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अध्याय छह: यदु वंश प्रभास से सेवानिवृत्त हो गया
11.6श्रीशुक उबाचअथ ब्रह्मात्मजै: देवै: प्रजेशैरावृतो भ्यगात् ।
भवश्च भूतभव्येशो ययौ भूतगणैर्वृत: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; ब्रह्मा--ब्रह्मा; आत्म-जै: --अपने पुत्रों ( सनक इत्यादि ) द्वारा;देवैः--देवताओं द्वारा; प्रजा-ईशैः--प्रजापतियों ( मरीचि इत्यादि ) द्वारा; आवृत:--घिरा हुआ; अभ्यगात्--( द्वारका ) गये;भव:--शिवजी; च-- भी; भूत--सारे जीवों को; भव्य-ईशः--कल्याणप्रदाता; ययौ--गये; भूत गणै:-- भूत-प्रेतों के झुँड से;वृतः--घिरे |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तब ब्रह्माजी अपने पुत्रों तथा देवताओं एवं महान् प्रजापतियोंको साथ लेकर द्वारका के लिए रवाना हुए।
सारे जीवों के कल्याणप्रदाता शिवजी भी अनेकभूत-प्रेतों से घिर कर द्वारका गये।
"
इन्द्रो मरुद्धिर्भगवानादित्या वसवोउश्चिनौ ।
ऋभवोड्रिरसो रुद्रा विश्वे साध्याश्व देवता: ॥
२॥
गन्धर्वाप्सरसो नागा: सिद्धचारणगुहाका: ।
ऋषय: पितरश्लेव सविद्याधरकिन्नरा: ॥
३॥
द्वारकामुपसझ्ञग्मु: सर्वे कृष्णदिदृक्षव: ।
वपुषा येन भगवान्नरलोकमनोरमः ।
यशो वितेने लोकेषु सर्वलोकमलापहम् ॥
४॥
इन्द्र:--इन्द्र; मरुद्ध्रिः--वायु-देवों के साथ; भगवान्--शक्तिशाली नियन्ता; आदित्या: --बारह मुख्य देवता, जो कि अदिति केपुत्र हैं; वसव:--आठ वसु देवता; अश्विनौ--दो अश्विनी कुमार; ऋभव:--तथा ऋभुगण; अड्विरसः--अंगिरा मुनि के वंशज;रुद्रा:--शिवजी के अंश; विश्वे साध्या:--विश्वेदेवा तथा साध्य के नाम से विख्यात; च-- भी; देवता: -- अन्य देवता; गन्धर्व-अप्सरसः--स्वर्गलोक के गवैये तथा नर्तकियाँ; नागा:--दैवी सर्प; सिद्ध-चारण--सिद्धगण तथा चारणगण; गुह्मयकाः--तथापिशाच; ऋषय:--ऋषिगण; पितरः --पूर्वज; च-- भी; एव--निस्सन्देह; स--सहित; विद्याधर-किन्नरा: --विद्याधर तथाकिन्नरगण; द्वारकाम्--द्वारका; उपसझ्ञग्मु:ः--साथ पहुँचे; सर्वे--सभी; कृष्ण-दिदृदक्षव:ः --कृष्ण को देखने के लिए उत्सुक;वपुषा--दिव्य शरीर से; येन--जो; भगवान्-- भगवान्; नर-लोक -- समस्त मानव समाज को; मन:-रम:ः --मोहने वाला;यशः--यश; वितेने--विस्तार किया; लोकेषु--सारे ब्रह्माण्ड-भर में; सर्व-लोक--सारे लोकों में; मल--अशुद्धियाँ;अपहम्--जो समूल नष्ट करती है।
कृष्ण का दर्शन करने की आशा से शक्तिशाली इन्द्र अपने साथ मरुतों, आदित्यों, बसुओं,अश्विनियों, ऋभुओं, अंगिराओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, साध्यों, गन्धर्वों, अप्सराओं, नागों, सिद्धों,चारणों, गुह्कों, महान् ऋषियों, पितरों तथा विद्याधरों एवं किन्नरों को लेकर द्वारका नगरीपहुँचे।
कृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप द्वारा सारे मनुष्यों को मोह लिया और समस्त जगतों में अपनीमहिमा फैला दी।
भगवान् का यश ब्रह्माण्ड के भीतर समस्त कल्मष को नष्ट करने वाला है।
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तस्यां विश्राजमानायां समृद्धायां महर्द्धिभि: ।
व्यचक्षतावितृप्ताक्षा: कृष्णमद्भुतदर्शनम् ॥
५॥
तस्याम्--उस ( द्वारका ) में; विध्राजमानायाम्--सुशोभित; समृद्धायाम्-- अत्यन्त धनी; महा-ऋद्द्धभि:--महान् ऐश्वर्य से;व्यचक्षत--उन्होंने देखा; अवितृप्त--असम्तुष्ट; अक्षा:--नेत्रों वाले; कृष्णम्--कृष्ण को; अद्भुत-दर्शनम्--आश्चर्ययुक्त होकरदेखना।
समस्त प्रकार के श्रेष्ठ ऐश्वर्यों से समृद्ध उस द्वारका की सुशोभित नगरी में देवताओं नेश्रीकृष्ण के अद्भुत रूप को अतृप्त नेत्रों से देखा।
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स्वर्गेद्यानोपगैर्माल्यैश्छादयन्तो युदूत्तमम् ।
गीर्भिश्वित्रपदार्थाभिस्तुष्ठवुर्जगदी श्वरम् ॥
६॥
स्वर्ग-उद्यान--देवताओं के स्वर्गलोक के बगीचों से; उपगै:--प्राप्त किया गया; माल्यैः--फूल की मालाओं से; छादयन्त:--ढकते हुए; यदु-उत्तमम्--यदुश्रेष्ठ; गीर्भि: --वाणी से; चित्र--मोहक; पद-अर्थाभि:--जिससे युक्त शब्दों तथा विचारों से;तुष्ठवुः--प्रशंसा की; जगत्-ई श्ररम्-ब्रह्माण्ड के स्वामी को |
देवताओं ने समस्त ब्रह्माण्डों के परम स्वामी को स्वर्ग के उद्यानों से लाये गये फूलों के हारोंसे ढक दिया।
तब उन्होंने यदुबंश शिरोमणि भगवान् की मोहक शब्दों तथा भावमय बचनों सेप्रशंसा की।
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श्रीदेवा ऊचुःनताः सम ते नाथ पदारविन्दंबुद्धीन्द्रियप्राणमनोवचोभि: ।
यच्चिन्त्यतेउन्तहदि भावयुक्तिर्मुमुक्षुभि: कर्ममयोरुपाशात् ॥
७॥
श्री-देवा: ऊचु:--देवताओं ने कहा; नताः स्म--हम नतमस्तक हैं; ते--तुम्हारे; नाथ--हे स्वामी; पद-अरविन्दमू--चरणकमलोंको; बुद्धि-- अपनी बुद्धि से; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राण--प्राण-वायु; मनः--मन; वचोभि:--तथा शब्दों से; यत्--जो;चिन्त्यते--चिन्तन किये जाते हैं; अन्त: हदि--हृदय के भीतर; भाव-युक्तै:--योगाभ्यास में स्थिर चित्त वालों को; मुमुक्षुभि:ः--मुक्ति के लिए प्रयलशीलों के द्वारा; कर्म-मय--सकाम कर्म के फलों के; उरु-पाशात्-महान् बन्धन से।
देवता कहने लगे : हे प्रभु, बड़े बड़े योगी कठिन कर्म-बन्धन से मुक्ति पाने का प्रयास करतेहुए अपने हृदयों में आपके चरणकमलों का ध्यान अतीव भक्तिपूर्वक करते हैं।
