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अध्याय नौ: मार्कण्डेय ऋषि भगवान की मायावी शक्ति को देखते हैं

12.9सूत उबाचसंस्तुतो भगवानित्थ॑ मार्कण्डेयेन धीमता ।

नारायणो नरसख: प्रीतआह भृगूद्ठहम्‌ ॥

१॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; संस्तुतः--भलीभाँति स्तुति किये जाने पर; भगवान्‌--भगवान्‌; इत्थम्‌--इस तरह;मार्कण्डेयेन--मार्कण्डेय द्वारा; धी-मता--बुद्धिमान मुनि; नारायण: --नारायण; नर-सख: --नर के मित्र; प्रीत:--प्रसन्न;आह--बोले; भृगु-उद्दहम्‌--अत्यन्त प्रसिद्ध भूगुवंशी से |

सूत गोस्वामी ने कहा : नर के मित्र, भगवान्‌ नारायण, बुद्धिमान मुनि मार्कण्डेय द्वाराकी गई उपयुक्त स्तुति से तुष्ट हो गये।

अतः बे उन श्रेष्ठ भूगवंशी से बोले।

"

श्रीभगवानुवाचभो भो ब्रह्मर्षिवर्योउसि सिद्ध आत्मसमाधिना ।

मयि भक्त्यानपायिन्या तपःस्वाध्यायसंयमैः ॥

२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; भो: भो:--हे मुनि; ब्रह्य-ऋषि--समस्त विद्वान ब्राह्मणों में; वर्य:-- श्रेष्ठ असि--हो; सिद्ध:--सिद्ध; आत्म-समाधिना--आत्मा पर स्थिर ध्यान से; मयि--मुझमें; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; अनपायिन्या--अविचल; तपः--तपस्या; स्वाध्याय--वेदाध्ययन; संयमै:--तथा विधि-विधानों द्वारा।

भगवान्‌ ने कहा : हे मार्कण्डेय, तुम सचमुच ही समस्त दिद्वान ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हो।

तुमने परमात्मा पर ध्यान स्थिर करके तथा अपनी अविचल भक्ति, अपनी तपस्या, अपनेवेदाध्ययन एवं विधि-विधानों के प्रति अपनी तत्परता मुझ पर केन्द्रित करते हुए, अपनेजीवन को सफल बना लिया है।

"

वबयं ते परितुष्टा: सम त्वद्ुहद्व्रतचर्यया ।

वरं प्रतीच्छ भद्गरं ते वरदोस्मि त्वदीप्सितम्‌ ॥

३॥

वयम्‌--हम; ते--तुमसे; परितुष्टा:--पूर्णतया तुष्ट; स्म--हो चुके हैं; त्वत्‌--तुम्हारा; बृहत्‌-ब्रत-- आजीवन ब्रह्मचर्य व्रतकी; चर्यया--सम्पन्नता द्वारा; वरमू--वर; प्रतीच्छ--चुनो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; वर-दः--वर देने वाले;अस्मि--मैं हूँ; त्वत्‌-ईप्सितम्‌--आपके द्वारा चाहा हुआ।

हम तुम्हारे आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत से पूर्णतया तुष्ट हैं।

अब जो वर चाहो, चुन लो क्योंकिमैं तुम्हारी इच्छा पूरी कर सकता हूँ।

तुम समस्त सौभाग्य का भोग करो।

"

श्रीऋषिरुवाचजितं ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराच्युत ।

वरेणैतावतालं नो यद्धवान्समहश्यत ॥

४॥

श्री-ऋषि: उवाच--ऋषि ने कहा; जितम्‌--विजयी हों; ते--आप; देव-देव-ईश--हे ईशों के भी ईश; प्रपन्न--शरणागत;आर्ति-हर-हे कष्टों को दूर करने वाले; अच्युत--हे अच्युत; बरेण--वर से; एतावता--इतना; अलमू--पर्याप्त; न: --हमारे द्वारा; यत्‌ू--जो; भवान्‌-- आपने; समहश्यत--देखे जा चुके |

ऋषि ने कहा : हे देव-देवेश, आपकी जय हो।

हे अच्युत, आप उन भक्तों का सारा कष्टदूर कर देते हैं, जो आपके शरणागत हैं।

आपने मुझे अपना दर्शन करने की अनुमति दी,यही मेरे द्वारा चाहा गया वर है।

"

गृहीत्वाजादयो यस्य श्रीमत्पादाब्जदर्शनम्‌ ।

मनसा योगपकक्‍्वेन स भवान्मेडक्षिगोचर: ॥

५॥

गृहीत्वा--पाकर; अज-आदय:--ब्रह्मा तथा अन्य; यस्य--जिसके; श्रीमत्‌--सर्व ऐश्वर्यवान्‌; पाद-अब्ज--चरणकमलोंका; दर्शनम्‌-दर्शन; मनसा--मन से; योग-पक्वेन--योग में परिपक्व; सः--वह; भवान्‌ू--आप; मे--मेरी; अक्षि--आँखों को; गो-चर:--दृश्य

