← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची
अध्याय दस: भगवान शिव और उमा मार्कण्डेय ऋषि की महिमा करते हैं
12.10वैभव योगमायायास्तमेव शरणं ययौ ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामीने कहा; सः--वह, मार्कण्डेय; एवम्--इस तरह; अनुभूय--अनुभव करके; इृदम्--यह;नारायण-विनिर्मितम्-- भगवान् नारायण द्वारा निर्मित; वैभवम्--ऐश्वर्यमय प्रदर्शन; योग-मायाया: -- अपनी अन्तरंगायोगशक्ति का; तम्ू--उसकी; एव--निस्सन्देह; शरणम्--शरण में; ययौ--चला गया।
सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् नारायण ने अपनी मोहमयी शक्ति का यह ऐसश्वर्यशालीप्रदर्शन नियोजित किया था।
इसका अनुभव करके मार्कण्डेय ऋषि ने भगवान् की शरणग्रहण की।
"
श्रीमार्कण्डेय उवाचप्रपन्नोउस्म्यड्प्रिमूलं ते प्रपन्नाभयदं हरे ।
यन्माययापि विबुधा मुहान्ति ज्ञानककाशया ॥
२॥
श्री-मार्कण्डेय: उबाच-- श्री मार्कण्डेय ने कहा; प्रपन्न:--शरणागत; अस्मि--मैं हूँ; अड्धप्रि-मूलम्--चरणकमलों केतलवों; ते--तुम्हारा; प्रपन्न--शरण लेने वालों का; अभय-दम्--अभय दान देने वाला; हरे--हे हरि; यत्-मायया--जिसकी माया से; अपि--भी; विबुधा:--बुद्द्धिमान देवता; मुहान्ति--मोहित हो जाते हैं; ज्ञान-काशया--जो झूठे ही ज्ञानजैसा प्रतीत होती है।
श्री मार्कण्डेय ने कहा : हे भगवान् हरि, मैं आपके उन चरणकमलों के तलवों कीशरण ग्रहण करता हूँ जो उनकी शरण ग्रहण करने वालों को अभय दान देते हैं।
बड़े-बड़ेदेवता भी आपकी माया से जो ज्ञान के वेश में उनके समक्ष प्रकट होती है, मोहित रहते हैं।
"
सूत उबाचतमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन् ।
रुद्राण्या भगवानुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः ॥
३॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; तम्ू--उसको, मार्कण्डेय ऋषि को; एवम्--इस प्रकार; निभृत-आत्मानम्--समाधिमें पूर्णतया निमग्न मन वाला; वृषेण-- अपने बैल पर; दिवि--आकाश में; पर्यटन्--यात्रा करते हुए; रुद्राण्या--अपनीप्रिया रुद्राणी ( उमा ) के साथ; भगवान्--शक्तिशाली प्रभु; रुद्र:--शिव ने; दरदर्श--देखा; स्व-गणै: -- अपने संगियों से;बृतः-घिरे हुए
सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् रुद्र ने अपने बैल पर सवार अपनी प्रिया रुद्राणी तथाअपने निजी संगियों के साथ, मार्कण्डेय को समाधि में देखा।
"
अथोमा तमृषिं वीक्ष्य गिरिशं समभाषत ।
पश्येम॑ भगवन्विप्रं निभृतात्मेन्द्रयाशयम् ॥
४॥
अथ--तब; उमा--उमा; तमू--उस; ऋषिम्--ऋषि को; वीक्ष्य--देख कर; गिरिशम्--शिव से; समभाषत--बोलीं;पश्य--देखो न; इमम्ू--इस; भगवन्ू--मेरे प्रभु; विप्रमू--विद्वान ब्राह्मण को; निभृत--स्थिर; आत्म-इन्द्रिय-आशयम्--शरीर, इन्द्रियाँ तथा मन ।
ऋषि को देख कर देवी उमा ने भगवान् गिरिश से कहा, 'हे प्रभु, जरा इस विद्वानब्राह्मण को, उसके शरीर, मन तथा इन्द्रियों को समाधि में अचल हुए, देखो।
"
'निभूतोदझषत्रातो बातापाये यथार्णव: ।
कुर्वस्य तपस: साक्षात्संसिद््रि सिद्धिदों भवान् ॥
५॥
निभूत-- अचल; उद--जल; झष-ब्रात:--तथा मछलियों का झुंड; वात--वायु के; अपाये--बन्द होने पर; यथा--जिसतरह; अर्णव: --समुद्र; कुरुू--कीजिये; अस्य--इसकी; तपस: --तपस्या का; साक्षात्--प्रकट; संसिद्धिम्--सिदर्द्धि;सिद्धि-दः --सिद्धि-दाता; भवान्ू--आप |
वह उस समुद्र के जल की तरह शान्त है जब वायु बन्द हो जाती है और मछलियाँ शान्तहो जाती हैं।
इसलिए हे प्रभु, चूँकि आप तपस्या करने वाले को सिद्धि प्रदान करते हैं,इसलिए इस ऋषि को सिद्ध्रि प्रदान करें जोकि उसे मिलनी चाहिए।
