← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची

अध्याय दो: कलियुग के लक्षण

12.2रीशुक उवाच ततश्चानुदिनं धर्म: सत्यं शौचं क्षमा दया ।

कालेन बलिना राजन्नडछ्ष्यत्यायुरबलं स्मृति: ॥

१॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत:ः--तब; च--तथा; अनुदिनम्‌--दिन प्रतिदिन; धर्म:--धर्म; सत्यम्‌ू--सत्य; शौचम्‌--शुद्धता; क्षमा--सहनशक्ति; दया--दया; कालेन--काल की शक्ति से; बलिना--प्रबल; राजनू--हे राजापरीक्षित; नडछ्ष्यति--नष्ट हो जायेगी; आयु:--उम्र; बलम्‌--बल; स्मृतिः--स्मरणशक्ति

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, तब कलियुग के प्रबल प्रभाव से धर्म, सत्य,पवित्रता, क्षमा, दया, आयु, शारीरिक बल तथा स्मरणशक्ति दिन प्रतिदिन घटते जायेंगे।

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वित्तमेव कलौ नृणां जन्माचारगुणोदय: ।

धर्मन्यायव्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥

२॥

वित्तमू-- धन; एब--केवल; कलौ--कलियुग में; नृणाम्‌--आदमियों में; जन्म--उत्तम जन्म का; आचार--अच्छाव्यवहार; गुण--तथा सदगुण; उदय:ः--प्रकट होने का कारण; धर्म--धार्मिक कर्तव्य; न्‍्याय--तथा तर्क की;व्यवस्थायाम्‌--व्यवस्था में; कारणम्‌--कारण; बलम्‌--बल; एबव--एकमात्र; हि--निस्सन्देह |

कलियुग में एकमात्र सम्पत्ति को ही मनुष्य के उत्तम जन्म, उचित व्यवहार तथा सदगुणोंका लक्षण माना जायेगा।

कानून तथा न्याय तो मनुष्य के बल के अनुसार ही लागू होंगे।

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दाम्पत्येडभिरुचिह् तुर्मायैव व्यावहारिके ।

स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिर्विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥

३॥

दाम्‌-पत्ये--पति-पत्नी के सम्बन्ध में; अभिरुचि:--ऊपरी आकर्षण; हेतु:--कारण; माया--धोखा; एव--निस्सन्देह;व्यावहारिके--व्यापार में; स्त्रीत्वे--स्त्री होने में; पुंस्वे--पुरुष होने में; च--तथा; हि--निस्सन्देह; रति:--कामशास्त्र;विप्रत्वे--ब्राह्मण होने में; सूत्रमू--जनेऊ; एब--एकमात्र; हि--निस्सन्देह।

पुरुष तथा स्त्रियाँ केवल ऊपरी आकर्षण के कारण एकसाथ रहेंगे और व्यापार कीसफलता कपट पर निर्भर करेगी।

पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व का निर्णय कामशास्त्र में उनकीनिपुणता के अनुसार किया जायेगा और ब्राह्मणत्व जनेऊ पहनने पर निर्भर करेगा।

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लिड्डमेवा भ्रमख्यातावन्योन्यापत्तिकारणम्‌ ।

अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वच: ॥

४॥

लिड्रम्‌ू--बाह्य प्रतीक; एब--केवल; आश्रम-ख्यातौ--मनुष्य के आश्रम को जानने में; अन्योन्य--पारस्परिक; आपत्ति--विनिमय; कारणमू--कारण; अवृत्त्या--जीविका के अभाव से; न्याय--विश्वसनीयता में; दौर्बल्यम्‌--दुर्बलता में;पाण्डित्ये--विद्वत्ता में; चापलम्‌ू--चालाकी-भरे; वच:--शब्द।

मनुष्य का आध्यात्मिक पद मात्र बाह्य प्रतीकों से सुनिश्चित होगा और इसी आधार परलोग एक आश्रम छोड़ कर दूसरे आश्रम को स्वीकार करेंगे।

यदि किसी की जीविका उत्तमनहीं है, तो उस व्यक्ति के औचित्य में सन्देह किया जायेगा।

और जो चिकनी-चुपड़ी बातेंबनाने में चतुर होगा वह विद्वान पंडित माना जायेगा।

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अनाब्यतैवासाधुत्वे साधुत्वे दम्भ एव तु ।

स्वीकार एव चोद्दाहे स्नानमेव प्रसाधनम्‌ ॥

५॥

अनाढ्यता-गरीबी, निर्धनता; एब--केवल; असाधुत्वे-- असाधु होने में; साधुत्वे--सफलता में; दम्भ:--दिखावा;एव--केवल; तु--तथा; स्वी-कार:--शाब्दिक स्वीकृति; एब--केवल; च--तथा; उद्बाहे --विवाह में; स्नानम्‌ू--जल सेस्नान करने; एव--केवल; प्रसाधनम्‌--शरीर को स्वच्छ रखना तथा अलंकृत करना।

यदि किसी व्यक्ति के पास धन नहीं है, तो वह अपवित्र माना जायेगा और दिखावे कोगुण मान लिया जायेगा।

विवाह मौखिक स्वीकृति के द्वारा व्यवस्थित होगा और कोई भीव्यक्ति अपने को जनता के बीच आने के लिए योग्य समझेगा यदि उसने केवल स्नान करलिया हो।

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दूरे वार्ययनं तीर्थ लावण्यं केशधारणम्‌ ।

