← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची
अध्याय एक: कलियुग के अपमानित राजवंश
12.1श्रीशुक उबवाचयोउन्त्यः पुरञ्ञयो नाम भविष्यो बारहद्रथ: ।तस्यामात्यस्तुशुनको हत्वा स्वामिनमात्मजम् ॥ १॥
प्रद्योतसंज्ञ राजानं कर्ता यत्पालकः सुतः ।विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः ॥
२॥
श्री शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; यः--जो; अन्त्य: --( नवे स्कन्ध में वर्णित ) अन्तिम सदस्य; पुरक्षय:--पुरक्ञय ( रिपुश्नय ); नाम--नामक; भविष्य:--भविष्य में होगा; बारहद्रथ:--बृहद्रथ का वंशज; तस्य--उसका;अमात्य:--मंत्री; तु--लेकिन; शुनक:--शुनक; हत्वा--मार कर; स्वामिनम्--अपने स्वामी को; आत्म-जम्--अपने पुत्र;प्रद्योत-संज्ञम्--प्रद्योत नाम वाले को; राजानम्ू--राजा को; कर्ता--बनायेगा; यत्--जिसका; पालक:--पालक नामक;सुतः--पुत्र; विशाखयूप:--विशाखयूप; ततू-पुत्र:--पालक का पुत्र; भविता--होगा; राजक:--राजक; ततः--तत्पश्चात्( विशाखयूप के पुत्र-रूप में )॥
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हमने इसके पूर्व मागध वंश के जिन भावी शासकों के नामगिनाये उनमें अन्तिम राजा पुरक्षय था, जो बृहद्रथ के वंशज के रूप में जन्म लेगा। पुरञ्ञयका मंत्री शुनक राजा की हत्या करके अपने पुत्र प्रद्योत को सिंहासनारूढ़ करेगा। प्रद्योत कापुत्र पालक होगा और उसका पुत्र विशाखयूप होगा जिसका पुत्र राजक होगा।"
नन्दिवर्धनस्तत्पुत्र: पञ्ञ प्रद्योतना इमे ।अष्ठत्रिशोत्तरशतं भोक्ष्यन्ति पृथिवीं नृपा; ॥
३॥
नन्दिवर्धन:--नन्दिवर्धन; तत्-पुत्र:--उसका पुत्र; पञ्ञ--पाँच; प्रद्योतना: --प्रद्योतन; इमे--ये; अष्ट-त्रिंश--अड़तीस;उत्तर--अधिक; शतमू--एक सौ; भोक्ष्यन्ति-- भोग करेंगे; पृथिवीम्--पृथ्वी पर; नूपा:--राजा लोगराजक का पुत्र नन्दिवर्धन होगा और प्रद्योतन वंश में पाँच राजा होंगे जो १३८ वर्षों तकपृथ्वी का भोग करेंगे।"
शिशुनागस्ततो भाव्य: काकवर्णस्तु तत्सुत: ।क्षेमधर्मा तस्य सुतः क्षेत्रज्ञ: क्षेमधर्मज: ॥
४॥
शिशुनाग:--शिशुनाग; ततः--तत्पश्चात्; भाव्य:--जन्म लेंगे; काकवर्ण:--काकवर्ण; तु--तथा; तत्-सुतः--उसका पुत्र;क्षेमर्मा--क्षेमधर्मा; तस्य--काकवर्ण का; सुतः--पुत्र; क्षेत्रज्ञ:--क्षेत्रज्ञ; क्षेमधर्म-ज: --क्षेमधर्मा से उत्पन्न |
नन्दिवर्धन के शिशुनाग नामक पुत्र होगा और उसका पुत्र काकवर्ण कहलायेगा।काकवर्ण का पुत्र क्षेमधर्मा होगा तथा क्षेमधर्मा का पुत्र क्षेत्रज्ञ होगा।"
विधिसार: सुतस्तस्याजातशत्रुर्भविष्यति ।दर्भकस्तत्सुतो भावी दर्भकस्याजय: स्मृत: ॥
५॥
विधिसार:--विधिसार; सुत:--पुत्र; तस्य--क्षेत्रज्ञ का; अजातशत्रु; --अजातशत्रु; भविष्यति--होगा; दर्भक:--दर्भक;तत्-सुतः--अजातशत्रु का पुत्र; भावी--जन्म लेगा; दर्भकस्य--दर्भक का; अजय:--अजय; स्मृत:--स्मरण किया जाताहै।क्षेत्रज्ञ का पुत्र विधिसार होगा और उसका पुत्र अजातशत्रु होगा। अजातशत्रु के दर्भकनाम का पुत्र होगा और उसका पुत्र अजय होगा।"