ब्रह्मा जैसे देवताओं ने आपके सुन्दर चरणकमलों का दर्शन करके ही उच्च पद प्राप्तकिया क्‍योंकि उनके मन योगाभ्यास से परिपक्व हो चुके थे।

और हे प्रभु, अब आप मेरेसमक्ष साक्षात्‌ प्रकट हुए हैं।

"

अथाप्यम्बुजपत्राक्ष पुण्यश्लोकशिखामणे ।

द्रक्ष्य मायां यया लोक: सपालो वेद सद्धिदाम्‌ ॥

६॥

अथ अपि--तो भी; अम्बुज-पत्र--कमल की पंखड़ियों जैसी; अक्ष--आँखों वाले हे; पुण्य-शलोक--प्रसिद्ध पुरुषों के;शिखामणे--हे शिरोमणि; द्रक्ष्ये--मैं देखना चाहता हूँ; मायाम्‌--मायाशक्ति को; यया--जिससे; लोक:--सम्पूर्ण जगत;स-पाल:ः--अधिष्ठाता देवताओं सहित; बेद--मानता है; सत्‌--परम सत्य का; भिदाम्‌-- भौतिक अन्तर

हे कमलनयन, हे विख्यात पुरुषों के शिरोमणि, यद्यपि मैं मात्र आपका दर्शन करके तुष्टहूँ किन्तु मैं आपकी मायाशक्ति को देखना चाहता हूँ जिसके प्रभाव से सम्पूर्ण जगत तथाउसके अधिष्ठाता देवता सत्य को भौतिक दृष्टि से विविधतापूर्ण मानते हैं।

"

सूत उबाचइतीडितोरचिंत: काममृषिणा भगवान्मुने ।

तथेति स स्मय-न्प्रागाद्गदर्या श्रममी श्वर: ॥

७॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इन शब्दों द्वारा; ईंडित:--स्तुति किये गये; अर्चित: --पूजित; कामम्‌--संतोषजनक रूप से; ऋषिणा--मार्कण्डेय ऋषि द्वारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; मुने--हे विज्ञ शौनक; तथा इति--तथास्तु,ऐसा ही हो; सः--वह; स्मयन्‌--मुसकाते हुए; प्रागातू--चले गये; बदरी-आश्रमम्‌--बदरिका श्रम; ई श्वरः-- भगवान्‌

सूत गोस्वामी ने कहा : हे विज्ञ शौनक, मार्कण्डेय की स्तुति तथा पूजा से इस तरह तुष्ठहुए भगवान्‌ ने हँसते हुए उत्तर दिया 'तथास्तु' और तब बदरिकाश्रम स्थित अपनी कुटियाचले गये।

"

तमेव चिन्तयन्नर्थमृषि: स्वाश्रम एवं सः ।

वसन्नग्न्यर्कसोमाम्बुभूवायुवियदात्मसु ॥

८॥

ध्यायन्सर्वत्र च हरिं भावद्रव्यैरपूजयत्‌ ।

क्वचित्पूजां विसस्मार प्रेमप्रसरसम्प्लुत: ॥

९॥

तम्‌--उस; एव--निस्सन्देह; चिन्तयन्‌--सोचते हुए; अर्थम्‌--लक्ष्य को; ऋषि: --मार्कण्डेय; स्व-आश्रमे-- अपनीकुटिया में; एब--निस्सन्देह; सः--वह; वसन्‌--रहते हुए; अग्नि--अग्नि; अर्क--सूर्य; सोम--चन्द्रमा; अम्बु--जल;भू--पृथ्वी; वायु--हवा; वियत्‌--बिजली; आत्मसु--तथा अपने हृदय में; ध्यायन्‌-- ध्यान करते हुए; सर्वत्र--सभीपरिस्थितियों में; च--तथा; हरिम्‌-- भगवान्‌ हरि को; भाव-द्रव्यै:--मन में कल्पित साज-सामग्री से; अपूजयत्‌--पूजाकी; क्वचित्‌--कभी; पूजाम्‌-पूजा; विसस्मार-- भूल गया; प्रेम--ई ध्वर-प्रेम की; प्रसर--बाढ़ में; सम्प्लुत:--डूब जानेसे।

मार्कण्डेय ऋषि, भगवान्‌ की माया का दर्शन करने की इच्छा के विषय में सदैव सोचतेहुए, अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, पृथ्वी, वायु, बिजली से तथा अपने हृदय में भगवान्‌ कानिरन्तर ध्यान करते हुए और अपने मन में कल्पित साज-सामग्री से उनकी पूजा करते हुए,अपने आश्रम ( कुटिया ) में रहते रहे।

किन्तु कभी कभी भगवत्प्रेम की तरंगों से अभिभूतहोकर वे नियमित पूजा करना भूल जाते।

"