उदरंभरता स्वार्थ: सत्यत्वे धाष्टर्यमेव हि ।

दाक्ष्यं कुटुम्बभरणं यशोअर्थे धर्मसेवनम्‌ ॥

६॥

दूरे--दूर स्थित; वारि--जल का; अयनम्‌--आगार; तीर्थम्‌--तीर्थस्थान; लावण्यम्‌--सौन्दर्य; केश--बाल; धारणम्‌--धारण करना; उदरम्‌-भरता--पेट का भरण; स्व-अर्थ:--जीवन-लक्ष्य; सत्यत्वे--तथाकथित सत्य में; धाष्टर्यम्‌ू--ढिठाई;एव--केवल; हि--निस्सन्देह; दाक्ष्यम्‌--दक्षता; कुटुम्ब-भरणम्‌--परिवार का पालन-पोषण; यश: --कीर्ति के; अर्थ --हेतु; धर्म-सेवनम्‌--धार्मिक नियमों का पालन

तीर्थस्थान को दूरस्थ जलाशय और सौन्दर्य को मनुष्य की केश-सज्जा पर आश्रित,माना जायेगा।

उदर-भरण जीवन का लक्ष्य बन जायेगा और जो जितना ढीठ होगा उसे उतनाही सत्यवादी मान लिया जायेगा।

जो व्यक्ति परिवार का पालन-पोषण कर सकता है, वहदक्ष समझा जायेगा।

धर्म का अनुसरण मात्र यश के लिए किया जायेगा।

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एवं प्रजाभिर्दुष्ठाभिराकीर्णे क्षितिमण्डले ।

ब्रह्मविद्क्षत्रशूद्राणां यो बली भविता नृप: ॥

७॥

एवम्‌--इस तरह से; प्रजाभि: --जनता से; दुष्टाभि:-- भ्रष्ट की हुई; आकीर्णे--एकत्र हुई; क्षिति-मण्डले--पृथ्वीमण्डलपर; ब्रह्म--ब्राह्मणों; विटू--वैश्यगण; क्षत्र--क्षत्रिय; शूद्राणामू--तथा शूद्रों के बीच; यः--जो भी; बली--सबसेबलवान; भविता--होगा; नृप:--राजा

इस तरह ज्यों-ज्यों पृथ्वी भ्रष्ट जनता से भरती जायेगी, त्यों-त्यों समस्त वर्णों में से जोअपने को सबसे बलवान दिखला सकेगा वह राजनैतिक शक्ति प्राप्त करेगा।

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प्रजा हि लुब्धे राजन्यैर्निर्धणैर्दस्युधर्मभि: ।

आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम्‌ ॥

८॥

प्रजा:--नागरिक; हि--निस्सन्देह; लुब्धे:--लालची; राजन्यै:--राजसी वर्ग के द्वारा; निर्घुणैः:--निर्दय; दस्यु--सामान्यचोरों के; धर्मभि: --स्वभाव के अनुसार कर्म करते हुए; आच्छिन्न--हर लिए गये; दार--पत्नी; द्रविणा: --तथा सम्पत्ति;यास्यन्ति--जायेंगे; गिरि--पर्वत; काननम्‌ू--तथा जंगल में |

जनता ऐसे लोभी तथा निष्ठुर शासकों द्वारा, जिनका आचरण सामान्य चोरों जैसा होगा,अपनी पत्नियाँ तथा सम्पत्ति छीन लिये जाने पर, पर्वतों तथा जंगलों में भाग जायेगी।

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शाकमूलामिषक्षौद्रफलपुष्पाष्टिभोजना: ।

अनावृष्ठया विनड्छ््यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिता: ॥

९॥

शाक--पत्तियाँ; मूल--जड़ें; आमिष--मांस; क्षौद्र--जंगली शहद; फल--फल; पुष्प--फूल; अष्टि--तथा बीज;भोजना: --खाकर; अनावृष्टठया--सूखे के कारण; विनड्छ््यन्ति--विनष्ट हो जायेंगे; दुर्भिक्ष-- अकाल; कर--तथा टैक्सद्वारा; पीडिता:--पीड़ित |

अकाल तथा अत्यधिक कर से सताये हुए लोग पत्तियाँ, जड़ें, मांस, जंगली शहद,'फल, फूल तथा बीज खाने के लिए बाध्य होंगे।

सूखे से पीड़ित होकर बे पूर्णतया विनष्ट होजायेंगे।

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शीतवातातपप्रावृड्हिमैरन्योन्यतः प्रजा: ।

क्षुत्तद्भ्यां व्याधिभिश्वेव सन्तप्स्यन्ते च चिन्तया ॥

१०॥

शीत--जाड़ा; वात--हवा; आतप--तपन; प्रावृटू--मूसलाधार वर्षा; हिमै:ः--तथा बर्फ से; अन्योन्यत:--लड़ने-झगड़नेसे; प्रजा:--नागरिक; क्षुतू-भूख; तृड्भ्यामू--तथा प्यास से; व्याधिभि: --रोगों से; च--भी; एव--निस्सन्देह;सन्तप्स्यन्ते--उन्हें महान्‌ कष्ट भोगना होगा; च--तथा; चिन्तया--चिन्ता से |

जनता को शीत, वात, तपन, वर्षा तथा हिम से अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ेगा।

लोगआपसी झगड़ों, भूख, प्यास, रोग तथा अत्यधिक चिन्ता से भी पीड़ित होते रहेंगे।

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त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायु: कलौ नृणाम्‌ ॥

