← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची
अध्याय सात: पौराणिक साहित्य
12.7सूत उबाचअथर्ववित्सुमन्तुश्च शिष्यमध्यापयत्स्वकाम् ।
संहितां सोउपिपथ्याय वेददर्शाय चोक्तवान् ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; अथर्व-वित्--अथर्ववेद का ज्ञाता; सुमन्तु:--सुमन्तु; च--तथा; शिष्यम्--अपनेशिष्य को; अध्यापयत्--शिक्षा दी; स्वकाम्ू--अपनी; संहिताम्--संहिता; सः--उसने, सुमन्तु के शिष्यने; अपि--भी;पथ्याय--पशथ्य को; वेददर्शाय--वेददर्श का; च--तथा; उक्तवान्ू--कहा
सूत गोस्वामी ने कहा : अथर्ववेद के विशेषज्ञ, सुमन्तु ऋषि, ने अपनी संहिता अपनेशिष्य कबन्ध को पढ़ाई जिसने इसे पथ्य और वेददर्श से कहा।
"
शौक्लायनिरब्रह्बलिमोंदोष: पिप्पलायनि: ।
वेददर्शस्य शिष्यास्ते पथ्यशिष्यानथो श्रृूणु ।
कुमुदः शुनको ब्रह्मन्जाजलिश्चाप्यथर्ववित् ॥
२॥
शौक्लायनि: ब्रह्मबलि: --शौक्लायनि तथा ब्रह्मबलि; मोदोष: पिप्पलायनि:--मोदोष तथा पिप्पलायनि; वेददर्शस्य--बेददर्श के; शिष्या:--शिष्य; ते--वे; पथ्य-शिष्यान्--पथ्य के शिष्य; अथो--और भी; श्रृणु--सुनो; कुमुदः शुनक:--कुमुद तथा शुनक; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण, शौनक; जाजलि:--जाजलि; च--तथा; अपि--भी; अथर्व-वित्--अथर्ववेद केज्ञाता
शौक्लायनि, ब्रह्मणनलि, मोदोष तथा पिप्पलायनि वेददर्श के शिष्य थे।
मुझसे पथ्य केभी शिष्यों के नाम सुनो।
हे ब्राह्मण, वे हैं--कुमुद, शुनक तथा जाजलि।
वे सभी अथर्ववेदको अच्छी तरह जानते थे।
"
बश्रु: शिष्योथानिगरस: सैन्धवायन एव च ।
अधीयेतां संहिते द्वे सावर्णाद्यास्तथापरे ॥
३॥
बश्रु;--बश्रु; शिष्य: --शिष्य; अथ--तब; अड्विरस:--शुनक ( जो अंगिरा भी कहलाते हैं ) का; सैन्धवायन:--सैधवायन;एव--निस्सन्देह; च-- भी; अधीयेताम्--उन्होंने सीखा; संहिते--संहिताएँ; द्वे--दो; सावर्ण--सावर्ण; आद्या: --इत्यादि;तथा--उसी तरह; अपरे-- अन्य शिष्यों ने |
बश्रु तथा सैधवायन नामक शुनक के शिष्यों ने अपने गुरु द्वारा संकलित अथर्ववेद केदो भागों का अध्ययन किया।
सैन्धवायन के शिष्य सावर्ण तथा अन्य ऋषियों के शिष्यों नेभी अथर्ववेद के इस संस्करण का अध्ययन किया।
"
नक्षत्रकल्प: शान्तिश्न कश्यपाड्रिरसादय: ।
एते आथर्वणाचार्या: श्रुणु पौराणिकान्मुने ॥
४॥
नक्षत्रकल्प:--नक्षत्रकल्प; शान्तिः:--शान्तिकल्प; च-- भी; कश्यप-आड्रिसस-आदय:-- कश्यप, आंगिरस तथा अन्य;एते--ये; आथर्वण-आचार्या:--अथर्ववेद के गुरु; श्रुणु--सुनो; पौराणिकान्--पुराणों के विद्वान; मुने--शौनकनक्षत्रकल्प, शान्तिकल्प, कश्यप, आंगिरस तथा अन्य लोग भी अथर्ववेद के आचार्यों मेंसे थे।
हे मुनि, अब पौराणिक साहित्य के विद्वानों के नाम सुनो।
"
तय्यारुणि: कश्यपश्च सावर्णिरकृतब्रन: ।
वैशम्पायनहारीतौ षड़्वै पौराणिका इमे ॥
५॥