तस्यैकदा भूृगुश्रेष्ठ पुष्पभद्रातटे मुने: ।

उपासीनस्य सब्ध्यायां ब्रह्मन्वायुरभून्महान्‌ ॥

१०॥

तस्थ--जब वह; एकदा--एक दिन; भृगु-श्रेष्ठ-हे भृगुवंशियों में सर्वश्रेष्ठ; पुष्पभद्रा-तटे--पुष्पभद्रा नदी के तट पर;मुने;:--मुनि के; उपासीनस्य--पूजा कर रहे थे; सन्ध्यायामू--दिन की संधि पर; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; वायु:--वायु;अभूत्‌--चलने लगी; महान्‌ू--तेज |

हे ब्राह्मण शौनक, हे भृगुश्रेष्ठ एक दिन जब मार्कण्डेय पुष्पभद्रा नदी के तट परसंध्याकालीन पूजा कर रहे थे तो सहसा तेज वायु चलने लगी।

"

तं चण्डशब्दं समुदीरयन्तंबलाहका अन्वभवन्कराला: ।

अक्षस्थविष्टा मुमुचुस्तडिद्धिः स्वनन्त उच्चैरभि वर्षधारा: ॥

११॥

तम्‌--वह वायु; चण्ड-शब्दम्‌--भयंकर शब्द; समुदीरयन्तम्‌--उत्पन्न करता हुआ; बलाहका:--बादल; अनु--पीछे-पीछे; अभवन्‌--प्रकट हुए; कराला:-- भयानक ; अक्ष--पहिये की तरह; स्थविष्ठा:--ठोस; मुमुचु:--छोड़ा; तडिद्ध्धि:--बिजली के साथ; स्वनन्तः--गूँजते; उच्चै:--तेज; अभि--सभी दिशाओं ; वर्ष--वर्षा की; धारा:--धारा

उस वायु ने भयंकर शब्द उत्पन्न किया और अपने साथ भयावने बादल लेती आईजिनके साथ बिजली तथा गर्जना थी और जिन्होंने सभी दिशाओं में गाड़ी के पहियों जितनीभारी मूसलाधार वर्षा की।

"

ततो व्यदृश्यन्त चतुः समुद्रा:समन्ततः क्ष्मातलमाग्रसन्त: ।

समीरवेगोर्मिभिरुग्रनक्र -महाभयावर्तगभीरघोषा: ॥

१२॥

ततः--तब; व्यहृश्यन्त--प्रकट हुए; चतुः समुद्र:--चार सागर; समन्तत:--सभी दिशाओं में; क्ष्मा-तलम्‌--पृथ्वी की सतहपर; आग्रसन्त:--निगलते हुए; समीर--वायु का; वेग--वेग; ऊर्मिभि:--लहरों से; उग्र-- भयंकर; नक्र--मगरों से; महा-भय--अ त्यन्त भयावह; आवर्त--भँवरों से; गभीर--गम्भीर; घोषा:--शब्द |

तब सभी दिशाओं में चार महासागर प्रकट हो गये जो वायु से उछाली गई लहरों सेपृथ्वी की सतह को निगल रहे थे।

इन महासागरों में भयानक मगर थे, भयानक भँवरें थींतथा अमांगलिक-गर्जन हो रहा था।

"

अन्तर्ब॑हिश्वाद्धिरतिद्युभि: खरैःशतहृदाभिरुपतापितं जगत्‌ ।

चतुर्विधं वीक्ष्य सहात्मना मुनि-ज॑लाप्लुतां क्ष्मां विमना: समत्रसत्‌ ॥

१३॥

अन्त:ः--भीतर से; बहि:--बाहर से; च--तथा; अद्धि:--जल से; अति-द्युभि:--आकाश से भी ऊपर उठती; खरै:--प्रचण्ड ( वायु से ); शत-हृदाभि:--बिजली की चमक से; उपतापितम्‌--अत्यन्त दुखी; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के सारे निवासी;चतु:-विधम्‌--चार प्रकार के ( उद्‌भिज, अण्डज, स्वेदज, जरायुज ); वीक्ष्य--देख कर; सह--साथ; आत्मना--अपने;मुनि:--मुनि; जल--जल से; आप्लुताम्‌--आप्लावित; क्ष्माम्‌--पृथ्वी; विमना:--उदास; समत्रसत्‌--डर गया।

ऋषि ने अपने सहित ब्रह्माण्ड के सारे निवासियों को देखा जो तेज वायु, बिजली केवज्पात तथा आकाश से भी ऊपर तक उठने वाली बड़ी-बड़ी लहरों से भीतर और बाहर सेसताये जा रहे थे।

ज्योंही सारी प्रथ्वी जलमग्न हो गई, वे उदास तथा भयभीत हो उठे।

"

