← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची
अध्याय आठ: मार्कण्डेय की नर-नारायण ऋषि से प्रार्थना
12.8श्रीशौनक उबाचसूत जीव चिरं साधो वद नो वदतां वर ।
तमसस््यपारे भ्रमतांनृणां त्वं पारदर्शन: ॥
१॥
श्री-शौनक: उवाच--श्री शौनक ने कहा; सूत--हे सूत गोस्वामी; जीव--आप जीवित रहें; चिरम्--दीर्घकाल तक;साधो--हे साधु; वद--कृपा करके कहें; न:ः--हमसे; वदताम्--वक्ताओं के; वर-- श्रेष्ठ; तमसि--अंधकार में; अपारे--अपार; भ्रमताम्ू--विचरण करते हुए; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; त्वमू--तुम; पार-दर्शन:--उस किनारे को देखने वाला।
श्री शौनक ने कहा : हे सूत, आप दीर्घायु हों।
हे साधु, हे वक्ता श्रेष्ठ, आप हमसे इसीतरह बोलते रहें।
निस्सन्देह, आप ही मनुष्यों को उस अज्ञान से निकलने का मार्ग दिखासकते हैं जिसमें वे विचरण कर रहे हैं।
"
आहुश्चिरायुषमृषिं मृकण्डतनयं जना: ।
यः कल्पान्ते ह्ुर्वरितो येन ग्रस्तमिदं जगत् ॥
२॥
स वा अस्मत्कुलोत्पन्न: कल्पेस्मिन्भार्गवर्षभ: ।
नैवाधुनापि भूतानां सम्प्लवः कोपि जायते ॥
३॥
एक एवार्णवे क्षाम्यन्ददर्श पुरुष किल ।
बटपत्रपुटे तोक॑ शयानं त्वेकमद्भुतम् ॥
४॥
एष नः संशयो भूयान्सूत कौतूहलं यतः ।
त॑ नश्छिन्धि महायोगिन्पुराणेष्वपि सम्मतः: ॥
५॥
आहु:--कहते हैं; चिर-आयुषम्-- अत्यधिक दीर्घ आयु वाला; ऋषिम्--ऋषि; मृकण्ड-तनयम्--मृकण्ड के पुत्र को;जना:--लोग; यः--जो; कल्प-अन्ते--ब्रह्म का एक दिन पूरा होने पर; हि--निस्सन्देह; उर्वरित: --एकान्त में रहते हुए;येन--जिस ( प्रलय ) से; ग्रस्तम्-ग्रस्त; इदम्ू--यह; जगत्--समूचा ब्रह्माण्ड; सः--वह, मार्कण्डेय; बै--निस्सन्देह;अस्मत्-कुल-मेरे ही परिवार में; उत्पन्न: --उत्पन्न; कल्पे--ब्रह्मा के दिन में; अस्मिनू--इस; भार्गव-ऋषभ:-- भूगु मुनिका परम प्रसिद्ध वंशज; न--नहीं; एव--निश्चय ही; अधुना--हमारे युग में; अपि-- भी; भूतानाम्--सारी सृष्टि का;सम्प्लव:ः--बाढ़ से संहार; कः--कोई; अपि--तनिक भी; जायते--उत्पन्न हुआ है; एक:--अकेला; एव--निस्सन्देह;अर्णवे--महासागर में; भ्राम्यनू--घूमते हुए; दरदर्श--देखा; पुरुषम्--पुरुष को; किल--कहा जाता है; वट-पत्र--बरगदकी पत्ती के; पुटे--दोने में; तोकम्--एक शिशु; शयानम्--लेटा हुआ; तु--लेकिन; एकम्--एक; अद्भुतम्-- अद्भुत;एषः--यह; नः--हमारा; संशय: --सन्देह; भूयान्ू--महान्; सूत--हे सूत गोस्वामी; कौतूहलम्--उत्सुकता; यतः--जिसके कारण; तम्--उसको; न:ः--हमारे लिए; छिन्धि--काट डालिये; महा-योगिन्--हे महान् योगी; पुराणेषु--पुराणोंके; अपि--निस्सन्देह; सम्मतः--सार्वजनिक रूप से स्वीकृत ( दक्ष ज्ञाता के रूप में )।
विद्वानों का कहना है कि मृकण्डु के पुत्र, मार्कण्डेय ऋषि, अति दीर्घ आयु वाले मुनिथे और ब्रह्मा के दिन के अन्त होने पर वे ही एकमात्र बचे हुए थे जबकि सारा ब्रह्माण्ड प्रलयकी बाढ़ में जलमग्न हुआ था।
किन्तु यही मार्कण्डेय ऋषि, जोकि भृगुवंशियों में सर्वोपरिहैं, मेरे ही परिवार में ब्रह्म के चालू दिन में जन्मे थे और हमने अभी ब्रह्मा के इस दिन कापूर्ण प्रलय नहीं देखा है।
यही नहीं, यह भलीभाँति ज्ञात है कि मार्कण्डेय मुनि ने प्रलय केमहासागर में असहाय होकर इधर-उधर घूमते हुए उस भयानक जल में एक अद्भुत पुरुष को देखा--एक शिशु जो बरगद के पत्ते के दोने में अकेले लेटा था।
हे सूत, मैं इन महर्षिमार्कण्डेय के विषय में अत्यधिक मोहग्रस्त तथा उत्सुक हूँ।
हे महान् योगी, आप समस्तपुराणों के विद्वान माने जाते हैं, इसलिए मेरे संशय को दूर कीजिये।
"
सूत उबाचप्रश्नस्त्वया महर्षेयं कृतो लोक भ्रमापह: ।
नारायणकथा यत्र गीता कलिमलापहा ॥
६॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; प्रश्न:--प्रश्न; त्वया--तुम्हारे द्वारा; महा-ऋषे--हे महर्षि शौनक; अयम्--यह;कृत:ः--बनाया हुआ; लोक --सम्पूर्ण जगत का; भ्रम-- भ्रम; अपह: --दूर करने वाला; नारायण-कथा-- भगवान्नारायण की कथा; यत्र--जिसमें; गीता--गाई जाती है; कलि-मल--कलियुग के कल्मष; अपहा--दूर करते हुए
सूत गोस्वामी ने कहा : हे महर्षि शौनक, तुम्हारे इस प्रश्न से हर एक का मोह दूर होसकेगा क्योंकि इसका सम्बन्ध भगवान् नारायण की कथाओं से है, जो इस कलियुग केकल्मष को दूर करती हैं।
"
प्राप्तद्धिजातिसंस्कारो मार्कण्डेय: पितु: क्रमात् ।
छन्दांस्यधीत्य धर्मेण तपःस्वाध्यायसंयुत: ॥
७॥
बृहद्व्रतधर: शान्तो जटिलो बल्कलाम्बर: ।
बिभ्रत्कमण्डलुं दण्डमुपवीतं समेखलम् ॥
८॥
कृष्णाजिन साक्षसूत्रं कुशांश्व नियमर्द्धये ।
अम्न्यर्कगुरुविप्रात्मस्वर्चयन्सन्ध्ययोहरिम् ॥
९॥
सायं प्रात: स गुरवे भेक्ष्यमाहत्य वाग्यतः ।
बुभुजे गुर्वनुज्ञात: सकृन्नो चेदुपोषित: ॥
१०॥
एवं तपःस्वाध्यायपरो वर्षाणामयुतायुतम् ।
आराधयन्हषीकेशं जिग्ये मृत्युं सुदुर्जयम् ॥
११॥
