← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची

अध्याय ग्यारह: महापुरुष का सारांश विवरण

12.11श्रीशौनक उबाचअथेममर्थ पृच्छामो भवन्तं बहुवित्तमम्‌ ।

समस्ततन्‍्त्रराद्धान्ते भवान्भागवत तत्त्ववित्‌ ॥

१॥

श्री-शौनक: उवाच-- श्री शौनक ने कहा; अथ--अब; इमम्‌--यह; अर्थम्‌--विषय; पृच्छाम: --हम पूछ रहे हैं;भवन्तमू--आप से; बहु-वित्‌-तमम्‌--सबसे विस्तृत ज्ञान के स्वामी; समस्त--समस्त; तन्त्र--पूजा की व्यावहारिक विधिबताने वाले शास्त्र; राद्ध-अन्ते-- अन्तिम निर्णय; भवान्‌--आप; भागवत--हे महान्‌ भगवद्भक्त; तत्त्व-वित्‌ू--असलीतथ्यों के ज्ञाता।

श्री शौनक ने कहा : हे सूत, आप सर्वश्रेष्ठ विद्वान तथा भगवद्भक्त हैं।

अतएव अब हमआपसे समस्त तंत्र शास्त्रों के अन्तिम निर्णय के विषय में पूछते हैं।

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तान्त्रिका: परिचर्यायां केवलस्य थथियः पते: ।

अज्झेपाड्रायुधाकल्पं कल्पयन्ति यथा च यै: ॥

२॥

तन्नो वर्णय भद्गं ते क्रियायोगं बुभुत्सताम्‌ ।

येन क्रियानैपुणेन मत्यों यायादमर्त्यताम्‌ ॥

३॥

तान्त्रिका:--तांत्रिक साहित्य की विधि के अनुयायी; परिचर्यायाम्‌--नियमित पूजा में; केवलस्य--शुद्ध आत्मा की;भ्रिय:--लक्ष्मी के; पतेः--पति का; अड्ग--अंग, यथा पाँव; उपाड्ू--गौण अंग यथा गरुड़ जैसे संगी; आयुध--हथियार,यथा सुदर्शन चक्र; आकल्पम्‌--तथा आभूषण यथा कौस्तुभ मणि; कल्पयन्ति--कल्पना करते हैं; यथा--जैसे; च--तथा; यैः--जिससे ( भौतिक वस्तुओं से ); तत्‌ू--वह; न:ः--हमसे; वर्णय--कृपा करके वर्णन करें; भद्रम्‌ू--सर्वमंगल;ते--तुम्हारा; क्रिया-योगम्‌--अनुशीलन की व्यावहारिक विधि; बुभुत्सताम्‌--सीखने के लिए उत्सुक; येन--जिससे;क्रिया--क्रमबद्ध अभ्यास में; नैपुणेन--दक्षता; मर्त्य:--मरणशील प्राणी; यायात्‌--प्राप्त कर सके; अमर्त्यताम्‌--अमरता।

आपका कल्याण हो, कृपा करके हम जिज्ञासुओं को वह लक्ष्मीपति दिव्य भगवान्‌ कीनियमित पूजा द्वारा सम्पन्न की जाने वाली क्रिया योग विधि बतलायें।

कृपा करके यह भीबतलायें कि भक्तगण उनके अंगों, संगियों, आयुधों तथा आभूषणों की किन विशेष भौतिकवस्तुओं से कल्पना करते हैं।

भगवान्‌ की दक्षतापूर्वक पूजा करके मर्त्य प्राणी अमरता प्राप्तकर सकता है।

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सूत उबाचनमस्कृत्य गुरून्वक्ष्ये विभूतीर्वैष्णवीरपि ।

याः प्रोक्ता वेदतन्त्राभ्यामाचार्य: पद्मजादिभि: ॥

४॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; गुरून्‌ू--गुरुओं को; वक्ष्ये--कहूँगा; विभूती: --ऐश्वर्य ;वैष्णवी: -- भगवान्‌ विष्णु सम्बन्धी; अपि--निस्सन्देह; या:--जो; प्रोक्ता:--वर्णित होते हैं; बेद-तन्त्राभ्याम्‌--वेदों तथातंत्रों द्वारा; आचार्य :-- अधिकारियों द्वारा; पद्ठाज-आदिभि:--ब्रह्मा इत्यादि द्वारा |

सूत गोस्वामी ने कहा : मैं अपने गुरुओं को नमस्कार करके कमल से उत्पन्न ब्रह्मा आदिमहान्‌ दिद्वानों द्वारा वेदों तथा तंत्रों में दिये हुए भगवान्‌ के ऐश्वर्यों का वर्णन तुमसे फिर सेकरूँगा।

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मायाद्यै्नवभिस्तत्त्वै: स विकारमयो विराट ।

निर्मितो दृश्यते यत्र सचित्के भुवनत्रयम्‌ ॥

५॥

माया-आझ्यै:--प्रकृति की अव्यक्त अवस्था से शुरू करके; नवभिः --नौ; तत्त्वै:--तत्वों से; सः--वह; विकार-मय:--रूपान्तरों वाला भी ( ग्यारह इन्द्रियाँ तथा पाँच स्थूल तत्त्व ); विराट्‌ू-- भगवान्‌ का विश्व रूप; निर्मित: --निर्मित; दृश्यते--देखा जाता है; यत्र--जिसमें; स-चित्के--सचेतन होने से; भुवन-त्रयमू--तीनों लोक |

भगवान्‌ का विराट रूप अव्यक्त प्रकृति तथा परवर्ती विकारों आदि से युक्त सृष्टि के नौमूलभूत तत्त्वों से बना है।

एक बार चेतना द्वारा इस विराट रूप को अधिष्ठित करने पर इसमेंतीनों लोक दिखाई पड़ने लगते हैं।

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एतद्ठै पौरुषं रूपं भू: पादौ दयौ: शिरो नभः ।