तस्यैवमुद्वीक्षत ऊर्मिभीषण:प्रभझनाघूर्णितवार्महार्णव: ।

आपूर्यमाणो वरषद्धिरम्बुदे:क्ष्मामप्यधादद्वीपवर्षाद्रिभि: समम्‌ ॥

१४॥

तस्य--जब वे; एवम्‌--इस तरह; उद्दीक्षत:--देख रहे थे; ऊर्मि-- लहरें; भीषण: -- भयावनी; प्रभञझन--अंधड़ से;आधघूर्णित--चक्कर काटता; वा:--जल; महा-अर्णव: --महासागर; आपूर्यमान: -- भर कर; वरषद्धि:--वर्षा से; अम्बु-दैः--बादलों से; क्ष्माम्‌-पृथ्वी को; अप्यधात्‌ू--ढक लिया; द्वीप--द्वीप; वर्ष--महाद्वीप; अद्विभि:--पर्वतों को; समम्‌--एकसाथ

मार्कण्डेय के देखते-देखते बादल से हो रही वर्षा समुद्र को भरती रही जिससे महासागरके जल ने अंधड़ द्वारा भयानक लहरों के उठने से पृथ्वी के द्वीपों, पर्वतों तथा महाद्वीपों कोढक लिया।

"

सक्ष्मान्तरिक्षं सदिवं सभागणंत्रैलोक्यमासीत्सह दिग्भिराप्लुतम्‌ ।

स एक एवोर्वरितो महामुनि-बैश्राम विक्षिप्पय जटा जडान्धवत्‌ ॥

१५॥

स--सहित; क्ष्मा--पृथ्वी; अन्तरिक्षम्‌--तथा बाह्य अवकाश; स-दिवम्‌--स्वर्गलोकों सहित; स-भा-गणम्‌--समस्तस्वर्गिक पिंडों समेत; त्रै-लोक्यम्‌--तीनों लोकों; आसीत्‌--हो गया; सह--सहित; दिग्भि:--सारी दिशाएँ; आप्लुतम्‌--जल से मग्न; सः--वह; एक:--अकेला; एव--निस्सन्देह; उर्वरित:--बचे हुए; महा-मुनिः--महामुनि; बच्राम--घूमतारहा; विक्षिप्प--छितराये; जटा:--अपनी जटाएँ; जड--मूक व्यक्ति; अन्ध--अच्धा व्यक्ति; बत्‌--सहश |

जल ने पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग तथा स्वर्ग-क्षेत्र को आप्लावित कर दिया।

निस्सन्देह,सारा ब्रह्माण्ड सभी दिशाओं में जलमग्न था और उसके सारे निवासियों में से एकमात्रमार्कण्डेय ही बचे थे।

उनकी जटाएँ छितरा गई थीं और ये महामुनि जल में अकेले इधर-उधर घूम रहे थे मानो मूक तथा अंधे हों।

"

क्षुत्तटूपरीतो मकरैस्तिमिड्रिलै-रुपद्गरुतो वीचिनभस्वताहत: ।

तमस्यपारे पतितो भ्रमन्दिशोन वेद खं गां च परिश्रमेषित: ॥

१६॥

क्षुतू-- भूख; तृटू--तथा प्यास से; परीत:--घिरे हुए; मकरैः--मकरें द्वारा; तिमिड्रिलै:ः--तथा तिमिंगलों अर्थात्‌ ह्ेल कोभी खा जाने वाली विशाल मछली के द्वारा; उपद्रुतः--सताये हुए; वीचि--लहरों; नभस्वता--तथा वायुद्वारा; आहत: --सताये हुए; तमसि--अंधकार में; अपारे-- असीम; पतित:--गिरे हुए; भ्रमन्‌--घूमते हुए; दिश:--दिशाएँ; न वेद--ज्ञाननहीं रहा; खम्‌--आकाश; गाम्‌ू--पृथ्वी; च--तथा; परिश्रम-इषित:--थका हुआ।

भूख-प्यास से सताये, देत्याकार मकरों तथा विमिंगिल मछलियों द्वारा हमला किये गयेतथा वायु और लहरों से त्रस्त, वे उस अपार अंधकार में निरुद्देश्य घूमते रहे जिसमें वे गिरचुके थे।

जब वे अत्यधिक थक गये तो उन्हें दिशाओं की सुधि न रही और वे आकाश तथापृथ्वी में भेद नहीं कर पा रहे थे।

"

