← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची

अध्याय तेरह: श्रीमद्भागवत की महिमा

12.13बेंदे: साड्रपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा: ।

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति य॑ं योगिनोयस्यथान्तं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम: ॥

१॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; यम्‌--जिसको; ब्रह्मा--त्रह्मा; वरुण-इन्द्र-रुद्र-मरूत:--तथा वरूण, इन्द्र, रुद्र औरमरूत्गण; स्तुन्वन्ति--स्तुति करते हैं; दिव्यै:--दिव्य; स्तबै:--स्तुतियों द्वारा; वेदैः--वेदों समेत; स--सहित; अड्ग--सहायक शाखाएँ; पद-क्रम--मंत्रों का विशेष अनुक्रम; उपनिषदेः --तथा उपनिषद; गायन्ति--गाते हैं; यम्‌--जिसको;साम-गा:--सामवेद के गायक; ध्यान--ध्यान-समाधि में; अवस्थित--स्थित; तत्‌-गतेन--उन पर स्थिर; मनसा--मन केभीतर; पश्यन्ति--देखते हैं; यम्‌ू--जिसको; योगिन: --योगीजन; यस्य--जिसका; अन्तम्‌--अन्त; न विदुः--नहीं जानते;सुर-असुर-गणा:--सारे देवता तथा असुर; देवाय-- भगवान्‌ को; तस्मै--उसको; नम:--नमस्कार।

सूत गोस्वामी ने कहा: ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र तथा मरूत्गण दिव्य स्तुतियों काउच्चारण करके तथा वेदों को उनके अंगों, पद-क्रमों तथा उपनिषदों समेत बाँच कर जिनकीस्तुति करते हैं, सामवेद के गायक जिनका सदैव गायन करते हैं, सिद्ध योगी अपने कोसमाधि में स्थिर करके और अपने को उनके भीतर लीन करके जिनका दर्शन अपने मन मेंकरते हैं तथा जिनका पार किसी देवता या असुर द्वारा कभी भी नहीं पाया जा सकता--ऐसेभगवान्‌ को मैं सादर नमस्कार करता हूँ।

"

पृष्ठे भ्राम्यदमन्दमन्दरगिरिग्रावाग्रकण्डूयना-ब्विद्रालो: कमठाकृतेर्भगवत:ः श्वासानिला: पान्तु व: ।

यत्संस्कारकलानुवर्तनवशाद्वेलानिभेनाम्भसांयातायातमतन्द्रितं जलनिधेर्नाद्यापि विश्राम्यति ॥

२॥

पृष्ठ--उनकी पीठ पर; भ्राम्यत्‌--चक्कर लगाता; अमन्द--अत्यधिक भारी; मन्दर-गिरि--मन्दराचल के; ग्राव-अग्र--पत्थरों की नोंके; कण्डूयनात्‌ू--खुरचने से; निद्रालो:--उनींदा हो जाता है; कमठ-आकृते:--कछुवे के रूप का;भगवतः--भगवान्‌ का; श्वास--श्वास से निकली; अनिला:--वायुएँ; पान्तु--रक्षा करें; व:--तुम सबों की; यत्‌--जिसका; संस्कार--उच्छिष्ट का; कला--रंचमात्र; अनुवर्तन-वशात्‌--पीछे चलने के फलस्वरूप; वेला-निभेन--जिससेवह प्रवाह के तुल्य है; अम्भसाम्‌--जल का; यात-आयातम्‌--आना-जाना; अतन्द्रितम्‌-- अविरत; जल-निधे:--समुद्रका; न--नहीं; अद्य अपि--आज भी; विश्राम्यति--रुकता है।

जब भगवान्‌ कूर्म ( कछुवे ) के रूप में प्रकट हुए तो उनकी पीठ भारी, घूमने वालेमन्दराचल पर स्थित नुकीले पत्थरों के द्वारा खरोंची गई जिसके कारण भगवान्‌ उनींदे होगये।

इस सुप्तावस्था में भगवान्‌ की श्वास से उत्पन्न वायुओं द्वारा आप सबों की रक्षा हो।

उसीकाल से, आज तक, समुद्री ज्वारभाटा पवित्र रूप में आ-जाकर भगवान्‌ के श्वास-निश्चासका अनुकरण करता आ रहा है।