नन्दिवर्धन आजेयो महानन्दिः सुतस्ततः ।शिशुनागा दश्वैते सप्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥
६॥
समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कुरुश्रेष्ठ कलौ नृपा: ।महानन्दिसुतो राजन्शूद्रागर्भोद्भवो बली ॥
७॥
महापदापतिः कश्रिन्नन्दः क्षत्रविनाशकृत् ।ततो नूपा भविष्यन्ति शूद्रप्रायास्त्वधार्मिका: ॥
८॥
नन्दिवर्धन:--नन्दिवर्धन; आजेय:--अजय का पुत्र; महा-नन्दि:ः--महानन्दि; सुत:--पुत्र; तत:--तत्पश्चात् ( नन्दिवर्धन केबाद ); शिशुनागा:--शिशुनाग; दश--दश; एव--निस्सन्देह; एते--ये; सष्टि--साठ; उत्तर--अधिक; शत-त्रयम्--तीनसौ; समा:--वर्ष; भोक्ष्यन्ति--राज्य करेंगे; पृथिवीम्-पृथ्वी पर; कुरु श्रेष्ट--हे कुरुओं में श्रेष्ठ; कलौ--इस कलियुग में;नृपा:--राजागण; महानन्दि-सुत:--महानन्दि का पुत्र; राजन्ू--हे राजा परीक्षित; शूद्रा-गर्भ--शूद्र स्त्री के गर्भ से;उद्धव:--जन्म लेकर; बली--बलवान; महा-पद्य--लाखों में गिनी जाने वाली सेना या सम्पत्ति; पति:--स्वामी;कश्चित्ू--कोई; नन्दः--नन्द; क्षत्र--राजसी श्रेणी का; विनाश-कृत्--विनाशकर्ता; ततः--तब; नृपा:--राजागण;भविष्यन्ति--हों गे; शूद्र-प्राया:--शूद्रों जैसे; तु--तथा; अधार्मिका:--अधार्मिक |
अजय दूसरे नन्दिवर्धन का पिता बनेगा, जिसका पुत्र महानन्दि होगा। हे कुरुश्रेष्ठ,शिशुनाग वंश के ये दस राजा कलियुग में ३६० वर्षो तक राज्य करेंगे। हे परीक्षित, राजामहानन्दि की शूद्रा पत्नी के गर्भ से अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र होगा जो नन्द कहलायेगा।वहलाखों सैनिकों तथा प्रभूत सम्पत्ति का स्वामी होगा। वह क्षत्रियों में कहर ढायेगा औरउसके बाद के प्रायः सारे राजे अधार्मिक शूद्र होंगे।"
स एकच्छत्रां पृथिवीमनुल्लड्वितशासन: ।शासिष्यति महापद्मो द्वितीय इव भार्गवः ॥
९॥
सः--वह ( नन्द ); एक-छत्रामू--एक नायकत्व के अधीन; पृथिवीम्--सम्पूर्ण पृथ्वी; अनुल्लड्डित--जिसका उल्लंघन नकिया जा सके; शासन:--शासन; शासिष्यति--प्रभुसत्ता होगी; महापद्या:--महापद्ा का स्वामी; द्वितीय:--दूसरा; इब--मानो; भार्गव:--परशुराम |
महापद्य का स्वामी, राजा नन्द, सारी पृथ्वी पर इस तरह शासन करेगा मानो द्वितीयपरशुराम हो और उसकी सत्ता को कोई चुनौती नहीं दे सकेगा।"
तस्य चाष्टौ भविष्यन्ति सुमाल्यप्रमुखा: सुता: ।य इमां भोक्ष्यन्ति महीं राजानश्च शतं समा: ॥
१०॥
तस्य--उसके ( नन््द के ); च--तथा; अष्टौ--आठ; भविष्यन्ति--जन्म लेंगे; सुमाल्य-प्रमुखा:--सुमाल्य इत्यादि; सुता: --पुत्र; ये--जो; इमामू--इस; भोश्ष्यन्ति-- भोग करेंगे; महीम्--पृथ्वी पर; राजान: --राजा; च--तथा; शतम्--एक सौ;समा:--वर्षउसके सुमाल्य आदि आठ पुत्र होंगे जो पृथ्वी को एक सौ वर्षो तक शक्तिशाली राजाओंके रूप में अपने वश में रखेंगे।"
नव नन्दान्द्रिज: कश्रित्प्रपन्नानुद्धरिष्यति ।तेषां अभावे जगतीं मौर्या भोक्ष्यन्ति वै कलौ ॥
११॥