अय्यारुणि: कश्यप: च--त्रय्यारुणि तथा कश्यप; सावर्णि: अकृत-ब्रण: --सावर्णि तथा अकृतब्रण; वैशम्पायन-हारीतौ--वैशम्पायन तथा हारीत; षट्ू--छ: ; बै--निस्सन्देह; पौराणिका:--पुराणों के आचार्य; इमे-ये त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतब्रण, वैशम्पायन तथा हारीत--ये छः पुराणों केआचार्य हैं।
"
अधीयन्त व्यासशिष्यात्संहितां मत्पितुर्मुखात् ।
एकैकामहमेतेषां शिष्य: सर्वा: समध्यगाम् ॥
६॥
अधीयन्त--उन्होंने सीखा; व्यास-शिष्यात्--व्यासदेव के शिष्य ( रोमहर्षण ) से; संहिताम्--पुराणों के संग्रह; मत्-पितु:--मेरे पिता के; मुखात्--मुख से; एक-एकाम्--हर एक ने एक अंश सीखा; अहम्--मैंने; एतेषाम्--इनमें से;शिष्य:--शिष्य; सर्वा:--सारे संग्रह; समध्यगाम्--पूरी तरह सीखा।
इनमें से प्रत्येक ने मेरे पिता रोमहर्षण से जोकि श्रील व्यासदेव के शिष्य थे, पुराणों कीछहों संहिताओं को पढ़ा।
मैं इन छहो आचार्यों का शिष्य बन गया और मैंने इस पौराणिकज्ञान का भलीभाँति प्रस्तुतिकरण सीखा।
"
कश्यपोहं च सावर्णी रामशिष्योकृतब्रन: ।
अधीमहि व्यासशिष्याच्चत्वारो मूलसंहिता: ॥
७॥
कश्यप:ः--कश्यप; अहम्-मैं; च--तथा; सावर्णि: --तथा सावर्णि; राम-शिष्य:--राम के शिष्य; अकृत्व्रण:--अकृतब्रण; अधीमहि--हमने आत्मसात किया; व्यास-शिष्यात्-व्यास के शिष्य ( रोमहर्षण ) से; चत्वार: --चार; मूल-संहिता:ः--मूल संहिताएँवेदव्यास के शिष्य रोमहर्षण ने पुराणों को चार मूल संहिताओं में विभाजित कर दिया।
मुनि कश्यप तथा मैंने सावर्णि तथा राम के शिष्य अकृतब्रण के साथ-साथ इन चारोंसंहिताओं को सीखा।
"
पुराणलक्षणं ब्रह्ान्ब्रह्मर्षिभिन्िरूपितम् ।
श्रृणुष्व बुद्धिमाञित्य वेदशास्त्रानुसारत: ॥
८॥
पुराण-लक्षणम्--पुराण के लक्षण; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण, शौनक; ब्रह्मय-ऋषिभि:--परम विद्वान ब्राह्मणों द्वारा;निरूपितम्--सुनिश्चित; श्रृणुष्व--सुनो; बुद्धिमू--बुद्धि पर; आश्रित्य--आश्रित होकर; वेद-शास्त्र--वैदिक शास्त्रों के;अनुसारतः--अनुसार |
हे शौनक, तुम ध्यान से पुराण के लक्षण सुनो जिनकी परिभाषा अत्यन्त प्रसिद्ध विद्वानब्राह्मणों ने वैदिक साहित्य के अनुसार दी है।
"
सर्गोउस्याथ विसर्गश्च वृत्तिरक्षान्तराणि च ।
वबंशो वंशानुचरीतं संस्था हेतुरपा भ्रयः ॥
९॥
दशभिर्लक्षणर्युक्तं पुराणं तद्विदो विदु; ।
केचित्पञ्नविध॑ ब्रह्मनम्महदल्पव्यवस्थया ॥
१०॥
सर्ग:--सृष्टि; अस्य--इस ब्रह्मण्ड की; अथ--तब; विसर्ग: --गौण सृष्टि; च--तथा; वृत्ति--पालन; रक्षा--सुरक्षा;अन्तराणि--मनुओं के शासन; च--तथा; वंश: --महान् राजाओं के वंश; वंश-अनुचरितम्--उनके कार्यों का वर्णन;संस्था--प्रलय; हेतु:--( भौतिक कार्यों में जीवों के लगने का ) कारण; अपाश्रय: --परम शरण; दशभि:--दस;लक्षणै:--लक्षणों से; युक्तम्--युक्त; पुराणम्--पुराण को; तत्--इस विषय