"

पुराणसड्ख्यासम्भूतिमस्य वाच्यप्रयोजने ।

दानं दानस्य माहात्म्यं पाठादेश्व निबोधत ॥

३॥

पुराण--पुराणों की; सड्ख्या--( श्लोकों की ) गिनती का; सम्भूतिम्‌--योग; अस्य--इस भागवत के; वाच्य--विषयवस्तु; प्रयोजने--तथा उद्देश्य; दानम्‌--भेंटस्वरूप देने की विधि; दानस्य--ऐसी भेंट देने की; माहात्म्यम्‌--महिमा;पाठ-आदे:--पढ़ने आदि का; च--तथा; निबोधत--कृपया सुनें |

अब मुझसे सभी पुराणों की एलोक संख्या सुनिये।

तब इस भागवत पुराण के मूलविषय तथा उद्देश्य, इसे भेंट में देने की सही विधि, ऐसी भेंट देने का माहात्म्य और अन्त मेंइस ग्रंथ के सुनने तथा कीर्तन करने का माहात्म्य सुनिये।

"

ब्राह्मंं दश सहस्त्राणि पाद्ं पदश्ञोनर्षष्टि च ।

श्रीवैष्णवं त्रयोविंशच्चतुर्विशति शैवकम्‌ ॥

४॥

दशाष्टो श्रीभागवतं नारदं पञ्जञविंशति ।

मार्कण्डं नव वाह्नं च दशपञ्ञ चतु:शतम्‌ ॥

५॥

चतुर्दश भविष्य॑ स्यात्तथा पञ्ञश्तानि च ।

दशाष्ट्रौ ब्रह्मवैवर्त लैड्मेकादशैव तु ॥

६॥

चतुर्विशति वाराहमेकाशीतिसहस्त्रकम्‌ ।

स्कान्दं शतं तथा चैकं वामनं दश कीर्तितम्‌ ॥

७॥

कौर्म सप्तदशाख्यातं मात्स्यं तत्तु चतुर्दश ।

एकोनविंशत्सौपर्ण ब्रह्माण्डं द्वादशैव तु ॥

८॥

एवं पुराणसन्दोहश्चतुर्लक्ष उदाहतः ।

तत्राप्टदशसाहस्त्रं श्रीभागवतं इष्यते ॥

९॥

ब्राह्मम्‌ू--ब्रह्म पुराण में; दश--दस; सहस््राणि--हजार; पाद्मम्‌--पद्दा पुराण में; पञ्ञ-ऊन-पषष्टि--साठ में पाँच कम;च--तथा; श्री-वैष्णवम्‌--विष्णु पुराण में; त्रय:-विंशत्‌--तेईस; चतु:-विंशति--चौबीस; शैवकम्‌--शिव पुराण में;दश-अष्टौ--अठारह; श्री-भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत में; नारदम्‌--नारद पुराण में; पञ्ञ-विंशति--पच्चीस; मार्कण्डम्‌--मार्कण्डेय पुराण में; नव--नौ; वाह्ममू-- अग्नि पुराण में; च--तथा; दश-पञ्ञ-चतु:-शतम्‌--पन्द्रह हजार चार सौ; चतुः-दश--चौदह; भविष्यम्‌--भविष्य पुराण में; स्थात्‌--से युक्त; तथा--इसके अतिरिक्त; पञ्ञच-शतानि--पाँच सौ ( शलोक );च--तथा; दश-अष्टौ-- अठारह; ब्रह्म-वैवर्तम्‌--ब्रह्मवैवर्त पुराण में; लैड्रम्‌--लिंग पुराण में; एकादश--ग्यारह; एव--निस्सन्देह; तु--तथा; चतु:-विंशति--चौबीस; वाराहम्‌--वराह पुराण में; एकाशीति-सहस्त्रकम्‌--इक्यासी हजार;स्कान्दम्‌-स्कन्द पुराण में; शतम्‌--सौ; तथा--और; च--तथा; एकम्‌--एक; वामनम्‌--वामन पुराण में; दश--दस;कीर्तितम्‌ू--कहा जाता है; कौर्मम्‌--कूर्म पुराण में; सप्त-दश--सत्रह; आख्यातम्‌--कहा जाता है; मात्स्यमू--मत्स्यपुराण में; तत्‌--वह; तु--तथा; चतु:-दश--चौदह; एक-ऊन-विंशत्‌--उन्नीस; सौपर्णम्‌--गरुड़ पुराण में; ब्रह्माण्डम्‌--ब्रह्माण्ड पुराण में; द्वादश--बारह; एबव--निस्सन्देह; तु--तथा; एवम्‌--इस तरह; पुराण-- पुराणों का; सन्दोह:--योगफल; चतुः-लक्ष:--चार लाख; उदाहत:--बताया जाता है; तत्र--उसमें; अष्ट-दश-साहस््रम्‌ू-- अठारह हजार; श्री-भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत में; इष्यते--कहा जाता है