प्राप्त--प्राप्त हुए; द्वि-जाति--द्वितीय जन्म का; संस्कार:--संस्कार; मार्कण्डेय: --मार्कण्डेय; पितु:--अपने पिता से;क्रमात्-क्रमश; छन्दांसि--वैदिक स्तोत्र; अधीत्य--अध्ययन करके; धर्मेण--विधि-विधानों समेत; तपः--तपस्या में;स्वाध्याय--तथा अध्ययन में; संयुत:--पूर्ण; बृहत्-ब्रत--आजीवन ब्रह्मचर्य ब्रत; धर: --धारण करते हुए; शान्त:--शान्त;जटिल:--जटा सहित; वल्कल-अम्बर:--छाल के वस्त्र पहने; बिभ्रतू--लिए हुए; कमण्डलुम्ू--कमण्डल; दण्डम्--संन्यासी की डंडा; उपवीतम्--जनेऊ; स-मेखलम्--ब्रह्मचारी के कटिसूत्र सहित; कृष्ण-अजिनमू--काले मृग का चर्म;स-अक्ष-सूत्रमू--कमल के बीजों से बनी जपमाला; कुशान्--कुश घास; च-- भी; नियम-ऋद्धये-- अपनी आध्यात्मिकप्रगति को सरल बनाने के लिए; अग्नि--अग्नि रूप में; अर्क--सूर्य; गुरु--गुरु; विप्र--त्राह्मण; आत्मसु--तथापरमात्मा; अर्चयन्--पूजा करते हुए; सन्ध्ययो: --दिन के प्रारम्भ तथा अन्त में; हरिम्ू-- भगवान् को; सायम्--संध्यासमय; प्रातः--तड़के; सः--वह; गुरवे--अपने गुरु से; भैक्ष्यम्-- भीख माँगने से मिली भिक्षा; आहत्य--लाकर; वाक्-यतः--संयमित वाणी से; बुभुजे-- भाग लिया; गुरु-अनुज्ञात:-- अपने गुरु द्वारा आमंत्रित; सकृत्--एक बार; न--नहीं( आमंत्रित ); उ--निस्सन्देह; चेतू--यदि; उपोषित:--उपवास करते हुए; एवम्--इस तरह; तपः-स्वाध्याय-पर: --तपस्यातथा वैदिक वाड्मय केअध्ययन में तत्पर; वर्षाणाम्--वर्षों; अयुत-अयुतम्--दस हजार के दस हजार गुने; आराधयन्--पूजा करते हुए; हषीक-ईशम्--इन्द्रियों के परम स्वामी, भगवान् विष्णु; जिग्ये--जीत लिया; मृत्युम्--मृत्यु को; सु-दुर्जयम्--जीत पाना असम्भव।
अपने पिता द्वारा ब्राह्मण की दीक्षा प्राप्त करने के लिए किये गये संस्तुत अनुष्ठानों द्वाराशुद्ध बन कर, मार्कण्डेय ने वैदिक स्तोत्रों का अध्ययन किया और विधि-विधानों काकठोरता से पालन किया।
वे तपस्या तथा वैदिक ज्ञान में आगे बढ़ गये और जीवन-भरब्रह्मचारी रहे।
अपनी जटा से तथा छाल से बने अपने वस्त्रों से अत्यन्त शान्त प्रतीत होते हुए,उन्होंने अपनी आध्यात्मिक प्रगति को योगी का कमण्डल, दंड, जनेऊ, ब्रह्मचारी पेटी,काला मृग-चर्म, कमल के बीज की जपमाला तथा कुश के समूह को धारण करके औरआगे बढ़ाया।
उन्होंने दिन की सन्धियों पर भगवान् के पाँच रूपों--यज्ञ-अग्नि, सूर्य, गुरु,ब्राह्मण तथा उसके हृदय के भीतर परमात्मा की नियमित पूजा की।
बे प्रातः तथा सायंकालभिक्षा माँगने जाते और लौटने पर सारा एकत्रित भोजन अपने गुरु को भेंट कर देते।
जबगुरु उन्हें आमंत्रित करते, तभी वे मौन भाव से दिन में एक बार भोजन करते, अन्यथाउपवास करते।
इस तरह तपस्या तथा वैदिक अध्ययन में समर्पित मार्कण्डेय ऋषि ने इन्द्रियोंके परम प्रभु भगवान् की करोड़ों वर्षो तक पूजा की और इस तरह उन्होंने दुर्जेय मृत्यु कोजीत लिया।
"
ब्रह्मा भगुर्भवो दक्षो ब्रह्मपुत्राश्च येडपरे ।
नृदेवपितृभूतानि तेनासन्नतिविस्मिता: ॥
१२॥
ब्रह्मा --बहा; भूगु:ः-- भूगु मुनि; भव:--शिवजी; दक्ष:--दक्ष प्रजापति; ब्रह्म-पुत्रा:--ब्रह्मा के महान् पुत्र; च--तथा;ये--जो; अपरे--अन्य; नृ--मनुष्य; देव--देवतागण; पितृ--पूर्वज; भूतानि-- भूतप्रेत; तेन--उससे ( मृत्यु पर विजय );आसनू--सबके सब हो गये; अति-विस्मिता: --अत्यन्त चकित ।
मार्कण्डेय ऋषि की उपलब्धि से ब्रह्मा, भूगु मुनि, शिवजी, प्रजापति दक्ष, ब्रह्म केमहान् पुत्र, मनुष्यों में से अन्य अनेक लोग, देवता, पूर्वज तथा भूतप्रेत--सभी चकित थे।
"
इत्थं बृहद्व्रतधरस्तपःस्वाध्यायसंयमै: ।
दध्यावधोक्षजं योगी ध्वस्तक्लेशान्तरात्मना ॥
१३॥
इत्थम्--इस प्रकार से; बृहत्-ब्रत-धर: --ब्रह्मचर्य ब्रत को धारण करते हुए; तपः-स्वाध्याय-संयमैः:--अपनी तपस्या,वेदाध्ययन तथा विधि-विधानों के द्वारा; दध्यौ--ध्यान किया; अधोक्षजम्--दिव्य भगवान् पर; योगी--योगी; ध्वस्त--विनष्ट; क्लेश--सारे कष्ट; अन्त:-आत्मना--अपने अंतस्थ मन से |
इस तरह भक्तियोगी मार्कण्डेय ने तपस्या, वेदाध्ययन तथा आत्मानुशासन द्वारा कठोरब्रह्मचर्य धारण किया।
फिर सारे उत्पातों से मुक्त अपने मन से वे अन्दर की ओर मुड़े औरभगवान् का ध्यान किया जो भौतिक इन्द्रियों के परे स्थित है।
"
तस्यैवं युझ्जतश्चित्तं महायोगेन योगिन: ।
व्यतीयाय महान्कालो मन्वन्तरषडात्मक: ॥
१४॥
तस्य--उसका; एवम्--इस प्रकार; युद्भतः--स्थिर करते हुए; चित्तम्--मन; महा-योगेन--योग के शक्तिशाली अभ्याससे; योगिन:--योगी; व्यतीयाय--बीत गया; महान्ू--महान्; काल:--कालखण्ड; मनु-अन्तर--मनु की आयु; षट्ू--छ:;आत्मकः--से युक्त |
जब यह योगी इस तरह महान् योगाभ्यास द्वारा अपने मन को एकाग्र कर रहा था, तोछः: मनुओं की आयु के बराबर ( मन्वन्तर ) विपुल समय बीत गया।
"
एतत्पुरन्दरो ज्ञात्वा सप्तमेउस्मिन्किलान्तरे ।
तपोविशड्टितो ब्रह्मन्नारेभे तद्बिघातनम् ॥
१५॥