नव--नौ; नन्दान्--नन्दों ( नन्द तथा उसके आठ पुत्रों ); द्विज:--ब्राह्मण; कश्चित्--कोई; प्रपन्नानू--विश्वास करते हुए;उद्धरिष्यति--उन्मूलन करेगा; तेषामू--उनकी; अभावे--अनुपस्थिति में; जगतीम्--पृथ्वी; मौर्या:--मौर्य वंश;भोक्ष्यन्ति--शासन करेगा; वै--निस्सन्देह; कलौ--इस कलियुग में |
कोई एक ब्राह्मण ( चाणक्य ) राजा नन्द तथा उसके आठ पुत्रों के साथ विश्वासघातकरेगा और उनके वंश का विनाश कर देगा। उनके न रहने पर कलियुग में मौर्यगण विश्व परशासन करेंगे।"
स एव चन्द्रगुप्तं वै द्विजो राज्येउभिषेक्ष्यति ।तत्सुतो वारिसारस्तु ततश्चाशोकवर्धन: ॥
१२॥
सः--वह ( चाणक्य ); एव--निस्सन्देह; चन्द्रगुप्तम्--राजकुमार चन्द्रगुप्त को; बै--निस्सन्देह; द्विज:--ब्राह्मण; राज्ये--राज्य में; अभिषेक्ष्यति--अभिषिक्त होगा; तत्--चन्द्रगुप्त का; सुत:--पुत्र; वारिसार: --वारिसार; तु--तथा; तत:--वारिसार के बाद; च--तथा; अशोकवर्धन:--अशोकवर्धन
यह ब्राह्मण चन्द्रगुप्त को सिंहासन पर बैठायेगा जिसका पुत्र वारिसार होगा। वारिसारका पुत्र अशोकवर्धन होगा।"
सुयशा भविता तस्य सड्गतः सुयश:सुतः ।शालिशूकस्ततस्तस्य सोमशर्मा भविष्यति ।शतथधन्वा ततस्तस्य भविता तहुहद्रथ: ॥
१३॥
सुयशा:--सुयशा; भविता--उत्पन्न होगा; तस्थ--उसके ( अशोकवर्धन के ); सड्भत:--संगत; सुयशः -सुत:--सुयशा कापुत्र; शालिशूक:--शालिशूक; ततः--तत्पश्चात्; तस्थ--उस ( शालिशूक ) के; सोमशर्मा--सोमशर्मा; भविष्यति--होगा;शतधन्वा--शतधन्वा; तत:ः--तत्पश्चात्; तस्य--उस ( सोमशर्मा ) के; भविता--होगा; तत्ू--उस ( शतथन्वा ) के;बृहद्रथ:--बृहद्रथ
अशोकवर्धन के बाद सुयशा होगा जिसका पुत्र संगत होगा। इसका पुत्र शालिशूक होगाजिसका पुत्र सोमशर्मा होगा। सोमशर्मा का पुत्र शतधन्वा होगा और इसका पुत्र बृहद्रथकहलायेगा।"
मौर्या होते दश नृपा: सप्तत्रिंशच्छतोत्तरम् ।समा भोक्ष्यन्ति पृथिवीं कलौ कुरुकुलोद्रह ॥
१४॥
मौर्या:--मौर्यगण; हि--निस्सन्देह; एते--ये; दश--दस; नृपा:--राजा; सप्त-त्रिंशत्--सैतीस; शत--एक सौ; उत्तरम्--अधिक; समा:--वर्ष; भोक्ष्यन्ति--शासन करेंगे; पृथिवीम्-पृथ्वी पर; कलौ--कलियुग में; कुरू-कुल--कुरुवंश के;उद्वद-हे विख्यात वीर।
हे कुरु श्रेष्ठ, ये दस मौर्य राजा कलियुग के १३७ वर्षो तक पृथ्वी पर राज्य करेंगे।
"
अग्निमित्रस्ततस्तस्मात्सुज्येष्टो भविता ततः ।
बसुमित्रो भद्गरकश्च पुलिन्दो भविता सुत: ॥
१५॥
ततो घोष: सुतस्तस्माद्वज्रमित्रो भविष्यति ।
ततो भागवतस्तस्माद्देवभूतिः कुरूद्बह ॥
१६॥
शुद्जा दशैते भोक्ष्यन्ति भूमिं वर्षणताधिकम् ।
ततः काण्वानियं भूमिर्यास्यत्यल्पगुणान्रूप ॥
१७॥