का; विद:--विद्वान; विदु:--जानते हैं;केचित्--कुछ विद्वान; पञ्ञ-विधम्--पाँच प्रकार के; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; महत्--महान्; अल्प--तथा छोटे के;व्यवस्थया--अन्तर के अनुसारहे ब्राह्मण, इस विषय के विद्वान, पुराण के दस लक्षण बतलाते हैं--इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि ( सर्ग ), तत्पश्चात् लोकों तथा जीवों की सृष्टि ( विसर्ग ), सारे जीवों का पालन-पोषण( वृत्ति ), उनका भरण (रक्षा ), विभिन्न मनुओं के शासन ( अन्तराणि ), महान् राजाओं केवंश ( वंश ), ऐसे राजाओं के कार्यकलाप ( वंशानुचरित ), संहार ( संस्था ), कारण ( हेतु )तथा परम आश्रय ( अपाश्रय )।
अन्य विद्वानों का कहना है कि महापुराणों में इन्हीं दस कावर्णन रहता है, जबकि छोटे पुराणों में केवल पाँच का।
"
नअव्याकृतगुणक्षोभान्महतस्त्रिवृतो हमः ।
भूतसूक्ष्मेन्द्रियार्थानां सम्भव: सर्ग उच्यते ॥
११॥
अव्याकृत-प्रकृति की अव्यक्त अवस्था; गुण-क्षोभात्--गुणों के क्षोभ से; महतः--महत् तत्त्व से; त्रि-वृत:ः--तीन प्रकारका; अहम: --मिथ्या अहंकार से; भूत-सूक्ष्म--अनुभूति के सूक्ष्म रूपों की; इन्द्रिय--इन्द्रियों की; अर्थानामू--तथाइन्द्रिय-विषयों की; सम्भव: --उत्पत्ति; सर्ग:--सृष्टि; उच्यते--कहलाती है।
अव्यक्त प्रकृति के भीतर मूल गुणों के क्षोभ से महत् तत्त्व उत्पन्न होता है।
महत् तत्त्व सेमिथ्या अहंकार उत्पन्न होता है, जो तीन पक्षों में बट जाता है।
यह तीन प्रकार का मिथ्याअहंकार अनुभूति के सूक्ष्म रूपों, इन्द्रियों तथा स्थूल इन्द्रिय-विषयों के रूप में, प्रकट होताहै।
इन सबों की उत्पत्ति सर्ग कहलाती है।
"
पुरुषानुगृहीतानामेतेषां वासनामय: ।
विसर्गोयं समाहारो बीजाद्वीजं चराचरम् ॥
१२॥
पुरुष--सृष्टि की लीला करते भगवान् का; अनुगृहीतानाम्--कृपाप्राप्त लोगों का; एतेषाम्--इन तत्त्वों का; वासना-मयः--जीवों की विगत इच्छाओं के अवशेषों से युक्त; विसर्ग: --गौण सृष्टि; अयम्--यह; समाहार: --व्यक्त संयोग;बीजात्ू--बीज से; बीजम्--दूसरा बीज; चर--गति करते प्राणी; अचरम्--तथा जड़ प्राणी |
गौण सृष्टि ( विसर्ग ), जो ईश्वर की कृपा से विद्यमान है, जीवों की इच्छाओं का व्यक्तसंयोग है।
जिस प्रकार एक बीज से अतिरिक्त बीज उत्पन्न होते हैं, उसी तरह कर्ता में भौतिकइच्छाओं को बढ़ाने वाले कार्य चर तथा अचर जीवों को जन्म देते हैं।
"
वृत्तिर्भूतानि भूतानां चराणामचराणि च ।
कृता स्वेन नृणां तत्र कामाच्योदनयापि वा ॥
१३॥
वृत्ति:-- भरण, निर्वाह; भूतानि--जीव; भूतानाम्ू--जीवों का; चराणाम्--चेतनों का; अचराणि--जड़ों का; च--तथा;कृता--सम्पन्न किया हुआ; स्वेन--अपने बद्ध स्वभाव से; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; तत्र--उसमें; कामात्--कामवश;चोदनया--वैदिक आदेशों के अनुसार; अपि--निस्सन्देह; वा--अथवा।