नाभि: सूर्योइक्षिणी नासे वायु: कर्णों दिशः प्रभो: ॥

६॥

प्रजापति: प्रजननमपानो मृत्युरीशितु: ।

तद्बाहवो लोकपाला मनश्चन्द्रो भ्रुवी यम: ॥

७॥

लज्जोत्तरोधरो लोभो दन्ता ज्योत्स्ता स्मयो भ्रम: ।

रोमाणि भूरुहा भूम्नो मेघा: पुरुषमूर्थजा: ॥

८ ॥

एतत्‌--यह; वै--निस्सन्देह; पौरुषम्‌--विराट पुरुष का; रूपमू--रूप; भू:--पृथ्वी; पादौ--उनके पाँव; दौ:--स्वर्ग;शिरः--उनका शिर; नभ:--आकाश; नाभि:--उनकी नाभि; सूर्य:--सूर्य ; अक्षिणी --उनके दो नेत्र; नासे--उनके नथुने;वायु:--वायु; कर्णौं--उनके कान; दिश:--दिशाएँ; प्रभो:--भगवान्‌ के; प्रजा-पति:--प्रजनन का देवता; प्रजननम्‌--उनका प्रजनन अंग; अपान:--उनकी गुदा; मृत्यु:--मृत्यु; ईशितु:--परम नियन्ता का; तत्‌-बाहव:--उनकी अनेक भुजाएँ;लोक-पाला:--विभिन्न लोकों के अधिष्ठाता; मन:--उनका मन; चन्द्र:--चन्द्रमा; भ्रुवा--उनकी भौंहें; यम:--यमराज;लज्ञा--लज्जा; उत्तर: --उनका ऊपरी होठ; अधर:--उनका निचला होठ; लोभ:--लालच; दन्ता:--उनके दाँत;ज्योत्सा--चाँदनी; स्मय:--उनकी मुसकान; भ्रम:-- भ्रम; रोमाणि--उनके रोएँ; भू-रुहा: --वृक्ष; भूम्न:--सर्वशक्तिमानप्रभु के; मेघा:--बादल; पुरुष--विराट पुरुष के; मूर्थ-जा:--सिर के बाल |

यह भगवान्‌ का विराट रूप है, जिसमें पृथ्वी उनके पाँव, आकाश उनकी नाभि, सूर्यउनकी आँखें, वायु उनके नथुने, प्रजापति उनके जननांग, मृत्यु उनकी गुदा तथा चन्द्रमाउनका मन है।

स्वर्गलोक उनका शिर, दिशाएँ उनके कान तथा विभिन्न लोकपाल उनकीअनेक भुजाएँ हैं।

यमराज उनकी भौंहे, लज्जा उनका निचला होठ, लालच उनका ऊपरीहोठ, भ्रम उनकी मुसकान तथा चाँदनी उनके दाँत है, जबकि वृक्ष उन सर्वशक्तिमान पुरुष केशरीर के रोम हैं और बादल उनके शिर के बाल हैं।

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यावानयं वै पुरुषो यावत्या संस्थया मित: ।

तावानसावपि महापुरुषो लोकसंस्थया ॥

९॥

यावान्‌--जिस विस्तार तक; अयम्‌ू--यह; बै--निस्सन्देह; पुरुष:--सामान्य व्यक्ति; यावत्या--जिस आकार तक;संस्थया--उसके अंगों की स्थिति द्वारा; मित:--मापित; तावान्‌--उसी विस्तार तक; असौ--वह; अपि--भी; महा-पुरुष:--दिव्य पुरुष; लोक-संस्थया--लोकों की स्थितियों के अनुसार

जिस तरह इस जगत के सामान्य पुरुष के आकार-प्रकार को उसके विविध अंगों कोमाप कर निश्चित किया जा सकता है, उसी तरह महापुरुष के विराट रूप के अन्तर्गत लोकोंकी व्यवस्था को माप कर महापुरुष का आकार- प्रकार जाना जा सकता है।

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कौस्तुभव्यपदेशेन स्वात्मज्योतिर्थिभर्त्यज: ।

तत्प्रभा व्यापिनी साक्षात्श्रीवत्समुरसा विभु: ॥

१०॥

कौस्तुभ-व्यपदेशेन--कौस्तुभ मणि द्वारा प्रदर्शित; स्व-आत्म--शुद्ध जीवात्मा का; ज्योति:--आध्यात्मिक प्रकाश;बिभर्ति--वहन करता है; अज:--अजन्मा ई श्वर; तत्‌-प्रभा--इस ( कौस्तुभ मणि ) का तेज; व्यापिनी--विस्तृत;साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; श्रीवत्सम्‌-- श्रीवत्स चिह्न का; उरसा--उनके वक्षस्थल पर; विभु:--सर्वशक्तिमान |

सर्वशक्तिमान अजन्मा भगवान्‌ अपने वक्षस्थल पर शुद्ध आत्मा का प्रतिनिधित्व करनेवाला कौस्तुभ मणि और उसी के साथ इस मणि के विस्तृत तेज का प्रत्यक्ष स्वरूप, श्रीवत्सचिह्न, धारण करते हैं।

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स्वमायां वनमालाख्यां नानागुणमर्यीं दधत्‌ ।

वासएछन्दोमयं पीत॑ ब्रह्मसूत्रं त्रिवृत्स्वरम्‌ ॥

११॥

बिभर्ति साइड्ख्यं योगं च देवो मकरकुण्डले ।

मौलिं पदं पारमेष्ठयं सर्वलोकाभयड्डूरम्‌ ॥

१२॥

स्व-मायाम्‌-- अपनी माया; वन-माला-आख्याम्‌--फूल की माला कहलाने वाली; नाना-गुण--प्रकृति के गुणों केविविध मेल; मयीम्‌--से बनी; दधत्‌--पहने हुए; वास:--उनका वस्त्र; छन्दः-मयम्‌--वैदिक छन्दों से युक्त; पीतम्‌--पीला; ब्रह्म-सूत्रमू--उनका जनेऊ; त्रि-वृत्‌--तेहरा; स्वर्मू-- ४कार नामक पवित्र ध्वनि; बिभर्ति--धारण करते हैं;साड्ख्यम्‌--सांख्य विधि; योगम्‌--योग-विधि; च--तथा; देव:--स्वामी; मकर-कुण्डले--मगर की आकृति वाले कानके कुंडल; मौलिम्‌--उनका मुकुट; पदम्‌--पद; पारमेष्ठययम्‌--परम ( ब्रह्मा का ); सर्व-लोक--सारे जगतों को;अभयम्‌--अभय; करम्‌--देने वाले |

उनकी फूल-माला उनकी भौतिक माया है, जो प्रकृति के गुणों के विविध मेलों से युक्तहै।

उनका पीत वस्त्र वैदिक छनन्‍्द हैं और उनका जनेऊ तीन ध्वनियों वाला ३» अक्षर है।

अपने दो मकराकृत कुण्डलों के रूप में भगवान्‌ सांख्य तथा योग की विधियाँ धारण करतेहैं।

उनका मुकुट जो सारे लोकवासियों को अभय प्रदान करता है, ब्रह्मलोक का परम पदहै।

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अव्याकृतमनन्ताख्यमासनं यदधिष्ठित: ।