अग्निमित्र:--अग्निमित्र; तत:ः--पुष्प मित्र से, वह सेनापति जो बृहद्रथ का वध करेगा; तस्मात्--उस ( अग्निमित्र ) से;सुज्येष्ठ:--सुज्येष्ठ; भविता--होगा; ततः--उससे; वसुमित्र:--वसुमित्र; भद्रक: -- भद्रक; च--तथा; पुलिन्द:--पुलिन्द;भविता--होगा; सुतः--पुत्र; ततः--उस ( पुलिन्द ) से; घोष:--घोष; सुतः--पुत्र; तस्मात्--उससे; वज्ञमित्र:--वज्मित्र;भविष्यति--होगा; तत:--उससे; भागवत:-- भागवत; तस्मात्-- उससे; देवभूति--देवभूति; कुरु-उद्वह-हे कुरु श्रेष्ठ;शुद्भा:--शुंग; दश--दस; एते--ये; भोक्ष्यन्ति-- भोग करेंगे; भूमिम्-पृथ्वी का; वर्ष--वर्ष; शत--एक सौ;अधिकम्--अधिक; तत:--तब; काण्वान्--काण्व वंश; इयम्--यह; भूमि:--पृथ्वी; यास्यति--के राज्य में आ जायेगी;अल्प-गुणान्--बहुत कम गुणों वाले; नूप--हे राजा परीक्षित |
हे राजा परीक्षित, इसके बाद अग्निमित्र राजा बनेगा, तब सुज्येष्ठ बनेगा।
सुज्येष्ठ के बादवसुमित्र, भद्रक तथा भद्गक का पुत्र पुलिन्द होंगे।
इसके बाद पुलिन्द का पुत्र घोष शासनकरेगा जिसके बाद वज्मित्र, भागवत तथा देवभूति होंगे।
इस तरह हे कुरु श्रेष्ठ, दस शुंगराजा पृथ्वी पर एक सौ वर्षों से अधिक तक राज्य करेंगे।
तब यह पृथ्वी काण्व वंश केराजाओं के अधीन हो जायेगी जिनमें बहुत ही कम गुण होंगे।
"
शुड्ं हत्वा देवभूतिं काण्वोमात्यस्तु कामिनम् ।
स्वयं करिष्यते राज्यं बसुदेवो महामति: ॥
१८॥
शुड्रमू--शुंग को; हत्वा--मार कर; देवभूतिम्--देवभूति; काण्व:--काण्व वंश का सदस्य; अमात्य:--उसका मंत्री;तु--लेकिन; कामिनम्ू--कामी; स्वयम्--स्वयं; करिष्यते--करेगा; राज्यम्ू--राज्य; वसुदेव:--वसुदेव नामक; महा-मतिः--अत्यन्त बुद्धिमानकाण्व वंश से सम्बद्ध
एक बुद्ध्धिमान मंत्री बसुदेव, शुंग राजाओं में से देवभूति नामकअत्यन्त विलासी अन्तिम राजा को मारेगा और स्वयं शासन सँभालेगा।
"
तस्य पुत्रस्तु भूमित्रस्तस्थ नारायण: सुतः ।
काण्वायना इसमे भूमि चत्वारिंशच्च पञ्ञ च ।
शतानि त्रीणि भोश्ष्यन्ति वर्षाणां च कलौ युगे ॥
१९॥
तस्य--उस ( वसुदेव ) का; पुत्र:--पुत्र; तु--तथा; भूमित्र:--भूमित्र; तस्थ--उसका; नारायण: -- नारायण; सुतः --पुत्र;काण्व-अयना:--काण्व वंश के राजा; इमे--ये; भूमिम्--पृथ्वी; चत्वारिंशत्--चालीस; च--तथा; पञ्ञ-- पाँच; च--तथा; शतानि--सौ; त्रीणि--तीन; भोक्ष्यन्ति--शासन करेंगे; वर्षाणामू--वर्ष; च--तथा; कलौ युगे--कलियुग में ।
बसुदेव का पुत्र भूमित्र होगा और उसका पुत्र नारायण होगा।
काण्व वंश के ये राजापृथ्वी पर कलियुग के अगले ३४५ वर्षो तक शासन चलायेंगे।
"
हत्वा काण्वं सुशर्माणं तद्धृत्यो वृषलो बली ।
गां भोध्यत्यन्ध्रजातीय: कजख्जित्कालमसत्तम: ॥
२०॥
हत्वा--मार कर; काण्वम्--काण्व राजा को; सुशर्माणम्--सुशर्मा नामक; तत्-भृत्य:--उसका नौकर; वृषल:--निम्नजाति का शूद्र; बली--बली नामक; गाम्--पृथ्वी पर; भोक्ष्यति--शासन करेगा; अन्ध्र-जातीय:--अन्श्र जाति का;कझ्जित्ू--कुछ; कालम्--समय तक; असत्तम: --अत्यन्त भ्रष्ट
काण्वों का अन्तिम राजा सुशर्मा, अन्ध्र जाति के अधम शूद्र बली नामक अपने हीनौकर के हाथों मारा जायेगा।
यह अत्यन्त भ्रष्ट महाराज बली कुछ काल तक पृथ्वी परशासन करेगा।
"
कृष्णनामाथ तदभ्राता भविता पृथिवीपति: ।
श्रीशान्तकर्णसस्तत्पुत्र: पौर्णमासस्तु तत्सुतः ॥
२१॥
लम्बोदरस्तु तत्पुत्रस्तस्माच्चिबिलको नूप: ।