हम देवतागणअपनी बुद्धि, इन्द्रियाँ, प्राण, मन तथा वाणी आपको समर्पित करते हुए, आपके चरणकमलों परनत होते हैं।
"
त्वं मायया त्रिगुणयात्मनि दुर्विभाव्यंव्यक्त सृजस्यवसि लुम्पसि तद्गुणस्थ: ।
नैतैर्भवानजित कर्मभिरज्यते वैयत्से सुखेउव्यवहितेडभिरतोनवद्य: ॥
८॥
त्वम्--तुम; मायया-- भौतिक शक्ति द्वारा; त्रि-गुणया--तीन गुणों से निर्मित; आत्मनि--अपने भीतर; दुर्विभाव्यम्--अचिन्त्य;व्यक्तमू--प्रकट जगत; सृजसि--उत्पन्न करते हो; अवसि--रक्षा करते हो; लुम्पसि--तथा संहार करते हो; तत्--उस प्रकृतिका; गुण--गुणों ( सतो, रजो तथा तमो ) के भीतर; स्थ:--स्थित; न--नहीं; एतैः--इनके द्वारा; भवान्ू--आप; अजित--हेअजेय स्वामी; कर्मभि:--कर्मो से; अज्यते--फँस जाते हैं; बै--तनिक ; यत्--क्योंकि; स्वे-- अपने; सुखे--सुख में;अव्यवहिते--बिना किसी रोक के; अभिरत:--सदैव लीन रहते हो; अनवद्य:--दोषरहित प्रभु |
है अजित प्रभुक, आप तीन गुणों से बनी अपनी मायाशक्ति को अपने ही भीतर अचिन्त्यव्यक्त जगत के सृजन, पालन तथा संहार में लगाते हैं।
आप माया के परम नियन्ता के रूप मेंप्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रिया में स्थित जान पड़ते हैं, किन्तु आप भौतिक कार्यो द्वारा कभीप्रभावित नहीं होते।
आप अपने नित्य आध्यात्मिक आनन्द में ही लगे रहते हैं, अतएवं आप परकिसी भौतिक संदूषण का दोषारोपण नहीं किया जा सकता।
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शुद्धि्नृणां न तु तथेड् दुराशयानांविद्याश्रुताध्ययनदानतपःक्रियाभि: ।
सत्त्वात्मनामृषभ ते यशसि प्रवृद्ध-सच्छुद्धया श्रवणसम्भूतया यथा स्यात् ॥
९॥
शुद्धिः--शुद्धि; नृणाम्--मनुष्यों की; न--नहीं; तु--लेकिन; तथा--इस तरह; ईड्यू--हे पूज्य; दुराशयानाम्ू--उनके, जिनकीचेतना कलुषित है; विद्या--सामान्य पूजा द्वारा; श्रुत--वेदों का श्रवण तथा उनके आदेशों का पालन; अध्ययन--विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन; दान--दान; तपः--तपस्या; क्रियाभि:--तथा अनुष्ठानों द्वारा; सत्त्व-आत्मनाम्--सतोगुणियों के; ऋषभ--हेसर्वश्रेष्ठ; ते--तुम्हारा; यशसि--यश में; प्रवृद्ध--पूर्णतया परिपक्व; सत्--दिव्य; श्रद्धया-- श्रद्धा द्वारा; श्रवण-सम्भूतया--सुनने की विधि से पुष्ट हुआ; यथा--जिस तरह; स्यात्--है।
हे सर्वश्रेष्ठ जिनकी चेतना मोह से कलुषित है, वे केवल सामान्य पूजा, वेदाध्ययन, दान,तप तथा अनुष्ठानों द्वारा अपने को शुद्ध नहीं कर सकते।
हमारे स्वामी, जिन शुद्ध आत्माओं नेआपके यश के प्रति दिव्य प्रबल श्रद्धा उत्पन्न कर ली है, उन्हें ऐसा शुद्ध जन्म प्राप्त होता है, जोऐसी श्रद्धा से रहित लोगों को कभी प्राप्त नहीं हो पाता।
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स्यान्नस्तवाड्प्रिशशुभाशयधूमकेतु:क्षेमाय यो मुनिभिरार््रहदोह्ममान: ।
यः सात्वतैः समविभूतय आत्मवद्धिर्व्यूहेडचिंत: सवनश: स्वरतिक्रमाय ॥
१०॥
स्थात्-वे हों; नः--हमारे लिए; तब--तुम्हारे; अद्धप्रि:--चरणकमल; अशुभ-आशय--हमारी अशुभ मनोवृत्ति के; धूम-केतु:ः--प्रलयंकारी अग्नि; क्षेमाय--असली लाभ पाने के लिए; यः--जो; मुनिभि: --मुनियों द्वारा; आर्द्र-हदा--पिघले हृदयोंसे; उह्ामान:--ले जाये जा रहे हैं; यः--जो; सात्वतैः-- भगवान् के भक्तों द्वारा; सम-विभूतये--उनके ही जैसा ऐश्वर्य पाने केलिए; आत्म-वद्धि:--आत्मसंयमियों के द्वारा; व्यूहे--वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध इन चार स्वांशों द्वारा; अर्थित:--'पूजित; सवनश:--प्रत्येक दिन की तीन संधियों पर; स्व:-अतिक्रमाय--इस जगत के स्वर्ग से परे जाने के लिए।
जीवन में सर्वोच्च लाभ की कामना करने वाले बड़े बड़े मुनि अपने उन हृदयों के भीतरसदैव आपके चरणकमलों का स्मरण करते हैं, जो आपके प्रेम में द्रवित हैं।
इसी तरह आपकेआत्मसंयमी भक्तगण, आपके ही समान ऐश्वर्य पाने के लिए स्वर्ग से परे जाने की इच्छा से,आपके चरणकमलों की पूजा प्रातः, दोपहर तथा संध्या समय करते हैं।
इस तरह वे आपके चतुर्व्यूह रूप का ध्यान करते हैं।
आपके चरणकमल उस प्रज्वलित अग्नि के तुल्य है, जोभौतिक इन्द्रिय-तृप्ति विषयक समस्त अशुभ इच्छाओं को भस्म कर देती है।
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यश्विन्त्यते प्रयतपाणिभिरध्वराग्नौ त्रय्या निरुक्तविधिनेश हविर्गृहीत्वा ।
अध्यात्मयोग उत योगिभिरात्ममायांजिज्ञासुभि: परमभागवतै:ः परीष्ट: ॥
११॥
यः--जो; चिन्त्यते-- ध्यान किया जाता है; प्रयत-पाणिभि:--हाथ जोड़े हुए लोगों के द्वारा; अध्वर-अग्नौ--यज्ञ की अग्नि में;तय्या--तीनों वेदों ( ऋगू, यजु: तथा साम ) के; निरुक्त--निरुक्त में दी हुई जानकारी; विधिना--विधि से; ईश--हे स्वामी;हवि:--हवन करने के निमित्त घी; गृहीत्वा--लेकर; अध्यात्म-योगे--आत्मा की अनुभूति हेतु योग-पद्धति में; उत-- भी;योगिभि:--योगियों द्वारा; आत्म-मायाम्--आपकी मोहने वाली माया के विषय में; जिज्ञासुभि:--जिज्ञासुओं द्वारा; परम-भागवतै:--अत्यन्त उन्नत हो चुके भक्तों द्वारा; परीष्ट:--पूजित |
जो लोग ऋग्, यजु: तथा सामवेद में दी गईं विधि के अनुसार यज्ञ की अग्नि में आहुति देतेसमय, वे आपके चरणकमलों का ध्यान करते हैं।