धर्मज्ञानादिभिर्युक्तं सत्त्वं पद्ममिहोच्यते ॥

१३॥

अव्याकृतमू्‌--सृष्टि की अव्यक्त अवस्था; अनन्त-आख्यम्‌--अनन्त कहलाने वाली; आसनम्‌--उनका आसन; यतू-अधिष्टित:--जिस पर वे बैठे हुए हैं; धर्म-ज्ञान-आदिभि:--धर्म, ज्ञान इत्यादि के साथ; युक्तम्‌--जुड़ा हुआ; सत्त्वम्‌--सतोगुणमें; पद्ममू--उनका कमल; इह--उस पर; उच्यते--कहा जाता है।

भगवान्‌ का आसन, अनन्त, भौतिक प्रकृति की अव्यक्त अवस्था है और भगवान्‌ काकमल सिंहासन, सतोगुण है, जो धर्म तथा ज्ञान से समन्वित है।

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ओज:सहोबलयुतं मुख्यतत्त्वं गदां दधत्‌ ।

अपां तत्त्वं दरवरं तेजस्तत्त्वं सुदर्शनम्‌ ॥

१४॥

नभोनिभं नभस्तत्त्वमसिं चर्म तमोमयम्‌ ।

कालरूपं धनु: शा्ड् तथा कर्ममयेषुधिम्‌ ॥

१५॥

ओज:ः-सहः-बल--इन्द्रियों के, मन के तथा शरीर के बल से; युतम्‌--युक्त; मुख्य-तत्त्वमू--मुख्य तत्त्व वायु जो भौतिकशरीर के भीतर प्राणशक्ति है; गदाम्‌ू--उनकी गदा; दधत्‌-- धारण किये; अपाम्‌--जल का; तत्त्वमू--तत्व; दर--उनकाशंख; वरम्‌--उत्तम; तेज: -तत्त्वम्‌-- अग्नि तत्त्व; सुदर्शनम्‌--सुदर्शन चक्र; नभ:-निभम्‌--आकाश के समान; नभः-तत्त्वमू--आकाश तत्त्व; असिमू--उनकी तलवार; चर्म--ढाल; तम:ः-मयम्‌--तमोगुण से बनी; काल-रूपम्‌--काल केरूप में प्रकट; धनु:--उनका धनुष; शार्ड्मू--शार्ड़् नामक; तथा--तथा; कर्म-मय--सक्रिय इन्द्रिय रूप; इषु-धिम्‌--तरकस।

भगवान्‌ की गदा इन्द्रिय, मन, शरीर सम्बन्धी शक्तियों से युक्त मुख्य तत्त्व प्राण है।

उनका उत्तम शंख जल तत्त्व है।

उनका सुदर्शन चक्र अग्नि तत्त्व है और उनकी तलवारजोकि आकाश के समान निर्मल है, आकाश तत्त्व है।

उनकी ढाल तमोगुण, उनका शाड्रग्गनामक धनुष काल तथा उनका तरकस कर्मेन्द्रियाँ हैं।

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इन्द्रियाणि शरानाहुराकूतीरस्य स्यन्दनम्‌ ।

तन्मात्राण्यस्याभिव्यक्ति मुद्रयार्थक्रियात्मताम्‌ ॥

१६॥

इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; शरान्‌ू--उनके तीर; आहुः--कहते हैं; आकूती:--( मन अपने ) सक्रिय कर्म सहित; अस्य--उनका;स्यन्दनम्‌-रथ; तत्‌-मात्राणि-- अनुभूति की वस्तुएँ; अस्य--उनका; अभिव्यक्तिम्‌--बाह्यम स्वरूप; मुद्रया--हाथ केइशारों द्वारा ( वर देने, अभय देने आदि के लिए ); अर्थ-क्रिया-आत्मताम्‌--सार्थक क्रिया का सार।

उनके बाण इन्द्रियाँ हैं और उनका रथ चंचल वेगवान मन है।

उनका बाह्य स्वरूपतन्मात्राएँ हैं और उनके हाथ के इशारे ( मुद्राएँ ) सार्थक क्रिया के सार हैं।

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मण्डलं देवयजन दीक्षा संस्कार आत्मन: ।

परिचर्या भगवत आत्मनो दुरितक्षय: ॥

१७॥

मण्डलम्‌--सूर्य मंडल; देव-यजनम्‌--वह स्थान जहाँ परमेश्वर की पूजा होती है; दीक्षा--दीक्षा; संस्कार: --संस्कार;आत्मन:--आत्मा के लिए; परिचर्या--भक्ति; भगवत: -- भगवान्‌ की; आत्मन:--जीवात्मा के लिए; दुरित--पापों का;क्षय: --विनाश।

सूर्य मण्डल ही वह स्थान है जहाँ भगवान्‌ पूजे जाते हैं; दीक्षा ही आत्मा की शुद्धि कासाधन है और भगवान्‌ की भक्ति करना ही किसी के पापों को समूल नष्ट करने की विधि है।

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भगवान्भग लीलाकमलमुद्गहन्‌ ॥

धर्म यशश्च भगवांश्वामरव्यजनेभजत्‌ ॥

१८॥

भगवान्‌--भगवान्‌; भग-शब्द-- भग शब्द का; अर्थम्‌--अर्थ ( ऐश्वर्य ); लीला-कमलम्‌--उनका लीला कमल;उद्वहन्‌ू-- धारण करते हुए; धर्मम्‌--धर्म; यशः--यश; च--तथा; भगवानू्‌-- भगवान्‌ ने; चामर-व्यजने--चामर के दोपंखे; अभजत्‌-- स्वीकार किया है

लीलाकमल को जोकि भग शब्द से विभिन्न ऐश्वर्यों का सूचक है सहज रूप में धारणकरते हुए भगवान्‌, धर्म तथा यश रूपी दो चामरों से सेवित हैं।

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आततपकत्र तु वैकुण्ठं द्विजा धामाकुतोभयम्‌ ।

त्रिवृद्वेद: सुपर्णाख्यो यज्ञ वहति पूरूषम्‌ ॥

१९॥

आततपत्रम्‌--उनका छाता; तु--तथा; बैकुण्ठम््‌--वैकुण्ठ; द्विजा:--हे ब्राह्मणो; धाम--उनका निजी धाम; अकुतः-भयम्‌--भय से रहित; त्रि-वृतू--तीन; वेद: --वेद; सुपर्ण-आख्य:--सुपर्ण या गरुड़ नामक; यज्ञम्‌--साक्षात्‌ यज्ञ;वहति--वहन करता है; पूरुषम्‌-- भगवान्‌ को |

हे ब्राह्मणो, भगवान्‌ का छाता उनका धाम वैकुण्ठ है जहाँ कोई भय नहीं है और यज्ञ केस्वामी को ले जाने वाला गरुड़, तीनों वेद हैं।