"
श्रीभगवानुवाचनैवेच्छत्याशिष: क्वापि ब्रह्मर्षिमेक्षमप्युत ।
भक्ति परां भगवति लब्धवान्युरुषेउव्यये ॥
६॥
श्री-भगवान् उवाच--शक्तिमान प्रभु ने कहा; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; इच्छति--इच्छा करती है; आशिष: --वर; क्वअपि--किसी भी देश में; ब्रह्मय-ऋषि: --सन्त ब्राह्मण; मोक्षम्--मोक्ष; अपि उत--ही; भक्तिमू--भक्ति; परामू--दिव्य;भगवति--भगवान् के लिए; लब्धवानू--प्राप्त किया है; पुरुष-- भगवान् के लिए; अव्यये--अव्यय |
शिवजी ने उत्तर दिया : निश्चय ही, यह सन्त ब्राह्मण किसी वर की यहाँ तक कि मोक्षतक की भी कामना नहीं करता क्योंकि इसने भगवान् अव्यय की शुद्ध भक्ति प्राप्त कर लीहै।
"
अथापि संवदिष्यामो भवान्येतेन साधुना ।
अयं हि परमो लाभो नृणां साधुसमागम: ॥
७॥
अथ अपि--तो भी; संवदिष्याम:--हम बात करेंगे; भवानि--हे भवानी; एतेन--इस; साधुना--शुद्ध भक्त से; अयम्ू--यह; हि--निस्सन्देह; परम:--सर्वोत्तम; लाभ:--लाभ; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; साधु-समागम:--सन््त भक्तों कीसंगति।
तो भी हे भवानी, चलो हम इस सन्त पुरुष से बातें करें।
आखिर सन्त भक्तों की संगतिमनुष्य की सर्वोच्च उपलब्धि है।
"
सूत उबाचइत्युक्त्वा तमुपेयाय भगवान्स सतां गति: ।
ईशान: सर्वविद्यानामी श्वर: सर्वदेहिनाम् ॥
८ ॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक््त्वा--कह कर; तम्ू--उस ऋषि के पास; उपेयाय--जाकर;भगवान्--वरिष्ठ देवता; सः--वह; सताम्--शुद्ध आत्माओं के; गति:--शरण; ईशान: --स्वामी; सर्व-विद्यानाम्ू--विद्याकी समस्त शाखाओं के; ईश्वर: --नियन्ता; सर्व-देहिनामू--समस्त देहधारी जीवों के ॥
सूत गोस्वामी ने कहा: इस तरह कहने के बाद, शुद्धात्माओं के आश्रय, समस्तआध्यात्मिक विद्याओं के स्वामी तथा समस्त देहधारी जीवों के नियन्ता भगवान् शंकर उसऋषि के पास गये।
"
तयोरागमन साक्षादीशयोर्जगदात्मनो: ।
न वेद रुद्धधीवृत्तिरात्मानं विश्वमेव च ॥
९॥
तयो:--उन दोनों का; आगमनम्--आना; साक्षात्--स्वयं; ईशयो:--शक्तिमान पुरुषों का; जगत्-आत्मनो: --ब्रह्माण्ड केनियन्ताओं का; न वेद--नहीं देख पाया; रुद्ध--रुका हुआ; धी-वृत्ति:--मन की गति; आत्मानमू--स्वयं; विश्वम्--बाहायब्रह्माण्ड; एव--निस्सन्देह; च-- भी |
चूँकि मार्कण्डेय का भौतिक मन कार्य करना बन्द कर चुका था अतएव वे ब्रह्माण्ड केनियन्ता शिव तथा उनकी पत्ली का आना देख नहीं पाये, जो स्वयं उन्हें देखने आये थे।
मार्कण्डेय ध्यान में इतने लीन थे कि उन्हें अपनी या बाह्य जगत की कोई सुधि-बुधि नहींथी।
"
भगवांस्तदभिज्ञाय गिरिशो योगमायया ।
आविशत्तद्गुहाकाशं वायुए्छद्रमिवेश्वर: ॥
१०॥
भगवान्--महापुरुष; तत्--उस; अभिज्ञाय--समझ कर; गिरिश:-- भगवान् गिरिश ने; योग-मायया--अपनी योगशक्तिसे; आविशत्--प्रवेश किया; तत्--मार्कण्डेय के; गुहा-आकाशम्--हृदय के गुप्त आकाश में; वायु:--वायु; छिद्रम्ू--छेद; इब--सहृश; ई श्वर:-- प्रभु |
स्थिति से भलीभाँति परिचित होने पर, शक्तिमान भगवान् शिव ने मार्कण्डेय के हृदय-आकाश के भीतर प्रविष्ट होने के लिए अपनी योगशक्ति का प्रयोग किया जिस तरह वायुछेद में से प्रवेश कर जाती है।
"
आत्मन्यपि शिवं प्राप्तं तडित्पिड्रजटाधरम् ।
ज्यक्षं दशभुजं प्रांशुमुद्यन्तमिव भास्करम् ॥
११॥
व्याप्रचर्माम्बरं शूलधनुरिष्वसिचर्मभि: ।
अक्षमालाडमरुककपालं परशुं सह ॥
१२॥
बिशभ्राणं सहसा भातं विचक्ष्य हृदि विस्मित: ।
किमिदं कुत एवेति समाधेर्विरतो मुनि: ॥
१३॥