इसी प्रकार योगीजन आपकी दिव्य योगशक्तिका ज्ञान प्राप्त करने की आशा से आपके चरणकमलों का ध्यान करते हैं और जो पूर्णमहाभागवत हैं, वे आपकी मायाशक्ति को पार करने की इच्छा से, आपके चरणकमलों कीअच्छी तरह से पूजा करते हैं।
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पर्युष्टया तब विभो वनमालयेयंसंस्पर्थिनी भगवती प्रतिपतीवच्छी: ।
यः सुप्रणीतममुयाहणमाददत्नोभूयात्सदाड्घ्रिरशुभाशयधूमकेतु: ॥
१२॥
पर्युष्टया--मुरझाई हुई, बासी; तब--तुम्हारा; विभो--सर्वशक्तिमान भगवान्; वनमालया--फूल की माला से; इयम्--वह;संस्पर्थिनी --स्पर्धा करती हुई; भगवती-- भगवान् की स्त्री; प्रति-पत्नी-वत्--ईर्ष्यालु सौत की तरह; श्री:--लक्ष्मीदेवी; यः --जो भगवान् ( आप ); सु-प्रणीतम्--जिससे भलीभाँति सम्पन्न हो सके; अमुया--इससे; अर्हणम्-- भेंट; आददन्--स्वीकारकरते हुए; नः--हमारा; भूयात्--हो; सदा--सदैव; अद्धध्रि:--चरणकमल; अशुभ-आशय--हमारी शुद्ध इच्छाओं की; धूम-केतुः--विनाश की अग्नि।
हे सर्वशक्तिमान, आप अपने सेवकों के प्रति इतने दयालु हैं कि आपने उस मुरझाई हुई( बासी ) फूलमाला को स्वीकार कर लिया है, जिसे हमने आपके वशक्षस्थल पर चढ़ाया था।
चूँकि लक्ष्मी देवी आपके दिव्य वक्षस्थल पर वास करती हैं, इसलिए निस्सन्देह वे हमारी भेंटोंको उसी स्थान पर अर्पित करते देखकर उसी तरह ईर्ष्या करेंगी, जिस तरह एक सौत करती है।
फिर भी आप इतने दयालु हैं कि आप अपनी नित्य संगिनी लक्ष्मी देवी की परवाह न करते हुएहमारी भेंट को सर्वोत्तम पूजा मान कर ग्रहण करते हैं।
हे दयालु प्रभु, आपके चरणकमल हमारेहृदयों की अशुभ कामनाओं को भस्म करने के लिए प्रज्वलित अग्नि का कार्य करें।
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केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताकोयस्ते भयाभयकरोसुरदेवचम्वो: ।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन्पद: पुनातु भगवन्भजतामघं न: ॥
१३॥
केतु:--झंडे का डंडा; त्रि-विक्रम--बलि महाराज को जीतने के लिए भरे गये तीन पग; यत:--अलंकृत; त्रि-पतत्--तीनोंलोकों में गिरते हुए; पताक:--झंडा, जिस पर; यः--जो; ते--तुम्हारे ( चरणकमल ); भय-अभय-- भय तथा निर्भीकता;करः--कर ने वाले; असुर-देव--असुरों तथा देवताओं की; चम्बो:--सेनाओं के लिए; स्वर्गाय--स्वर्ग-प्राप्ति के लिए;साधुषु--साधु-देवताओं तथा भक्तों के बीच; खलेषु--दुष्ट; इतराय--इनसे विपरीतों के लिए; भूमन्--हे सर्वाधिक शक्तिशालीप्रभु; पाद:--चरणकमल; पुनातु--पवित्र करें; भगवन्--हे भगवान्; भजतामू--आपकी पूजा में लगे हुए; अघधम्-पापों को;नः--हमारे।
हे सर्वशक्तिमान प्रभु, आपने अपने त्रिविक्रम अवतार में ब्रह्माण्ड के कवच को तोड़ने केलिए अपना पैर ध्वज-दंड की तरह उठाया और पवित्र गंगा को तीन शाखाओं में तीनों लोकों मेंसे होकर विजय-ध्वजा की भाँति बहने दिया।
आपने अपने चरणकमलों के तीन बलशाली पगोंसे बलि महाराज को उनके विश्वव्यापी साम्राज्य सहित वश में कर लिया।
आपके चरण असुरों मेंभय उत्पन्न करते हैं, जिससे वे नरक में भाग जाते हैं और आपके भक्तों में निर्भीकता उत्पन्नकरके, उन्हें स्वर्ग-जीवन की सिद्धि प्रदान करते हैं।
हे प्रभु, हम आपकी निष्ठापूर्वक पूजा करनाचाह रहे हैं, इसलिए आपके चरणकमल कृपा करके हमारे सभी पापकर्मों से हमें मुक्त करें।
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नस्योतगाव इब यस्य वशे भवन्तिब्रह्मादयस्तनुभूतो मिथुरच्ामाना: ।
कालस्थ ते प्रकृतिपूरुषयो: परस्यशं नस्तनोतु चरण: पुरुषोत्तमस्य ॥
१४॥
नसि--नाक से होकर; ओत--नथे हुए; गाव:--बैल; इब--मानो; यस्य--जिसका; वशे--वश में; भवन्ति-- हो ते हैं; ब्रह्म-आदय:--ब्रह्मा तथा अन्य; तनु-भूत:ः--देहधारी जीव; मिथु:--परस्पर; अर्द्यमाना:--संघर्ष करते हुए; कालस्य--समय की शक्ति से; ते--तुम्हारा; प्रकृति-पूरुषयो:--प्रकृति तथा जीव दोनों; परस्थ--जो उनसे परे है; शम्--दिव्य भाग्य; न:ः--हमारेलिए; तनोतु--फैला सकें; चरण: --चरणकमल; पुरुष-उत्तमस्य-- भगवान् के आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, दिव्य आत्मा हैं, जो भौतिक प्रकृति तथा इसके भोक्ता दोनोंसे श्रेष्ठ हैं।
आपके चरणकमल हमें दिव्य आनन्द प्रदान करें।
ब्रह्मा इत्यादि सारे बड़े बड़े देवतादेहधारी जीव हैं।
आपके काल के वश में एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते वे सब उन बैलों जैसे हैं,जिन्हें छिदे हुए उनकी नाक में पड़ी रस्सी ( नथ ) के द्वारा खींचा जाता है।
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अस्यासि हेतुरुदयस्थितिसंयमाना-मव्यक्तजीवमहतामपि कालमाहुः ।
सोडयं त्रिणाभिरखिलापचवे प्रवृत्तःकालो गभीररय उत्तमपूरुषस्त्वम् ॥
१५॥
अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) का; असि--हो; हेतु:--कारण; उदय--सृष्टि; स्थिति-- पालन; संयमानाम्--तथा संहार; अव्यक्त--अव्यक्त प्रकृति का; जीव--जीव; महताम्--तथा महत तत्त्व का; अपि--भी; कालमू--नियंत्रक काल; आहुः--कहलाते हो;सः अयम्--यही व्यक्ति; त्रि-णाभि:--तीन नाभियों वाला; अखिल--हर वस्तु के; अपचये --हास में; प्रवृत्त:--लगा हुआ;काल:ः--काल, समय; गभीर--- अदृश्य, गम्भीर; रयः--जिसकी गति; उत्तम-पूरुष:-- भगवान्; त्वम्--तुम |
आप इस ब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथा संहार के कारण हैं।