ब्रह्म पुराण में दस हजार, पद्मा पुराण में पचपन हजार, श्री विष्णु पुराण में तेईंस हजार,शिव पुराण में चौबीस हजार तथा श्रीमद्भागवत में अठारह हजार एलोक हैं।

नारद पुराण मेंपच्चीस हजार हैं, मार्कण्डेय पुराण में नौ हजार, अग्नि पुराण में पन्द्रह हजार चार सौ,भविष्य पुराण में चौदह हजार पाँच सौ, ब्रह्मवैवर्त पुराण में अठारह हजार तथा लिंग पुराणमें ग्यारह हजार श्लोक हैं।

वराह पुराण में चौबीस हजार, स्कन्द पुराण में इक्‍्यासी हजारएक सौ, वामन पुराण में दस हजार, कूर्म पुराण में सत्रह हजार, मत्स्य पुराण में चौदहहजार, गरुड़ पुराण में उन्नीस हजार तथा ब्रह्माण्ड पुराण में बारह हजार एलोक हैं।

इस तरहसमस्त पुराणों की कुल इलोक संख्या चार लाख है।

पुनः, इनमें से अठारह हजार एलोकअकेले श्रीमद्भागवत के हैं।

"

इदं भगवता पूर्व ब्रह्मणे नाभिपड्डजे ।

स्थिताय भवभीताय कारुण्यात्सम्प्रकाशितम्‌ ॥

१०॥

इदम्‌--इसे; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; पूर्वम्‌--पहले; ब्रह्मणे--ब्रह्मा से; नाभि-पड्ढडजे--नाभि से निकले कमल पर;स्थिताय--स्थित; भव--संसार से; भीताय-- भयभीत; कारुण्यात्‌--दया करके ; सम्प्रकाशितम्‌--पूरीतरह प्रकट किया

भगवान्‌ ने सर्वप्रथम ब्रह्म को सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत प्रकाशित की।

उस समय ब्रह्मा,संसार से भयभीत होकर, भगवान्‌ की नाभि से निकले कमल पर आसीन थे।

"

आदिमध्यावसानेषु वैराग्याख्यानसंयुतम्‌ ।

हरिलीलाकथाब्रातामृतानन्दितसत्सुरम्‌ ॥

११॥

सर्ववेदान्तसारं यद्गह्मात्मैकत्वलक्षणम्‌ ।

उस्त्वद्वितीयं तन्निष्ठं कैवल्यैकप्रयोजनम्‌ ॥

१२॥

आदि-प्रारम्भ; मध्य--मध्य; अवसानेषु--तथा अन्त में; बैराग्य--भौतिक वस्तुओं के परित्याग से सम्बन्धित;आख्यान--कथाओं से; संयुतम्‌-पूर्ण; हरि-लीला-- भगवान्‌ हरि की लीलाओं का; कथा-ब्रात--अनेक विवेचनाओंका; अमृत--अमृत से; आनन्दित--आनन्दयुक्त बनाये गये; सत्‌-सुरम्‌--सनन्‍्त भक्तों तथा देवताओं; सर्व-वेदान्त--सारेवेदान्तों का; सारमू--सार; यत्‌--जो; ब्रह्म--परब्रह्म; आत्म-एकत्व--आत्मा से अभिन्नता; लक्षणम्‌--लक्षणों से युक्त;वस्तु--वास्तविकता; अद्वितीयम्‌--अद्वितीय; तत्‌-निष्ठम्‌--मुख्य विषयवस्तु के रूप में; कैवल्य--एकान्तिक भक्ति;एक--एकमात्र; प्रयोजनम्‌--चरम लक्ष्य ।