११॥

त्रिंशत्‌--तीस; विंशति--बीस और; वर्षाणि--वर्ष; परम-आयु:--अधिकतम आयु; कलौ--कलियुग में; नृणाम्‌--मनुष्यों की |

कलियुग में मनुष्यों की अधिकतम आयु पचास वर्ष हो जायेगी।

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क्षीयमाणेषु देहेषु देहिनां कलिदोषतः ।

वर्णाश्रमवतां धर्मे नष्टे वेदपथे नृणाम्‌ ॥

१२॥

पाषण्डप्रचुरे धर्मे दस्युप्रायेषु राजसु ।

चौरयनृतवृथाहिंसानानावृत्तिषु वै नूषु ॥

१३॥

शूद्रप्रायेषु वर्णेषु च्छागप्रायासु धेनुषु ।

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गृहप्रायेष्वाश्रमेषु यौनप्रायेषु बन्धुषु ॥

१४॥

अणुप्रायास्वोषधीषु शमीप्रायेषु स्थास्नुषु ।

विद्युव्प्रायेषु मेघेषु शून्यप्रायेषु सदासु ॥

१५॥

इत्थं कलौ गतप्राये जनेषु खरधर्मिषु ।

धर्मत्राणाय सत्त्वेन भगवानवतरिष्यति ॥

१६॥

क्षीयमाणेषु--छोटा होकर; देहेषु--शरीर में; देहिनाम्‌--सारे जीवों के; कलि-दोषत:--कलियुग के दूषण से; वर्ण-आश्रम-वतामू्‌--वर्णा श्रम समाज के सदस्यों के; धर्मे->उनके धर्मों के; नष्टे--नष्ट हो जाने पर; वेद-पथे--वेदों के मार्गपर; नृणाम्‌--सारे मनुष्यों के लिए; पाषण्ड-प्रचुरे--प्रायः नास्तिकता; धर्मे-- धर्म में; दस्यु-प्रायेषु--प्रायः चोर; राजसु--राजा; चौर्य--लूट; अनृत--झूठ बोलना; वृथा-हिंसा--व्यर्थ की हत्या; नाना--विविध; वृत्तिषु--पेशों में; बै--निस्सन्देह;नृषु--मनुष्यों में; शूद्र-प्रायेषु--प्रायः निम्न वर्ग के शूद्र; वर्णेषु--तथाकथित वर्णो में; छाग-प्रायासु--बकरियों जैसी;धेनुषु--गौवें; गृह-प्रायेषु--घरों जैसे; आश्रमेषु--आध्यात्मिक कुटिया; यौन-प्रायेषु--विवाह से आगे तक न पहुँचनेवाले; बन्धुषु--पारिवारिक बन्धन; अणु-प्रायासु--अत्यन्त लघु; ओषधीषु--जड़ी-बूटियों में; शमी-प्रायेषु --शमी वृक्षोंकी तरह; स्थास्नुषु--सररे वृक्षों में; विद्युत्‌-प्रायेषु--सदैव बिजली प्रकट करते हुए; मेघेषु--बादलों में; शून्य-प्रायेषु --धार्मिक जीवन से शून्य; सद्यसु--घरों में; इत्थम्‌--इस प्रकार; कलौ--कलियुग में; गत-प्राये--प्रायः समाप्त हुए;जनेषु--लोगों में; खर-धर्मिषु--गधों जैसे गुणों वाले; धर्म-त्राणाय--धर्म के उद्धार हेतु; सत्त्वेन--सतोगुण में;भगवान्‌--भगवान्‌; अवतरिष्यति-- अवतरित होगा |

कलियुग समाप्त होने तक सभी प्राणियों के शरीर आकार में अत्यन्त छोटे हो जायेंगेऔर वर्णाश्रम मानने वालों के धार्मिक सिद्धान्त विनष्ट हो जायेंगे।

मानव समाज वेदपथ कोपूरी तरह भूल जायेगा और तथाकथित धर्म प्राय: नास्तिक होगा।

राजे प्रायः चोर हो जायेंगे;लोगों का पेशा चोरी करना, झूठ बोलना तथा व्यर्थ हिंसा करना हो जायेगा और सारेसामाजिक वर्ण शूद्रों के स्तर तक नीचे गिर जायेंगे।

गौवें बकरियों जैसी होंगी; आश्रमसंसारी घरों से भिन्न नहीं होंगे तथा पारिवारिक सम्बन्ध तात्कालिक विवाह बंधन से आगेनहीं जायेंगे।

अधिकांश वृक्ष तथा जड़ी-बूटियाँ छोटी होंगी और सारे वृक्ष बौने शमी वृक्षोंजैसे प्रतीत होंगे।

बादल बिजली से भरे होंगे; घर पवित्रता से रहित तथा सारे मनुष्य गधों जैसेहो जायेंगे।

उस समय भगवान्‌ पृथ्वी पर प्रकट होंगे।

वे शुद्ध सतोगुण की शक्ति से कर्मकरते हुए शाश्वत धर्म की रक्षा करेंगे।

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चराचर गुरोर्विष्णोरी श्वरस्याखिलात्मन: ।

धर्मत्राणाय साधूनां जन्म कर्मापनुत्तये ॥

१७॥

चर-अचर--सारे जड़ तथा चेतन प्राणी; गुरोः --गुरु का; विष्णो: --विष्णु का; ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ का; अखिल--सारे;आत्मन:--परमात्मा का; धर्म-त्राणाय--धर्म की रक्षा के लिए; साधूनाम्‌--साधु पुरुषों के; जन्म--जन्म; कर्म--सकामकर्म की; अपनुत्तये--समाप्ति के लिए