आप प्रकृति की स्थूल तथासूक्ष्म दशाओं को नियमित करने वाले तथा हर जीव को अपने वश में करने वाले हैं।
कालरूपीचक्र की तीन नाभियों के रूप में आप अपने गम्भीर कार्यों द्वारा सारी वस्तुओं का हास करनेवाले हैं और इस तरह आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
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त्वत्त: पुमान्समधिगम्य ययास्य वीर्यधत्ते महान्तमिव गर्भममोघवीर्य: ।
सोयं तयानुगत आत्मन आण्डकोशंहैम॑ ससर्ज बहिरावरणैरुपेतम् ॥
१६॥
त्वत्त:--तुमसे; पुमान्ू--पुरुष-अवतार, महाविष्णु; समधिगम्य--प्राप्त करके; यया--जिससे; अस्य--इस सृष्टि का; वीर्यम्--बीज; धत्ते--स्थापित करता है; महान्तम्--महत तत्त्व; इब गर्भम्ू--सामान्य भ्रूण ( गर्भ ) की तरह; अमोघ-वीर्य:--वह जिसकावीर्य नष्ट नहीं होता; सः अयम्--वही ( महत तत्त्व ); तया--प्रकृति के साथ; अनुगत:--मिला हुआ; आत्मन: --अपने से;आण्ड-कोशमू--ब्रह्माण्ड; हैमम्--सोने का; ससर्ज--उत्पन्न किया; बहिः--बाहर की ओर; आवरणै:--खोलों सहित;उपेतम्--प्रदत्त, समन्वित |
हे प्रभु, आदि पुरुष-अवतार महाविष्णु अपनी सर्जक शक्ति आपसे ही प्राप्त करते हैं।
इसतरह अच्युत शक्ति से युक्त बे प्रकृति में वीर्य स्थापित करके महत् तत्त्व उत्पन्न करते हैं।
तबभगवान् की शक्ति से समन्वित यह महत् तत्त्व अपने में से ब्रह्माण्ड का आदि सुनहला अंडाउत्पन्न करता है, जो भौतिक तत्त्वों के कई आवरणों ( परतों ) से ढका होता है।
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तत्तस्थूषश्चव जगतश्च भवानधीशोयन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् ।
अर्थाञ्जुषन्नपि हषीकपते न लिप्तोयेउन्ये स्वतः परिहृतादपि बिभ्यति सम ॥
१७॥
तत्--इसलिए; तस्थूष: --प्रत्येक अचर वस्तु का; च--तथा; जगत:--चर; च-- भी; भवानू--आप ( हैं ); अधीश:--चरमनियन्ता; यत्--क्योंकि; मायया--प्रकृति द्वारा; उत्थ--उठा हुआ; गुण--( प्रकृति के ) गुणोंका; विक्रियया--विकार से ( जीवोंकी इन्द्रियों के कर्म से ); उपनीतान्--पास पास लाये गये; अर्थान्--इन्द्रिय-विषय; जुषन्--लिप्त रहकर; अपि--यद्यपि;हृषीक-पते--हे इन्द्रियों के स्वामी; न लिप्त:--आपको छू नहीं पाते; ये--जो; अन्ये--अन्य; स्वतः--अपने बल पर;'परिहतात्-- के कारण; अपि-- भी; बिभ्यति--ड रते हैं; स्म--निस्सन्देहहे प्रभु, आप इस ब्रह्माण्ड के परम स्त्रष्टा हैं और समस्त चर तथा अचर जीवों के परमनियन्ता हैं।
आप हषीकेश अर्थात् सभी इन्द्रिय-विषयक कार्यो के परम नियंता हैं और आप कभीभी इस भौतिक सृष्टि के भीतर अनन्त इन्द्रिय-विषय-कार्यों के अधीक्षण के समय संदूषित यालिप्त नहीं होते।
दूसरी ओर, अन्य जीव, यहाँ तक कि योगी तथा दार्शनिक भी उन भौतिकवस्तुओं का स्मरण करके विचलित तथा भयभीत रहते हैं केवल उन भौतिक पदार्थों को यादकरके जिनका परित्याग प्रकाश की खोज करते समय उन्होंने त्याग दिया था।
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स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डै: ।
पल्यस्तु षोडशसहस्त्रमनड्रबाणै-यस्येन्द्रियं विमधितुं करणैर्न विभ्व्य: ॥
१८ ॥
स्माय--मुसकान; अवलोक--चितवन का; लव--अंश द्वारा; दर्शित--दिखलाया हुआ; भाव--उनके विचार; हारि--मोहक;भ्रू-मण्डल-- भौंहों के अर्धवृत्र द्वारा; प्रहित-- भेजा गया; सौरत--दाम्पत्य प्रेम का; मन्त्र--सन्देश; शौण्डै:--प्रगल्भ; पत्य:--पत्ियाँ; तु--लेकिन; षोडश-सहस्त्रमू-सोलह हजार; अनड्र-- कामदेव के; बाणै:--बाणों द्वारा; यस्थ--जिसकी; इन्द्रियम्ू--इन्द्रियाँ; विमधितुम्--विश्लुब्ध करने के लिए; करणैः--अपनी सारी युक्तियों से; न विभ्व्य:--समर्थ नहीं थे ।
हे प्रभु, आप सोलह हजार अत्यन्त सुन्दर राजसी पत्नियों के साथ रह रहे हैं।
अपनी अत्यन्तलजीली तथा मुस्कान-भरी चितवन तथा सुन्दर धनुष-रूपी भौंहों से वे आपको अपने उत्सुकप्रणय का सन्देश भेजती हैं।
किन्तु वे आपके मन तथा इन्द्रियों को विचलित करने में पूरी तरहअसमर्थ रहती हैं।
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विभ्व्यस्तवामृतकथोदवहास्त्रिलोक्या:पादावनेजसरितः शमलानि हन्तुम् ।
आनुश्रवं श्रुतिभिरडप्रिजमड्रसड्रै-स्तीर्थद्वयं शुच्चिषिदस्त उपस्पूशन्ति ॥
१९॥
विभ्व्य:--समर्थ हैं; तब--तुम्हारी; अमृत-- अमृतमयी; कथा--कथाओं का; उद-वहा:--जल धारण करने वाली नदियाँ; त्रि-लोक्याः--तीनों लोकों की; पाद-अवने--आपके चरणकमलों को स्नान कराने से; ज--उत्पन्न; सरितः--नदियाँ; शमलानि--सारा दूषण; हन्तुम्--नष्ट करने के लिए; आनुश्रवम्-प्रामाणिक व्यक्ति से श्रवण-विधि से युक्त; श्रुतिभि: --कानों से; अद्भूप्रि-जम्--आपके चरणकमलों से निकली ( पवित्र नदी से युक्त ); अड्ड-सद्डैः--सीधे शारीरिक सम्पर्क से; तीर्थ-द्रयम्--ये दोप्रकार के तीर्थस्थान; शुचि-षद:--शुद्धि के लिए प्रयलशील; ते--तुम्हारे; उपस्पृशन्ति--साथ रहने के लिए पास आते हैं
आपके विषय में वार्ता रूपी अमृतवाहिनी नदियाँ तथा आपके चरणकमलों के धोने सेउत्पन्न पवित्र नदियाँ तीनों लोकों के सारे कल्मष को विनष्ट करने में समर्थ हैं।
जो शुद्धि के लिएप्रयत्नशील रहते हैं, वे अपने कानों से सुनी हुई आपकी महिमा की पवित्र कथाओं का सात्निध्यपाते हैं और आपके चरणकमलों से निकलने वाली पवित्र नदियों से उनमें स्नान करके, सात्निध्यप्राप्त करते हैं।