क्रचिन्मग्नो महावर्ते तरलैस्ताडित: क्वचित्‌ ।

यादोभिर्भक्ष्यते क्वापि स्वयमन्योन्यघातिभि: ॥

१७॥

क्वचिच्छोक॑ क्वचिन्मोहं क्वचिद्दु:खं सुखं भयम्‌ ।

क्वचिम्मृत्युमवाष्नोति व्याध्यादिभिरुतार्दित: ॥

१८॥

क्वचित्‌--कभी; मग्न: --डूबते हुए; महा-आवर्ते-- भारी भँवर में; तरलै: --लहरों से; ताडित:--थपेड़े खाकर;क्वचित्‌--कभी; यादोभि: -- जल-जन्तुओं द्वारा; भक्ष्यते--खाये जाने से आशंकित; क्व अपि--क भी; स्वयम्‌--स्वयं;अन्योन्य--परस्पर; घातिभि: --आक्रमण करते हुए; क्वचित्‌--क भी; शोकम्‌-- उदासी; क्वचित्‌--क भी; मोहम्‌--मोह;क्वचित्‌--कभी; दुःखम्‌--कष्ट; सुखम्‌--सुख; भयम्‌-- भय; क्वचित्‌--कभी; मृत्युम्‌ू--मृत्यु; अवाष्नेति-- अनुभवकरता; व्याधि-- रोग; आदिभि:--इत्यादि से; उत-- भी; अर्दित:--पीड़ित |

कभी वे भारी भँवर में फँस जाते, कभी प्रबल लहरों के थपेड़े खाते, कभी जल-दैत्योंके परस्पर आक्रमण करने पर उनके द्वारा निगले जाने से आशंकित हो उठते।

कभी उन्हेंशोक, मोह, दुख, सुख या भय का अनुभव होता तो कभी उन्हें ऐसी भयानक बीमारी तथापीड़ा का अनुभव होता जैसे कि वे मरे जा रहे हों।

"

अयुतायतवर्षाणां सहस्त्राणि शतानिच ।

व्यतीयुर्भ्रमतस्तस्मिन्विष्णुमायावृतात्मन: ॥

१९॥

अयुत--दस हजार का; अयुत--दस हजार गुणा; वर्षाणाम्‌-वर्षो के; सहस्त्राणि--हजारों; शतानि--सैकड़ों; च--तथा;व्यतीयु:--बीत गये; भ्रमतः--विचरण करते हुए; तस्मिन्‌--उसमें; विष्णु-माया--भगवान्‌ विष्णु की माया से; आवृत--आच्छादित; आत्मन:--मन।

मार्कण्डेय को उस जलप्लावन में इधर-उधर घूमते करोड़ों वर्ष बीत गये; उनका मनभगवान्‌ विष्णु की माया से विमोहित था।

"

स कदाचिदशभ्रमंस्तस्मिन्पृथिव्या: ककुदि द्विज: ।

न्याग्रोधपोत॑ ददशे फलपललवशोभितम्‌ ॥

२०॥

सः--उसने; कदाचित्‌--एक बार; भ्रमन्‌--विचरण करते हुए; तस्मिनू--उस जल में; पृथिव्या:--पृथ्वी के; ककुदि--उठेस्थान पर; द्विज:--ब्राह्मण ने; न्याग्रोध-पोतमू--एक छोटा बरगद का पेड़; ददशे--देखा; फल--फलों; पल्‍लव--तथाकोपलों से; शोभितम्‌--सुशोभित |

एक बार जल में विचरण करते हुए ब्राह्मण मार्कण्डेय ने एक छोटा टापू ( द्वीप ) देखाजिस पर एक छोटा बरगद का पेड़ खड़ा था जिसमें फल-फूल लगे थे।

"

प्रागुत्तरस्थां शाखायां तस्यापि दहशे शिशुम्‌ ।

शयानं पर्णपुटके ग्रसन्तं प्रभया तम: ॥

२१॥

प्राक्‌-उत्तरस्थाम्‌--उत्तर पूर्व की ओर; शाखायाम्‌--एक शाखा में; तस्य--उस वृक्ष की; अपि--निस्सन्देह; दहशे--देखा;शिशुम्‌ू--एक शिशु को; शयानमू्‌--लेटे हुए; पर्ण-पुटके--पत्ते के गर्त के भीतर; ग्रसन्‍्तम्‌--निगलते हुए; प्रभया--उसके तेज से; तमः--अँधेरा।

उन्होंने उस वृक्ष की उत्तर-पूर्व की एक शाखा में एक पत्ते के भीतर एक शिशु को लेटेदेखा।

इस शिशु का तेज अंधकार को लील रहा था।

"