भगवान्‌ विष्णु जोकि सारे जड़ तथा चेतन प्राणियों के गुरु तथा सबों के परमात्मा हैं,धर्म की रक्षा करने तथा अपने सन्त भक्तों को भौतिक कर्मफल से छुटकारा दिलाने के लिएजन्म लेते हैं।

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शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मन: ।

भवने विष्णुयशस: कल्कि: प्रादुर्भविष्यति ॥

१८॥

शम्भल-ग्राम--शम्भल नामक गाँव में; मुख्यस्य--प्रमुख नागरिक के; ब्राह्मणस्य--ब्राह्मण के; महा-आत्मन: --महान्‌आत्मा; भवने--घर में; विष्णुयशस: --विष्णुयशा के; कल्कि:-- भगवान्‌ कल्कि; प्रादुर्भविष्यति--प्रकट होगा।

भगवान्‌ कल्कि शम्भल ग्राम के अत्यन्त निपुण ब्राह्मण महात्मा विष्णुयशा के घर मेंप्रकट होंगे।

अश्वमाशुगमारुह्म देवदत्तं जगत्पतिः ।

असिनासाधुदमनमष्टै श्र्यगुणान्वित: ॥

१९॥

विच्रन्नाशुना क्षौण्यां हयेनाप्रतिमद्युति: ।

नृपलिड्भच्छदो दस्यून्कोटिशो निहनिष्यति ॥

२०॥

अश्वम्‌--अपने घोड़े; आशु-गम्‌--तेज चलने वाले; आरुह्म--सवार होकर; देवदत्तम्‌--देवदत्त पर; जगत्‌ -पति:--ब्रह्माण्ड के स्वामी; असिना--अपनी तलवार से; असाधु-दमनम्‌-- असाधुओं का दमन करने वाला ( घोड़ा ); अष्ट--आठ;ऐश्वर्य--योग ऐश्वर्यों; गुण--तथा भगवान्‌ के दिव्य गुणों से; अन्वित:--युक्त; विचरन्‌ू--विचरण करते हुए; आशुना--तेज; क्षौण्याम्‌-पृथ्वी पर; हयेन--अपने घोड़े द्वारा; अप्रतिम--अद्वितीय; झ्युतिः--तेज वाला; नृप-लिड्र--राजाओं केवेश में; छदः--अपने को भेस बदल कर रहते हुए; दस्यून्‌--चोरों को; कोटिश: --करोड़ों; निहनिष्यति--मार डालेगा |

ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान्‌ कल्कि अपने तेज घोड़े देवदत्त पर सवार होंगे और हाथ मेंतलवार लेकर, ईश्वर के आठ योग ऐश्वर्यो तथा आठ विशिष्ट गुणों को प्रदर्शित करते हुए,पृथ्वी पर विचरण करेंगे।

वे अपना अद्वितीय तेज प्रदर्शित करते हुए तथा तेज चाल से सवारीकरते हुए, उन करोड़ों चोरों का वध करेंगे जो राजाओं के वेश में रहने का दुस्साहस कर रहेहोंगे।

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अथ तेषां भविष्यन्ति मनांसि विशदानि वे ।

वासुदेवाड्गरागातिपुण्यगन्धानिलस्पृशाम्‌ ।

पौरजानपदानां वै हतेष्वखिलदस्युषु ॥

२१॥

अथ--तब; तेषाम्‌--उनमें से; भविष्यन्ति--होंगे; मनांसि--मन; विशदानि--स्पष्ट; बै--निस्सन्देह; वासुदेव-- भगवान्‌वासुदेव के; अड्ू--शरीर का; राग--सुगन्धि पदार्थों से; अति-पुण्य--अत्यन्त पवित्र; गन्ध--गन्ध से युक्त; अनिल--वायुद्वारा; स्पृशाम्‌--स्पर्श किये हुओं का; पौर--नगरवासियों के; जन-पदानाम्‌--छोटे कस्बों तथा गाँवों के निवासियों के;बै--निस्सन्देह; हतेषु--मारे जाने पर; अखिल--सारे; दस्युषु--धूर्त राजाओं के

जब सारे धूर्त राजा मारे जा चुकेंगे, तो शहरों तथा कस्बों के निवासी, भगवान्‌ वासुदेवको लेपित चन्दन तथा अन्य प्रसाधनों की सुगन्धि को लाती हुईं पवित्र वायु का अनुभवकरेंगे और उससे उनके मन आध्यात्मिक रूप से शुद्ध हो जायेंगे।

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तेषां प्रजाविसर्गश्न स्थविष्ठ: सम्भविष्यति ।

वबासुदेवे भगवति सत्त्वमूर्तों हदि स्थिते ॥

२२॥

तेषाम्‌--उनकी; प्रजा--सन्तान की; विसर्ग: --उत्पत्ति; च--तथा; स्थविष्ठ: --प्रचुर; सम्भविष्यति--होगा; वासुदेवे--वासुदेव में; भगवति-- भगवान्‌; सत्त्व-मूर्तौ--सतोगुणी स्वरूप में; हदि--हृदयों में ; स्थिते--स्थित ॥

जब भगवान्‌ वासुदेव बचे हुए नागरिकों के हृदयों में अपने दिव्य सात्विक रूप में प्रकटहोते हैं, वे फिर से पृथ्वी की जनसंख्या को काफी बढ़ा देंगे।