एतत्--यह; पुरन्दर:--राजा इन्द्र ने; ज्ञात्वा--जान कर; सप्तमे--सातवें; अस्मिनू--इस; किल--निस्सन्देह; अन्तरे--मनुके राज्य में; तप:--तपस्या का; विशद्धित:-- भयभीत होकर; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण शौनक; आरेभे--आरम्भ कर दिया;तत्--उस तपस्या का; विघाटनम्--विघ्त |
हे ब्राह्मण, सातवें मन्वन्तर में, जोकि चालू युग है, इन्द्र को मार्कण्डेय की तपस्या कापता चला तो वह उनकी बढ़ती योगशक्ति से भयभीत हो उठा।
इस तरह उसने मुनि कीतपस्या में विघ्न डालने का प्रयास किया।
"
गन्धर्वाप्सरस: काम वसनन््तमलयानिलौ ।
मुनये प्रेषयामास रजस्तोकमदौ तथा ॥
१६॥
गन्धर्व-अप्सरस:--दैवी गायक तथा नर्तकियाँ; कामम्--कामदेव को; वसन््त--वसन्त ऋतु; मलय-अनिलौ--तथा मलयपर्वत से आने वाली प्रफुल्ल करने वाली वायु; मुनये--मुनि के पास; प्रेषयाम् आस--भेजा; रज:-तोक--काम का शिशु,लोभ; मदौ--नशा; तथा-- भी |
मुनि की आध्यात्मिक तपस्या नष्ट करने के लिए, इन्द्र ने कामदेव, सुन्दर गन्धर्वों, अप्सराओं, वसन््त ऋतु तथा मलय पर्वत से चलने वाली चन्दन की गन्ध से युक्त मन्द समीरके साथ साक्षात् लोभ तथा नशे ( मद ) को भेजा।
"
ते वै तदाश्रमं जम्मुर्हिमादरे: पार्श्व उत्तरे ।
पुष्पभद्रा नदी यत्र चित्राख्या च शिला विभो ॥
१७॥
ते--वे; बै--निस्सन्देह; तत्-मार्कण्डेय ऋषि की; आश्रमम्--कुटिया में; जग्मु:--गये; हिम-अद्रेः--हिमालय पर्वत के;पार््वे--बगल में; उत्तरे--उत्तर में; पुष्पभद्रा नदी--पुष्पभद्रा नदी; यत्र--जहाँ; चित्रा-आख्या--चित्रा नामक; च--तथा;शिला--चोटी; विभो--हे शक्तिशाली शौनक
हे शक्तिशाली शौनक, वे मार्कण्डेय की कुटिया पर गये जो हिमालय पर्वत की उत्तरीदिशा में थी और जहाँ से पुष्पभद्गा नदी सुप्रसिद्ध चोटी चित्रा के निकट से बहती है।
"
तदाश्रमपदं पुण्य॑ पुण्यद्रुमलताझ्लितम् ।
पुण्यद्विजकुलाकीऋनं पुण्यामलजलाशयम् ॥
१८॥
मत्तभ्रमरसड़ीतं मत्तकोकिलकूजितम् ।
मत्तबर्हिनटाटोपं मत्तद्विजकुलाकुलम् ॥
१९॥
वायु: प्रविष्ट आदाय हिमनिर्झरशीकरान् ।
सुमनोभि: परिष्वक्तो ववावुत्तम्भयन्स्मरम् ॥
२०॥
तत्--उसकी; आश्रम-पदम्--कुटिया का स्थान; पुण्यम्--पवित्र; पुण्य--पतवित्र; द्रुम--वृक्षों; लता--तथा लताओं से;अश्वितमू-विशेष रूप से अंकित; पुण्य--पवित्र; ट्विज--ब्राह्मण मुनियों के; कुल--समूहों से; आकीर्णम्--परिपूरित;पुण्य--पवित्र; अमल--निर्मल; जल-आशयमू--जलाशयों से युक्त; मत्त--मतवाले; भ्रमर--भौरों के; सड्रीतम्--संगीतसे; मत्त--उन्मत्त बने हुए; कोकिल--कोयलों की; कूजितम्--कूक से; मत्त--मतवाले; बर्हि--मोरों के; नट-आटोपम्--नाचने के नशे में; मत्त--मतवाले; द्विज--पक्षियों के; कुल--परिवारों से युक्त; आकुलम्--पूरित; वायु:--मलयाचल की वायु ने; प्रविष्ट: --प्रवेश करके; आदाय--लेकर; हिम--शीतल; निर्झर--झरनों के; शीकरान्--कुहरे केकणों; सुमनोभि:--फूलों से; परिष्वक्त:--आलिंगित होकर; ववौ--बहने लगी; उत्तम्भयन्--जागृत करते हुए; स्मरम्--कामदेव को।
मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम को पवित्र वृक्षों के कुंज अलंकृत कर रहे थे और बहुत-सेसाधु ब्राह्मण प्रचुर शुद्ध, पवित्र तालाबों का आनन्द उठाते हुए वहाँ रह रहे थे।
वह आश्रमउन्मत्त भौरों की गुनगुनाहट से तथा उत्तेजित कोयलों की कुहू-कुहू से प्रतिध्वनित हो रहा थाऔर प्रफुल्लित मोर इधर-उधर नाच रहे थे।
निस्सन्देह उन्मत्त पक्षियों के अनेक परिवार उसकुटिया में झुंड के झुंड रह रहे थे।
वहाँ पर इन्द्र द्वारा भेजी वसन््त की वायु पास के झरनों सेशीतल बूँदों की फुहार लेते हुए प्रविष्ट हुई।
वह वायु वन के फूलों के आलिंगन से सुगंधितथी।
उसने कुटिया में प्रवेश किया और कामदेव की कामेच्छा को जगाना प्रारम्भ कर दिया।
"
उद्यच्चन्द्रनिशावक्त्र: प्रवालस्तबकालिभि:ः ।
गोपद्गुमलताजालैस्तत्रासीत्कुसुमाकर: ॥
२१॥
उद्यत्ू--उदय होते; चन्द्र--चन्द्रमा के साथ; निशा--रात; वक्त्र:--मुख वाली; प्रवाल--नई कोपलों से; स्तबक--फूलोंकी; आलिभि:--पंक्तियों से; गोप--छिपी; द्रुम--वृक्षों; लता--तथा लताओं के; जालै:ः--समूह से; तत्र--वहाँ;आसीतू--प्रकट हुआ; कुसुम-आकरः:--वसन्त ऋतु |
तब मार्कण्डेय के आश्रम में वसन््त ऋतु प्रकट हुआ।
संध्याकालीन आकाश उदय हो रहेचन्द्रमा के प्रकाश से चमक रहा था मानो वह वसन््त का मुख हो और नई कोंपले और ताजेफूल प्रायः वृक्षों और लताओं के झुंडों को आच्छादित किये हुए थे।
"
अन्वीयमानो गन्धर्वैगीतवादित्रयूथकै: ।
अदृश्यतात्तचापेषु: स्वःस्त्रीयूथपति: समर: ॥
२२॥
अन्वीयमान: -- अनुसरण करते हुए; गन्धर्वै: --गन्धर्वो द्वारा; गीत--गायकों ; वादित्र--तथा वाद्य-यंत्र बजाने वालों की;यूथकै:--टोलियों द्वारा; अहह्यत--दिखाई पड़ा; आत्त--पकड़े; चाप-इषु:--अपना धनुष तथा बाण; स्वः-स्त्री-यूथ--झुंड की झुंड स्वर्ग की स्त्रियों का; पति:--स्वामी; स्मर:--कामदेव।