आत्मनि--अपने भीतर; अपि-- भी; शिवम्--शिव को; प्राप्तम्--आया हुआ; तडित्--बिजली के समान; पिड़--पीलाभ; जटा--बालों की लटें; धरम्-- धारण किये; त्रि-अक्षम्--तीन नेत्रों सहित; दश-भुजम्--तथा दस भुजाएँ;प्रांशुम्-- अत्यधिक ऊँचा; उद्यन्तम्ू--उठा हुआ; इब--सहृश; भास्करम्--सूर्य को; व्याप्र--बाघ का; चर्म--रोंएदारचमड़ा; अम्बरम्--वस्त्र के रूप में; शूल--त्रिशूल; धन:--धनुष; इषु--बाण; असि--तलवार; चर्मभि:--तथा ढालसहित; अक्ष-माला--जपमाला; डमरुक--डमरू; कपालम्--तथा सिर; परशुम्--फरसा; सह--सहित; बिभ्राणम्--प्रदर्शित करते हुए; सहसा--एकाएक; भातमू--प्रकट; विचक्ष्य--देख कर; हृदि--हृदय में; विस्मित:--चकित; किमू्--क्या; इृदम्--यह; कुत:ः--कहाँ से; एब--निस्सन्देह; इति--इस प्रकार; समाधे:--समाधि से; विरत:--हटा; मुनिः--मुनि
श्री मार्कण्डेय ने सहसा भगवान् शिव को अपने हृदय के भीतर प्रकट हुए देखा।
शिवजी के सुनहरे केश बिजली के समान थे।
उनके तीन नेत्र, दस भुजाएँ तथा ऊँचा शरीरथा, जो उदय हो रहे सूर्य की तरह चमक रहा था।
वे व्याप्र चर्म पहने थे और त्रिशूल, धनुष,बाण, तलवार तथा ढाल लिये थे।
वे जपमाला, डमरू, कपाल तथा परशु भी लिए थे।
मुनिने चकित होकर अपनी समाधि तोड़ दी और सोचा, 'यह कौन है और कहाँ से आया है ?'" 'नेत्रे उन्मील्य दहशे सगणं सोमयागतम् ।
रुद्रं त्रिलोकैकगुरुं ननाम शिरसा मुनि: ॥
१४॥
नेत्रे--अपने नेत्र; उन््मील्य--खोल कर; दहशे --देखा; स-गणम्-- अपने संगियों के साथ; स-उमया--तथा उमा समेत;आगतम्--आया हुआ; रुद्रमू-रुद्र को; त्रि-लोक--तीनों लोकों के; एक-गुरुम्--एकमात्र गुरु; ननाम--नमस्कारकिया; शिरसा--सिर के बल; मुनि:--
मुनि नेअपनी आँखें खोल कर मुनि ने तीनों जगत के गुरु भगवान् रुद्र को उमा तथा उनकेगणों समेत देखा।
तब मार्कण्डेय ने सिर के बल झुक कर उन्हें सादर नमस्कार किया।
"
तस्मै सपर्या व्यदधात्सगणाय सहोमया ।
स्वागतासनपाद्यार्ध्यगन्धस््रग्धूपदीपकै: ॥
१५॥
तस्मै--उसको; सपर्याम्--पूजा; व्यदधात्-- अर्पित की; स-गणाय--उनके गणों समेत; सह उमया--उमा सहित; सु-आगत--स्वागत के शब्दों से; आसन--बैठने के लिए स्थान देते हुए; पाद्य--चरण धोने के लिए जल; अर्ध्य--सुगन्धितपीने का पानी; गन्ध--सुगन्धित तेल; सत्रकू--माला; धूप--धूप; दीपकै:--तथा दीपकों से।
मार्कण्डेय ने उमा तथा शिव के गणों समेत भगवान् शिव की पूजा स्वागत के शब्दों,आसन, उनके पाँव धोने के लिए जल, सुगंधित पीने के पानी, सुगन्धित तेल, फूल-मालाओंतथा आरती के दीपक द्वारा की।
"
आह त्वात्मानुभावेन पूर्णकामस्य ते विभो ।
'करवाम किमीशान येनेदं निर्वृतं जगत् ॥
१६॥
आह--मार्कण्डेय ने कहा; तु--निस्सन्देह; आत्म-अनुभावेन--निजी आनन्द अनुभूति से; पूर्ण-कामस्य--सभी प्रकार सेतुष्ठ; ते--आपके लिए; विभो--हे सर्वशक्तिमान; करवाम--कर सकता हूँ; किम्--क्या; ईशान--हे ई श्वर; येन--जिससे;इदम्--यह; निर्वृतम्ू--शान्त बनता है; जगत्--पूरा संसार।
मार्कण्डेय ने कहा : हे विभु, मैं आपके लिए, जो अपने ही आनन्द में सदैव तुष्ट रहनेवाले हैं, क्या कर सकता हूँ? निस्सन्देह, आप अपनी कृपा से इस सारे जगत को तुष्ट करतेहैं।
"
नमः शिवाय शान्ताय सत्त्वाय प्रमृडाय च ।
रजोजुषेथ घोराय नमस्तुभ्यं तमोजुषे ॥
१७॥
नमः--नमस्कार; शिवाय--सर्वमंगलकारी; शान्ताय--शान्त; सत्त्वाय--सतोगुण के साक्षात् रूप; प्रम्डाय-- आनन्द केदाता; च--तथा; रज:-जुषे--रजोगुण के सम्पर्क में रहने वाला; अथ-- भी; घोराय--घोर; नम:--नमस्कार; तुभ्यम्--आपको; तमः-जुषे--तमोगुण के संगीहे सर्वमंगलकारी दिव्य पुरुष, मैं बारम्बार आपको नमस्कार करता हूँ।
सतोगुण केस्वामी के रूप में आप आनन्द के दाता हैं, रजोगुण के सम्पर्क में आप अत्यन्त भयावनेलगते हैं और तमोगुण से भी आप सात्निध्य रखते हैं।