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यदावतीर्णो भगवान्कल्किर्धर्मपतिहरि: ।

कृतं भविष्यति तदा प्रजासूतिश्चव सात्तिविकी ॥

२३॥

यदा--जब; अवतीर्ण:--अवतरित; भगवान्‌-- भगवान्‌; कल्किः-- कल्कि; धर्म-पति:--धर्म के स्वामी; हरि: --भगवान्‌;कृतम्‌--सत्ययुग; भविष्यति--शुरू होगा; तदा--तब; प्रजा-सूति:--प्रजा की उत्पत्ति; च--तथा; सात्त्विकी--सतोगुणी।

जब पृथ्वी पर धर्म के पालनहारे भगवान्‌, कल्कि के रूप में, प्रकट हो चुकेंगे, तोसत्ययुग प्रारम्भ होगा और मानव समाज सात्विक सन्तानें उत्पन्न करेगा।

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यदा चन्द्रश्न सूर्यश्च॒ तथा तिष्यबृहस्पती ।

एकराशौ समेष्यन्ति भविष्यति तदा कृतम्‌ ॥

२४॥

यदा--जब; चन्द्र: --चन्धमा; च--तथा; सूर्य: --सूर्य; च--तथा; तथा-- भी; तिष्य--तिष्य या पुष्य नक्षत्र (जो ३० २०से लेकर १६० ४०कर्क तक विस्तीर्ण है ); बृहस्पती--बृहस्पति नक्षत्र; एक-राशौ--एक ही राशि पर ( कर्कट );समेष्यन्ति--एकसाथ प्रवेश करेंगे; भविष्यति--होगा; तदा--तब; कृतम्‌--सत्ययुग |

जब चन्द्रमा, सूर्य तथा बृहस्पति एकसाथ कर्कट राशि में होते हैं और तीनों एक हीसमय पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करते हैं, ठीक उसी क्षण सत्य या कृतयुग प्रारम्भ होगा।

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येउतीता वर्तमाना ये भविष्यन्ति च पार्थिवा: ।

ते त उद्देशतः प्रोक्ता वंशीया: सोमसूर्ययो: ॥

२५॥

ये--जो; अतीता:--विगत; वर्तमाना: --वर्तमान; ये--जो; भविष्यन्ति--भविष्य में होंगे; च--तथा; पार्थिवा:--पृथ्वी केराजे; ते ते--वे वे, वे सभी; उद्देशत:--संक्षिप्त कथन द्वारा; प्रोक्ताः:--वर्णित; वंशीया:--वंशों के सदस्य; सोम-सूर्ययो: --चन्द्र तथा सूर्य देव के ॥

इस तरह मैंने सूर्य तथा चन्द्र वंशों-- भूत, वर्तमान तथा भविष्य--के सारे राजाओं कावर्णन कर दिया है।

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आरशभ्य भवतो जन्म यावन्नन्दाभिषेचनम्‌ ।

एतद्ठर्षसहस्त्रं तु शतं पञ्जदशोत्तरम्‌ ॥

२६॥

आरभ्य--प्रारम्भ करके; भवत:--आपके ( परीक्षित ); जन्म--जन्म; यावत्‌--जब तक; नन्द--महानन्दि के पुत्र राजानन्द का; अभिषेचनम्‌--- अभिषेक, राजतिलक; एतत्‌--यह; वर्ष--वर्ष; सहस्त्रमू--एक हजार; तु--तथा; शतम्‌ू--एकसौ; पञ्ञ-दश-उत्तरमू--पचास और।

तुम्हारे जन्म से लेकर राजा नन्द के राजतिलक तक ११५० वर्ष बीत चुकेंगे।

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सप्तर्षणां तु यौ पूर्वी हृश्येते उदितौ दिवि ।

तयोस्तु मध्ये नक्षत्र हश्यते यत्समं निशि ॥

२७॥

तेनैव ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम्‌ ।

ते त्वदीये द्विजाः काल अधुना चाथ्रिता मघा: ॥

२८॥

सप्त-ऋषीणाम्‌--सात ऋषियों का समूह ( पाश्चात्य लोग जिसे उर्स मेजर कहते हैं ); तु--तथा; यौ--जो दो नक्षत्र; पूर्वी --प्रथम; दृश्येते--देखे जाते हैं; उदितौ--उदय हुए; दिवि--आकाश में; तयो: --दोनों ( पुलह तथा क्रतु ) के; तु--तथा;मध्ये--बीच में; नश्षत्रमू--नक्षत्र; हश्यते--देखा जाता है; यत्‌ू--जो; समम्‌--उसी रेखा में; निशि--रात्रि के आकाश में;तेन--उस नक्षत्र से; एब--निस्सन्देह; ऋषय: --सप्तर्षिगण; युक्ता:--सम्बद्ध हैं; तिष्ठन्ति--रहते जाते हैं; अब्द-शतम्‌--एक सौ वर्ष; नृणाम्‌-मनुष्यों का; ते--ये सप्तर्षि; त्वदीये--आप में; द्विजा:--कुलीन ब्राह्मण; काले--समय में;अधुना--वर्तमान; च--तथा; आश्रिता:--स्थित हैं; मघा:--मघा नक्षत्र में ॥

सप्तर्षि मण्डल के सात तारों में से पुलह तथा क्रतु ही सबसे पहले रात्रिकालीन आकाशमें उदय होते हैं।