मेघस्वातिश्चिबिलकादटमानस्तु तस्थ च ॥
२२॥
अनिष्टकर्मा हालेयस्तलकस्तस्य चात्मज: ।
पुरीषभीरुस्तत्पुत्रस्ततो राजा सुनन्दनः: ॥
२३॥
चकोरो बहवो यत्र शिवस्वातिररिन्दम: ।
तस्यापि गोमती पुत्र: पुरीमान्भविता तत: ॥
२४॥
मेदशिरा: शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः ।
विजयस्तत्सुतो भाव्यश्चन्द्रविज्ञ सलोमधि: ॥
२५॥
एते त्रिंशन्रपतयश्चत्वार्यब्द्शतानि च ।
षट्पश्ञाशच्च पृथिवीं भोक्ष्यन्ति कुरूनन्दन ॥
२६॥
कृष्ण-नाम--कृष्ण नामक; अथ--तब; तत्--उस ( बली ) का; भ्राता-- भाई; भविता--होगा; पृथिवी-पति:--पृथ्वीका स्वामी; श्री-शान्तकर्ण:--श्री शान्तकर्ण; तत्--कृष्ण का; पुत्र:--पुत्र; पौर्णमास:--पौर्णमास; तु--तथा; तत्-सुतः--उसका पुत्र; लम्बोदर: --लम्बोदर; तु--तथा; तत्-पुत्र:--उसका पुत्र; तस्मात्--उस ( लम्बोदर ) से; चिबिलक:--चिबिलक; नृप:--राजा; मेघस्वाति: --मेघस्वाति; चिबिलकात्--चिबिलक से; अटमान:--अटमान; तु--तथा; तस्थ--उस ( मेघस्वाति ) का; च--तथा; अनिष्टकर्मा--अनिष्टकर्मा; हालेय: --हालेय; तलक:--तलक; तस्य--उस ( हालेय )का; च--तथा; आत्म-ज: --पुत्र; पुरीषभीरु:--पुरीषभीरू ; तत्ू--तलक का; पुत्र:--पुत्र; तत:ः--तब; राजा--राजा;सुनन्दन:--सुनन्दन; चकोर:--चकोर; बहव:--बहुगण; यत्र--जिनमें से; शिवस्वाति:--शिवस्वाति; अरिम्दम:--शत्रुओंका दमन करने वाला; तस्य--उसके; अपि-- भी; गोमती--गोमती; पुत्र:--पुत्र; पुरीमान्--पुरीमान; भविता--होगा;ततः--उस ( गोमती ) से; मेदशिरा: --मेदशिरा; शिवस्कन्द: --शिवस्कन्द; यज्ञश्री:--यज्ञश्री; तत्--शिवस्कन्द का;सुत:--पुत्र; ततः--तब; विजय: --विजय; तत्ू-सुत:--उसका पुत्र; भाव्य:--होगा; चन्द्रविज्ञ:--चन्द्रविज्ञ; स-लोमधि:--लोमधि सहित; एते--ये; त्रिंशत्--तीस; नू-पतय:--राजा; चत्वारि--चार; अब्द-शतानि--शताब्दियों; च--तथा; षट्-पञ्ञासत्--छप्पन; च--तथा; पृथिवीम्--पृथ्वी पर; भोक्ष्यन्ति--शासन करेंगे; कुरु-नन्दन--हे कुरुओं के प्रियपुत्र |
बली का भाई, कृष्ण, पृथ्वी का अगला शासक बनेगा।
उसका पुत्र शान्तकरण होगाऔर शान्तकरण का पुत्र पौर्णमास होगा।
पौर्णमास का पुत्र लम्बोदर होगा जिसका पुत्रमहाराज चिबिलक होगा।
चिबिलक से मेघस्वाति उत्पन्न होगा जिसका पुत्र अटमान होगा।
अटमान का पुत्र अनिष्टकर्मा होगा।
उसका पुत्र हालेय होगा जिसका पुत्र तलक होगा।
तलकका पुत्र पुरीषभीरू होगा और उसके बाद सुनन्दन राजा बनेगा।
सुनन्दन के बाद चकोर तथाआठ बहुगण होंगे जिनमें से शिवस्वाति शत्रुओं का महान् दमनकर्ता होगा।
शिवस्वाति कापुत्र गोमती होगा जिसका पुत्र पुरीमान होगा।
पुरीमान का पुत्र मेदशिरा होगा।
उसका पुत्रशिवस्कन्द होगा जिसका पुत्र यज्ञश्री होगा।
यज्ञश्री का पुत्र विजय होगा जिसके दो पुत्रहोंगे--चन्द्रविज्ञ तथा लोमधि।
हे कुरुओं के प्रिय पुत्र, ये तीस राजा पृथ्वी पर कुल ४५६वर्षो तक अपनी प्रभुसत्ता बनाये रखेंगे।
"
सप्ताभीरा आवशभृत्या दश गर्दभिनो नृपा: ।