वृत्ति का अर्थ है भरण या निर्वाह की विधि जिससे चेतन प्राणी जड़ प्राणियों पर निर्वाहकरते हैं।
मनुष्य के लिए वृत्ति का विशेष अर्थ होता है अपनी जीविका के लिए इस तरह सेकार्य करना जो उसके निजी स्वभाव के अनुकूल हो।
ऐसा कार्य या तो स्वार्थ कीइच्छानुसार या फिर ईश्वर के नियमानुसार पूरा किया जा सकता है।
"
रक्षाच्युतावतारेहा विश्वस्यानु युगे युगे ।
तिर्यड्मर्त्यर्षिदेवेषु हन्यन्ते यैस्त्रयीद्विष: ॥
१४॥
रक्षा--रक्षा; अच्युत-अवतार-- भगवान् अच्युत के अवतारों का; ईहा--कार्यकलाप; विश्वस्थ--इस ब्रह्माण्ड का; अनुयुगे युगे-- प्रत्येक युग में; तिर्यक्--पशुओं ; मर्त्य--मनुष्यों; ऋषि--मुनियों; देवेषु--तथा देवताओं के बीच; हन्यन्ते--मारे जाते हैं; यैः --जिन अवतारों द्वारा; त्रयी-द्विष:--वैदिक संस्कृति के शत्रु, दैत्यगण |
अच्युत भगवान् प्रत्येक युग में पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों तथा देवताओं के बीच प्रकटहोते हैं।
वे इन अवतारों में अपने कार्यकलापों से ब्रह्माण्ड की रक्षा करते हैं और वैदिकसंस्कृति के शत्रुओं का वध करते हैं।
"
मन्वन्तरं मनुर्देवा मनुपुत्रा: सुरेश्वरा: ।
रयोउशावताराश्च हरे: षड्विधमुच्यते ॥
१५॥
मनु-अन्तरम्-प्रत्येक मनु के शासन में; मनुः--मनु; देवा:--देवतागण; मनु-पुत्रा:--मनु के पुत्र; सुर-ई श्वरा: --विभिन्नइन्द्र; ऋषय:--ऋषिगण; अंश-अवतारा:-- भगवान् के अंशों के अवतार; च--तथा; हरेः--हरि के; षट्ू-विधम्--छ:प्रकार का; उच्यते--कहा जाता है।
मनु के प्रत्येक शासनकाल ( मन्वन्तर ) में भगवान् हरि के रूप में छह प्रकार के पुरुषप्रकट होते हैं--शासक मनु, मुख्य देवता, मनुपुत्र, इन्द्र, महर्षि तथा भगवान् के अंशावतार।
"
राज्ञां ब्रह्मप्रसूतानां वंशस्त्रैकालिकोन्वय: ।
वंशानुचरितं तेषाम्वृत्तं वंशधरास्च ये ॥
१६॥
राज्ञामू--राजाओं के; ब्रह्म-प्रसूतानाम्--ब्रह्मा से उत्पन्न; वंश:--वंश; त्रै-कालिक:--काल की तीन अवस्थाओं तकविस्तीर्ण ( भूत, वर्तमान तथा भविष्य ); अन्वय:--श्रेणी; वंश-अनुचरितम्--वंशों के इतिहास; तेषाम्--उन वंशों के;वृत्तमू-कार्यकलाप; वंश धरा:--वंश के प्रमुख व्यक्ति; च--तथा; ये--जो ब्रह्मा से लेकर भूत
वर्तमान तथा भविष्य तक लगातार फैली हुई राजाओं की सरणियाँ( पंक्तियाँ ) वंश हैं।
ऐसे वंशों के, विशेष रूप से सर्वाधिक प्रमुख व्यक्तियों के, विवरण वंशइतिहास के प्रमुख विषय होते हैं।
"
नैमित्तिकः प्राकृतिको नित्य आत्यन्तिको लय॒ः ।
संस्थेति कविशि: प्रोक्तश्चतुर्धास्य स्वभावत: ॥
१७॥
नैमित्तिक:--आकस्मिक; प्राकृतिक:--तात्विक; नित्य:--संतत; आत्यन्तिक: --अन्तिम; लय: --प्रलय; संस्था--विलय;इति--इस प्रकार; कविभि:--विद्वान पंडितों द्वारा; प्रोक्त:--वर्णित; चतुर्धा--चार प्रकार से; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का;स्वभावत:--भगवान् की निहित शक्ति सेब्रह्म प्रलय के चार प्रकार हैं--नैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य तथा आत्यन्तिक।