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अनपायिनी भगवती श्रुई: साक्षादात्मनो हरे: ।

विष्वक्षेनस्तन्त्रमूर्तिविदित: पार्षदाधिप: ।

नन्दादयोष ्टौ द्वा:स्थाश्व तेडणिमाद्या हरेगुणा: ॥

२०॥

अनपायिनी--पृथक्‌ न की जा सकने वाली; भगवती--लक्ष्मी; श्री:-- श्री; साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; आत्मन:--अन्तरंगा प्रकृतिका; हरेः--हरि का; विष्वक्सेन:--विष्वक्सेन; तन्त्र-मूर्तिः--तंत्र शास्त्रों के रूप में; विदितः--ज्ञात है; पार्षद-अधिप: --उनके निजी संगियों का प्रधान; नन्द-आदय: --नन्द इत्यादि; अष्टौ--- आठ; द्वा:-स्था:--द्वारपाल; च--तथा; ते--वे;अणिमा-आद्या:--अणिमा तथा अन्य सिद्धियाँ; हरेः-- भगवान्‌ के; गुणा:--गुण भगवती श्री

जो भगवान्‌ का संग कभी नहीं छोड़तीं, उनके साथ उनकी अन्तरंगा शक्तिके रूप में इस जगत में प्रकट होती हैं।

विष्वक्सेन जोकि भगवान्‌ के निजी संगियों में प्रमुखहैं, पंचरात्र तथा अन्य तंत्रों के रूप में विख्यात हैं।

और नन्‍्द आदि भगवान्‌ के आठ द्वारपाल उनकी अणिमादिक योगसिद्ध्रियाँ हैं।

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वासुदेव: सड्डूर्षण: प्रद्युम्न: पुरुष: स्वयम्‌ ।

अनिरुद्ध इति ब्रहान्मूर्तिव्यूहोइभिधीयते ॥

२१॥

वासुदेव: सड्डूर्षण: प्रद्युम्म:--वासुदेव, संकर्षण तथा प्रद्यम्न; पुरुष: --भगवान्‌; स्वयम्‌-स्वयं; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध;इति--इस प्रकार; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण, शौनक; मूर्ति-व्यूह:--साकार रूपों के अंश; अभिधीयते--कहलाती हैहे ब्राह्मण शौनक, वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध--ये भगवान्‌ के साक्षात्‌आंशों ( चतुर्व्यूह ) के नाम हैं।

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स विश्वस्तैजस:ः प्राज्ञस्तुरीय इति वृत्तिभि: ।

अर्थन्द्रियाशयज्ञानैर्भगवान्परिभाव्यते ॥

२२॥

सः--वह; विश्व: तैजस: प्राज्ञ:--जाग्रत, सुप्त तथा सुषुप्त रूप; तुरीय:--चौथी, दिव्य अवस्था; इति--इस तरह कहे गये;वृत्तिभि: --कार्यो द्वारा; अर्थ--इन्द्रिय-विषय; इन्द्रिय--मन; आशय--आवृत चेतना; ज्ञानै:--तथा आध्यात्मिक ज्ञान केद्वारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; परिभाव्यते--कल्पित किये जाते हैं।

मनुष्य भगवान्‌ की कल्पना जाग्रत, सुप्त तथा सुषुप्त अवस्थाओं में कर सकता है, जोक्रमशः बाह्य वस्तुओं, मन तथा भौतिक बुद्धि के माध्यम से कार्य करती हैं।

एक चौथीअवस्था भी है, जो चेतना का दिव्य स्तर है और शुद्ध ज्ञान के लक्षण वाली है।

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अक्झेपाड्रायुधाकल्पैर्भगवांस्तच्चतुष्टयम्‌ ।

बिभर्ति सम चतुर्मूर्तिभगवान्हरिरी श्वर: ॥

२३॥

अड़--अपने प्रमुख अंगों; उपाड्---गौण अंगों; आयुध--हथियारों; आकल्पै: --तथा आभूषणों से; भगवान्‌-- भगवान्‌;तत्‌ चतुष्टयम्‌--ये चार स्वरूप ( विश्व, तैजस, प्राज्ञ तथा तुरीय ); बिभर्ति--धारण करता है; स्म--निस्सन्देह; चतु:-मूर्ति:--अपने चार साकार रूपों ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध ); भगवान्‌--भगवान्‌; हरि:ः--हरि; ई श्र: --परम नियन्ता।

इस प्रकार भगवान्‌ हरि चार साकार आंशों ( मूर्तियों ) के रूप में प्रकट होते हैं जिनमें सेहर अंश प्रमुख अंग, गौण अंग, आयुध तथा आभूषण से युक्त होता है।

इन स्पष्ट स्वरूपों सेभगवान चार अवस्थाओं को बनाये रखते हैं।

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द्विजऋषभ स एष ब्रह्मययोनि: स्वयंहक्‌स्वमहिमपरिपूर्णो मायया च स्वयैतत्‌ ।

सृजति हरति पातीत्याख्ययानावृताक्षोविवृत इव निरुक्तस्तत्पैरात्मलभ्य: ॥

२४॥

द्विज-ऋषभ-हे ब्राह्मण- श्रेष्ठ; सः एष:--एकमात्र वही; ब्रह्म-योनि: --वेदों के स्त्रोत; स्वयम्‌-हक्‌--आत्म-प्रकाशित;स्व-महिम--अपनी महिमा में; परिपूर्ण: --अच्छी तरह से पूर्ण; मायया--माया द्वारा; च--तथा; स्वया--अपनी; एतत्‌--यह ब्रह्माण्ड; सृजति--रचता है; हरति--हर लेता है; पाति--पालन करता है; इति आख्यया--इस तरह से कल्पित;अनावृत--खुला; अक्ष:--उसकी दिव्य चेतना; विवृत:ः--विभक्त; इब--मानो; निरुक्त: --वर्णित; तत्‌-परै:--उनके द्वाराजो उनके भक्त हैं; आत्म--उनके आत्मा रूप; लभ्य:--प्राप्त होने वाले |

हे ब्राह्मण- श्रेष्ठ, एकमात्र वे ही आत्म-प्रकाशित, वेदों के आदि स्त्रोत, पूर्ण तथा अपनीमहिमा में पूर्ण हैं।

वे अपनी मायाशक्ति से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा संहारकरते हैं।

चूँकि वे विविध भौतिक कार्यों के कर्ता हैं अतएव कभी कभी उन्हें विभक्त कहाजाता है फिर भी वे शुद्ध ज्ञान में स्थित बने रहते हैं।