महामरकतश्यामं श्रीमद्ददनपड्डूजम्‌ ।

कम्बुग्रीवं महोरस्क॑ सुनसं सुन्दरभ्रुवम्‌ ॥

२२॥

श्वासैजदलकाभातं कम्बुश्रीकर्णदाडिमम्‌ ।

विद्युमाधरभासेषच्छोणायितसुधास्मितम्‌ ॥

२३॥

पदागर्भारुणापाडुं हद्दहासावलोकनम्‌ ।

श्रासैजद्ठलिसंविग्ननिम्ननाभिदलोदरम्‌ ॥

२४॥

चार्वड्डुलिभ्यां पाणिभ्यामुन्नीय चरणाम्बुजम्‌ ।

मुखे निधाय विप्रेन्द्रो धयन्तं वीक्ष्य विस्मित: ॥

२५॥

महा-मरकत--महामरकत मणि की तरह; श्यामम्‌--गहरा नीला; श्रीमत्‌--सुन्दर; वदन-पड्डजम्‌--जिसका कमल जैसामुख; कम्बु--शंख जैसा; ग्रीवम्‌-गर्दन; महा--चौड़ा; उरस्कम्‌--छाती, वक्षस्थल; सु-नसम्‌--सुन्दर नाक वाली;सुन्दर- भ्रुवम्‌--सुन्दर भौंहों वाला; श्रास--उनकी श्वास से; एजत्‌ू--हिलती; अलक--बाल से; आभातम्‌--शानदार;कम्बु--शंख जैसा; श्री--सुन्दर; कर्ण--कान; दाडिमम्‌--अनार के फूल जैसा; विद्वुम--मूँगा जैसा; अधर--होंठों का;भासा--तेज से; ईषत्‌--कुछ-कुछ; शोणायित--लाल हुआ; सुधा--अमृत जैसी; स्मितम्‌--मुसकान; पद्मा-गर्भ--कमलके कोश जैसा; अरुण--लाल; अपाड्म्‌--आँखों के कोर; हृद्य--मनोहर; हास--हँसी से युक्त; अवलोकनम्‌--मुखमण्डल; श्रास--उनकी श्वास से; एजत्‌--हिलाया गया; वलि--रेखाओं से; संविग्न--मोड़ी हुई; निम्न--गहरी;नाभि--नाभि से; दल--पत्ते की तरह; उदरम्‌--जिसका पेट; चारु--आकर्षक; अद्जुलिभ्याम्‌--अंगुलियों वाले;पाणिभ्याम्‌--दोनों हाथों से; उन्नीय--उठाते हुए; चरण-अम्बुजम्‌--अपना चरणकमल; मुखे--मुँह में; निधाय--डालकर; विप्र-इन्द्र:--ब्राह्मण- श्रेष्ठ, मार्कण्डेय; धयन्तम्‌-पीते हुए; वीक्ष्य--देख कर; विस्मित:--चकित

बालक का गहरा नीला रंग निष्कलंक मरकत जैसा था; उसका कमल मुखमण्डलअपार सौंदर्य के कारण चमक रहा था और उसकी गर्दन में शंख जैसी रेखाएँ थीं।

उसका वक्षस्थल चौड़ा, नाक सुन्दर आकार वाली, भौंहे सुन्दर तथा अनार के फूलों जैसे सुन्दरकान थे जिसके भीतर के वलन शंख के घुमावों जैसे थे।

उसकी आँखों के कोर कमल केकोश जैसे लाल रंग के थे और मूँगे जैसे होठों का तेज उसके मुखमण्डल की सुधामयीमोहनी मुसकान को लाल-लाल बना रहा था।

जब वह साँस लेता, उसके सुन्दर बाल हिलतेथे और गहरी नाभि उसके बरगद के पत्ते जैसे उदर की चमड़ी के हिलते वलनों से विकृतहोती थी।

वह ब्राह्मण-श्रेष्ठ आश्चर्य से उस बालक को देख रहा था, जो अपने एकचरणकमल को अपनी सुन्दर सुन्दर अंगुलियों से पकड़ कर अपने मुँह में डाल कर चूस रहाथा।

"

तहर्शनाद्वीतपरिश्रमो मुदाप्रोत्फुल्लहत्पौल्मविलोचनाम्बुज: ।

प्रहष्टरोमाद्भुतभावशड्डितःप्रष्टें पुरस्तं प्रससार बालकम्‌ ॥

२६॥

तत्‌-दर्शनातू--उस शिशु का दर्शन करने से; वीत--दूर हो गया; परिश्रम:-- थकान; मुदा--हर्ष के कारण; प्रोत्फुल्ल--खिल उठा; हत्‌-पद्य--हृदय का कमल; विलोचन-अम्बुज:--तथा उसकी कमल जैसी आँखें; प्रहष्ट--खड़े हो गये;रोमा--शरीर के रोएँ; अद्भुत-भाव--इस अद्भुत रूप की पहचान के बे में; शद्धित:ः--शंकालु; प्रष्टमू--पूछने के लिए;पुरः:--आगे; तम्‌--उसके; प्रससार--पास गया; बालकम्‌--बालक के।

जैसे ही मार्कण्डेय ने बालक को देखा उनकी सारी थकान जाती रही।

निस्सन्देह उनकोइतनी अधिक प्रसन्नता हुई कि उनका हृदय तथा उनके नेत्र कमल की भाँति पूरी तरहप्रफुल्लित हो उठे और उन्हें रोमांच हो आया।

इस बालक की अद्भुत पहचान के विषय मेंशंकित मुनि उसके पास पहुँचे।

"

तावच्छिशोर्व श्वसितेन भार्गव:सोडन्तः शरीरं मशको यथाविशत्‌ ।

तत्राप्यदो न्यस्तमचष्ट कृत्स्नशोयथा पुरामुहादतीव विस्मित: ॥

२७॥

तावत्‌--उसी क्षण; शिशो: --शिशु का; बै--निस्सन्देह; श्रसितेन-- श्वास लेने से; भार्गव:--भूगुवंशी; सः--वह; अन्तःशरीरमू--शरीर के भीतर; मशकः--मच्छर; यथा--जिस तरह; अविशत्‌--घुस गया; तत्र--वहाँ पर; अपि--निस्सन्देह;अदः--यह ब्रह्माण्ड; न्यस्तम्‌--रखा हुआ; अचष्ट--उसने देखा; कृत्सनश:--समूचा; यथा--जिस तरह; पुरा--पहले;अमुहात्‌--विमोहित हो चुका था; अतीव--अत्यधिक; विस्मित:--चकित

तभी उस शिशु ने श्वास ली जिससे मार्कण्डेय मच्छः की तरह उसके शरीर के भीतररिंच गये।

वहाँ पर ऋषि ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रलय के पूर्व की स्थिति में सुव्यवस्थितपाया।

यह देख कर मार्कण्डेय अत्यधिक आश्चर्यचकित तथा मोहग्रस्त हो गए।

"

खं रोदसी भागणानद्विसागरान्‌द्वीपान्सवर्षान्ककुभः सुरासुरान्‌ ।

बनानि देशान्सरितः पुराकरान्‌खेटान्ब्रजाना श्रमवर्णवृत्तय: ॥

२८ ॥

महान्ति भूतान्यथ भौतिकान्यसौकालं च नानायुगकल्पकल्पनम्‌ ।

यत्किञ्ञिदन्यद्व्यवहारकारणंददर्श विश्व सदिवावभासितम्‌ ॥

२९॥

खम्‌--आकाश; रोदसी--स्वर्ग तथा पृथ्वी; भा-गणान्‌--सारे तारों; अद्वि--पर्वत; सागरान्‌ू--तथा सागरों; द्वीपानू--बड़े-बड़े द्वीपों; स-वर्षान्‌ू--महाद्वीपों समेत; ककु भ: --दिशाओं; सुर-असुरान्‌--सन्त भक्तों तथा असुरों; वनानि--जंगलों; देशान्‌--विविध देशों; सरितः--नदियों; पुर--नगरों; आकरान्‌--तथा खानों; खेटान्‌ू--खेतिहर गाँवों; ब्रजानू--चरागाहों; आश्रम-वर्ण--विभिन्न आश्रमों तथा वर्णो; वृत्तय:--पेशों; महान्ति भूतानि--प्रकृति के मूल तत्त्वों; अथ--तथा; भौतिकानि--स्थूल रूपों को; असौ--उसने; कालम्‌--काल; च--तथा; नाना-युग-कल्प--विभिन्न युग तथा ब्रह्माका दिन; कल्पनम्‌--नियामककारक; यत्‌ किश्ञित्‌ू--जो कुछ भी; अन्यत्‌--दूसरा; व्यवहार-कारणम्‌-- भौतिक जीवन मेंकाम आने वाली वस्तु; ददर्श--देखा; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; सत्‌--सत्य; इब--मानो; अवभासितम्‌-- प्रकट वहाँ पर

मुनि ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखा--आकाश, स्वर्ग तथा पृथ्वी, तारे, पर्वत, सागर,द्वीप तथा महाद्वीप, हर दिशा में विस्तार, सन्‍्त तथा आसुरी जीव, वन, देश, नदियाँ, नगरतथा खानें, खेतिहर गाँव तथा चरागाह, समाज के वर्ण तथा आश्रम।

उन्होंने सृष्टि के मूलतत्त्वों तथा उनके गौण उत्पादों के साथ ही साक्षात्‌ काल को देखा जो ब्रह्मा के दिनों मेंअसंख्य युगों को नियमित करता है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने भौतिक जीवन में काम आनेवाली अन्य सारी वस्तुएँ देखीं।

उन्होंने अपने समक्ष यह सब देखा जो सत्य जैसा प्रतीत होरहा था।

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हिमालवयं पुष्पवहां च तां नदींनिजाश्रमं यत्र ऋषी अपश्यत ।

विश्व विपश्यज्छूसिताच्छिशोर्वे बहिर्निरस्तो न्‍्यपतल्लयाब्धौ ॥

३०॥

हिमालयम्‌--हिमालय पर्वत को; पुष्प-वहाम्‌--पुष्पभद्रा;च--तथा; तामू--उस; नदीमू--नदी को; निज-आश्रमम्‌--अपनी कुटिया को; यत्र--जहाँ; ऋषी--दो ऋषि, नर तथा नारायण; अपश्यत--देखा था; विश्वम्‌--ब्रह्मण्ड को;विपश्यन्‌-देखते हुए; श्रसितात्‌-- श्रास से; शिशो:--शिशु के; बै--निस्सन्देह; बहि:--बाहर; निरस्त:--निकाला गया;न्यपतत्‌--गिर पड़ा; लय-अब्धौ--प्रलय के सागर में |