तब अनेक स्वर्ग की स्त्रियों का पति कामदेव वहाँ पर अपना धनुष और बाण लिएआया।
उसके पीछे-पीछे गन्धर्वों की टोलियाँ थी जो वाद्य-यंत्र बजा रहे थे और गा रहे थे।
"
ह॒त्वाग्नि समुपासीनं दहशु: शक्रकिड्जूरा: ।
मीलिताक्षं दुराधर्ष मूर्तिमन्तमिवानलम् ॥
२३॥
ह॒त्वा--आहुति डाल कर; अग्निमू-- अग्नि में; समुपासीनम्--योग-दध्यान में बैठे हुए; दहशु;:--देखा; शक्र--इच्ध के;किड्डरा:ः--नौकरों ने; मीलित--बन्द; अक्षम्--नेत्र; दुराधर्षम्-- अजेय; मूर्ति-मन्तम्--साक्षात्; इब--मानो; अनलमू्--अग्निइन्द्र के नौकरों ने ऋषि को ध्यान में आसीन पाया, जिसने अभी अभी यज्ञ-अग्नि मेंनियत आहुतियाँ डाली थीं।
उसकी आँखें समाधि में बन्द थीं; वह अजेय प्रतीत हो रहा थामानो साक्षात् अग्नि हो।
"
ननृतुस्तस्य पुरतः स्त्रियोथो गायका जगु: ।
मृदड्डवीणापणवैर्वाद्यं चक्रुर्मनोरमम् ॥
२४॥
ननृतुः--नाचीं; तस्य--उनके; पुरत:--समक्ष; स्त्रियः--स्त्रियाँ; अथ उ--तथा; गायका:--गवैयों ने; जगु:ः--गाया;मृदड़--मृदंग; वीणा--वीणा; पणवै:--तथा मंजीरों से; वाद्यम्ू--वाद्य संगीत; चक्कु:--किया; मन: -रमम्--मन को हरनेबाला
ऋषि के समक्ष स्त्रियाँ नाचने लगीं और गन्धर्वो ने मृदंग, वीणा तथा मंजीरों के साथ मनोहर गीत गाये।
"
सन्दधेस्त्रं स्वधनुषि काम: पञ्ञमुखं तदा ।
मधुर्मनो रजस्तोक इन्द्रभृत्या व्यकम्पयन् ॥
२५॥
सन्दधे--चढ़ाया; अस्त्रमू--हथियार; स्व-धनुषि--अपने धनुष पर; काम:--कामदेव ने; पञ्ञ-मुखम्--पाँच सिरों ( दृष्टि,ध्वनि, गन्ध, स्पर्श तथा स्वाद ) वाले; तदा--तब; मधु: --वसन्त; मन:--ऋषि का मन; रज:-तोक:--कामका शिशु,लोभ; इन्द्र-भृत्या:--इन्द्र के नौकर; व्यकम्पयन्--विचलित करने लगे।
जब काम का पुत्र ( साक्षात् लोभ ), वसनन््त तथा इन्द्र के अन्य नौकर मार्कण्डेय के मनको विचलित करने का प्रयत्त कर रहे थे, तो कामदेव ने अपना पाँच सिरों वाला तीरनिकाला और उसे अपने धनुष पर चढ़ाया।
"
क्रीडन्त्या: पुड्लिकस्थल्या: कन्दुकै: स्तनगौरवात् ।
भृशमुद्विग्नमध्याया: केशविस्त्रंसितस्त्रज: ॥
२६॥
इतस्ततो भ्रमदृष्टेश्वलन्त्या अनु कन्दुकम् ।
वायुर्जहार तद्ठास: सूक्ष्म त्रुटितमेखलम् ॥
२७॥
क्रीदन्त्या:--खेल रही; पुल्लिकस्थल्या: --पुझ्लिकस्थली नामक अप्सरा की; कन्दुकै:--गेंदों से; स्तन--उसके कुचों के;गौरवात्--अधिक भार से; भृशम्-- अत्यधिक; उद्विग्न--बोझिल; मध्याया:--जिसकी कटि; केश--उसके बालों से;विस्नैंसित--गिरते हुए; सत्रज:--फूल का हार; इतः तत:ः--इधर-उधर; भ्रमत्--विचरण करती; दृष्टे--जिसकी आँखें;चलस्न््त्या:--चंचल; अनु कन्दुकम्--अपनी गेंद के पीछे; वायु:--वायु; जहार--उड़ा ले गया; तत्-वास:--उसका वस्त्र;सूक्ष्ममू--झीना; त्रुटित--ढीली; मेखलम्--पेटीपुड्चलिकस्थली नामक अप्सरा अनेक गेंदों से खेलने का प्रदर्शन करने लगी।
उसकी कमरउसके भारी स्तनों के भार से लचक रही थी और उसके बालों में गुँथे फूलों का हार बिखररहा था।
जब वह इधर-उधर दृष्टि डालती, गेंदों के पीछे दौड़ती, तो उसके झीने वस्त्र की पेटीढीली पड़ गईं और सहसा वायु उसके वस्त्र उड़ा ले गया।
"
विससर्ज तदा बाएं मत्वा तं स्वजितं समर: ।
सर्व तत्राभवन््मोघमनीशस्य यथोद्यम: ॥
२८॥
विससर्ज--छोड़ा; तदा--तब; बाणम्--तीर; मत्वा--सोच कर; तम्--उसको; स्व--अपने द्वारा; जितम्--जीता हुआ;स्मरः--कामदेव; सर्वम्--यह सब; तत्र--ऋषि की ओर; अभवत्--हो गया; मोघम्--व्यर्थ; अनीशस्य--नास्तिक का;यथा--जिस तरह; उद्यम:--प्रयास |
तब कामदेव ने यह सोच कर कि उसने ऋषि को जीत लिया है, अपना तीर चलाया।
किन्तु मार्कण्डेय को बहकाने के ये सारे प्रयास निष्फल रहे जिस तरह नास्तिक के प्रयास व्यर्थ जाते हैं।
"
त इत्थमपकुर्वन्तो मुनेस्तत्तेजसा मुने ।
दह्ममाना निववृतु: प्रबोध्याहिमिवार्भका: ॥
२९॥
ते--वे; इत्थम्--इस तरह; अपकुर्वन्तः--हानि पहुँचाने का प्रयास करते; मुने:--मुनि को; तत्--उसकी; तेजसा--शक्तिसे; मुने--हे मुनि ( शौनक ); दहममाना: --जला हुआ अनुभव करते हुए; निववृतु:--विलग हो गये; प्रबोध्य--जगाकर;अहिम्--सर्प को; इव--मानो; अर्भका:--बालक
हे विद्वान शौनक, जब कामदेव तथा उसके अनुयायी मुनि को हानि पहुँचाने का प्रयासकर रहे थे, तो वे स्वयं उनकी शक्ति से जीवित ही दग्ध होते अनुभव करने लगे।
इस तरहउन्होंने अपनी शैतानी बन्द कर दी जिस तरह सोते साँप को जगाने वाले बालक।
"
इतीन्द्रानुचरैब््रह्मन्धथर्षितो पि महामुनि: ।
यन्नागादहमो भावं न तच्चित्रं महत्सु हि ॥
३०॥
इति--इस प्रकार; इन्द्र-अनुचरै: --इन्द्र के अनुयायियों द्वारा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; धर्षित:--थृष्ठतापूर्वक आक्रमण कियागया; अपि--यद्यपि; महा-मुनि: --महामुनि; यत्--जिसको; न अगातू--झुके नहीं; अहम:--मिथ्या अहंकार का;भावमू--रूपान्तर को; न--नहीं; तत्--उस; चित्रम्-- आश्चर्यजनक; महत्सु--महात्माओं के लिए; हि--निस्सन्देह