जो लोग उनकी भक्ति में लगे हुए हैं, वेउन्हें अपनी असली आत्मा के रूप में अनुभव कर सकते हैं।

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श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यूषभावनिश्रु -ग्राजन्यवंशद्हनानपवर्गवीर्य ।

गोविन्द गोपवनिताब्रजभृत्यगीत-तीर्थश्रव: श्रवणमड़ल पाहि भृत्यान्‌ू ॥

२५॥

श्री-कृष्ण--हे श्रीकृष्ण; कृष्ण-सख--हे अर्जुन के मित्र; वृष्णि--वृष्णिवंशी के; ऋषभ--हे प्रमुख; अवनि--पृथ्वी पर;ध्रुकु--विद्रोही; राजन्य-वंश--राजवंशों के; दहन--हे संहारक; अनपवर्ग--बिना हास के; वीर्य--जिसका पराक्रम;गोविन्द--हे गोलोक धाम के स्वामी; गोप--ग्वालों के; वनिता--तथा गोपियाँ; ब्रज--समूह; भृत्य--तथा उनके सेवक;गीत--गाया हुआ; तीर्थ--पवित्र, जिस तरह तीर्थस्थान होते हैं; श्रव:--जसिका यश; श्रवण--जिसके विषय में सुनने केलिए; मड़ल--शुभ; पाहि--कृपया रक्षा करें; भृत्यान्‌ू--अपने सेवकों की |

हे कृष्ण, हे अर्जुन के सखा, हे वृष्णिवंशियों के प्रमुख, आप इस पृथ्वी पर उत्पात मचाने वाले राजनीतिक दलों के संहारक हैं।

आपका पराक्रम कभी घटता नहीं।

आप दिव्यधाम के स्वामी हैं और आपकी पवित्र महिमा जो वृन्दावन के गोपों, गोपियों तथा उनकेसेवकों द्वारा गाई जाती है, सुनने मात्र से सर्वमंगलदायिनी है।

हे प्रभु, आप अपने भक्तों कीरक्षा करें।

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ये ड्दं कल्य उत्थाय महापुरुषलक्षणम्‌ ।

तच्चित्त: प्रयतो जप्त्वा ब्रह्म वेद गुहाशयम्‌ ॥

२६॥

यः--जो कोई; इृदम्‌--इसे; कल्ये--प्रातःकाल; उत्थाय--उठ कर; महा-पुरुष-लक्षणम्‌--विश्व रूप भगवान्‌ के लक्षण;ततू-चित्त:--उनमें लीन मन; प्रयत:--शुद्ध हुआ; जप्त्वा--अपने आप जप करके; ब्रह्म--परब्रह्म; वेद--जान पाता है;गुहा-शयम्‌--हृदय के भीतर स्थित

जो कोई प्रातःकाल जल्दी उठता है और शुद्ध मन को महापुरुष में स्थिर करके, उनकेगुणों का यह वर्णन मन ही मन जपता है, वह उन्हें अपने हृदय के भीतर निवास करने वालेपरब्रह्म के रूप में अनुभव करेगा।

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श्रीशौनक उवाचशुको यदाह भगवान्विष्णुराताय श्रृण्वते ।

सौरो गणो मासि मासि नाना वसति सप्तकः ॥

२७॥

तेषां नामानि कर्माणि नियुक्तानामधीश्चरै: ।

ब्रृहि नः श्रद्दधानानां व्यूहं सूर्यात्मनो हरे: ॥

२८॥

श्री-शौनक: उवाच--श्री शौनक ने कहा; शुक:--शुकदेव गोस्वामी ने; यत्‌ू--जो; आह--वर्णन किया; भगवान्‌ --महामुनि; विष्णु-राताय--राजा परीक्षित से; श्रृण्वते--सुन रहे; सौर: --सूर्य देव के; गण: --संगी; मासि मासि--प्रत्येकमास में; नाना--विविध; वसति--निवास करता है; सप्तक:--सात का समूह; तेषाम्‌--उनमें से; नामानि--नाम;कर्माणि--कर्म; नियुक्तानाम्‌--लगे हुए; अधी श्ररै:-- अपने नियन्ता सूर्य देव के विविध स्वरूपों से; ब्रूहि--कृपा करकेकहें; न:--हमसे; श्रद्धधानानाम्‌--श्रद्धालुओं के; व्यूहम्‌-स्वांशों; सूर्य-आत्मन: --सूर्य देव के रूप में उनके निजी अंशमें; हरेः-- भगवान्‌ हरि का

श्री शौनक ने कहा : कृपया आपके बचचनों में अत्यन्त श्रद्धा रखने वाले हमसे उन सातसाकार रूपों तथा संगियों के विभिन्न समूहों का वर्णन उनके नामों तथा कार्यों समेत करेंजिन्हें सूर्य देव प्रति मास प्रदर्शित करते हैं।

सूर्य देव के संगी, जो अपने स्वामी की सेवाकरते हैं, सूर्य देव के अधिष्ठाता देवता के रूप में भगवान्‌ हरि के स्वांश हैं।

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सूत उबाचअनाद्यविद्यया विष्णोरात्मन: सर्वदेहिनाम्‌ ।

निर्मितो लोकतन्त्रोयं लोकेषु परिवर्तते ॥

२९॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; अनादि--जिसका आदि न हो; अविद्यया--माया द्वारा; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णुकी; आत्मन:--परमात्मा रूप; सर्व-देहिनाम्‌--सारे देहधारी जीवों का; निर्मित:--उत्पन्न किया; लोक-तन्त्र:--लोकों केनियामक; अयम्‌--इस; लोकेषु--लोकों के बीच; परिवर्तते-- भ्रमण करता है

सूत गोस्वामी ने कहा : सूर्य समस्त ग्रहों के बीच भ्रमण करता है और उनकी गतियों कोनियमित करता है।

इसे समस्त देहधारियों के परमात्मा, भगवान्‌ विष्णु, ने अपनी अनादिभौतिक शक्ति के द्वारा उत्पन्न किया है।

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एक एव हि लोकानां सूर्य आत्मादिकृद्धरिः ।

सर्ववेदक्रियामूलमृषिभिर्बहुधोदितः ॥

३०॥

एक:--एक; एव--एकमात्र; हि--निस्सन्देह; लोकानामू--सारे जगतों के; सूर्य: --सूर्य; आत्मा--आत्मा; आदि-कृत्‌--आदि स्रष्टा; हरिः-- भगवान्‌ हरि; सर्व-वेद--सररे वेदों में; क्रिया--कर्मकाण्ड का; मूलम्‌--आधार; ऋषिभि: --ऋषियोंद्वारा; बहुधा--विविध प्रकार से; उदित:--नाम दिये