उन्होंने अपने समक्ष हिमालय पर्वत, पुष्पभद्रा नदी तथा अपनी कुटिया देखी जहाँ उन्होंनेनर-नारायण ऋषियों के दर्शन किये थे।

तत्पश्चात्‌ मार्कण्डेय द्वारा सम्पूर्ण विश्व के देखते-देखते, जब उस शिशु ने श्वास बाहर निकाली तो ऋषि उसके शरीर से बाहर धकेल दिए गएऔर प्रलय सागर में गिरा दिए गए।

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तस्मिन्पृथिव्या: ककुदि प्ररूढंबट च तत्पर्णपुटे शयानम्‌ ।

तोकं च तत्प्रेमसुधास्मितेननिरीक्षितोपाड्ननिरीक्षणेन ॥

३१॥

अथ तं बालक वीक्ष्य नेत्राभ्यां धिष्ठितं हृदि ।

अभ्ययादतिसड्क्लिष्ट: परिष्वक्तुमधोक्षजम्‌ ॥

३२॥

तस्मिनू--उस जल में; पृथिव्या:--पृथ्वी का; ककुदि--उठे स्थान पर; प्ररूढम्‌--उगता हुआ; वटम्‌ू--बरगद का वृक्ष;च--तथा; तत्‌--उसके; पर्ण-पुटे--पत्ते के दोने में; शयानम्‌--लेटे हुए; तोकम्‌--बालक को; च--तथा; तत्‌-- अपने;प्रेम--प्रेम की; सुधा--अमृत जैसी; स्मितेन--हँसी से; निरीक्षित:--देखा जाकर; अपाड़---आँख के कोरों से;निरीक्षणेन--चितवन से; अथ--तब; तमू--उस; बालकम्‌--बालक को; वीक्ष्य--देख कर; नेत्राभ्यामू--अपनी आँखोंसे; धिष्ठितम्‌ू--रखते हुए; हृदि--हृदय के भीतर; अभ्ययात्‌--आगे दौड़ा; अति-सड्ूक्लिष्ट: --अत्यन्त क्षुब्ध; परिष्वक्तुम्‌--आलिंगन करने के लिए; अधोक्षजम्‌-- भगवान्‌ को |

उस विशाल सागर में उन्होंने छोटे-से द्वीप पर बरगद के वृक्ष को उगा हुआ और शिशुको पत्ते के भीतर लेटे हुए देखा।

वह शिशु उनको अपनी आँखों की कारों से प्रेम के अमृतसे भरी हँसी से देख रहा था।

मार्कण्डेय ने उसे अपनी आँखों के द्वारा अपने हृदय में करलिया।

अत्यन्त क्षुब्थ ऋषि भगवान्‌ का आलिंगन करने दौड़े।

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तावत्स भगवान्साक्षाद्योगाधीशो गुहाशयः ।

अन्तर्दध ऋषे: सद्यो यथेहानीशनिर्मिता ॥

३३॥

तावत्‌ू--तभी; सः--वह; भगवान्‌-- भगवान्‌; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; योग-अधीश: --योगे श्वर; गुहा-शय: --समस्त जीवों केहृदयों में छिपे; अन्तर्दधे-- अन्तर्धान हो गये; ऋषे:--ऋषि के समक्ष; सद्यः--सहसा; यथा--जिस तरह; ईहा-- प्रयास द्वारावस्तु; अनीश--अक्षम व्यक्ति द्वारा; निर्मिता--बनाई हुई |

तभी भगवान्‌, जोकि योगेश्वर हैं तथा हर एक के हृदय में छिपे रहते हैं, ऋषि की आँखों से ओझल हो गये जिस तरह अक्षम व्यक्ति की सारी उपलब्धियाँ सहसा विलीन हो जाती हैं।

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तमन्वथ वटो ब्रह्मग्सलिलं लोकसम्प्लवः ।

तिरोधायि क्षणादस्य स्वाश्रमे पूर्ववत्स्थित: ॥

३४॥

तम्‌--उसके; अनु--पीछे; अथ--तब; वट: --बरगद का वृक्ष; ब्रह्ननू--हे ब्राह्मण, शौनक; सलिलम्‌--जल; लोक-सम्प्लवः--ब्रह्माण्ड का प्रलय; तिरोधायि--- अदृश्य हो गये; क्षणात्‌--तुरन्त; अस्य--उसके सामने ही; स्व-आश्रमे--अपनी कुटिया में; पूर्व-वत्‌--पहले की तरह; स्थित:--उपस्थित था।

हे ब्राह्मण, भगवान्‌ के अदृश्य हो जाने पर, वह बरगद का वृक्ष, अपार जल तथाब्रह्माण्ड का प्रलय--सारे के सारे विलीन हो गये और क्षण-भर में मार्कण्डेय ने पहले कीतरह अपने को अपनी कुटिया में पाया।

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