हे ब्राह्मण, इन्द्र के अनुयायियों ने उद्धत होकर सन्त स्वभाव वाले मार्कण्डेय परआक्रमण किया था; फिर भी वे मिथ्या अहंकार के किसी भी प्रभाव के आगे झुके नहीं।
महात्माओं के लिए ऐसी सहिष्णुता तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।
"
इृष्ठा निस्तेजसं कामं सगणं भगवान्स्वराट् ।
श्र॒त्वानुभावं ब्रह्मर्षेविस्मयं समगात्परम् ॥
३१॥
इृष्टा--देख कर; निस्तेजसम्--अपनी शक्ति से रहित; कामम्--कामदेव को; स-गणम्--उसके संगियों समेत;भगवान्-शक्तिमान प्रभु; स्व-राट्--इन्द्र ने; श्रुत्वा--सुन कर; अनुभावम्--प्रभाव; ब्रह्म-ऋषे: --ब्रह्मर्षि का;विस्मयम्--आश्चर्य को; समगात्--प्राप्त हुआ; परमू--अत्यधिक |
बलशाली इन्द्र ने जब महर्षि मार्कण्डेय की योगशक्ति के विषय में सुना तो उसेअत्यधिक आश्चर्य हुआ।
उसने देखा कि किस तरह कामदेव तथा उसके संगी महर्षि कीउपस्थिति में शक्तिहीन हो गये थे।
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तस्यैवं युद्भतश्ित्तं तपःस्वाध्यायसंयमै: ।
अनुग्रहायाविरासीन्नरनारायणो हरि; ॥
३२॥
तस्य--मार्कण्डेय के; एवम्--इस तरह; युद्धत:--स्थिर हुए; चित्तमू--मन को; तपः--तपस्या से; स्वाध्याय--वेदाध्ययनद्वारा; संयमैः--तथा संयम द्वारा; अनुग्रहाय--दया दिखाने के लिए; आविरासीत्--अपने को प्रकट किया; नर-नारायण:--नर तथा नारायण के रूप में; हरि:--भगवान् ने।
सन्त स्वभाव वाले मार्कण्डेय पर, जिन्होंने तपस्या, वेदाध्ययन तथा संयम के द्वाराआत्म-साक्षात्कार में अपने मन को पूरी तरह स्थिर कर लिया था, अपनी दया दिखलाने कीइच्छा से भगवान् उनके समक्ष नर तथा नारायण रूपों में प्रकट हुए।
"
तौ शुक्लकृष्णौ नवकझ्जलोचनौचतुर्भुजौ रौरबवल्कलाम्बरौ ।
पवित्रपाणी उपवीतकं त्रिवृत्कमण्डलुं दण्डमृजुं च वैणवम् ॥
३३॥
पद्माक्षमालामुत जन्तुमार्जनंवेदं च साक्षात्तप एव रूपिणौ ।
तपत्तडिद्वर्णपिशड्ररोचिषाप्रांशू दधानौ विबुधर्षभार्चितो ॥
३४॥
तौ--वे दोनों; शुक्ल-कृष्णौ--एक गोरा तथा दूसरा काला; नव-कञ्ञ--खिले कमल के फूल के समान; लोचनौ--आँखों वाले; चतुः-भुजौ--चार भुजाओं वाले; रौरव--काला मृगचर्म; वल्कल--तथा पेड़ की छाल; अम्बरौ--वस्त्रों केरूप में; पवित्र--अत्यन्त पवित्र करने वाले; पाणी--हाथों वाले; उपवीतकम्--जनेऊ; त्रि-वृत्--तीन लड़ों वाले;'कमण्डलुमू--जलपात्र, कमण्डल; दण्डम्--डण्डा, लाठी; ऋजुम्--सीधा; च--तथा; वैणवम्--बाँस का बना; पद्म-अक्ष--कमल के बीजों की; मालामू--जपमाला; उत--तथा; जन्तु-मार्जमम्--सारे जीवों को शुद्ध बनाने वाले; वेदम्--वेदों को ( दर्भ के पुंजों से प्रदर्शित); च--तथा; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; तप:--तपस्या; एव--निस्सन्देह; रूपिणौ--साक्षात्;तपत्--जलते हुए; तडित्--बिजली; वर्ण--रंग; पिशड्र-- पीला; रोचिषा--तेज से; प्रांशु--अत्यन्त लम्बे; दधानौ--पहनेहुए; विबुध-ऋषभ--देवताओं में प्रमुख; अर्चितौ--पूजति।
उनमें से एक गोरे वर्ण का और दूसरा साँवला था और उन दोनों के चार-चार बाजू थे।
उनके नेत्र खिले कमल की पत्तियों जैसे थे और वे श्याम मृगचर्म तथा छाल का वस्त्र तथातीन धागों वाला जनेऊ पहने थे।
वे पवित्र करने वाले अपने हाथों में, यती का कमण्डल,सीधे बाँस का लट्ठ और कमल के बीज की जपमाला तथा दर्भ के पुंजों के प्रतीक रूप मेंसबको पवित्र करने वाले वेदों को भी धारण किये हुए थे।
उनका कद लम्बा था और उनकापीला तेज चमकती बिजली के रंग का था।
वे साक्षात् तपस्या की मूर्ति रूप में प्रकट हुए थेऔर अग्रणी देवताओं द्वारा पूजे जा रहे थे।
"
ते वै भगवतो रूपे नरनारायणावृषी ।
इष्टोत्थायादरेणोच्चैर्ननामाड्रेन दण्डवत् ॥
३५॥
ते--वे; बै--निस्सन्देह; भगवत:--भगवान् के; रूपे--साकार रूप में; नर-नारायणौ--नर तथा नारायण; ऋषी--दोनोंऋषि; हृष्ठा--देख कर; उत्थाय--खड़े होकर; आदरेण--आदरपूर्वक; उच्चै:--अत्यधिक; ननाम--प्रणाम किया;अड्जेन--अपने पूरे शरीर से; दण्ड-वत्--डंडे की तरहये दोनों मुनि नर तथा नारायण भगवान् के साकार रूप थे।
जब मार्कण्डेय ऋषि ने दोनोंको देखा तो वे तुरन्त उठ खड़े हुए और तब पृथ्वी पर डंडे की तरह गिर कर अतीव आदर सेउन्हें नमस्कार किया।
"
स तत्सन्दर्शनानन्दनिर्व॒तात्मेन्द्रयाशय: ।
हष्टरोमा श्रुपूर्णा क्षो न सेहे तावुदीक्षितुम् ॥
३६॥
सः--वह, मार्कण्डेय; तत्--उनका; सन्दर्शन--दर्शन करने से; आनन्द--आनन््द से; निर्वुत--प्रसन्न; आत्म--जिसकाशरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आशय: --तथा मन; हष्ट--खड़े हुए; रोमा--शरीर के रोएँ; अश्रु-- आँसुओं से; पूर्ण --भरे;अक्ष:--नेत्र; न सेहे--असमर्थ; तौ--दोनों को; उदीक्षितुम्--देख पाने में।
उन्हें देखने से उत्पन्न हुए आनन्द ने मार्कण्डेय के शरीर, मन तथा इन्द्रियों को पूरी तरहतुष्ट कर दिया और उनके शरीर में रोमांच ला दिया और उनके नेत्रों को आँसुओं से भरदिया।