भगवान्‌ हरि से अभिन्न होने के कारण सूर्य देव सारे जगतों तथा उनके आदि स्त्रष्टा कीअकेली आत्मा हैं।

वे वेदों द्वारा बताये गये समस्त कर्मकाण्ड के उदगम हैं और वैदिकऋषियों ने उन्हें तरह-तरह के नाम दिये हैं।

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कालो देशः क्रिया कर्ता करणं कार्यमागमः ।

द्रव्यं फलमिति ब्रह्मन्नवधोक्तोजया हरि: ॥

३१॥

काल:--काल; देश:--स्थान; क्रिया--उद्योग; कर्ता--करने वाला; करणम्‌--उपकरण; कार्यम्‌--अनुष्ठान; आगम: --शास्त्र; द्रव्यमू--साज-सामग्री; फलम्‌ू--फल; इति--इस प्रकार; ब्रह्मनू--हे बत्राह्यण शौनक; नवधा--नौ प्रकार की;उक्त:--वर्णित; अजया--माया के रूप में; हरिः-- भगवान्‌ हरि।

हे शौनक, माया का स्त्रोत होने से भगवान्‌ हरि के अंश रूप सूर्य देव को नौ प्रकारसे--काल, देश, क्रिया, कर्ता, उपकरण, अनुष्ठान, शास्त्र, पूजा की साज-सामग्री तथाप्राप्तत्य फल के अनुसार--वर्णित किया गया है।

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मध्वादिषु द्वादशसु भगवान्कालरूपध्ृ॒क्‌ ।

लोकतन्त्राय चरति पृथग्द्वादशभिर्गणै: ॥

३२॥

मधु-आदिषु--मधु इत्यादि; द्वादशसु--बारहों ( महीनों ) में; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; काल-रूप--काल के रूप में; धृक्‌--धारण करके; लोक-तन्त्राय--ग्रहों की गति को नियमित करने के लिए; चरति--यात्रा करता है; पृथक्‌--अलग से;द्वादशभि:--बारह; गणै: --संगियों समेत ॥

भगवान्‌ अपनी कालशक्ति को सूर्य देव के रूप में प्रकट करके मधु इत्यादि बारहोंमहीनों में ब्रह्माण्ड के भीतर ग्रह की गति को नियमित करने हेतु इधर-उधर यात्रा करते हैं।

बारहों महीनों सूर्य देव के साथ यात्रा करने वाला छह संगियों का पृथक्‌-पृथक्‌ समूह है।

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धाता कृतस्थली हेतिवासुकी रथकृन्मुने ।

पुलस्त्यस्तुम्बुरुरिति मधुमासं नयन्त्यमी ॥

३३॥

धाता कृतस्थली हेति:-- धाता, कृतस्थली तथा हेति; वासुकि: रथकृत्‌--वासुकि तथा रथकृत; मुने--हे मुनि; पुलस्त्य:तुम्बुरु:--पुलस्त्य तथा तुम्बुरु; इति--इस प्रकार; मधु-मासम्‌--मधु मास ( चेत्र ); नयन्ति--आगे ले जाते हैं; अमी--ये

हे मुनि, मधु मास को, धाता सूर्य देव के रूप में, कृतस्थली अप्सरा रूप में, हेति राक्षसरूप में, वासुकि नाग के रूप में, रथकृत यक्ष रूप में, पुलस्त्य मुनि रूप में तथा तुम्बुरूगन्धर्व के रूप में, नियंत्रित करते हैं।

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अर्यमा पुलहोथौजा: प्रहेति: पुझ्लिकस्थली ।

नारद: कच्छनीरश्व नयन्त्येते सम माधवम्‌ ॥

३४॥

अर्यमा पुलह: अथौजा: --अर्यमा, पुलह तथा अथौजा; प्रहेति: पुद्लिकस्थली--प्रहेति तथा पुल्लिकस्थली; नारदःकच्छनीर:--नारद तथा कच्छनीर; च-- भी; नयन्ति--शासन करते हैं; एते--ये; स्म--निस्सन्देह; माधवम्‌--माधव( वैशाख ) मास में |

माधव मास पर, अर्यमा सूर्य, पुलह मुनि, अथौजा यश्ष, प्रहेति राक्षस, पुझ्चिकस्थलीअप्सरा, नारद गंधर्व तथा कच्छनीर नाग के रूप में, शासन करते हैं।

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मित्रोत्रि: पौरुषेयोथ तक्षको मेनका हहाः ।

रथस्वन इति होते शुक्रमासं नयन्त्यमी ॥

३५॥

मित्र: अत्रि: पौरुषेय: --मित्र, अत्रि तथा पौरुषेय; अथ-- भी; तक्षक: मेनका हहा:--तक्षक, मेनका तथा हाहा;रथस्वन:--रथस्वन; इति--इस प्रकार; हि--निस्सन्देह; एते--ये; शुक्र-मासम्‌--शुक्र ( ज्येष्ठ ) मास; नयन्ति--शासनचलाते हैं; अमी--ये।

शुक्र मास पर, मित्र सूर्य देव, अत्रि मुनि, पौरुषेय राक्षस, तक्षक नाग, मेनका अप्सरा,हहा गन्धर्व तथा रथस्वन यक्ष के रूप में, शासन चलाते हैं।

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वसिष्ठो वरुणो रम्भा सहजन्यस्तथा हुहू: ।

शुक्रश्नित्रस्वनश्चेव शुचिमासं नयन्त्यमी ॥

३६॥

वसिष्ठ: वरुण: रम्भा--वशिष्ठ, वरुण तथा रम्भा; सहजन्य:--सहजन्य; तथा-- भी; हुहः-- हूहू; शुक्र: चित्रस्वन: --शुक्रतथा चित्रस्वन; च एव-- भी; शुचि-मासम्‌--शुचि ( आषाढ़ ) मास; नयन्ति--शासन चलाते हैं; अमी--ये शुच्ि मास पर

वसिष्ठ ऋषि, वरुण सूर्य देव, रम्भा अप्सरा, सहजन्य राक्षस, हूहू गन्धर्व,शुक्र नाग तथा चित्रस्वन यक्ष रूप में, शासन करते हैं।

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इन्द्रो विश्वावसु: श्रोता एलापत्रस्तथाड्रिरा: ।

प्रम्लोचा राक्षसो वर्यो नभोमासं नयन्त्यमी ॥

३७॥

इन्द्र: विश्वावसु: श्रोता:--इनद्र, विश्वावसु तथा श्रोता; एलापत्र:--एलापत्र; तथा--और; अड्डिरा:--अंगिरा; प्रम्लोचा--प्रम्लोचा; राक्षस: वर्य:--वर्य नामक राक्षस; नभ:ः-मासम्‌ू--नभस ( श्रावण ) मास; नयन्ति--शासन करते हैं; अमी--ये नभस ( श्रावण ) मास पर