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श्रीबादरायणिरुवाचइत्यभिष्टूय विबुधे: सेश: शतधृतिहरिम् ।
अभ्यभाषत गोविन्दं प्रणम्याम्बरमाश्रित: ॥
२०॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिष्टूय-- प्रशंसा करके; विबुधे:--सारे देवताओंके साथ; स-ईशः--शिव समेत; शत-धूृति:--ब्रह्मा; हरिम्--परमे श्वर से; अभ्यभाषत--कहा; गोविन्दम्-- गोविन्द को;प्रणम्य--प्रणाम करके ; अम्बरम्-- आकाश में; आश्रित:--स्थित
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह ब्रह्माजी शिव तथा अन्य देवताओं समेतभगवान् गोविन्द की स्तुति करने के बाद स्वयं आकाश में स्थित हो गये और उन्होंने भगवान् कोइस प्रकार से सम्बोधित किया।
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श्रीब्रह्मोवाचभूमेर्भारावताराय पुरा विज्ञापित: प्रभो ।
त्वमस्माभिरशेषात्मन्तत्तथेवोपपादितम् ॥
२१॥
श्री-ब्रह्मा उबाच-- श्री ब्रह्मा ने कहा; भूमेः--पृथ्वी का; भार--बोझ; अवताराय--कम करने के लिए; पुरा--पहले;विज्ञापित:--प्रार्थना किये गये थे; प्रभो--हे प्रभु; त्वम्--तुम; अस्माभि:--हमारे द्वारा; अशेष-आत्मन्--हे सबों के असीमआत्मा; तत्ू--वह ( प्रार्थना ); तथा एब--जैसा हमने कहा, उसी तरह; उपपादितम्ू--पूरा हुआ
ब्रह्मा ने कहा : हे प्रभु, इसके पूर्व हमने आपसे पृथ्वी का भार हटाने की प्रार्थना की थी।
हेअनन्त भगवान्, हमारी वह प्रार्थना पूरी हुई है।
"
धर्मश्व स्थापित: सत्सु सत्यसन्धेषु वै त्वया ।
कीर्तिश्व दिश्लु विक्षिप्ता स्वलोकमलापहा ॥
२२॥
धर्म:--धर्म के सिद्धान्त; च--तथा; स्थापित:--स्थापित; सत्सु--पवित्र जनों में; सत्य-सन्धेषु--सत्य की खोज करने बालों मेंसे; वै--निस्सन्देह; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; कीर्ति:--तुम्हारी कीर्ति; च--तथा; दिक्षु--सारी दिशाओं में ; विक्षिप्ता--फैली हुई;सर्व-लोक--सारे लोकों के; मल--कल्मष; अपहा--दूर करने वाले।
हे प्रभु, आपने उन पवित्र लोगों के बीच धर्म की पुनर्स्थापना की है, जो सत्य से सदैवहढ़तापूर्वक बँधे हुए हैं।
आपने अपनी कीर्ति का भी सारे विश्व में वितरण किया है।
इस तरहसारा संसार आपके विषय में श्रवण करके शुद्ध किया जा सकता है।
"
अवतीर्य यदोर्वृशे बिश्रद्गूपमनुत्तमम् ।
कर्माण्युद्यामवृत्तानि हिताय जगतोकृथा: ॥
२३॥
अवतीर्य--अवतरित होकर; यदो:--राजा यदु के ; वंशे--वंश में; बिभ्रत्-- धारण करते हुए; रूपम्ू--दिव्य रूप; अनुत्तमम्--अद्वितीय; कर्माणि--कर्म ; उद्दाम-वृत्तानि--उदार कार्यों से युक्त; हिताय--लाभ के लिए; जगत:--ब्रह्माण्ड के; अकृथा: --आपने सम्पन्न किया।
आपने यदुवंश में अवतार लेकर अपना अद्वितीय दिव्य रूप प्रकट किया है और सम्पूर्णब्रह्माण्ड के कल्याण हेतु आपने उदार दिव्य कृत्य किये हैं।
"
यानि ते चरितानीश मनुष्या: साधव: कलौ ।
श्रण्वन्तः कीर्तयन्तश्न तरिष्यन्त्यज्ससा तम: ॥
२४॥
यानि--जिन; ते--तुम्हारे; चरितानि--लीलाओं को; ईश--हे परमे श्वर; मनुष्या: --मनुष्य; साधव: --सन्त-पुरुष; कलौ--कलियुग में; श्रृण्वन्तः--सुनते हुए; कीर्तयन्त:--कीर्तन करते हुए; च--तथा; तरिष्यन्ति--पार कर जायेंगे; अज्खसा--सरलतासे; तमः--अंधकार।
हे प्रभु, कलियुग में पवित्र तथा सनन््त-पुरुष, जो आपके दिव्य कार्यों का श्रवण करते हैं औरउनका यशोगान करते हैं, वे इस युग के अंधकार को सरलता से लाँघ जायेंगे।
"
यदुवंशेवर्तीर्णस्य भवत:ः पुरुषोत्तम ।
शरच्छतं व्यतीयाय पञ्जञविंशाधिकं प्रभो ॥
२५॥
यदु-वंशे--यदुकुल में; अवतीर्णस्य--अवतरित; भवत:--आपका; पुरुष-उत्तम--हे परम पुरुष; शरत्-शतम्--एक सौ शरदऋतुएँ; व्यतीयाय--व्यतीत करके ; पञ्ञ-विंश--पच्चीस; अधिकम्-- अधिक; प्रभो-हे प्रभुहे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्
हे प्रभु, आप यदुकुल में अवतरित हुए हैं और अपने भक्तों केसाथ आपने एक सौ पच्चीस शरद ऋतुएँ बिताई हैं।
"
नाधुना तेडखिलाधार देवकार्यावशेषितम् ।
कुलं च विप्रशापेन नष्टप्रायमभूदिदम् ॥
२६॥
ततः स्वधाम परम विशस्व यदि मन्यसे ।
सलोकाल्लोकपालान्नः पाहि बैकुण्ठकिड्डरानू ॥
२७॥
न अधुना-- और अधिक नहीं; ते--तुम्हारे लिए; अखिल-आधार--सभी वस्तुओं के आधार; देव-कार्य--देवताओं की ओर सेकिया गया कार्य; अवशेषितम्-शेष भाग; कुलम्--आपका वंश; च--तथा; विप्र-शापेन--ब्राह्मण के शाप से; नष्ट-प्रायम्ू--एक तरह से विनष्ट; अभूत्--हो गया है; इदम्--यह; ततः--इसलिए; स्व-धाम-- अपने धाम; परमम्--परम;विशस्व--प्रवेश कीजिए; यदि--यदि; मन्यसे--आप ऐसा मानते हैं; स-लोकान्--सारे लोकों के निवासियों सहित; लोक-पालान्--लोकों के संरक्षक; न:--हमको; पाहि--रक्षा करते रहें; वैकुण्ठ--विष्णु का वैकुण्ठ; किड्डरानू-- सेवकों को
हे प्रभु, इस समय देवताओं की ओर से, आपको करने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा।
आपने पहले ही अपने वंश को ब्राह्मण के शाप से उबार लिया है।
हे प्रभु, आप सारी वस्तुओं केआधार हैं और यदि आप चाहें, तो अब बैकुण्ठ में अपने धाम को लौट जाय।
साथ ही, हमारीविनती है कि आप सदैव हमारी रक्षा करते रहें।
हम आपके विनीत दास हैं और आपकी ओर से हम ब्रह्माण्ड का कार्यभार सँभाले हुए हैं।
हमें अपने लोकों तथा अनुयायियों समेत आपके सततसंरक्षण की आवश्यकता है।
"