भावविहल होने से मार्कण्डेय उन्हें देख पाने में असमर्थ हो रहे थे।
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उत्थाय प्राज्जलि: प्रह्न औत्सुक्यादाश्लिषन्निव ।
नमो नम इतीशानौ बभाशे गद्गदाक्षरम् ॥
३७॥
उत्थाय--खड़े होकर; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; प्रह्ः--विनीत; औत्सुक्यात्ू--उत्सुकता के कारण; आश्लिषन्--आलिंगनकरते हुए; इव--मानो; नम: -- नमस्कार; नम: --नमस्कार; इति--इस प्रकार; ईशानौ--दोनों प्रभुओं से; बभाषे--कहा;गदगद-- आनन्द से रुद्ध; अक्षरम्-- अक्षर
सम्मान में हाथ जोड़े खड़े होकर तथा दीनतावश अपना सिर झुकाये मार्कण्डेय कोइतनी उत्सुकता हुई कि उन्हें लगा कि वे दोनों ईश्वरों का आलिंगन कर रहे हैं।
आनन्द से रुद्धहुई वाणी से उन्होंने बारम्बार कहा ' मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ'।
"
'तयोरासनमादाय पादयोरवनिज्य च ।
अर्हणेनानुलेपेन धूपमाल्यैरपूजयत् ॥
३८॥
तयो:--उनको; आसनमू--बैठने का स्थान; आदाय-देते हुए; पादयो: --उनके पैरों को; अवनिज्य--पखार कर; च--तथा; अर्हणेन--उपयुक्त आदरपूर्ण भेंटों से; अनुलेपेन--चन्दन तथा अन्य सुगन्धित द्रव्यों से लेपित करके; धूप-- धूप;माल्यै:--तथा फूल की मालाओं से; अपूजयत्--पूजा की
उन्होंने उन दोनों को आसन प्रदान किया, उनके पैर धोये और तब अर्घ्य, चन्दन-लेप,सुगन्धित तेल, धूप तथा फूल-मालाओं की भेंट चढ़ाकर पूजा की।
"
सुखमासनमासीनौ प्रसादाभिमुखौ मुनी ।
पुनरानम्य पादाभ्यां गरिष्ठाविदमब्रवीत् ॥
३९॥
सुखम्--आराम से; आसनम्--आसनों पर; आसीनौ--बैठे; प्रसाद--दया; अभिमुखौ--देने को उद्यत; मुनी--दो मुनियोंके रूप में भगवान् के अवतारों को; पुनः:--फिर से; आनम्य-- प्रणाम करके; पादाभ्याम्ू--उनके पाँवों पर; गरिष्ठौ--अत्यन्त पूजनीय; इृदम्--यह; अब्नवीत्ू--कहा
मार्कण्डेय ऋषि ने पुनः इन दो पूज्य मुनियों के चरणकमलों पर शीश झुकाया जोसुखपूर्वक बैठे थे और उन पर कृपा करने के लिए उद्यत थे।
तब उन्होंने उनसे इस प्रकारकहा।
"
श्रीमार्कण्डेय उवाचकिं वर्णये तब विभो यदुदीरितो सु:संस्पन्दते तमनु वाड्मनइन्द्रियाणि ।
स्पन्दन्ति वै तनुभूतामजशर्वयो श्रस्वस्थाप्यथापि भजतामसि भावबन्धु: ॥
४०॥
श्री-मार्कण्डेय: उवाच-- श्री मार्कण्डेय ने कहा; किम्ू-- क्या; वर्णये--वर्णन करूँ; तव-- आपके विषय में; विभो--हेसर्वशक्तिमान प्रभु; यत्--जिनसे; उदीरित: --चलाई जाती है; असु:--प्राणवायु; संस्पन्दते--जीवन पाती है; तम् अनु --पीछे-पीछे; वाक्--वाणी की शक्ति; मन:ः--मन; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; स्पन्दन्ति--कार्य करने लगती हैं; वै--निस्सन्देह;तनु-भूताम्--समस्त देहधारी जीवों का; अज-शर्वयो:--ब्रह्मा तथा शिव के स्वामी का; च--भी; स्वस्य--मेरा; अपि--भी; अथ अपि--तो भी; भजताम्--पूजा करने वालों के लिए; असि--हो; भाव-बन्धु: --घनिष्ठ प्रेमी मित्र
श्री मार्कण्डेय ने कहा : 'हे सर्वशक्तिमान प्रभु, भला मैं आपका वर्णन कैसे करसकता हूँ?' आप प्राणवायु को जागृत करते हैं, जो मन, इन्द्रियों तथा वाक्-शक्ति कोकार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
यह सारे सामान्य बद्धजीवों पर, यहाँ तक कि ब्रह्मातथा शिव जैसे महान् देवताओं पर भी, लागू होता है।
अतएवं यह निस्सन्देह, मेरे लिए भीसही है।
तो भी, आप अपनी पूजा करने वालों के घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं।
"
मूर्ती इमे भगवतो भगवंस्त्रिलोक्या:क्षेमाय तापविरमाय च मृत्युजित्यै ।
नाना बिभर्ष्यवितुमन्यतनूर्यथेदंसृष्ठरा पुनर्ग्रससि सर्वमिवोर्णनाभि: ॥
४१॥
मूर्ती--दो साकार रूप; इमे--ये; भगवत:-- भगवान् के; भगवनू--हे प्रभु; त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों के; क्षेमाय--कल्याण के लिए; ताप--भौतिक कष्ट की; विरमाय--समाप्ति के लिए; च--तथा; मृत्यु--मृत्यु पर; जित्ये--विजय केलिए; नाना--विविध; बिभर्षि-- प्रकट करते हो; अवितुम्--रक्षा करने के लिए; अन्य--अन्य; तनू:--दिव्य शरीर;यथा--जिस तरह; इृदम्--इस ब्रह्माण्ड को; सृघ्ठा--उत्पन्न करके; पुनः --एक बार फिर; ग्रससि--निगल लेते हो;सर्वम्--पूरी तरह; इब--सहश; ऊर्ण-नाभि:--मकड़ा
हे भगवान्, आपके ये दो साकार रूप तीनों जगतों को परम लाभ प्रदान करने केलिए--भौतिक कष्ट की समाप्ति तथा मृत्यु पर विजय के लिए--प्रकट हुए हैं।
हे प्रभु,यद्यपि आप इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं और इसकी रक्षा करने के लिए नाना प्रकार केदिव्य रूप धारण करते हैं, किन्तु आप इसे निगल भी लेते हैं जिस तरह मकड़ी पहले जालबुनती है और बाद में उसे निगल जाती है।
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तस्यावितु: स्थिरचरेशितुरड्प्रिमूलंयत्स्थं न कर्मगुणकालरज: स्पृशन्ति ।