इन्द्र सूर्य देव, विश्वासु गन्धर्व, श्रोता यक्ष, एलापत्र नाग,अंगिरा मुनि, प्रम्लोचा अप्सरा तथा वर्य राक्षस के रूप में, शासन करते हैं।

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विवस्वानुग्रसेनश्च व्याप्र आसारणो भृगु: ।

अनुम्लोचा शट्डुपालो नभस्याख्यं नयन्त्यमी ॥

३८॥

विवस्वान्‌ उग्रसेन:--विवस्वान तथा उग्रसेन; च--भी; व्याप्र: आसारण: भृगुः--व्याप्र, आसारण तथा भृगु; अनुम्लोचाशद्भुपाल:--अनुम्लोचा तथा शंखपाल; नभस्य-आख्यम्‌--नभस्य ( भाद्र ) नामक मास; नयन्ति--शासन करते हैं;अमी--येनभस्य मास में

विवस्वान सूर्य देव, उग्रसेन गंधर्व, व्याप्र राक्षम, आसारण यक्ष, भृगुमुनि, अनुम्लोचा अप्सरा तथा शंखपाल नाग के रूप में शासन चलाते हैं।

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पूषा धनज्जयो वातः सुषेण: सुरुचिस्तथा ।

घृताची गौतमश्लेति तपोमासं नयन्त्यमी ॥

३९॥

पूषा धनझ्जय: वात:--पूषा, धनञ्जय तथा वात; सुषेण: सुरुचि: --सुषेण तथा सुरुचि; तथा-- भी; घृताची गौतम: --घृताची तथा गौतम; च--भी; इति--इस प्रकार; तप:-मासम्‌--तपस्‌ मास ( माघ ); नयन्ति--शासन चलाते हैं; अमी--येतपस्‌ मास पर

पूषा सूर्य देव, धत्लय नाग, वात राक्षस, सुषेण गन्धर्व, सुरुचि यक्ष,घृताची अप्सरा तथा गौतम मुनि के रूप में शासन करते हैं।

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ऋतुर्वर्चा भरद्वाज: पर्जन्य: सेनजित्तथा ।

विश्व ऐरावतञश्नेव तपस्याख्यं नयन्त्यमी ॥

४०॥

ऋतु: वर्चा भरद्वाज:--ऋतु, वर्चा तथा भरद्वाज; पर्जन्य: सेनजित्‌--पर्जन्य तथा सेनजित; तथा-- भी; विश्व: ऐरावत:--विश्व तथा ऐरावत; च एब-- भी; तपस्य-आख्यम्‌--तपस्य नामक मास ( फाल्गुन ); नयन्ति--शासन करते हैं; अमी--ये।

तपस्य नामक मास पर, ऋतु यक्ष, वर्चा राक्षस, भरद्वाज मुनि, पर्जन्य सूर्य देव, सेनजितअप्सरा, विश्व गन्धर्व तथा ऐरावत नाग के रूप में शासन चलाते हैं।

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अथांशुः कश्यपस्ताह््य ऋतसेनस्तथोर्वशी ।

विद्युक्तत्रु्महाशड्डुः सहोमासं नयन्त्यमी ॥

४१॥

अथ--तब; अंशु: कश्यप: तार्ष्य:--अंशु, कश्यप तथा तार्श्य; ऋतसेन: --ऋतसेन; तथा-- और; उर्वशी --उर्वशी;विद्युच्छत्रु: महाशद्ड: --विद्युच्छत्रु तथा महाशंख; सह:-मासम्‌--सहस मास ( मार्गशीर्ष ); नयन्ति--शासन करते हैं;अमी-येसहस्‌ मास पर

अंशु सूर्य देव, कश्यप मुनि, तार्श््य यक्ष, ऋतसेन गन्धर्व, उर्वशी अप्सरा,विद्युच्छत्रु राक्षम तथा महाशंख नाग के रूप में शासन चलाते हैं।

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भगः स्फूर्जोरिष्ठनेमिरूर्ण आयुश्च पञ्ञम: ।

कर्कोटकः पूर्वचित्ति: पुष्यमासं नयन्त्यमी ॥

४२॥

भगः स्फूर्ज: अरिष्टनेमि:-- भग, स्फूर्ज तथा अरिष्टनेमि; ऊर्ण:--ऊर्ण; आयु:--आयुर्‌; च--तथा; पञ्ञम: --पाँचवा संगी;कर्कोटकः पूर्वचित्ति:--कर्कोटक तथा पूर्वचित्ति; पुष्य-माअसम्‌--पुष्य मास; नयन्ति--शासन करते हैं; अमी--ये |

पुष्य मास पर, भग सूर्य, स्फूर्ज राक्षस, अरिष्टनेमि गन्धर्व, ऊर्ण यक्ष, आयुर्‌ मुनि,करकॉटक नाग तथा पूर्वचित्ति अप्सरा के रूप में, शासन चलाते हैं।

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त्वष्टा ऋचीकतनय: कम्बलश्न तिलोत्तमा ।

ब्रह्मापेतोथ शतजिद्‌ धृतराष्ट्र इषम्भरा: ॥

४३॥

त्वष्टा--त्वष्टा; ऋ्चचीक-तनय:--ऋचीक का पुत्र ( जमदग्नि ); कम्बल: --कम्बल; च--तथा; तिलोत्तमा--तिलोत्तमा;ब्रह्मापेत:--ब्रह्मापेत; अथ--और ; शतजित्‌--शतजित; धृतराष्ट्र: --धूतराष्ट्र; इषम्‌-भरा: --इष मास ( अश्विन ) के पोषक

इष मास कात्वष्टा सूर्य देव, ऋचीक-पुत्र जमदग्नि मुनि, कम्बलाश्व नाग, तिलोत्तमाअप्सरा, ब्रह्मापेत राक्षस, शतजित यक्ष तथा धृतराष्ट्र गन्धर्व के रूप में, पालन-पोषण करतेहैं।

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विष्णुरश्वतरो रम्भा सूर्यवर्चा श्र सत्यजित्‌ ।

विश्वामित्रो मखापेत ऊर्जमासं नयन्त्यमी ॥

४४॥

विष्णु: अश्वतर: रम्भा--विष्णु, अश्वतर तथा रम्भा; सूर्यवर्चा:--सूर्यवर्चा; च--तथा; सत्यजित्‌--सत्यजित; विश्वामीत्र:मखापेत:--विश्वामित्र तथा मखापेत; ऊर्ज-मासम्‌--ऊर्ज मास ( कार्तिक ); नयन्ति--शासन करते हैं; अमी--ये ऊर्ज मास पर