यदि उनके मध्य बिन्दु से होकर उत्तर दक्षिण को एक रेखा खींची जाय तोयह जिस नक्षत्र से होकर गुजरती है, वह उस काल का प्रधान नक्षत्र माना जाता है।

सप्तर्षिगण एक सौ मानवी वर्षों तक उस विशेष नक्षत्र से जुड़े रहते हैं।

सम्प्रति तुम्हारेजीवन-काल में वे मघा नक्षत्र में स्थित हैं।

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विष्णोर्भगवतो भानु: कृष्णाख्योउसौ दिव॑ गतः ।

तदाविशत्कलिलेंक पापे यद्रमते जन: ॥

२९॥

विष्णो:--विष्णु के; भगवत:-- भगवान्‌; भानु:--सूर्य; कृष्ण-आख्य:--कृष्ण नामक; असौ--वह; दिवम्‌--आध्यात्मिक आकाश तक; गत:--वापस जाकर; तदा--तब; अविशत्‌--प्रवेश किया; कलि:--कलियुग; लोकम्‌--इसजगत में; पापे--पाप में; यत्‌--जिस युग में; रमते--रमण करते हैं; जन:--लोग।

भगवान्‌ विष्णु सूर्य के समान तेजवान्‌ हैं और कृष्ण कहलाते हैं।

जब वे वैकुण्ठ-लोकवापस चले गये, तो इस जगत में कलि ने प्रवेश किया और तब लोग पापकर्मों में आनन्द लेने लगे।

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यावत्स पादपद्याभ्यां स्पृशनास्ते रमापतिः ।

तावत्कलियं पृथिवीं पराक्रन्तुंन चाशकत्‌ ॥

३०॥

यावत्‌--जब तक; सः--वह, श्रीकृष्ण; पाद-पद्माभ्यामू--अपने चरणकमलों से; स्पृशन्‌--स्पर्श करते हुए; आस्ते--रहता रहा; रमा-पति:ः--लक्ष्मी देवी का पति; तावत्‌--तब तक; कलि:--कलियुग; बै--निस्सन्देह; पृथिवीम्‌-- पृथ्वीको; पराक्रन्तुम--जीतने के लिए; न--नहीं; च--तथा; अशकत्‌--समर्थ था

जब तक लक्ष्मीपति भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपने चरणकमलों से पृथ्वी का स्पर्श करते रहे,तब तक कलि इस लोक का दमन करने में असमर्थ रहा।

"

यदा देवर्षय: सप्त मघासु विचरन्ति हि ।

तदा प्रवृत्तस्तु कलिद्दादशाब्दशतात्मक: ॥

३१॥

यदा--जब; देव-ऋषय: सप्त--देवताओं में से सात ऋषि; मघासु--मघा नक्षत्र में; विचरन्ति--विचरण करते हैं; हि--निस्सन्देह; तदा--तब; प्रवृत्त:--प्रारम्भ होता है; तु--तथा; कलि:ः--कलियुग; द्वादश--बारह; अब्द-शत--शताब्दी( देवताओं के ये १,२०० वर्ष बराबर हैं पृथ्वी पर ४, ३२, ००० वर्ष के ); आत्मक:--से युक्त |

जब सप्तर्षि मण्डल मघा नक्षत्र से होकर गुजरता है, तो कलियुग प्रारम्भ होता है।

यहदेवताओं के १,२०० वर्षो तक रहता है।

"

यदा मघाभ्यो यास्यन्ति पूर्वाषाढां महर्षयः ।

तदा नन्दात्प्रभृत्येष कलिदव्वृद्धि गमिष्यति ॥

३२॥

यदा--जब; मघाभ्य: --मघा से; यास्यन्ति--वे जायेंगे; पूर्व-आषाढाम्‌-- अगला नक्षत्र पूर्वाषाढा; महा-ऋषय: --सप्तर्षि;तदा--तब; नन्दात्‌--नन्द से लेकर; प्रभूति--तथा उसके वंशज; एष:--यह; कलि:--कलियुग; वृद्द्धिम्‌--प्रौढ़ता;गमिष्यति--प्राप्त करेगा।

जब सप्तर्षि मघा से चल कर पूर्वाषाढा में जायेंगे तो कलि अपनी पूर्ण शक्ति में होगाऔर राजा नन्द तथा उसके वंश से इसका सूत्रपात होगा।

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यस्मिन्कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि ।

प्रतिपन्न॑ं कलियुगमिति प्राहु: पुराविद: ॥

३३॥

यस्मिनू--जिस पर; कृष्ण:-- श्रीकृष्ण; दिवम्‌--वैकुण्ठ को; यात:--गये हुए; तस्मिन्‌--उस पर; एव--वही; तदा--तब; अहनि--दिन; प्रतिपन्नम्‌ू--प्राप्त किया हुआ; कलि-युगम्‌--कलियुग; इति--इस प्रकार; प्राहु:--कहते हैं; पुरा--भूतकाल के; विद: --जानकार।

जो लोग भूतकाल को अच्छी तरह समझते हैं, वे यह कहते हैं कि जिस दिन भगवान्‌कृष्ण ने वैकुण्ठ-लोक के लिए प्रस्थान किया, उसी दिन से कलियुग का प्रभाव शुरू होगया।

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दिव्याब्दानां सहस्त्रान्ते चतुर्थ तु पुनः कृतम्‌ ।