"
सूत उबाचएवं स्तुतः स भगवानादिदेव: सतां गति: ।
परितुष्टः प्रसन्नात्मा प्रहसंस्तमभाषत ॥
१८॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्--इन शब्दों द्वारा; स्तुत:--स्तुति किया गया; सः--वह; भगवान्--शक्तिमानशिवजी; आदि-देव:--देवताओं के अग्रणी; सताम्--साधु भक्तों के; गति:--आश्रय, शरण; परितुष्ट:--पूरी तरह तुष्ट;प्रसन्न-आत्मा--मन में प्रसन्न; प्रहसन्--हँसते हुए; तम्--मार्कण्डेय से; अभाषत--बोले |
सूत गोस्वामी ने कहा : देवताओं में अग्रणी तथा साधु भक्तों के आश्रय रूप भगवान्शिव, मार्कण्डेय की स्तुति से तुष्ट हो गए।
प्रसन्न होने के कारण वे हँसने लगे और मुनि सेबोले।
"
श्रीभगवानुवाचवबरं वृणीष्व नः काम वरदेशा वयं त्रयः ।
अमोधं दर्शन येषां मर्त्यों यद्विन्दतेठमृतम् ॥
१९॥
श्री-भगवान् उबाच--शिवजी ने कहा; वरमू--वर; वृणीष्व--चुनो; न:--हमसे; कामम्--जो इच्छा हो; वर-द--समस्तवर देने वालों में से; ईशा: --नियंता, स्वामी; वयम्--हम; त्रय:--तीन ( ब्रह्मा, विष्णु तथा महे श्वर ); अमोघम्-व्यर्थ नजाने वाला; दर्शनम्-दर्शन; येषाम्--जिनके; मर्त्य:--मर्त्य जीव; यत्--जिससे; विन्दते--प्राप्त करता है; अमृतम्--अमरता।
शिवजी ने कहा : तुम मुझसे कोई वर माँगो क्योंकि वर देने वालों में से हम तीन--ब्रह्मा, विष्णु तथा मैं--सर्व श्रेष्ठ हैं।
हमारा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि हमारे दर्शन मात्र सेमर्त्य प्राणी अमरता प्राप्त कर लेता है।
"
ब्राह्मणा: साधव: शान्ता निःसड़ा भूतवत्सला: ।
एकान्तभक्ता अस्मासु निर्वैरा: समदर्शिन: ॥
२०॥
सलोका लोकपालास्तान्बन्दन्त्यर्चन्त्युपासते ।
अहं च भगवान्त्रह्मा स्वयं च हरिरीश्वर: ॥
२१॥
ब्राह्मणा:--ब्राह्मण; साधव: --साधु स्वभाव के; शान्ता: --शान्त तथा द्वेष एवं अन्य दुर्गुणों से रहित; निःसड़ा:--भौतिकसंगति से मुक्त; भूत-वत्सला:--जीवों पर सदय; एक-अन्त-भक्ता:--अनन्य भक्त; अस्मासु--हमारे ( ब्रह्मा, हरि तथाशिव ); निर्वरा:--कभी घृणा से युक्त नहीं; सम-दर्शिन:--सबको समान दृष्टि से देखने वाले; स-लोकाः --सारे जगतों केनिवासियों सहित; लोक-पाला: --विभिन्न लोकों के शासक; तान्--उन ब्राह्मणों को; वन्दन्ति--वन्दना करते हैं;अर्चन्ति--पूजा करते हैं; उपासते--सहायता करते हैं; अहम्ू--मैं; च--भी; भगवान्--महान् स्वामी; ब्रह्मा--ब्रह्मा;स्वयम्--स्वयं; च-- भी; हरि:--हरि; ई श्वरः-- भगवान् |
ब्रह्मा, हरि तथा मुझ समेत सारे लोकों के निवासी तथा शासन करने वाले देवता उनब्राह्मणों की वन्दना, पूजा तथा सहायता करते हैं, जो सन्त स्वभाव के, सदैव शान्त, भौतिकआसक्ति से रहित, समस्त जीवों पर दयालु, हमारे प्रति शुद्ध भक्ति से युक्त, घृणा से रहितएवं समहद्ृष्टि से युक्त होते हैं।
"
न ते मय्यच्युतेडजे च भिदामण्वपि चक्षते ।
नात्मनश्व जनस्यापि तद्युष्मान्वयमीमहि ॥
२२॥
न--नहीं; ते--वे; मयि--मुझमें; अच्युते-- भगवान् विष्णु में; अजे--ब्रह्मा में; च--तथा; भिदामू-- अन्तर; अणु--लेश;अपि- भी; चक्षते--देखते हैं; न--नहीं; आत्मन:--अपना; च--तथा; जनस्य--अन्य लोगों का; अपि-- भी; तत्--इसलिए; युष्मान्ू--तुम; वयम्--हम; ईमहि--पूजा करते हैं।
ये भक्तगण भगवान् विष्णु, ब्रह्म तथा मुझमें अन्तर नहीं करते, न ही वे अपने तथा अन्यजीवों के बीच अन्तर करते हैं।
तुम इसी तरह के सन्त भक्त हो, इसलिए हम तुम्हारी पूजाकरते हैं।
"
न हाम्मयानि तीर्थानि न देवाश्वेतनोज्झिता: ।
ते पुनन्त्युरुकालेन यूय॑ दर्शनमात्रतः ॥