यद्वै स्तुवन्ति निनमन्ति यजन्त्यभीक्ष्णंध्यायन्ति वेदहदया मुनयस्तदाप्त्ये ॥
४२॥
तस्थ--उसका; अवितु:--रक्षक; स्थिर-चर--अचर तथा चर प्राणी; ईशितु:--परम नियन्ता; अद्धघ्रि-मूलम्--उनकेचरणकमलों के तलवे; यत्-स्थम्--जिस पर स्थित है; न--नहीं; कर्म-गुण-काल--भौतिक कर्म, भौतिक गुणों तथाकाल का; रज:--दूषण; स्पृशन्ति--छूते हैं; यत्--जिसको; बै--निस्सन्देह; स्तुवन्ति-- प्रशंसा करते हैं; निनमन्ति--नमनकरते हैं; यजन्ति--पूजा करते हैं; अभीक्ष्णम्--हर क्षण; ध्यायन्ति-- ध्यान करते हैं; वेद-हृदया:--जिन्होंने वेदों काआत्मसात् कर लिया है; मुनयः--मुनिगण; तत्-आप्त्यै--उन्हें प्राप्त करने के उद्देश्य से |
चूँकि आप सारे चर तथा अचर प्राणियों के रक्षक तथा परम नियन्ता हैं, इसलिए जो भीआपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, उसे भौतिक कर्म, भौतिक गुण या काल केदूषण छू तक नहीं सकते।
जिन महर्षियों ने वेदों के अर्थ को आत्मसात् कर रखा है, वेआपकी स्तुति करते हैं।
आपका सात्निध्य प्राप्त करने के लिए वे हर अवसर पर आपकोनमस्कार करते हैं, निरन्तर आपको पूजते हैं और आपका ध्यान करते हैं।
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नान््यं तवाड्ढयुपनयादपवर्गमूर्ते:क्षेमं जनस्य परितोभिय ईश विदा: ।
ब्रह्मा बिभेत्यलमतो द्विपरार्धश्िष्ण्य:कालस्य ते किमुत तत्कृतभौतिकानाम् ॥
४३॥
न अन्यमू--अन्य नहीं; तब--तुम्हारे; अड्घ्रि--चरणकमलों के; उपनयात्--प्राप्ति की अपेक्षा; अपवर्ग-मूर्ते:--जोसाक्षात् मोक्ष हैं; क्षेममू--लाभ; जनस्थ--पुरुष के लिए; परितः--सभी दिशाओं में; भिय:-- भयभीत; ईश--हे ईश्वर;विद्य:--हम जानते हैं; ब्रह्मा-- ब्रह्मा; बिभेति-- भयभीत रहता है; अलम्-- अत्यधिक; अत:--इस कारण से; द्वि-परार्ध--ब्रह्माण्ड की पूरी अवधि; धिष्णय:--शासनकाल; कालस्य--काल का; ते--आपका स्वरूप; किम् उत--क्या कहा जाय;ततू-कृत--उस ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न; भौतिकानाम्--संसारी प्राणियों का |
हे प्रभु, ब्रह्म भी, जोकि ब्रह्माण्ड की पूरी अवधि तक अपने उच्च पद का भोग करताहै, काल के प्रवाह से भयभीत रहता है।
तो उन बद्धजीवों के बारे में क्या कहा जाय जिन्हें ब्रह्मा उत्पन्न करते हैं।
वे अपने जीवन के पग-पग पर भयावने संकटों का सामना करते हैं ।
मेंइस भय से छुटकारा पाने के लिए आपके चरणमलों की जोकि साक्षात् मोक्ष स्वरूप हैंशरण ग्रहण करने के सिवाय और कोई साधन नहीं जानता।
"
तद्दै भजाम्यृतधियस्तव पादमूलंहित्वेदमात्मच्छदि चात्मगुरो: परस्य ।
देहाद्यपार्थमसदन्त्यमभिज्ञमात्रविन्देत ते तहिं सर्वमनीषितार्थम् ॥
४४॥
तत्--इसलिए; बै--निस्सन्देह; भजामि--पूजा करता हूँ; ऋत-धिय:--उनकी, जिनकी बुद्धि सदैव सत्य का अनुभवकरती है; तव--तुम्हारे; पाद-मूलम्--चरणकमलों के तलवे; हित्वा--त्याग कर; इृदम्--यह; आत्म-छदि--आत्मा काआवरण; च--तथा; आत्म-गुरो:--आत्म के गुरु का; परस्य--परब्रह्म का; देह-आदि-- भौतिक शरीर तथा अन्य मिथ्याउपाधियाँ; अपार्थम्-व्यर्थ; असत्--अयथार्थ; अन्त्यमू-- क्षणिक; अभिज्ञ-मात्रमू--पृथक् अस्तित्व की कल्पना करके;विन्देत--प्राप्त करता है; ते--आपसे; तहिं--तब; सर्व--सारा; मनीषित--वांछित; अर्थम्-वस्तुएँ
इसलिए मैं भौतिक शरीर तथा उन सारी वस्तुओं से, जो मेरी असली आत्मा को प्रच्छन्नकरती हैं, अपनी पहचान का परित्याग करके आपके चरणकमलों की पूजा करता हूँ।
येव्यर्थ, अयथार्थ तथा क्षिणिक आवरण, आपसे जिनकी बुद्धि समस्त सत्य को समेटने वालीहै, पृथक् कल्पित मात्र किये जाते हैं।
परमेश्वर तथा आत्मा के गुरु स्वरूप आपको प्राप्तकरके मनुष्य प्रत्येक वांछित वस्तु प्राप्त कर लेता है।
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सत्त्वं रजस्तम इतीश तवात्मबन्धोमायामया: स्थितिलयोदयहेतवोस्य ।
लीला धृता यदपि सत्त्वमयी प्रशान्त्यैनान्ये नृणां व्यसनमोहभियश्च याभ्याम् ॥
४५॥
सत्त्वम्--सतो; रज:--रजो; तम:--तमो; इति--इस प्रकार कहलाने वाले गुण; ईश--हे ईश्वर; तब--तुम्हारा; आत्म-बन्धो--हे आत्म के परम मित्र; माया-मया:--आपकी माया से उत्पन्न; स्थिति-लय-उदय--पालन, विनाश तथा सृजन;हेतव:--कारण; अस्य--इस ब्रह्माण्ड के; लीला: --लीलाओं के रूप में; धृता:--कल्पित; यत् अपि--यद्यपि; सत्त्व-मयी--सात्विक; प्रशान्त्यै--मोक्ष के लिए; न--नहीं; अन्ये--अन्य दो; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; व्यसन--खतरा;मोह--मोह; भिय:--तथा भय; च-- भी; याभ्यामू--जिससे |
हे प्रभु, हे बद्धजीव के परम मित्र, यद्यपि इस जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के लिए आप सतो, रजो तथा तमोगुणों को जो आपकी मायाशक्ति हैं, स्वीकार करते हैं ? किन्तुबद्धजीवों को मुक्त करने के लिए आप सतोगुण का प्रयोग करते हैं।
अन्य दो गुण उनकेलिए कष्ट, मोह तथा भय लाने वाले हैं।