ये सारे के सारे भगवान् की अन्तर्निहित शक्ति द्वारा प्रभावित होते हैं।
विद्वान पंडितों ने इस विषय कानाम विलय रखा है।
"
हेतुर्जीवोस्य सर्गादिरविद्याकर्मकारक: ।
यं चानुशायिनं प्राहुरव्याकृतमुतापरे ॥
१८॥
हेतु:--कारण; जीव:--जीव; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का; सर्ग-आदे:ः--सृजन, पालन तथा संहार का; अविद्या--अज्ञानतावश; कर्म-कारक:--भौतिक कार्य करने वाला; यम्ू--जिसको; च--तथा; अनुशायिनम्--सन्नहित व्यक्ति;प्राहु:--कहते हैं; अव्याकृतम्-- अव्यक्त; उत--निस्सन्देह; अपरे-- अन्य ।
जीव अज्ञानवश भौतिक कर्म करता है और इस तरह वह, एक अर्थ में, ब्रह्माण्ड केसृजन, पालन तथा संहार का हेतु बन जाता है।
कुछ विद्वान जीव को भौतिक सृष्टि में निहितपरुष मानते हैं जबकि अन्य उसे अव्यक्त आत्मा कहते हैं।
"
व्यतिरिकान्वयो यस्य जाग्रत्स्वप्ससुषुप्तिषु ।
मायामयेषु तद्गह्म जीववृत्तिष्वपाअ्रय: ॥
१९॥
व्यतिरिक--पृथक् अस्तित्व; अन्वयः--तथा; यस्य--जिसका; जाग्रतू--जगी हुई चेतना; स्वन--स्वण; सुषुप्तिषु--तथागहरी नींद के अन्तर्गत; माया-मयेषु--माया की वस्तुओं के अन्तर्गत; तत्--वह; ब्रह्म--परब्रह्म; जीव-वृत्तिषु--जीवों केकार्यों के अन्तर्गत; अपाश्रय:--अद्वितीय आश्रय ।
परब्रह्म, जागरूकता की सभी अवस्थाओं--जागृत, सुप्त तथा सुषुप्ति--में, माया द्वाराप्रकट किये जाने वाली सारी घटनाओं में तथा सारे जीवों के कार्यो में उपस्थित रहते हैं।
वेइन सबों से पृथक् होकर भी उपस्थित रहते हैं।
इस तरह अपने ही अध्यात्म में स्थित, वे परमतथा अद्वितीय आश्रय हैं।
"
पदार्थेषु यथा द्र॒व्यं सन््मात्रं रूपनामसु ।
बीजादिपश्ञतान्तासु हावस्थासु युतायुतम् ॥
२०॥
पद-अर्थेषु-- भौतिक वस्तुओं में; यथा--जिस प्रकार; द्रव्यम्--मूल वस्तु; सत्-मात्रम्--वस्तुओं का अस्तित्व मात्र; रूप-नामसु--रूपों तथा नामों के बीच; बीज-आदि--बीज इत्यादि ( गर्भधारण से लेकर ); पञ्ञता-अन्तासु-- मृत्यु तक; हि--निस्सन्देह; अवस्थासु--शरीर की विभिन्न अवस्थाओं में; युत-अयुतम्-- अकेले तथा एकसाथ मिल कर।
यद्यपि भौतिक वस्तु विविध रूप तथा नाम धारण कर सकती है, किन्तु इसका मूलभूतअवयव सदैव इसके अस्तित्व का आधार बना रहता है।
इसी तरह परब्रह्म अकेले तथाएकसाथ मिल कर, सदैव भौतिक शरीर की विभिन्न अवस्थाओं में, गर्भधारण से लेकर मृत्युतक, उपस्थित रहता है।
"
विरमेत यदा चित्तं हित्वा वृत्तित्रयं स्वयम् ।
योगेर्ल वा तदात्मानं वेदेहाया निवर्तते ॥
२१॥
विरमेत--दूर रखता है; यदा--जब; चित्तम्ू-मन; हित्वा--त्याग कर; वृत्ति-त्रयम्--जागृती, स्वप्न तथा सुषुप्ती ये तीनअवस्थाएँ, जोकि भौतिक जीवन के कार्य हैं; स्वयम्--स्वतः; योगेन--नियमित आध्यात्मिक अभ्यास से; वा--अथवा;तदा--तब; आत्मानम्--परमात्मा को; वेद--जानो; ईहाया:-- भौतिक प्रयास से; निवर्तते--बन्द कर देता है