विष्णु सूर्य देव, अश्वतर नाग, रम्भा अप्सरा, सूर्यवर्चा गन्धर्व, सत्यजित्‌यक्ष, विश्वामित्र मुनि तथा मखापेत राक्षस के रूप में, शासन करते हैं।

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एता भगवतो विष्णोरादित्यस्य विभूतय: ।

स्मरतां सन्ध्ययोर्नुणां हरन्त्यंहों दिने दिने ॥

४५॥

एता:--ये; भगवत:--भगवान्‌ विष्णो:--विष्णु के; आदित्यस्य--सूर्य देव के; विभूतय:--ऐश्वर्य; स्मरताम्‌--स्मरणरखने वालों को; सन्ध्ययो: --दिन की सन्धियों के समय; नृणाम्‌--ऐसे मनुष्यों के; हरन्ति--हर लेते हैं; अंह:--पाप; दिनेदिने--दिन-प्रतिदिन

ये सारे पुरुष सूर्य देव के रूप में भगवान्‌ विष्णु के ऐश्वर्यशाली अंश हैं।

ये देव उनलोगों के सारे पापों को दूर कर देते हैं, जो प्रत्येक सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय उनकास्मरण करते हैं।

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द्वादशस्वपि मासेषु देवोडइसौ षड्धिभरस्य वै ।

चरन्समन्तात्तनुते परत्रेह चर सन्‍्मतिम्‌ ॥

४६॥

द्वादशसु--बारहों; अपि--निस्सन्देह; मासेषु--महीनों में; देव: --स्वामी; असौ--इस; षड्धिभ: --छ: प्रकार के संगियोंसमेत; अस्य--इस ब्रह्माण्ड के लोगों के लिए; बै--निश्चय ही; चरन्‌--विचरण करते हुए; समन्तात्‌--सभी दिशाओं में;तनुते--विस्तार करता है; परत्र--अगले जीवन में; इह--इस जीवन में; च--तथा; सत्‌-मतिम्‌-शुद्ध चेतना

इस प्रकार बारहों महीने सूर्य देव अपने छः प्रकार के संगियों के साथ सभी दिशाओं मेंविचरण करते हुए इस ब्रह्माण्ड के निवासियों में इस जीवन तथा अगले जीवन के लिए शुद्धचेतना का विस्तार करता रहता है।

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सामर्ग्यजुर्भिस्तल्लिड्रैरृषय: संस्तुवन्त्यमुम्‌ ।

गन्धर्वास्तं प्रगायन्ति नृत्यन्त्यप्सरसोग्रत: ॥

४७॥

उन्नह्ान्ति रथं नागा ग्रामण्यो रथयोजका: ।

चोदयन्ति रथं पृष्ठे नेरता बलशालिनः ॥

४८ ॥

साम-ऋक्-यजुर्भि: --साम, ऋग्‌ तथा यजुर्वेदों के स्तोत्रों द्वारा; तत्‌-लिड्रैः--जो सूर्य को प्रकट करते हैं; ऋषय: --ऋषिगण; संस्तुवन्ति--स्तुति करते हैं; अमुम्‌--उसकी; गन्धर्वा:--गन्धर्वगण; तम्‌--उसके बारे में; प्रगायन्ति--जोर-जोरसे गाते हैं; नृत्यन्ति--नाचती हैं; अप्सरस:--अप्सराएँ; अग्रतः--आगे; उन्नह्मन्ति--कसते हैं; रथम्‌--रथ को; नागा: --नागजन; ग्रामण्य: --यक्षगण; रथ-योजका:--रथ में घोड़े जोतने वाले; चोदयन्ति--हाँकते हैं; रथम्‌--रथ; पृष्ठे--पीछे से;नैर्ता:--राक्षसगण; बल-शालिन:--बलवान्‌

एक ओर जहाँ ऋषिगण सूर्यदेव की पहचान को प्रकट करने वाले साम, ऋग्‌ तथायजुर्वेदों के स्तोत्रों द्वारा सूर्य देव की स्तुति करते हैं, वहीं गन्धर्वगण भी उनकी प्रशंसा करतेहैं तथा अप्सराएँ उनके रथ के आगे-आगे नाचती हैं; नागगण रथ की रस्सियों को कसते हैंऔर यक्षगण रथ में घोड़ों को जोतते हैं जबकि प्रबल राक्षसगण रथ को पीछे से धकेलते हैं।

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वालखिल्या: सहस्त्राणि षष्टिब्रह्मर्षघोमला: ।

पुरतोभिमुखं यान्ति स्तुवन्ति स्तुतिभिर्विभुम्‌ ॥

४९॥

वालखिल्या:--वालखिल्य; सहस्त्राणि--हजार; षष्टि: --साठ; ब्रह्म-ऋषय: --ब्रह्मर्षि; अमला: --शुद्ध; पुरत:--आगे-आगे; अभिमुखम्‌--रथ की ओर मुँह किये; यान्ति--जोतते हैं; स्तुवन्ति--स्तुति करते हैं; स्तुतिभि:--वैदिक स्तुतियोंद्वारा; विभुमू--सर्वशक्तिमान प्रभु की |

रथ की ओर मुँह किये साठ हजार वालखिल्य नामक ब्रह्मर्षि आगे-आगे चलते हैं औरवैदिक मंत्रों द्वारा सर्वशक्तिमान सूर्य देव की स्तुति करते हैं।

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एवं हानादिनिधनो भगवान्हरिरी श्वरः ।

कल्पे कल्पे स्वमात्मानं व्यूह् लोकानवत्यज: ॥

५०॥

एवम्‌--इस तरह; हि--निस्सन्देह; अनादि--प्रारम्भ से; निधन: --अथवा अन्त; भगवान्‌ -- भगवान्‌; हरि: --हरि; ईश्वर: --परम नियन्ता; कल्पे कल्पे--प्रत्येक ब्रह्मा के दिन में; स्वम्‌ आत्मानम्‌-- अपना; व्यूह्य--वभिन्नि रूपों में विस्तार करके;लोकानू--लोकों की; अवति--रक्षा करते हैं; अज:--अजन्मा प्रभु ॥

इस तरह अजन्मा, अनादि तथा अनन्त भगवान्‌ सारे लोकों की रक्षा हेतु, ब्रह्मा केप्रत्येक दिन में अपना विस्तार इन अपने विशेष निजी स्वरूपों में करते हैं।

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