श्रीभगवानुवाचअवधारितमेतन्मे यदात्थ विबुधे श्वर ।
कृतं वः कार्यमखिलं भूमेर्भारोउइवतारित: ॥
२८॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; अवधारितम्--समझा जाता है; एतत्--यह; मे--मेरे द्वारा; यत्ू--जो; आत्थ-- आपनेकहा है; विबुध-ईश्वर--हे देवताओं के नियन्ता, ब्रह्मा; कृतम्--पूर्ण हो चुका; वः--तुम्हारा; कार्यमू--कार्य; अखिलम्--सारा;भूमेः:--पृथ्वी का; भार:--भार; अवतारित: --हटा दिया गया।
भगवान् ने कहा : हे देवताओं के अधीश ब्रह्मा, मैं तुम्हारी प्रार्थाओं तथा अनुरोध कोसमझता हूँ।
पृथ्वी का भार हटाकर मैं वह सारा कार्य सम्पन्न कर चुका, जिस कार्य की तुमलोगों से अपेक्षा थी।
"
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम् ।
लोकं जिधृक्षद्रुद्धं मे वेलयेव महार्णव: ॥
२९॥
तत् इृदम्--इसी; यादव-कुलम्--यादव-वंश; वीर्य--उनकी शक्ति; शौर्य--साहस; थ्रिया--तथा एऐश्वर्य से; उद्धतम्--प्रवर्धित;लोकम्--सारा जगत; जिधघृक्षत्--निगल जाने की धमकी देते हुए; रुद्धमू--रोका हुआ; मे--मेरे द्वारा; वेलया--समुद्री तटद्वारा; इब--सहश; महा-अर्णव:--महासागर।
वही यादव-कुल, जिसमें मैं प्रकट हुआ, ऐश्वर्य में, विशेष रूप से अपने शारीरिक बल तथासाहस में, इस हद तक बढ़ गया कि वे सारे जगत को ही निगल जाना चाहते थे।
इसलिए मैंनेउन्हें रोक दिया है, जिस तरह तट महासागर को रोके रहता है।
"
यद्यसंहत्य हप्तानां यदूनां विपुलं कुलम् ।
गन्तास्म्यनेन लोकोयमुद्वेलेन विनड्छ््यति ॥
३०॥
यदि--यदि; असंहृत्य--बिना हटाये; हृप्तानामू--धमंड से चूर रहने वाले; यदूनाम्ू--यदुओं के; विपुलम्ू--विशाल; कुलम्--वंश को; गन्ता अस्मि--मैं जाता हूँ; अनेन--इस कारण से; लोक:--जगत; अयम्--यह; उद्वेलेन--उफान ( यदुओं के ) से;विनड्छ्यति--विनष्ट हो जायेगा।
यदि मुझे यदुवंश के इन अतिशय घमंड से चूर रहने वाले सदस्यों को हटाए बिना यह संसारत्यागना पड़ा, तो इनके असीम विस्तार के उफान से सारा संसार विनष्ट हो जायेगा।
"
इदानीं नाश आरब्ध:ः कुलस्य द्विजशापज:ः ॥
यास्यामि भवन ब्रह्मन्नेतदन््ते तवानघ ॥
३१॥
इदानीमू--इस समय; नाश: --विनाश; आरब्ध: --शुरू हो चुका है; कुलस्य--वंश का; द्विज-शाप-जः--ब्राह्मणों के शाप केकारण; यास्यामि-- मैं जाऊँगा; भवनम्--आवास-स्थान को; ब्रह्मनू-हे ब्रह्मा; एतत्-अन्ते--इसके पश्चात्; तब--तुम्हारे;अनघ--हे निष्पाप |
अब ब्राह्मणों के शाप के कारण मेरे परिवार का विनाश पहले ही शुरू हो चुका है।
हेनिष्पाप ब्रह्म, जब यह विनाश पूरा हो चुकेगा और मैं वैकुण्ठ जा रहा होऊँगा, तो मैं थोड़े समयके लिए तुम्हारे वास-स्थान पर अवश्य आऊँगा।
"
श्रीशुक उबाचइत्युक्तो लोकनाथेन स्वयम्भू: प्रणिपत्य तम् ।
सह देवगणैर्देव: स्वधाम समपद्यत ॥
३२॥
श्री-शुक: उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहे जाने पर; लोक-नाथेन--ब्रह्माण्ड के स्वामीश्रीकृष्ण द्वारा; स्वयम्-भू:--स्वतः जन्मे ब्रह्मा ने; प्रणिपत्य--गिर कर नमस्कार करते हुए; तमू--उनको; सह--सहित; देव-गणै:--सारे देवताओं; देव: --ब्रह्मा जी; स्व-धाम-- अपने निजी धाम; समपद्यत--लौट गये।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ब्रह्माण्ड के स्वामी द्वारा ऐसा कहे जाने पर स्वयम्भू ब्रह्माउनके चरणकमलों पर गिर पड़े और उन्हें नमस्कार किया।
तब सारे देवताओं से घिरे हुए ब्रह्माजीअपने निजी धाम लौट गये।
"
अथ तसयां महोत्पातान्द्वारवत्यां समुत्थितान् ।
विलोक्य भगवानाह यदुवृद्धान्समागतान् ॥
३३॥
अथ--त्पश्चात्; तस्याम्--उस नगरी में; महा-उत्पातान्ू-- भयंकर उपद्रवों को; द्वारवत्याम्-द्वारका में; समुत्थितान्ू--उठ खड़ेहुए; विलोक्य--देखकर; भगवानू-- भगवान् ने; आह--कहा; यदु-वृद्धान्ू--वृद्ध यदुवंशियों से; समागतान्--एकत्रित |
तत्पश्चात्, भगवान् ने देखा कि पवित्र नगरी द्वारका में भयंकर उत्पात हो रहे हैं।
अतःएकत्रित वृद्ध यदुवंशियों से भगवान् इस प्रकार बोले।
"
श्रीभगवानुवाचएते वै सुमहोत्पाता व्युत्तिष्ठन्तीह सर्वतः ।
शापश्च नः कुलस्यासीद्राह्मणे भ्यो दुरत्ययः ॥
३४॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; एते--ये; वै--निस्सन्देह; सु-महा-उत्पाता:--अतीव बड़े उत्पात; व्युत्तिष्ठन्ति--उठ खड़ेहो रहे हैं; हह--यहाँ; सर्वतः--सभी दिशाओं में; शाप:--शाप; च--तथा; न:--हमारे; कुलस्थ--परिवार का; आसीत्--होतारहा है; ब्राह्मणेभ्य:--ब्राह्मणों द्वारा; दुरत्ययः--निराकरण कर पाना ( टाल सकना ) असम्भव।
भगवान् ने कहा : ब्राह्मणों ने हमारे वंश को शाप दिया है।
ऐसे शाप का परिहार असम्भवहै, इसीलिए हमारे चारों ओर महान् उत्पात हो रहे हैं।
"
न वस्तव्यमिहास्माभिर्जिजीविषुभिरार्यका: ।
प्रभासं सुमहत्पुण्यं यास्यामो उह्यैव मा चिरम् ॥
३५॥
न वस्तव्यम्--नहीं निवास करना चाहिए; इह--यहाँ; अस्माभि:ः--हमारे द्वारा; जिजीविषुभि:--जीवित रहने की इच्छा से;आर्यकाः-हे शिष्ट लोगो; प्रभासम्-प्रभास नामक तीर्थस्थान को; सु-महत्--अत्यधिक; पुण्यम्--पवित्र; यास्याम:--हमचलें; अद्य--आज; एव--ही; मा चिरमू--बिना विलम्ब किये।
हे आदरणीय वरेषुजनो, यदि हम अपने प्राणों को अक्षत रखना चाहते हैं, तो अब औरअधिक काल तक हमें इस स्थान पर नहीं रहना चाहिए।
आज ही हम परम पवित्र स्थल प्रभासचलें।
हमें तनिक भी विलम्ब नहीं करना चाहिए।