भविष्यति तदा नृणां मन आत्मप्रकाशकम्‌ ॥

३४॥

दिव्य--देवताओं के; अब्दानाम्‌-वर्ष; सहस्त्र--एक हजार; अन्ते--अन्त में; चतुर्थ--चतुर्थ युग, कलियुग में; तु--तथा;पुनः--फिर; कृतम्‌ू--सत्ययुग; भविष्यति--होगा; तदा--तब; नृणाम्‌--मनुष्यों के; मनः--मन; आत्म-प्रकाशकम्‌--स्वयं प्रकाशित |

कलियुग के एक हजार दैवी वर्षो के बाद, सत्ययुग पुनः प्रकट होगा।

उस समय सारेमनुष्यों के मन स्वयं प्रकाशमान्‌ हो उठेंगे।

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इत्येष मानवो वंशो यथा सड्ख्यायते भुवि ।

तथा विद्शूद्रविप्राणां तास्ता ज्ञेया युगे युगे ॥

३५॥

इति--इस प्रकार ( श्रीमद्भागवत के स्कन्धों में ); एब:--यह; मानव:--वैवस्वत मनु से अवतरित; वंश:--वंश; यथा--जिस तरह; सड्ख्यायते--गिनाया जाता है; भुवि--पृथ्वी पर; तथा--उस प्रकार से; विट्‌ू--वैश्यों; शूद्र--शूढ्रों;विप्राणाम्‌ू--तथा ब्राह्मणों के; ता: ता:--वे वे; ज्ञेया:--जाने जाने चाहिए; युगे युगे--प्रत्येक युग में |

इस प्रकार मैंने मनु के राजवंश का वर्णन, जिस रूप में वह पृथ्वी पर विख्यात है, कहसुनाया।

इसी प्रकार से विविध युगों में रहने वाले वैश्यों, शुद्रों तथा ब्राह्मणों के इतिहास काअध्ययन किया जा सकता है।

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एतेषां नामलिड्ानां पुरुषाणां महात्मनाम्‌ ।

कथामात्रावशिष्टानां कीर्तिरिव स्थिता भुवि ॥

३६॥

एतेषाम्‌--इनके; नाम--नामों; लिड्रानाम्‌--उन्हें स्मरण रखने के साधन मात्र हैं, जो; पुरुषाणाम्‌-पुरुषों के; महा-आत्मनाम्‌ू-महात्माओं के; कथा--कहानियाँ; मात्र--केवल; अवशिष्टानाम्‌ू--जिनके शेषांश; कीर्ति:--यश; एव--केवल; स्थिता--उपस्थित हैं; भुवि--पृथ्वी पर।

ये पुरुष जोकि महात्मा थे अब केवल अपने नामों से जाने जाते हैं।

वे भूतकाल केविवरणों में ही पाये जाते हैं और पृथ्वी पर केवल उनका यश रहता है।

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देवापि: शान्तनोर्भ्राता मरुश्नेक्ष्वाकुवंशज: ।

कलापग्राम आसाते महायोगबलान्वितोौ ॥

३७॥

देवापि: --देवापि; शान्तनो: --महाराज शान्तनु का; भ्राता-- भाई; मरः--मरू; च--तथा; इक्ष्वाकु-वंश-ज:--इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न; कलाप-ग्रामे--कलाप ग्राम में; आसाते--रह रहे हैं; महा--महान्‌; योग-बल--योगशक्ति से; अन्वितौ--युक्त

महाराज शान्तनु का भाई देवापि तथा इश्ष्वाकु वंशी मरु, दोनों ही महान्‌ योगशक्ति सेयुक्त हैं और अब भी कलाप ग्राम में रह रहे हैं।

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ताविहैत्य कलेरन्ते वासुदेवानुशिक्षितौ ।

वर्णाश्रमयुतं धर्म पूर्ववत्प्रथयिष्यत: ॥

३८ ॥

तौ--वे दोनों ( मरु तथा देवापि ); हह--मानव समाज में; एत्य--लौट कर; कले:--कलियुग के; अन्ते--अन्त में;वासुदेव--भगवान्‌ वासुदेव द्वारा; अनुशिक्षितौ-- आदेश दिया जाकर; वर्ण-आश्रम--वर्ण तथा आश्रम से; युतम्‌--युक्त;धर्मम्‌--नित्य धर्म-संहिता; पूर्व-वत्‌--पहले की ही तरह; प्रथयिष्यत: --लागू करेंगे |

कलियुग के अन्त में, ये दोनों ही राजा भगवान्‌ वासुदेव का आदेश पाकर, मानवसमाज में लौट आयेंगे और मनुष्य के शाश्वत धर्म की पुनः स्थापना करेंगे जिसमें वर्ण तथाआश्रम का विभाजन पर्ववत रहेगा।

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कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्वेति चतुर्युगम्‌ ।

अनेन क्रमयोगेन भुवि प्राणिषु वर्तते ॥

३९॥

कृतम्‌--सत्ययुग; त्रेता--त्रेतायुग; द्वापरम्‌-द्वापर युग; च--तथा; कलि:--कलियुग; च--तथा; इति--इस प्रकार;चतुः-युगम्‌--चार युगों का चक्र; अनेन--इससे; क्रम--क्रमवार; योगेन--व्यवस्था; भुवि--पृथ्वी पर; प्राणिषु--जीवोंके बीच; वर्तते--लगातार चल रही है

इस पृथ्वी पर जीवों के बीच चार युगों का--सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग का--चक्र निरन्तर चलता रहता है, जिससे घटनाओं का वही सामान्य अनुक्रम पिष्टपेषित होता है।