२३॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अपू-मयानि--पवित्र जल से युक्त; तीर्थानि--तीर्थस्थल; न--नहीं; देवा:--देवताओं केअर्चाविग्रह रूप; चेतन-उज्झिता:--जीवन से रहित; ते--वे; पुनन्ति--शुद्ध करते हैं; उर-कालेन--दीर्घकाल के पश्चात्;यूयम्ू--तुम सब; दर्शन-मात्रत:--केवल दर्शन करने से |
मात्र जलाशय तीर्थस्थान नहीं होते, न ही देवताओं की निर्जीव मूर्तियाँ वास्तविक पूज्यअर्चाविग्रह होती हैं।
चूँकि बाह्य दृष्टि पवित्र नदियों तथा देवताओं के उच्च आशय को समझनहीं पाती, इसलिए ये दीर्घकाल बाद ही पवित्र बना पाते हैं।
किन्तु तुम जैसे भक्त, दर्शनमात्र से, पवित्र कर देते हो।
"
ब्राह्मणेभ्यो नमस्यामो येउस्मद्रूपं त्रयीमयम् ।
बिक्रत्यात्ससमाधानतपःस्वाध्यायसंयमै: ॥
२४॥
ब्राह्मणेभ्य: --ब्रह्मणों को; नमस्याम:--हम नमस्कार करते हैं; ये--जो; अस्मत्-रूपम्--हमारे ( शिव, ब्रह्मा तथा विष्णुके ) रूप; त्रयी-मयम्--तीन वेदों के द्वारा प्रदर्शित; बिभ्रति--वहन करते हैं; आत्म-समाधान-- आत्म पर केन्द्रित ध्यानसमाधि द्वारा; तप: --तपस्या द्वारा; स्वाध्याय-- अध्ययन द्वारा; संयमै: --तथा विधि-विधानों के पालन द्वारा
परमात्मा का ध्यान करके, तपस्या करके, वेदाध्ययन करके तथा विधि-विधानों कापालन करके, ब्राह्मणजन अपने भीतर तीनों वेदों को, जोकि विष्णु, ब्रह्मा तथा मुझसेअभिन्न हैं धारण करते हैं।
डसलिए मैं ब्राह्मणों को नमस्कार करता हँ।
"
श्रवणाहर्शनाद्वापि महापातकिनोपि व: ।
शुध्येरन्नन्त्यजा श्चापि किमु सम्भाषणादिभि: ॥
२५॥
श्रवणात्-- श्रवण करने से; दर्शनात्ू--दर्शन करने से; वा--अथवा; अपि-- भी; महा-पातकिन: -- सबसे अधम पापकरने वाले; अपि-- भी; व: --तुम; शुध्येरन्--शुद्ध बन जाते हैं; अन्त्य-जा:--अछूत लोग; च--तथा; अपि-- भी; किम्उ--क्या कहा जाय; सम्भाषण-आदिभि: -- प्रत्यक्ष बात करने इत्यादि से।
अधम से अधम पापी तथा अछूत भी तुम जैसे पुरुषों का श्रवण करने या दर्शन करने सेशुद्ध बन जाते हैं।
तब जरा कल्पना करो कि सीधे तुमसे बात करने से वे कितने शुद्ध बनजाते हैं ?"
सूत उबाचइति चन्द्रललामस्य धर्मगह्योपबृंहितम् ।
वचोमृतायनमृषिर्नातृप्यत्कर्णयो: पिबन् ॥
२६॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; चन्द्र-ललामस्थ--चन्द्रमा से सुशोभित शिव का; धर्म-गुहा--धर्मके गुह्य सार से; उपबृंहितम्--पूरित; वच:--शब्द; अमृत-अयनम्-- अमृत के आगार; ऋषि:--ऋषि; न अतृप्यत्--तृप्तिनहीं हुई; कर्णयो: --अपने कानों से; पिबन्ू--पीते हुए।
सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् शिव के अमृत तुल्य शब्दों को, जोकि धर्म के गुह्य सारसे पूरित थे, अपने कानों से पीते हुए मार्कण्डेय ऋषि तुष्ट नहीं हुए।
"
स चिरं मायया विष्णोर्भ्रामित: कर्शितो भूशम् ।
शिववागमृतध्वस्तक्लेशपुझ्जस्तमब्रवीत् ॥
२७॥
सः--वह; चिरम्ू--दीर्घकाल तक; मायया--माया द्वारा; विष्णो:-- भगवान् विष्णु की; भ्रामित:-- भटकाया हुआ;कशितः--थका; भूशम्--अत्यधिक; शिव--शिव के; वाक्ू-अमृत--अमृत तुल्य शब्दों से; ध्वस्त--विनष्ट; क्लेश-पुज्न:--कष्टों का समूह; तम्--उससे; अब्नवीत्--बोला |
भगवान् विष्णु की माया द्वारा प्रलय के जल में दीर्घकाल तक भटकाये गये होने केकारण मार्कण्डेय अत्यधिक थक चुके थे।
किन्तु शिवजी के अमृत तुल्य शब्दों से उनकासंचित क्लेश नष्ट हो गया।
अतः वे शिवजी से बोले।
"
श्रीमार्कण्डेय उवाचअहो ईश्वरलीलेयं दुर्विभाव्या शरीरिणाम् ।
यन्नमन्तीशितव्यानि स्तुबन्ति जगदी श्वरा: ॥
२८॥
श्री-मार्कण्डेय: उवाच-- श्री मार्कण्डेय ने कहा; अहो-- ओह; ईश्वर--महान् स्वामियों की; लीला--लीला; इयम्--यह;दुर्विभाव्या--अविश्वसनीय; शरीरिणाम्--देहधारी जीवों के लिए; यत्--क्योंकि; नमन्ति--नमस्कार करते हैं;ईशितव्यानि--उनको जो उनके द्वारा नियंत्रित होते हैं; स्तुवन्ति--स्तुति करते हैं; जगत्-ई श्वरा:-- ब्रह्माण्ड के शासक |
श्री मार्कण्डेय ने कहा : देहधारी जीवों के लिए ब्रह्माण्ड के नियन्ताओं की लीलाओंको समझ पाना सबसे कठिन है क्योंकि ऐसे प्रभु अपने ही द्वारा शासित जीवों को सिरझुकाते तथा उनकी स्तुति करते हैं।
"
धर्म ग्राहयितु प्राय: प्रवक्तारश्व देहिनाम् ।
आच्रन्त्यनुमोदन्ते क्रियमाणं स्तुवन्ति च ॥
२९॥
धर्मम्-- धर्म; ग्राहयितुमू--स्वीकार करवाना; प्राय:--अधिकांशत:; प्रवक्तार:--वैध वक्ताओं; च--तथा; देहिनाम्--सामान्य देहधारियों के लिए; आचरन्ति--कर्म करते हैं; अनुमोदन्ते--प्रोत्साहित करते हैं; क्रियमाणम्--सम्पन्न करनेवाला; स्तुवन्ति--स्तुति करते हैं; च-- भी |
सामान्यतया देहधारी जीवों को धार्मिक सिद्धान्त स्वीकार करने के लिए प्रेरित करने केलिए ही प्रामाणिक धर्माचार्य, अन्यों को प्रोत्साहित करके तथा उनके आचरण की प्रशंसाकरके, आदर्श आचरण प्रदर्शित करते हैं।
"
नैतावता भगवतः स्वमायामयवृत्तिभि: ।
न दुष्येतानुभावस्तैर्मायिन: कुहक॑ यथा ॥
३०॥
न--नहीं; एतावता--ऐसे ( विनयशीलता के प्रदर्शन ) द्वारा; भगवत:-- भगवान् का; स्व-माया--अपनी माया; मय--सेयुक्त; वृत्तिभि: --कार्यों द्वारा; न दुष्येत--बिगड़ता नहीं; अनुभाव: --शक्ति; तैः--उनके द्वारा; मायिन:--जादूगर की;कुहकम्--करामातें; यथा--जिस तरहयह ऊपरी विनयशीलता दया का दिखावा मात्र है।
भगवान् तथा उनके संगियों का ऐसाआचरण, जिसे भगवान् अपनी मोहिनी शक्ति से दिखलाते हैं, उनकी शक्ति को नहीं बिगाड़ता जिस तरह जादूगर की शक्तियाँ जादूगरी की करामातें दिखाने से घटती नहीं।
"
सृप्ठेदं मनसा विश्वमात्मनानुप्रविश्य यः ।
गुणै: कुर्वद्धिराभाति कर्तेव स्वप्नहग्यथा ॥
३१॥
तस्मै नमो भगवते त्रिगुणाय गुणात्मने ।
केवलायाद्वितीयाय गुरवे ब्रह्ममूर्तये ॥
३२॥
सृप्ठा--उत्पन्न करके; इदम्--इस; मनसा--अपने मन से, अपनी इच्छा मात्र से; विश्वम्--ब्रह्माण्ड को; आत्मना--परमात्मारूप में; अनुप्रविश्य--बाद में प्रविष्ट होकर; य:--जो; गुणै: --गुणों के द्वारा; कुर्वद्धिः--कर्म करते हैं; आभाति--प्रकटहोता है; कर्ता इब--मानो कर्ता हो; स्वण-हक्--स्वप्न देखने वाला व्यक्ति; यथा--जिस तरह; तस्मै--उस; नम: --नमस्कार; भगवते-- भगवान् को; त्रि-गुणाय--तीन गुणों वाले; गुण-आत्मने-- प्रकृति के तीनों गुणों के स्वामी;केवलाय--शुद्ध; अद्वितीयाय--अद्वितीय; गुरवे--गुरु को; ब्रह्म-मूर्तये--परब्रह्म के साकार रूप।
मैं उन भगवान् को नमस्कार करता हूँ जिन्होंने अपनी इच्छा मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी सृष्टि की और फिर जो उसमें परमात्मा रूप में प्रविष्ट हो गये।
वे प्रकृति के गुणों कोक्रियमाण बनाकर इस जगत के प्रत्यक्ष स्त्रष्टा प्रतीत होते हैं जिस तरह स्वप्न देखने वालाअपने स्वप्न के भीतर कर्म करता प्रतीत होता है।
वे प्रकृति के तीनों गुणों के स्वामी औरपरम नियन्ता हैं, फिर भी वे पृथक् रहते हैं और शुद्ध तथा अद्वितीय हैं।
वे सबों के परम गुरुतथा परब्रह्म के आदि साकार रूप हैं।
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क॑ वृणे नु परं भूमन्वरं त्वद्वरदर्शनात् ।
यहर्शनात्पूर्णकामः सत्यकाम: पुमान्भवेत् ॥
३३॥
कम्--क्या; वृणे--मैं चुनूँ; नु--निस्सन्देह; परम्--अन्य; भूमन्--हे सर्वव्यापक प्रभु; वरम्--वर; त्वत्--आपसे; वर-दर्शनात्ू--जिनका दर्शन ही सबसे बड़ा वर है; यत्--जिसके; दर्शनात्ू--दर्शन से; पूर्ण-काम:--सारी इच्छाओं से पूर्ण;सत्य-काम:--किसी भी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने में सक्षम; पुमान्--पुरुष; भवेत्ू--बन जाता है।
हे सर्वव्यापक प्रभु, चूँकि मुझे आपका दर्शन करने का वर प्राप्त हो चुका है, इसलिए मैंआपसे अन्य किस वर की याचना करूँ? केवल आपका दर्शन करने से मनुष्य की सारीइच्छाएँ पूरी हो जाती हैं और वह कोई भी कल्पित कार्य संपन्न कर सकता है।
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वरमेक॑ वृणेथापि पूर्णात्कामाभिवर्षणात् ।
भगवत्यच्युतां भक्ति तत्परेषु तथा त्वयि ॥
३४॥
वरम्--वर; एकम्--एक; वृणे--याचना करता हूँ; अथ अपि--तो भी; पूर्णात्--जो पूर्ण है उससे; काम-अभिवर्षणात्--जो इच्छाओं की पूर्ति की वर्षा करता है; भगवति-- भगवान् के लिए; अच्युताम्--अच्युत; भक्तिमू--भक्ति; तत्-परेषु--उनके शरणागतों; तथा-- भी; त्वयि--आप में |
किन्तु मैं आपसे एक वर माँगता हूँ क्योंकि आप समस्त सिद्धि से पूर्ण हैं और समस्तइच्छाओं की पूर्ति की वर्षा करने में समर्थ हैं।
मैं आपसे भगवान् की तथा उनके समर्पितभक्तों की, विशेष रूप से आपकी, अच्युत भक्ति के लिए याचना करता हूँ।
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सूत उबाचइत्यर्चितोभिष्टृतश्व॒ मुनिना सूक्तया गिरा ।
तमाह भगवाउछर्व: शर्वया चाभिनन्दित: ॥
३५॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इन शब्दों में; अचित:--पूजित; अभिष्ठृत:ः--स्तुति किये गये; च--तथा;मुनिना--मुनि द्वारा; सु-उक्तया-- अच्छी तरह कहे गये; गिरा--शब्दों से; तम्ू--उससे; आह--कहा; भगवान् शर्व:--शिवजी; शर्वया--अपनी प्रिया शर्वा द्वारा; च--तथा; अभिनन्दित:--प्रोत्साहित
सूत गोस्वामी ने कहा : मुनि मार्कण्डेय के वाक्पटु कथनों द्वारा पूजित तथा प्रशंसितभगवान् शर्व ( शिव ) ने अपनी प्रिया द्वारा प्रोत्साहित किये जाने पर उनसे इस प्रकार कहा।
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कामो महर्षे सर्वोद्यं भक्तिमांस्त्वमधोक्षजे ।
आकल्पान्ताद्यशः पुण्यमजरामरता तथा ॥
३६॥
काम:ः--इच्छा; महा-ऋषे--हे महर्षि; सर्व:--सारा; अयम्--यह; भक्ति-मान्--भक्ति से पूर्ण; त्वमू--तुम; अधोक्षजे--भगवान् के लिए; आ-कल्प-अन्तात्--ब्रह्मा के दिन के अन्त तक; यशः--यश्न; पुण्यम्--पवित्र; अजर-अमरता--वृद्धावस्था तथा मृत्यु से मुक्ति; तथा--भी |
हे महर्षि, तुम भगवान् अधोक्षज के प्रति अनुरक्त हो, इसलिए तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरीहोंगी।
इस सृष्टि चक्र के अन्त तक तुम पवित्र यश तथा वृद्धावस्था एवं मृत्यु से मुक्ति का भोग करोगे।
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ज्ञान त्रैकालिकं ब्रह्मन् विज्ञानं च विरक्तिमत् ।
ब्रह्मवर्चस्विनो भूयात्पुराणाचार्यतास्तु ते ॥
३७॥
ज्ञानम्--ज्ञान; त्रै-कालिकम्ू--काल की तीनों अवस्थाओं ( भूत, वर्तमान तथा भविष्य ) का; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण;विज्ञानम्ू--दिव्य अनुभूति; च--भी; विरक्ति-मत्--वैराग्य समेत; ब्रह्म-वर्चस्विन: --ब्रह्म शक्ति से युक्त है, जो उसका;भूयात्--हो; पुराण-आचार्यता--पुराणों के आचार्य का पद; अस्तु--हो; ते--तुम्हारा
हे ब्राह्मण, तुम्हें भूत, वर्तमान तथा भविष्य का पूर्ण ज्ञान और उसी के साथ वैराग्य सेयुक्त ब्रह्म की दिव्य अनुभूति प्राप्त हो।
तुम्हारे पास आदर्श ब्राह्मण का तेज है, जिससे तुमपुराणों के आचार्य का पद पा सको।
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सूत उबाचएवं वरान्स मुनये दत्त्वागात्त्यक्ष ईश्वर: ।
देव्यै तत्कर्म कथयन्ननुभूतं पुरामुना ॥