श्रीमद्भागवत आदि से अन्त तक ऐसी कथाओं से पूर्ण है, जो भौतिक जीवन से बैराग्यकी ओर ले जाने वाली हैं।

इसमें भगवान्‌ हरि की दिव्य लीलाओं का अमृतमय विवरण भीहै, जो सन्त भक्तों तथा देवताओं को आनन्द देने वाला है।

यह भागवत समस्त वेदान्त दर्शनका सार है क्योंकि इसकी विषयवस्तु परब्रह्म है, जो आत्मा से अभिन्न होते हुए भी अद्वितीयपरम सत्य है।

इस ग्रंथ का लक्ष्य परब्रह्य की एकान्तिक भक्ति है।

"

प्रौष्ठपद्मां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम्‌ ।

ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम्‌ ॥

१३॥

प्रौष्ठपद्याम्‌-- भाद्र मास में; पौर्णमास्याम्‌-पूर्णमासी के दिन; हेम-सिंह--सोने के सिंहासन पर; समन्वितम्‌--आसीन;ददाति--भेंट के रूप में देता है; य:ः--जो; भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत को; सः--वह; याति--जाता है; परमाम्‌--परम;गतिम्‌--गन्तव्य को |

यदि कोई व्यक्ति भाद्र मास की पूर्णमासी को सोने के सिंहासन पर रख करश्रीमद्भधागवत का दान उपहार के रूप में देता है, तो उसे परम दिव्य गन्तव्य प्राप्त होगा।

"

राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे ।

यावद्धागवतं नैव श्रूयतेडमृतसागरम्‌ ॥

१४॥

राजन्ते--चमकते हैं; तावत्‌ू--तब तक; अन्यानि--अन्य; पुराणानि-- पुराण; सताम्‌--साधु पुरुषों की; गणे--सभा में;यावत्‌--जब तक; भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत को; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; श्रूयते--सुना जाता है; अमृत-सागरम्‌--अमृत का सागर

अन्य सारे पुराण तब तक सन्त भक्तों की सभा में चमकते हैं जब तक अमृत केमहासागर श्रीमदभागवत को नहीं सना जाता।

"

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते ।

तद्गसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रति: क्वचित्‌ ॥

१५॥

सर्व-वेदान्त--समस्त वेदान्त दर्शन का; सारम्‌--सार; हि--निस्सन्देह; श्री-भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत; इष्यते--कहाजाता है कि; तत्‌ू--इसके; रस-अमृत-- अमृतमय स्वाद से; तृप्तस्य--तृप्त होने वाले के लिए; न--नहीं; अन्यत्र--दूसरीजगह; स्यात्‌-- है; रतिः--आकर्षण; क्वचित्‌--कभी |

श्रीमद्भागवत को समस्त वैदिक दर्शन का सार कहा जाता है।

जिसे इसके अमृतमयरस से तुष्टि हुई है, वह कभी अन्य किसी ग्रंथ के प्रति आकृष्ट नहीं होगा।

"

निम्नगानां यथा गड्ढा देवानामच्युतो यथा ।

वैष्णवानां यथा शम्भु: पुराणानामिदं तथा ॥

१६॥

निम्न-गानाम्‌--समुद्र की ओर बह कर जाने वाली नदियों का; यथा--जिस तरह; गड्जा--गंगा नदी; देवानाम्‌--समस्तदेवों में; अच्युत:--अच्युत भगवान्‌; यथा--जिस तरह; वैष्णवानाम्‌-- भगवान्‌ विष्णु के भक्तों में; यथा--जिस तरह;शम्भु:--शिव; पुराणानाम्‌--पुराणों में; इदम्‌--यह; तथा--उसी प्रकार से

जिस तह गंगा समुद्र की ओर बहने वाली समस्त नदियों में सबसे बड़ी है, भगवान्‌अच्युत देवों में सर्वोच्च हैं और भगवान्‌ शम्भु ( शिव ) वैष्णवों में सबसे बड़े हैं, उसी तरहश्रीमद्भागवत समस्त पुराणों में सर्वोपरि है।

"