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राजन्नेते मया प्रोक्ता नरदेवास्तथापरे ।

भूमौ ममत्वं कृत्वान्ते हित्वेमां निधनं गता: ॥

४०॥

राजनू--हे राजा परीक्षित; एते--ये; मया--मेरे द्वारा; प्रोक्ता:--वर्णित; नर-देवा:--राजा; तथा-- और; अपरे-- अन्यमनुष्य; भूमौ--पृथ्वी पर; ममत्वम्‌--आत्मीयता; कृत्वा--दिखाते हुए; अन्ते--अन्तमें; हित्वा--त्याग कर; इमाम्‌ू--यहजगत; निधनम्‌--विनाश को; गता: --प्राप्त हुए |

हे राजा परीक्षित, मेरे द्वारा वर्णित ये सारे राजे तथा अन्य सारे मनुष्य इस पृथ्वी पर आतेहैं, अपना प्रभुत्व जताते हैं किन्तु अन्त में उन्हें यह जगत त्यागना पड़ता है और वे विनाश कोप्राप्त होते हैं।

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कृमिविड्भस्मसंज्ञान्ते राजनाम्नोडपि यस्य च ।

भूतथुक्तत्कृते स्वार्थ कि वेद निरयो यतः ॥

४१॥

कृमि--कीड़ों का; विटू--मल; भस्म--तथा राख; संज्ञा--उपाधि; अन्ते--अन्त में; राज-नाम्न:--राजा नाम से विख्यात;अपि--यद्यपि; यस्य--जिस ( शरीर ) का; च--तथा; भूत--जीवों का; ध्रुक्‌-शत्रु; तत्‌-कृते--उस शरीर के लिए; स्व-अर्थमू--अपने हित को; किम्‌--क्या; वेद--जानता है; निरय:--नरक में दण्ड; यतः--जिसके कारण |

भले ही अभी मनुष्य का शरीर राजा की उपाधि से युक्त हो, किन्तु अन्त में इसका नामकीड़े, मल या राख हो जायेगा।

जो व्यक्ति अपने शरीर के लिए अन्य जीवों को पीड़ापहुँचाता है, वह अपने हित के विषय में क्या जान सकता है क्योंकि उसके कार्य उसे नरककी ओर ले जाने वाले होते हैं ?"

कथं सेयमखण्डा भू: पूर्व पुरुषैर्धृता ।

मत्पुत्रस्थ च पौत्रस्य मत्पूर्वा वंशजस्य वा ॥

४२॥

कथम्‌-कैसे; सा इयम्‌--यह वही; अखण्डा--असीम; भू:--पृथ्वी; पूर्व: --पूर्वजों द्वारा; मे--मेरे; पुरुष: --पुरुषों द्वारा;धृता--वश में की गई; मत-पुत्रस्थ--मेरे पुत्र के; च--तथा; पौत्रस्य--पौत्र के; मत्‌-पूर्वा--अब मेरे अधीन; वंश-जस्य--वंशजों के; वा--अथवा[ भौतिकतावादी

राजा सोचता हैं 'यह असीम पृथ्वी मेरे पूर्वजों के अधीन थी औरअब मेरी प्रभुसत्ता में है।

मैं इसे अपने पुत्रों, पौत्रों तथा अन्य वंशजों के हाथों में रहते जानेकी किस तरह व्यवस्था करूँ ?'तात्पर्य : यह मूर्खतापूर्ण स्वामित्व का उदाहरण है।

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तेजोबन्नमयं कायं गृहीत्वात्मतयाबुधा: ।

महीं ममतया चोभौ हित्वान्तेडदर्शनं गता: ॥

४३॥

तेज:--अग्नि; अपू--जल; अन्न--तथा पृथ्वी; मयम्‌--से बना; कायम्‌--यह शरीर; गृहीत्वा--स्वीकार करके;आत्मतया--' मैं ' भाव से; अबुधा: --मूर्ख; महीम्‌--इस पृथ्वी को; ममतया--' मेरे ' भाव से; च--तथा; उभौ--दोनों;हित्वा--त्याग कर; अन्ते--अन्तत:; अदर्शनम्‌--अन्तर्धान; गता: --हो गये।

यद्यपि मूर्ख लोग पृथ्वी, जल तथा अग्नि से बने शरीर को 'मैं' और इस पृथ्वी को'मेरी ' स्वीकार करते हैं, किन्तु अन्ततः उन सबों को अपना शरीर तथा पृथ्वी दोनों त्यागनापड़ा और वे विस्मृति के गर्भ में चले गये।

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ये ये भूपतयो राजन्भुझ्जते भुवमोजसा ।

कालेन ते कृताः सर्वे कथामात्रा: कथासु च ॥

४४॥

ये ये--जो भी; भू-पतय:--राजा; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; भुझ्ञते-- भोग करते हैं; भुवम्‌--संसार का; ओजसा--अपनेपराक्रम से; कालेन--काल की शक्ति से; ते--वे; कृता:--बनाये गये; सर्वे--सभी; कथा-मात्रा: --मात्र वृत्तान्त;कथासु--विविध इतिहासों में; च--तथा।

हे राजा परीक्षित, ये सारे राजे जिन्होंने अपने बल से पृथ्वी का भोग करना चाहा, सारेके सारे, काल की शक्ति से ऐतिहासिक वृत्तान्त मात्र बन कर रह गये।

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