३८॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह; वरान्--वर; सः--वह; मुनये--मुनि को; दत्त्वा--देकर;अगातू--चला गया; त्रि-अक्ष:--तीन नेत्रों वाले; ईश्वरः--शिवजी; देव्यै--देवी पार्वती को; तत्-कर्म--मार्कण्डेय केकार्यकलाप; कथयन्--बतलाते हुए; अनुभूतम्-- अनुभव किया हुआ; पुरा--पहले; अमुना--उसके द्वारा, मार्कण्डेयद्वारा
सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार मार्कण्डेय ऋषि को वर देकर शिवजी अपने मार्ग मेंदेवी पार्वती से ऋषि की उपलब्धियों का तथा उनके द्वारा अनुभव की गई भगवान् की मायाके प्रत्यक्ष प्रदर्शन का वर्णन करते चले गये।
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सोप्यवाप्तमहायोगमहिमा भार्गवोत्तम: ।
विचरत्यधुनाप्यद्धा हरावेकान्ततां गत: ॥
३९॥
सः--वह, मार्कण्डेय; अपि--निस्सन्देह; अवाप्त--प्राप्त करके; महा-योग--योग की सर्वोच्च सिद्धि की; महिमा--महिमा; भार्गव-उत्तम: -- श्रेष्ठ भूगुवंशी; विचरति--विचरण कर रहा है; अधुना अपि--आज भी; अद्धघा- प्रत्यक्ष; हरौ--हरि के लिए; एक-अन्ततामू--एकान्तिक भक्ति का पद; गतः--प्राप्त करके |
श्रेष्ठ भूगुवंशी मार्कण्डेय ऋषि अपनी योग-सिद्धि की उपलब्धि के कारण यशस्वी हैं।
आज भी वे इस जगत में भगवान् की अनन्य भक्ति में पूरी तरह लीन होकर विचरण करतेहैं।
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अनुवर्णितमेतत्ते मार्कण्डेयस्थ धीमत: ।
अनुभूतं भगवतो मायावैभवमद्भुतम् ॥
४०॥
अनुवर्णितम्--वर्णन किया गया; एतत्--यह; ते--तुमसे; मार्कण्डेयस्य--मार्कण्डेय का; धी-मतः--बुद्द्धिमान;अनुभूतम्-- अनुभव किया गया; भगवत: -- भगवान् का; माया-वैभवम्--माया का ऐश्वर्य; अद्भुतम्ू-- अद्भुत |
इस तरह मैंने तुमसे अत्यन्त बुद्धिमान ऋषि मार्कण्डेय के कार्यकलापों का, विशेष रूपसे जिस तरह उन्होंने भगवान् की माया की अद्भुत शक्ति का अनुभव किया, वर्णन करदिया।
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एतत्केचिदविद्वांसो मायासंसूतिरात्मन: ।
अनाद्यावर्तितं नृणां कादाचित्कं प्रचक्षते ॥
४१॥
एतत्--यह; केचित्--कुछ व्यक्ति; अविद्वांस:--जो विद्वान नहीं हैं; माया-संसृति:--मायामयी सृष्टि; आत्मन:--परमात्माकी; अनादि--अनन्त काल से; आवर्तितम्--पिष्टपेषण की गई; नृणाम्--बद्धजीवों का; कादाचित्कम्-- अभूतपूर्व;प्रचक्षते--कहते हैं
यद्यपि यह घटना अद्वितीय तथा अभूतपूर्व थी, किन्तु कुछ अज्ञानी लोग इसकी तुलनाबद्धजीवों के लिए भगवान् द्वारा रचित मायामय जगत के चक्र से करते हैं--ऐसा अन्तहीनचक्र जो अनन्त काल से चल रहा है।
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य एवमेतद्धगुवर्य वर्णितंरथाड्रपाणेरनुभावभावितम् ।
संश्रावयेत्संश्रूणुयादु तावुभौतयोर्न कर्माशयसंसूतिर्भवेत् ॥
४२॥
यः--जो; एवम्--इस प्रकार; एतत्--यह; भृगु-वर्य --हे श्रेष्ठ भूगुवंशी ( शौनक ); वर्णितम्--वर्णित; रथ-अड्डभ-पाणे: --रथ के पहिए को हाथ में धारण करने वाले श्री हरि का; अनुभाव--शक्ति से; भावितम्ू--सिक्त; संश्रावयेत्--सुनाता है;संश्रूणुयात्--स्वयं सुनता है; उ--अथवा; तौ--वे; उभौ--दोनों; तयो:--उनके; न--नहीं; कर्म-आशय--सकाम कर्मकी मनोवृत्ति पर आधारित; संसृति:--भौतिक जीवन का चक्र; भवेत्-- है |
हे श्रेष्ठ भूगुवंशी, मार्कण्डेय ऋषि से सम्बन्धित यह विवरण भगवान् की दिव्य शक्ति कोबताने वाला है।
जो कोई इसका ठीक से वर्णन करता है या इसे सुनता है, उसे सकाम कर्मकरने की इच्छा पर आधारित भौतिक जगत में फिर से नहीं आना होगा।
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