मनुष्य का मन या तो अपने आप से या नियमित आध्यात्मिक अभ्यास से जाग्रत, सुप्ततथा सुषुप्त अवस्थाओं में भौतिक स्तर पर कार्य करना बन्द कर देता है।
तब वह परमात्माको समझ पाता है और भौतिक प्रयास करना बन्द कर देता है।
"
एवं लक्षणलक्ष्याणि पुराणानि पुराविद: ।
मुनयोषष्टादश प्राहु: क्षुललकानि महान्ति च ॥
२२॥
एवम्--इस तरह; लक्षण-लक्ष्याणि--लक्षणों से लक्षित; पुराणानि--पुराण; पुरा-विद:--प्राचीन इतिहासों में दक्ष;मुनयः:--मुनिगण; अष्टाइश--अठारह; प्राहु:--कहते हैं; क्षुल्लकानि--छोटे, गौण; महान्ति--महान्; च-- भी
प्राच्चीन इतिहास में दक्ष मुनियों ने घोषित किया है कि अपने विविध लक्षणों केअनुसार, पुराणों को अठारह प्रधान पुराणों और अठारह गौण पुराणों में विभाजित किया जासकता है।
"
ब्राह्मंं पादं वैष्णवं च शैवं लैड़ं सगारुडं ।
नारदीयं भागवतमाग्नेयं स्कान्दसंज्ञितम् ॥
२३॥
भविष्य॑ ब्रह्मवैवर्त मार्कण्डेयं सवामनम् ।
वाराहं मात्स्यं कौर्म च ब्रह्माण्डाख्यमिति त्रिषट् ॥
२४॥
ब्राह्ममू--ब्रह्मा पुराण; पाद्ममू--पद्मा पुराण; वैष्णवम्--विष्णु पुराण; च--तथा; शैवम्--शिव पुराण; लैड़म्--लिंगपुराण; स-गारुडइम्--गरुड़ पुराण के साथ; नारदीयम्--नारद पुराण; भागवतम्--भागवत पुराण; आग्नेयम्-- अग्निपुराण; स्कान्द--्कन्द पुराण; संज्ञितमू--नामक; भविष्यम्-- भविष्य पुराण; ब्रह्म-वैवर्तम्--ब्रह्मवैवर्त पुराण;मार्कण्डेयम्--मार्कण्डेय पुराण; स-वामनम्ू--वामन पुराण सहित; वाराहम्--वराह पुराण; मात्स्यम्-मत्स्य पुराण;कौर्मम्-कूर्म पुराण; च--तथा; ब्रह्मण्ड-आख्यम्--ब्रह्माण्ड पुरान नामक; इति--इस प्रकार; त्रि-षट्ू--छ: के तीन गुनेअर्थात् अठारह।
अठारह प्रधान पुराणों के नाम हैं--ब्रह्मा, पद्म, विष्णु, शिव, लिंग, गरुड़, नारद,भागवत, अग्नि, स्कन्द, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, वामन, वराह, मत्स्य, कूर्म तथाब्रह्माण्ड पुराण।
"
ब्रह्मन्रिदं समाख्यातं शाखाप्रणयनं मुने: ।
शिष्यशिष्यप्रशिष्याणां ब्रह्मतेजोविवर्धनम् ॥
२५॥
ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; इदम्ू--यह; समाख्यातम्--पूरी तरह वर्णित; शाखा-प्रणयनम्--शाखाओं का विस्तार; मुने:--मुनि( श्रील व्यासदेव ) के; शिष्य--शिष्यों के; शिष्य-प्रशिष्याणाम्ू--तथा उनके शिष्यों के भी शिष्यों के; ब्रह्म-तेज:--आध्यात्मिक शक्ति; विवर्धनम्--बढ़ाने वाले
हे ब्राह्मण, मैंने तुमसे वेदों की शाखाओं के महामुनि व्यासदेव, उनके शिष्यों तथाशिष्यों के भी शिष्यों द्वारा किये गये विस्तार का भलीभाँति वर्णन किया है।
जो इस कथाको सुनता है उसकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ जाती है।
"
