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अध्याय पाँच: शुकदेव गोस्वामी के महाराज परीक्षित को अंतिम निर्देश

12,5श्रीशुक उबवाचअत्रानुवर्ण्यतेभी क्ष्णं विश्वात्मा भगवान्हरि: ।

यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्र: क्रोधसमुद्भधवः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अतन्र-- श्रीमद्भागवत में ; अनुवर्ण्यते--विस्तार से वर्णन हुआ है;अभीक्ष्णम्‌--बारम्बार; विश्व-आत्मा--समस्त ब्रह्माण्ड की आत्मा; भगवान्‌--भगवान्‌; हरि:ः--हरि; यस्य--जिसके;प्रसाद--प्रसन्न होने से; ज:--उत्पन्न; ब्रह्मा--ब्रह्मा; रुद्र:--शिव; क्रोध--क्रोध से; समुद्धव:--उत्पन्न

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस श्रीमद्भागवत की विविध कथाओं में भगवान्‌ हरि काविस्तार से वर्णन हुआ है जिनके प्रसन्न होने पर ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं और जिनके क्रोध सेरुद्र का जन्म होता है।

"

त्वं तु राजन्मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि ।

न जातः प्रागभूतोद्य देहवत्त्वं न नड्छ््यसि ॥

२॥

त्वमू--तुम; तु--लेकिन; राजन्‌ू--हे राजा; मरिष्ये--मैं मरने वाला हूँ; इति--यह सोच कर; पशु-बुद्धिमू--पाशविकमनोवृत्ति का; इमामू--इस; जहि--त्याग दो; न--नहीं; जात: --उत्पन्न; प्राकु--इससे पूर्व; अभूत:--अविद्यमान; अद्य--आज; देह-वत्‌--शरीर की तरह; त्वम्‌--तुम; न नड्छ्यसि--नष्ट नहीं होगे

हे राजा, तुम यह सोचने की पाशविक प्रवृत्ति कि, 'मैं मरने जा रहा हूँ' त्याग दो।

तुमशरीर से सर्वथा भिन्न हो क्योंकि तुमने जन्म नहीं लिया है।

भूतकाल में ऐसा समय नहीं थाजब तुम नहीं थे और तुम विनष्ट होने वाले भी नहीं हो।

"

न भविष्यसि भूत्वा त्वं पुत्रपौत्रादिरूपवान्‌ ।

बीजाइ्डु रवहेहादेव्यतिरिक्तो यथानलः ॥

३॥

न भविष्यसि--तुम नहीं होगे; भूत्वा--होकर; त्वम्‌--तुम; पुत्र--पुत्रों; पौन्र--नातियों; आदि--इत्यादि; रूप-वानू--स्वरूप वाले; बीज--बीज; अड्डु र--तथा अंकुर; वत्‌--सदृश; देह-आदेः--भौतिक शरीरतथा इसके साज-सामान से;व्यतिरिक्त:--पृथक्‌; यथा--जिस तरह; अनलः--अग्नि ( काष्ठ से )

तुम अपने पुत्रों तथा पौत्रों के रूप में फिर से जन्म नहीं लोगे जिस तरह बीज से अंकुरजन्म लेता है और पुनः नया बीज बनाता है।

प्रत्युत तुम भौतिक शरीर तथा उसके साज-सामान से सर्वथा भिन्न हो, जिस तरह अग्नि अपने ईंधन से भिन्न होती है।

"

स्वपण्ने यथा शिरएछेदं पञ्ञत्वाद्यात्मन: स्वयम्‌ ।

यस्मात्पश्यति देहस्य तत आत्मा हाजोमर: ॥

४॥

स्वप्ने--स्वण में; यथा--जिस तरह; शिर:ः--किसी का सिर का; छेदम्‌--काटा जाना; पशञ्ञत्व-आदि--पाँच तत्त्वों से बनेहोने की स्थिति तथा अन्य स्थितियाँ; आत्मन: --अपनी ही; स्वयम्‌--स्वयं; यस्मात्‌--क्योंकि; पश्यति--देखता है;देहस्य--शरीर का; ततः--इसलिए; आत्मा--आत्मा; हि--निश्चय ही; अज:-- अजन्मा; अमर:--अमर।

स्वण में मनुष्य अपने ही सिर को काटा जाते देख सकता है और वह यह समझ सकताहै कि उसका आत्मा स्वप्न के अनुभव से अलग खड़ा है।

इसी तरह जगते समय मनुष्य यहदेख सकता है कि उसका शरीर पाँच भौतिक तत्त्वों का फल है।

इसलिए यह माना जाता हैकि वास्तविक आत्मा उस शरीर से पृथक्‌ है, जिसे वह देखता है और वह अजन्मा तथा अमरहै।

"