श़" यत्र स्नात्वा दक्षशापादगृहीतो यक्ष्मणोदुराट् ।
विमुक्त: किल्बिषात्सद्यो भेजे भूयः कलोदयम् ॥
३६॥
यत्र--जहाँ; स्नात्वा--स्नान करके ; दक्ष-शापात्-- प्रजापति दक्ष के शाप से; गृहीत:ः--पकड़ा हुआ, पीड़ित; यक्ष्मणा--फेफड़ोंके रोग यक्ष्मा से; उडु-राट्--तारों का राजा, चन्द्रमा; विमुक्त:--मुक्त हुआ; किल्बिषात्--अपने पापों से; सद्यः--तुरन्त;भेजे-- धारण किया; भूय:--पुन:ः; कला--अपनी कलाओं की; उदयम्--अभिवृद्धि
एक बार दक्ष के शाप के कारण चन्द्रमा यक्ष्मा से पीड़ित था, किन्तु प्रभास क्षेत्र में स्नानकरने मात्र से चन्द्रमा अपने सारे पापों से तुरन्त विमुक्त हो गया और उसने अपनी कलाओं कीअभिवृद्धि भी प्राप्त की।
"
बयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितृन्सुरान् ।
भोजयित्वोषिजो विप्रान्नानागुणवतान्धसा ॥
३७॥
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्त्वा महान्ति वै ।
वृजिनानि तरिष्यामो दानेनौभिरिवार्णवम् ॥
३८॥
वयम्--हम; च--भी; तस्मिन्--उस स्थान पर; आप्लुत्य--स्नान करके; तर्पयित्वा--भेंट द्वारा तुष्ट करके, तर्पण करके;पितृनू--दिवंगत् पुरखों को; सुरानू--तथा देवताओं को; भोजयित्वा-- भोजन कराकर; उषिज: -- पूज्य; विप्रान्ू--ब्राह्मणों को;नाना--विविध; गुण-वता--स्वाद वाले; अन्धसा-- भोजन से; तेषु--उन ( ब्राह्मणों ) में; दानानि--दान, भेंटें; पात्रेषु--दान केयोग्य व्यक्ति; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; उप्त्वा--बोकर ( उन्हें भेंट करके ); महान्ति--महान्; बै--निस्सन्देह; वृजिनानि--संकट;तरिष्याम:--हम लाँघ सकेंगे; दानै:--अपने दान से; नौभि:--नावों से; इब--जैसे; अर्गवम्--समुद्र को
प्रभास क्षेत्र में स्नान करने, वहाँ पर पितरों तथा देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि देने,पूज्य ब्राह्मणों को नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन खिलाने तथा उन्हें ही दान का योग्य पात्र मानकर पर्याप्त दान देने से, हम निश्चय ही इन भीषण संकटों को पार कर सकेंगे, जिस तरह मनुष्यकिसी उपयुक्त नाव में चढ़ कर महासागर को पार कर सकता है।
"
श्रीशुक उबाचएवं भगवतादिष्टा यादवा: कुरुनन्दन ।
गन्तुं कृतथधियस्तीर्थ स्यन्दनान््समयूयुजन् ॥
३९॥
श्री-शुक: उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; भगवता-- भगवान् द्वारा; आदिष्टा:--आदेश दिये गये;यादवा:--यादवगण; कुरु-नन्दन--हे कुरुओं के प्रिय; गन्तुम्--जाने के लिए; कृत-धिय:--मन में संकल्प करके; तीर्थम्--पवित्र स्थान को
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुनन्दन, इस तरह भगवान् द्वारा आदेश दिये जाने परयादवों ने उस प्रभास क्षेत्र नामक पवित्र स्थान को जाने का निश्चय किया और उन्होंने अपने अपनेरथों में घोड़े जोत दिये।
"
तत्रिरीक्ष्योद्धवो राजन्श्रुत्ता भगवतोदितम् ।
इष्ठारिष्टानि घोराणि नित्यं कृष्णमनुत्रत: ॥
४०॥
विविक्त उपसड्म्य जगतामी श्वरेश्वरम् ।
प्रणम्य शिरिसा पादौ प्राज्ललिस्तमभाषत ॥
४१॥
तत्--वह; निरीक्ष्य--देखकर; उद्धव:--उद्द्वव; राजन्ू--हे राजा; श्रुत्वा--सुनकर; भगवता-- भगवान् द्वारा; उदितम्ू--कहाहुआ; हदृष्ठा--देखकर; अरिष्टानि-- अपशकुनों को; घोराणि-- भयानक; नित्यमू--सदैव; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण का;अनुव्रत:--श्रद्धालु अनुयायी; विविक्ते--एकान्त में; उपसड्रम्घ--पास जाकर; जगताम्--ब्रह्माण्ड के समस्त चर प्राणियों के;ईश्वर--नियन्ता के; ई श्वरमू--परम नियन्ता को; प्रणम्य--प्रणाम करके; शिरसा--सिर के बल; पादौ--उनके चरणों पर;प्राज्ललिः--विनती के लिए हाथ जोड़े; तम्--उनसे; अभाषत--बोले
हे राजन, उद्धव भगवान् कृष्ण के सदा से ही श्रद्धावान अनुयायी थे।
यादवों के कूच कोअत्यन्त निकट देखकर, उनसे भगवान् के आदेशों को सुनकर तथा भयावने अपशकुनों कोध्यान में रखते हुए, वे एकान्त स्थान में भगवान् के पास गये।
उन्होंने ब्रह्माण्ड के परम नियन्ता केचरणकमलों पर अपना शीश झुकाया और हाथ जोड़ कर उनसे इस प्रकार बोले।
"
श्रीउद्धव उबाचदेवदेवेश योगेश पुण्यश्रवणकीर्तन ।
संहत्यैतत्कुलं नूनं लोक॑ सन्त्यक्ष्यते भवान् ।
विप्रशापं समर्थोपि प्रत्यहन्न यदी श्वरः ॥
४२॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; देव-देव--देवताओं में सबसे महान् के; ईश--हे परम ई श्वर; योग-ईश--हे समस्तयोगशक्ति के स्वामी; पुण्य--जो पवित्र हैं; भ्रवण-कीर्तन--जिसकी महिमा का श्रवण तथा कीर्तन कर रहे आप; संहत्य--समेट कर; एतत्--इस; कुलम्--वंश को; नूनम्--ऐसा नहीं है; लोकम्--यह जगत; सन्त्यक्ष्यते--सदा के लिए त्यागने वालेहैं; भवान्ू--आप; विप्र-शापम्--ब्राह्मणों का शाप; समर्थ: --सक्षम; अपि--यद्यपि; प्रत्यहन् न--तुमने मिटाया नहीं; यत्--क्योंकि; ईश्वर:-थे सुप्रेमे लो
श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, हे देवों के परम ईश्वर, आपकी दिव्य महिमा का श्रवण औरकीर्तन करने से ही असली दया आती है।
हे प्रभु, ऐसा लगता है कि अब आप अपने वंश कोसमेट लेंगे और आप इस ब्रह्माण्ड में अपनी लीलाएँ भी बन्द कर देंगे।
आप सम्स्त माया-शक्तिके परम नियन्ता और स्वामी हैं।
यद्यपि आप अपने वंश को दिये गये ब्राह्मणों के शाप कोमिटाने में पूर्णतया समर्थ हैं, किन्तु आप ऐसा नहीं कर रहे हैं और आपका तिरोधान सन्निकट है।