क्षेत्राणां चैव सर्वेषां यथा काशी ह्वनुत्तमा ।

तथा पुराणक्रातानां श्रीमद्धागवतं द्विजा: ॥

१७॥

क्षेत्राणामू-पतवित्र स्थलों में; च--तथा; एव--निस्सन्देह; सर्वेषामू--समस्त; यथा--जिस तरह; काशी--बनारस; हि--निस्सन्देह; अनुत्तमा--अद्वितीय; तथा--उसी तरह; पुराण-ब्रातानामू--समस्त पुराणों में; श्रीमत्‌-भागवतम्‌--श्रीमद्भागवत; द्विजा:--हे ब्राह्मणोहे ब्राह्यणो, जिस तरह पवित्र स्थानों में काशी नगरी अद्वितीय है, उसी तरह समस्तपुराणों में श्रीमद्भागवत सर्वश्रेष्ठ है।

"

श्रीमद्भागवर्तं पुराणममल य्दैष्णवानां प्रियंयस्मिन्पारमहंस्यमेकममल ज्ञान परं गीयते ।

तत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविस्कृतंतच्छुण्वन्सुपठन्विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नर: ॥

१८॥

श्रीमत्‌-भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत; पुराणम्‌--पुराण; अमलमू-- पूर्णतया शुद्ध; यत्‌--जो; वैष्णवानाम्‌--वैष्णवों को;प्रियमू--अत्यन्त प्रिय; यस्मिन्‌--जिसमें; पारमहंस्यम्‌--सर्वोच्च भक्तों द्वारा प्राप्प; एकम्‌--एकमात्र; अमलमू्‌--नितान्तशुद्ध; ज्ञाम्‌ू--ज्ञान; परमू--परम; गीयते--गाया जाता है; तत्र--उसमें; ज्ञान-विराग-भक्ति-सहितम्‌--ज्ञान, वैराग्य तथाभक्ति के साथ; नैष्कर्म्यम्‌ू--समस्त भौतिक कर्म से मुक्ति; आविष्कृतम्‌--प्रकाशित किया गया है; तत्‌ू--वह; श्रृण्वन्‌--सुनते हुए; सु-पठन्‌-- भलीभाँति कीर्तन करते हुए; विचारण-पर:--जो समझने का इच्छुक है; भक्त्या-- भक्ति के साथ;विमुच्येत्‌--पूरी तरह छूट जाता है; नर:--मनुष्य |

श्रीमद्भागवत निर्मल पुराण है।

यह वैष्णवों को अत्यन्त प्रिय है क्योंकि यह परमहंसोंके शुद्ध तथा सर्वोच्च ज्ञान का वर्णन करने वाला है।

यह भागवत समस्त भौतिक कर्म सेछूटने के साधन के साथ ही दिव्य ज्ञान, वैराग्य तथा भक्ति की विधियों को प्रकाशित करताहै।

जो कोई भी श्रीमद्भागवत को गम्भीरतापूर्वक समझने का प्रयास करता है, जो समुचितढंग से श्रवण करता है और भक्तिपूर्वक कीर्तन करता है, वह पूर्ण मुक्त हो जाता है।

"

कस्मै येन विभासितोयमतुलो ज्ञानप्रदीप: पुरातद्गूपेण च नारदाय मुनये कृष्णाय तद्भूपिणा ।

योगीन्द्राय तदात्मनाथ भगवद्राताय कारुण्यत-स्तच्छुद्धं विमलं विशोकममृतं सत्यं परं धीमहि ॥

१९॥

कस्मै--ब्रह्म को; येन--जिसके द्वारा; विभासित: --पूरी तरह प्रकट किया गया; अयम्‌--यह; अतुल:--अतुलनीय;ज्ञान-दिव्य ज्ञान का; प्रदीप:--दीपक; पुरा--बहुत काल पहले; तत्‌-रूपेण--ब्रह्मा के रूप में; च--तथा; नारदाय--नारद को; मुनये--महर्षि को; कृष्णाय--कृष्ण द्वैषायन व्यास को; तत्‌-रूपिणा--नारद के रूप में; योगि-इन्द्राय--योगियों में श्रेष्ठ, शुकदेव; तत्‌-आत्मना--नारद के रूप में; अथ--तब; भगवत्‌-राताय--परीक्षित महाराज को;कारुण्यत:--कृपावश; तत्‌--वह; शुद्धम्‌-शुद्ध;।