घटे भिन्ने घटाकाश आकाश: स्याद्यथा पुरा ।

एवं देहे मृते जीवो ब्रह्म सम्पद्मयते पुन: ॥

५॥

घटे-घड़े में; भिन्ने--टूट जाने पर; घाट-आकाश:-घड़े के भीतर का आकाश; आकाश: --आकाश; स्यात्‌--बनारहता है; यथा--जिस तरह; पुरा--पूर्ववत्‌; एवम्‌--उसी तरह से; देहे--शरीर में; मृते--मर जाने पर, मुक्तअवस्था में;जीव:--जीवात्मा; ब्रहा--अपनी आध्यात्मिक स्थिति; सम्पद्यते--प्राप्त कर लेता है; पुन:--फिर से

जब घड़ा टूट जाता है, तो घड़े के भीतर का आकाश पहले की ही तरह आकाश बनारहता है।

उसी तरह जब स्थूल तथा सूक्ष्म शरीर मरते हैं, तो उनके भीतर का जीव अपनाआध्यात्मिक स्वरूप धारण कर लेता है।

"

मन: सृजति वै देहान्गुणान्कर्माणि चात्मन: ।

तनमन: सृजते माया ततो जीवस्य संसृति: ॥

६॥

मनः--मन; सृजति--उत्पन्न करता है; बै--निस्सन्देह; देहान्‌ू-- भौतिक शरीरों को; गुणान्‌ू--गुणों को; कर्माणि--कर्मोको; च--तथा; आत्मन:--आत्मा का; तत्‌--वह; मन:--मन; सृजते--उत्पन्न करता है; माया--परमे श्वर की मायाशक्ति;ततः--इस प्रकार; जीवस्य--जीव का; संसृति:ः -- अस्तित्व |

आत्मा के भौतिक शरीर, गुण तथा कर्म भौतिक मन द्वारा ही उत्पन्न किये जाते हैं।

मनस्वयं भगवान्‌ की मायाशक्ति से उत्पन्न होता है और इस तरह आत्मा भौतिक अस्तित्व धारणकरता है।

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स्नेहाधिष्ठानवर्त्यग्निसंयोगो यावदीयते ।

तावद्दीपस्य दीपत्वमेवं देहकृतो भव: ।

रजःसत्त्वतमोवृत्त्या जायतेथ विनश्यति ॥

७॥

स्नेह--तेल का; अधिष्ठान--पात्र; वर्ति--बत्ती; अग्नि--तथा अग्नि; संयोग:--संमेल; यावत्‌--जितना; ईयते--देखाजाता है; तावत्‌--उस हद तक; दीपस्थ--दीपक का; दीपत्वम्‌--दीपक के रूप में कार्य करने की स्थर्ति; एवम्‌--उसीतरह; देह-कृत:-- भौतिक शरीर के कारण; भव:--संसार; रज:-सत्त्व-तम:--रजो, सतो तथा तमोगुणों की; वृत्त्या--क्रिया से; जायते--उत्पन्न होता है; अथ--तथा; विनश्यति--नष्ट होता है

दीपक अपने ईंधन, पात्र, बत्ती तथा अग्नि के संमेल से ही कार्य करता है।

इसी तरहभौतिक जीवन, शरीर के साथ आत्मा की पहचान पर आधारित होने से, उत्पन्न होता है औररजो, तमो तथा सतोगुणों के कार्यो से विनष्ट होता है, जो शरीर के अवयवी तत्त्व हैं।

"

न तत्रात्मा स्वयंज्योतिर्यों व्यक्ताव्यक्तयो: पर: ।

आकाश इव चाधारो थ्रुवोनन्तोपमस्तत: ॥

८ ॥

न--नहीं; तत्र--वहाँ; आत्मा--आत्मा; स्वयम्‌-ज्योति:ः--आत्म-प्रकाशित; यः--जो; व्यक्त-अव्यक्तयो:--व्यक्त तथाअव्यक्त ( स्थूल तथा सूक्ष्म देहों ) से; पर:--भिन्न; आकाश: --आकाश; इब--सहृश; च--तथा; आधार: --आधार;ध्रुव:--निश्चित; अनन्त--अन्तहीन; उपम:--अथवा उपमा; तत:--इस प्रकार |

शरीर के भीतर का आत्मा स्वयं-प्रकाशित है और दृश्य स्थूल तथा अदृश्य सूक्ष्म शरीरोंसे पृथक्‌ है।

यह परिवर्तनशील शरीरों का स्थिर आधार बना रहता है, जिस तरह आकाशभौतिक रूपान्तर की अपरिवर्तनशील पृष्ठभूमि है।

इसलिए आत्मा अनन्त और भौतिक तुलनाके परे है।

"

एवमात्मानमात्मस्थमात्मनैवामृश प्रभो ।

बुद्धय्ानुमानगर्भिण्या वासुदेवानुचिन्तया ॥

९॥

एवम्‌--इस तरह; आत्मानम्‌--तुम्हारा शुद्ध आत्मा; आत्म-स्थम्‌--शारीरिक आवरण के भीतर स्थित; आत्मना--तुम्हारेमन से; एव--निस्सन्देह; आमृश--ठीक से विचार करो; प्रभो--हे आत्मा के ई श्वर ( राजा परीक्षित ); बुद्धया--बुद्धि से;अनुमान-गर्भिण्या--तर्क द्वारा सोचा गया; वासुदेव-अनुचिन्तया--वासुदेव के ध्यान से