"
नाहं तवाड्प्रिकमलं क्षणार्धभपि केशव ।
त्यक्तु समुत्सहे नाथ स्वधाम नय मामपि ॥
४३॥
न--नहीं; अहम्--मैं हूँ; तब--तुम्हारे; अद्धप्रि-कमलम्--चरणकमल; क्षण--एक क्षण का; अर्धमू--आधा; अपि-- भी;केशव--हे केशी असुर के मारने वाले; त्यक्तुमू--छोड़ पाना; समुत्सहे--सहन करने में समर्थ हूँ; नाथ--हे प्रभु; स्व-धाम--अपने निजी धाम; नय--ले चलिये; मामू--मुझको; अपि--भी |
हे स्वामी, भगवान् कृष्ण, मैं आधे क्षण के लिए भी आपके चरणकमलों का विछोह सहननहीं कर सकता।
मेरी विनती है कि आप मुझे भी अपने साथ अपने धाम लेते चलें।
"
तब विक्रीडितं कृष्ण नूनां परममड्रलम् ।
कर्णपीयूषमासाद्य त्यजन्त्यन्यस्पूहां जना: ॥
४४॥
तव--तुम्हारी; विक्रीडितमू--लीलाएँ; कृष्ण--हे कृष्ण; नृणाम्ू--मनुष्यों के लिए; परम-मड्रलम्--अत्यन्त शुभ; कर्ण--कानों के लिए; पीयूषम्--अमृत; आसाद्य--आस्वादन करके; त्यजन्ति--त्याग देते हैं; अन्य-- अन्य वस्तुओं के लिए;स्पृहामू--उनकी इच्छाएँ; जना: --व्यक्ति।
है कृष्ण, आपकी लीलाएँ मनुष्य प्रजाति के लिए अतीव शुभ हैं और कानों के लिए मादकपेय तुल्य हैं।
ऐसी लीलाओं का आस्वादन करने पर लोग अन्य वस्तुओं की इच्छाएँ भूल जाते हैं।
"
शय्यासनाटनस्थानस्नानक्रीडाशनादिषु ।
कथं त्वां प्रियमात्मानं वयं भक्तास्त्यजेम हि ॥
४५॥
सय्या--; आसन--; अटन--; स्थान--; स्नान--; क्रीडा--; आसन--; आदिषु--; कथम्--; त्वाम्--; प्रियम्--;आत्मानमू--; वयम्--; भक्ता:--; त्यजेम--; हि--हे प्रभु, आप परमात्मा हैं इसलिए, आप हमें सर्वाधिक प्रिय हैं।
हम सभी आपके भक्त हैं, तोभला हम किस तरह आपको त्याग सकते हैं या आपके बिना क्षण-भर भी रह सकते हैं? हमलेटते-बैठते, चलते, खड़े होते, नहाते, खेलते, खाते या अन्य कुछ करते आपकी ही सेवा मेंनिरन्तर लगे रहते हैं।
"
त्वयोपभुक्तर्रग्गन्धवासोलड्ढारचर्चिता: ।
उच्छिष्टभोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि ॥
४६॥
त्वया--तुम्हारे द्वारा; उपभुक्त--पहले भोगा हुआ; सत्रकु--माला की; गन्ध--सुगन्ध; वास:--वस्त्र; अलड्लार--तथा गहने;चर्चिता:--सज्जित; उच्छिष्ट-- आपका जूठन; भोजिन:--खाते हुए; दासा:--दास; तब--आपके; मायाम्--माया को;जयेम--हम जीत लेंगे; हि--निस्सन्देह।
आपके द्वारा उपभोग की गईं मालाओं, सुगन्धित तेलों, बस्त्रों तथा गहनों से अपने कोसजाकर तथा आपका जूठन खाकर हम आपके दास निश्चय ही आपकी माया को जीत सकेंगे।
"
वातवसना य ऋषय: श्रमणा ऊर्ध्रमन्थिनः ।
ब्रह्माख्यं धाम ते यान्ति शान्ता: सन्ष्यासीनोइमला: ॥
४७॥
वात-वसना:--दिगम्बर, नग्न; ये--जो हैं; ऋषय:--ऋषिगण; श्रमणा:--आध्यात्मिक अभ्यास के कट्टर अनुयायी; ऊर्ध्व-मन्थिन:--ऊरध्वरिता, जिनका सुरक्षित वीर्य सिर तक चढ़ जाता है; ब्रह्म-आख्यम्--ब्रह्म के नाम से विख्यात; धाम--निर्विशेषदिव्य धाम; ते--वे; यान्ति--जाने के लिए; शान्ता:--शान्त; सन्ष्यासिन:--संन्यासी लोग; अमला:--पापरहित ।
आध्यात्मिक अभ्यास में गम्भीरता से प्रयास करने वाले नग्न ऋषिगण, ऊरध्वरिता, शान्त तथानिष्पाप सन्यासी आध्यात्मिक धाम को प्राप्त करते हैं, जो ब्रह्न कहलाता है।
"
वबयं त्विह महायोगिन्भ्रमन्तः कर्मवर्त्मसु ।
त्वद्वार्तया तरिष्यामस्तावकैर्दुस्तरं तम: ॥
४८ ॥
स्मरन्तः कीर्तयन्तस्ते कृतानि गदितानि च ।
गत्युत्समितेक्षणक्ष्वेलि यन्नलोकविडम्बनम् ॥
४९॥
वयम्--हम; तु--दूसरी ओर; इह--इस जगत में; महा-योगिन्--हे महायोगी; भ्रमन््तः--घूमते हुए; कर्म-वर्त्ससु-- भौतिक कर्मके मार्ग पर; त्वत्--तुम्हारा; वार्तवा--कथाओं पर विचार-विमर्श द्वारा; तरिष्याम:--पार करेंगे; तावकै: --तुम्हारे भक्तों सहित;दुस्तरम्--दुर्लघ्य; तम:--अंधकार; स्मरन्तः कीर्तयन्त:--महिमा गान करते; ते--तुम्हारे; कृतानि--कार्यो को; गदितानि--शब्दों को; च--तथा; गति--चाल; उत्स्मित--मुसकान; ईक्षण--चितवन; क्षेलि--तथा मोहक लीलाएँ; यत्--जो हैं; नू-लोक--मानव समाज की; विडम्बनम्--नकल
हे महायोगी यद्यपि हम सकाम कर्म के मार्ग पर विचरण करने वाले बद्धजीव हैं, किन्तु हमआपके भक्तों की संगति में आपके विषय में सुन कर ही इस भौतिक जगत के अंधकार को पारकर जायेंगे।
इस तरह आप जो भी अद्भुत कार्य करते हैं और अद्भुत बातें करते हैं, उनको हमसदैव स्मरण करते हैं और उनका यशोगान करते हैं।
हम अत्यन्त भावपूर्ण होकर स्मरण करते हैं कि आप अपने विश्वस्त सुमाधुर्य दाम्पत्य का भक्तों के साथ श्रृंगारिक लीलाओं तथा ऐसीयौवनपूर्ण लीलाओं में लगे हुए आप किस तरह निर्भीक होकर मुसकाते तथा विचरण करते हैं।
हे प्रभु, आपकी प्रेममयी लीलाएँ इस भौतिक जगत के भीतर सामान्य लोगों के कार्यकलापों कीही तरह मोहित करने वाली हैं।
"
श्रीशुक उबाचएवं विज्ञापितो राजन्भगवान्देवकीसुतः ।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ॥
५०॥
श्री-शुक: उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह; विज्ञापित:--प्रार्थना किये जाने पर; राजन्ू--हे राजा;भगवान्-- भगवान्; देवकी -सुतः--देवकी के पुत्र; एकान्तिनम्ू--एकान्त में; प्रियम्-प्रिय; भृत्यम्ू--दास; उद्धवम्-उद्धवसे; समभाषत--बोले |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, इस तरह सम्बोधित किये जाने पर देवकी-पुत्रकृष्ण अपने प्रिय अनन्य दास उद्धव से गुह्य रूप में उत्तर देने लगे।
"