"
तस्मात्तवेह भगवन्नथ तावकानांशुक््लां तनुं स््वदयितां कुशला भजन्ति ।
यत्सात्वता: पुरुषरूपमुशन्ति सत्त्वंलोको यतोभयमुतात्मसुखं न चान्यत् ॥
४६॥
तस्मात्ू--इसलिए; तव--तुम्हारा; हह--इस जगत में; भगवन्--हे भगवान्; अथ--तथा; तावकानाम्--आपके भक्तों के;शुक्लाम्-दिव्य; तनुम्--स्वरूप को; स्व-दयिताम्--अत्यन्त प्रिय; कुशला:--आध्यात्मिक ज्ञान में दक्ष; भजन्ति--पूजाकरते हैं; यत्--क्योंकि; सात्वता:--महान् भक्तगण; पुरुष-- आदि भगवान् के; रूपम्--स्वरूप को; उशन्ति--मानते हैं;सत्त्वमू--सतोगुण; लोक:--आध्यात्मिक जगत; यत:--जिससे; अभयमू--निर्भीकता; उत--तथा; आत्म-सुखम्--आत्मा का सुख; न--नहीं; च--तथा; अन्यत्--अन्य कोई ॥
हे प्रभु, चूँकि निर्भीकता, आध्यात्मिक सुख तथा भगवद्धाम--ये सभी सतोगुण के द्वाराही प्राप्त किये जाते हैं इसलिए आपके भक्त इसी गुण को आपकी प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति मानतेहैं, रजो तथा तमोगुण को नहीं।
इस तरह बुद्धिमान व्यक्ति आपके प्रिय दिव्य रूप को,जोकि शुद्ध सत्व से बना होता है, आपके शुद्ध भक्तों के आध्यात्मिक स्वरूपों के साथ पूजाकरते हैं।
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तस्मै नमो भगवते पुरुषाय भूम्नेविश्वाय विश्वगुरवे परदैवताय ।
नारायणाय ऋषये च नरोत्तमायहंसाय संयतगिरे निगमेश्वराय ॥
४७॥
तस्मै--उस; नम:ः--मेरा नमस्कार; भगवते--भगवान् को; पुरुषाय--परम पुरुष; भूम्ने--सर्वव्यापी; विश्वाय--ब्रह्माण्डके समस्त स्वरूप; विश्व-गुरवे--ब्रह्माण्ड के गुरु; पर-दैवताय--परम पूज्य देव; नारायणाय--नारायण को; ऋषये--ऋषि; च--तथा; नर-उत्तमाय-- पुरुषों में श्रेष्ठ; हंसाय--नितान्त शुद्ध; संयत-गिरे--संयमित वाणी वाले; निगम-ईश्वराय--वैदिक शास्त्रों के स्वामी |
मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ।
वे ब्रह्माण्ड के सर्वव्यापक तथा सर्वस्व हैंऔर उसके गुरु भी हैं।
मैं भगवान् नारायण को नमस्कार करता हूँ जो ऋषि के रूप में प्रकटहोने वाले परम पूज्य देव हैं।
मैं सन्त स्वभाव वाले नर को भी नमस्कार करता हूँ जो मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, जो पूर्ण सात्विक हैं, जिनकी वाणी संयमित है और जो वैदिक ग्रन्थों केप्रचारक हैं।
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यं वै न वेद वितथाक्षपथे भ्र॑मद्धी:सन्तं स्वकेष्वसुषु हृद्यपि हक््पथेषु ।
तन्माययावृतमति:ः सउ एव साक्षा-दाद्यस्तवाखिलगुरोरुपसाद्य वेदम् ॥
४८ ॥
यम्--जिसको; बै--निस्सन्देह; न वेद--नहीं पहचानते; वितथ-- धोखेबाज; अक्ष-पथै: --काल्पनिक अनुभूति कीविधियों द्वारा; भ्रमत्-घुमाया जाकर; धी:--जिसकी बुद्धि; सन््तम्--उपस्थित; स्वकेषु-- अपने ही भीतर; असुषु--इन्द्रियों में; हंदि--हृदय के भीतर; अपि-- भी; हक्ू-पथेषु--बाह्य जगत की दृश्य वस्तुओं में; तत्ू-मायया--उसकी मायासे; आवृत--ढकी; मति:--ज्ञान; सः--वह; उ-- भी; एव--ही; साक्षात्- प्रत्यक्ष; आद्य:ः--मूल रूप से ( अज्ञान में );तव--तुम्हारा; अखिल-गुरो:--सारे जीवों के गुरु; उपसाद्य--प्राप्त करके; वेदम्--वेदों का ज्ञान
भौतिकतावादी की बुद्धि उसकी धोखेबाज इन्द्रियों की क्रिया से विकृत रहती है,इसलिए वह आपको तनिक भी पहचान नहीं पाता यद्यपि आप उसकी इन्द्रियों तथा हृदय मेंऔर उसकी अनुभूति की वस्तुओं में सदेव विद्यमान रहते हैं।
मनुष्य का ज्ञान आपकी मायासे आवृत होते हुए भी, यदि वह, सबों के गुरु आपसे, वैदिक ज्ञान प्राप्त करता है, तो वहआपको प्रत्यक्ष रूप से समझ सकता है।
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यहर्शनं निगम आत्मरहःप्रकाशंमुह्ान्ति यत्र कबयोजपरा यतन्तः ।
तं सर्ववादविषयप्रतिरूपशीलंवबन्दे महापुरुषमात्मनिगूढबोधम् ॥
४९॥
यत्--जिसका; दर्शनमू--दर्शन; निगमे--वेदों में; आत्म--परमात्मा का; रह:--रहस्य; प्रकाशम्--प्रकाशित करता है;मुहान्ति--मोहित हो जाते हैं; यत्र--जिसमें; कवय: --बड़े बड़े विद्वान; अज-परा:--ब्रह्मा इत्यादि; यतन्त:--यत्न करतेहुए; तमू--उसको; सर्व-वाद--विभिन्न दर्शनों का; विषय--विषय; प्रतिरूप-- अपने को उपयुक्त बनाकर; शीलम्--जिसका निजी स्वभाव; वन्दे--नमस्कार करता हूँ; महा-पुरुषम्-- भगवान् को; आत्म--आत्मा से; निगूढ--छिपा हुआ;बोधमू--ज्ञान |
हे प्रभु, केवल वैदिक ग्रंथ ही आपके परम स्वरूप का गुह्म ज्ञान प्रकट करने वाले हैं,अतएव भगवान् ब्रह्मा जैसे महान् विद्वान भी आगमन विधियों द्वारा आपको समझने केप्रयास में मोहित हो जाते हैं।
हर दार्शनिक अपने विशेष चिन्तनपरक निष्कर्ष के अनुसारआपको समझता है।
मैं उन परम पुरुष की पूजा करता हूँ जिनका ज्ञान बद्धात्माओं केआध्यात्मिक स्वरूप को आवृत करने वाली शारीरिक उपाधियों से छिपा हुआ है।
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