हे राजा, भगवान्‌ वासुदेव का निरन्तर ध्यान करते हुए तथा शुद्ध एवं तार्किक बुद्धि काप्रयोग करते हुए अपनी आत्मा पर सावधानी से विचार करो कि यह भौतिक शरीर के भीतरकिस तरह स्थित है।

"

चोदितो विप्रवाक्येन न त्वां धक्ष्यति तक्षक: ।

मृत्यवो नोपधक्ष्यन्ति मृत्यूनां मृत्युमी श्वरम्‌ ॥

१०॥

चोदित:ः--भेजा हुआ; विप्र-वाक्येन--ब्राह्मण के शब्दों से; न--नहीं; त्वाम्‌--तुम; धक्ष्यति--जला दोगे; तक्षक:--तक्षक सर्प; मृत्यव:--साक्षात्‌ मृत्यु के दूत; न उपधक्ष्यन्ति--नहीं जला सकता; मृत्यूनाम्‌--मृत्यु के इन कारणों का;मृत्युमू--मृत्यु को; ईश्वरम्‌--आत्मा के स्वामी को

ब्राह्मण के शाप से भेजा हुआ तक्षक सर्प तुम्हारी असली आत्मा को जला नहीं सकेगा।

मृत्यु के दूत तुम जैसे आत्मा के स्वामी को कभी नहीं जला पायेंगे क्योंकि तुमने भगवद्धामजाने के मार्ग के सारे खतरों को पहले से ही जीत रखा है।

"

अहं ब्रह्म परं धाम ब्रह्माहं परमं पदम्‌ ।

एवं समीक्ष्य चात्मानमात्मन्याधाय निष्कले ॥

११॥

दशन्तं तक्षकं पादे लेलिहानं विषाननै: ।

न द्रक्ष्यसि शरीर च विश्व च पृथगात्मन: ॥

१२॥

अहम्‌--ैं; ब्रहम--परब्रहा; परम्‌--परम; धाम-- धाम; ब्रह्म--परब्रहा; अहम्‌--मैं; परमम्‌--परम; पदम्‌--गन्तव्य;एवम्‌--इस प्रकार; समीक्ष्य--विचार करके; च--तथा; आत्मानम्‌-- अपने को; आत्मनि--परमात्मा में; आधाय--रखकर; निष्कले-- भौतिक गन्तव्य से मुक्त; दशन्तम्‌--काटते हुए; तक्षकम्‌--तक्षक को; पादे--अपने पाँव में;लेलिहानम्‌--होठ चाटता सर्प; विष-आननै:--विष से भरे मुँह से; न द्रक्ष्यसि--नहीं देखोगे; शरीरम्‌-- अपने शरीर को;च--तथा; विश्वम्‌--समूचे संसार को; च--तथा; पृथक्‌--भिन्न; आत्मन:--अपने से।

तुम मन में यह विचार लाओ कि, 'मैं परब्रह्म, परम धाम से अभिन्न हूँ और परम गन्तव्य परब्रह्म मुझसे अभिन्न हैं।

इस तरह अपने को परमात्मा को सौंपते हुए जो सभी भौतिकउपाधियों से मुक्त हैं, तुम तक्षक सर्प को जब वह अपने विष से पूर्ण दाँतों से तुम्हारे पासपहुँच कर तुम्हारे पैर में काटेगा, तो देखोगे तक नहीं।

न ही तुम अपने मरते हुए शरीर को याअपने चारों ओर के जगत को देखोगे क्योंकि तुम अपने को उनसे पृथक्‌ अनुभव कर चुकेहोगे।

"

एतत्ते कथितं तात यदात्मा पृष्टवान्नुप ।

हरेविश्वात्मनश्वैष्टां कि भूय: श्रोतुमिच्छसि ॥

१३॥

एतत्‌--यह; ते--तुमसे; कथितम्‌--कहा गया; तात--हे परीक्षित; यत्‌--जो; आत्मा--तुमने; पृष्टवान्‌--पूछा; नृप--हेराजा; हरेः-- भगवान्‌ का; विश्व-आत्मन:--ब्रह्माण्ड की आत्मा की; चेष्टामू--लीलाएँ; किम्‌--क्या; भूयः --और आगे;श्रोतुम्‌--सुनना; इच्छसि--चाहते हो ।

हे प्रिय राजा परीक्षित, मैंने तुमसे ब्रह्माण्ड के परमात्मा भगवान्‌ हरि की लीलाएँ--वेसारी कथाएँ--कह दीं जिन्हें प्रारम्भ में तुमने पूछा था।

अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?"

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