कड्ढाः षोडश भूपाला भविष्यन्त्यतिलोलुपा: ॥
२७॥
सप्त--सात; आभीरा:--आभीर; आवशभृत्या:--अवभूति नगरी के; दश--दस; गर्दभिन:--गर्द भी; नृूपा: --राजा;कड्ढाः--कंक; षोडश--सोलह; भू-पाला:--पृथ्वी के शासक; भविष्यन्ति--होंगे; अति-लोलुपा:--अत्यन्त लालची
तत्पश्चात् अवभृति नगरी की आभीर जाति के सात राजा होंगे और तब दस गर्दभी होंगे।
उनके बाद कंक के सोलह राजा शासन करेंगे और वे अपने अत्यधिक लोभ के लिएविख्यात होंगे।
"
ततोडष्टी यवना भाव्याश्षतुर्दश तुरुष्कका: ।
भूयो दश गुरुण्डाश्व मौला एकादशैव तु ॥
२८॥
ततः--तत्पश्चात्; अष्टौ--आठ; यवना:--यवनगण; भाव्या: --होंगे; चतु:-दश--चौदह; तुरुष्कका:--तुरुष्क; भूयः--इसके भी आगे; दश--दस; गुरुण्डा:--गुरुण्ड; च--तथा; मौला:--मौल; एकादश-ग्यारह; एब--निस्सन्देह; तु--तथा
तब आठ यवन शासन सँभालेंगे जिनके बाद चौदह तुरुष्क, दस गुरुण्ड तथा ग्यारहमौल वंश के राजा होंगे।
"
एते भोक्ष्यन्ति पृथिवीं दश वर्षशतानि च ।
नवाधिकां च नवतिं मौला एकादश क्षितिम् ॥
२९॥
भोष्ष्यन्त्यव्दशतान्यड् त्रीणि तैः संस्थिते ततः ।
किलकिलायां नृपतयो भूतनन्दोथ बड़िरि: ॥
३०॥
शिशुनन्दिश्चव तदभ्राता यशोनन्दिः प्रवीरकः ।
इत्येते वै वर्षशतं भविष्यन्त्यधिकानि घट् ॥
३१॥
एते--ये; भोश्ष्यन्ति--शासन करेंगे; पृथिवीम्-पृथ्वी पर; दश--दस; वर्ष-शतानि--शताब्दी; च--तथा; नव-अधिकाम्--और नौ; च--तथा; नवतिम्--नब्बे; मौला:--मौल; एकादश --ग्यारह; क्षितिम्ू--संसार पर; भोक्ष्यन्ति--शासन करेंगे; अब्द-शतानि--शताब्दी; अड़--हे परीक्षित; त्रीणि--तीन; तैः--उनके द्वारा; संस्थिते--सबों के मृत होनेपर; तत:ः--तब; किलकिलायाम्--किलकिला नगरी में; नू-पतय:--राजागण; भूतनन्द:--भूतनन्द; अथ--और तब;बड़िरि:--वंगिरि; शिशुनन्दि:--शिशुनन्दि; च--तथा; तत्--उसका; भ्राता--भाई; यशोनन्दि:--यशोनन्दि; प्रवीरक: --प्रवीरक; इति--इस प्रकार; एते--ये; बै--निस्सन्देह; वर्ष-शतम्--एक सौ वर्ष; भविष्यन्ति--होंगे; अधिकानि-- अधिक,और; षट्ू--छः ६
ये आभीर, गर्दभी तथा कंक १०९९ वर्षों तक पृथ्वी का भोग करेंगे और मौलगण ३००वर्षो तक राज्य करेंगे।
इन सबों के दिवंगत होने पर किलकिला नगरी में भूतनन्द, वंगिरि,शिशुनन्दि, उसका भाई यशोनन्दि तथा प्रवीरक नामक राजाओं का वंश उदय होगा।
किलकिला के ये राजा कुल मिलाकर १०६ वर्षो तक प्रभुत्व जमाये रखेंगे।
"
तेषां त्रयोदश सुता भवितारश्च बाहिका: ।
पुष्पमित्रोथ राजन्यो दुर्मित्रोउस्य तथेव चर ॥
३२॥
एककाला इसमे भूपाः सप्तान्ध्रा: सप्त कौशला: ।
विदूरपतयो भाव्या निषधास्तत एव हि ॥
३३॥
तेषाम्--उनके ( भूतनन्द तथा किलकिला वंश के अन्य राजाओं के ); त्रयोदश--तेरह; सुताः --पुत्र; भवितार: --हों गे;च--तथा; बाहिका:--बाहिक; पुष्पमित्र: --पुष्पमित्र; अथ--तब; राजन्य:--राजा; दुर्मित्र:--दुर्मित्र; अस्थ--उसका( पुत्र )) तथा-- भी; एब--निस्सन्देह; च--तथा; एक-काला:--एक ही समय शासन कर रहे; इमे--ये; भू-पा:--राजा;सप्त--सात; अन्ध्रा:-- अन्ध्र; सप्त--सात; कौशला:--कौशल देश के राजा; विदूर-पतय:--विदूर के शासक;भाव्या:--होंगे; निषधा:--निषध; तत:--तब ( बाहिकों के बाद ); एव हि--निस्सन्देह |