विमलमू--निष्कलुष; विशोकम्‌--शोक से मुक्त; अमृतम्‌--अमर;सत्यमू--सत्य का; परम्‌--परम; धीमहि--मैं ध्यान करता हूँमैं उन शुद्ध तथा निष्कलुष परब्रह्म का ध्यान करता हूँ जो दुख तथा मृत्यु से रहित हैंऔर जिन्होंने प्रारम्भ में इस ज्ञान के अतुलनीय दीपक को ब्रह्मा से प्रकट किया।

तत्पश्चात्‌ब्रह्म ने इसे नारद मुनि से कहा, जिन्होंने इसे कृष्ण द्वैपायन व्यास से कह सुनाया।

श्रीलव्यास ने इस भागवत को मुनियों में सर्वोपरि, शुकदेव गोस्वामी, को बतलाया जिन्होंने कृपाकरके इसे महाराज परीक्षित से कहा।

"

नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय साक्षिणे ।

य इदम्कृपया कस्मै व्याचचक्षे मुमुक्षवे ॥

२०॥

नमः--नमस्कार; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान्‌; वासुदेवाय--वासुदेव को; साक्षिणे--परम साक्षी; य:--जो; इृदम्‌--इस; कृपया--कृपावश; कस्मै--ब्रह्मा को; व्याचचक्षे--बतलाया; मुमुक्षबे--मुक्ति चाहने वाले को

हम सर्वव्यापक साक्षी भगवान्‌ वासुदेव को नमस्कार करते हैं जिन्होंने कृपा करके ब्रह्माको यह विज्ञान तब बताया जब वे उत्सुकतापूर्वक मोक्ष चाह रहे थे।

"

योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे ।

संसारसर्पदष्टे यो विष्णुरातममूमुचत्‌ ॥

२१॥

योगि-इन्द्राय--योगियों के राजा को; नम:--नमस्कार; तस्मै--उस; शुकय--शुकदेव गोस्वामी को; ब्रह्म-रूपिणे--परब्रह्म के साकार रूप; संसार-सर्प--संसार रूपी सर्प द्वारा; दष्टमू--काटा हुआ; य:--जिसने; विष्णु-रातम्‌--महाराजपरीक्षित को; अमूमुचत्‌--मुक्त कर दिया।

मैं श्री शुकदेव गोस्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ जो श्रेष्ठ योगी-मुनि हैं और परब्रह्मके साकार रूप हैं।

उन्होंने संसार रूपी सर्प द्वारा काटे गये परीक्षित महाराज को बचाया।

"

भवे भवे यथा भक्ति: पादयोस्तव जायते ।

तथा कुरुष्व देवेश नाथस्त्वं नो यतः प्रभो ॥

२२॥

भवे भवे--जन्म-जन्मांतर; यथा--जिससे; भक्ति:--भक्ति; पादयो:--चरणकमलों पर; तव--तुम्हारे; जायते--उत्पन्न हो;तथा--उसी तरह; कुरुष्व--कीजिये; देव-ईश--हे ईशों के ईश; नाथ:--स्वामी; त्वमू--तुम; न:--हमारे; यत: --क्योंकि; प्रभो-हे प्रभु

हे ईशों के ईंश, हे स्वामी, आप हमें जन्म-जन्मांतर तक अपने चरणकमलों की शुद्धभक्ति का वर दें।

"

नामसड्डीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।

प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम्‌ ॥

२३॥

नाम-सड्डीर्तनम्‌--नाम का सामूहिक कीर्तन; यस्य--जिसका; सर्व-पाप--सारे पापों को; प्रणाशनम्‌--नष्ट करने वाले;प्रणाम:--नमस्कार; दुःख--दुख का; शमन:--शमन करने वाले; तम्‌--उसको; नमामि--नमस्कार करता हूँ; हरिम्‌--हरि को; परमू--परम |

मैं उन भगवान्‌ हरि को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके पवित्र नामों का सामूहिककीर्तन सारे पापों को नष्ट करता है और जिनको नमस्कार करने से सारे भौतिक कष्टों से छुटकारा मिल जाता है।

"

TO TOP

← पिछला अध्याय

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची