्रकार; गुल्फौ--टखने; तलातलम्‌--तलातल नामक लोक; बै--वे जैसे हैं; पुरुषस्य--विराट पुरुष की; जद्ढे--पिंडलियाँ ।

जिन पुरुषों ने इसकी अनुभूति की है, उन्होंने यह अध्ययन किया है कि पाताल लोक विराटपुरुष के पाँवों के तलवे हैं तथा उनकी एड़ियाँ और पंजे रसातल लोक हैं।

टखने महातल लोकहैं तथा उनकी पिंडलियाँ तलातल लोक हैं।

द्वे जानुनी सुतलं विश्व-मूर्ते -रूरु-द्वयं वितलं चातलं च ।

महीतलं तज्जघनं महीपतेनभस्तलं नाभि-सरो गृणन्ति ॥

२७॥

द्वे--दो; जानुनी--घुटने; सुतलमू--सुतल नामक लोक; विश्व-मूर्तें:--विराट रूप के; ऊरु-द्वयम्‌--दोनों जाँघें; वितलम्‌--वितल लोक; च-- भी; अतलम्‌--अतल लोक; च--तथा; महीतलम्‌--महातल लोक; तत्‌--उसका; जघनम्‌--कटि-प्रदेश;महीपते--हे राजा; नभस्तलम्‌--बाह्य अन्तरिक्ष; नाभि-सर:--नाभि का गट्ढा; गृणन्ति--कहते हैं |

विश्व-रूप के घुटने सुतल नामक लोक हैं तथा दोनों जाँघें वितल तथा अतल लोक हैं।

कटि- प्रदेश महीतल है और उसकी नाभि का गट्टा बाह्य अन्तरिक्ष है।

उरः-स्थलं ज्योतिरनीकमस्यग्रीवा महर्वदनं वै जनोस्य ।

तपो वराटीं विदुरादि-पुंसःसत्यं तु शीर्षाणि सहस्त्र-शीर्ष्ण: ॥

२८॥

उरः--उच्च; स्थलम्‌--स्थान ( छाती ); ज्योतिः-अनीकमू-- ज्योतिष्क; अस्य--उसकी; ग्रीवा--गर्दन; महः --ज्योतिष्कों केऊपर का लोक; वदनम्‌-- मुख; बै--ठीक उसी तरह; जनः--इस लोक के ऊपर का लोक; अस्य--उनका; तपः--जनः लोकके ऊपर का लोक; वराटीम्‌--मस्तक; विदु:--जाना जाता है; आदि--मूल; पुंसः--पुरुष; सत्यम्‌ू--सर्वोच्च लोक; तु--लेकिन; शीर्षाणि--शिर; सहस्त्र--एक हजार; शीर्ष्ण:--शिरों से युक्त |

विराट रूप वाले आदि पुरुष की छाती ज्योतिष्क ( स्वर्ग ) लोक है, उसकी गर्दन महलोंकहै, उसका मुख जनःलोक है और उसका मस्तक तपःलोक है।

सर्वोच्च लोक, जिसे सत्यलोक कहते हैं, एक हजार सिरों ( मस्तिष्कों ) वाले उनआदि पुरुष का सिर है।

इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्त्रा:कर्णों दिश: श्रोत्रममुष्य शब्द: ।

नासत्य-दस्त्रौ परमस्य नासेघ्राणोस्य गन्धो मुखमग्निरिद्ध: ॥

२९॥

इन्द्र-आदय:--स्वर्ग के राजा इन्द्र इत्यादि देवता; बाहव:ः--बाँहें; आहु:--कहलाते हैं; उस्त्रा:--देवता; कर्णौं--कान; दिशः--चारों दिशाएँ; श्रोत्रमू--सुनने की इन्द्रियाँ; अमुष्य-- भगवान्‌ की; शब्द:--ध्वनि; नासत्य-दस्त्रौ--अश्विनी कुमार नामक देवता;'परमस्य--परम के; नासे--नथुने; प्राण: --सुंगधि की इन्द्रिय; अस्य--उसका; गन्ध: --सुगन्धि; मुखम्‌--मुँह; अग्नि: -- अग्नि;इद्धः--प्रज्वलित ।

इन्द्र इत्यादि देवता उस विराट पुरुष की बाँहें हैं, दसों दिशाएँ उसके कान हैं और भौतिकध्वनि उसकी श्रवणेन्द्रिय है।

दोनों अश्विनीकुमार उसके नथने हैं तथा भौतिक सुगंध उसकीप्राणेन्द्रिय है।

उसका मुख प्रज्वलित अग्नि है।

झौरक्षिणी चकश्षुरभूत्पतड़ःपक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च ।

तदभ्रू-विजृम्भ: परमेष्ठटि-धिष्ण्य-मापोउस्य तालू रस एव जिह्नमा ॥

३०॥

चौ:--अन्तरिक्ष; अक्षिणी--नेत्र-गोलक; चक्षु:--आँखों के; अभूत्‌--ऐसा हुआ; पतड्ढ:--सूर्य; पक्ष्माणि--पलकें ; विष्णो: --भगवान्‌ श्री विष्णु की; अहनी--दिन तथा रात; उभे--दोनों; च--तथा; तत्‌--उसका; भ्रू-- भौहें; विजृम्भ: --गतियाँ;परमेष्ठटि--सर्वोपरि जीव ( ब्रह्मा ); धिष्णयमू--पद; आप:--वरुण, जल का स्वामी; अस्य--उसका; तालू--तालू; रस: --रस;एव--निश्चय ही; जिह्वा--जीभ |

बाह्य अन्तरिक्ष उसकी आँखों के गड्ढे हैं तथा देखने की शक्ति के लिए सूर्य नेत्र-गोलक हैं।

दिन तथा रात पलकें हैं और उसकी भृकुटि की गतियों में ब्रह्म तथा अन्य महापुरुषों का निवासहोता है।

जल का अधीश्वर वरुण उसका तालु तथा सभी वस्तुओं का रस या सार उसकी जीभहै।

छन्दांस्यनन्तस्थ शिरो गृणन्तिदंष्टा यमः स्नेह-कला द्विजानि ।

हासो जनोन्माद-करी च मायादुरन्त-सर्गों यदपाड्ु-मोक्ष: ॥

३१॥

छन्दांसि--वैदिक स्तोत्र; अनन्तस्य--परमेश्वर के; शिर:--मस्तक; गृणन्ति--उनका कहना है; दंष्टाः--दाढ़ें; यम:--यमराज,जो पापियों का निदेशक है; स्नेह-कला:--स्नेह करने की कला; द्विजानि--दाँत; हास:--मुस्कान; जन-उन्माद-करी --अत्यन्तमोहक; च--भी; माया-- भ्रामिका शक्ति; दुरन्‍्त--अजेय; सर्ग:-- भौतिक सृष्टि; यत्‌-अपाड़---जिसकी चितवन; मोक्ष: --विक्षेप |

वे कहते हैं कि वैदिक स्तोत्र भगवान्‌ के मस्तक हैं और मृत्यु का देवता तथा पापियों कोदण्ड देनेवाला यम उनकी दाढ़ें हैं।

स्नेह की कला ही उनके दाँत हैं और सर्वाधिक मोहिनी मायाही उनकी मुस्कान है।

यह भौतिक सृष्टि रूपी महान्‌ सागर उनकी चितवन स्वरूप है।

ब्रीडोत्तरौष्ठोधर एवं लोभोधर्म: स्तनोधर्म-पथोउस्य पृष्ठम्‌ ।

कस्तस्य मेढ़ं वृषणौ चर मित्रोकुक्षिः समुद्रा गिरयोउस्थि-सड्भा: ॥

३२॥

ब्रीड--लज्जा; उत्तर--ऊपरी; ओष्ठ:--होंठ; अधर:--ठुड्ी; एब--निश्चय ही; लोभ: --लालसा; धर्म:--धर्म; स्तन:--वक्षस्थल; अधर्म--अधर्म; पथ: --मार्ग; अस्य--उसका; पृष्ठम्‌--पीठ; कः--ब्रह्मा; तस्थ--उसकी; मेढ़म्‌--जननेन्द्रिय;वृषणौ--अण्डकोश; च-- भी; मित्रौ--मित्रावरुण; कुक्षिः--कमर, कोख,; समुद्रा:--समुद्र; गिरय:--पर्वत; अस्थि--हड्डियाँ;सझ्ञ:--समूह ।

लज्जा भगवान्‌ का ऊपरी होठ है, लालसा उनकी ठुड्डी है, धर्म उनका वक्ष:स्थल तथा अधर्मउनकी पीठ है।

भौतिक जगत में समस्त जीवों के जनक ब्रह्मा जी उनकी जननेन्द्रिय ( लिंग ) हैंऔर मित्रा-वरुण उनके दोनों अण्डकोश हैं।

सागर उनकी कमर है और पर्वत उनकी अस्थियों केसमूह हैं।

नद्योउस्य नाड्योथ तनू-रुहाणिमही-रुहा विश्व-तनोनुपिन्द्र ।

अनन्त-वीर्य: श्वसितं मातरिश्ागतिर्वय: कर्म गुण-प्रवाह: ॥

३३॥

नद्यः--नदियाँ; अस्य--उसकी; नाड्य:--नाडियाँ, नसें; अथ--तत्पश्चात्‌; तनू-रुहाणि--शरीर के बाल; मही-रुहा: --पेड़-पौधे; विश्व-तनो:--विश्व-रूप का; नृप-इन्द्र--हे राजा; अनन्त-वीर्य:--सर्व-शक्तिमान; श्रसितम्‌-- श्रास-क्रिया; मातरिश्रा --वायु; गतिः--गति; वयः--व्यतीत होती आयु; कर्म--कर्म; गुण-प्रवाह:--प्रकृति के गुणों की प्रतिक्रियाएँ

हे राजन, नदियाँ उस विराट शरीर की नसें हैं, वृक्ष रोम हैं और सर्वशक्तिमान वायु उनकीश्वास है।

व्यतीत होते हुए युग उनकी गति तथा प्रकृति के तीनों गुणों की प्रतिक्रियाएँ ही उनके कार्यकलाप हैं।

ईशस्यथ केशान्‌ विदुरम्बुवाहान्‌वासस्तु सन्ध्यां कुरु-वर्य भूम्न: ।

अव्यक्तमाहुईदयं मनश्नस चन्द्रमा: सर्व-विकार-कोशः ॥

३४॥

ईशस्यथ--परम नियन्ता के; केशान्‌--सिर के बाल; विदुः--तुम मुझसे जान लो; अम्बु-वाहान्‌ू--जल ले जाने वाले बादल;वास: तु--वस्त्र; सन्ध्यामू-दिन तथा रात्रि का सन्धि-काल; कुरु-वर्य--हे कुरुओं में श्रेष्ठ; भूम्न:--सर्वशक्तिमान का;अव्यक्तमू-- भौतिक सृष्टि का आदि कारण; आहु:--कहा जाता है; हृदयम्‌--बुद्धि; मनः च--तथा मन; सः--वह; चन्द्रमा:--चन्द्रमा; सर्व-विकार-कोशः --समस्त परिर्वतनों का आगार।

हे कुरुश्रेष्ठ, जल ले जानेवाले बादल उनके सिर के बाल हैं, दिन या रात्रि की सन्धियाँ हीउनके वस्त्र हैं तथा भौतिक सृष्टि का परम कल्याण ही उनकी बुद्धि है।

चन्द्रमा ही उनका मन है,जो समस्त परिवर्तनों का आगार है।

विज्ञान-शक्ति महिमामनन्तिसर्वात्मनोउन्त:-करणं गिरित्रम्‌ ।

अश्वाश्वतर्युष्ट-गजा नखानिसर्वे मृगा: पशव: श्रोणि-देशे ॥

३५॥

विज्ञान-शक्तिमू--चेतना; महिम्‌-पदार्थ का सिद्धान्त; आमनन्ति--वे ऐसा कहते है; सर्व-आत्मन:--सर्व-व्यापी का; अन्तः-करणम्‌--अहंकार; गिरित्रमू-रुद्र ( शिव ); अश्व--घोड़ा; अश्वतरि--खच्चर; उष्ट--ऊँट; गजा:--हाथी; नखानि--नाखून;सर्वे-- अन्य सब; मृगा:-- हिरन; पशव:--चौपाये; श्रोणि-देशे --कटि-प्रदेश में |

पदार्थ का सिद्धान्त ( महत्‌-तत्त्व ) सर्वव्यापी भगवान्‌ की चेतना है, जैसा कि विद्वानों नेबल देकर कहा है तथा रुद्रदेव उनका अहंकार है।

घोड़ा, खच्चर, ऊँट तथा हाथी उनके नाखूनहैं तथा जंगली जानवर और सारे चौपाये भगवान्‌ के कटि-प्रदेश में स्थित हैं।

वयांसि तद्व्याकरणं विचित्रमनुर्मनीषा मनुजो निवास: ।

गन्धर्व-विद्याधर-चारणाप्सरःस्वर-स्मृतीरसुरानीक-वीर्य: ॥

३६॥

वयांसि--विभिन्न प्रकार के पक्षी; तत्‌-व्याकरणम्‌--शब्दावली; विचित्रमू--कलात्मक; मनुः--मनुष्यों के पिता; मनीषा--विचार; मनुज:--मानव जाति ( मनु-पुत्र ); निवास:--निवास; गन्धर्व--गन्धर्व नामक मनुष्य; विद्याधर--विद्या धर; चारण--चारण; अप्सर:--देवदूत; स्वर--संगीतात्मक स्वर-लहरी; स्मृती:--स्मृति; असुर-अनीक--आसुरी सैनिक; वीर्य:--शक्ति |

विभिन्न प्रकार के पक्षी उनकी दक्ष कलात्मक रुचि के सूचक हैं।

मानवजाति के पिता, मनु,उनकी आदर्श बुद्धि के प्रतीक हैं और मानवता उनका निवास है।

गन्धर्व, विद्याधर, चारण तथादेवदूत जैसी दैवी योनियाँ उनके संगीत की स्वर-लहरी को व्यक्त करती हैं और आसुरी सैनिकउनकी अद्भुत शक्ति के प्रतिरूप हैं।

ब्रह्माननं क्षत्र-भुजो महात्माविडूरुरडप्रि-अ्रित-कृष्ण-वर्ण: ।

नानाभिधाभीज्य-गणोपपतन्नोद्रव्यात्मक: कर्म वितान-योग: ॥

३७॥

ब्रह्म--ब्राह्षणप; आननम्‌--मुख; क्षत्र--क्षत्रिय; भुज:--बाँहें ; महात्मा--विराट पुरुष; विट्‌ू--वैश्य; ऊरु:--जाँघ; अदडप्नि-भ्रित--उनके चरणों की छाया में; कृष्ण-वर्ण:--शूद्र; नाना--विविध; अभिधा--नामों से; अभीज्य-गण--देवता; उपपन्न: --निहित; द्रव्य-आत्मक:--उपलब्ध वस्तुओं से; कर्म--कर्म; वितान-योग: --यज्ञ का सम्पन्न होना।

विराट पुरुष का मुख ब्राह्मण है, उनकी भुजाएँ क्षत्रिय हैं, उनकी जाँघें वैश्य हैं तथा शूद्रउनके चरणों के संरक्षण में हैं।

सारे पूज्य देवता उनमें सन्निहित हैं और यह प्रत्येक व्यक्ति काकर्तव्य है कि भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए यथासम्भव वस्तुओं से यज्ञसम्पन्न करे।

इयानसावी श्वर-विग्रहस्ययः सन्निवेश: कथितो मया ते ।

सन्धार्यतेस्मिन्‌ वपुषि स्थविष्टेमनः स्व-बुद्धया न यतोस्ति किल्ञित्‌ ॥

३८॥

इयान्‌ू--ये सब; असौ--वह; ईश्वर--परमे श्वर के ; विग्रहस्थ--स्वरूप का; यः--जो कुछ; सन्निवेश:--जिस तरह वे स्थित हैं;कथितः--कहा गया; मया--मेरे द्वारा; ते--तुमको; सन्धार्यते--एकाग्र कर सकता है; अस्मिन्‌--इसमें; वपुषि--विराट स्वरूपमें; स्थविष्ठे --स्थूल में; मन: --मन; स्व-बुद्धब्ा--अपनी बुद्धि से; न--नहीं; यत:--उनसे परे; अस्ति--है; किल्ञित्‌ू--कुछभी।

इस प्रकार मैंने आपको भगवान्‌ के स्थूल भौतिक विराट स्वरूप की अवधारणा का वर्णन किया।

जो व्यक्ति सचमुच मुक्ति की इच्छा करता है, वह भगवान्‌ के इस स्वरूप पर अपने मनको एकाग्र करता है, क्योंकि भौतिक जगत में इससे अधिक कुछ भी नहीं है।

स सर्व-धी-वृत्त्यनुभूत-सर्वआत्मा यथा स्वप्न-जनेक्षितैक: ।

तं सत्यमानन्द-निधि भजेतनान्यत्र सज्जेद यत आत्म-पातः ॥

३९॥

सः--वह ( परम पुरुष ); सर्व-धी-वृत्ति--सभी प्रकार की बुद्धि द्वारा अनुभूति होने की विधि; अनुभूत--सावधान; सर्वे--हरएक; आत्मा--परमात्मा; यथा-- जिस तरह; स्वप्न-जन--सपना देखनेवाला; ईक्षित--देखा हुआ; एक:--एक और वही;तम्‌--उसको; सत्यम्‌ू--परम सत्य; आनन्द-निधिम्‌--आनन्द का सागर; भजेत--पूजा करे; न--कभी नहीं; अन्यत्र-- अन्यत्र;सज्जेत्‌--अनुरक्त हो; यत:--जिससे; आत्म-पात:--अपना पतन |

मनुष्य को अपना मन भगवान्‌ में एकाग्र करना चाहिए, क्योंकि वे ही अपने को इतने सारेरूपों में उसी तरह वितरित करते हैं, जिस तरह कि सामान्य मनुष्य स्वण में हजारों रूपों की सृष्टिकरता है।

मनुष्य को अपना मन एकमात्र सर्व आनन्दमय परम सत्य पर एकाग्र करना चाहिएअन्यथा वह पथभ्रष्ट हो जायेगा और अपने हाथों ही अपना पतन कर लेगा।

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