किलकिलाओं के बाद उनके तेरह पुत्र, बाहिक होंगे और उनके बाद राजा पुष्पमित्र,उसका पुत्र दुर्मित्र, सात अन्ध्र, सात कौशल तथा विदूर और निषध प्रान्तों के राजा भी एकही समय विश्व के अलग-अलग भागों में शासन करेंगे।
"
मागधानां तु भविता विश्वस्फूर्जि: पुरक्षयः ।
करिष्यत्यपरो वर्णान्पुलिन्दयदुमद्रकान् ॥
३४॥
मागधानाम्--मगध प्रान्त के; तु--तथा; भविता-होंगे; विश्वस्फूर्जि:--विश्वस्फूर्जि; पुरक्लय:--राजा पुरज्ञय; करिष्यति--बनायेगा; अपर: --दूसरे; वर्णानू--सारे सभ्य मनुष्य; पुलिन्द-यदु-मद्रकान्ू--पुलिन्द, यदु तथा मद्रक जैसे अछूतों में ॥
तब मागधों का राजा विश्वस्फूर्जि प्रकट होगा जो दूसरे पुरञ्लय के समान होगा।
वहसमस्त सभ्य वर्णों को निम्न श्रेणी के असभ्य मनुष्यों में बदल देगा, जिस तरह पुलिन्द, यदुतथा मद्गक होते हैं।
"
प्रजाश्वाब्रह्म भूयिष्ठा: स्थापयिष्यति दुर्मति: ।
वीर्यवान्श्षत्रमुत्साद्य पद्मवत्यां स वै पुरि ।
अनुगड़माप्रयागं गुप्तां भोक्ष्यति मेदिनीम् ॥
३५॥
प्रजा:--नागरिक; च--तथा; अब्रह्म--जो ब्राह्मण नहीं है; भूयिष्ठा: --मुख्य रूप से; स्थापयिष्यति--बनायेगा; दुर्मति:--मूर्ख ( विश्वस्फूर्जि ); वीर्य-वन्--शक्तिशाली; क्षत्रम्ू--क्षत्रिय जाति; उत्साद्य-विनष्ट करके; पद्मवत्याम्--पदावती में;सः--वह; बै--निस्सन्देह; पुरि--नगरी में; अनु-गड्ढम्--गंगा द्वारा ( हरद्वार ) से; आ-प्रयागम्--प्रयाग तक; गुप्ताम्--सुरक्षित; भोक्ष्यति--शासन करेगा; मेदिनीम्--पृथ्वी पर
मूर्ख राजा विश्वस्फूर्जि सारे नागरिकों को नास्तिकता की ओर ले जाएगा और अपनीशक्ति का उपयोग क्षत्रिय जाति को पूर्णतया ध्वंस करने में करेगा।
वह अपनी राजधानी पदावती में गंगा के उद्गम से लेकर प्रयाग तक शासन करेगा।
"
सौराष्ट्रावन्त्याभीराश्च शूरा अर्बुदमालवा: ।
ब्रात्या द्विजा भविष्यन्ति शूद्रप्राया जनाधिपा: ॥
३६॥
शौराष्ट्र--सौराष्ट्र; अवन्ती--अवन्ती; आभीरा:--तथा आभीर में निवास करने वाले; च--तथा; शूरा:--शूर॒ प्रान्त में रहनेवाले; अर्बुद-मालवा:--अर्बुद तथा मालव में रहने वाले; ब्रात्या:--सारे संस्कारों से विपथ; द्विजा:--ब्राह्मण;भविष्यन्ति--हों गे; शूद्र-प्राया:--शूद्रों जैसे ही; जन-अधिपा:--राजागण |
उस काल में सौराष्ट्र, अवन्ती, आभीर, शूर, अर्बुद तथा मालव प्रान्तों के ब्राह्मण अपनेसारे विधि-विधान भूल जायेंगे और इन स्थानों के राजवंशों के सदस्य शूद्रों जैसे ही होंगे।
"
सिन्धोस्तर्ट चन्द्रभागां कौन्तीं काश्मीरमण्डलम् ।
भोष्ष्यन्ति शूद्रा ब्रात्याद्या म्लेच्छाश्वाब्रह्मवर्चस: ॥
३७॥
सिन्धो:--सिन्धु नदी के; तटम्--तट पर; चन्द्रभागाम्--चन्धभागा; कौन्तीम्--कौन्ती; काश्मीर-मण्डलम्--काश्मीर काक्षेत्र; भोक्ष्यन्ति--शासन करेगा; शूद्रा:--शूद्रजन; ब्रात्य-आद्या:--ब्राह्मण-पद् से च्युत ब्राह्मण तथा दूसरे अयोग्य पुरुष;म्लेच्छा:--मांसभक्षक; च--तथा; अब्नह्म-वर्चस:ः--आध्यात्मिक शक्ति से रहित
सिन्धु नदी का तटवर्ती भाग तथा चन्द्रभागा, कौन्ती एवं काश्मीर के जनपद शूद्रों,पतित ब्राह्मणों और मांसाहारियों के द्वारा शासित होंगे।
वे वैदिक सभ्यता के मार्ग को त्यागकर समस्त आध्यात्मिक शक्ति खो चुकेंगे।
"
तुल्यकाला इसमे राजस्म्लेच्छप्राया श्र भूभूतः ।
एतेधर्मानृतपरा: फल्गुदास्तीत्रमन््यव: ॥
३८॥
तुल्य-काला:--एक ही समय शासन कर रहे; इमे--ये; राजन्ू--हे राजा परीक्षित; म्लेच्छ-प्राया:--अछूतों जैसे ही; च--तथा; भू-भूतः--राजागण; एते--ये; अधर्म--अधर्म; अनृत--तथा असत्य के प्रति; परा:--समर्पित; फल्गु-दा:--अपनीप्रजा को नाममात्र का लाभ देने वाले; तीव्र-- भयानक; मन्यव:--उनका क्रोध।
हे राजा परीक्षित, एक ही समय शासन करने वाले ऐसे अनेक असभ्य राजा होंगे और वेसब के सब दान न देने वाले, अत्यन्त क्रोधी तथा अधर्म और असत्य के महान् भक्त होंगे।
"
स्त्रीबालगोद्विजघ्नाश्न परदारधनाहता: ।
उदितास्तमितप्राया अल्पसत्त्वाल्पकायुष: ॥
३९॥
असंस्कृताः क्रियाहीना रजसा तमसावृता: ।
प्रजास्ते भक्षयिष्यन्ति म्लेच्छा राजन्यरूपिण: ॥
४०॥
स्त्री--स्त्रियों; बाल--बालकों; गो--गौवों; द्विज--तथा ब्राह्मणों के; घ्ता:--हत्यारे; च--तथा; पर--अन्य मनुष्यों के;दार--स्त्रियाँ; धन--तथा धन; आहता:--रुचि लेते हुए; उदित-अस्त-मित--बढ़ते तथा घटते स्वभाव वाले; प्राया:--अधिकांशत:; अल्प-सत्त्व--थोड़े बल वाले; अल्पक-आयुष:--अल्पायु वाले; असंस्कृता:--वैदिक अनुष्ठानों से शुद्धनहीं हुए; क्रिया-हीना:--विधि-विधानों से रहित; रजसा--रजोगुण से; तमसा--तथा तमोगुण से; आवृता:--ढके;प्रजा:--नागरिक; ते--वे; भक्षयिष्यन्ति--निगल जायेंगे; म्लेच्छा: --अछूत; राजन्य-रूपिण:--राजा के रूप में |
ये बर्बर लोग राजा के वेश में निर्दोष स्त्रियों, बच्चों, गौवों तथा ब्राह्मणों की हत्या करकेतथा अन्य पुरुषों की पत्नियों को लुभाकर तथा सम्पत्ति को लूट करके सारी प्रजा काभक्षण कर जायेंगे।
उनका स्वभाव अनियमित होगा, उनमें चरित्र बल नहीं के बराबर होगातथा वे अल्पायु होंगे।
निस्सन्देह, किसी वैदिक अनुष्ठान से शुद्ध न होने तथा विधि-विधानोंके अभाव में वे रजो तथा तमोगणों से परी तरह प्रच्छन्न होंगे।
"
तन्नाथास्ते जनपदास्तच्छीलाचारवादिनः ।
अन्योन्यतो राजभिश्च क्षयं यास्यन्ति पीडिता: ॥
४१॥
तत्-नाथा:--इन राजाओं को शासक रूप में पाने वाली प्रजा; ते--वे; जन-पदा:--नगरों के बासी; तत्--इन राजाओंके; शील--चरित्र; आचार---आचरण; वादिन:--तथा वाणी; अन्योन्यत:--परस्पर; राजभि:--राजाओं द्वारा; च--तथा;क्षयम् यास्यन्ति--विनष्ट हो जायेंगे; पीडिता: --सताये हुए
इन निम्न जाति के राजाओं द्वारा शासित प्रजा अपने शासकों के चरित्र, आचरण तथावाणी का अनुकरण करेगी।
वे लोग अपने अपने नायकों से तथा एक-दूसरे से सतायेजाकर विनष्ट हो जायेंगे।
"
